Friday, June 6, 2014

मेरे अपने- मीनाकुमारी की यादगार फिल्म


उसने स्वयं से कहा, अगर उसे ईश्वर पर अटूट विश्वास है तो जीवन में आने वाली मुसीबतों से घबराना नहीं, शरीर व मन के साथ तो ऊंच-नीच लगा ही रहेगा किन्तु आत्मा के सच्चे अविनाशी रूप को कोई बीमारी, कोई विपदा नहीं मिटा सकती और वास्तव में वह वही है, सो घबराने या थकहार कर बैठ जाने के बजाय उसे अपनी बिखरी हुई शक्तियों को समेटना होगा और जो कुछ जीवन में आये उसे बिना किसी दुविधा के स्वीकारना होगा.

Today is her birthday. Younger brother rang her and she talked to him. Bhabhi, father, didi also called. Jijaji has resigned from his uae job and will live with his family now. Elder brother also wished. She called younger sister. They all love her and care for her. In the evening few friends came. Nanha made one birth day card for her in computer and jun gave the loveliest card. He was so caring and loving last some days. He understands her worries and weaknesses.

Life is like a river, somewhere full of energy and velocity, broad and pure, somewhere narrow and still. These days river of her life is not flowing its full speed, one friend says it is age and her over activity, but she thinks it is the disease. Jun says low blood pressure or low hemoglobin is not a disease. God only knows what is root cause of her problem. Whatever comes in way is will of god so accept it wholeheartedly. On Wednesday when she first experienced the pain she could not accept it that it is happening to her and then came other symptoms.she realized the reason of her fatigue and tiredness, the slow walking and dullness. She was weak but did not have courage  to accept this.

कल जून का आरम्भ हो गया, आज दीदी का जन्मदिन है वे उन्हें इ-मेल से शुभकामनायें भेज रहे हैं. पिछले बुधवार को उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी जो दिक्कत शुरू हुई थी अब पूरे एक हफ्ते बाद समाप्त हुई सी लगती है. अगल हफ्ते से नन्हे का स्कूल बंद हो रहा है, तब उसके दिन अच्छे व्यतीत होंगे उसके साथ पढ़ते-पढ़ाते, कम्प्यूटर पर काम करते व टीवी देखते. कल दोपहर बाद मीनाकुमारी की एक बहुत अच्छी फिल्म देखी, ‘मेरे अपने’.

जीवन का लक्ष्य है, एकमात्र लक्ष्य है सत्य की प्राप्ति, किन्तु वे, कहना चाहिए ‘वह’ कितनी आसानी से असत्य का सहारा ले लेती है, इसका मकसद दूसरों को दुःख या चोट पहुंचना नहीं  बल्कि चोट से बचाना ही होता है, फिर भी असत्य तो असत्य ही है. आज ३ जून की सुबह एक बार फिर वह अपने आप से वादा करती है कि किसी भी रूप में ( चाहे शहद या औषधि के रूप में ही ) असत्य का प्रयोग नहीं करेगी. आज बगीचे से आम व खीरे तोड़े, अभी घर में सजे फूलों को भी बदलना है, घर में बगीचा होना कितना लाभकारी और शुभ होता है. यहाँ से जाने के बाद भी वे अपने घर में पौधे अवश्य लगायेंगे. आजकल जी टीवी पर भागवद कथा सुनाई जा रही है, व अगली बनारस यात्रा में ‘भागवद पुराण’ लेकर आएगी, इसमें कई सुंदर कथाये हैं और ज्ञान के आख्यान हैं. ईश्वर भक्ति व प्रेम के कारण ही भारत इतना विशाल व विविधताओं के होते हुए भी एक सूत्र में बंधा है. यहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में यह मानता है कि जीवन क्षण भंगुर है और सुख-दुःख का कारण मानव की भोक्ता बनने की प्रवृत्ति है. असल में सब माया जाल है सच्ची शांति पाने के लिए मानव को द्रष्टा बनना होता है. जैसे स्टेज पर कोई नाटक चल रहा हो और दर्शक मूक द्रष्टा व श्रोता बनकर देखा करते हैं वैसे ही स्वयं भी उसी नाटक का पात्र होते हुए भी मानव को सारे जीवन को एक नाटक की तरह लेना चाहिए. अपने रोल को बखूबी निभाने की कला भर सीखनी चाहिए उसमें डूबकर स्वयं को व्यथित व हर्षित नहीं करना चाहिए.


