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Thursday, August 27, 2020

आर्थर मिलर का नाटक


रात्रि के आठ बजने वाले हैं, कुछ देर पूर्व ही वे इस घर लौटे हैं. आज भी वहाँ नैनी से सफाई करवाई. नन्हे ने काफी सामान भी भेजा, सभी को उनके यथोचित स्थान पर रखा, घर काफी सुंदर लग रहा था, छोटी बहन से वीडियो कॉल पर बात की, घर दिखाया. दीदी शायद व्यस्त थीं. वापस आकर कपड़े समेटे व किचन के बर्तन, कुक खाना बना रहा है. बिल्लियों को एक बरामदे से दूसरे में शिफ्ट किया. कल शाम को इस समय गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा होने लगी थी, यह बरामद गमलों में पानी भर जाने से बाहर आयी मिट्टी से गंदा हो गया था, आज मौसम ठीक है. कल नन्हे की कम्पनी का स्थापना दिवस था, उन्होंने खाने का इंतजाम आउटडोर में किया था पर मौसम का मिजाज बदल जाने से उन्हें सारा कार्यक्रम बदलना पड़ा. कल आश्रम में गुरूजी को कन्नड़ में बोलते सुना, अच्छा लगा, कई शब्द संस्कृत व हिंदी के भी हैं. कल पिताजी ने तस्वीरें देखीं और बधाई दी. 


शाम के साढ़े आठ बजे हैं, असम में होते तो रात्रि के. सुबह दस बजे वे घर से निकले थे,  पौने दस बजे तक सुबह के सारे काम हो चुके थे और आज तो व्हाट्सऐप व फेसबुक की गलियों का एक-एक  चक्कर भी लग गया था. पहले पर्दों के शो रूम में गए वहाँ से एक बजे नए  घर पहुँचे, साथ लाया लन्च खाया. रास्ते में ढेर सारे भुट्टे कल दिखे थे, आज भुट्टे के खेत दिखे. जंगल व गांव के बीच से जाता हुआ रास्ता बहुत अच्छा है. दीदी का फोन आज आया, जून ने उन्हें घर दिखाया. दोपहर को सोलर पैनल का सिस्टम सेट हो गया, फिर जाली के दरवाजों की नाप लेने कारीगर आये, उसके बाद सफाई कर्मचारी. घर के दायीं तरफ का कचरा अब उठा लिया गया है तथा पिछली गली में जाने वाला शॉर्ट कट रास्ता भी बन्द कर दिया है. अब आते-जाते लोगों की ताक-झांक नहीं होगी. नन्हे का कहना है कि कुछ दिनों में लोग फिर खोल लेंगे, पर उसे लगता है कुछ दिन बन्द रहने से लोगों को दूसरे रास्ते की आदत पड़ जाएगी. आज एशियन पेण्ट वाले भी आये, सीढ़ी के पास की दीवार पर ग्रे रंग करना है, कल पूरा हो जायेगा. कूरियर से चाय बनाने वाली इलेक्ट्रिकल केतली आयी और मॉप के साथ ट्विन बकेट भी, नन्हे को घर में काम आने वाले सभी सामानों की जानकारी है. अक्टूबर में उनके आने तक वह पूरा घर सेट कर ही देगा. वह स्वतन्त्र विचारधारा रखता है, किसी की भी टोका-टाकी उसे पसन्द नहीं है. हर आत्मा की पहली मांग है पूर्ण स्वतन्त्रता ! इस समय वह फोन पर इंटरव्यू ले रहा है. सोनू आज देर से आने वाली है. कुक खाना बनाकर चला गया है. आज उससे एक गास्केट जल गया, जो दूसरे कुकर के तले पर चिपका था. कल उन्हें चार दिनों तक आश्रम में रहने के लायक सामान लेकर जाना है और सम्भव हुआ तो उसके बाद नए घर में ही रुक जायेंगे. 


