Tuesday, July 4, 2017

बोगेनविलिया का पेड़



सदा खुश रहने के लिए बुद्धि को स्वच्छ रखना है. बुद्धि स्वच्छ हो तो उनके कृत्य भी स्वच्छ हो जाते हैं. बुद्धि को स्वच्छ रखने के लिए ‘मेरे’ के भाव का  का त्याग करना है. यहाँ सब कुछ मिला हुआ है, पहले देह फिर परिवार तथा फिर वस्तुएं ! सब कुछ परमात्मा का ही है. जितना-जितना उनका मोह घटेगा, प्रेम बढ़ता जायेगा. वे जब यह स्वीकार करना सीख जाते हैं, तब सारा फ़िक्र परमात्मा को दे देते हैं. आज टीवी पर सुंदर प्रेरणादायक वचन सुने, कोई दक्षिण भारत के संत थे-

Bring powerful completion in yourself and then every day, when you wake up, looks like Shiva is creating new world. When we are complete everything radiates completion, whatever we touch. When one is incomplete inside he or she cannot see the incompletion around him. We can change from karmic life to Avatar life. Move yourself to more and more of completion. Yoga gives us energy and little more we need we should from food. First rest should come from completion and little more from sleep. Prana is the greatest healer and completion is greatest rest.

शाम के सात बजे हैं. नैनी आज बगीचे से हरे प्याज लायी थी, उसी की रोटी बनाने का निश्चय किया है. आज दोपहर को बरामदे के सामने ही लॉन में लगा बोगेविलिया का पेड़ तेज हवा के कारण गिर गया. पहली बार गिरा तो वह घर के अंदर थी. माली को बुलवाकर खड़ा करने को कहा. एक घंटे बाद बाहर गयी तो एक बांस के सहारे खड़ा था. वह अक्सर वहीं बैठकर चाय पीती है. दोपहर को रोज की तरह वहाँ जाकर बैठी तो कुछ ही देर में पेड़ फिर गिर गया. वह उसके नीचे चाय के कप सहित दब गयी. मगर ‘जाको राखे साईंया मार सके न कोई’, न चाय के कप को कुछ हुआ न ही उसे. थोड़े से प्रयास से बाहर निकल आई. बाद में पुनः उसे अच्छी तरह से खड़ा किया गया. बहुत दिनों बाद आज पौधों में पानी भी खुद दिया. शाम को बच्चे भी आये, अब अगले बुधवार को आएंगे.

कल शाम को गुरूपूजा है उनके घर में, उसकी तैयारी शुरू कर दी है. फोन पर सभी को निमन्त्रण दिए. जून ने नये फोन खरीदे हैं उन दोनों के लिए, उन्हें जल्दी हो रही है कि नया सिम एक्टिवेट हो जाये. जिसे एक काम में जल्दी हो उसे हर काम में जल्दी होती है. उन्होंने दो दिनों से भगवद्गीता सुनना शुरू किया है. गुरूजी का छह सीडी का सेट है. जून भी सुन रहे हैं, पर उन्हें अभी संसार से मोहभंग नहीं हुआ है, सो बहुत दिल उसमें नहीं लगाते हैं. हरेक को अपनी गति से ही यात्रा करनी होती है. हरेक का मार्ग भी अलग होता है. आज टीवी पर गुरूजी को कहते सुना था, हरेक को शीघ्र विकास के लिए अपने जीवन में एक दिन पागलखाने में, एक दिन स्कूल में, एक दिन कोर्ट में तथा एक दिन अस्पताल में बिताना चाहिए. वह स्कूल तथा अस्पताल तो जा सकती है पर बाकी दो में जाना मुश्किल है. कल बहुत दिनों या कहें वर्षों बाद मामीजी से फोन पर बात की. परसों होली है, पर उन्हें इस वर्ष होली नहीं मनानी है. जैसे राखी मनाने का उत्साह नहीं था वैसे ही होली मनाने का भी भी मन ही नहीं है. पिताजी के बिना जैसे सब त्योहार अपनी आभा खो चुके हैं.



