Sunday, January 4, 2015

पालक की सिन्धी भाजी


कल शाम पुनः उसे सिर में दूर से आती ढोल की ध्वनि जैसी ध्वनि सुनाई दी, फिर आज सुबह क्रिया के बाद काफी स्पष्ट थी. योग शिक्षक से पूछना ही उचित होगा अथवा इसे भी सामान्य घटना मानकर आगे चलती चले. अध्यात्म के मार्ग पर न जाने कितने-कितने मोड़ आएंगे जिनसे उन्हें गुजरना होगा. यह तो तलवार की धार पर चलने जैसा है. हर सुख की एक कीमत चुकानी होती है. हर सुख क्षणिक होता है लेकिन आत्मसुख का न कोई आदि है न ही अंत है. वह तो अनंत है, उसे सीमा में बद्ध नहीं किया जा सकता. इस समय उसके पोर-पोर से वही आनंद फूट रहा है, सारा शरीर कम्पायमान हो रहा है, ध्यान न करते हुए भी ध्यान की सी मनः स्थिति हो रही है, एकांत नहीं है सो अभी वह ध्यान नहीं कर सकती. आत्मा से टपकने वाले इस मधुर भाव को क्या नाम दे सकते हैं. सारा जग एक स्वप्न की भांति प्रतीत हो रहा है. सब कुछ जैसे थम गया है, दिशाएं खो गयी हैं, शून्य ही शून्य है, उसके इस आत्मबोध के अतिरिक्त कोई बोध शेष नहीं रहा है. कान में पड़ने वाली ध्वनियाँ भी अर्थहीन हो गयी हैं. सब कुछ यथावत होते हुए भी यथावत नहीं है. कुछ बदला-बदला सा है. कहीं यह उसका मतिभ्रम तो नहीं, लेकिन ऐसा पहले भी तो हुआ है और आनंद की तीव्रता उस समय अधिक थी, पर उसे संयत होना होगा. स्वयं को अभी और तीव्रतर अनुभवों के लिए परिपक्व करना होगा. सद्गुरु सदा उसके साथ हैं. कृष्ण भी हर क्षण उसके साथ परमज्योति के रूप में रहते हैं, जिसे वह आंख बंद करते ही देखती है. जैसे कमल पंक में रहकर भी उसमें लिप्त नहीं होता वैसे ही उन्हें संसार में रहकर भी इससे अलिप्त रहना है. वे ईश्वर के निमित्त मात्र हैं. उसने अनंत शक्तियाँ प्रदान की हैं. सूक्ष्म जगत और तात्विक जगत में प्रवेश करने की क्षमता दी है. अलौकिक आनंद प्राप्त करने के सामर्थ्य भी दिया है. शाश्वत सुख व शांति का भागी बनने की क्षमता दी है जो वे अपने आत्मस्वरूप में रहकर ही पा सकते हैं.

आज नन्हे का स्कूल ‘तिनसुकिया बंद’ के कारण बंद है. वे आधा घंटा देर से उठे,  क्रिया की जो उनके जीवन का अंग बन चुकी है और दिन का पहला कार्य. कल दो पत्र लिखे, सभी को भाईदूज का टीका भेज दिया है, दीवाली के लिए सफाई का कार्य भी नियमित चल रहा है. कल शाम एक मित्र परिवार आया, अच्छा लगा पर कुछ देर को शायद वह भावना में बह गयी थी. art of living की बात छिड़ते ही वह संयत नहीं रह पाती, पता नहीं क्यों ? उसके सिर में हल्की आवाजें आज सुबह भी महसूस हुईं, इसके पीछे जरूर कोई राज है. आज लम्बे समय के बाद ‘सिन्धी पालक’ बनाया है. सुबह ससुराल से फोन आया, वे लोग इसी माह बड़ी ननद के पास जा रहे हैं. अज गुरुमाँ ने कड़े शब्दों में फटकर लगाई, पर बिलकुल सही कहा कि ईश्वर का नाम तो जगाने के लिए है न कि सुलाने के लिए. गुरू युगों की नींद से जगाने आया है. कल ‘इंडिया टुडे’ के मुखपृष्ठ पर गुरूजी का फोटो देखकर अच्छा लगा. उनकी बातें ही निराली हैं. नन्हे बच्चे से निष्पाप और महान ऋषि से ज्ञानी. ईश्वर हर क्षण उनकी आँखों में, हँसी में, हाव-भाव में झलकता है. वह स्वयं ही ईश रूप  हो गये हैं. अब इतना वक्त नहीं है कि अभ्यास करे, सो उसने सोचा संगीत सुनना ही ठीक रहेगा.




