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Wednesday, July 19, 2023

ध्वनि की ऊर्जा

आज शाम से ही वर्षा हो रही है। कुछ देर पहले नन्हे से बात हुई, उसने बताया दिवाली का उत्सव वे अभी तक मना रहे हैं। आज सुबह एक मित्र परिवार ने उन्हें नाश्ते पर बुलाया था, दोपहर को उन्होंने पड़ोसियों को लंच पर आमंत्रित किया, शाम को पुन: उन दोनों को एक सहकर्मी के यहाँ दिवाली की चाय पर जाना था। रात को नौ बजे से उनका नृत्य अभ्यास है, जो एक मित्र के विवाह के अवसर पर उन्हें करना है। आज दीदी ने वर्ष भर पूर्व  उनके साथ की गई हिमाचल की यात्रा का विवरण भेजा, पढ़कर वे सारे दृश्य आँखों के सम्मुख आ गये। उसने सोचा, वह भी डायरी में लिखे यात्रा विवरण को टाइप करके उन्हें भेजेगी । बड़ी ननद के विवाह की वर्षगाँठ पर उसने एक कविता लिखी ।कल एक सखी के माँ-पापा के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक छोटा सा आलेख लिखा था, उसने अपने परिवार जनों की प्रतिक्रियाएँ भेजी हैं, अब तक बीस आ चुकी हैं। उनका परिवार बहुत बड़ा है। उसे महसूस हुआ, शब्दों में कितनी ताक़त होती है। 


सुबह वे टहलने निकले तो भोर का तारा गाढ़े नीले आकाश पर दमक रहा था। हवा शीतल थी। रात की रानी की सुगंध दूर से ही आ रही थी। मुख्य सड़क के मध्य में एक लंबी क़तार में इनके पौधे लगे हैं। योगासन के अभ्यास के दौरान छत से दिखा सूर्योदय का दृश्य अनुपम था। उसी दौरान पुन: गायत्री परिवार के लाल बिहारी जी का मनोमय कोष की साधना पर दिया व्याख्यान सुना। उनकी वाणी में कितनी प्रखरता है, बहुत गहरी साधनाएँ उन्होंने की हैं। बाद में एक परिचित, जो इसी सोसाइटी के  निवासी हैं, मिलने आये थे, तमिलनाडु के हैं। हर सुबह दौड़ लगाते हुए मिलते हैं। वे सात बार विपासना का कोर्स कर चुके हैं। उनसे बात करते हुए उसे अपने विपासना अनुभव याद आ रहे थे, उसके लिए एक बार ही यह अनुभव करना पर्याप्त है।  


बाहर से कुछ आवाज़ें आ रही हैं। उनकी बैठक की दीवारों में पानी के रिसाव के निशान दिख रहे थे, इस समस्या से छुटकारे के लिए बाहर दीवारों के पास खुदाई का काम चल रहा है, एक बार फिर से जलनिरोधी प्लासतर करना होगा। आज दिन में दो बार ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ । एक प्याला टूटा और खाने की मेज़ पर पानी से भरा गिलास उलट गया। दोनों बार दाहिने हाथ से, अर्थात हाथ पर मन का नियंत्रण नहीं था और मन पर ख़ुद का। नन्हा और सोनू विवाह में पहुँच गये हैं, उसके मित्र ने लिंक भेजा है, चाहे तो वे भी यहाँ से सम्मिलित हो सकते हैं।’देवों के देव’ में कार्तिकेय और गणेश के मध्य प्रतिस्पर्धा होने वाली है। गणेश ही विजयी होंगे, कार्तिकेय के मन में एक गहरा घाव है जो इंद्र ने उसे दिया है अथवा उसके जन्म की घटनाओं के कारण उसे मिला है। वह कई बार कैलाश छोड़कर जा चुके हैं, कोई न कोई उन्हें मनाकर वापस लाता है। 


