Showing posts with label कोर्स. Show all posts
Showing posts with label कोर्स. Show all posts

Sunday, August 10, 2025

अंतर आकाश


अंतर आकाश



कभी-कभी अतीत में झांकना जैसे एक खिड़की से झांकना है। जीवन को सुंदर बनाने की दिशा में उठाये गये वे छोटे-छोटे कदम थे, जो यहाँ तक ले आये हैं। जब हर घड़ी परमात्मा का स्मरण सहज ही बना रहता है। हर श्वास उसी की देन है। हर शै में वही है। उसके सिवा कोई और हो ही कैसे सकता है? भीतर एक अपूर्व शांति का साम्राज्य है, जिसे न कोई ले सकता है, न ही दे सकता है: वह ‘है’ ! शाम को मंझले भाई-भाभी से बहुत दिनों के बाद बात हुई। भाभी का जन्मदिन आने वाला है, उसके लिए कविता लिखनी है। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्हें चिंता है कि भक्तिभाव में ज़्यादा नहीं डूबना चाहिए, नहीं तो संसार से विरक्ति हो जाएगी। मनुष्य का मन भी कितना जकड़ा हुआ है, उम्र के आख़िरी पड़ाव पर आकर भी विरक्ति की बात से उसे भय लगता है। 


आज सुबह टहलने गये तो आसमान में पूर्णिमा का चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था।नीले बादलों से झांकता हुआ पीला चाँद बहुत सुंदर लग रहा था। रोज़ की तरह नीम की टहनी से कुछ कोमल पत्तियाँ जून ने तोड़ कर दी, पित्त कम होता है नीम की पत्ती चबाने से। वापस आकर धौति क्रिया भी की और आसान आदि। गुरुजी का एक पुराना वीडियो देखा, बहुत ही अच्छा लगा। एडवांस कोर्स में सुना था इसे।जून आज बगीचे के लिए मिट्टी व खाद लाए हैं। दोपहर को छोटी बहन से बात हुई, बहनोई की दूसरी आँख का ऑपरेशन अगले महीने होगा। शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग के संयम कोर्स की सूचना मिली। उसने सोचा है, मंगल से शुक्र चार दिनों तक स्वयं ही प्रतिदिन मौन रहकर आठ घंटे की साधना करेगी। जून भी मान गये हैं। बहुत अच्छा लगेगा। 


आज शाम से ही तेज वर्षा हो रही थी, जब से वे बोटेनिका से लौटे। वापस आकर कुछ किताबों में से एक-एक पन्ना पढ़ा, परमात्मा को अपने क़रीब महसूस किया। नन्हे से बात हुई, कल सुबह वह सोनू के साथ आएगा। आज पहली बार बगीचे से पपीता तोड़ा, कल पराँठे बनायेंगे। 


आज नाश्ते के बाद सब लोग अगारा झील देखने गये, अत्यंत सुंदर दृश्य थे। थोड़ी सी चढ़ाई चढ़कर झील के किनारे बने ऊँचे बंद पर टहलते रहे। दोपहर को बच्चे वापस चले गये। शाम को बोटेनिका से आगे सोमनहल्ली की तरफ़ कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ते गये। वापसी में एक परिचित दंपत्ति कृष्णा व उनकी डाक्टर  पत्नी मिल गयीं ।उनके साथ थोड़ा और आगे जंगल में चले गये, लौटते समय वर्षा होने लगी, पहले बूँदाबाँदी फिर तेज वर्षा, घर आते-आते तक सभी पूरी तरह भीग गये थे। जून ने ग्रीन टी बनायी।आज झील और जंगल की कई तस्वीरें भी उतारीं। 


