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Tuesday, August 11, 2026

मडीवाला झील के किनारे

मडीवाला झील के किनारे

आज वे बहुत दिनों के बाद ‘गुरु पूजा’ में सम्मिलित हुए, बहुत अच्छा लगा। जैसा कि आर्ट ऑफ़ लिविंग में होता है, पहली बार मिलने पर भी सभी अपने परिवार की तरह मिले। एक बंगाली परिवार से मिलकर कुछ बातें कीं, उनका नन्हा पुत्र और सासुमाँ भी आयी थीं। कुछ अन्य बंगाली व हिन्दी भाषी परिवार भी थे।परसों शाम उनके यहाँ पूजा है, नन्हा व सोनू भी आयेंगे। पूजा के लिए आवश्यक सामान की लिस्ट उसे याद हो गई है। पाँच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, एक नया रूमाल, थोड़े से अक्षत, अगरबत्ती आदि। लेकिन गुरु पूजा का अर्थ केवल गुरु का आभार प्रकट करना ही नहीं है, बल्कि उनकी उपस्थिति को महसूस करना है। प्रार्थना के क्षणों में कई बार उसने मानसिक गुरु पूजा की है, जहाँ कोई सामग्री नहीं होती, किंतु फिर भी सब कुछ होता है। वहाँ चरण भी वास्तविक होते हैं यदि भावना वास्तविक है; अंततः सभी कुछ तो वे मन के माध्यम से ही देखते हैं, जाग्रत हो या स्वप्न, मन ही सब कुछ दिखाता है। ध्यान में भी जो चित्र दिखते हैं, मन ही उनका सृजन करता है। आज भी ब्लॉग्स पर नई पोस्ट प्रकाशित की। पिछले कुछ महीनों में आँख के इलाज के कारण लेखन में जो ढीलापन आ गया था, अब वह दूर हो रहा है। लेखन का अभ्यास बना रहेगा तभी काम आगे बढ़ेगा। ‘बाल्मीकि रामायण’ में अभी तक अयोध्या कांड ही चल रहा है। जीवन रहते उसे इस कार्य को पूरा करना है। शाम को पापाजी से बात हुई, वह कुछ अकेलेपन का अनुभव कर रहे थे, ऐसा उन्होंने कहा, पर बातचीत में सामान्य दिखे। 

आज सुबह उठी तो नूना एक स्वप्न देख रही थी, विचित्र सा स्वप्न, फिर ध्यान किया तो समाधान मिला। आनन्दमय कोष के बारे में सुना, सुनते-सुनते ही मन ध्यानस्थ हो गया था। दोपहर को कुछ देर नवनीत पढ़ा।शाम को  भांजे ने उन्हें भोजन के लिए बुलाया था। वहाँ उसकी नव विवाहिता पत्नी की छोटी बहन व माँ भी आ गयीं; उसके चचेरा भाई भी,  जो इसी शहर में नौकरी करता है। नन्हा व सोनू भी कुछ देर के लिए आये। ढोकला व गोलगप्पे खाकर वे चले गये। सोनू की मौसेरी बहन ने उन्हें डिनर के लिए बुला रखा था। सभी ने अपने अपने कार्य तथा शौक़ के बारे में बताया। चाहे वे कई दिन बाद मिलें पर मिलने पर कोई न कोई पुराना सिरा हाथ में आ जाता है और लगने लगता है, जैसे कल ही मिले थे। बच्चों से मिलकर एक ऊर्जा का अहसास तो होता ही है, उनकी नयी गृहस्थी देखकर उसे अपना अतीत भी एक पल के लिए याद आ गया था। 

