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Thursday, May 21, 2026

हर घर ध्यान

हर घर ध्यान


आज सुबह-सुबह वे एक परिचित दंपत्ति के साथ उनके घर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित एक झील देखने गये, रास्ते में ढेर सारी बातें हुईं, इधर-उधर की।मौसम सुहाना था, सूर्योदय हो रहा था, अनेक तरह के पक्षी जल में क्रीड़ा कर रहे थे। निकट ही एक गाँव है, उसकी गलियों से गुजरते हुए, उनकी सरल जीवनशैली के कितने ही दृश्य दिखे। एक दो व्यक्तियों से उनके मित्रों की बातचीत भी हुई। वापसी में कुछ दूरी पर स्थित एक नयी झील भी देखी, जिसके बार में उन्हें जरा भी जानकारी नहीं थी, उसने झील के पानी में वृक्षों की छाया के सुंदर चित्र उतारे। आश्रम के सामने नये खुले रेस्तराँ ‘उडुपी’ में सुबह का नाश्ता किया।सबकी पसंद भिन्न थी, नूना ने इडली मंगायी, जून ने मसाला दोसा, उसकी सखी ने नीर दोसा और उनके पतिदेव ने पूरी सब्ज़ी। इस वर्ष की इस आख़िरी मुलाक़ात को वे यादगार बना लेना चाहते थे। वास्तव में उनकी दिनचर्या घर लौटकर शुरू हुई, जब नैनी आयी। घर की सफ़ाई, स्नान आदि। शाम को पापाजी से बात हुई, वहाँ ठंड काफ़ी बढ़ गई है, रात्रि का तापमान पाँच डिग्री तक चला जाता है। वह यह बताते हुए बहुत खुश हो रहे थे कि नार्वे से आये हुए दीदी के बच्चे उनसे मिलने गये थे। नूना के स्वास्थ्य के बारे में जानकर नन्हे ने कहा है, अगले हफ़्ते उन्हें सालाना मेडिकल टेस्ट करा कर उसकी रिपोर्ट डॉक्टर को दिखानी चाहिए। 


बैंगलुरु की एक प्रसिद्ध लैब में उन्होंने सभी आवश्यक टेस्ट कराये।रिपोर्ट दिखाने गये तो डाक्टर ने आश्वासन दिया, सब कुछ सामान्य है। बस ज़रूरत है, वे हल्का आहार लें, वजन कुछ कम करें और तेल-घी व चीनी का सेवन कम करें। नियम से व्यायाम करें।पानी अधिक पीना है और उसे नमक की मात्रा अधिक व जून को कम लेनी है। नये वर्ष में प्रवेश करने से पूर्व यह अच्छा ही है कि वे अपने स्वास्थ्य के प्रति एक बार फिर जागरूक हो जायें। आज “रामसेतु” फ़िल्म देखनी शुरू की है। फ़िल्म की कहानी रोचक है। एक नास्तिक पुरातत्वविद् ‘सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट’ के लिए अपनी रिपोर्ट देता है, जिसमें रामसेतु को तोड़ा जाना है, पर अनेक लोग नाराज़ हो जाते हैं। वह असलियत का पता लगाने के लिए समुद्र के भीतर जाकर खोज करता है, तब उसे ज्ञात होता है, यह पुल प्राकृतिक नहीं आदमी द्वारा बनाया गया है। इसके बाद वह इसे बचाने के लिए लग जाता है। श्रीलंका में फ़िल्माये दृश्य बहुत सुंदर हैं। रामायण से जुड़े कितने ही स्थान श्रीलंका में भी हैं। राम के अस्तित्त्व को नकारना असंभव है। राम उसी तरह शाश्वत हैं जैसे भारत भूमि ! आज भी एओएल का अनुवाद कार्य किया। आज़ादी के अमृत महोत्सव के अन्तर्गत भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग के साथ एक राष्ट्रव्यापी जान-जागरूकता अभियान चला रहा है, “हर घर ध्यान”। गुरुजी हर व्यक्ति को, विशेषकर युवाओं को ध्यान से जोड़ना चाहते हैं।कल सुबह उनके नये वर्ष के संदेश का अनुवाद करना है।


सुबह शीतल थी, वे दूर तक पैदल चले। कल की यात्रा के लिए तैयारी की। कल वे सब एक ‘ईको रिजार्ट’ जा रहे हैं। नये वर्ष का आरंभ वहीं से करेंगे। वजन कम करने के लिए जो परहेज़ आवश्यक हैं, वे करने आरम्भ कर दिये हैं। नये वर्ष को वे जब तक नया रहने देंगे, उत्साह बना रहेगा। आने वाले वर्ष के अन्तिम दिन तक इसे नया जानना है, उसके बाद ही तो यह पुराना होगा। किंतु होता क्या है कि फ़रवरी आते-आते ही यह पुराना हो जाता है, और जीवन उसी पुराने क्रम में लौट जाता है। उसके मन में कितने ही भाव उमड़ रहे हैं, नया उत्साह, नये इरादे, नये ढंग से जीने की आस, नये रास्ते, नये को अपनाने में कोई भय न हो, पुराने को त्यागना नहीं है पर उसमें कुछ नयापन भी जोड़ना है। भूलें भी करें तो नये ढंग की, गुरुजी कहते हैं, वही भूलें एक चक्र में घुमाती हैं। 


परसों वे सब आई मैक्स में अवतार सीरीज़ की दूसरी फ़िल्म ‘अवतार- द वे ऑफ़ वाटर’ देखने जा रहे हैं, नये वर्ष की उनकी पहली फ़िल्म। नन्हे ने कहा पहले की कहानी पढ़ लें, तो यह समझ में अच्छी तरह आएगी।उसने कहानी पढ़ी और पापाजी को ‘अवतार’ की पहली फ़िल्म का लिंक भेजा है, शायद वह देखें।वर्षों पहले उन्होंने यह अनोखी फ़िल्म देखी थी। जेम्स कैमरून की थ्री डी फ़िल्म। सुदूर भविष्य की कहानी है, धरती पर काफ़ी कुछ ख़त्म हो चुका है, पैंडोरा नाम के एक ग्रह पर मानवों का प्रवेश होता है, जो वहाँ से एक बहुमूल्य खनिज लाना चाहते हैं। वहाँ के मूल निवास नावी, जो दस फ़ीट लंबे और नीले रंग के हैं, गहराई से प्रकृति से जुड़े हैं। नावी लोगों से संपर्क के लिए वैज्ञानिक,एक इंसानी दिमाग़ को प्रयोगशाला में तैयार किए गये नावी अवतार में लगा देते हैं।जेक सुली वह अवतार है, जो पैंडोरा पर जाता है, और एक नावी महिला नेयतिरी से मिलता है। बाद में वह मानवों के ख़िलाफ़ वहाँ के निवासियों की तरफ़ से लड़ता है।  

 

Wednesday, September 4, 2024

शिव सूत्र


शिव सूत्र

कल उन्हें नन्हे के घर जाना है और वहाँ से उसके एक मित्र के यहाँ, उसका नया घर देखने; जहाँ गृहप्रवेश की पूजा का आयोजन किया गया है। नन्हा भी एक महीने के लिए किराए पर लिए घर में है, उनके ख़ुद के घर में रिनोवेशन का काम जो चल रहा है।किसी भी अन्य मूर्त या अमूर्त वस्तु की तरह एक घर को संभाल और संवार कर रखना इतना आसान तो नहीं है। इसके रख-रखाव का ध्यान रखना होता है ताकि लंबे समय तक यह सुंदर और सुरक्षित बना रहे। 


वे लोग कल दोपहर बारह बजे ‘सॉंग ऑफ़ साउथ’ पहुँचे, जो एक विशाल सोसाइटी है। वहाँ कई बड़े-बड़े लॉन तथा पार्किंग स्थल थे। उसमें बाहरवें टावर में सत्रहवीं मंज़िल पर मित्र का घर है। कुछ अन्य लोग तथा उसके भाई-भाभी व भतीजी पहले से ही वहाँ उपस्थित थे। सोसाइटी के क्लब हाउस में भोजन का इंतज़ाम किया गया था। पूजा सुबह ही हो चुकी थी। नन्हे ने बताया, कल रात एयरपोर्ट से भाई के परिवार को लाते समय मित्र की कार को एक प्राइवेट बस ने टक्कर लगायी, बाँयी तरफ़ का पिछला दरवाज़ा धँस गया, भाई वहाँ बैठे थे, पर सौभाग्य से उन्हें कोई चोट नहीं आयी।फ़ोन करके उसने नन्हे को बुलाया, वे सब उसकी कार में बैठ कर रात को एक बजे घर लौटे।