आज बहुत दिनों बाद आसमान में टिमटिमाते चमचमाते तारे देखे, कल भी तापमान ३२ डिग्री रहेगा। नूना कल से अगले चार दिनों तक ध्यान व मौन की साधना शुरू कर रही है। यह इस तरह का पहला प्रयास है, पर आगे भी जारी रहेगा। सुबह ६-८।३० तक योग आसन, प्राणायाम, क्रिया तथा ध्यान । ८।३० से १०  तक नाश्ता व बगीचे में काम। १०-१२/३० तक जप साधना, स्वाध्याय व लेखन। १२/३० - ३ बजे तक भोजन, विश्राम व लेखन, ३-६ तक ध्यान, भजन, गायन, श्लोक पाठ।६-९तक सांध्य भ्रमण, रात्रि भोजन, डायरी लेखन, रात्रि भ्रमण। इन चार दिनों में मोबाइल तथा टीवी से दूरी रहेगी। स्वयं को जानने के लिए स्वयं के साथ समय बिताना बहुत ज़रूरी है।  


आज चार दिनों के मौन का प्रथम दिन है। दिन भर में कुल मिलकर पाँच-छह शब्द बोले होंगे। बिना बोले भी काम चल जाता है। शब्दों के पीछे जो भाव हैं, वे इशारे से भी बखूबी समझाए जा सकते हैं। आज अपेक्षाकृत मौसम गर्म है। बहुत दिनों बाद सूर्यास्त के भी दर्शन भी हुए, बादलों के पीछे ही सही। गुरुजी की दो पुस्तकें निकालीं, सोर्स ऑफ़ लाइफ तथा द स्पेस विदिन, दोनों में अमूल्य ज्ञान है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रह्मचर्य का अर्थ बहुत सरलता से समझाया गया है। शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान आदि नियमों का भी। ध्यान की बारीकियाँ पढ़कर ध्यान भी गहरा हुआ। आज रात की निद्रा भी अवश्य विश्राम पूर्ण होगी। कुछ पुरानी कविताएँ भी पढ़ीं। सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक का समय अति सरलता से बीत गया। सुबह कुछ देर बाग़वानी की कुछ देर सफ़ाई। अभी सोने में आधा घंटा शेष है, कुछ लिखा जा सकता है।                                                                                                    


Friday, March 6, 2015

महाभारत का अध्ययन


गुरू के प्रति प्रेम मन से शुरू होता है और आत्मा तक पहुँचता है. गुरू से मिला ज्ञान अथवा प्रेम ही इस प्रेम को उपजाता है, उसके प्रति कृतज्ञता और आभार की भावना भी प्रेम का ही दूसरा रूप है. कल शाम उन्होंने योग शिक्षक से बात की. कल दोपहर उसकी आंखों में रह रह कर आंसू भर आते थे, यह आद्रता अंतर में कहाँ छुपी थी उसे स्वयं भी पता नहीं था, जो गुरू स्मरण से सारी सीमाएं तोड़कर बह निकली है. सम्भवतः यह सारी सृष्टि के लिए है जो ब्रह्म का ही दूसरा रूप है, बल्कि ब्रह्म स्वरूप है, सभी के भीतर वही प्रकाश है जो गुरू के भीतर है पर उनके भीतर का प्रकाश उनके चेहरे पर झलकता है, क्योंकि वह ईश्वर के निकट हैं. सब प्राणियों के प्रति उनके भीतर प्रेमपूर्ण भाव है, प्रसन्नता की मूरत हैं. निस्वार्थ भाव से इस जगत के कल्याण में लगे हैं. उनकी आँखों में ईश्वर का प्रकाश है. नूना ने सोचा, ऐसी ही भावना उनके हृदयों में उत्पन्न हो, उनका अभ्यास और वैराग्य दृढ़ हो. शाम को वे योग शिक्षक से मिलने जायेंगे. उनका मुख्य कर्त्तव्य है अपने सच्चे स्वरूप को जानना, जिसे भुला दिया है उसको याद करना. वह स्मरण इतना सहज हो जैसे धूप और हवा और जल अपने सहज रूप में सदा रहते हैं, झरते हुए, बहते हुए, बिखरते हुए वैसे ही उनका मन उसकी याद में झरता रहे, बहता रहे, पिघलता रहे, द्रवित होता रहे. कुछ स्थूल न बचे, कोई ठोसपना नहीं...सब कुछ बह जाये...

