Tuesday, July 15, 2014

पूसी का परिवार


आज उनतीस अप्रैल की सुबह नौ बजे वह पंच भूतों, समस्त देवी-देवताओं व परम सत्ता को साक्षी बनाकर एक घोषणा करना चाहती है. “मानवीय सद्गुणों में जो सर्वोत्तम है, जिसके कारण इस सृष्टि में सुन्दरता है, वही प्रेम समस्त प्रश्नों का हल है”. उसने सोचा, यदि मानव, मानव के प्रति प्रेम का भाव रखे तो इस संसार से सारे वैमनस्य, सारी क्षुद्रता पल भर में मिट जाये. प्रेम लेकिन सच्चा होना चाहिए, ऐसा प्रेम प्रतिदान नहीं माँगता, वही प्रेम जो सबके जीवन में एक न एक बार अवश्य उदित होता है, पर उसे कुचल दिया जाता है, ईर्ष्या, लोभ, मोह, और क्रोध जैसे अवगुण उसे ढक लेते हैं. वह बीती वस्तु बन कर रह जाता है और कभी-कभी लगता है कि प्रेम कहीं था ही नहीं, शायद वह भ्रम था, पर वह भ्रम नहीं था, वह सत्य था जो झूठ के नीचे दबा सिसक रहा होता है. यदि क्रोध सत्य हो सकता है तो प्रेम क्यों नहीं. जरूरत है तो बस उस कोमल पौधे को जीवित रखने की, आस-पास के झाड़-झंखाड़ साफ कर उसे सही पोषण देकर बड़ा करने की, वही प्रेम का पौधा जीवन में फलीभूत होगा और खुशियों के फल देगा.

यह डायरी उसकी आध्यात्मिक यात्रा का भी दस्तावेज है, वर्षों पहले उस यात्रा का बीज अंतर में प्रकृति ने बोया था, पर मौसम आते-जाते रहे, कभी अनुकूलता मिली, कभी प्रतिकूलता और अंकुर से पौधा बनने में इतना वक्त लग गया. आज भी यह एक पौधा है अर्थात यात्रा का आरम्भिक चरण, लेकिन अब इसे दिशा मिल गयी है. भारत के मनीषियों, ऋषियों, संतों और अवतारों के जीवन, उनके सदुपदेश ने इसे पानी और भोजन दिया है. कल जून कोलकाता होते हुए मुम्बई से यहाँ आ गये. वह दोपहर का खाना खाकर थोड़ा आराम कर रही थी, टीवी पर ‘दिल ही दिल में’, internet love पर फिल्म आ रही थी. जून थोड़ा थके हुए थे, जो स्वाभाविक ही है, पर खुश थे, उनका भाव वही पहले की तरह था छलकता हुआ. शाम को एक सखी आयी, बेटे के लिए हिंदी के प्रश्न पूछने. बाद में उसे एक सखी को बुलाना पड़ा, जिसे पेट्स का अनुभव है, पूसी अपने बच्चों को भूखा छोड़कर रात से ही गायब थी, भूख से व भीग जाने के कारण वे रो रहे थे, उसने बड़े प्यार से दूध पिलाया और सुखाया और तब वे सो गये. रात को पूसी आ गयी थी, शायद वह कहीं शिकार को गयी थी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, कह रहा था प्रोजेक्ट वर्क में व्यस्त रहने के कारण क्लासेस ही अटेंड नहीं कर पाया था,  अपने आप पढकर, समझकर, याद करना कठिन कार्य है लेकिन उसे मालम है नन्हे का टेस्ट हमेशा की तरह अच्छा होगा.