रात्रि के नौ बजे हैं। साढ़े नौ बजे गुरुजी की एबीसी टीम के साथ मीटिंग है।जिसमें सभी अनुवादकर्ताओं से चर्चा होगी और उन्हें दिशा निर्देश भी दिये जाएँगे।आज महिला दिवस के उपलक्ष्य में सोसाइटी में योग सत्र का आयोजन किया गया था। सुबह कई लोगों को महिला दिवस पर संदेश भेजे। पापाजी से बात हुई, उन्हें गुरुजी पर लिखी उसकी कहानी पसंद आयी। सुबह वे टहलने जाते हैं तो किसी न किसी सड़क पर सूखे पत्तों के ढेर पर सोया कुत्तों का परिवार भौंक कर अपनी नाराज़गी व्यक्त करता है, उनकी नींद में जैसे ख़लल पड़ गया हो। ‘देवों के देव’ में रावण का अहंकार टूटते देखा, जब शिव ने उससे कहा, भक्ति का अहंकार भक्त को डुबा देता है।रावण कितना बड़ा विद्वान था पर अपनी भक्ति और ज्ञान का गर्व उसे ले डूबा।


आज घर में पीछे आठ दिनों से चल रहा काम पूरा हो गया। सुबह साईं बाबा पर एक फ़िल्म देखनी आरंभ की थी, जो अभी उनके जन्म की कथा के साथ समाप्त होने वाली है। इस फ़िल्म में उनकी अद्भुत बाल लीलाएँ दिखायी गई हैं।यह भी दिखाया गया है कि देवत्व उन्हें जन्म से ही प्राप्त था, जिसे वह सहज ही प्रकट भी करते थे, जिसका जगत को सदा लाभ मिलता था और आज भी मिल रहा है। प्रेम और करुणा की मूर्ति थे, सेवा उनका सहज स्वभाव था। इतने वर्षों तक उनके बारे में कितनी अफ़वाहें भी प्रचलित हो गई हैं, कोई उन्हें जादूगर बताता है तो कोई फ्रॉड भी। सत्य क्या है, यह कौन जानता है। शायद सबका अपना-अपना सत्य है। आज दिन भर परमात्मा की कृपा का अहसास होता रहा, वही तो है सबका आधार ! संत कहते हैं, वह अपना आप ही तो है। वह तो सदा से ही था, अब उसकी प्रतीति अनायास ही रहने लगी है। 


आजकल एक विचित्र बात उसके साथ हो रही है।जो भी विचार मन में आता है, वह घट जाता है। उसके बिना कहे ही जून वैसा ही करने लगते हैं। उसकी छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी होती रहती हैं।इच्छा उसके लिए लाभप्रद है या नहीं इसका कोई भेद नहीं रहता। परमात्मा की शक्ति रहस्यमयी है। विचार ही वस्तु बन जाते है,  इसका  प्रत्यक्ष उदाहरण एक बार नहीं अनेक बार मिला है पिछले दिनों। आज दिन भर मन हल्का सा रहा है, मन के साथ तन में भी हल्कापन लग रहा है। नापा, उनकी सोसाइटी में शिवरात्रि की तैयारी चल रही है। मंदिर के रास्ते पर बिजली के बल्ब लगा दिये गये हैं, आगे एक तरफ़ तख़्त बिछाया  गया है, स्टेज जैसा, शायद बच्चे अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। आश्रम में गुरुजी द्वारा शिवसूत्र पर दो दिनों का व्याख्यान चल रहा है। अद्भुत है शिवसूत्र ! पहले उसने शिवसूत्र पर ओशो को व्याख्या भी सुनी थी।नन्हे के एक जूनियर साथी की यात्रा के दौरान हृदयाघात से मृत्यु हो गई, कुछ दिन पूर्व उसका तलाक़ हुआ था। लिवर व किडनी की भी समस्या थी। शायद अपने पापा से  उसका रिश्ता भी अच्छा न रहा हो, पिता ने उसकी माँ के न रहने पर दूसरा विवाह कर लिया था। कभी-कभी जीवन कितना विचित्र रूप लेकर आता है। एक परिचिता से पता चला, विवाह टूटने से वह अवसादग्रस्त था।उसके पिता बहुत दुखी हैं।  


आज शिवरात्रि है, वे कुछ देर पूर्व ही मंदिर से होकर आये हैं। बहुत भीड़ थी, बच्चे नृत्य के लिए तैयार थे। महिलाएँ श्लोक उच्चारण कर रही थीं। कुछ लोग खड़े थे। मंदिर में पुजारी पूजा कर रहा था। वे मास्क ले जाना भूल गये, सो जल्दी वापस लौट आये। कल सुबह एक मेडिकल कॉलेज में कोविशील्ड वैक्सीन लगवाने जाना है।साईं बाबा की किताब आगे पढ़ी, अनोखे व्यक्ति ?संत थे वे। संत व्यक्ति नहीं रह जाता, वह समष्टि से एक हो जाता है। उसके चमत्कारों से पुस्तक भरी पड़ी है।गुरु जी के पास रहने वाले भी कितने ही चमत्कारों का अनुभव करते हैं, उसने स्वयं भी अनेकों बार अनुभव किया है।आश्रम के सत्संगका टीवी पर प्रसारण देखा, आज चित्रा जी आयी हैं, जिनके सुमधुर भजन सुनकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।  



Wednesday, February 17, 2021

छोटी दीवाली

 

कल का पूरा दिन घर को व्यवस्थित करने में ही निकल गया। मेहमानों का कमरा अभी भी  शेष है। आज आखिरी कार्टन भी खोल दिए। योग कक्ष में किताबें लगा दी हैं, कमरा अच्छा लग रहा है। अब शाम को यहाँ बैठकर स्वाध्याय व साधना दोनों किए जा सकते हैं। आज सुबह सिट आउट यानि शयनकक्ष के बाहर बड़ी बालकनी या बरामदे में आसन किए। चार-पाँच दिनों के बाद दीवाली है, इस नए घर में उनकी पहली दीवाली ! नन्हा कुछ लोगों को बुलाने वाला है। आजकल यहाँ शाम होते ही काले बादल छा जाते हैं और मूसलाधार वर्षा आरंभ हो जाती है। इस समय सिर में हल्का दर्द हो रहा है, नया शहर, नई दिनचर्या एडजस्ट होते-होते कुछ समय तो लगेगा। 


आज सुबह पाँच बजे से कुछ पहले ही उठे। एक नए इलाके की तरफ टहलने गए। पार्क नंबर छह व सात देखा। पूरे नापा में चौदह पार्क हैं, सभी सुंदर हैं। एक-एक करके वे सभी में जाएंगे और सुंदर तस्वीरें उतारेंगे। इस समय उसकी आँखें अश्रुओं से भरी हैं, पता नहीं कौन सी पीड़ा है, क्या दुख है, साथ ही एक मुस्कुराहट भी रह-रह कर आ रही है अधरों पर, कौन है जो यह क्रीड़ा कर रहा है ? सुबह टहलने गई तो दोनों पैर जैसे  अकड़े हुए थे, चलने में श्रम प्रतीत हो रहा था, गति भी कम हो गई थी। वापस आकर योगासन किए। नन्हा व सोनू उठ गए थे। हरसिंगार के फूल चुने। जून इडली का नाश्ता  ले आए। नौ बजे वे बच्चों को उनके घर छोड़ते हुए डेन्टिस्ट के पास गए। बाएं गाल में अंतिम दांत पर मसूढ़ा चढ़ गया था, उसने थोड़ी सी सर्जरी की, टांके लगाए। अगले हफ्ते फिर जाना है। दोपहर का भोजन सोनू ने अच्छी तरह से मेज पर लगाया था। आज सुबह असम से नैनी ने फोन किया, एक-एक करके घर के सभी सदस्यों ने बात की। उसके ससुर की तबीयत ठीक नहीं है।  दो दिन बाद दीवाली है, कल बिजली की लड़ी लगाने इलेक्ट्रिशियन आएगा। शाम को टहलते समय जून को पैरों की जकड़न के बारे में बताया तो उन्होंने कहा यह मन की उदासी के कारण है, और कोई बात  नहीं, कोई इंसान दूसरे की पीड़ा का अनुभव कैसे कर सकता है ? हर कोई स्वयं से ही पूरा भरा होता है ! परमात्मा सब जानता है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है, कोई कर्म उदय हुआ है। 