आज सुबह से मन भक्ति रस में सराबोर था। नन्हा व सोनू ग्यारह बजे आ गये थे। शाम को घर का वातावरण संगीतमय हो गया था। नन्हे और सोनू ने चने, पूरी व रायता बनाया, एक परिचिता सूजी का हलवा बनाकर लायी थीं। पूजा करने के लिए आश्रम से एक शिक्षक आये थे, उनके साथ एक असमिया सत्संगी भी, जिनकी छोटी सी बेटी ने कई अच्छे-अच्छे भजन गाये। उनका मित्र परिवार भी आया था, पहली बार उनके नाती को देखा। गुरु पूजा के बाद हुए भजन गायन के बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। कल दोपहर को फिर एक विला में गुरु पूजा का आयोजन है। वे जाएँगे, कुछ और लोगों से परिचय बढ़ेगा। 

दोपहर को वे उनकी लेन में में एक शिक्षक के यहाँ गुरु पूजा में गये। गुरु पूर्णिमा पर मन-प्राण बहुत प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं। एक युवा साधिका से मिले, जिसने गुरु पूर्णिमा से पूर्व एक निश्चित संख्या में इन पूजाओं के आयोजन की ज़िम्मेदारी उठायी थी। उसी की प्रेरणा से यह काम हुआ है, गुरुजी ने उसे यह काम सौंपा है। शाम को आश्रम में भी गुरु पूजा उत्सव में शामिल होने का अवसर मिला। वर्षा के बावजूद अनेक लोग आये थे। एक सौ आठ शिक्षकों ने एक साथ पूजा में भाग लिया। उसके बाद वहीं प्रसाद ग्रहण किया। अन्नपूर्णा में आज विशेष भोजन बना था। पापाजी से बात हुई, छोटी भाभी लौट आयी है। उन्होंने ओशो द्वारा दिये प्रवचन ‘मौन की महत्ता’ के आधार पर कुछ बातें बतायीं। उनके अनुसार जैसे-जैसे भीतर का मौन बढ़ता जाता है, अहंकार व भय गिरने लगता है। सृजनात्मकता बढ़ती है और नयी संभावनाएँ पता चलती हैं। गुरु के शब्दों का काम भीतर के मौन को जगाना ही तो है। 

आज सुबह वे नन्हे यहाँ गये थे, उसके गेस्ट रूम  के लिए गीज़र पहुँचाना था। नन्हे ने मिलेट दोसा मँगवाया उनके नाश्ते के लिए, उनका रसोइया थोड़ा देर से आता है। वहाँ से वे बीटीएम स्थित मडीवाला झील तक गये, जो बैंगलुरु की बड़ी झीलों में से एक है। हवा ठंडी थी, सुबह की सैर के लिए अनेक लोग आये हुए थे। वे कुछ देर उसके किनारे टहलते रहे, पक्षियों की उड़ान भली लग रही थी, जो झील में स्थित एक द्वीप से उड़ते थे। उसके बाद बैंक का काम करना था। जून का हर कार्य योजना बद्ध तरीक़े से होता है, सुबह जल्दी निकलने के पीछे कारण था, ट्रैफ़िक नहीं मिलेगा, और क्योंकि सुबह टहलना नहीं हो पाया था, सो बैंक खुलने की प्रतीक्षा में वह काम भी हो गया। उन्होंने पड़ोसी की सहायता से, जो सीए हैं, इस बार का टैक्स भी जमा कर दिया है। शाम को फलों वाले बगीचे में कुछ तस्वीरें उतारीं, करौंदे के पेड़ लाल फलों से भर गये हैं, बहुत सुंदर लग रहे थे। दशकों पूर्व बचपन में सीतापुर में इसका पेड़ देखा था, तब के बाद यहीं आकर उसने करौंदे देखे हैं।  