कल शाम वे क्लब गये, बेसिक कोर्स चल रहा था. पुरानी स्मृतियाँ उसके मानस पटल पर आ गयीं. उन्होंने सितम्बर में यह कोर्स किया था, आठ महीने होने को हैं. उसके जीवन के वे सुनहरे दिन थे. उन्ही दिनों उस परमपिता का अनुभव हुआ था, वह जो सत्य स्वरूप है, जो सदा से है, सदा रहेगा, जो सबका आधार है, जिसकी सत्ता से उनकी धड़कनें चल रही हैं. जो उनके भीतर है, उनके हर क्षण का साक्षी है, जो उन्हें सदा प्रेरित करता है, जिसका न आदि है न अंत, वह न स्थूल है न सूक्ष्म. वह जिसे वे इन्द्रियों से देख नहीं सकते जो मन की गहराइयों में भी अव्यक्त है. वह जो सुख का स्रोत है, प्रेम और ज्ञान का सागर है, वह जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है. वही शब्द है, वही नाद है, वही प्राण है और वही इन सबका आधार...ऐसे परमात्मा जिसकी स्मृति से उसका अंतर कमल की भांति खिल उठता है, एक अनजानी सी ख़ुशी की लहर पोर-पोर में समा जाती है, उनका स्मरण ही इतना प्रभाव डालता है तो उनका दर्शन कितना असर डालता होगा यह कल्पना से भी बाहर है. उनसे जो जुड़ा है वह गुरू पूजनीय है और उस गुरू से जो जुड़े हैं वह योग शिक्षक शाम को उनके यहाँ भोजन पर आ रहे हैं.

कल रात्रि आठ बजे शिक्षक आये, दस बजे गये, दो घंटे कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. उनकी बातें मन को छूती हैं, ज्ञानप्रद हैं. नन्हे और जून को कोर्स करने व सत्संग में जाने को उत्साहित किया, दोनों प्रभावित नजर आ रहे थे. नन्हे को ‘महाभारत’ पढ़ने को कहा है. अभी कुछ देर पहले पड़ोसिन सखी से बात की. कल की मीटिंग की बहुत तारीफ़ क्र रही थी, श्लोक, गीत व गेम सभी अच्छे थे. अभी-अभी गुरुमाँ का प्रवचन सुना. बहुत स्पष्ट शब्दोंमें बोलती हैं.
चाह चूड़ी चाह चमारण, चाह नींचा दी नीच
तू तां बुलया शाह सी, जो चाह न होती बीच

योग वशिष्ठ में कहा गया है जिसके हृदय से सब अर्थों की आस्था चली गयी है, अर्थात जो जगत में रहते हुए भी यह जानता हो कि सब सपना है, सब माया का खेल है, आत्मशांति तभी मिलती है जब यह ज्ञान होता है. श्री श्री के हृदय में भी यही ज्ञान है और तभी वह इतना काम कर पाते हैं. वे भी ज्ञान में स्थित रहें, अविद्या को दूर करें तभी आत्मिक सुख पा सकते हैं और तब कोई भौतिक आकांक्षा नहीं रह जाती क्योंकि उस एक के सिवा प्राप्त करने को क्या है ? प्रवृत्ति और निवृत्ति का ज्ञान प्राप्त करना है. उसका दिया उसको अर्पण करके ग्रहण करना है.


Thursday, January 1, 2015

गीत समर्पण के


पिछले दो दिन डायरी नहीं लिख सकी. सुबह का वक्त जो श्रवण-लेखन में बीतता है, छुट्टी होने पर अन्य कार्यों में चला जाता है. जीव हर वक्त इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगा रहता है. देहात्म बुद्धि से निजात पाना कितना कठिन हो जाता है पर इन सबके बीच ‘क्रिया’ के क्षण वरदान बनकर आते हैं, जब मन आत्मभाव में स्थित हो जाता है. आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह सभी से बात की, कल रात पिता से भी बात हुई, उन्होंने बताया, पत्र लिखा है. दीदी ने पत्र का जवाब फोन पर दिया. कल दोनों भाई उनके यहाँ परिवार सहित पहुंच गये आज दोपहर तक वापस आयेंगे. कुछ देर पहले छोटी बहन का फोन आया उसने नन्हे से यहाँ का पिन पूछा और कुशलता का समाचार लिया दिया. सुबह ससुराल से फोन आया यह याद दिलाने के लिए कि वे बधाई देने के लिए फोन अवश्य करें. यह फोन उन सभी परिवारजनों को आपस में जोड़े हुए है.