आज दोपहर से ही बाहर बिजली की झालर आदि लगाने का काम चल रहा है। कल छोटी दीवाली है, सोनू की चचेरी बहन व भाई-भाभी आए हैं, वे लोग भी परसों आएंगे। नन्हे ने पार्टी की पूरी तैयारी कर ली है। भोजन बाहर से ही बनकर आएगा, पूरी व रोटी यहाँ बनेगी।सुबह भी पैरों में जकड़न महसूस हो रही थी। शायद हार्मोन्स की समस्या हो, जरूरत से ज्यादा भावुक होना और जल्दी थकान होना इसके लक्षण हैं। जून ने आज पैरों व हाथों में तेल लगाया, उनमें सेवा भाव बहुत है पर उसे जगाना पड़ता है, वरना उन्हें उसकी बात सुनने की भी फुरसत नहीं रहती कभी-कभी। 


वे धीरे-धीरे नए घर में रहने के अभ्यस्त हो रहे हैं। लगभग रोज शाम को भोजन के बाद सोसाइटी में स्थित छोटे से सुपर मार्केट जाकर एक-दो जरूरी समान ले आते हैं। एक महिला उसे चलाती हैं, हिंदी बोल लेती हैं। शाम को टहलने गए तो तेज वर्षा होने लगी, दस मिनट का ही रास्ता था पर घर आते-आते काफी भीग गए, आकर देखा, एक व्यक्ति उनके गैरेज में बारिश से बचने के लिए खड़े हैं। जून ने कुछ देर उनसे बात की, कह रहे थे तीन करोड़ में आपका घर बिक सकता है। आज सुबह सूर्योदय देखते हुए छत पर योगाभ्यास किया। अंग्रेजी अखबार के साथ हिंदी का एक अखबार राजस्थान पत्रिका भी लेना शुरू किया है, कुछ देर पढ़ा। दोपहर बाद डाइनिंग हॉल में बिजली की दो लड़ियाँ लगाईं। शाम को ग्यारह दीपक जलाए, कल्याण के पर्व अंक में दीपावली उत्सव के बारे में  विस्तृत जानकारी पढ़ी। इस बार पूजा का समान नहीं ला पाये हैं अभी तक। रंगोली के लिए रंग भी नहीं हैं। यहाँ वे बाजार से काफी दूर हैं। उत्तर भारत में जिस उत्साह से दीवाली मनाते हैं वैसा यहाँ नहीं है। आज सुबह वे पड़ोसियों को शाम के भोज के लिए निमंत्रित करने गए। उनके पुत्र सैकड़ों के पटाखे जलाता है ऐसा उन्होंने बताया। 


उस पुरानी डायरी के पन्ने पर उसने कहीं से एक सूक्ति लिखी थी, “स्वप्न से भागना नहीं, जागना है। स्वप्न में भागकर भी तो स्वप्न में ही रहेंगे; किन्तु स्वप्न से जागकर स्वप्न ही नहीं रह जाएगा। आज लगता है, जीवन भी तो एक स्वप्न ही है जो वे देखे ही जा रहे हैं, जाग कर पुन: सोने का अभिनय करते हुए। 


Wednesday, February 10, 2021

नया घर

 

दोपहर  के सवा बारह बजे हैं. मौसम आज गर्म है, बाहर तेज धूप निकली है. गेस्टहाउस के इस वीआईपी सूट में एसी चलने से गर्मी का अहसास नहीं हो रहा है. आज यहाँ अंतिम दिन है, शाम को एक बार घर जाना है, माली से कुछ पौधों की कटिंग्स लेनी है. आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर से मिलना है और आठ बजे विदाई पार्टी के लिए क्लब जाना है. जून के सारे काम हो गये हैं, आज सुबह वे एडमिन डिपार्टमेंट गए थे. उसके पहले मागुरी बील से लौटकर नाश्ता किया. सुबह चार बजे से पहले ही उठ गए थे, पौने पांच बजे ही ड्राइवर आ गया था. आकाश पूर्व दिशा में लाल था, पर थोड़ी ही दूर जाने पर कोहरा छा गया और सूरज छिप गया. काफी देर बाद जब तिनसुकिया आने ही वाला था, कोहरा छंटा, सूरज तब तक ऊपर चढ़ आया था. टूरिस्ट कैम्प में पहुंचने पर गाइड मिला जो लकड़ी की नाव में एक नाविक को लेकर चला. दो प्लास्टिक की कुर्सियां उसने रखवा दी थीं. पिछले वर्ष फरवरी के महीने में में वे वहां गए थे, तो अनेक पक्षियों को देखा था.  आज ज्यादातर स्थानीय पक्षी ही दिखे, दिसम्बर से प्रवासी पक्षी आना आरम्भ कर देते हैं. कमल के अनेकों फूल वहां खिले थे, श्वेत व लाल कमल दोनों ही थे. छोटे और बड़े कई पक्षियों जैसे किंगफिशर, वैगटेल बर्ड, ओपन बीक बर्ड आदि की तस्वीरें उतारीं. कितनी तरह की छोटी बड़ी मछलियां और बत्तखें भी यहाँ हैं. एक सुखद अनुभव था यह. 


शाम के पौने सात बजे हैं, वे नए घर में हैं. उनकी जरूरत का हर सामान यहाँ है और जरूरत से ज्यादा भी ! कल सुबह साढ़े पांच बजे गेस्टहाउस से वे रवाना हुए थे और शाम को साढ़े आठ बजे के बाद ही नन्हे के घर पहुंचे. वे दोनों उन्हें लेने जब तक पहुँचते, वे पांचवी मंजिल तक आ गए थे. भोजन के बाद नीचे टहलने गए, हवा ठंडी थी पर भली लग रही थी. सुबह भी नीचे स्पोर्ट्स कोर्ट में बैठकर प्राणायाम किया. भीतर का गुरू या परमात्मा स्वयं पढ़ाने आता है. जिन श्वासों में उसे स्मरण नहीं  करते, चंदन की लकड़ी का हम कोयला बना लेते हैं और गंगाजल को नाले में  बहा देते हैं. जो सुगन्ध बनकर भीतर विद्यमान है उसे दुर्गंध बनाने की कला भी जगत सिखा देता है. सुख का सागर भीतर लहरा रहा है पर उन्हें तपती रेत पर चलना भाता है. जीवन जो प्रतिपल दिए जा रहा है, उसे न देख उन्हें मांगने से ही फुर्सत नहीं है. हर इच्छा उन्हें अपने स्वरूप से नीचे गिरा देती है. जीवन का यह मर्म सद्गुरु के सिवा कौन बता सकता है. अभी तो ट्रक आना शेष है, जिसमें मुख्यतः किताबें हैं और कुछ क्राकरी, शेष कपड़ों के कार्टन्स हैं. अभी तक तो ऐसा लग रहा है जैसे वे यहां  घूमने आये हैं. वैसे भी आज वापस जाना है, परसों से यहाँ रहना आरम्भ करेंगे. 


पिछले दो दिन नए घर को व्यवस्थित करने में कैसे निकल गए पता ही नहीं चला. कल दोपहर ट्रक आ गया था, शाम तक काफी सामान खोल लिया था. नन्हे का एक मित्र व उसकी पत्नी भी आये थे. पुलाव बनाया, सफेद डाइनिंग टेबल पर, नए डिनर नए सेट में, नए कुकर में बने पुलाव का स्वाद विशेष लग रहा था. इस समय  रात्रि के सवा नौ होने को हैं. बाहर वर्षा होकर थम चुकी है. वे कुछ देर टहल कर लौटे हैं. कितने नए वृक्ष देखे और अन्य घर भी. कुछ लोगों ने बगीचे के चारों ओर बाड़ लगायी है, वे भी लॉन को दो तरफ से घेरने की सोच रहे हैं. खिड़कियों पर छज्जे भी लगवाने होंगे. आज बेडरूम की खिड़की खुली रह गयी थी, पानी भीतर आ गया. खिड़की के आगे एक बैठने का स्थान है, जिस पर कुशन लगा है, यहां बैठकर पढ़ने-लिखने का अपना ही आनंद है. बाहर कंचन का पेड़ है और हरसिंगार का भी, जो अभी खिड़की तक नहीं पहुँचा है. आज सुबह उसके ढेर सारे फूल उठाये और सुगन्धित श्वेत फूलों की एक माला भी मालिन दे गयी, जून ने उससे कहा है रोज दे जाये. अभी किताबों के बॉक्स खोलने शेष हैं. अगले एक हफ्ते में सभी कुछ व्यवस्थित हो जायेगा. 