Friday, January 2, 2015

मुक्त उड़ान

 

आज उस सखी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन किया गया है. उन्हें वहाँ नौ बजे के बाद पहुंचना है. कल शाम उस समस्याग्रस्त सखी का फोन आया, उसके घर में सुलह होने की शुरुआत तो हुई है. गुरूजी की वह कृतज्ञ है, उन्हीं की कृपा से यह चमत्कार ( उसी के शब्दों में ) हुआ है. उसकी भी सारी उलझनों को गुरू की स्मृति एक चुटकी में दूर कर देती है. भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर है, वह आने में एक क्षण भी नहीं लगाता. भगवान के लिए प्रेम ही परमधर्म है. अपने अंतर में छिपे प्रेम को प्रकट करना है. इस प्रेम को प्रकट करने में गुरू सहायक है. उसका अर्थ ही है जो अज्ञान को दूर करे, क्योंकि वह स्वयं मुक्त है, वही मुक्त कर सकता है. जो स्वयं बंधा हो वह क्या मुक्त करेगा. सद्गुरु को सुबह-शाम वह एक ज्योति के रूप में अपने साथ पाती है. शास्त्र माँ है और गुरू पिता है, उनकी शरण में आकर ही कोई द्विज होता है. दूसरा जन्म पाता है. ज्ञान का अभ्यास करने से और सेवा करने से ही कोई ज्ञान का अधिकारी बनता है. सतोगुण से ऊपर शुद्ध सतोगुण में स्थित होना है.

उसे लगता है सुख-दुःख मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है. सुख-दुख को सच्चा मानना ईश्वर को सच्चा न मानना है. मन एक वृत्ति है, सागर की तरंग की तरह, वही सुख-दुःख का अनुभव करता है. है कुछ भी नहीं पर अनादि कल से वे इससे बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाने पर वहाँ अंधेरा नहीं टिकता. या फिर मन एक चलते-फिरते रस्ते की तरह है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं, यदि वह इनसे नाता न रखे और किसी भी वृत्ति का आग्रह न करे तो ही अविचलित रहेगी. आत्मा सभी को स्पर्श करते हुए भी किसी को स्पर्श नहीं करता, जैसे सूर्य की किरणें छूती हुई भी किसी को भी नहीं छूतीं. मन को भी आत्मा सा मुक्त होना सीखना होगा. निस्सीम गगन सा मुक्त, अनंत ब्रह्मांड सा मुक्त और पवन सा मुक्त..इसी मुक्ति को तो मोक्ष कहा गया है और यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो भी अमूल्य है. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर बादल सूर्य को ढक लेते हैं वैसे ही आत्मा की सत्ता से से ही अज्ञान की सत्ता है. मृग-मरीचिका ही अज्ञान है, जो है ही नहीं उसके पीछे दौड़ते रहना ही तो अज्ञान है.

कल शाम उसे कुछ आवाजें जैसे दूर से बजते ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी, कभी किसी वाद्य की आवाज, पर बाद में नींद आ गयी. कल शाम से ही जून कुछ चुप-चुप थे पर आज सुबह उन्होंने साथ-साथ क्रिया की और दफ्तर जाते वक्त वह सामान्य थे. दीदी को फोन किया वे लोग स्वयं भी नर्सिंग होम के मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उसे याद आया, छोटी बुआ को पत्र लिखना है. टीवी पर आत्मा में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली भगवद गीता का पाठ आ रहा है. ईश्वर हर वक्त उसके निकट हैं. तीनों गुणों से परे अत्रि और सूया से परे अनसूया के पास वे बिन बुलाये ही चले जाते हैं.


दस बजे हैं, अभी विचार आया कि एक परिचिता से किये वादे को निभाने के लिए उनके यहाँ जाये. उनका बगीचा देखा, जगह ज्यादा है पर सूझ-बुझ से उसका उपयोग हुआ हो ऐसा नहीं लगता, खैर, वापस आयी तो लंच का समय होने ही वाला था. जून के दफ्तर जाने के बाद संगीत का अभ्यास किया, नये शिक्षक के सिखाने का तरीका बिलकुल अलग है और शुल्क भी तिगुना. पर संगीत को पैसों से नहीं तोला जा सकता. परसों शाम को तेजपुर की साधिका का फोन आया. योग शिक्षक तेजपुर में आ चुके होंगे. आज सुबह  जागरण में सुना, आसक्ति ही मानव को बांधती है. वास्तव में वह मुक्त है. अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन असली रूप को भुला बैठा है. उस दिन उसे अंतरतम की झलक मिली थी, अतिशय आनंद की अनुभूति हुई थी. वही आनंद थोडा थोड़ा करके रोज रिसता है और उसके अंतर को हरा-भरा रखता है. 