आज दोपहर उसने छोटी बहन को फ़ोन किया तो वह क्लिनिक से घर आकर विश्राम कर रही थी।बड़ी भांजी ने फ़ोन उठाया। उससे बहुत सी बातें हुईं। वह अगले हफ़्ते  आस्ट्रेलिया जा रही है। कुछ महीनों में उसे कनाडा का पासपोर्ट मिल जाएगा। नूना को आश्चर्य होता है, कि कोई भारतीय कैसे अपना देश छोड़कर बाहर की नागरिकता ले लेता है। शायद उनके पास दोनों देशों की नागरिकता होती हो। आज सुबह वह उठी एक स्वप्न की याद बनी हुई थी, नन्हे को लेकर एक स्वप्न देखा था, लगा, जैसे वह कुछ उदास है। पर सब ठीक होगा, मन की तो आदत ही है तिल का ताड़ बनाने की।


Tuesday, July 26, 2016

गॉड लव्स फन


अगले दिन समुद्र तट पर कार्यक्रम था लोग फूल, मालाएं व उपहार दे रहे थे जिन्हें वह गुरूजी के हाथ से लेकर कार में रख कर आते थोड़ी देर में पुनः गुरूजी का हाथ भर जाता वह पकड़ा देते, रेत पर धोती पहन कर भागना बड़ा कठिन लग रहा था, डर था कहीं धोती में पैर न फंसे I गुरूजी को अब मंच पर जाना था, उन्हें आगे जाकर आसन बिछाना था, पर लोगों का हुजूम आगे जाने से रोक रहा था, लगभग भीड़ को धकेलते हुए जब तेजी से आगे बढ़े तो अचानक धोती खुल गयी, बहुत शर्म आयी, पर इतनी भीड़ में किसी का ध्यान नहीं था लोग गुरूजी की झलक पाने को बेताब थे जो अभी आने वाले थे, आसन बिछाने का काम किसी अन्य सहयोगी को सौंपा और किनारे पर जाकर धोती ठीक करने लगे, गुरूजी मंच पर पहुँच गए और अपनी जगह पर जाकर बैठ गये, रैम्प पर चल कर जब वह लौटे तो माइक हटा कर मुस्कुराते हुए बोले, अब सब टाइट है न ? हनी शर्म से पानी-पानी हो गये, कहाँ वह सोच रहे थे अच्छा हुआ किसी ने देखा नहीं, गुरूजी तो काफी पीछे थे, अब लगता है गुरूजी ठीक कहते हैं, God Loves Fun” I

उसी टूर की बात है, एक शाम दिन भर के थके एक हाल में जमीन पर ही अपने बैग पर सर रखकर लेट गये, सबके लिये कमरे नहीं थे, मच्छर भी काट रहे थे, माँ की याद भी आ रही थी, अपने घर का सुविधाजनक वातावरण छोड़ कर यहाँ अकेले सोये हैं, मन बहुत उदास था, सोचते-सोचते नींद आ गयी I सुबह क्या देखते हैं एक वरिष्ठ शिक्षक भी निकट ही फर्श पर सोये हैं I उनसे पूछा आपको तो सोने का स्थान मिला था फिर यहाँ कैसे? उनका जवाब सुनकर आँखों से अश्रुपात होने लगा, वे बोले आधी रात को गुरूजी का फोन आया, हनी हाल में अकेला रो रहा है, उसके पास जाओ I लगा कोई है जो माँ से भी ज्यादा ध्यान रखता है I पल भर में सारा दर्द कृतज्ञता में बदल गया I