   

Wednesday, June 4, 2014

बन्दर वाला बैग


जून आज बहुत दिनों बाद फील्ड ड्यूटी पर गये हैं, ‘कतलानी’ नामक एक जगह पर. आज मौसम खुला है, चारों ओर उजले सोने सी बिखरी धूप अच्छी लग रही है. पूसी आजकल आलसी हो गयी है या कमजोर, मुँह से धीरे से आवाज निकलती है जो सुनाई नहीं बस दिखाई देती है. आज नन्हे के स्कूल और जून के दफ्तर जाने के बाद ‘जागरण’ सुना. कल शाम नन्हे को क्विज में प्यारा सा बन्दर वाला बैग पुरस्कार में मिला है, पर उसे पसंद नहीं आया, जबकि नूना को बहुत सुंदर लग रहा है, पर पुरस्कार की बात उन्हें आनंद देती है, क्यों कि इसके पीछे उनका प्रयास छिपा है. इस समय उसका संगीत अभ्यास का वक्त हो चला है.

आज फिर उसका मन चिन्तन में लगा है. अक्सर न जाने कहाँ से (ऐसा वह सोचती है) जो उसके अंतर में कुछ खोया-खोया सा लगता है, खालीपन जैसा वह कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि अंदर गहरे तक भरा हुआ है जो जरा मौका मिलते ही सतह पर आ जाता है. जब सतह पर सात्विक विचार कमजोर हो जाते हैं तब ही. आध्यात्मिकता उन नकारात्मक विचारों से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग है. सद्विचारों का वेग इतना तीव्र हो कि सारी कमियां ऊपर आकर बह जाएँ और मन का घट अमृतमय हो जाये. तब जीवन सरल, कोमल, शांत व रसमय बनेगा, अंतर में कविता स्वयंमेव जन्मेगी. विकार मुक्त, तृप्त मन जिसने सारे नकार पर विजय पा ली हो, जिसका कोई भी शत्रु न रह गया हो, जिसने स्वयं को साध लिया हो, ऐसा स्वच्छ दर्पण सा मन जिसके पास हो दुनिया का कोई संकट उसे छू भी नहीं सकता. ऐसा ही मन उसका हो, यही उसके जीवन का लक्ष्य है.

Today is a hot and humid day of mid day. It is early morning but not very cool and pleasant like many mornings in Assam. When they will leave this place to go somewhere else most probably in UP or Uttaranchal, they will miss the calm and serene atmosphere of Assam. But that is many years away today at this moment she has to live in the present.

आज सुबह जून ने रोज की तरह उठाया, नन्हे और उनके जाने के बाद उसने घर संभाला, कितनी अच्छी-अच्छी बातें रोज ही सुनती है, पढ़ती है. कभी-कभी वे एकदूसरे का विरोध करती हुई भी प्रतीत होती हैं, कभी कोई कहता है कि अंतर में डूबकर साधना की जा सकती है, दुनियादारी से जितना दूर रहकर निर्मुक्त होकर जीयें उतना अच्छा है फिर दूसरा विचार कहता है, स्वयं को गुनना छोड़कर दूसरों के काम आना सीखो, दोनों में से कौन रास्ता ठीक है ?

Jonathan can learn flying so can she, he has no limitations of body, time and space. He is free  like true self. Jonathan taught her the same lesson she is trying to learn from Buddha and all other wise men. But now when she knows and has faith in the highest bliss, she has to find her self. She is no longer a helpless, weak, poor soul but she is the soul which can not be crushed. Which can fly higher and higher without any limit.