बरसों पहले की बात ....कल रात नाटक सुनकर सोयी थी. स्वप्न में नाटक देखा पर नाटक के पात्र वास्तविक बन गए थे और उस सेल्समैन ने किताबें सचमुच दी थीं बस में बैठे यात्रियों को ! उसे भी एक किताब दी थी, कोई धार्मिक पुस्तक थी. उस नाटक के अंतिम डायलॉग सुने जो सेल्समैन और उसका विरोधी बोलते हैं.  उसके पहले क्या कारण था कि उसे किताबें मुफ्त बांटनी पड़ी थीं. एक कोर्ट सीन था, अदालत फैसला देती है कि उसे ऐसा करना होगा और उस बुद्धू लड़की को भी देखा जिसे वह सबसे पहले किताबें देता है. स्टेज पर किताबें ही किताबें हो गयी थीं, नाटक के बाद वह सचमुच किताब घर लायी थी. आर्थर मिलर का नाटक ‘डेथ ऑफ़ अ सेल्समैन’ कितना प्रभावशाली रहा. उसे उस सेल्समैन पर तरस आता है, मोटा, बुद्धू दीखता था पर वह कितना महत्वाकांक्षी था और लिंडा तो देवी थी.  वह कहाँ गलत हो गयी कि... शायद वह अपने पति से अत्यधिक प्रेम करती थी, अपने पुत्रों से भी अधिक. क्यों उसे इसकी जरूरत थी पर वह होटल और बस्टिन में वह लड़की. हैप्पी तो जानता था तभी वह अपने पिता का आदर नहीं करता था, प्यार जरूर करता था. वह सेल्समैन झूठ ही खाता था, झूठ ही ओढ़ता था, झूठ ही पहनता था, तभी वह कभी सफल नहीं हो पाया. वह स्वप्न के महल खड़े करता था फिर काल्पनिक बातों को सत्य बताता था. लिंडा इसे समझती नहीं थी, वह भी उस पर दया करती थी और वह भी तो उसे कितना मानता था.  


Wednesday, June 17, 2020

सूरज की बिंदी


सुबह के साढ़े आठ बजे हैं. दो दिनों के ‘बंद’ के बाद आज जून दफ्तर गए हैं. सरकार सिटिजनशिप बिल के द्वारा कुछ अन्य देशों के धर्म के आधार पर पीड़ित हिंदुओं को भारत की  नागरिकता देना चाहती है, जो किसी तरह जान बचाकर भारत आते रहे हैं, बिना नागरिकता के रह रहे हैं. इसके खिलाफ ही था परसों का बंद. आज जो सफाई कर्मचारी आया है कह रहा है, उसके पूर्वजों को अंग्रेज बिहार से यहाँ असम लाये थे, पर अब तो यही उनका घर है. कल रात भर गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा होती रही, कई बार बिजली चमकने व गड़गड़ाहट से नींद भी खुली. सुबह टहलने गए तो बारिश रुकी हुई थी, सड़क खाली थी, कुछ देर बाद ही सारी बत्तियां भी बुझ गयीं, लगभग अँधेरे में ही प्रातः भ्रमण हुआ. कल शाम को क्लब की मीटिंग थी, वर्तमान प्रेजिडेंट की अंतिम कमेटी मीटिंग. कुछ जिम्मेदारी उसे सौंपी गयी है, भावी प्रेसीडेंट ज्यादा व्यस्त है इसलिए. दुबई से लाये खजूर वह सबके लिए ले गयी थी.  आज दोपहर मृणाल ज्योति जाना है नए वर्ष के कैलेंडर, डायरी और केक लेकर, हर वर्ष वहाँ टीचर्स को प्रतीक्षा रहती है. बाहर से झगड़ने की आवाजें आ रही हैं, पिछले घर में रहने वाली किशोरियां हैं जो पिता की बात जरा नहीं मानतीं, स्कूल जाना भी छोड़ दिया है. दुबई यात्रा पर दो कविताएं लिखीं, दो सखियों की विदाई कविताएं टाइप करनी हैं जिनके पतिदेव सेवा निवृत्त हो रहे हैं. 

उस पुरानी डायरी में लिखा है, जीवन में कुछ पल भी अवसाद भरे क्यों हों, कुछ क्षण भी बोझिल क्यों हों. जिन पलों में मन की शांति भंग हो जाये, आँखों में अश्रु आ जाएँ. मुख से कोई शब्द न फूटे पर भीतर मौन भी रुचि न रहा हो. मन खुद से बात करे पर बाहर चुप्पी छायी हो. क्या ऐसा पहले भी कितनी बार नहीं हुआ होगा, इस जन्म में या पिछले जन्मों में. जीवन इसी तरह गिरता-पड़ता, रोता हुआ अपनी यात्रा तय करता आया है. ऐसे क्षण ही मन की दुर्बलता के, मन के अंधियारे के पोषक हैं. इन्हें दूर फेंक कर जलती हुई शिखा की तरह मुस्काना होगा. जीवन सुख का ही नाम है और सुख जीवन का. जिन पलों में आँखें हँसी हैं उन स्मृतियों का ऋण है मन पर, कुछ गीतों का और सपनों का भी. हँसते-गाते कुछ बच्चों का भी और सबसे बढ़कर इक धरती और इक सूरज का ऋण है उस पर ! 