यात्रा समाप्त हुई और वह घर लौटे, बहुत कुछ बदल चुका था, जीने में आनंद आ रहा था I पहले मन में क्रोध था, हिंसा थी, गुस्सा आने पर हाथ में पकड़ी वस्तु तक तोड़ देता था, why-why मन अब  Wow-Wow मन में बदल चुका था I प्रश्न वाचक चिन्ह ? का घुमाव सीधा होकर विस्मय बोधक ! चिन्ह में परिवर्तित हो गया था I खुशी-खुशी कॉलेज गये, कोर्स कर लिया था, गुरूजी के साथ रहे थे मन एक अद्भुत आनंद व शक्ति का अनुभव कर रहा था I पहले ही दिन कुछ लड़के पकड़ कर रैगिंग के लिये ले गए, मन में जरा भी डर नही था, उन्होंने व्यर्थ के सवाल पूछने शुरू किये, व्यर्थ के काम करने को कहे, मना किया तो दस-बारह लड़कों ने पकड़ लिया और उनके नेता ने लोहे की एक चेन निकाल ली I गुरूजी ने कहा था कि यदि किसी के मन, वाणी और भाव से हिंसा विलीन हो जाती है तो उसके सामने हिंसक प्राणी भी हिंसा त्याग देता है I जरा भी भय नहीं लग रहा था, भीतर गुरूजी के वचनों के प्रति विश्वास था, अचानक उस लड़के ने मारने के लिये उठाया हाथ नीचे कर लिया, कॅालर से पकड़ कर धक्का दिया और वे सब चले गये I उस दिन पता चला कि सबसे बड़ी ताकत क्या है? कि वे ज्यादा शक्तिशाली थे या भीतर का प्रेम व आनंद !  

Friday, January 9, 2015

ईश्वर का विधान


विवेक रूपी बाण और वैराग्य रूपी धनुष सदा अपने साथ रखना है, जैसे ही कामना रूपी राक्षसी प्रकट हो तो उसका विनाश किया जा सके. ईश्वर की भक्ति का अर्थ है माया से युद्ध, मन की शक्ति का विकास ईश्वर भक्ति में ही होता है. कल उसने चौथी बार सुदर्शन क्रिया की. हर बार की तरह कल भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ. सुख की अनुभूति तो हुई ही फिर स्लेटी फूलों के मध्य नील रंग का कमल दिखा जो बेहद चमक लिए था, फिर कई रंगों के प्रकाश दीखते रहे. कल की क्रिया के दौरान एक बार भी भय का अनुभव नहीं हुआ और समय भी बहुत कम लगा. कुछ देर और क्रिया चलती तो ठीक था पर बुद्धि में अनाग्रह रहे तो ही उचित है. कल योग शिक्षक से उसने कहा कि उसे लग रहा है आज परमात्मा से उसका appointment है. और वह कल उस क्षण से उसके साथ है, बल्कि उसके पहले से ही, हर पल हर क्षण उसके साथ है, वह ख़ुशी बनकर उसके पोर-पोर में समा गया है. सुदर्शन क्रिया में सचमुच सु-दर्शन होते हैं, अद्भुत अनुभव होते हैं. श्री श्री के प्रति मन कृतज्ञता से भर जाता है और उनके योग शिक्षक के प्रति भी. जीवन में एक उजाला बनकर, आनंद का स्रोत बनकर वह उनके जीवन में आए हैं. जून का कहना है कि वे उन्हें एक बार फिर खाने पर बुलाएँ. इस समय साढ़े दस बजे हैं, सब कुछ कितना शांत लग रहा है. आज एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है.

मन प्रशांत होगा तभी उत्तम सुख की प्राप्ति होगी. संशय, आलस्य, प्रमाद से विमुक्त मन ही शांत होगा. शांत मन ही प्रसन्न रहेगा और यही प्रसन्न मन ही ईश्वर को पा  सकता है. वह देह से स्वयं को पृथक जानता है. स्वयं को आत्मा के स्तर पर ले जाकर परमात्मा के सान्निध्य का सुख प्राप्त करता है. वह पूर्ण अमृत का स्वाद लेता है, उसके आनंद की निरंतर वृद्धि होती है. प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है. वह ईश्वर जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की समझ देता है, पग-पग पर उनका हाथ थाम लेता है, वह नितांत अपने से भी अपना ईश्वर ही सच्चा मित्र है. उसका नाम ही अंतर्मन को वर्तमान की शांत जलधारा पर स्थिर रखता है. ऐसे प्रभु का सत्संग गुरू कृपा से आज शाम उन्हें प्राप्त होने वाला है.

अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक से बात हुई, उनका जन्मदिन पहली जुलाई को है. अभी वह ऋषिकेश जायेंगे फिर डिब्रूगढ़ और फिर तेजपुर ‘साधना’ के लिए, और कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. मन को पवित्र रखने तो सब कुछ अपने आप होता जाता है. ईश्वर हर जगह है उसको देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सभी में ईश दर्शन करके सभी को अपने समान जानकर कोई ईश्वर की अनुभूति कर सकता है. कल शाम क्लब में योग शिक्षक को सुना, फिर एक सखी के यहाँ उनके भजन सुने. एक व्यक्ति इतना शांत, इतना पवित्र, इतना मधुर, समदर्शी और भक्तिभाव से पूर्ण हो सकता है, गुरू के सभी लक्षण उनमें हैं. मन श्रद्धा से भर जाता है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जीवन में भी प्रभु प्रेम की वर्षा हो रही है. लेकिन ईश्वर के प्रति वह तड़प, वह खिंचाव जो प्रथम क्रिया के बाद उसने अनुभव किया था वह शांत हो गया है. अब वह उससे एक पल को भी दूर नहीं है, उसके नाम का मानसिक जप वर्तमान में रहने की प्रेरणा देता है. वर्तमान में जीना व्याधियों से मुक्त रखता है. मन फूल की तरह नित नवीन बनकर खिला रहत है.

कल कोर्स का अंतिम दिन था, ध्यान किया फिर सामूहिक भोज व सत्संग, लौटते-लौटते उन्हें साढ़े दस हो गये. सुबह पांच बजे उठाने का वादा जून ने शिक्षक से किया था. उन्होंने उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभाया है. चार बजे ही उसकी नींद भी खुली पर उठने की चेष्टा नहीं की. पांच बजे उसे एक स्वप्न आया, कोई कह रहा है, 'पांच बज गये', 'पांच गये'. वह ईश्वर थे या उसकी चेतना.
उसके अंतर में न जाने कहाँ से एक कसक या कचोट ने प्रवेश पा लिया है. यह महीनों बाद हुआ हुआ है, सो यह अपरिचित, अनजाना मेहमान अप्रिय लग रहा है. कल दोपहर से इसका आरम्भ हुआ होगा, एक क्षण को भी सजग न रहो तो कामनाएं मन पर अधिकार जमा लेती हैं. अपने आत्मभाव से वे च्युत हो जाते हैं. ईश्वर का विधान बहुत कठोर है, जिस क्षण उसका पथ छोड़ा अथवा छोड़ने का भाव भी मन में आया तो उसका फल मिले बिना नहीं रहता. मन यदि सद् मार्ग पर चले तो आत्मसुख में रहता है. पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जाका नाम. वह ईश्वर जब तक पूरा नहीं मिलता, ज्ञान पूर्ण नहीं होता तभी तक यह विचलन, विक्षेप मन पर छाने का साहस कर सकते हैं. उसका लक्ष्य तो उस पूरे को पाना ही है. वही इसका रास्ता बता सकते हैं. मन और देह में जब तक आसक्ति रहेगी तब तक वह नहीं मिलेगा. अपने अहं को तुष्टि देने का भाव, सुख-सुविधाओं का आकर्षण जब तक रहेगा वह अनवरत सुख इसी तरह बीच-बीच में लुप्त होगा. यही दुःख लेकिन उसी मार्ग पर स्थित करेगा, जब प्रार्थना और हृदय एक हो जाते हैं तभी उसका अभ्युदय होता है. ध्यान ही उसे पावन करेगा. उसकी कृपा अपार है, वे अकृतज्ञ होकर उससे और-और मांगते हैं. उलटी चल चलते दीवाने, दीदारे यार करते आँख बंद करके !