मानव के लिए असीम सम्भावनाएं हैं वह चाहे तो स्वर्ग तक पहुंच सकता है, स्वयं अपना स्वर्ग बना सकता है. उसे रोकती हैं तो उसकी स्वयं की कमियां, हृदय की क्षुद्रता, संकीर्णता और अपनी शक्ति पर भरोसा न होना. यह दुनिया वैसी ही दिखती है जैसा कोई देखना चाहता है, खुद के विचारों को ही जैसे आईने में प्रतिबिम्बित किया जा रहा हो, इसलिए जहाँ कहीं भी दुविधा, दुःख, क्षोभ की अनुभूति हो समझना चाहिए अंतर में कहीं मेल जमा है. वरना तो प्यार का प्रतिदान प्यार में ही मिलता है. यही दुनिया की रीत है और यही उस परवरदिगार की तदबीर है. उसने हम सबको बहुत छूट दी है और बहुत शक्ति भी दी है. चाहें तो स्वर्ग बना लें और चाहे तो अपना व अपनों का जीवन दुखमय कर लें. कल छोटे भाई का कार्ड व पत्र मिला उसके स्नेह ने नूना के हृदय में स्नेह को उत्पन्न किया. पड़ोसिन को उसने कटहल दिया तो उसने आम दिए, उन्होंने बातें कीं और लगा कि वे किसी बंधन में बंधे हैं. एक और सखी को उसने बगीचे के आम भिजवाने का वायदा किया है, उसे भी स्नेह रूप में ही वे मिलेंगे और यह सिलसिला जारी रहेगा. जीवन एक यात्रा भी है और एक पड़ाव भी जहाँ वे अन्य यात्रियों से मिलते हैं किन्तु असली मंजिल का पता भी नहीं भूलते, वहाँ अटक नहीं जाते, असली मंजिल तो रब ही है वही सृजनहार जिसने सबको बनाया तो अपने जैसा ही है पर वे खुद को कुछ और समझ बैठे, भूल ही गये..कि वे कौन थे.




Tuesday, June 3, 2014

पतझड़ का मौसम


She began her spiritual journey long ago but still she is very far from destination, when in college read books and in those days she used to feel a presence but with passing of years began to doubt even in its existence. Now again after fruitless effort  of obtaining true happiness and peace that never lasts, she has come to Him. He says that she should change herself because all her sorrows and despairs are her own creations, created by ego. When she will do her duties with selfless love she will be happier, and when she will be at ease with herself, Meditation will find its way, nowadays mind wanders because it has no base to stay in. Buddha also says your mind is your friend and is your enemy. It is  mind with false ego which dances  on its tune. Never doubting  real self one should be above from its whims and fancies.

शाम का वक्त है, मौसम अच्छा-खासा है, न सर्दी न गर्मी, न पूरी तरह दिन अस्त हुआ है न दिन शेष ही है. शाम का ऐसा सुहाना वक्त जब दिन और रात मिलते हैं. पडोस की छोटी लड़की घर की सीढ़ियों पर बैठकर कविताएँ याद कर रही है. माली दिन की जाती रोशनी में गुलाब के पौधों की निराई करने में व्यस्त है. वह इतने सारे घरों में काम करता है, सुबह से ड्यूटी बजाते-बजाते हर दिन किसी न किसी घर में शाम हो जाती है. पूसी, घर की बिल्ली घास पर लेटी अपनी थकान मिटा रही है. बीच-बीच में चौकन्नी होकर इधर-उधर ताकने लगती है फिर बदन सिकोड़ती हुई गड्डमड्ड सी हो बैठ जाती है. मई महीने की शाम वर्षा के कारण थोड़ी सी नमी लिए हुए है, पौधे हरे-भरे होकर शांत-संतोषी भाव लिए दीखते हैं. पौधों में जान होती है, शायद उनमें भावनाएं भी होती हों, वर्षों तक एक ही जगह खड़े-खड़े पीपल, आम और कटहल के पेड़ क्या ऊब नहीं जाते होंगे, सामने खड़ा कनकचम्पा का पेड़ आधा हरा है, नये कोमल पत्ते धारण कर चुका है और आधा अभी पुराने सूखे पत्ते लिए काला दीखता है. गुलदाउदी के पौधों में कुछ पर फूल आ चके हैं, कुछ अभी तक पुष्प हीन हैं. प्रकृति में सभी संयमी हैं, जिनपर फूल आ गये हैं उन्हें कोई घमंड नहीं और जिनपर नहीं आये हैं उन्हें कोई दुःख नहीं, वही पेड़ जो वसंत आने पर फूलों से लद जाता है, पतझड़ में ठूँठ सा लगता है पर अपने ऊपर सारे मौसमों की मार सहता हुआ तटस्थ भाव से खड़ा रहता है. दूर से कु कू.. की आवाजें आ रही हैं, दो पंछी जैसे जुगलबंदी कर रहे हों.