Sunday, July 28, 2019

होली की गुजिया



कल दिन भर में केवल एक कविता की आठ पंक्तियाँ लिखीं, अब आगे की पंक्तियाँ कब बनेंगी, बनेंगी भी या नहीं, कौन जानता है. आज शनिवार है, साप्ताहिक सफाई का दिन और कल सुबह वे घूमने जाने वाले हैं, सो कल की जगह आज ही इतवार का विशेष स्नान भी. सुबह टहलने गये तो कोहरा भी था, जैकेट में भी ठंड महसूस हो रही थी. नन्हे से बात की, सोनू का गला ठीक नहीं है. नये घर के लिए उसने कुछ लोगों से बात की, कुछ घरों में किचन का काम भी देखा, काफ़ी जानकारी है उसे और समय भी दे रहा है, उनका घर बहुत सुंदर बनने वाला है. कल जून दोपहर को घर आ गये, मौसम दिन भर ठंडा ही रहा, एक योग साधिका के लिए कविता लिखी, जो वह बहुत दिनों से फरमाइश कर रही थी. एक सदस्या ने कहा, उन्होंने भी उसके लिए एक कविता लिखी है, जो अभी पूरी नहीं हुई है. आज दोपहर जून की एक सहकर्मी की बिटिया के पहले जन्मदिन की पार्टी में उन्हें जाना है.

आज दिन भर बदली बनी रही. मौसम कल और ठंडा होने वाला है, होली पर भी वर्षा का अनुमान है. आज सुबह एक आश्चर्यचकित कर देने वाली घटना हुई. स्कूल से लौटी तो नैनी ने स्वर्ण का कान का बुंदा दिया, जो रसोईघर में गिरा हुआ उसे मिला था, पर पीछे की ठीपी नहीं मिली, उसका हाथ कान पर गया, ठीपी वहीं थी. खराब रास्तों पर कार से दो बार की यात्रा में, बच्चों को व्यायाम और आसन कराने में किसी भी समय वह गिर सकती थी पर जाने किस शक्ति से वह गुरुत्वाकर्षण के सारे नियमों को तोडती हुई अपने स्थान पर बनी रही, जैसे किसी ने अदृश्य हाथ लगाकर थामे रखा हो. एक और बात हुई भोजन करते समय दायीं तरफ का ऊपरवाला एक दांत टूट गया, बाद में देखा तो वह दांत पर लगी कैप थी, जो कई वर्ष पहले लगवायी थी. कल डेंटिस्ट के पास जाना है. कल ही दोपहर को गुजिया भी बनानी है और शाम को एक सखी की विदाई पार्टी में जाना है. कल दो योग कक्षाएं भी लेनी हैं. ईश्वर ही इन सब कार्यों को करने की शक्ति प्रदान करेंगे. आज स्कूल में जो भी बच्चों को कराया और बताया, जैसे कोई और ही भीतर से प्रेषित कर रहा था. स्कूल जाते समय ष अध्यापिका ने अपने चाचा के देहांत का समाचार बताया, जिन्होंने नब्बे वर्ष के अपने बड़े भाई को अपना उत्तराधिकारी बना दिया है. उन्हें कुछ समय पूर्व ही अस्पताल से लाये थे, वह ठीक हो रहे थे. श्रीदेवी की मृत्यु के कारणों पर भी अटकलें बढ़ती जा रही हैं, उसकी मृत्यु पानी में डूबने से हुई. जीवन छोटा हो या बड़ा, अर्थपूर्ण होना चाहिए, उसने अपने जीवन में जो हासिल किया, कम ही लोग कर पाते हैं. समय और लहर किसी का इंतजार नहीं करते, यह वाक्य इस डायरी के पन्ने पर नीचे लिखा है, कितना सटीक है यह वाक्य. समय गुजरता ही जाता है अपनी गति से. कुछ देर पहले सोनू से बात की, उसका बुखार अभी उतरा नहीं है.

सुबह टहलने गये तो कोहरा घना था, धुंधला-धुंधला सा सब कुछ.. जैसे किसी स्वप्नलोक का दृश्य हो. वापस आकर साधना की. कल जो दांत निकल गया था, उसके कारण दायीं तरफ से कुछ भी खाने में दिक्कत हो रही है. आज पूरा दिन व्यस्तता में बीतने वाला है.
दो दिनों का अन्तराल ! आज सुबह से ही वर्षा हो रही है. अच्छा ही हुआ कि होली का उत्सव उन्होंने कल ही मना लिया. सुबह जून दफ्तर जा रहे थे कि मंझले भाई का फोन आया, उसने जून के एक पुराने सहकर्मी से बिटिया के पीजी में रहने की बात की है. दूधवाला, सफाई कर्मचारी, धोबी, नैनी, माली-मालिन, ड्राइवर सभी को गुजियाँ दे दी हैं, शाम को योग साधिकाओं को भी खिलानी हैं. कल शाम को एक परिवार को बुलाया था, होली का विशेष भोज अच्छा रहा. सभी के साथ संबंध अब सहज और प्रेमपूर्ण हो गये हैं, अब कोई पुराना संस्कार नहीं रहा, परमात्मा की कृपा से मन खाली है और कल दोपहर जून भी अपनी नाराजगी ज्यादा देर तक नहीं रख सके. उसकी सकारात्मकता ने  अवश्य उन्हें छुआ होगा. उनके भीतर माँ का दिल है. उसे भूख लगी है यह सुनते ही कितनी सारी वस्तुएं ले आये. सुबह उन्होंने मिलकर दही-बड़े बनाये, बहुत ही अच्छे बने हैं. उन्हें भी शाम के विशेष भोज में परोसेंगे. कल दोपहर बाद मृणाल ज्योति में मीटिंग है. वहाँ ले जाने के लिए भी मिठाई का डिब्बा पड़ा है, जो सोनू के पिताजी लाये थे. देने की इच्छा हो तो सब सामान उपस्थित हो जाता है.



Tuesday, June 11, 2019

पिटुनिया के फूल



आज बड़े भाई से बात हुई, बुआ व मामी जी से भी. सबको विवाह के लिए निमन्त्रण दिया. फुफेरे भाई ने कहा, वह कार्यक्रम बनाकर बतायेगा. मंझली भाभी से बात की, वह बेटी को लेकर परेशान हैं. आज से मात्र एक महीना शेष है विवाह के दिन में. आज भी वे कार्ड्स बांटने जायेंगे. परसों मुख्य अधिकारी के यहाँ से शुरुआत की. उसके बाद छह घरों में गये. पटवारी, पॉल, फूकन, बनर्जी, एक तमिल परिवार, और शर्मा परिवार में. कल भी पांच मित्रों के यहाँ गये, मराठी, बंगाली, मारवाड़ी, दो असमिया, व ब्राह्मण परिवार में, एक तरह से यहाँ पूरा भारत बसता है. हर प्रदेश के लोग यहाँ रहते हैं. सभी ने दीवाली की मिठाई खिलाई. एक परिवार में उनकी बेटी से मिले जिसने कानून में पढ़ाई पूरी कर ली है और अब एक लॉ कालेज में पढ़ाने जा रही है. सभी के घर सुसज्जित थे. सबसे सुंदर थे दो बंगाली सखियों के घर. उनके घरों की सज्जा देखने लायक थी. सुंदर फर्नीचर तथा सुंदर बगीचे रहने वालों के कलात्मक मिजाज की खबर दे रहे थे. अगले वर्ष उनमें से एक के पति रिटायर हो रहे हैं, तथा दो अन्य के इसी वर्ष. उनके लिए विवाह से लौटने के बाद कुछ लिखेगी.

दस बजने को हैं, आज भोजन पहले ही बना लिया है ताकि आराम से एक घंटा बैठकर लेखन कार्य किया जा सके. कल शाम भी वे कालोनी के दस परिवारों के यहाँ कार्ड्स देने गये. एक का घर बंद था. आज शाम को भी जाना है.

आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, इस बार बंगलूरू में उसके साथ रहने का अवसर मिला. मिलनसार है, काम में हाथ बंटता है. सीधा-सरल स्वभाव है उसका. भगवान उसे शक्ति और ज्ञान का वरदान दे ! जून का स्वास्थ्य ठीक नहीं है पर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण वह किसी समस्या को खुद पर हावी नहीं होने देते हैं. आज शाम को अपने दफ्तर में काम करने वाली एक कर्मचारी को बुलाया है. जो कुछ परेशान है, घर से दूर अकेले रहती है, अपने शहर में तबादला करवाना चाहती है. उसे समझना और समझाना है. कल शाम भी वे कुछ मित्रों के घरों में कार्ड्स देने गये, अच्छा लग रहा है. एकाध दिन और जाना होगा. शाम को बहुत दिनों बाद बेक्ड सब्जी बनाने वाली है. आज से एलोवेरा जूस बनाना भी आरंभ करना है. इस वर्ष आंवले काफी हुए हैं बगीचे में. कुछ महीने चलेंगे.

कल कुछ नहीं लिखा और आज इस समय शाम के पांच बजे हैं, जून गोहाटी गये हैं, परसों लौटेंगे. आजकल उसे न ही फोटोग्राफी का शौक रहा है, न ही व्हाट्स एप पर संदेश भेजने का, न ही लोगों से बात करने का. वैराग्य बढ़ रहा है, सब कुछ व्यर्थ प्रतीत होता है. आज सुबह जून की बात का जवाब भी ठीक से नहीं दिया. माली को भी उसकी गलती के लिए सुनाया. हर बार वह वही गलती करता है. कल रात भी नींद ठीक नहीं आई, परसों भी. शायद देर तक जगने के कारण ही, समय से सो जाना ही उचित है. नींद पूरी न होने पर ऐसे लक्षण होने स्वाभाविक हैं. आज दोपहर को बारह-तेरह बच्चे ही आये. कल स्कूल जाना है और नर्सरी भी, जहाँ से फूलों की पौध लानी है. 

तीन बजने को हैं, यानि योग कक्षा का समय. अभी-अभी वर्षा शुरू हो गयी है. महिलाओं की संख्या कम हो सकती है. आज नर्सरी गयी थी. छह गमले खरीदे और कैलेंडुला, पिटुनिया, डहेलिया, सिल्विया और इंका की पौध. सर्दियों में फूलों से भर जायेगा बगीचा..अभी तक तो बरसात का मौसम ही चल रहा है. मृणाल ज्योति से फोन आया, बौद्धिक अक्षमता पर योग, संगीत या व्यायाम का कितना और क्या असर पड़ता है, इस पर कुछ लिखने को कहा है. उसने इसके बारे में नेट पर पढ़ा. दुनिया में बहुत जगह लोग ऐसे व्यक्तियों और बच्चों को योग सिखा रहे हैं. कल शाम को 'सीता' पुस्तक से प्रेरित होकर नन्हे और सोनू के लिए कविता लिखनी आरंभ की है. आज उसे आगे बढ़ाना है.  


Tuesday, August 28, 2018

दफ्ती का घर



शाम होने को है. टीवी पर केन्द्रीय मंत्री बता रहे हैं कि उत्तर-पूर्व भारत के विकास और सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार क्या काम कर रही है, इसको बताने के लिए एक पुस्तिका का प्रकाशन भी हुआ है. पिछले दिनों यहाँ काफी ‘बंद’ हुए और तेल कम्पनी को भी इसके कारण काफी खामियाजा भुगतना पड़ा है. जून अभी आने वाले हैं, शाम को उन्हें बंगाली सखी के यहाँ जाना है, चाय पर बुलाया है. कल शाम को एक अन्य सखी ने रात्रि भोज पर बुलाया है. ‘नजर बदली तो नजारे बदले’, कितनी सही कहावत है यह. किसी के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलते ही सामने वाला भी बदला सा नजर आने लगता है. यदि पहले कभी मित्रता रही हो तो वही पहले वाला प्रेम भरा. किसी के प्रति कभी भी कोई विपरीत भाव न जगे, क्योंकि एक का ही विस्तार है सब. एक के प्रति भीतर प्रेम जगे तो सबके प्रति उसकी खुशबू फ़ैल ही जाती है और उसमें प्रेम देने वाला स्वयं भी शामिल होता है. जगत के साथ उनका व्यवहार खुद के साथ के व्यवहार को ही झलकाता है. जब भी जगत के प्रति उनके मन में कोई भी निंदा का भाव जगता है, वे हर बार स्वयं को ही पीड़ित कर रहे होते हैं. भीतर की शाश्वतता का अनुभव जिसे हो जाये फिर वह बदलने वाले इस जगत को नहीं देखता, उसके पीछे छिपे अबदल ही देखता है, जो बदल ही रहा है, उसकी चिंता कब तक और क्यों ? जो अबदल है उससे ध्यान हटते ही पीड़ा व दुःख का संसार आरम्भ हो जाता है. उनके भीतर ही है शांति का वह परमधाम जहाँ अनंत सुख का साम्राज्य है !

नन्हे ने आज अपनी कम्पनी व कार्य के विषय में बहुत कुछ बताया. अगले कुछ वर्षों में वे अधिक लाभ प्राप्त करेंगे, अभी तो वे पैसा लगा रहे हैं, जो इन्वेस्टर ने लगाया है. वह अपने काम से संतुष्ट लगता है. सुबह उसकी मित्र से फोन पर बात हुई, वह इसी माह नन्हे को अपने पिता से मिलाएगी. वह कह रही थी कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे जरा भी अंदाजा नहीं है. चार बजने को हैं शाम के. अभी कुछ देर पूर्व अस्पताल से लौटी. आँख का दबाव सामान्य है. दस दिन बाद फिर जाना है. आंख के आगे एक काला घेरा सा दिखाई देता है. उसकी वजह से और कोई समस्या तो नहीं है फ़िलहाल. नन्हे ने पूसी के लिए दफ्ती का एक घर बना दिया है, पर वह उसमें कम ही टिकती है. कल ही वह वापस जा रहा है.

सुबह से लगातर वर्षा हो रही है. अभी-अभी धोबी आकर धुले सूखे कपड़े दे गया, ऐसे मौसम में भी वह अपना कर्त्तव्य पूरी तरह निभाता है, पुत्र की पढ़ाई को लेकर चिंतित है. उसे बीए के बाद एमए कराना है, क्या उसके बाद सरकारी नौकरी मिल जाएगी, क्या पढ़ाई कर लेने मात्र से ही मिल जाएगी ? ये उसके प्रश्न थे. नन्हे ने कहा, प्राइवेट नौकरी ही ढूँढनी पड़ेगी. आज लाओत्से पर ओशो के वचन सुने. अद्भुत वचन हैं उसके, ज्ञान जितना-जितना बढ़ेगा, पाखंड भी बढ़ेगा, होशियारी बढ़ेगी तो चालाकी भी बढ़ेगी. जब तक कोई द्वन्द्वों के पार नहीं चला जाता, उनसे मुक्त नहीं हो सकता. अच्छे बने रहने का आग्रह बुरे से पीछा छुड़ाने नहीं देता. आत्मा में रहकर मन के सारे द्वंद्व स्पष्ट दिखने लगते हैं. शिवानी भी कहती है, सतयुग में ज्ञान की, पूजा की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी क्योंकि अज्ञान ही नहीं होगा. स्वभाव में टिकना आ जाये किसी को तो वह सुख-दुःख दोनों के पार निकल जाता है.    

Thursday, May 24, 2018

देव दत्त पटनायक की माय गीता



ग्यारह बजे हैं सुबह के. जून नये घर में हैं. काम शुरू हो गया है. मिस्त्री, प्लम्बर, बढ़ई सभी आ गये हैं. अभी कुछ देर पहले बड़ी भतीजी के लिए एक कविता लिखी. बंगाली सखी के लिए भी लिखनी है, उसके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, नये घर की बधाई दी है. एक सखी ने अपनी भतीजी के विवाह का कार्ड भेजा है.

परसों उन्हें वापस जाना है. दो दिन में घर काफी साफ हो जायेगा. जून आज भी वहीं गये हैं. नन्हा व उसके मित्र दफ्तर चले गये हैं. नन्हा कल रात देर से आया, फिर भी देर से सोया और अब उठकर चला गया है. उसकी दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं है, पर उसका काम ही ऐसा है. मानव मन व तन की सहनशक्ति अपार है. उसे परमात्मा ही शक्ति से भरता है. हर कोई अपने कर्मों के अनुसार ही पाता है तथा जीवन निर्वाह करता है. वहाँ असम में योग कक्षा सुचारुरूप से चल रही है. अब भविष्य में कभी भी उसे कहीं जाना हुआ तो मन में यह खेद नहीं रहेग कि साधिकाओं को कोई परेशानी होगी. यहाँ जो शिवकुमारी नाम की मेड आती है उसे अपने निर्धारित काम के अलावा कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती. इसी तरह लोग अपने को सीमित कर लेते हैं. असीम परमात्मा ही सीमित जीव बनकर देह में कैद हो गया है. मुक्तता का अनुभव इसी मानव देह में हो सकता है, पर मानव इतनी गहरी नींद सोया है कि उसे इस सत्य की कोई खबर ही नहीं लग पाती.

