Friday, March 14, 2014

हनुमान मन्दिर


उसने सोचा, वक्त आ गया है कि कुछ पल बैठकर मन का लेखा-जोखा किया जाये, मन जो इस वक्त शांत है. कल रात को जीजीएम के संदेश का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते समय आने वाली दिक्कतों से थोड़ा परेशान हो गया था, पर वक्त पर पूरा करके दे सकी इसका श्रेय भी इसी मन को है. जून होते तो रात साढ़े दस बजे तक बैठकर उसे काम नहीं करने देते शायद तब इतनी देर भी नहीं लगती, उसने दो-तीन तकनीकी शब्दों का हिंदी अनुवाद एक मित्र के यहाँ फोन करके पूछा, बाद में पता चला वे लोग पहले पैकिंग करने के कारण देर से भोजन कर रहे थे और उन्हें उठकर फोन रिसीव करना पड़ा. उसे लगा, उन्हें अपने परिचितों को taken for granted नहीं लेना चाहिए. खैर जो हुआ सो हुआ ! कल दोपहर उड़िया पड़ोसिन के साथ भोजन अच्छा लगा, उस सखी की तरह इसने भी उत्तर भारतीय खाना बनाया था, राजमा वाली काली दाल, मिश्रित सब्जी और पनीर दो प्याजा तथा कढ़ी. नन्हा जिस तरह पांच-साथ मिनट में कपड़े बदल कर वहाँ आ गया, देखकर अच्छा लगा. नये स्कूल में पढ़ने जाने से वह होशियार हो गया है स्मार्ट भी. उसने समय देखा, मात्र दो घंटे बचे हैं, समय का नियोजन यदि करे तो आधा घंटा अभ्यास कर सकती है. कल घर से भी फोन आया, उन्होंने भी उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए फोन किया, लोगों को उनकी परवाह है, जानकर ख़ुशी होती है.

आज सुबह भी देखा तो पूसी बरामदे में रखी रॉकिंग चेयर पर सोयी थी, रात को किसी वक्त जब जाली से कूद कर आई होगी तो अपने पंजों के दबाव से एक गमला भी उल्टा किया होगा, उसे देखकर क्रोध आया और उसे डांट के भगा दिया पर मन में यह ख्याल भी बना हुआ है कि मूक जानवर भला क्या जाने कि उसके किस काम से कोई खफा है. नन्हे के पैर में कल रात अचानक cramp हो गया, घुटने के पास से दांया पैर मुड़ ही नहीं रहा था, दर्द था, फिर बाद में कुछ राहत मिली तो सो गया पर सुबह तैयार होकर जब स्कूल के लिए निकला तो दर्द फिर आ गया, मना करने पर भी स्कूल तो गया है क्योंकि अगले पांच दिन स्कूल बंद है सो आज जाना ठीक ही था, कल उसने debate के लिए कुछ points लिखवाये पर कापी ले जाना भूल गया. कल रात स्वप्न में जून को देखा, अब यूँ भी अकेले रहना खलने लगा है.

आज जून आने वाले हैं, सो नन्हा और वह उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, इतवार का सारा कार्य हो गया है. आज सुबह से वर्षा हो रही है, अलार्म भी सुनायी नहीं दिया, कल एक मित्र परिवार के साथ वे हनुमान मन्दिर गये, उनके कारण कभी-कभी मन्दिरों के दर्शन हो जाते हैं, उसे ध्यान के सिवा सब बचकाना लग रहा था पर घर पर अकेले रहने से बेहतर था. ‘हनुमान जयंती’ के उपलक्ष में एक जगह हनुमान पूजा भी देखी.

कल दोपहर दो बजे जून आ गये, साथ-साथ भोजन किया, घर जैसे भर गया. उनके लाये ढेर सारे सामानों से और उनकी बातचीत से. फिर शाम को बाजार गये. नन्हे की कुछ किताबें लेने जब उसका एक मित्र आया तो उसने कुछ नानुकुर की पर नन्हे ने समझाया कि उसे इन किताबों की कोई जरूरत नहीं है, बच्चे कभी-कभी बड़ों को राह पर ले आते हैं. उसका मन संवेदनशील नहीं है, पूसी को भगाया फिर कभी-कभी बेवजह पत्ते भी तोड़ देती है. यूँ ही झुझला जाती है पर जानती है कि यह सब वह कर रही है और ऐसा करना उचित नहीं है लेकिन क्यों कि ऐसा करने से कोई विशेष दुःख उसे नहीं उठाना पड़ता सो इससे परहेज नहीं करती. आज ध्यान में वह अपने विचारों को देख पाई कभी धीरे-धीरे कभी एक के बाद एक आते जा रहे विचार, मन एक पल भी खाली नहीं बैठता, आज जून शायद देर से आयेंगे straight शिफ्ट है. आज बैसाखी है पर सुबह से उत्सव जैसी कोई बात नहीं हुई. यदि मन स्थिरता से युक्त न हो तब उत्सव भी अर्थहीन हो जाता है.



2 comments:


  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. बहुत सुन्दर...

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