ईश्वर पर विश्वास करो तो सब कुछ कितना सहल हो जाता है. आज मई महीने का दूसरा दिन है. उसके जन्मदिन का महिना. इस बार वह उस दिन अपने जन्मस्थान में होगी, जहाँ उन्होंने एक घर भी बनाया है भविष्य में रहने के लिए. वर्षों पहले जब वह बीस की हुई थी, सोच रही थी बहुत बड़ी हो गयी है, उस उम्र में बीस का होना भी बहुत बड़ा होता है. यह भी सोच रही थी कि इतने वर्षों में अपने जीवन का, ऊर्जा का, मानसिक शक्ति का सदुपयोग नहीं किया किन्तु आज वह मलाल नहीं है. जिन्दगी ने उसे बहुत कुछ दिया है और भरसक प्रयत्न करके उसने ईश्वर के मार्ग पर चलने का प्रयास जारी रखा है, क्योंकि वही एकमात्र सत्य है और हर मानव का अंतिम उद्देश्य है सत्य की प्राप्ति. आज सुबह जून ने उसे उठाया, वह और नन्हा दोनों उसके स्नेह के पात्र हैं, ऐसे स्नेह के जो निस्वार्थ, निष्काम और शुद्ध है, जो स्नेह के लिए स्नेह है, love for the sake of love क्योंकि सत्य के साथ ईश्वर प्रेम भी है. आज ‘जागरण’ में सुना सुख-दुःख आदि अवस्थाएं आती रहती हैं, इन्हें साक्षी भाव से देखने वाला आत्मा इनसे अलिप्त रहता है तो उसे यह प्रभावित नहीं करतीं. कल लाइब्रेरी से चार नई किताबें लायी है. आज से योगासन करते समय सचेत रहेगी, क्योकि ध्यानयुक्त होकर आसन करने से ही उसका लाभ मिल सकता है. आज नन्हे के स्कूल में extempore speech का टेस्ट है. नानाजी की दी एक डायरी से उसने सहायता ली है, कुछ साल पहले पिता ने ये डायरी उसे दी थी, जिनमें विभिन्न विषयों पर जानकारी है.






Monday, July 14, 2014

विज्ञान प्रदर्शनी की रौनक


जून को सम्भवतः सोमवार को मुम्बई जाना पड़े, एक सप्ताह नन्हा और उसे अकेले रहना पड़ेगा, अपने स्वार्थ के कारण नूना ने कहा, भगवान करे ट्रिप कैंसिल हो जाये पर अब वह ऐसा नहीं चाहती यदि जून का जाना आवश्यक है, कम्पनी का लाभ है तो उन्हें वहाँ अवश्य जाना चाहिए.

जून कल चले गये, कल रात उनका फोन काफी देर से आया, वह कुछ देर पूर्व ही सोयी थी, पर नींद गहरी नहीं थी, जून के बिना पहली रात को ऐसा ही होता है, बाहर का गेट, गैराज का गेट और बरामदे का गेट बंद करके भीतर आकर दरवाजा बंद करते करते एक ख्याल कहीं न कहीं से आ जाता है सब ताले ठीक से लग गये न. नन्हा आज स्कूल से देर से आने वाला है, उसके पास आठ घंटे हैं जिन्हें उसे व्यवस्थित ढंग से बिताना है. मौसम ठंडा है, गर्मियों में ऐसा मौसम रहे तो गर्मी का अहसास ही नहीं होता. कल शाम वह अकेले टहलने गयी. जून के न रहने से इस बार उसे उदासी का ज्यादा अहसास हो रहा है, ज्यों-ज्यों उनका साथ बढ़ता जा रहा है, निकटता भी बढ़ रही है, उनका एकनिष्ठ स्नेह नूना को अंदर तक भिगो गया है. she loves him and misses him ! लेकिन वह उदास नहीं है, साधक कभी उदास नहीं होता, उसे अपनी भावनाओं को उचित दिशा देनी होगी, ढेर सारे काम भी हैं. पत्र लिखने हैं, सिलाई करनी है और दोपहर को संगीत क्लास में भी जाना है.

कल शाम उसने नन्हे के स्कूल में बितायी, बच्चे बड़े उत्साह से अपने-अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रहे थे. नन्हा भी खुश था. सुबह एक सखी से बात हुई, वह अपने पुत्र के भविष्य की बारे में उसी तरह चिंतित थी जैसे जून के एक मित्र अपने पुत्र के भविष्य के बारे में, लेकिन उसे नन्हे के भविष्य के बारे में चिंता करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती न ही जून को. उसे समझाना, रास्ता दिखाना उनका काम है लेकिन वह कौन सा रास्ता चुनेगा यह समय स्वयं बतायेगा. आज उन्हें दो मित्रों के यहाँ जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ के लिए जाना है. दोनों के यहाँ से निमन्त्रण आया है, इसके अलावा तीन और सखियों से बात हुई, एक महिला ने फोन पर पूछा उनके यहाँ सफाई कर्मचारी आया या नहीं, फिर स्कूल की एक टीचर से बात हुई, स्कूल बंद हो गया है.. नन्हे के स्कूल की हेड मिस्ट्रेस  से कल कुछ पल बात हुई. उसे लगा, इन सब बातों को अगर ध्यान से देखें, परखें तो पता चलता है मूलतः सभी इन्सान एक हैं, सभी के कुछ आदर्श हैं, कुछ इच्छाएं हैं, कुछ सपने हैं और सभी उस पूर्णता की तलाश में हैं, जिसे पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता, जिसे जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता !


एक सुहानी सुबह ! वर्षा रुक गयी है और अपना सुखद प्रभाव सब ओर छोड़ गयी है. सब कुछ धुला-धुला और शीतल प्रतीत हो रहा है. पंछी नहा धोकर चहक रहे हैं. नन्हा स्कूल गया तो वह कुछ देर बगीचे में ही टहलती रही. कल वे दोनों जगह गये, दोनों जगह सखियाँ थकी हुई लगीं, जबकि वह भीतर तक तरोताजा महसूस कर रही थी. जून का फोन आया था, इस बार वह ढेर सारे उपहार लाने वाले हैं. पिछले दिनों उसने एक किताब पढ़ी “speed post” जो बहुत रोचक और ज्ञान वर्धक भी है. लेखिका एक संवेदनशील, समझदार और वात्सल्यमयी माँ है, उनके लिखने का तरीका और सोच भी उसे अच्छी लगी. आज जागरण में भूत-प्रेतों के बाद गन्धर्वों के अस्तित्त्व के बारे में बताया जा रहा है, उसे इन सब बातों में विश्वास नहीं है, उसे लगता है मनुष्यों को ज्यादा प्रैक्टिकल होना चाहिए और जमीनी हकीकत से जुड़ा रहना चाहिए. मनुष्येतर जीवों के बारे में जानकर या देवों की पूजा करके वे महान नहीं बन सकते. उसने टीवी ही बंद कर दिया और सोचा कि उसे दिन भर में किये जाने वाले कार्यों की एक सूची ही बना लेनी चाहिए लिखित नहीं तो मानसिक रूप से ही सही. जिस भाव के साथ उसने यह पेज खोला था वह न जाने कहाँ चला गया है, भाव भी असम के मौसम की तरह हैं पल में धूप तो पल में वर्षा, जैसे कल शाम हुआ.

Saturday, July 12, 2014

खीरे का रस


गीता का एक सुंदर श्लोक है, जिसका अर्थ है, वैश्वानर अग्नि के रूप में ईश्वर उनके द्वारा खाए अन्न को पचाने में मदद करता है. ईश्वर तो हर तरह से उनकी सहायता करता है. सोचने, समझने के लिए बुद्धिबल दिया है, आत्मोद्धार के लिए आत्मबल. कल दोपहर बाद से वे व्यस्त रहे एक मित्र परिवार के साथ, जो यहाँ से जा रहे हैं. आज शाम को भी उन्हें भोजन के लिए बुलाया है. जागरण में आज की बात उसे पसंद नहीं आई. भूत-प्रेत की बातें बताकर लोगों को अन्धविश्वासी बना रहे हैं ऐसा लगा, चमत्कार की बात ही करनी है तो इस सुंदर सृष्टि की रचना अपने आप में क्या कम चमत्कार है ? आज नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आई है, धीरे-धीरे काम करती है वह. नन्हे और जून के जाने के बाद उसने नाश्ता किया कुछ देर टीवी देखा. स्कूल की एक टीचर का फोन आया, एक छात्रा के पिता को संदेह है कि उसकी कापी ठीक से जांची नहीं गयी सो री-चेक करवानी होगी. स्कूल छोड़ने के बाद भी सभी खबरें मिलती रहती हैं, कल एक टीचर ने बताया कि एक फेल हो गये बच्चे के पिता ने भूख हड़ताल करने की धमकी दी है, यदि उसे पास न किया गया. पड़ोसिन के बगीचे में कैंडीटफ्ट के फूल हो रहे हैं, उनका सुंदर गुलदस्ता उसने बनाकर दिया. उनकी जीनिया की पौध में से आठ-दस पौधे पूसी नष्ट कर चुकी है. उसने नाराज होकर उसे कुछ भी नहीं दिया, सोचकर कि वह यहाँ से चली जाये पर वह पूरे श्रद्धा भाव से टिकी रही और आज उसे उस पर दया आ गयी. ऐसे ही ईश्वर उनकी लगन चाहता है.

“उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है”. अब उसके भी जागने का वक्त आ गया है. हर क्षण मन पर नजर रखकर अतीत या भावी का चिन्तन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर इस जागृति का अनुभव किया जा सकता है. उसके बिना कोई आधार नहीं, बुद्धि भी हार जाती है एक सीमा तक तर्क करके. इस जग का नियंता जो भी है वही उनके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है. मानव उसका ही प्रतिबिम्ब है, जब वे उसे प्रसन्न करेंगे तो स्वयं भी प्रसन्न हो जायेंगे. क्योंकि प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिए वस्तु में ही परिवर्तन करना होगा. उसे प्रसन्न करने का उपाय अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करना व उससे प्रेम करना है. सद्गुणों का तो वह भंडार है, मानव उसका चिन्तन करेंगे तो वे गुण भी उनके भीतर आ जायेंगे. इतनी सी बात उसकी समझ में नहीं आती थी जो आज सुनी. दीदी इतनी बार राम का जाप क्यों करती हैं व लिखती हैं, आज स्पष्ट हुआ है.

एक लम्बा अन्तराल ! पिछले दिनों कुछ नहीं लिख पायी, एक-दो बार पेन हाथ में लिया पर बात नहीं बनी. जून आज जल्दी आकर जल्दी चले गये थे, वह जरा सुस्ताने लेटी तो खुमारी छा गयी, नींद से जागकर कुछेक छोटे-मोटे काम किये कि नन्हा आ गया, फिर जून और शाम का सिलसिला शुरू हो गया. माँ-पिता, ननद-ननदोई जी और दो प्यारे बच्चे आये और चले भी गये. उनके घर जाने में भी मात्र एक महीना रह गया है. कल शाम वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक मित्र के यहाँ गये, दिन भर धूप में फील्ड ड्यूटी करने के बाद जून के सिर में दर्द था, पर वे, “जो वादा किया है निभाना पड़ेगा”...में यकीन करते हैं. फिर वे जल्दी ही लौट आये. अगले हफ्ते उन्हें मुम्बई जाना है, off shore well के सिलसिले में. नन्हा आज छुट्टी के दिन भी स्कूल गया है, कुछ दिन बाद उसके स्कूल में science exhibition है. उसे याद आया दोनों घरों को पत्र भेजने हैं, और भेजने से पूर्व उन्हें लिखना पड़ता है. पिछले दो-एक दिन से food for health से पढकर चेहरे पर आलू व खीरे का रस लगा रही है. क्रीम बंद, देखें इस प्राकृतिक इलाज का क्या असर होता है. कल रात स्वप्न में देखा, स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया है, अर्थात वासना अभी तक मिटी नहीं, उस दिन एक परिचिता को कैसेट न देकर भी यह सिद्ध हो गया कि लोभ की जड़ें बड़ी गहरी हैं मन में, ईश्वर जो अपना आप बन कर बैठा है सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह सन्सार में फंसे हैं !










Friday, July 11, 2014

स्वप्न का संगीत


गर्मियों के दिन थे, चारों ओर से खिड़की दरवाजे बंद, भारी पर्दों के कारण दिन में भी कमरे में खासा अँधेरा था, वह एयर कंडीशड कमरे में हल्का मखमली कम्बल ओढ़े लेटी थी. पास ही माँ भी सोयी थीं कि अचानक उसका छोटा भाई कमरे में एक आगंतुका को लेकर दाखिल हुआ और बोला, दीदी यह तुम्हारी मेहमान हैं, उसने कसमसाई आँखों से देखा, उनकी एक परिचिता थीं. वह सिर हिलाते हुए अभिवादन कर जब बाथरूम की ओर बढ़ी कि आँखें व चेहरा धो ले तब तक वह पलंग के एक किनारे पर बैठ चुकी थी. माँ ने कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए कहा, वरुणा, यहाँ बैठो, वहाँ मिसेज राय बैठेंगी तो वह उठकर इधर आ गयीं. उसके छोटे भाई भी पीछे-पीछे आ गये जब वह चेहरे पर पानी के छींटे डाल रही थी, उसने झुंझलाते हुए कहा, मेहमान को बाहर के ड्राइंग रूम में बैठाया जाता है कि सीधा अंदर के कमरे में ले आते हैं, भाई चुप रहा शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था. पर अचानक उनके कानों में कई आवाजें पड़ने लगीं तो झांककर देखा. कमरे में कई महिलाएं आ चुकी थीं और बैठ चुकी थीं. माँ सबको बैठा रही थीं. तब उसे सूझा कि माँ की ‘महिला सभा’ आज उनके यहाँ होने वाली थी, पर माँ ने तो इसके लिए कोई तैयारी नहीं की थी. कम से कम उसकी जानकारी में तो नहीं, देखते ही देखते उनका विशाल कमरा जो बीच का दरवाजा खोल दिए जाने के कारण और बड़ा हो गया था, लोगों से भर गया. माँ ने एक गान शुरू किया तो कुछ महिलाओं ने उनका साथ देना शुरू कर दिया. अब आने वालों में पुरुष भी शामिल हो गये थे. वह भी एक तरफ बैठ गयी थी, तभी एक लड़की ने जो उसकी ही उम्र की रही होगी सबको सम्बोधित करते हुए कहा, अब आपको कुछ शब्द दोहराने हैं, जो अरबी भाषा में थे पर वे धार्मिक अर्थ नहीं रखते थे. इसके बाद की घटनाओं को याद करके अब भी वह सिहर उठती है.