कल वे घर लौट आये हैं. इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं. मौसम बादलों भरा है. कल रात भर वर्षा हुई. बगीचा फूलों से भर गया है. डहेलिया, सिल्विया, एन्थ्रेनियम, कैलेंडुला, और भी जाने कितने फूल..एक हफ्ते में काफी परिवर्तन आ गया है मौसम में, अब बसंत पूरे निखार पर है, कंचन के विशाल वृक्षों में भी गुलाबी और श्वेत फूल दिख रहे हैं. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को योग की कुछ क्रियाएं करवायीं. छोटी बहन से स्काइप पर बात हुई. बड़े भाई को घर में पूजा करवानी है, समय कितनी तेजी से बीत जाता है. भाभी को गये दस महीने हो गये हैं. पिताजी से भी बात हुई, वे अकेले हैं, भाभी मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. भाई कल शाम को घर आ रहा है. उसने इस बार देवदत्त पटनायक की पुस्तक, ‘माइ गीता’ खरीदी एअरपोर्ट से. जून ने कहा, फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक आधे दाम में मिल रही है. पर फ्लाइट में पढ़ने का जो आनंद है, वह नहीं मिलता, फिर भी आगे से ध्यान रखना है. किताबें उसकी सबसे बड़ी मित्र हैं, ज्ञान की देवी सरस्वती इनमें ही तो बसती है !

Monday, February 26, 2018

बड़ा सा कार्पेट



शाम के छह बजने को हैं. वे सवा तीन बजे ही घर पहुंच गये थे. आते ही सफाई का कार्य आरम्भ करवाया, काफी साफ हो गया है घर, शेष कल होगा या कहे, कल से होगा. पिछले सात दिन पलक झपकते गुजर गये, अच्छा लगा नन्हे का नया घर. उसके सभी मित्रगण मिलजुल कर रहते हैं. घर को साफ रखने का भरसक प्रयत्न करते हैं और खुश रहते हैं. वे नन्हे की नयी मित्र से भी मिले. पता नहीं कब तक निभेगा यह रिश्ता, वे खुद भी नहीं जानते. आज की पीढ़ी कई मायनों में जिन्दगी को ज्यादा गहराई से जी रही है. वे खतरा उठाने को तैयार हैं. बंधन उन्हें पसंद नहीं, पता नहीं जीने का यह तरीका कितना सही है. अभी-अभी उसने उनके लिए एक कविता लिखी, नन्हे को भेजी. इस यात्रा में उसने कई किताबें भी खरीदीं. तीन इस्कॉन से तथा दो एयरपोर्ट से.

आज एक पुरानी सखी का फोन आया, वे लोग चार-पाँच वर्ष पहले यहाँ से चले गये थे. नन्हे का फोन भी आया, उसने कहा कविता उसे अच्छी लगी. जून का काम आजकल बढ़ गया है. शाम का नाश्ता ( कुछ फल) साथ ले गये हैं. दोपहर को वह बाजार गयी, एक सखी के लिए क्लब की ओर से दिया जाने वाला उपहार खरीदा. एक सुंदर सी असमिया साड़ी, उसे अवश्य पसंद आएगी. कल ही विदाई समारोह है, वह बगीचे से फूल तोड़कर उसके लिए एक गुलदस्ता भी बनाएगी. उसके लिए एक कविता भी लिखी थी, जून उसे एक कार्ड में प्रिंट करके लायेंगे. कल मीटिंग के अंत में उसे धन्यवाद ज्ञापन भी करना है. सोचती है पहले से ही प्रिंट कर लेगी. उसने क्लब में योग साधना के लिए एक नया प्रोजेक्ट आरम्भ करने की योजना बनाई है. प्रेसिडेंट भी राजी हैं. दो दिन बाद ईद का अवकाश है वह उसी दिन जाकर बड़ा सा कार्पेट खरीदेगी. अगले महीने दो अक्तूबर को प्रोजेक्ट का शुभारम्भ होगा. पूजा का उत्सव भी आने वाला है, उन्हें घर व बगीचे में सहयोग देने वालों तथा उनके परिवार के लिए उपहार खरीदने हैं, दूधवाला, धोबी और ड्राइवर भी उनमें शामिल हैं.
 
दो दिनों का अन्तराल, परसों जून गोहाटी गये थे. आज का दिन घटनापूर्ण रहा, सुबह उठने से पूर्व भीतर अक्षर देखे, अ, आ,....ज्ञ. पश्यन्ति इसे ही कहते हैं शायद. सुबह मृणाल ज्योति जाना था और दोपहर को एक और सदस्या के लिए उपहार लेने बाजार. दोपहर को लेखन कार्य. शाम को क्लब के काम से एक सदस्या के घर जाना था, वहाँ से क्लब. लौटकर देर हो गयी थी, सो रात्रि भोजन में दिन के बचे मूली के साग का परांठा ही खाया. जून कल आ रहे हैं. कल शाम से फिर दिनचर्या नियमित हो जाएगी. आज उनका फोटो अख़बार में छपा, गोहाटी में जो कांफ्रेस हुई थी उसी सिलसिले में. सभी ने बधाई दी.

सितम्बर का अंतिम दिन ! सुबह एक सखी का फोन आया, उन्हें क्लब में एक कार्यक्रम का आयोजन करना है जिसमें विभिन्न स्थानीय फैशन डिजाइनर तथा महिला दुकानदार अपने वस्त्रों के स्टाल लगायेंगे. बड़े हॉल में लगभग बीस मेजें लगवानी हैं और वस्त्र टांगने के लिए स्टैंड आदि लगवाने हैं. इसका विज्ञापन भी देना है. परसों से योग कक्षा की शुरूआत भी करनी है. अभी-अभी एक निमन्त्रण संदेश लिखा है उसने, जो व्हाट्सएप के जरिये सभी को भेजना है. उसने सोचा एक बार सेक्रेटरी को दिखा लेना ठीक रहेगा. परसों के लिए कुछ सामान भी खरीदना होगा. प्रसाद के लिए मूंग साबुत दाल, काबुली व काले चने, एक नारियल, एक दीपक, अगरबत्ती और कागज की प्लेट्स. कुछ फूल भी ले जाने हैं. 

Monday, June 5, 2017

आंवले की डाल


छोटे भाई का फोन आया था परसों रात सोने से पूर्व, छोटी बुआजी जो दो वर्ष पूर्व घर से चली गयीं थीं, उनकी खबर मिल गयी है. वह बंगलूरू स्टेशन पर थीं, जब पुलिस द्वारा टाइम्स ग्रुप के करुणा ट्रस्ट में पहुंचायी गयीं और वहाँ उनका मानसिक इलाज होता रहा. जब उन्हें अपने घर की याद आयी तो वहाँ के लोगों ने लखनऊ पुलिस से सम्पर्क किया और आज सुबह वे घर आ गयीं. उनका पुत्र उन्हें लेने गया था, वह जहाँ नौकरी करती थीं उस दफ्तर के लोगों ने  सहायता की. नन्हे ने उनसे बात की पर मिलने नहीं जा सका. कल सुबह उसने हिटलर की आत्मकथा पढनी शुरू की है, अभी तो रोचक लग रही है, देखे, क्या मनोदशा है उसकी, परमात्मा किससे क्या करवायेगा, कौन जानता है. हरेक को पूर्णता की ओर जाना है. जिस क्षण भी कोई अपूर्णता का अनुभव करता है वही क्षण उसे चुभन देता है. भूत में जिस क्षण उन्होंने अपूर्णता का अनुभव किया है, वे सारे क्षण उनके मन पर संचित हो गये हैं, उन सबका भार उठाए वे आगे बढ़ते हैं, बढ़ते क्या हैं, घिसटते हैं. उन्ह किसी से कुछ कहना था, पर कह नहीं पाए तो एक भार सिर पर बैठ गया. वे चाहें तो इसी क्षण में पूर्ण हो सकते हैं, हल्के और खाली, क्योंकि वे सारी घटनाएँ जैसी घटनी थीं, घट चुकी हैं. दीदी से बात की, वह भी यही कह रही थीं, एक ही चेतना  है सबमें जो विभिन्न नाम रूपों के द्वारा काम करवा रही है. वह परसों आस्ट्रेलिया जा रही हैं, अब शायद वहीं से अगली बात हो.