Thursday, January 1, 2015

गीत समर्पण के


पिछले दो दिन डायरी नहीं लिख सकी. सुबह का वक्त जो श्रवण-लेखन में बीतता है, छुट्टी होने पर अन्य कार्यों में चला जाता है. जीव हर वक्त इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगा रहता है. देहात्म बुद्धि से निजात पाना कितना कठिन हो जाता है पर इन सबके बीच ‘क्रिया’ के क्षण वरदान बनकर आते हैं, जब मन आत्मभाव में स्थित हो जाता है. आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह सभी से बात की, कल रात पिता से भी बात हुई, उन्होंने बताया, पत्र लिखा है. दीदी ने पत्र का जवाब फोन पर दिया. कल दोनों भाई उनके यहाँ परिवार सहित पहुंच गये आज दोपहर तक वापस आयेंगे. कुछ देर पहले छोटी बहन का फोन आया उसने नन्हे से यहाँ का पिन पूछा और कुशलता का समाचार लिया दिया. सुबह ससुराल से फोन आया यह याद दिलाने के लिए कि वे बधाई देने के लिए फोन अवश्य करें. यह फोन उन सभी परिवारजनों को आपस में जोड़े हुए है.

आज पूरे एक हफ्ते बाद नन्हे का स्कूल खुला है. वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाए सो क्रिया भी नहीं हो सकी. अभी कुछ देर पहले बाबाजी का हिमाचल में हुआ सत्संग देखा, मन भर आया, गुरू का सन्निध्य कितना अमूल्य होता है. योग शिक्षक से वे पिछले इतवार को डिब्रूगढ़ में मिले थे, उसके बाद से कोई खबर नहीं है. उस दिन एक मित्र परिवार ने दो कैसेट दिए एक में समपर्ण के गीत हैं. सुनकर बहुत अच्छा लगता है. गुरू उन्हें कितनी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं, गुरू भीतर ही हैं, सदा उनके पास हैं पर फिर भी किसी बाहरी आश्रय की आवश्यकता का अनुभव होता है, कोई ऐसा जो दो आँखों से ही अंदर का सारा हाल जान लेता है, जिसका एक वचन ही काफी होता है. जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी से शिक्षा लेनी पड़ती है तो ईश्वर को जानने जैसे महान कार्य के लिए गुरू की आवश्यकता हो इसमें आश्चर्य क्या है. गुरू मन का वैद्य होता है. जो विकारों से मन को मुक्त करता है. ऐसा सद्गुरु आसानी से नहीं मिलता, पर ईश्वर की अनुभति वही करा सकता है. वह शिष्य के मंगल की कामना हर क्षण करता है, उसका हृदय ईश्वर की तरह अनंत प्रेम से भरा हुआ है. कल शाम से ही बल्कि दोपहर से ही उसका सिर भारी था, खैर, शरीर का अपना धर्म है और आत्मा तो सदा मुक्त है, कल उसने इन दोनों को अलग-अलग रखते हुए कोई दवा आदि नहीं ली और रात को कब अपने-आप ही दर्द ठीक हो गया पता नहीं चला. आज ‘जागरण’ में विभिन्न चक्रों के बारे में सुना. आत्मा के स्तर पर जीना यदि कोई सीख ले तो सारे चक्र अपने आप ही जाग्रत हो जायेंगे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा से जीवन ओत-प्रोत हो जायेगा.

कल अंततः जून को शिक्षक का ईमेल मिला. उनके भाई का देहांत हो गया था जिसके एक्सीडेंट की खबर सुनकर वे गोहाटी गये थे, जीवन कितना क्षणिक है यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है. देह का संबंध क्षणिक है मात्र ईश्वर से मानव का संबंध शाश्वत है. उन्होंने उसे दो आदेश दिए थे पहला सेवा करनी चाहिए दूसरा ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करने का आदेश. पर दोनों ही आदेशों का पालन वह नहीं कर पायी है. सेवा करने की क्षमता नहीं है, अपने परिवार और निज आत्मा की सेवा करने में ही सारा समय बीतता है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा बलवती होती जा रही है. कृष्ण की चेतना में अपनी चेतना जोड़ने की इच्छा. भगवद स्मरण के सिवा और कोई भी कार्य स्वीकार्य नहीं लगता है. आज सुबह वे उठे तो गला खराब लग रहा था पर अब देह को आत्मा से अलग रख कर देखने की कला गुरूजी ने सिखा दी है. परमात्मा उसे जिस हाल में रखना चाहें, क्योंकि वही सब करा रहे हैं. उसके लिए जो भी अच्छा है वही होगा. वह जड़ वस्तु पर निर्भर न रहकर चेतना की ओर कदम बढ़ा रही है. इन्द्रियां अपना काम करती रहेंगी, मात्र उसकी चेतना इन्द्रियों की ओर न जाकर कृष्ण की ओर जा रही होगी.