Monday, July 3, 2017

आत्मा की ज्योति


बेहोशी में जो भी बीतता है, वह बेहोशी को मजबूत करता है. होश में जो भी बीतता है वह होश को मजबूत करता है. वे जागकर देखें तो हरेक कृत्य पूजा हो जाता है. उनका हर क्षण सार्थक हो जाता है. आज बहुत दिनों बाद एक सखी से बात हुई, वही जो अपनी परेशानी तो बताती है पर कोई भी सुझाव देने पर उसे न मानने में अपनी मजबूरी भी झट बता देती है, तब उसे लगता है जैसे वह अपनी तकलीफ में भी खुश ही है. नन्हे से बात नहीं हो पायी, शायद वह काफी व्यस्त है. सुबह पिकेटिंग थी, ड्राइवर ड्यूटी पर नहीं आये, वह स्कूल भी नहीं जा पायी. जून इस समय नन्हे की मित्र के घर पर होंगे दिल्ली में.
किसी पक्षी की आवाज आ रही है, जो रात्रि को बोलता है अक्सर. आज सोने में कुछ देर हो गयी है, रात्रि के पौने दस बजे हैं, जून कल आ जायेंगे, फिर सब कुछ समय पर होगा. वैसे तो कल महिला क्लब कमेटी की मीटिंग उनके घर में है, देर हो सकती है. सुबह उठी तो कुछ देर यूँही आँख बंद करके बैठ गयी, एक उपस्थिति का अनुभव इतने करीब होता है कि अब ध्यान करना भी नहीं होता. ओशो को सुना, मन को साक्षी होकर देखना आ जाये तो सारा दुःख समाप्त हो जाता है. मन नहीं रहता तभी साक्षी का अनुभव होता है. आज शाम को भी भीतर कुछ घटा, जब एक सखी ने ‘नारायण हरि ॐ’ भजन गाया, वह बहुत अच्छा गाती है. मीटिंग ठीक से हो गयी, इस महीने अभी तक मृणाल ज्योति नहीं जा पाई है, जब भी जाने में देर हो जाये तो जैसे कोई टोकता है भीतर से.

आत्मा की ज्योति पर पहरे लगे हैं
ख्वाहिशों की सेना के
जो अधूरी हों तो धुआं देती हैं
पूरी हों तो छिपा देती हैं  

इतवार को उनके लॉन में आसपास के सर्वेन्ट्स के लिए ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘नव चेतना शिविर’ होने वाला है. एओल की टीचर से बात की तो वह काफी उत्साहित जान पड़ीं. यकीनन वे सभी को सद्गुरू का ज्ञान बता पाएंगी. सद्गुरु कहते हैं, जिससे भौतिक तौर पर कल्याण हो और मोक्ष भी मिले वही धर्म है. भक्ति, युक्ति, मुक्ति और प्राप्ति धर्म के अंग हैं. साधना ही वह चार्जर है जिससे आत्मा की बैटरी परमात्मा से जुड़ी रखनी है, विश्वास रूपी सिम कार्ड लगाना है और रेंज के भीतर रहना कृपा का पात्र बनना है. तब परमात्मा से कनेक्शन बना रहेगा. सरलता, सहजता ही सिद्धावस्था है. संत को कोई पराया नहीं लगता, वह स्वयं पूर्ण है और दूसरों को आशीर्वाद देता है. सुख-दुःख में सम रहना आ जाये और सबके साथ समान भाव से व्यवहार हो तो जानना चाहिए, भीतर प्रेम जगा है. सबको अपना देखने की कला ही ‘जीवन जीने की कला’ है. ध्यान, सेवा और सत्संग तब जीने का अंग बन जाते हैं.
काशी में इसी महीने गुरूजी आ रहे हैं, यहाँ भी आने की बात तो है. परमात्मा ही सदगुरुओं के रूप में धरती पर आते हैं. सुबह रामदेव जी के प्रेरणात्मक वचन सुने तो मन जैसे तृप्त और आनंदित हो गया. उनके जीवन में कितनी खुशियाँ भर गयी हैं ज्ञान के आलोक से जो संतों का दिया हुआ है. नन्हे ने कहा है, दशहरे पर वे सब मैसूर जा सकते हैं, सेलम भी जा सकते हैं एक दिन.   