आज चार दिनों के बाद डायरी खोली है, पिछले चार दिन सुखमय थे, उसके मन पर किसी भी तरह का बोझ नहीं था, जिन्दगी पहले की तरह खुशनुमा लगने लगी थी और यह कायाकल्प हुआ काम करने से, उसने हर क्षण अपने को व्यस्त रखा. पिछले दिनों की उदासी अकर्मण्यता का परिणाम थी. हाथ सदा काम में लगे रहें तो मन भी शांत रहता है, कहीं कोई उहापोह नहीं. आज भी सुबह से कार्यों का क्रम जारी है. मानव अपने लिए परेशानियों की किले खुद ही बनाता चलता है. उम्र के साथ-साथ स्वभाव में जो परिपक्वता आनी चाहिए कभी-कभी उसका अभाव खटक जाता है. स्वयं को नहीं जाना, ऐसा लगता है. कभी कभी रात को जब नींद से आँखें बोझिल होती हैं. मन में विचार एक रील की तरह चलते हैं, एक-दूसरे से बिलकुल अलग विचार, जिन पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं है. उसकी सारी समस्याओं का हल उसके अंतर में ही मिल सकता है क्योंकि वहीं चैतन्य का निवास है, जो मानव को अच्छे कर्मों पर आनंद और विकर्मों पर दुःख की अनुभूति कराता है. कल उसने तीन पत्र भी लिखे..


Monday, June 2, 2014

ओस की बूंदें


वह लॉन में स्थित झूले पर बैठे हुए घिर आती संध्या का नजारा  देख रही है. ठंडी हवा का स्पर्श पाकर डाली के फूल झूल जाते हैं..और झींगुरों की आवाजें, आकाश के बदलते रंग, पेड़ हरे से काले होते जाते हैं. थम-थम कर पंछियों की आती हुई आवाजें, क्या स्वर्ग इससे भी सुंदर होता होगा. असम में दिन भर बरसने के बाद शाम को बादल थककर आकश में पसर जाते हैं, स्थिर.. जैसे सारे आकश को ढक लेते हैं. चान्द-तारे भी उसके पीछे छुप जाते हैं और शाम से पहले शाम होने लगती है. ऐसे में दिल कृतज्ञता से भर उठता है. इस सारे दृश्य के प्रति, हवा और ठंडक के प्रति, उस सृजनहार के प्रति जो उनसे दूर भी रहता है और करीब भी, वह जो मन को आकाश सा विस्तृत बना देता है, साफ और असीम.. सारे बंधन तोड़ देता है.

प्रतिक्षण, प्रतिपल छोटे-छोटे कदम बढ़ाये वह परम लक्ष्य की ओर बढ़ रही है, उसकी छोटी सी टॉर्च से घने अँधेरे जंगल में जहाँ तक रौशनी जाती है, वहाँ तक की दूरी एक बार में तय करते हए, रास्ते में कांटे भी हैं और पत्थर भी, लुभाने वाले फूल भी और मधुर स्वर भी पर किसी का आकर्षण उसे बाँध नहीं पायेगा और जीवन पथ पर उसके कदम बढ़ते जायेंगे. कवियों की कही बातें “जीवन का लम्बा सफर”..आज जाकर स्पष्ट हुई हैं. उसने कहीं सुना था, ‘दशरथ रूपी जीव कीर्ति रूपी कैकेयी के कारण दुखी होता है, राम राज्य की जगह राम वनवास हो जाता है’. पर उसे अपने अंतर में राम राज्य की स्थापना करनी ही है. राग, द्वेष, लोभ, मोह, आसक्ति, नफरत, चाह और असत्य के राक्षसों का नाश करके प्रेम, उदारता, मधुरता और नम्रता को मंत्री पद देना है. हर उस क्षण जब वह असत्य बोलती है, उसके अंतर में बैठा कोमल सत, चित आनन्द स्वरूप परमात्मा सिहर उठता है. वह तो उसे निर्देश देता रहता है. जीवन के छोटे-छोटे कार्यों को यदि उसका स्मरण करते हुए करे तो उलझनों में न पड़े. पीपल के पत्तों पर स्थित ओस की बूंदों की भांति नश्वर जीवन है, उसे इसी जीवन में इन्द्रधनुष बनाने हैं, सुमधुर गीत गाने हैं, शांति का साम्राज्य बनाना है. सहनशील बनना है. विकास की गुंजाइश बहुत है, अभी तो पहला पड़ाव भी नहीं आया है, चलना है बस चलते ही रहना है.