आज पूरे एक हफ्ते बाद नन्हे का स्कूल खुला है. वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाए सो क्रिया भी नहीं हो सकी. अभी कुछ देर पहले बाबाजी का हिमाचल में हुआ सत्संग देखा, मन भर आया, गुरू का सन्निध्य कितना अमूल्य होता है. योग शिक्षक से वे पिछले इतवार को डिब्रूगढ़ में मिले थे, उसके बाद से कोई खबर नहीं है. उस दिन एक मित्र परिवार ने दो कैसेट दिए एक में समपर्ण के गीत हैं. सुनकर बहुत अच्छा लगता है. गुरू उन्हें कितनी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं, गुरू भीतर ही हैं, सदा उनके पास हैं पर फिर भी किसी बाहरी आश्रय की आवश्यकता का अनुभव होता है, कोई ऐसा जो दो आँखों से ही अंदर का सारा हाल जान लेता है, जिसका एक वचन ही काफी होता है. जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी से शिक्षा लेनी पड़ती है तो ईश्वर को जानने जैसे महान कार्य के लिए गुरू की आवश्यकता हो इसमें आश्चर्य क्या है. गुरू मन का वैद्य होता है. जो विकारों से मन को मुक्त करता है. ऐसा सद्गुरु आसानी से नहीं मिलता, पर ईश्वर की अनुभति वही करा सकता है. वह शिष्य के मंगल की कामना हर क्षण करता है, उसका हृदय ईश्वर की तरह अनंत प्रेम से भरा हुआ है. कल शाम से ही बल्कि दोपहर से ही उसका सिर भारी था, खैर, शरीर का अपना धर्म है और आत्मा तो सदा मुक्त है, कल उसने इन दोनों को अलग-अलग रखते हुए कोई दवा आदि नहीं ली और रात को कब अपने-आप ही दर्द ठीक हो गया पता नहीं चला. आज ‘जागरण’ में विभिन्न चक्रों के बारे में सुना. आत्मा के स्तर पर जीना यदि कोई सीख ले तो सारे चक्र अपने आप ही जाग्रत हो जायेंगे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा से जीवन ओत-प्रोत हो जायेगा.

कल अंततः जून को शिक्षक का ईमेल मिला. उनके भाई का देहांत हो गया था जिसके एक्सीडेंट की खबर सुनकर वे गोहाटी गये थे, जीवन कितना क्षणिक है यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है. देह का संबंध क्षणिक है मात्र ईश्वर से मानव का संबंध शाश्वत है. उन्होंने उसे दो आदेश दिए थे पहला सेवा करनी चाहिए दूसरा ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करने का आदेश. पर दोनों ही आदेशों का पालन वह नहीं कर पायी है. सेवा करने की क्षमता नहीं है, अपने परिवार और निज आत्मा की सेवा करने में ही सारा समय बीतता है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा बलवती होती जा रही है. कृष्ण की चेतना में अपनी चेतना जोड़ने की इच्छा. भगवद स्मरण के सिवा और कोई भी कार्य स्वीकार्य नहीं लगता है. आज सुबह वे उठे तो गला खराब लग रहा था पर अब देह को आत्मा से अलग रख कर देखने की कला गुरूजी ने सिखा दी है. परमात्मा उसे जिस हाल में रखना चाहें, क्योंकि वही सब करा रहे हैं. उसके लिए जो भी अच्छा है वही होगा. वह जड़ वस्तु पर निर्भर न रहकर चेतना की ओर कदम बढ़ा रही है. इन्द्रियां अपना काम करती रहेंगी, मात्र उसकी चेतना इन्द्रियों की ओर न जाकर कृष्ण की ओर जा रही होगी.