Friday, June 30, 2017

चित्र कथाओं का संसार


परसों सुबह-सुबह एक अजीब स्वप्न देखा. एक कुत्ता उसके सामने बैठा है और बातें ही नहीं कर रहा, एक से एक फ़िल्मी गीत गा रहा है. नींद खुली उससे पहले उसने गाया, धीरे से जाना बगियन में, ओ..भंवरे धीरे से जाना..बिलकुल किशोर कुमार के स्टाइल में. कितनी बार उसने अन्य योनियों को देखा है स्वप्नों में. पिछले दिनों एक बार माँ-पिताजी को देखा था स्वप्न में, आजकल उनकी बात चल रही है, ब्लॉग में, शायद इसी कारण.

आज उन्होंने जनरल हेल्थ चेकप करवाया है, कल सुबह रिपोर्ट मिल जाएगी. एक उम्र के बाद इस तरह की जाँच करवाते रहना चाहिए, कितनी बार सुनने को मिलता है, फलां को गठिया है, किसी को दिल की बीमारी है, समय रहते उन्हें पता ही नहीं चल पाता. उसे भी पैरों में हल्की जकड़न सी महसूस हुई, हल्का खिंचाव सा, बढती हुई उम्र का तकाजा है या कुछ और बात है, पर मन वैसे ही है प्रफ्फुलित और कुसुमित ! कल लाइब्रेरी से चार चित्रकथाएं लायी, बुद्ध, टैगोर, शिव और भगवद् गीता, कितने सुंदर चित्रों और कथानक के साथ ये पुस्तकें तैयार की गयी हैं. आज असम बंद है, राहुल गाँधी गोहाटी में आये हैं, सम्भवतः उन्हीं के विरोध में. एक व्यक्ति ने कल गोहाटी में राजनितिक विरोध के चलते स्वयं को जला लिया, लोग किस सीमा तक चले जाते हैं. कल स्कूल में बच्चों को शिव का भजन अच्छा लगा, उन्हें बहुत कुछ सिखाया जा सकता है. उसे लगता है आर्ट एक्सेल कोर्स की ट्रेनिंग लेनी चाहिए. वे वैसे भी जुलाई-अगस्त में बैंगलोर जाने की बात सोच रहे हैं. उसे हर विरोध के लिए तैयार होना होगा. हर विरोध अंततः मान ही लिया जाता है अर्थात समाप्त हो जाता है.

परसों मीटिंग में कवयित्री सम्मेलन का आयोजन अच्छा रहा. कल शाम वे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर गये, शिवरात्रि उत्सव मनाया गया वहाँ. आज सुबह उसने एओएल की एक टीचर को फोन किया, वह सोच रही है सर्वेंट लाइन के सभी वयस्कों के लिए एक कोर्स कराए. बच्चों को तो वह सिखा देती है पर बड़ों को भी जानकारी होनी चाहिए. उन्होंने एक अन्य टीचर से बात करने को कहा है. कल शाम जून के एक कनिष्ठ सहकर्मी के यहाँ गये वे. घर अच्छा लगा, ज्यादा सामान नहीं है, साफ-सुथरा सा. गृह स्वामिनी ने झटपट आलू-पूरी व पकोड़े बनवाये, कस्टर्ड शायद बना रखा था. उसे यह सब खाने का अभ्यास नहीं है, पर शिष्टता वश कुछ खाया.

मार्च का प्रथम दिन..देखते-देखते जैसे गर्मी का मौसम भी आ गया है, कमरे में गर्मी का अहसास हो रहा है. अभी से पंखा चलाकर बैठना पड़ रहा है. आज गर्मी की सब्जियों के बीज भी लाये, माली ने भिन्डी के बीज भिगोकर रखने को कहा. जून के दफ्तर में वाहन कल से ठीक से नहीं चल रहे हैं. कुछ लोगों ने कंपनी में नौकरी न मिलने पर शिकायत दर्ज कराने के रूप में वाहनों पर पत्थर मारने शुरू कर दिए थे. सोमवार तक सम्भवतः हालात ठीक हो जायेंगे. जून का दिल्ली से फोन आया, वह आज  ही गये हैं, नन्हे से बात हुई, वह लौकी की सब्जी बना रहा था, फुल्के बनाने वाला था. कितना अच्छा है कि वह भोजन बनाने के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है.   