Today is 4th of may. It is raining, raining and raining since last two weeks. Every thing around is green and wet, trees are happy and so is grass, growing fast every moment, garden is overflowing with green. Nanha did not go to school today due to pain in his right thumb, he got hurt last evening while searching a book in the library,. It is 9 am he will come back any minute from hospital where he went with jun at 8 am. Last night they saw a movie so slept late, so she is feeling sleepy , could not concentrate on the book she was reading. Every pleasure demands its price.

Today is a warm day, Sun is shining  in the sky after so many days and every thing is shining in its light. Her heart is also somewhat calm today. In the morning when jun said her to getup, she was feeling so sleepy, did not wanted to leave the bed. It was Tamsik vritti and then they sent  Nanha to school and sat for guided Meditation but could not concentrate, jun went and she had breakfast then listened jagaran. They told so many good things. How to live in this world, to love everybody and every thing, to be happy…she was touched by their compassion and caring for the hearts of other persons. They are like Buddha, teaching goodness to humanity. But what is the solution of her nameless, faceless misery ? she, who has everything , who has everything required and can get anything, who has a loving and caring family. Who has a brain and sound body. May be she wants rest, real rest and then when she will getup, will be full of energy and joy !


Saturday, May 31, 2014

अच्छी किताबें


आज सुबह से दो बार असमिया सखी का फोन आ चुका है, अच्छा लगा, मित्रता की बेल मुरझा भले ही जाये पर सूखती नहीं, कभी-कभी खिल उठती है और अब तो उसके मन में सिर्फ उसके लिए ही नहीं सभी के लिए असीम स्नेह और शुभकामनायें हैं, जहाँ आनंद है, प्रेम है वहाँ दुःख और द्वेष रह ही कहाँ सकते हैं. भगवान बुद्ध भी कहते हैं, मन में उठे विकार को यदि कोई ग्रहण करे तभी उसका भागी होगा. यदि साक्षी भाव में रहे तो वह खुदबखुद समुद्र में उठी लहर की तरह नष्ट हो जायेगा. न दुःख के प्रति द्वेष न सुख के प्रति आसक्ति, मध्यम मार्ग का अनुसरण ही किसी को हर पल हल्का रख सकता है. कल बहुत दिनों बाद माँ-पिता का पत्र मिला, पिता ने लिखा है, अच्छी किताबें पढ़ने से मन का विस्तार होता है और विस्तृत मन में सभी कुछ समा सकता है. संकीर्ण मनोवृत्ति और अहम् की तुष्टि ही सारे विकारों की जड़ है. संसार में जहाँ भी दुःख है, अहम् के कारण है और जहाँ भी सुख है वह निस्वार्थ भावना के पोषित होने पर है. जब मानव मन समग्रता को सत्य माने, टुकड़ों में बंटे नहीं, सम्पूर्ण जीवन को और मृत्यु को भी एक अनंत की यात्रा समझे तो कहीं विछोह नहीं, कहीं पीड़ा नहीं, दुःख नहीं, सभी एक ही मंजिल के यात्री हैं. उसने प्रार्थना की यह सद्शिक्षा उसके जीवन को सदा प्रफ्फुलित रखे.

उसने पढ़ा, “हम लोग आत्मसुख रूपी विशाल सागर से निकल कर इन्द्रिय सुख रूपी छोटी-छोटी नदियों में आ जाने वाली मछलियाँ हैं, सागर में हम ज्यादा सुखी व संतुष्ट थीं पर मूढ़तावश उथले-गंदले पानी वाली इन नालियों में तड़प रही हैं, जीवन में प्रत्येक क्षण हमारे पास चुनाव का अवसर आता है, चुनना हमारे हाथ में है पर हर बार हम सागर को छोड़ उथला पानी ही चुनते हैं”. उसे याद आया, बचपन में उसने अध्यापिका की डांट से बचने के लिए अपनी भूगोल की कापी में उनके हस्ताक्षर स्वयं कर दिए थे, जिसका अफ़सोस उसे आज तक है और अभी तक वह स्वयं को क्षमा नहीं कर पायी है. इसके अलावा एक बार किसी का खत पढ़ा था, पर तब वह बड़ी थी सो उसका दुःख ज्यादा नहीं है. सम्भवतः बच्चा जब बड़ा होता है, अपने इर्दगिर्द होते झूठ, बेईमानी और असत्य के कार्य-कलाप को दखकर उसका मन भी उसे ही ठीक मानने लगता है और अबोध अवस्था में वह कोई गलत कार्य कर देता है जिस पर बड़ा होने पर उसे पछतावा होता है.