सुबह वे जल्दी उठे। उठने से पूर्व उसे लगा जैसे किसी ने कहा हो, ध्वनि एक ऊर्जा है। प्रात: भ्रमण के दौरान इसी बात पर मनन करते हुए मंत्र जाप किया। हर शब्द  की तरंगों का शरीर पर असर होता है।ओम के उच्चारण का अति प्रभाव होता है, इसीलिए इस पर इतने शोध हो रहे हैं। हज़ारों वर्षों से ऋषि यह कहते आये हैं। शरीर तरंगों से बना है, तो ध्वनि की तरंगें उसे प्रभावित करें इसमें आश्चर्य भी क्या है ? भीतर निरंतर एक गुंजन चल रही है, उसे सुनें या ना सुनें, वह हो ही रही है। वह ध्वनि कहाँ से आ रही है, क्या वह प्राण ऊर्जा की गति के कारण है, जैसे बिजली की तारों से एक ध्वनि आती है। इस देह में न जाने कितने रहस्य छिपे हैं। गुरुजी के भगवद्गीता पर दिये प्रवचन का एक अंश सुना। वे गूढ़ विषयों को भी सरल भाषा में समझा देते हैं। शाम को एक निर्देशित ध्यान किया था, मन कितना हल्का हो गया था उसके बाद। जून को भी अच्छा लगा। अब वह पुन: कर रहे हैं। उन्हें अपने आप ध्यान के लिए बैठे देखकर अच्छा लगा। उन्हें ध्यान के महत्व का ज्ञान हो रहा है।  


आज साप्ताहिक सफ़ाई का दिन था। सुबह सर्दियों की ठंड के साथ शुरू हुई। तापमान चौदह डिग्री था, वे जैकेट आदि से मुस्तैद होकर निकले। दोपहर को धूप निकल आयी थी। फूलों के चित्र उतारे, जो धूप में और भी शोख़ लग रहे थे। शाम को सूर्यास्त के चित्र  फ़ेसबुक पर प्रकाशित किए। आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुवाद कार्य के बाद  दोपहर को ब्लॉग पर लेखन  व पठन कार्य, लिखा कम, पढ़ा अधिक। हिमाचल की यात्रा का वृतांत पिताजी व दीदी दोनों को अच्छा लगा। नन्हे के मित्र ने विवाह के बाद एक उपहार भेजा है, बहुत बड़ा सा पैकेट है। उन्होंने अनुमान लगाया, उसमें क्या हो सकता है। 

   


Wednesday, March 2, 2016

हिना का रंग


आज सुबह अजीब सा स्वप्न देखा. एक नवजात शिशु का जन्म, जन्म देने वाली माँ को वह जानती है और वह बच्चा जन्मते ही कितना लम्बा था. स्वप्नों की दुनिया कितनी निराली है. देर तक वह स्वप्न चला. जन्म का रहस्य पता चल जाता है एक  बार सद्गुरू ने कहा था. सुबह अभी सवा सात ही बजे थे कि बातूनी सखी का फोन आया, उसने कुछ दिन पहले भी कहा था, मिलने आएगी. उसका गला बैठा हुआ था, उसकी कहानी सुनी जब उसके घर गयी. वह अपने ही मन, अपने व्यवहार, अपनी ही आदतों व अपने ही स्वभाव के कारण इतना दुःख पा रही है, वह इस बात को समझ नहीं पा रही है. नूना ने उसे समझाया तो है पर जब तक वह अपने को परिवर्तित करने की बात स्वयं नहीं सोचेगी, तब तक उसको ख़ुशी मिलना मुश्किल है. मन के हाथों या कहें माया के हाथों, अज्ञान के हाथों, अहंकार के हाथों मानव पिसा जाता है, पर उसे होश नहीं आता. मन, माया, अहंकार, अज्ञान यही तो उस आवरण का नाम है जो उसके और परम के बीच है. आत्मा, ब्रह्म, प्रेम, ज्ञान यही तो उस आनन्द स्वरूप के नाम हैं, जो सदा हाजिर है. परमात्मा उसके भी साथ है. इस समय दोपहर के सवा तीन बजे हैं. उसका पुत्र गणित पढ़ने आता है, इस समय परीक्षा दे रहा है. परिवार के दुःख की छाया उसके चेहरे पर भी झलक रही है. जून परसों मुम्बई जा रहे हैं.