Thursday, June 29, 2017

स्वप्नों का संसार


परसों सुबह पुनः दो स्वप्न देखे, एक में कोई व्यक्ति बाँह में सूई के द्वारा कुछ डाल रहा है, कई लोग हैं, उनमें से एक वह भी है ऐसा कुछ भास हुआ, दुसरे में मृत्यु का अनुभव हुआ, अब दूसरा स्वप्न जरा भी याद नहीं है, पर यह ज्ञात हुआ था कि इस तरह मृत्यु हुई थी. पिछले जन्मों की स्मृतियाँ भी हो सकती हैं ये. परमात्मा ही जानता है. आज सुबह एक स्वप्न में समय बता रही थी कि किसी ने कहा, दस पैंतालीस नहीं दस तिरालिस और नींद खुल गयी. उनके घर का नम्बर तक उसे पता है, उनकी चेतना से कुछ भी छिपा नहीं है, आखिर वह स्वयं ही तो हैं !

फिर छह दिनों का अंतराल, कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह स्नानगृह में है. एक ऊर्जा गले तक चढ़ती है, थोडा भय लगता है पर वह स्वयं को तैयार कर लेती है, पुनः एक ऊर्जा चढ़ती है और उसके बाद होश नहीं रहता, फिर अचानक एक सुंदर चित्र दीखता है, फिर तो एक के बाद एक चित्रों की श्रृंखला शुरू हो जाती है. रंगीन चित्र थे, कला कृतियाँ थीं, जैसे कोई टीवी देख रहा हो. स्वप्न उनके मन में छिपी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं. ध्यान का गहन अनुभव जागृत में नहीं हुआ सो स्वप्न में कुछ हो गया !

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा, ध्यान की स्मृति आती रही. परमात्मा उस पर अवश्य ही नजर रखे हैं. अभी कुछ देर पूर्व सद्गुरू को बहुत दिनों बाद पत्र लिखा. उन्हें अपने प्रति ईमानदार होना चाहिए, साधना का यह पहला सूत्र है. भीतर जो कुछ भी चल रहा है उसका साफ-साफ पता होना चाहिए. अतीत में जो भी हुआ वह स्वप्न मात्र है. संस्कारों के वश होकर जो भी किया उसको अब बदल नहीं सकते पर अब जो हर क्षण हो रहा है वह होश में रह कर हो. क्लब की पत्रिका छप कर आ गयी है. एक लेख की लेखिका के नाम के आगे भूल से डॉ लिखा गया है, उनसे बात की, पहले तो वह कुछ नाराज दिखीं फिर संतुष्ट हो गयीं. अगले हफ्ते क्लब की मीटिंग में कवियत्री सम्मेलन का आयोजन करना है. सुबह नैनी ने कुछ माँगा तो उसने ले लेने को कह दिया, उसे शायद अच्छा लगा हो, अपने आप ही कुछ काम कर दिए, बिना कहे ही. उसके ससुर के झगड़े से घर के सभी लोग परेशान हो गये हैं. उसे उनके प्रति सहानुभूति होती है. मन के भीतर न जाने कितने संस्कार दबे पड़े हैं, खुद को भी आश्चर्य होता है. परमात्मा हरेक के हृदय में है. वह उसे हर तरह के बंधन से मुक्त देखना चाहते हैं. अहंकार की हल्की सी छाया भी न रहे. मन बिलकुल सपाट नीले आकाश सा हो जाये निरभ्र..निर्मल..तभी तो होगा उसका पदार्पण !