कल सुबह एक सखी आई थी अपनी समस्या लेकर और गुरूजी ने उसे उसकी सहायता करने की प्रेरणा दी. सुबह उसको फोन किया. सुबह एक अन्य सखी के साथ बाजार गयी, वह अपने यहाँ कल पूर्णिमा की कथा का आयोजन कर रही है. बाद में लंच भी होगा जो उसके जन्मदिन का भी होगा, क्योंकि उस दिन करवाचौथ है. कल शाम दीदी का फोन आया उन्होंने बताया उनके घर के पास एक नर्सिंग होम बिक रहा है वह चाहती हैं वे सभी मिलकर उसे खरीद लें और चलायें पर उन्हें यह विचार जंच नहीं रहा है, न तो  उन्हें इसका कोई अनुभव है और न ही इतना धन है. जून आज देर से आने वाले हैं. इसी माह होने वाले एक कोर्स के लिए सहायता करने में व्यस्त हैं. कल पिता का एक लम्बा सा पत्र आया है. उसने उनके लिए एक कार्ड खरीदा और अभी छह कार्ड खरीदे जो जिनको मिलेंगे उन्हें ख़ुशी अवश्य देंगे, क्योंकि बहुत प्यार से चुने गये हैं. सुबह एक सखी को भी उसने इसी प्यार और विश्वास की बात कही, उसका जीवन कैसा अजीब सा हो गया है उसने स्वयं ही बना लिया है. ईश्वर से प्रार्थना करेगी और गुरूजी से भी की उसे सामर्थ्य दे, शक्ति दे ! art of living ने जैसे उसके जीवन में एक शांति, स्निग्धता और प्रेम की लहर ला दी है वैसी ही लहर उसके जीवन में भी आये. वह अपने रिश्तों की कद्र करना सीखे. 

Monday, December 22, 2014

पूजा का पंडाल


जागरण में सुने आज के वचन उसके मन के भावों से कितने मिलते-जुलते हैं. एकमात्र ईश्वर ही उनके प्रेम का केंद्र हो, जो कहना है उसे ही कहें, अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब बरसती है तो अंतर में बयार बहती है, अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं, अंतर की ख़ुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है ऐसे प्रेम का दिखावा नहीं होता. वह अपनी सुगंध आप बिखेरता है. दुनिया का सौन्दर्य जब उसके सौन्दर्य के सामने फीका पड़ने लगे, उस सत्यं शिवं सुंदरम की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये ! उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पड़ेगा, अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर कदम रखे बिना रह ही न सके ! स्वयं को इतना हल्का बनाना है कि परमात्मा रूपी सूर्य उन्हें अपनी ओर खीँच ले. आदि भौतिक दुनिया में हैं दिव्य दुनिया में जाना है. आत्मबल वहीं से मिलता है. सदैव प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है. बाबाजी कहते हैं, दिले में तस्वीर यार है जब चाहे नजरें मिला लीं..परिस्थिति कैसी भी हो अपने भीतर के नारायण पर दृढ श्रद्धा हो तो हर बाधा हल हो जाती है.