मेरे गीत अमर कर दो ! इंसानी दिल को को ही यह फरियाद करने की जरूरत पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है, पर ‘सूरज’ उसे कभी कहने की आवश्यकता नहीं हुई, वह जो नित नए गीत लिख जाता है आकाश पर, धरती पर भी ! अभी कुछ क्षणों पहले सूर्योदय का भव्य और रोमांचकारी दृश्य देखकर आयी है. मन जो पोर-पोर तक उस उस वक्त सूरज का कृतज्ञ था, ग्रे और श्वेत रंग की विशाल स्लेट पर जैसे कोई लाल चमकदार बिंदी सजा दे, और वह बिंदी उसके साथ-साथ चल रही थी. वह दो कदम आगे तो वह भी आगे पीछे तो वह भी पीछे ! कोई अन्य सजीव या निर्जीव वस्तु नहीं दिख रही थी. कोहरे की परत ने सभी पर आवरण कर दिया था, सिर्फ एक सूरज और दूसरी वह स्वयं... 

जॉली और ड्यूक ! राजकुमारी और जॉली, सिल्विया और राजा, ये पात्र बचपन से उसके मन में सजीव हैं. जब भी ‘एक गीत की मौत’ रेडियो नाटक  सुनती है, करुणा से भर जाता है मन ! जॉली और ड्यूक का अद्भुत ऊँचा प्रेम ! सोहराब मोदी की तीसरी फिल्म ‘पृथ्वी वल्लभ’ देखी आज. छोटे भाई ने एक घायल चिड़िया का बच्चा उसे लाकर दिया जैसे वह दम तोड़ने की प्रतीक्षा कर रहा था. हाथों में आते ही बिना पानी पिए चला गया, उसने ऐसा क्यों किया, पहले वह हिल-डुल रहा था फिर शांत... किसी की मौत अपने हाथों में.. पता भी नहीं चला एक सेकण्ड से भी कम समय में उसके प्राण निकल गए. उसने उसे मिट्टी में दबा दिया चंद आँसुओं के साथ ! 

Monday, May 30, 2016

आपकी अंतरा


एक परिचिता को उसे ऋषिमुख के कुछ अंक भिजवाने थे, तभी नैनी अपने आप ही आ गयी. वह परिचिता जो थोड़ी सी नाराज लगी थीं, खुश हो जाएँगी. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द है. वह साक्षी होकर देख रही है. दर्द कितना भी ज्यादा हो या कम हो वह मुस्कुरा सकती है. स्थिति कैसी भी हो वह भीतर सदा एक सी रहने में समर्थ है. ये सब बाहर जो घट रहा है एक नाटक ही तो है. रात को तेज वर्षा होती है, दोपहर को तेज धूप निकलती है. भगवान भी मजाक करने में पीछे नहीं रहते. अब स्वाइन फ्लू का हौवा फैला दिया है, सारे लोग डरे हुए हैं. टीवी पर ‘आपकी अंतरा’ धारावाहिक  आ रहा है. छोटी सी अंतरा उसे बहुत अच्छी लगती है, सो देखती है. अन्तरा ने विद्या को अपनी माँ स्वीकार कर लिया है, विद्या भी उसे सुंदर चित्र बनाते देखकर प्रभावित हुई है. आज दोपहर जून तिनसुकिया से दस अनानास लेकर आए. वह पिछले दो-तीन महीनों से माँ के लिए वह हर वस्तु ला रहे हैं जो कोई भी उन्हें कह देता है कि उन्हें लाभ देगी. वह जीवन भर जो माँ के लिए नहीं कर पाए अब करना चाहते हैं. वह उन्हें नया जीवन प्रदान कर रहे हैं.

साक्षी भाव अब भी है पर मन की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है. मन जो सदा नकारात्मकता पर ही जीता है, जो सदा अभाव को ही देखता है. गुरूजी कहते हैं जब प्राण ऊर्जा कम होती है तभी मन अवसाद का शिकार होता है. जून की पीठ में भी पिछले तीन-चार दिनों से दर्द है, उनकी भी प्राण ऊर्जा घट गयी है लेकिन दिन में मेहमानों के सामने वह बहुत प्रसन्न नजर आ रहे था. उसे लगता है मानव के भीतर दो व्यक्ति रहते हैं, एक वह जो बाहर से वह दिखाता है एक जो भीतर से वह है. वास्तव में भीतर वाला ही वह है, बाहर तो मुखौटा लगा लेता है. जैसे उसके भीतर विषैले सर्प हैं जो कभी भी विष की फुफकार छोड़ कर मन को जहरीला बना देते हैं, वैसे ही क्रोध के सर्प जून के मन को भी अशांत बना रहे होंगे. लेकिन जैसे कोई व्यक्ति आग में हाथ डाल दे और फिर चिल्लाये वैसे ही वे भी स्वयं ही इस विष का पान करते हैं. वे चाहें तो एक क्षण में इसे झटक कर अलग हो सकते हैं. हर समय इच्छा उनकी ही होती है कि वे किसे चुनते हैं ! 