कल ध्यान में उसे पल भर में परमात्मा के आनन्द का अनुभव करने की कुंजी हाथ लग गयी.  एक क्षण के शतांश में वहाँ पहुंचा जा सकता है. वह परम हर पल निमन्त्रण देता है. वह अपना घर है. उनके जन्मों से आहत हुआ मन का अपना घर..वहाँ जाकर मन जैसे खिल जाता है, तृप्त हो जाता है, खो जाता है, समाधि इसी को कहते हैं क्या ? जगती आँखों की समाधि ! बैंगलोर आश्रम में गुरूजी एडवांस कोर्स करा रहे हैं, वह उनकी कृपा का अनुभव यहाँ रहकर कर रही है. भीतर झींगुर की सी ध्वनि इस वक्त भी सुनाई दे रही है, कहाँ से आती है यह ध्वनि, कोई नहीं जानता. उस सखी का फोन आया, आज दिल्ली से आने वाले किसी मेहमान के लिए भोजन बना रही है, कल जो दुःख से दबी जा रही थी. ईश्वर सबको शक्ति देता है, वह उन्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता. वे परमधाम न भी जा सकें वह तो उनके पास आ ही जाता है.
टीवी पर मुरारी बापू राम कथा कह रहे हैं. कितना रस है उनकी कथा में, शेरो-शायरी और पुराने फ़िल्मी गीतों का आध्यात्मिक अर्थ देते हैं.
‘पत्थर के सनम, पत्थर के खुदा ही पाए हैं
लोग शहरे मुहब्बत कहते हैं हम जान बचा के आये हैं’
‘इश्क का जहर पी लिया साकी
अब कौन मसीहा दवा करेगा’ !
‘चंद मासूमों का लहू है
लोग जिसे मुहब्बत की हिना कहते हैं’ !
इस बार उनकी कथा का विषय भगवान नागेश्वर हैं, अर्थात शिव. भगवान महादेव आदिदेव हैं. वही निराकार ब्रह्म हैं, अजन्मा हैं, उनके रूप की कल्पना कर ऋषियों ने जो छवि बनाई है उसका वर्णन हो रहा है. हजारों वर्षों से वह प्रतिमा लोगों के मनों में बसी है. उनका रंग, कुंद, इंद्र तथा शंख के समान श्वेत है, उनकी कृपा असीम है.


जून कल आ गये, वहीं से बड़ी ननद से मिलने भी गये, उसने ढेर सारा सामान भेजा है, कुछ जून ने खरीदा है, उनकी आलमारी का निचला हिस्सा भर गया है, फ्रिज भी भर गया है और तुर्रा यह कि उनका पाचन ठीक नहीं है. इतना गरिष्ठ भोजन खाकर कहीं उसका भी न हो जाये, इस बात का डर है. कल दोपहर बाद से समय कुछ अलग तरह से बीत रहा है. मौन रहने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को वे जायेंगे. आज भी मौसम भीगा है, सुबह उठे तो मूसलाधार पानी बरस रहा था, अभी पुनः आरम्भ हो गयी है. कल डेंटिस्ट के पास गयी थी. उसने कहा, सुबह हो गयी है, सूरज बादलों के पीछे छिपा है. मौसम की उदासी देखकर मन भी जैसे उदास हो गया है. इस भाव के लिए कोई एक शब्द या कुछ शब्द लिखें. उसका मन भी सम्भवतः इस वक्त उदास है, नन्ही छात्रा उसकी एक भी बात नहीं सुन रही है. बच्चों को पढ़ाना इतना सरल भी नहीं है, वे उनके धैर्य की पूरी परीक्षा लेते हैं. 

Friday, March 13, 2015

बारिश और छाता


कबिरा इस जग में आय के अनेक बनाये मीत
जिन बाँधी एक संग प्रीत वही रहा निश्चिंत !

उस एक से जब लौ लग जाती है तो जीवन फूल सा हल्का हो जाता है, कोई रूई के फाहों की तरह गगन में उड़ने लगता है. वह एक इतना प्यारा है, इतना अपना कि दिल भर जाता है उसकी याद में. वह हर पल मित्र की तरह साथ रहता है, कुशल-क्षेम को वहन करता है. उसकी कृपा असीम है, अपार है, उस पर किसी का जितना अधिकार है उतना संसार की किसी भी वस्तु पर नहीं. उसकी सारी बातें ही निराली हैं, उसका बखान करना जितना कठिन है उतना ही आसान भी ! एक शब्द में कहें तो प्रेम वही तो है, सभी में उसका ही प्रकाश है. सद्गुरु की आँखों में उसकी ही तो चमक है, उनकी मुस्कान में उसका ही रहस्य झलकता है, उनके हृदय की गहराई में एकमात्र वही बसता है. उस अशब्द परमात्मा को शब्दों से नहीं जाना जा सकता. वह मौन है उसे मौन में ही ढूँढना होगा. कोई जितना-जितना अपने आस-पास की ध्वनियों के प्रति सजग होता जाता हैं उतना-उतना ही उसे मौन का भी आभास होता है. दो ध्वनियों के बीच का मौन और वह बेहद प्रभावशाली होता है, शब्दों से कहीं ज्यादा, उस मौन में उसे अपने होने का अहसास तीव्रता से होता है. अपने वास्तविक शून्य रूप का ! वही उन्हें पहुंचना है, जहाँ न राग है न द्वेष, न संयोग हैं न वियोग, न अच्छा न बुरा ! उस अद्भुत लोक में प्रवेश करने के लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है. ध्यान का अर्थ है कोई अपने को जो आज तक मानता आया है उससे अलग सच्चे स्वरूप को जानना. ईश्वर को जानना हो तो अपने आप को जानना होगा.