कल वे पूजा देखने गये, पहले कितनी ही बार कितने पूजा-पंडालों में गयी है लेकिन वह जाना अब लगता है व्यर्थ ही था. वे मात्र मूर्ति को देखते थे, भीड़ को देखते थे और चमक-धमक को, जो आँखों को कितनी देर सुख दे सकती थी, पर कल उसे मूर्तियों के पीछे छुपी भावना स्पष्ट दीख रही थी. उनकी आँखें बोलती हुई सी प्रतीत हो रही थीं. ईश्वर जैसे उन मूर्तियों के माध्यम से उसके अंतर में प्रवेश कर रहे थे. लोग जो वहाँ आये थे, पुजारी या नन्हे बच्चे, भक्त लग रहे थे. पवित्रता का अनुभव हो रहा था, कैसी अद्भुत शांति. सब कुछ जैसे किसी व्यवस्था के अंतर्गत धीमे-धीमे से किया जा रहा था. सबके पीछे जैसे कोई महान अर्थ छुपा हुआ था. ईश्वर के कार्य भी कितने रहस्यमय होते हैं. वह पंडाल दर पंडाल उसे अनुभूतियों से तृप्त कर रहा था, उसकी निकटता कितनी मोहक थी. मूर्तियों को गढ़ने वाले, उन्हें रंगने वाले, वस्त्र बनाने, पहनाने वाले, पंडाल बनाने वाले अनेकानेक लोगों के प्रति, उन भक्त आत्माओं के प्रति कितनी निकटता अनुभव हो रही थी. कितने लोगों ने अपने अंतर की सद्भावना का प्रतिरूप उन मूर्तियों में गढ़ा था, वे कितनी सजीव लग रही थीं, जैसे बोल ही पड़ेंगी. उन्हें छोड़कर जाते समय पीड़ा भी हुई और यह महसूस भी हुआ कि ईश्वर पग-पग पर मानव को संरक्षित करते हैं, वह हर क्षण उसके साथ हैं. आज सुबह art of living की एक सदस्या से बात हुई जो तेजपुर में रहती हैं. नन्हा और जून दोनों घर पर हैं, पूजा का अवकाश आरम्भ हो चूका है. कल उसने शास्त्रीय संगीत के चार कैसेट भी खरीदे, जिन्हें अभी सुनना है.

Sunday, December 21, 2014

साधना के सोपान


जो कण-कण में व्याप्त है, जो घट-घट में बोल रहा है, जो स्वयं चेतन है पर जड़ रूप  में प्रकट हुआ है, वही परमात्मा है. जो निर्गुण होते हुए भी सगुण रूप धरता है, उसी की एकमात्र सत्ता है, वही है जो भीतर तृप्ति का अनुभव कराता है. आनंद स्वरूप, सत्य स्वरूप, शांत और अनंत वह परब्रह्म सर्व व्यापक है, पर वही अपना आप है जिसे ढूँढने न तो कहीं जाना है न शास्त्रों को घोट-घोट कर पढ़ना है, न ही घोर तपस्या करनी है बल्कि मन को सदा उससे संयुक्त रखना है. शांत, सत्य और आनंद स्वरूप उसका ध्यान करना है. वही उसे निकट लायेगा, मन जब उसी के चिन्तन में डूब जायेगा तो न कोई अभाव रहेगा न दुःख, न चाह, सारा विषाद न जाने चला जायेगा. जैसा कि उसका चला गया है और सदाबहार मुस्कुराहट ने अपना घर बना लिया है. अंतरात्मा के तीर्थ को जानकर ही उस रब को जो सदा से ही था, कोई जान सकता है. जब यह दिव्य ज्ञान  हृदय में परिपक्व होगा तब मुक्ति व भक्ति में प्रवेश मिलता है. आज उसने योग शिक्षक से फोन पर बात की, वह कल उनके घर आ रहे हैं. उसके साथ जून भी बहुत खुश हैं, वह उन्हें लेने डिब्रूगढ़ जायेंगे. गुरू के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहिए, जैसे ईश्वर के प्रति, लेकिन क्या कोई अपने प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करता है, ईश्वर तो अपना आप है न, यूँ देखा जाये तो सभी एक हैं, कहीं भेद तो है ही नहीं, शब्दों की भी एक सीमा है उसके बाद वे व्यर्थ हो जाते हैं, रह जाती है सिर्फ एक अनुभूति और वही अनुभूति उसे गुरू के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने को विवश करती है क्योंकि जैसा बाबाजी भी कहते हैं बारह वर्ष की मनमानी साधना करने से जो लाभ नहीं होता वह गुरू के सान्निध्य में कुछ ही दिनों में हो जाता है !