Friday, December 19, 2014

हास्य कवि सम्मेलन


आज सुबह वे चार बजे उठे और 'क्रिया' आदि शीघ्रता से की. नन्हे को छह बजे विशेष कक्षा के लिए जाना था पर गाड़ी न मिलने की वजह से नहीं जा सका. घर पर ही पढ़ रहा है. आज शनिवार है, म्यूजिक सर आएंगे, उससे पूर्व थोडा अभ्यास कर लेना उचित होगा. सुबह दीदी को फोन किया, कल उनकी शादी की सालगिरह थी. छोटी ननद की परसों थी. उन्हें कुछ याद नहीं था. मन एक अलग ही स्तर पर रहता है आजकल. वे लोग योग शिक्षक को अपने घर आमंत्रित कर रहे हैं, देखें, वह समय निकल पाते हैं या नहीं. जून ने कहा, उन्हें लेने वे स्वयं भी जा सकते हैं. क्लब में हिंदी हास्य कवि सम्मेलन होने वाला है, वे शाम को कवियों से मिलने भी जायेंगे, कार्यक्रम सात बजे शुरू होगा. वह यह सब लिख रही है क्योंकि स्वयं को याद दिलाना चाहती है, विशेष आग्रह न रखे तो इच्छा पूर्ण होने का चांस ज्यादा है. वैसे भी उसकी मानसिक स्थिति ऐसी है की जहाँ उस एक परमात्मा की स्मृति के सिवा किसी इतर वस्तु या व्यक्ति के लिए आग्रह एक हद तक ही है. शिक्षक की बात अलग है, उनके लिए मन सदा श्रद्धा युक्त रहता है, साथ ही कवि के लिए भी, क्योंकि कवि भी स्रष्टा होता है, वह जीवन को एक नई नजर से देखता है. ‘योग वसिष्ठ’ में आज जो कुछ भी उसने पढ़ा वह art of living में भी सिखाया गया है, इतनी पुरानी पुस्तक और इतना आधुनिकतम ज्ञान, सत्य है ज्ञान एक है, सदा-सर्वदा एक..जैसे सत्य एक है और ईश्वर एक है, हर काल में हर युग में !

कब सुमिरोगे राम ? बालपन में खेल घुमायो, तरूपन में कम, अब तुम कब सुमिरोगे राम ? आज बाबाजी ने कहा. उन्हें देखकर लगता है, अंतर में कितना ज्ञान समेटे हैं. अनंत शांति और प्रेम भी. तत्व का बोध जिसे है वही मार्ग दिखा सकता है. जीवात्मा परमात्मा का सनातन अंश जो है. अन्तर्मुखी होकर उन्होंने अपने भीतर से पाया है यह सत्य. मृत्यु से पूर्व बल्कि वृद्धावस्था से पूर्व यह अनुभव दृढ हो जाये तभी जीवन सफल है. मन किसी भी स्थिति में अशांत न हो, क्योंकि यह उस अन्तेवासी का अपमान होगा जो आनंद स्वरूप है. उन्होंने एक और बात कही, ईश्वर के प्रति प्रेम का बखान करना ही दर्शाता है कि अभी प्रेम कच्चा है. जब कोई प्रेममय होता है तो उसे खबर नहीं होती, दूसरे ही पहले जानते हैं कि परमात्मा के प्रेम में पागल हो गया है ! प्रभु प्रीति अचल हो इसके लिए तो सजग रहना ही है पर वह दिखावा न बन जाये इसका भी विशेष प्रयत्न करना होगा क्योंकि जो जानता है वह कहता नहीं और जो कहता है वह अभी पूरा जानता नहीं. कल शाम वे कवि सम्मेलन देखने, सुनने गये, उससे पूर्व वह गेस्ट हाउस भी गयी उन लोगों से मिलने. सम्मेलन में वे बहुत हँसे शायद पूरे साल में उतना नहीं  हँसे होंगे. बाद में उसे ‘धन्यवाद ज्ञापन’ व्यक्त करने के लिय कहा गया जो शायद वह गुरू कृपा से बोल ही सकी.