आज सुबह ध्यान में नवीन अनुभव हुआ, जैसे वह एक गहरी सुरंग में उतरती जा रही है, फिर कुछ शब्द सुने जो अप्रिय थे. एक बार विपासना में सुना था आत्म मंथन के समय सभी तरह के अनुभव होंगे लेकिन यह याद रखना है जो उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है अत किसी भी अच्छी या बुरी संवेदना को महत्व नहीं देना है. मन को समत्व भाव में स्थिर रखना है. आज सुबह संगीत की कक्षा हुई. दोपहर को एक हास्य फिल्म देखी. अख़बार पढ़ा. नन्हा अभी तक कोचिंग से आया नहीं है, वर्षा हो रही है उसके पास छाता तक नहीं है. परसों शाम वह डांट खाने के कारण बहुत नाराजगी व्यक्त कर रहा था पर कल दोपहर उतनी ही ख़ुशी व्यक्त कर रहा था. हर रात के बाद सवेरा आता है, हर दुःख के बाद सुख. पिछले हफ्ते छोटी बहन का फोन सुनकर उसने उसे व्यर्थ ही सुझाव दिए. अस्वस्थ होना तो कोई भी नहीं चाहता पर अगर कोई किसी कारणवश हो भी जाता है तो दुखी होने का कारण नहीं है. “जो पहले नहीं था वह बाद में भी नहीं रहेगा” और वे मात्र शरीर तो नहीं हैं जो थोड़ी सी परेशानी से ही व्यथित हो जाएँ, भविष्य में ध्यान रखेगी. उन्हें अपनी आत्मिक शक्ति पर भरोसा रखना है. रोग तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं. बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, संत यही तो कहते आए हैं कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग ये चार व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका भाजन हरेक को बनना है. इनसे कोई जीवात्मा बच नहीं सकता. आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है अपनी जीने की इच्छा के कारण ही देह धारण करता है और फिर इन चारों के चक्रव्यूह में फंस जाता है. माया का बंधन काट दें तो इन चारों का अस्तित्त्व नहीं रहता ! 


आज तीन महीनों की छुट्टियों के बाद नन्हा स्कूल गया है. उसका हृदय उसके लिए शुभाशीष और शुभकामनाओं से युक्त है. जैसे आज तक वह अपनी पढ़ाई में सफल रहा है वैसे ही आगे भी रहेगा. आज सुबह वे तीनों सुबह चार बजे उठे. वह समय से पहले ही तैयार हो गया था. जून और उसने सुबह साधना भी की. ईश्वर के सम्मुख होकर यदि वे अपने दिन का आरम्भ करें तो दिन भर मन सात्विक भावों से पूर्ण रहता है. कृष्ण उनके अंतर में ज्ञान का दीपक जलाकर स्वयंमेव तम को मिटने का संकल्प करते हैं. कल इस का अनुभव हुआ, गीता का एक श्लोक उसे अपने आप याद आया और मन में विचारों की एक अनवरत श्रृंखला.. जो एक भाव को ही पोषित कर रही थी, प्रवाहित होने लगी, जैसे तेल की धार. उसे विश्वास है कि एक दिन एक ऐसा क्षण इसी जन्म में आयेगा जब उसके मन में ऐसा ठहराव आयेगा जिसके बाद और दौड़ नहीं करनी होगी. जब मन ध्यान में टिकाना नहीं पड़ेगा बल्कि टिका रहेगा. अभी उस लक्ष्य से दूर है, पर कृष्ण उसके साथ हैं. अंतर में उसी का उजाला, बुद्धि में उसी का प्रकाश और आत्मा में उसी का प्रेम...वह प्रिय से भी प्रिय उसके मन पर अपना पूर्ण अधिकार कर चुका है ! वही उसे मुक्त करता है इस जग से !