कल शाम को गुरु माँ का अद्भुत प्रवचन सुना. सभी जगे हुए एक ही बात कहते हैं. उनके भीतर जब चैतन्य की शिखा अखंड जलने लगती है, कोई भी घटना उसे कंपाती नहीं, वह स्वयं भी मन, बुद्धि के रूप में व्यर्थ ही नहीं चुकती, तब ही भीतर अखंड प्रेम का साम्राज्य छा जाता है. वही सत्य है, वह अबदल है, सारे द्वंद्व तभी समाप्त हो जाते हैं जब सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, सारी चाहें गिर जाती हैं. प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है, आत्मा निसंग हो जाती है, कैवल्य का अनुभव घटता है. द्रष्टा भाव में जो टिक जाता है उसके लिए जगत का क्रिया कलाप एक खेल सा ही जान पड़ता है. रात्रि को फिर कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं पड़ता. सारे स्वप्न अधूरी इच्छाओं के कारण ही जगते हैं.


Wednesday, June 28, 2017

या देवी सर्वभूतेषु


परसों रात्रि एक स्वपन देखा जिसमें एक छोटा बच्चा जो चाय की दुकान पर काम करता है, झिड़कियां खा रहा है, लगा किसी जन्म में वह ही तो नहीं थी यह, इसीलिए उसे ऐसे बच्चों की तरफ सहज प्रेम झलकता प्रतीत होता है अपने भीतर. एक दिन और एक स्वप्न में एक लडकी को स्वयं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारते देखा था. उन्होंने कितने जन्मों में न जाने कितनी गलतियाँ की हैं. हर गलती स्वयं को  कष्ट देना ही तो है. कल रात्रि का स्वप्न अद्भुत था, सुंदर रंग और आकृतियाँ तो दिखी हीं, एक श्वेत वसना देवी का आशीर्वाद भी मिला. देवी की आकृति हिली, उसका मुख खुला और हाथ से एक श्वेत ही दंड निकला, जिससे उससे निकलती ऊर्जा ने स्पर्श किया और भीतर कैसा तो अनुभव हुआ. कल वसंत पंचमी पर अपने घर को मिलाकर पांच स्थानों पर देवी सरस्वती के दर्शन किये. एक स्कूल में तो मूर्ति बहुत सुंदर थी और मृणाल ज्योति में मुस्कुराती हुई प्रतीत हुई, सम्भवतः इसी कारण वह स्वप्न देखा. दृष्टा ही दृश्य बन जाता है, इसका अनुभव अब दृढ़ होने लगा है. वे ही अपने सुख-दुःख के निर्माता हैं, यह ज्ञान मुक्त करने वाला है,. इसीलिए दृष्टा भाव को इतना महत्व दिया गया है.

वह आत्मा है, यह देह उसका घर है, मन व बुद्धि उसके साधन हैं, यह बात अब कितनी स्पष्ट दिखने लगी है. ऊर्जा का अहसास हर क्षण बना रहता है. कल शाम जून को भी इसका परिचय कराने का प्रयास किया, पर कोई जब तक अपने भीतर से ही न चाहे, बाहर से कोई भी किसी को कुछ बता नहीं सकता. सद्गुरू ऐसा कर सकते हैं पर उन्हीं के लिए जो इसके इच्छुक हैं. हरेक ही अवश्य एक न एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. आज बादल हैं आकाश पर, सुबह जब वे टहलने गये वातावरण इतना सुखद था कि चालीस मिनट जैसे चार मिनटों में बीत गये. सुबह आकाश सात्विक होता है, धरती भी रात्रि विश्राम के बाद शांत होती है और जीव प्रसन्नता से भरे. स्नान करके जब तुलसी व सूर्य भगवान को जल चढ़ाने गयी तो बादल थे, आकाश को निहारते समय वृक्षों व टहनियों के पीछे ऊर्जा की श्वेत आकृतियाँ भी दीख पड़ीं, बादलों के मध्य भी प्रकाश की झलक थी.

सद्गुरू कहते हैं, मूलतः सब पूर्ण हैं, सभी को अपने उसी स्वभाव को पाना है. अंतर की पूर्णता के क्षेत्र में अनुभव किया हर विचार सत्य हो जाता है. पूर्णता ही नित्य सत्संग है, जो भी उन्हें प्राप्त करना है, वह पूर्णता के विकास से मिल जाता है. जब अभावों के भूत सताने लगें, जब विचार अधूरे हों तब उसी की शरण में जाना है जो पूर्ण है. परमात्मा हर जगह है, हर समय है, वही सब रूपों में प्रकट हो रहा है. वास्तविक संपदा वैराग्य और भक्ति है.