आज नन्हे का स्कूल काटी बीहू के लये बंद है, उसका उपवास का दिन है. उसने सुना था एक बार बाबाजी कह रहे थे, उपवास से जीवनी शक्ति सुव्यस्थित होती है. उपवास का अर्थ है स्वयं के निकट रहना ! आश्विन शुरू हो गया है, एक माह बाद दीपावली होगी. मौसम आज स्वच्छ है, धूप खिली है. बगीचे में काम करने के लिए अच्छा दिन. शाम को फूलों के बीज रोपने हैं. कल उसने पिता को एक पत्र लिखा. कल शाम को क्रिया के बाद अद्भुत अनुभव हुआ. गुरुमाँ ने आज संत नामदेव की कथा सुनाई. उनका मन अन्तर्मुखी हुआ, जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहे थे वह भीतर मिल गया, जैसे नानक और कबीर को मिला था, जैसे उन्हें मिला है. जून का फोन आया, आज ऑफिस में एक ही शिफ्ट है, सो देर से आयेंगे सो एक घंटा अभ्यास कर सकती है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, गृहणी के हाथ का प्लास्टर कल खुला था, मिठाई खिलाई और दीवाली के लिए लाई बिजली की दो झालरें भी दिखाईं. दीपावली का प्रकाश उनके अंतर में भी उजाला करे, इस दीवाली को यही प्रार्थना करनी है.



Friday, December 5, 2014

खुद से मुलाकात


कल “आर्ट ऑफ लिविंग” का पहला दिन था, उनके शिक्षक बंगाली हैं, अति सहजता से उन्होंने सिखाया. उज्जायी प्राणायाम भी किया, इसके अतिरिक्त मुस्कुराने के लाभ, अपने आस-पास के लोगों से मिलना, समय की पाबंदी और जो भी कार्य करें अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा उसमें लगा देनी चाहिए, आदि बताया. मानव अपनी  ऊर्जा का कुछ प्रतिशत ही कार्य में लाता है. आज भी ‘जागरण’ में सुंदर वचन सुने, ईश्वर की परम चेतना के अनुसार यदि उसकी लघु चेतना हो जाये तो मन स्थिर हो सकता है. जगत की वस्तुओं में यदि मन को लगायें तो मन अस्थिर रहता है, क्योंकि वस्तुएं तो बदल ही रही हैं, मन भी प्रतिक्षण बदल रहा है. स्थिर है तो केवल परमात्मा..मानव का अंतिम लक्ष्य तो वही है और वह भीतर है, कहीं दूर जाना नहीं. प्रेम ही उस तक पहुँचने का मार्ग है. अपने अंतर को कोई इतना प्रेम से भर ले कि दूसरी किसी बात के लिए स्थान न रहे, आस-पास के वातावरण को, लोगों को अपने आप इसका भास होने लगे. कहीं कोई काँटा न रहे, कोई उहापोह न रहे. परमात्मा  यही तो चाहते हैं, वह कहते हैं कि उन्हें भी साधक का उतना ही ख्याल है जितना साधक को उनका. वह साधक का कुशल-क्षेम वहन करने को तत्पर हैं, सिर्फ उसे ही अपने बन्धनों को तोडना है, बंधन जो अज्ञान के हैं, मोह और अविद्या के हैं. तीनों गुणों के हैं. उसे शुद्ध स्तर पर मन को ले जाना है, तभी भक्ति व ध्यान सफल होगा.