सभी लोग मनोयोग से कार्यक्रम में भाग ले रहे थे तभी शहनाई वादन की घोषणा हुई, वह माँ की चतुराई की प्रशंसा किये बिना न रह सकी, वह सारा इंतजाम पुख्ता करवा चुकी थीं. वादक जन-समूह से गुजरता हुआ सामने मंच की तरफ बढ़ा, शहनाई के सुर हवा में गूंज रहे थे, वह कुछ देर के लिए उन सुरों में खो गयी थी जब होश आया तो देखा शहनाई उसके हाथ में है और वह पूरी दक्षता से बजा रही है, आयोजकों में से एक ने शहनाई लगभग उससे छीन ही ली, वह इतना ही कह सकी, यह उसके पास कैसे आई ? अगला कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व कुछ और घोषणाएं हुईं फिर अख़बार के जैसे कुछ पेपर लोगों को वितरित किये जाने लगे. उसने फिर देखा अपने आप ही उसके हाथों में एक पेपर था, फिर दूसरा और जैसे ही वितरक किसी को पेपर पकड़ाता वह किसी अदृश्य ताकत के बल से उसके हाथों में खिंचा चला आता, आयोजक घबरा गया और टीवी स्क्रीन की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करने लगा. उसे भी उसने पढ़ने से मना कर दिया पर न चाहने पर भी उसके हाथ उठने लगे, जिन्हें वह सप्रयास रोकन लगी, कई बार की कोशिश के बाद अचानक हाथ ढीले पढ़ गये और तब उसे लगा कि अब चाह कर भी वह पेपर नहीं पढ़ पायेगी और इस चेतना के होते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ी, यह कहते हुए कि उसने इसे हमेशा के लिए खो दिया, कुछ क्षणों के लिए दैवी शक्ति उसे मिली थी पर असावधानीवश उसने उसे खो दिया था. उस पेपर में जाने कौन सा संदेश लिखा था जो प्रकृति उसे सिखाना चाहती थी. उस पल के बाद से उसकी यह कोशिश रहती है कि प्रकृति से दान में मिली प्रतिभा को निखरे उसे व्यर्थ न जाने दे.

कितना अद्भुत स्वप्न उसने कल रात देखा और सुबह उठते ही लिख लिया.    


Thursday, July 10, 2014

चेन्नई की साड़ी


आज ‘जागरण’ में निस्वार्थ सेवा के महत्व के बारे में सुना. उसके सम्मुख भी सेवा एक सुयोग आने वाला है. यह उसकी परीक्षा का समय भी होगा. उस अखंड स्रोत से मन जुड़ा रहे, किसी भी परिस्थिति में झुंझलाहट के चिह्न चेहरे पर न आयें, यही होगी परीक्षा ! कल मीटिंग में वह कविताएँ नहीं पढ़ पायी तो यह बात निराशा का कारण नहीं होनी चाहिए. किन्तु इस क्षण जो उसके हृदय में अकुलाहट हो रही है, इसका कारण क्या है. अन्यों को जज करने की प्रवृत्ति, शासन करने की प्रवृत्ति भी ताप का कारण बनती है. अज्ञान भी ताप को जन्म देता है. देह और मन के साथ सुखी-दुखी होना अज्ञान ही तो है. देह की व्याधि या मन का सुख-दुःख उस शुद्ध स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकते. यदि इसका ज्ञान है तो छोटी-छोटी बातों से स्वयं को तनाव ग्रस्त होने से रोक सकते हैं. कल छोटी बहन का पत्र आया, वह खुश है लेकिन पति की परेशानी को लेकर चिंतित भी. वे लोग मई में उसके पास जायेंगे.