आज दो बजे योग शिक्षक आयेंगे. उसने स्वयं को सचेत किया. ईश्वर किसी को एक क्षण के लिए भी विस्मृत नहीं करते. जहाँ चाह है वहाँ राह है. जहाँ कृष्ण है वहाँ श्री है. कृपा से ही भीतर के शत्रुओं पर विजय पायी जा सकती है और भीतर की शुद्धता ही व्यवहारिक जीवन में सहज बनाती है, सूझ-बूझ देती है. गुरू ने जो ज्ञान दिया है उससे भी कहीं ज्यादा ज्ञान (क्योंकि ज्ञान अनंत है ) अभी उनसे सीखना है, जो उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखकर व सेवा करके ही वे पाने के अधिकारी बन सकते हैं. ज्ञान ही किसी को निस्वार्थ बनाता है, उच्च बनाता है. गुरू के प्रति श्रद्धा दिखाते हुए कभी भी स्वयं को उनके आगे योग्य सिद्द करने की भूल नहीं करनी चाहिए, बल्कि अहम् को पूरी तरह भुलाकर, स्वयं को अकिंचन मानकर जाना चाहिए तभी कृपा प्रसाद मिलेगा. गुरू के सामने उपलब्धियों की कोई कीमत नहीं, एक धूलि कण के बराबर हैं. बाबाजी कहते हैं जो प्रभु का नाम अपना लेता है वह कभी डूबता नहीं यदि किसी को मान चाहिए तो गुरू के पास जाना नहीं चाहिए. अहंकार को पोषणा नहीं है पर उसे तोड़ना है. गुरू की आज्ञा का पालन ही उनकी सेवा है.

जहाँ श्रद्धा होती है वहाँ बुद्धि लगती है अर्थात बुद्धि स्थिर होती है फिर संशय का कोई स्थान नहीं. जहाँ प्रेम होता है वहाँ प्रेमास्पद के सान्निध्य की चाह होती है. ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम दोनों हो तो बुद्धि उन्हीं से युक्त होगी और उन्हें पाने की चाह दृढ़ होगी. कल रात जून ने पूछा, साधना किसे कहते हैं, उनके मन में भी ईश्वर के प्रति प्रेम उत्पन्न हो रहा है. साधना के विभिन्न सोपान हैं, अभी वे पहली या दूसरी सीढ़ी पर ही हैं मगर ईश्वर की झलक उन्हें अपने अंतर्मन में मिलने लगी है. यह हर वक्त की बेवजह मुस्कुराहट, यह खिला-खिला सा चेहरा और हंसती हुई आँखें यही तो बताती हैं न ‘कोई है’, कोई है जिसे उन्होंने खोज लिया है और जिसने उन्हें खोज लिया है. कल वे डिब्रूगढ़ गये, शिक्षक भिन्न लिबास में थे मगर उनकी बातें उतनी हो मोहक थीं. वे तीन परिवार गये थे, भोजन बनाकर ले गये थे. लौटे तो शाम हो चुकी थी. सुबह ‘क्रिया’ की फिर ‘ध्यान’ भी किया लेकिन लग रहा है कि कहीं कुछ है जो छूट गया है. एक कसक सी है जो हर साधक को सालती होगी तभी तो वह अपनी साधना को और निखारता है. प्रेम के दो अंग हैं संयोग और वियोग. सुख और दुःख मगर इसका दुःख भी मिठास भरा है. उनका हर पल वर्तमान में गुजरे. वाणी और विचारों के प्रति प्रतिपल वे सजग रहें, अध्ययन मनन भी लक्ष्य से दूर ले जाने वाला न हो बल्कि लक्ष्य की ओर ले जाने वाला हो पर अपने कर्त्तव्यों से च्युत भी न हों. ईश्वर के मार्ग पर चलना कितना सरल है पर साथ ही कितना कठिन भी. मन पर सदा नजर रखनी होगी. मन न जाने कितने-कितने रूप बनाकर छलता आया है. कभी यह मन आत्मा और ईश्वर का रूप भी बनाकर छल सकता है, पर सत्य कभी छिपता नहीं !