जो अपने आप में संतुष्ट रहता है, उसके आनंद का स्रोत ईश्वर होता है न कि संसार के विषय. वही स्थितप्रज्ञ है, आत्मानंदी ही ऐसा कर सकता है. कल कोर्स की दूसरी क्लास थी. शिक्षक बेहद मृदुभाषी हैं और सहज रहते हैं. ज्ञान का भंडार सबके भीतर है उसे वह उजागर करने में सहायक हैं ऐसा उन्होंने कहा. कई उदाहरणों तथा कहानियों के माध्यम से अपनी बातों को स्पष्ट किया. कल जून और वह लगभग आठ बजे वापस आये. नन्हा ठीक था, वह अकेले रहना पसंद करता है शायद उसकी तरह. उसे सुबह उठकर बात करना भी पसंद नहीं है, चुपचाप बिना मुस्कुराये अपना काम करता रहता है. वे उसे बदलने का प्रयास व्यर्थ ही करते हैं. आज भी वह छह बजे ही स्कूल चला गया. गुरू माँ तथा बाबाजी दोनों से भेंट हुई, दोनों ने यही कहा कि भौतिक वस्तुओं में आनंद खोजने जायेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. ‘आत्मा’ में भी सुना, सच्चे आनंद का स्रोत मानव स्वयं ही है. उसे अपना साथ जब भला लगता है तभी वह खुश होता है. सुबह प्राणायाम भी किया, अच्छा लगा. इस कोर्स के बाद उसके बहुत से सवालों के जवाब उसे मिल जायेंगे, she hopes so... और सबसे अच्छी बात यह है कि उसके साथ जून हैं इस कोर्स में. वे पहली बार साथ-साथ घर से बाहर जाकर कुछ कर रहे हैं और यह उनके बंधन को और सुदृढ़ करेगा. उन्हें द्वंद्व से ऊपर उठना है और वह है स्थित प्रज्ञ की स्थिति !

“निर्भय बनना है, सत्व एवं शुद्धि को बढ़ाना है, तभी ज्ञान में स्थिति रहेगी ! चित्त में समता लानी है. सभी के साथ सौजन्य एवं मधुरता का व्यवहार करना है’ ! सुबह सुने  ये वचन उसके मन में गूँज रहे थे, जब वह कक्षा में गयी. कल उसे एक अलौकिक अनुभव हुआ. art of living का चौथा दिन था. कुछ ज्ञान की चर्चा करने के बाद शिक्षक ने उज्जायी, भस्त्रिका करने के बाद ‘सुदर्शन क्रिया’ कराई जिसमें श्री श्री रविशंकर जी की वाणी में, जो बहुत मधुर थी, ‘सोहम’ का उच्चारण किया गया था और उसके साथ श्वास लेनी व छोड़नी थी. कुछ देर तक तो वह अपने मन को देख रही थी, वह कुछ सोच रहा था पर बाद में मन दूर चला गया, हाथ-पाँव की सुध भी जाती रही. पूरे शरीर में रोमांच तो हो ही रहा था फिर अचानक आँसूं आ गये. क्रिया चलती रही और तभी उसके मस्तक से निकलती हुई या उसकी ओर आती हुई प्रकाश की चमकदार रेखा दिखी, जो बहुत तीव्र थी और मोटी भी थी. विभिन्न रंग भी दिखे और उस क्षण ऐसा लगा कि उसने कुछ पा लिया है. अब जग में कुछ भी पाना शेष नहीं है इस भाव के आते ही उसका रुदन और बढ़ गया पर कुछ ही क्षणों में नया विचार आया कि अब तो ईश्वर उसके साथ है अब सब उसी पर छोड़ देना चाहिए और फिर वह हँसने लगी. स्वर्गिक हास्य था, वह क्षण उसका सर्वाधिक सुखद क्षण था. सम्भवतः इसी को परमानन्द कहते हैं या आत्मानंद कहते हैं. उसके बाद निर्देश मिलते रहे. धीरे-धीरे वह सामान्य अवस्था में आ गयी पर उस क्षण से अब तक एक सुखद अनुभुति उसके पोर-पोर में छाई हुई है. उसके चेहरे पर अनोखी मुस्कान है ! उसने स्वयं को देख लिया है !