Friday, June 23, 2017

सर्दी-जुकाम


फिर एक अन्तराल..नया वर्ष आया और पहला माह समाप्त होने को है, उसने लगभग हर दिन कुछ पंक्तियाँ लिखीं, छोटी-छोटी कविताएँ..गद्य लिखने का मन ही नहीं हुआ. पद्य सुकोमल है, गद्य जीवन का यथार्थ है. जून आज फिर गोहाटी गये हैं, परसों आ जायेंगे. उनका गला खराब था, कालीमिर्च, गुड़ और गाय के घी का नुस्खा अपनाना शुरू किया, उससे लाभ भी हुआ. पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय से वे शाम को सीडी लगाकर प्रवचन सुन रहे थे, आज भगवद् गीता पर आधारित प्रवचन है. साहित्य अमृत के स्वामी विवेकानंद पर आधारित अंक को पढ़कर कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे जब छोटे मन से दुनिया को देखते हैं तो अभाव नजर आता है, जब गहराई से देखते हैं तब पूर्णता का अनुभव होता है.

आज सुबह वह नींद में थी पर महसूस हो रहा था कोई जगा रहा है, जब तक नहीं जागी तब तक वह प्रयास करता रहा. एक स्वप्न जैसा कुछ देखा, जिसमें स्वयं को तितली के रूप में देखा. उस दिन नन्हे को फोन पर स्वयं को कहते सुना था कि हर योनि में जैसे तितली, परमात्मा या प्रकृति सबके साथ होते हैं, उन पर नजर रखते हैं. ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, एक बार स्वयं का चेहरा कुछ बदला सा दर्पण में देखा. स्नान करने गयी तो गाउन के बार्डर में कुछ भारीपन महसूस हुआ, छूकर देखा तो  कान का वह बुंदा था, जो कुछ दिन पहले खो गया था, पर वह वहाँ कैसे गया होगा, चारों तरफ देखा कहीं से भी सिलाई खुली नहीं है. इतने दिन से वहीं था तो आज ही उसका पता क्यों चला. कल स्कूल में बच्चों को सिखा सकी, वह भी तो परमात्मा की कृपा ही थी. उनके जीवन में वह कितना निकट है, बस देखने के लिए नजर चाहिए. टीवी पर जैसे ही गुरूजी का प्रवचन सुनना शुरू किया तो पहला वाक्य था, ‘जीवन एक पहेली है, इसे समझना और सुलझाना सीखना पड़ता है, फिर भी कुछ अनसुलझा रह जाता है’.

कल से सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है, पिछले दिनों जब जून को खांसी थी, उन्हें परेशान देखकर एक बार उसने प्रार्थना की थी, जून की तबियत ठीक हो जाये, भले उसकी खराब हो, वह स्वयं को ठीक कर सकती है. इसी अहंकार को मिटाने के लिए शायद प्रकृति ने यह उपहार भेजा है. जून अब पहले की तरह स्वस्थ व प्रसन्न हैं. कल शाम महिला क्लब की पार्टी थी. अस्सी महिलाएं आई थीं, हो सकता है उनमें से किसी से संक्रमण पकड़ लिया हो. छोटी बहन से बात की, उसकी गर्दन में भी दर्द था, पिछले हफ्ते बीती उसके विवाह की वर्षगांठ अलबत्ता उन्होंने अच्छी तरह मनायी. आज उसका एक छात्र पढ़ने नहीं आया, पहले सोचा शायद घर पर ही पढ़ रहा होगा, फिर फोन कर लिया. बहुत हँसी आयी जब पता चला उसने माँ से कह दिया था, टीचर ने आने के लिए मना किया है. कुछ बच्चे कितनी आसानी से झूठ बोल देते हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं होता कि यह झूठ है.