कल सुबह एक सखी आई थी अपनी समस्या लेकर और गुरूजी ने उसे उसकी सहायता करने की प्रेरणा दी. सुबह उसको फोन किया. सुबह एक अन्य सखी के साथ बाजार गयी, वह अपने यहाँ कल पूर्णिमा की कथा का आयोजन कर रही है. बाद में लंच भी होगा जो उसके जन्मदिन का भी होगा, क्योंकि उस दिन करवाचौथ है. कल शाम दीदी का फोन आया उन्होंने बताया उनके घर के पास एक नर्सिंग होम बिक रहा है वह चाहती हैं वे सभी मिलकर उसे खरीद लें और चलायें पर उन्हें यह विचार जंच नहीं रहा है, न तो  उन्हें इसका कोई अनुभव है और न ही इतना धन है. जून आज देर से आने वाले हैं. इसी माह होने वाले एक कोर्स के लिए सहायता करने में व्यस्त हैं. कल पिता का एक लम्बा सा पत्र आया है. उसने उनके लिए एक कार्ड खरीदा और अभी छह कार्ड खरीदे जो जिनको मिलेंगे उन्हें ख़ुशी अवश्य देंगे, क्योंकि बहुत प्यार से चुने गये हैं. सुबह एक सखी को भी उसने इसी प्यार और विश्वास की बात कही, उसका जीवन कैसा अजीब सा हो गया है उसने स्वयं ही बना लिया है. ईश्वर से प्रार्थना करेगी और गुरूजी से भी की उसे सामर्थ्य दे, शक्ति दे ! art of living ने जैसे उसके जीवन में एक शांति, स्निग्धता और प्रेम की लहर ला दी है वैसी ही लहर उसके जीवन में भी आये. वह अपने रिश्तों की कद्र करना सीखे. 

Tuesday, March 19, 2013

लटपटे नूडल्स



हैप्पी सेवेंथ...अभी कुछ देर पूर्व जून ने कहा, ठीक एक माह बाद आज के ही दिन उनके विवाह की वर्षगाँठ है. आज सुबह नन्हे के लिए ऊन की टोपी बनाने में लगी रही. कल शाम वह काफी देर तक पढ़ता रहा, घर जाने से उसका काफी कोर्स छूट गया था. आज जून धनिया व मूली के बीज लाए हैं, हरी मिर्च की पौध भी. शाम को सभी लगाने हैं. कल तीन खत लिखे, जो मन में आया, सभी  लिखती गयी, दीदी को भी, माँ-पिता को भी...कब तक कोई चेहरे पर मुखौटा लगाये रह सकता है? सितम्बर का न्यूज़ ट्रैक देखा, कुछ खास नहीं लगा, जुही चावला का इंटरव्यू है, पता नहीं ये सारी अभिनेत्रियाँ एक जैसी भाषा क्यों बोलती हैं, क्या बोल रही हैं शायद इंटरव्यूअर भी नहीं समझ पाती होंगी, लेकिन ‘केएसकेटी’ देखने का मन हो गया है इंटरव्यू सुनकर. नए साल के कार्ड भेजने हैं सभी को फुफेरी बहन को भी और मामी जी को भी.

  अभी-अभी उसने दैनिक व्यायाम किया, तन के साथ मन भी हल्का हो गया, कुछ देर बगीचे में भी काम किया था उसके पहले, गाजर के बीज डलवाए और फ्रेंच बीन्स तोड़े. गुलदाउदी पूरे शबाब में खिल रहा है और गेंदा भी. उन्होंने नया माली रखा है, पता नहीं यह भी कब तक टिकेगा. सुबह नन्हे के लिए नाश्ते में नूडल्स बनाने का प्रयास किया, पर ज्यादा गीले हो गए, मेसी टाइप, पर नन्हा इतना समझदार और प्यारा है कि उसने जरा भी मुंह नहीं बनाया और उसे ही खुशी से खा लिया. दोपहर को उसका स्कूल का चार्ट बनाकर रखेगी, रंग वह आकर भरेगा.