साक्षी भाव में बने रहकर मन में उठते विचारों को जब वह देखती है तो कई बार आश्चर्य होता है. मन कितने राग-द्वेष पाले हुए हैं, कितना विकार छिपे हैं अब भी उसके गर्भ में. आज गीता ज्ञान में सद्गुरू ने बताया कि अपने सारे कर्मों को समर्पित कर देने से कर्मों से मुक्त हुआ जाता है. मन, वाणी व काया से होने वाला कोई भी कर्म यदि कोई कर्ता भाव से करे तो भोक्ता बनना ही होगा. सुबह से शाम तक मनसा, वाचा, कर्मणा जितने भी कर्म उसने किये हैं, जो इस क्षण कर रही है तथा जो भविष्य में उससे होने वाले हैं, वे सभी वह परमात्मा को समर्पित करती है. इस जन्म के पूर्व पिछले जन्मों के सारे कर्म भी ! पिछले किसी जन्म में उसने किसी की वस्तु ली और इस जन्म में भी वह उसे मिली लेकिन जिसकी वह वस्तु थी उसकी भी नजर उस पर लगी है. अब उसे उस वस्तु को बचाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह भी पता है कि कभी यह वस्तु उसके अधिकार में थी, किन्तु इतना भी ज्ञान है कि इस जन्म में पूर्ण अधिकारी बनकर उसे प्राप्त किया है. भय व्यर्थ है, उसे दूर करना होगा तथा अपने सारे अवगुणों को परमात्मा को समर्पित करना होगा. इस धरती पर आने का मकसद सदा सामने रखना होगा. स्वयं को जागृत रखना होगा जिससे कोई भी पराया न रहे, मन आत्मा में विश्राम पाए तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाये. फिर भी यदि संस्कारों के वश मन विचलित हो भी जाये तो उसे साक्षी भाव से देखना होगा !

Saturday, November 15, 2014

गॉल ब्लैडर में स्टोन



मन की वृत्ति ऐसी हो कि इस जग को रैन बसेरा ही समझे, जिस तरह पंछी आते हैं, एक-एक तिनका चुनकर लाते हैं और नीड़ बनाते हैं, फिर कुछ दिन रहकर निर्मोही होकर उड़ जाते हैं. वे संग्रह पर विश्वास नहीं करते, अपने कर्मों के भरोसे रहते हैं, पर इन्सान के पास जोड़ने का, संग्रह का व्यसन है. जबकि उसे पता नहीं कि जिन वस्तुओं को वह संभाल कर रख रहा है वे उसकी हैं ही नहीं ! उसकी तो यह देह भी नहीं, पंचतत्वों से बनी यह देह तो प्रकृति की है. साधन रूप में मिली है”. बाबाजी ने आज ये वचन कहे थे सुबह. लेकिन जब तक देह है तब तक तो इसके प्रति कर्त्तव्य का पालन करना होगा. सुबह छोटी बहन का मेल पढ़ा, जून ने जवाब भी दे दिया है. कल दोपहर उसने ‘वनिता’ के लिए दो कविताएँ भेजीं. कल दोपहर लिखने का प्रयास किया पर बात बनी नहीं, कई दिनों से नया कुछ लिखा नहीं, जैसे स्रोत के इर्दगिर्द खरपतवार उग आये हैं अथवा काई जम गयी है. पहले उसे साफ करना होगा, तभी धारा फूटेगी. मन को ऊंचे केन्द्रों में ले जाना होगा, निस्वार्थता का पालन करना होगा. वाणी पर संयम और हृदय में प्रेम, अपने आप में आना होगा जो हम वास्तव में हैं. निर्मुक्त, शुद्ध, समर्थ, पूर्ण आत्मा..जिसे कुछ पाने की चाह शेष नहीं, जो झूठे अहम् का शिकार नहीं, जो परहित के लिए ही जीता है क्योंकि उसका हित इसी में है, जो बांटना चाहता है.