Thursday, June 22, 2017

पौधों की आँखें


जून कल गोहाटी गये हैं, आने वाले कल दिल्ली जायेंगे. अभी कुछ देर पहले फोन आया उनका. सवा पांच बजे हैं, कुछ देर में प्राणायाम सीखने माली का पिता और उसकी दो पोतियाँ आयेंगी, अब उन्हें आते हुए एक हफ्ते से ज्यादा समय ही हो गया है. छह बजे से भजन है. नैनी के यहाँ से भी भजनों की मधुर आवाज आ रही है. आज दो सखियों से बात की. कल क्रिसमस है, एक अन्य से कल करेगी. सुबह उठी तो सिर में दर्द था, जो अभी तक बना हुआ है, पर बीच-बीच में गायब हो जाता है. देहभाव जब हट जाता है तभी शायद महसूस नहीं होता होगा. ठंड बढ़ गयी है, पर इस वक्त फायर प्लेस में आग जल रही है, कमरा गर्म है. दीदी से फोन पर बात हुई, देहरादून में भी ठंड है, सुबह वह देर से उठने लगी हैं. छोटे भाई का फोन देवप्रयाग से आया, वह आज गोपेश्वर जा रहा है, ऐसा उसने कहा. वर्षों पूर्व उसने वहाँ की रामलीला में अभिनय किया था. इतने वर्षों बाद भी लोगों को याद था. उसका अभिनय सराहा गया था.

अज क्रिसमस है, बादल हैं, मौसम ठंडा है. सूरज जल्दी अपने घर चला गया है. आज वह नर्सरी गयी थी, कुछ फूलों के पौधे लिए. शायद एक महीने बाद इनमें फूल आयें. रंग-बिरंगे फूल जो पौधों की आँखें हैं ओशो के अनुसार, जिनसे वे जगत को निहारते हैं. वह जब अस्तित्त्व को निहारती है, तो वह एकाएक कितना मुखर हो उठता है. एक कोहरे जैसा श्वेत धुआं सा उठने लगता है. घास कितनी सुंदर हो जाती है, चमकदार और जैसे कोई तिलस्म घट रहा है, परमात्मा कितना सुंदर है और उनके चारों ओर है, भीतर की शांति गहराती जा रही है, एक अनोखा जगत छिपा है, इसी जगत के भीतर जिससे वे अनजान ही बने रहते हैं. समाधि का अनुभव कैसा होता है यह तो नहीं मालूम, लेकिन एक अनोखी शांति इस बार उसने अनुभव की है. जून का बाहर जाना भी शायद परमात्मा की इस लीला का एक हिस्सा है. उनके रहते ध्यान इतना घर नहीं हो पाता, अब लगातार दो घंटे बैठना सम्भव है. सद्गुरु की कृपा का अनुभव भी हर क्षण होता है.

नया वर्ष आरम्भ हो चुका है. आज दूसरा दिन है. परसों वे यात्रा पर गये. उससे पूर्व ही तैयारी करते समय ज्ञात हुआ अभी भी मन प्रतिक्रिया करने से बाज नहीं आता, अपने को ऊपर रखने से भी और स्वयं को सही सिद्ध करने से भी, आश्चर्य करने के सिवा और किया क्या जा सकता है. परमात्मा का इतना-इतना प्रेम पाकर भी ऐसा होता है तो..वैसे जिन लोगों के साथ बर्ताव करना होता है उन्हें परमात्मा की खबर कहाँ है ? शायद सहज रूप से सभी के भीतर से जो भी आता है उसे ही परमात्मा का इशारा समझ कर स्वयं को साधना में आगे बढ़ते देना है. कृष्ण इसलिए ही गीता में कहते हैं, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उत्पन्न होने पर भी जो सम रहता है वही मुक्त है. जो ‘है’, उस पर ध्यान देना है, जो ‘नहीं’ है उस पर नहीं, तो है ही सब कुछ घेर लेगा. परमात्मा भरपूर है, हर जगह है.. हर समय है... वही उसके द्वारा काम कर रहा है. आज इस क्षण यह बात स्पष्ट हो रही है. परमात्मा उसकी वाणी, उसकी लेखनी, उसके रग-रग में समा गया है. वह उससे दूर नहीं है, वह उसीमें है. वह उसे अपनी बाँसुरी बना ले..अपनी कठपुतली.. अपनी आवाज..अपना संदेश...अपना बना ले, बस इतना ही काफी है..वही ऋत है..वही धर्म है..वही सत्य है..वही नियम है..वही है..वही है..!