जून कल दोपहर गोहाटी चले गये. दोपहर को वह क्लब के काम से बाहर गयी और शाम को मीटिंग में, लौटने में पौने नौ बज गये थे. इसी माह क्लब की पत्रिका निकलेगी, उसके लिए एक नाम का चुनाव करना है. ऐसा नाम जो क्लब की सदस्याओं में जोश भी भरे और कुछ नया करने का जज्बा भी. बगीचे में आंवले के पेड़ की एक बड़ी डाल टूट कर गिर गयी थी कल रात की आंधी में, उसे साफ करवाया. आज फिर दीदी से स्काइप पर बात हुई, वह अभी देहली में हैं, बड़ी बेटी के यहाँ गयी थीं, उनकी दोहती को देखा, उसके लिए एक कविता भेजी, बहुत प्यारी है वह. जून परसों आ रहे हैं. नन्हे से पूछा उसने, कैमरे से वीडियो टीवी पर कैसे देख सकते हैं, उसने जो बताया वह काफी आसान था. उसे पिताजी का एक वीडियो एक सखी को दिखाना है. आज भी तेज वर्षा हो रही है. उसने भीगी-भीगी सी एक कविता लिखी, जो ब्लॉग पर डाल रही है. कल ईद है, वे सेवइयां बनायेंगे.   

जून आज वापस आ गये हैं, घर जैसे भर गया है. ढेर सारे फल, टिंडे, नींबू, सूखे मेवे, कुकीज और उसके लिए नये कंगन लाये हैं अपने साथ. नन्हे का एक सूटकेस यहाँ पड़ा था, जिसकी चाबी उसने खो दी थी. जिसे पिछले महीने खुलवाया था. उसके कालेज के फोटो, ग्रीटिंग कार्ड्स आदि उसमें पड़े हैं और कुछ चिठ्ठियाँ भी. हर व्यक्ति का अपना एक अतीत होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना कुछ छिपाए रहता है. उसने भी खुद को पहचाना है, कितना कुछ अनुभव किया है और आज जो भी है वह उन्हीं का परिणाम है. वह बहुत संवेदनशील है, बहुत स्नेह भरा है उसके भीतर पर साथ ही सबसे अलग भी, एक वैराग्य की भावना भी है. उसका जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ, बचपन में उसे जैसे संस्कार मिले, उसी के अनुसार ही तो वह बड़ा हुआ. वे स्वयं ही जब आवेगों के वशीभूत थे, अपना ही पता नहीं था तब उन्होंने उसे बड़ा किया. उसके दुःख उनके ही हैं. हर आत्मा अपनी यात्रा कर रही है. वह कुछ संस्कार अवश्य ही पूर्व जन्म के लाया होगा लेकिन वे उनके सजातीय होंगे तभी तो वह उनके जीवन में आया. अच्छा है कि अब वह सजग है, अब उसके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं है जो उन्हें ज्ञात नहीं है. 

Wednesday, May 24, 2017

बड़ा सा घर


नये घर में उनका तीसरा दिन है. परसों दोपहर बाद वे सभी सामान लेकर यहाँ आ गये थे. पिछले दस दिनों से यानि बुद्ध पूर्णिमा के दिन से उन्होंने शिफ्टिंग का काम शुरू किया. उसी दिन से डायरी के पन्ने कोरे हैं. पहले दिन पूजा का कमरा यानि योग का कमरा ठीक किया. दूसरे दिन किताबें लाये, तीसरे दिन पिताजी के कमरे का सामान. एक दिन छुट्टी की, फिर पांचवें, छठे, सातवें दिन अन्य सामान और अंत में आठवें दिन शेष सारा सामान. अभी तक घर में कुछ न कुछ काम निकल ही आ रहा है, कोई बाथरूम लीक हो रहा था, कोई ट्यूब लाइट काम नहीं कर रही थी. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. आश्चर्य है कि उन्हें एक बार भी वह घर याद नहीं आया, ऐसा लग रहा है जैसे वे इसी घर की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह उनके स्वप्नों का घर था, बाहर का लॉन इतना बड़ा है कि आराम से एक विवाह की पार्टी हो सकती है. उनके गमले जो वहाँ सिमटे सकुचाये से थे, यहाँ खिल के अपना वैभव दिखा पा रहे हैं, उनके साज-सज्जा के सामान यहाँ कितनी मुखरता से अपना सौन्दर्य प्रदर्शित कर रहे हैं. इतना बड़ा और इतना सुंदर घर उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव करा रहा है. इस घर में यह बाहर का बरामदा बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऊपर पंखा भी है, सामने ‘नाइन ओ क्लॉक’ के फूल खिले हैं. कुछ ही दिनों में सामने की लंबी क्यारी में लगे जीनिया के फूल खिल जायेंगे. पिताजी अभी तक अस्पताल में ही हैं, उनका स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा है, अब दोनों ननदों के आने की प्रतीक्षा है. लगभग दो हफ्तों बाद वे दोनों आ रही हैं, सम्भवतः उन्हें देखकर उनकी तबियत में कुछ सुधार आये.
कल शाम एक मित्र परिवार आया पहली बार इस घर में. नयी नैनी ने पहले दो गिलास शरबत बनाया फिर दो कप लाल चाय. रोज सुबह भी वह नींबू वाली ग्रीन चाय का एक कप लाती है उसके लिए. आज मौसम अच्छा है भीगा-भीगा सा, महादेव का अंतिम भाग आने वाला है. आज बहुत दिनों बाद वह विद्यार्थी आया अपनी नई साईकिल पर, आखिर वह समर्थ हुआ अपने आप कहीं जाने में. सुबह कितनी ठंडी थी, रात भर वर्षा होती रही. सुबह हरी घास पर टहलते हुए कई सारे स्नेल जीव बाहर किये, नन्हे पौधों को खा लेते हैं ये, आज बगीचे में मिट्टी डाली जा रही है. हेज के किनारे जमीन काफी नीची हो गयी थी. सद्गुरू कहते है, जीवन के अंत में यही पूछा जायेगा कितना ज्ञान प्राप्त किया और कितना प्रेम बांटा...उसके भीतर प्रेम का जो सहज स्रोत था वह आजकल शांत पड़ा है. प्रेम का स्वरूप बदल गया है, वह मौन में ही प्रवाहित होता है. दो महीने हो गये हैं उसे मृणाल ज्योति गये हुए, पिछले दिनों सेवा की भावना जैसे भीतर सिकुड़ गयी थी. पिताजी को इस हालत में देखकर भी कुछ न कर सकने का भाव अजीब सा है. विचित्र है मानव मन, अहंकार भी कितने-कितने रूपों में सम्मुख आता है. उसे कार की आवाज आयी, लगता है जून आ गये.
कल रात तेज वर्षा हुई, बगीचे में हेज के किनारे पानी भर गया है. इस समय धूप निकली है. जून अस्पताल गये हैं पिताजी के लिए दही और दाल के पानी का भोजन लेकर. आजकल उनका यही आहार है. मानव अपने अंतिम काल में कितना बेबस व निरीह हो जाता है, वे पूरी तरह से सोच और समझ तो रहे हैं पर बोल नहीं पाते. डाक्टरों की सहायता से उनके अंतिम समय को कुछ आरामदेह बनाया जा  सकता है, पर कष्ट से उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकते. कल शाम जून ने नन्हे से होने वाली दुल्हन के लिए चेन खरीदने के लिए कहा, उसे थोड़ा नहीं काफी अजीब लगा. उसे अपने मन पर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है, कब कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, उसे खुद भी पता नहीं चलता. यह मन नामकी वस्तु दुनिया में सबसे अजूबी है. आज सुबह की साधना में काफी देर मन टिक गया, कितना कुछ दिख रहा था, मन ही रूप धरकर आ रहा था, पर वह साक्षी बनकर देख रही थी. पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है, भविष्य नामकी कोई वस्तु होती भी है या सिर्फ कल्पना ही है, हर क्षण जो उनसे मिलता है, वह तो वर्तमान ही बनकर मिलता है. कल जो बीत गया वह भी और कल जो आएगा वह भी.   