उसने याद किया, ध्यान के लिए कई बातें जरूरी हैं. सबसे पहले तो आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा, फिर सांसारिक बातों से उदासीनता, लक्ष्य का निर्धारण, स्वाध्याय और नियमितता. नियत समय पर नियत विधि से ध्यान किया जाये तो ही परिणाम मिलेगा, लेकिन परिणाम की आकांक्षा न रखते हुए ध्यान करना है. आज सुबह गाइडेड मैडिटेशन में भी वह मन को एकाग्र नहीं रख सकी. सम्भवतः उसकी श्रद्धा दृढ नहीं है, अभी रास्ता बहुत लम्बा है, जिस मार्ग पर बुद्ध, नानक, कबीर, महावीर चले थे इसी रास्ते पर चलना होगा, जाहिर है रास्ता बहुत कठिन है लेकिन असम्भव नहीं. मन को संयत करना अभ्यास और वैराग्य से सम्भव है, ऐसा कृष्ण ने कहा है, कृष्ण ही उसकी सहायता करेंगे. अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए सांसारिक लोभ व आकर्षणों से मुक्त रहने का प्रयास करना होगा. मध्यम मार्ग अपनाते हुए मानसिक विकारों (क्रोध, लोभ, मोह तथा इच्छाएं ) एक-एक कर दूर करते जाना है. मन जितना मुक्त होगा ध्यान उतना ही सम्भव होगा. किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रहे, सचेत रहना है. ईश्वर का ध्यान-भजन करते करते ध्यान स्वयंमेव सिद्ध होने लगेगा.

टीवी पर जागरण आ रहा है, जिसमें मातृ देवो भव ...आदि प्राचीन परंपरा का महत्व बता रहे हैं. आजकल सब अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वृद्ध माता-पिता को भूल जाते है, जिनके कारण वे इस दुनिया में हैं. कल से उसका मन फिर नीचे के स्तरों में चला गया है. कल सुबह से शाम की मीटिंग की बात ध्यान में थी. स्वास्थ्य भी पूर्ण नहीं है, पन्द्रह आने है, शायद यही दो कारण रहे हों. आज सुबह भी मन ध्यान में भटका पर सचेत थी सो वापस लायी. लेकिन बिना किसी व्यवधान के ध्यान कब सधेगा कहना मुश्किल है. मन दुनियावी प्रपंचों में कब खो जाता है पता ही नहीं चलता. सतत् प्रयत्न जारी रखना है मंजिल एक न एक दिन अवश्य मिलेगी. नन्हे की पढ़ाई पूरे जोरों पर है. उसे गणित पढ़ाते वक्त अच्छा लगता है, वह बहुत जल्दी सीख भी जाता है. जून आजकल ठीक हैं, कल उसे लेने आये तो खुश थे, वरना पहले तो हमेशा उदास हो जाते थे. कल उसने चेन्नई से खरीदी नई साड़ी पहली बार पहनी. सोमवार को मेहमान आ रहे हैं, घर की सफाई हो गयी है, सामान भी सब मंगा लिया है. उस समय सारा प्रयास यही रहना चाहिए कि एक क्षण के लिए भी मन उद्व्गिन न हो, ऐसा नहीं कि जबरदस्ती की जाये सहज, स्वाभाविक स्थिति में यदि मन रहे तो स्वतः शांत रहेगा. आतुरता तो वह ऊपर से ओढ़ लेती है. उसे लगा यदि वे भारतीय जीवन शैली अपनायें, संयम, सहन शीलता, सदाचार और प्रेम से ओत-प्रोत हो तो जीवन सहज रह सकता है.