It is raining cats and dog since last night, every plant, leaf and each flower is quenching her thirst of water. It was so hot yesterday, they all were dry and needed water and lo.. God gave them enough ! similarly God fulfills their wishes all big and small. He takes care of his creation. She is grateful to Him, for giving her shelter, food and clothes, for immense love, for understanding, for desire to know Him, for the search of TRUTH, sky like nature of mind, for the inner sense, for attractions in the world which deviate her from path of truth, but He helps her on keeping on the right path. The one and only aim of life is to attain Him, after knowing the true nature of mind. Ahankar is illusion and to pamper it, is great hindrance on the way of truth. Let going is freedom, freedom from habits of many life and deaths. Freedom from anxious mind, worries and tension. When GOD is always with one in the heart of his heart then who cares about trivialities of life.

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Friday, May 30, 2014

सत्य की खोज


Today she got younger sister’s letter, she was having sour throat and body ache when she wrote this, was feeling low and then she remembered her. Nuna thought, will talk to her and write also. Hoped by now she might have recovered and is again hopeful and happy. She read in tibaten book,” Nature of your mind is always there sky like radiant, blissful, limitless and unchanging.” So why should she think of herself mean. Yes,  there are so many things which  she should do but does not do and many times in the past she has spoken harsh words and in future she may but at present she is ok, trying to find the ultimate truth.

Her student came in the morning, she likes her and talking to her is enjoyable. She asked about coal shell plant, internet, y2k, and books. Nuna could not tell her much about these things because she herself is ignorant. She thought, one does not know much but pretend to know everything. There are so many things around them which need their attention but….last night she was tired slept early, they had went to play after many weeks. In the afternoon she wasted much precious time in idle thinking. Today feeling better, always cherishing self and grasping self, even for a single second she is not free from self then how can she expect to live at ease, content and in peace with herself. She wants to do something better and in this futile search can not do even simple things. Life as such is great so why the urge to make it greater.  

मन प्रश्नों से घिरा है, अंतर्मन से उपजें ऐसे शब्द कहाँ से लाये ?
भाव अर्चना हो जाएँ, हो श्वास सार्थक, सत्य निकट आ जाये, ऐसा हृदय कहाँ से लाये ?
विश्वासी मन हो, विश्वास करे जिसका ऐसे राम कहाँ से लाये ?
खाली-खाली सा जीवन, रहा अधूरा सा हरदम मन, शांति और संतोष खजाना लेकिन कहाँ से पाए?  अंतहीन भटकन यह अंतहीन रस्ते ठौर कहाँ पाए ?
क्यों न ठहरे मन जिससे सुफलित हो जीवन, संशय, असंतोष के दानव, देव हरा दे लेकिन ऐसा देव कहाँ से लाये?
जो है, वह कम है, जो किया वह कम किया, वह  समुचित नहीं, व्यर्थ है यह सब, व्यर्थ है वह  सब, जीना व्यर्थ है, जीने का यह ढंग गलत है पर सही कहाँ से लाये ?
इन प्रश्नों का ऊत्तर मन में, अंतर्मन में डूब सके तो पाए !

उसने सोचा, क्या कभी कोई ऐसी स्थिति आ सकती है जब कोई पूर्णतया स्वार्थ मुक्त हो जाये, अपना सुख दूसरों के सुख में ही ढूँढे, विचार समुचित हों, कार्य, उद्देश्य, आशाएं सभी समुचित हों, जीवन एक शांत नदी की तरह बहता चला जाये नदी जो दूसरों को अमृत सा जल देती है, शीतलता देती है.