Friday, December 19, 2014

हास्य कवि सम्मेलन


आज सुबह वे चार बजे उठे और 'क्रिया' आदि शीघ्रता से की. नन्हे को छह बजे विशेष कक्षा के लिए जाना था पर गाड़ी न मिलने की वजह से नहीं जा सका. घर पर ही पढ़ रहा है. आज शनिवार है, म्यूजिक सर आएंगे, उससे पूर्व थोडा अभ्यास कर लेना उचित होगा. सुबह दीदी को फोन किया, कल उनकी शादी की सालगिरह थी. छोटी ननद की परसों थी. उन्हें कुछ याद नहीं था. मन एक अलग ही स्तर पर रहता है आजकल. वे लोग योग शिक्षक को अपने घर आमंत्रित कर रहे हैं, देखें, वह समय निकल पाते हैं या नहीं. जून ने कहा, उन्हें लेने वे स्वयं भी जा सकते हैं. क्लब में हिंदी हास्य कवि सम्मेलन होने वाला है, वे शाम को कवियों से मिलने भी जायेंगे, कार्यक्रम सात बजे शुरू होगा. वह यह सब लिख रही है क्योंकि स्वयं को याद दिलाना चाहती है, विशेष आग्रह न रखे तो इच्छा पूर्ण होने का चांस ज्यादा है. वैसे भी उसकी मानसिक स्थिति ऐसी है की जहाँ उस एक परमात्मा की स्मृति के सिवा किसी इतर वस्तु या व्यक्ति के लिए आग्रह एक हद तक ही है. शिक्षक की बात अलग है, उनके लिए मन सदा श्रद्धा युक्त रहता है, साथ ही कवि के लिए भी, क्योंकि कवि भी स्रष्टा होता है, वह जीवन को एक नई नजर से देखता है. ‘योग वसिष्ठ’ में आज जो कुछ भी उसने पढ़ा वह art of living में भी सिखाया गया है, इतनी पुरानी पुस्तक और इतना आधुनिकतम ज्ञान, सत्य है ज्ञान एक है, सदा-सर्वदा एक..जैसे सत्य एक है और ईश्वर एक है, हर काल में हर युग में !

कब सुमिरोगे राम ? बालपन में खेल घुमायो, तरूपन में कम, अब तुम कब सुमिरोगे राम ? आज बाबाजी ने कहा. उन्हें देखकर लगता है, अंतर में कितना ज्ञान समेटे हैं. अनंत शांति और प्रेम भी. तत्व का बोध जिसे है वही मार्ग दिखा सकता है. जीवात्मा परमात्मा का सनातन अंश जो है. अन्तर्मुखी होकर उन्होंने अपने भीतर से पाया है यह सत्य. मृत्यु से पूर्व बल्कि वृद्धावस्था से पूर्व यह अनुभव दृढ हो जाये तभी जीवन सफल है. मन किसी भी स्थिति में अशांत न हो, क्योंकि यह उस अन्तेवासी का अपमान होगा जो आनंद स्वरूप है. उन्होंने एक और बात कही, ईश्वर के प्रति प्रेम का बखान करना ही दर्शाता है कि अभी प्रेम कच्चा है. जब कोई प्रेममय होता है तो उसे खबर नहीं होती, दूसरे ही पहले जानते हैं कि परमात्मा के प्रेम में पागल हो गया है ! प्रभु प्रीति अचल हो इसके लिए तो सजग रहना ही है पर वह दिखावा न बन जाये इसका भी विशेष प्रयत्न करना होगा क्योंकि जो जानता है वह कहता नहीं और जो कहता है वह अभी पूरा जानता नहीं. कल शाम वे कवि सम्मेलन देखने, सुनने गये, उससे पूर्व वह गेस्ट हाउस भी गयी उन लोगों से मिलने. सम्मेलन में वे बहुत हँसे शायद पूरे साल में उतना नहीं  हँसे होंगे. बाद में उसे ‘धन्यवाद ज्ञापन’ व्यक्त करने के लिय कहा गया जो शायद वह गुरू कृपा से बोल ही सकी.

आज नन्हे का स्कूल काटी बीहू के लये बंद है, उसका उपवास का दिन है. उसने सुना था एक बार बाबाजी कह रहे थे, उपवास से जीवनी शक्ति सुव्यस्थित होती है. उपवास का अर्थ है स्वयं के निकट रहना ! आश्विन शुरू हो गया है, एक माह बाद दीपावली होगी. मौसम आज स्वच्छ है, धूप खिली है. बगीचे में काम करने के लिए अच्छा दिन. शाम को फूलों के बीज रोपने हैं. कल उसने पिता को एक पत्र लिखा. कल शाम को क्रिया के बाद अद्भुत अनुभव हुआ. गुरुमाँ ने आज संत नामदेव की कथा सुनाई. उनका मन अन्तर्मुखी हुआ, जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहे थे वह भीतर मिल गया, जैसे नानक और कबीर को मिला था, जैसे उन्हें मिला है. जून का फोन आया, आज ऑफिस में एक ही शिफ्ट है, सो देर से आयेंगे सो एक घंटा अभ्यास कर सकती है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, गृहणी के हाथ का प्लास्टर कल खुला था, मिठाई खिलाई और दीवाली के लिए लाई बिजली की दो झालरें भी दिखाईं. दीपावली का प्रकाश उनके अंतर में भी उजाला करे, इस दीवाली को यही प्रार्थना करनी है.