Wednesday, July 9, 2014

मेथी की बड़ियाँ


भारत ने पाकिस्तान को पांच विकेट से हरा दिया, क्रिकेट का खेल उनके दिलोदिमाग पर किस कदर छा गया है कि डायरी खोलते ही पहला वाक्य यही मन में आया. कल शाम को ‘मैडिटेशन’ पुस्तक का एक अध्याय पढ़ते-पढ़ते मन एकाग्र हो गया और कुछ मिनटों के ध्यान के कारण सारी शाम स्वयं को फूल सा हल्का महसूस किया. उसे लगा, पूर्वजों ने जीवन के उद्देश्य, जीने के तरीके और आत्मिक उन्नति के द्वार योग के रूप में खोल दिए हैं, अब यह उन पर निर्भर करता है कि पंक में सने रहें, सांसारिक मोह-माया और उलझनों में ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट कर दें अथवा मुक्त होकर अध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ें. सन्त कहते हैं ज्ञानी के अनुभव को अपना अनुभव बना लेने पर ही बंधन कट  सकता है. तब सुख-दुःख, मान-अपमान, यश-अपयश सभी स्वप्नवत् प्रतीत होते हैं क्योंकि ये सभी आने-जाने वाले हैं और एक चैतन्य ही शाश्वत है. उसी में विश्रांति मिल सकती है. अभी जो बुद्धि कंस की सेविका है जब कृष्ण की सेविका हो जाएगी तभी उसका उद्धार सम्भव है. आज जून वह पत्र पोस्ट कर देंगे जो छोटी बहन को कल रात उसने लिखा था कविताओं के साथ.

आज उसने सुना, “इच्छा पूर्ति में पराधीनता है, जड़ता है, इच्छा निवृत्ति में स्वाधीनता व चेतनता है. निष्काम होने का सुख बड़ा है, सकाम होने का दुःख उससे भी बड़ा. जो मन इच्छाओं से तपे वह कैसे दर्पण की भांति अंतर की पवित्रता को दर्शा सकता है. ‘नाम जप’ इसमें सहायक होता है”. सुबह जून ने धूप में बड़ी डालने में उसकी सहायता की, कल रात मेथी साफ़ कर दाल पीस कर तैयारी कर रखी थी. जून उसके घर में रहने से पहले की तरह खुश रहने लगे हैं, उनके स्वप्नों का घर फिर मिल गया है.

“मानस की गहराइयों में जाकर सारे विकारों को दूर करने का काम ही विपशना है. इसके लिए मन को नियंत्रित करना होता है, शील-सदाचार का पालन करना होता है और यह निरंतर होना चाहिए. सहज स्वाभाविक रूप से साँस को देखते रहना मन को एकाग्र करने का सर्वोत्तम साधन है”. आज जागरण में श्री गोयनका जी ने विपशना पर प्रवचन माला आरम्भ की है, अच्छा होगा यदि कल भी वे आयें लेकिन यदि न भी आये तो उसे विक्षोभ नहीं होगा क्योंकि समभाव रहकर मन को इच्छाओं से मुक्त रखने का प्रण श्रीकृष्ण के सामने लिया है. कल दोपहर उसने गीता को पुनः पढ़ा, कल से पहले न जाने कितनी बार पढ़ चुकी है पर वह पढना मात्र पढ़ना ही था उसका अर्थ समझने का सामर्थ्य उसमें बिलकुल नहीं था, कल उसका अर्थ अपने आप ही समझ में आने लगा और उसे लगता है यह ईश्वर की कृपा का फल है वह तभी किसी के अंतर में प्रकट होता है जब हृदय शुद्ध हो, भावनाएं उद्दात हों और निस्वार्थ भाव से मात्र ज्ञान के लिए ज्ञान की आकांक्षा हो. नन्हा और जून दोनों घर पर नहीं हैं, वह भी चली जाती थी तो उनका यह घर अकेला बंद रहा करता था, कितना सन्नाटा होता होगा यहाँ, अब इतने दिनों बाद घर पर रहना अच्छा लगता है. जून का शुक्रगुजार होना चाहिए. उस रात उसने जो कठोर वचन कहे थे वे सम्भवतः नियति ने ही कहलवाए थे. उसे लग रहा था कि सब कुछ अस्त-व्यस्त हो रहा है, बिखर रहा है. जून की बातें तब समझ में नहीं आती थीं, अब स्पष्ट हो रही हैं. उसका सही स्थान उनका घर ही है. मन की साधना करने के सारे उपाय यहीं मिल सकते हैं.  