  कल दोपहर जून को जो पहले से ही उखड़े-उखड़े थे, उसने यूँ ही उदास कर दिया, उसने मन ही मन उनसे क्षमा मांगी. कल शाम को उसकी छात्रा ने उसे खुशी का अनुपम उपहार दिया, उसके कारण उसे हमेशा अनजानी, अनसोची खुशियाँ मिलती रही हैं, वह सचमुच प्रिया है. उसने सोचा उसे नए साल का कार्ड अवश्य भेजेगी. कल जब उसने बताया तो सन अठासी की पत्रिका निकल कर अपनी कविता पढ़ी-  
खोल दो मन के सब के दरवाजे, खुली हवाएं आने दो !
बहुत सुकून मिला पढ़कर, प्रिंसिपल साहब ने तारीफ की इसके भावों की.. उसने मन ही मन उसे धन्यवाद दिया. अभी कुछ देर पूर्व उसने एक-एक कर दो सखियों को फोन किया, सम्बन्ध अपनी सुविधानुसार निभाना चाहते हैं आजकल सभी लोग, दूसरों के लिए किसी स्नेह या आत्मीयता के कारण नहीं. रिश्ते अपनी जरूरत के अनुसार बनाये या बिगाड़े जाते हैं. लेकिन इस पर अफ़सोस करने की कोई बात नहीं क्योंकि यह कोई नई बात तो नहीं...अब तो मन इतना कठोर हो चुका है कि सब कुछ आसानी से सह लेता है. इससे तो अच्छा है दोस्त बनाएँ हम अपने विचारों को..किताबों को और फूलों को जो बदले में अनादर तो नहीं करते हमारे स्नेह का. उसने देखा, सवा दस हो चुके हैं, अभी कई कार्य शेष हैं, सो मन की पीड़ा इन्हीं पन्नों में छोड़कर अब शेष कार्यों में लगने चली गयी.

  आज से नन्हे की छमाही परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. आज हिंदी का पेपर है. उसके लिए अंग्रेजी का पेपर बना कर रखेगी जो वह आकर हल करेगा. परसों उसकी नैनी लक्ष्मी चली जायेगी, फिर कितनी मुश्किल होगी..एक लाभ होगा उसकी कमर जो फैलती जा रही है थोड़ी तो कम होगी कुछ काम करने से. कल एक बच्ची के जन्मदिन की पार्टी में गए थे वे, इतने लोग थे कि बैठने की जगह नहीं मिल पा रही थी कुछ लोगों को. आज खतों का दिन भी है पर पिछले हफ्ते एक भी खत नहीं आया, सो अगले हफ्ते ही लिखेगी नए साल की शुभकामनाओं के साथ.

  अभी कुछ देर पूर्व पुरानी पड़ोसिन से बात की और अब इस बात पर पछता रही है कि व्यर्थ ही लेडीज क्लब के ‘मेहँदी’ कार्यक्रम की आलोचना की, सचमुच कितनी आसान होती है आलोचना लेकिन प्रशंसा करना भी उतना ही आसान है उसके लिए यदि बात उसके मन की हो, चलो, इस बात को यहीं छोड़ते हैं, उसने सोचा. शाम को क्लब जाना है, क्रिसमस ईव है, बचपन में कितने गीत गाते थे वे ईसामसीह के बारे में. आज भी कई दिन बाद लिख रही है, नन्हा पास ही बैठा है उसे काम दिया है, पर वह हर एक मिनट में कुछ पूछ लेता है. उसने सोचा इन छुट्टियों में उसे कोर्स की पुस्तकों के अलावा कुछ पढ़ाएगी, पर इधर-उधर के कामों में ही मन इतना थक जाता है कि...फिर भी कुछ समय तो निकालना ही चाहिए. कल जून वह कार्ड भी ले आए जो उस छात्रा को भेजना है. पिछले हफ्ते सिर्फ मंझले भाई का एक पत्र आया था. कभी वे दिन भी थे जब लिखने से सुकून मिलता था पर आज इस वक्त कुछ जम नहीं रहा है यूँ कलम चलाना, और ऐसा पहले भी हुआ है, हो सकता है पहले यही बेचैनी उसे भाती हो.