Thursday, December 18, 2014

योग के आसन


God is with her always, it was before when she was young so is now and so will be in future. When one gives her life in his hand everything becomes crystal clear, mind is calm and heart is full of love, no past regret or no future planning. When he is always there to help why should she think of herself, she will think of Him only and whatever he wishes will be good for her. Krishna preached gita five thousand years back but man has not got anything higher than this knowledge, it is the ultimate. He says that जो जिस भाव से ईश्वर की शरण में जाता है उसी के अनुरूप ईश्वर उसे वर देते हैं. जो अनन्य भाव से उसकी शरण में जाता है ईश्वर पूर्णरूप से उसके कुशल-क्षेम का निर्वाह करते हैं. कल शाम विवेकानन्द साहित्य माला में राजयोग पर पढ़ा. मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ. वह एक गुरू की तरह कदम-कदम पर सहायता करते हैं. आज दोपहर को नये म्यूजिक सिस्टम के लिए कवर सिलने हैं. जीवात्मा के लिए ईश्वर की सहायता लेना उतना ही जरूरी है जितना मछली के लिए जलवास. ईश्वर ने उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता दी है पर वह चाहते हैं कि वे उनकी ओर जाएँ. वह प्रतीक्षा कर रहे हैं. वे प्रेम, ज्ञान, शांति और आनंद का अतुल भंडार हैं. वह प्रियदर्शन हैं !

गुरूजी कहते हैं, प्रेम में डूबे रहो, मस्त होकर गाओ, गुनगुनाओ और मन को उद्ग्विन न होने दो. जब भी कोई खुश होता है और शांत होता है ईश्वर के निकट होता है और उसके निकट जितने क्षण जीवन के बीतें वही सार्थक हैं ! कल एक सखी से ईश्वर संबंधी चर्चा की, वह भी इस पथ की यात्री है, अंततः हर एक को इसी पथ का यात्री बनना है, क्योंकि भौतिक रूप से कोई कितना भी सफल हो, आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न नहीं हुआ तो शांति का अनुभव नहीं कर पायेगा. आज सुबह ध्यान में दो-तीन बार तेज रौशनी का आभास हुआ. क्रिया करने के बाद मन कितना शांत था. गुरूजी के प्रति मन पुनः पुनः कृतज्ञता से भर जाता है. गुरुमाँ भजन गा रही हैं, मोको तू न बिसार, तू न बिसार, तू न बिसारे रामय्या !  लेबनान के दार्शनिक, शायर, चिंतक खलील जिब्रान की एक कथा भी सुनाई. सत्संग की महत्ता अपार है. सत्यस्वरूप परमात्मा में प्रीति, अमरता का बोध, आत्मा का ज्ञान, सभी कुछ मिलता है. आठ बजने को हैं, एक और दिन का आरम्भ हो चुका है, समय कितनी शीघ्रता से बीतता जा रहा है. पत्रों के जवाब देने का कार्य शेष है. समय के हर पल का उपयोग करना होगा. नन्हे के स्कूल में टेस्ट शुरू हो गये हैं. जून भी अपने कार्य में व्यस्त हैं, इतवार को उन्हें बॉस के यहाँ योगासन सिखाने जाना है. कल क्लब में ‘बोध’ नाटक था, वे नहीं गये.

आज भी ‘जागरण’ में प्रेरणास्पद विचार सुने. विचार अंगरक्षक की तरह हैं, वे रक्षा भी कर सकते हैं और बंदी भी बना सकते हैं. सोच कभी हल्की न हो, सदा उच्च विचारों को ही प्रश्रय देना होगा. लक्ष्य ऊंचे हों और शक्तियाँ उसकी तरफ केन्द्रित हों. भीतर अनमोल खजाना है, मस्तिष्क की ऊर्जा और तन की स्फूर्ति के रूप में ! आधे-अधूरे मन के साथ या निराश होकर और संशय के साथ कभी कोई काम नहीं करना है. निज पुरुषार्थ पर सदा भरोसा रखना है. गुरू की शक्ति कर्त्तव्य पथ पर सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करती है. अभी कुछ देर पूर्व उसने नैनी को सफाई के लिए कहा, सदा की तरह उसने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया तो एक क्षण के लिए उसका मन भी थोड़ा सा विचलित हुआ पर अगले ही क्षण उसे लगा, वह उस पर निर्भर ही क्यों रहे, उसके पास असीम सम्भावनाओं का भंडार है, उसका दस प्रतिशत भी अभी तक इस्तेमाल नहीं किया है. वह स्वयं ही जब काम में जुट गयी तो वह भी हाथ बंटाने लगी.