Wednesday, February 8, 2017

पहाड़ी पर घर


कल रात को एक और स्वप्न..मन न जाने कितने गड्ढे, कितने गहरे तल छिपाए है और अवचेतन मन न जाने कितना व्यर्थ भी अपने में समाये है. वासना और कामना, लोभ और अहंकार सभी के बीज भीतर हैं ही..यहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर एक गहरा कुआँ समोए है और एक अनंत आकाश भी. वे जो अन्यों की तरफ ऊँगली उठाते हैं पहले अपने भीतर झाँक कर देखना चाहिए. एक मन जिसने जान लिया, सारे मन उसने जान लिए. यहाँ सभी एक ही कीचड़ से उपजे हैं और कमल बनने की सभी को छूट है. लोगों का आपस में मिलना अकारण नहीं है, न जाने कितने जन्मों में वे एक दूसरे के मान-अपमान का सुख-दुःख का कारण बने हैं. कितनी बार उन्होंने फूल भी उगाये हैं और कांटे भी. माँ की हालत बिगड़ती जा रही है, उनका मस्तिष्क अब साथ नहीं दे रहा है, पिताजी बहुत परेशान रहने लगे हैं.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. परसों सुबह एक सखी के यहाँ आयोजित धार्मिक उत्सव में भाग लेने वह मोरान गयी थी, शाम को लौटी, उसी दिन माँ बिस्तर से उठकर बाथरूम जाते समय चक्कर आने से गिर गयीं. उनके दाहिने कूल्हे में चोट लगी है. इस समय वह अस्पताल में हैं, जून और पापा भी उनके साथ हैं. बहुत दिनों बाद पूरे घर में वह अकेले ही है.

आज माँ का अस्पताल में दूसरा दिन है, न जाने कितने दिन, कितने हफ्ते या कितने महीने उन्हें अस्पताल में रहना होगा. जीवन की संध्या में यह दारुण दुःख उन्हें झेलना पड़ रहा है, कर्मों की ऐसी ही गति है. कल दिन भर उसका मन भी कुछ अस्त-व्यस्त सा रहा, कोई भी कार्य पूरे मन से नहीं कर पायी. आज सुबह से दिनचर्या नियमित हुई है. जून आज फील्ड गये हैं.

आज तीसरा दिन है. जून अभी कुछ देर में आने वाले हैं. अस्पताल में खाना ले जाना है. एक परिचिता  का फोन आया है, विश्व विकलांग दिवस पर उसे बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेना है. दो दिन बाद बाल दिवस है, शायद वह न जा पाए. सभी को फोन पर माँ के बारे में बताया. जीवन क्या मात्र मृत्यु की प्रतीक्षा है ? प्रतीक्षा जो केवल एक व्यक्ति ही नहीं करता, करते हैं उसके अपने भी (?) जून के एक मित्र की माँ पिछले पांच-छह महीनों से बिस्तर पर हैं. अब माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया है अगले दो-तीन महीनों के लिए, डाक्टर ने कहा है इतना समय तो हड्डी को जुड़ने में लगेगा. नूना खुद भी धीरे-धीरे बढती हुई उम्र का अनुभव देह के तौर पर करने लगी है. मन के तौर पर तो कोई स्वयं को बूढ़ा कभी महसूस नहीं करता. कहना कठिन है उम्र घटती है या बढ़ती है.

‘संडे स्कूल’ व ‘मृणाल ज्योति’ के बच्चों के साथ बालदिवस मनाया, जून कापी और पेंसिलें ले आए थे. मिठाई और केक भी. एक ही स्थिति में लेटे-लेटे माँ की परेशानी थोड़ा बढ़ गयी है. पिताजी का उत्साह पूर्ववत है, वह ज्यादातर समय अस्पताल में ही रहने लगे हैं. उसे अभी ‘विवेक चूड़ामणि’ का काव्यानुवाद आगे लिखना है. नवम्बर आधा बीत गया है, अभी तक सभी क्यारियों में फूल नहीं लगा पायी है. आज शाम को सत्संग है. उस सखी का फोन आया जो यहाँ से चली गयी है. काफी देर तक बात करती रही. वहाँ का जीवन यहाँ से बिलकुल अलग है. उनका घर एक पहाड़ी पर है, चढाई करके घर तक आना पड़ता है. पांचवीं मंजिल पर घर है और अभी तक लिफ्ट चलनी शुरू नहीं हुई है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते साँस फूल जाती है. बालकनी से सुंदर सूर्योदय दीखता है, ऊपर ठंड भी रहती है. नैनी दोपहर को एक ही बार आती है. कुछ काम खुद भी करने होते हैं. माँ को अस्पताल गये आज पूरा एक सप्ताह हो गया. ऐसे ही देखते-देखते समय बीत जायेगा और वह घर आ जाएँगी.

जून देहली गये हैं, नन्हा भी वहाँ किसी काम से आया था उससे भी मिले. एक सखी का फोन आया, उसने कहा माँ को ठीक से खाना चाहिए, उसे पता नहीं है किस स्थिति में वह हैं. उस दिन उसने अस्तित्त्व से उन्हें दुःख से मुक्त करने के लिए प्रार्थना की थी, उसे अभी तक पूरा होना बाकी है लेकिन यह दिखाकर ईश्वर उसके मन में वैराग्य दृढ़ कर रहे हैं, ओशो कहते हैं, जीवन के अनुभव ही काफी हैं किसी को वैरागी बनाने के लिए. सुबह से कई संतों के वचन सुने, अच्छा लगता है सुनना पर मनन् भी करना चाहिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है.

    

Friday, September 23, 2016

नई गाड़ी में सैर


तू ही रस्ता, तू ही मंजिल, तू ही राही है..!

कहाँ जा रहा यह मानवदल, किसे ढूँढ़ते होता बेकल
सुबह-सवेरे उठते ही क्यों, चिंता ने आ इनको घेरा
गगन, फूल, कलियां तो छोड़ो, पंछी सुर न सुनते देखा
कदम-कदम पर निशां हैं जिसके, ढूँढा करते जाकर मन्दिर
जिसके कारण हैं दुनिया में, ढूँढा करते हैं उसका घर
कैसे बेसुध दीवाने हैं, आग लगाते स्वयं ही मन में
कभी क्रोध की, कभी ईर्ष्या, अकुलाते सुंदर जीवन में
स्वयं जगाते तृष्णा, आशा, सुखी रहें करते अभिलाषा
सुख से ही तो बने स्वयं हैं, थमकर न सीखें यह भाषा
तन में एक आग जलती है, मन हारा चिन्तन कर करके
फिर भी रुकना न जानें, क्या पाना कुछ साबित करके
पीना और पिलाना सीखा, जीना न आया अब तक
चाहा जिसको सदा भुलाना, मन वह वश में किया न अब तक
तन के लिए सभी उपाय, दौड़, खुराक कभी जिम जाये
मन पाता विश्राम जहाँ, उस निज घर जाना न आये
तन पाता विश्राम नींद में, मन पाता आराम कहाँ
जाना जिसने भेद वह ज्ञानी, मिलते उसको राम यहाँ
नैन थके तो मुंद जाते हैं, श्रवण कहाँ सुनते निद्रा में
बैन हुए चुप अधर शांत हैं, मन फिर भी दौड़े निद्रा में
घर से निकले पहुंचे मंजिल, पैरों ने पाया विश्राम
मन की गति न थमती देखो, कैसे हो हमको आराम
तन के सेवक पांच इन्द्रियां, खुद के तीन सिपाही सच्चे
मन, बुद्धि व अहंकार के, आगे होते अनगिन बच्चे
स्वयं की महिमा स्वयं ही जाने, सेवक न बखान कर पाए
स्वयं में टिक जाये पल भर तो, तीनों को तुष्टि मिल जाये
जीने का है यही सलीका, लौट के कुछ पल घर में आये !

आज क्लब में मीटिंग है, उसे संचालन का कार्य करना है. कल रात्रि देर तक ज्ञान श्रृंखला सुनती रही. दोपहर को नींद आ गयी, उठकर एक नये ब्लॉग पर पूर्व की लिखी कविताएँ डालीं. कल जून नई गाड़ी में उन्हें घुमाने ले गये, कुछ देर एक मित्र के यहाँ रुके. परमात्मा जब तक अपना नहीं बन जाता तब तक जीवन से दुःख नहीं जाता, पर उसे जो हर वक्त एक नामालूम सी ख़ुशी घेरे रहती है, लगता है वह आसपास ही है. सद्गुरू के शब्दों में पास-पास. मन से परे, बुद्धि से परे एक और सत्ता है जो प्रेम से ही बनी है, उसमें और नूना में दूरी नहीं है, वे दोनों एक ही हैं, कितना अद्भुत ज्ञान है यह.