Thursday, May 29, 2014

धूल का बादल


आज सुबह उसके घर के दरवाजे पर एक deaf and dumb (उसके हाथ में पकड़े फोल्डर के अनुसार ) सहायता मांगने आया पर अभ्यास वश उसने उसकी पुकार (मूक) सुनी ही नहीं, अनसुनी कर दी. बाद में सोचा, अगर उसकी कुछ सहायता कर दी होती तो उनका क्या घट जाता.
फिर कुछ दिनों का अन्तराल, उस दिन माँ-पिता को जाना था, अगले चार दिन घर की सफाई, स्वेटर्स की धुलाई आदि में व्यस्त रही. धूप भी दिखानी थी गर्म कपड़ों को, पर धूप निकल ही नहीं रही है, अख़बार में आया था कि पूरे असम के ऊपर धूल का एक बड़ा बादल छा गया है., वर्षा पिछले कई हफ्तों से नहीं हुई है. कल शाम वे अपने पड़ोसी के यहाँ गये, साथ-साथ रहते हुए उन्हें वर्षों होने को आये हैं, अच्छे किन्तु औपचारिक ही कहे जाएँ, ऐसे सम्बन्ध हैं उनके मध्य, जो उन दोनों परिवारों को सूट करते हैं. जब मिले तो पूरे मन से नहीं तो किसी के व्यक्तिगत जीवन में कोई झांक-ताक नहीं. उसकी आँखें जाने क्यों आज बंद हो रही हैं, हल्का सा दर्द है, उस दिन पढ़ा था कि डायरी में न ही मौसम का जिक्र होना चाहिए और न ही छोटी-मोटी बीमारियों का, लेकिन लिखने के लिए उसके पास और भी बहुत कुछ है, खुद की शिकायत भी तो करनी है, पिछले तीन-चार दिनों से संगीत का अभ्यास भी नहीं हुआ है. दो दोपहरें सिलाई के काम में गुजर गयीं. मन पर नजर रखने का अभ्यास भी शिथिल हुआ एक दो बार, माँ-पापा के साथ चाहकर भी बहुत खुला व्यवहार नहीं कर पाती वह, निकटता से घबराहट होती है. अपनी आजादी, अपना आप इतना महत्वपूर्ण लगता है कि अपने इर्द-गिर्द एक घेरा सा बना लिया था. उस समय वही ठीक लगता था अब भी वही ठीक लगता है, कम से कम उनकी अपेक्षाएं बढ़ेंगी तो नहीं.

जिन्दगी यूँ ही चली जा रही है, बेमकसद, बेमजा, हर वक्त मन अपने आप से पूछता है ? क्या समाचार है ? और मन अंजान सा बना टप-टप बरसती बूंदों को तकता, धरती से उमड़ती सोंधी गंध को सूँघता ठगा सा खड़ा रहता है. जीवन कुछ और भी तो हो सकता था, कुछ खोज लिए, कोई तलाश लिए, बामकसद और अर्थपूर्ण. सांसें क्यों व्यर्थ सी जाती प्रतीत होती हैं, क्यों लगता है कि हीरा जन्म गंवाया, आकाश भी तो बस है, धरती भी तो बस है, वे भी सिर्फ हों ऐसा क्यों नहीं होता. उनका मन भी बस हो, जैसा है वैसा का वैसा, न एक रत्ती भर इधर न उधर, बस एक पेड़ की तरह सिर्फ होना भर क्या मनुष्य के लिए कभी नहीं, नहीं जी, मनुष्य को तो बड़े-बड़े काम करने हैं, नाम करना है.


मंजिल अभी दूर है, लेकिन रास्ते का पता है सो भय की कोई बात नहीं, पिछले कई वर्षों से वह आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ती आ रही है, अपने मन को समझने लगी है अब. जिस ओर हवा बह रही है उसी ओर मन की नाव नहीं बह जाती बल्कि सोच-समझ कर नियंत्रित कर सकती है, अपने अंदर के विकारों को खूब देख पाती है और मन यदि कोई गलती कर रहा होता है तो बखूबी जानता है, मात्र जानना ही पर्याप्त नहीं है, मानना भी पड़ेगा कि स्वार्थ सिद्धि और आत्म कल्याण य आत्म सुख की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य न बन जाये. अध्यात्म की साधना में व्यक्ति नितांत अकेला होता है, उसे एकांत चाहिये और सांसारिक बन्धनों से जितना मुक्त हो सके उतना ही श्रेष्ठ है. यदि अपने आप को शांत या मुक्त रखना आ गया तो जीवन में कहीं भी दुःख या रोष तो नहीं व्यापेगा.