Monday, July 7, 2014

गुझिया की मिठास


आज उसका मन पूर्णत शांत है, उद्ग्विनता है तो यही कि हर पल सचेत नहीं रह सकी, बिना किसी कारण के असत्य भाषण किया, उस समय चेतनता नहीं थी पर बोलते ही अनुभव हुआ. चाहे कितना भी निर्दोष या छोटा सा झूठ भी हो पर दाग तो लग जाता है न, दीदी-जीजा जी से फोन पर बात की, वही जानी–पहचानी आवाज. नन्हा और जून जा चुके हैं. जागरण में बताया जा रहा है कि सबसे भयंकर हिंसा वाणी की हिंसा है, अपनी जिह्वा रूपी गौ को खूंटे से बाँध कर रखें क्योंकि यह दूसरों के हरे-भरे मन उपवन को तहस-नहस कर सकती है. वाणी का बहुत महत्व है. कल सुबह फोन पर जब उसे लगा कि भाषा थोड़ी रूखी थी तो शाम को वह उनके घर गयी अपने उस दोष का प्रायश्चित करने. आज फोन पर बात न ही करनी पड़े तो अच्छा है क्योंकि मौनव्रत लेने को बाध्य है. मानव मन देह के सुख-दुःख से ऊपर उठना ही नहीं चाहता, इसलिए मन से परे बुद्धि  और बुद्धि से परे आत्मा को जानने की बात पूर्वजों ने की. कल शाम वह स्कूल में कम्प्यूटर की अध्यापिका के यहाँ भी गयी, उसका क्लास वन में पढने वाला बेटा बहुत प्यारा है, नन्हा भी बचपन में ऐसा था. आज वह बायोलॉजी कक्षा के लिए कुछ टहनियां लेकर गया है. रसोईघर में नैनी कुछ खटपट कर रही है शायद उसे आकर्षित करने के लिए पर उसका तो मौनव्रत है न !

कल ईद की छुट्टी थी जून और नन्हा घर पर ही थे, परसों रात को असमिया सखी की बिटिया के जन्मदिन पार्टी से लौटकर सोते-सोते थोड़ी देर हो गयी सो सुबह नींद भी देर से खुली, फिर दोपहर को उन्होंने मिलकर गुझिया बनाई. नन्हे ने भरावन का कार्य किया, जून ने तलने का और उसने बेलने का. शाम को एक मित्र के यहाँ गये, उस सखी से काफी देर तक बात हुई, विषय वही था, स्कूल, कभी उसका ज्यादातर सखी का. आज जागरण में कोई जैन आचार्य आये हैं. अभी-अभी कुछ सखियों को फोन किया कल रात्रि होली के विशेष भोज के लिए. पड़ोसिन ने पूछा, वह क्लब की मीटिंग में गए जाने गाने की रिहर्सल में क्यों नहीं आ रही है, उसे वह गाना पसंद नहीं आया था, बहुत हल्का-फुल्का सा गीत है, पर और किसी को इसमें कोई बुराई नजर नहीं आई. सच्चाई की राह पर अकेले ही चलना पड़ता है, इससे उसे ताकत ही मिलेगी.

आज से वह मुक्त है, कल स्कूल में सभी को होली की गुझिया खिलाकर विदा ली, मन ही मन वह सभी स्मरण किया जो पिछले कुछ दिनों से वहाँ घटा था. आज से अपनी उसी पुरानी दिनचर्या में लौट जाना है, स्वाध्याय, आसन, लेखन व संगीत !

कल भारत शारजाह में साउथ अफ्रीका से पहला मैच हार गया, शायद इस हार से कुछ सीख लेकर आज का मैच जीत जाये. ‘जागरण’ चल रहा है, अपने मूल स्वरूप को पहचानकर अंतहीन सुख के साम्राज्य को प सकने का उपदेश दे रहे हैं. संसार सारहीन है, नश्वर है लेकिन अपना आप जो चेतन है, नित्य है, अपरिवर्तन शील है. उसी चैतन्य को पाना ही जीवन का ध्येय है, ये बातें हर जगह सुनने को नहीं मिलतीं, लेकिन जीवन को सार्थक ढंग से जीने के लिए, अपने कर्त्तव्य का पालन करने के लिए, हृदय में सहनशीलता, त्याग व आत्म विसर्ग की उद्दात भावनाओं के स्फुरण के लिए इनको सुनते रहना अति आवश्यक है. ये मन को उहापोह से मुक्त रखती हैं, वहीं एकाग्र रखने में भी सहायक हैं. कल दोपहर उसने मध्यमा का कोर्स शुरू कर दिया है, अभी बहुत कुछ सीखना है. अध्यापिका को भी सिखाने का शौक है सो उसकी संगीत यात्रा अभी जारी रहेगी. कल बहुत दिनों के बाद माँ-पापा का पहले का सा पत्र मिला. छोटी बहन ने उस दिन फोन पर कविताओं के लिए कहा. अगली मीटिंग में क्लब में भी साहित्य का कार्यक्रम है उसने तीन कविताएँ चुनी हैं, यदि अवसर मिला तो पढ़ेगी.