एक सखी की बेटी का बुखार अभी तक ठीक नहीं हुआ है, आज पूरे बाईस दिन हो गये  हैं, उससे बात की, वह फोन पर ही रुआंसी हो गयी. उसने तय किया, कल दोपहर या हो सके तो आज ही वह उससे मिलने जाएगी. शाम को क्लब की मीटिंग है, जाना है, कहीं दबी-छिपी यह इच्छा भी है कि कोई नाटक में उसके अभिनय की तारीफ करेगा. अभी तक कई लोग कह चुके हैं, शायद इसी के पीछे नेता और अभिनेता भागते हैं, खैर, वैसे भी उसे जाना था, क्लब की सदस्यता ली है तो सभा में जाना भी एक कर्त्तव्य है. आज बाबाजी को नहीं सुन पायी, मंझली भाभी को फोन किया, वह भी भाई के गॉल ब्लैडर में स्टोन के आपरेशन को लेकर थोड़ी परेशान थी. कल रात को भाई ने बताया था और रात भर वह डरावने सपने देखती रही, अचेतन मन कैसे भयभीत हो जाता है. समाचारों में हिंदुस्तान, पाकिस्तान के अच्छे संबंधों के बारे में आशान्वित लोगों के विचार सुनकर अच्छा लगता है, भविष्य में वह भी कभी पाकिस्तान जा पायेगी अगर ऐसा हो गया तो !


मानव का जन्म आत्म वैभव का अनुभव करने के लिए हुआ है न कि निराश होकर जीवन की गाड़ी को घसीटते हुए किसी तरह दिन गुजारने के लिए ! जीवन का लक्ष्य ऊंचा होगा तो साधन अपने आप मिलते जायेंगे, आज बाबाजी ने एक सूत्र और बताया कि माह में दो दिन उपवास रखा तो तन-मन दोनों हल्के रहते हैं. कल उनकी मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम तथा जलपान दोनों ही बहुत अच्छे थे. एक नई सदस्या ने सम्बोधित किया, धीरे-धीरे ही सही सभी अपने खोलों से बाहर आ रहे हैं. उसके नाटक की तारीफ़ भी दो लोगों ने की पर अब लगता है कितना ओछापन है यह उम्मीद पालना, नीचे गिरना ही है. यह छोटी-मोटी वाह-वाही विनम्र नहीं बनाती बल्कि एक झूठा नशा देती है. बड़े-बड़े कलाकार कितने मजबूत होते होंगे भीतर से कौन जानता है ? कल दोपहर वह उस सखी के यहाँ गयी, बेटी का इलाज ठीक चल रहा है, बस वक्त कुछ ज्यादा लग रहा है. कल रात भाई से बात की, आप्रेशन ठीक हो गया. दीदी को फिर से मेल भेजा है, महीने में दो बार उपवास रखने की बात पर अमल करना ठीक होगा !




Thursday, November 13, 2014

नाटक की रिहर्सल


आज उनके नाटक की ड्रेस रिहर्सल है, बाबाजी आ चुके हैं पर नैनी अपने जीवन की व्यथा सुना रही है. उसके पास कहानियों एक नहीं अनेक हैं, अपने लम्बे-चौड़े भूतपूर्व परिवार की कहानियाँ, उसके पति ने दूसरी शादी कर ली तो वह अपने तीन बच्चों को लेकर घर छोड़कर आ गयी, बर्तन मांजकर गुजारा करने लगी. यह कई साल पहले की बात है फिर उसके पति की दुखद मौत हुई. देवर-जेठ सभी समर्थ थे पर किसी ने सहारा नहीं दिया यहाँ तक कि जायज हक भी नहीं दिया. ननदें भी अचछे घरों में ब्याही हैं, उनके बच्चे भी पढ़लिख रहे हैं पर इसके बच्चे बिन पढ़े ही रह गये अब तो बेटियों की शादियाँ हो गयी हैं. बेटा भी काम तलाश रहा है, कभी मिल जाता है कभी नहीं मिलता. आज भी सर्दी ने उसे परेशान किया हुआ है, विश्वास पूर्ण हृदय ले ईश्वर से शक्ति के लिए प्रार्थना की ताकि आज और कल अपने कर्त्तव्य का पालन कर सके. इतना विश्वास तब तो नहीं होता जब वह स्वस्थ होती है. कबीरदास ने सच ही कहा है- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई.. जून आज सुबह समझा कर गये हैं कि वह अपना ख्याल रखे. वह उसका बेहद ख्याल रखते हैं, कल उसके साथ उन्होंने ‘संघर्ष’ फिल्म देखी. फिर वह क्लब गयी. मौसम आजकल ठीकठाक है, न बेहद वर्षा न बेहद गर्मी.

आज शनिवार है, शाम को नाटक है, स्वास्थ्य पूरी तरह तो नहीं सुधरा है पर शेष पात्रों को आभास तक नहीं हुआ सो स्पष्ट है कि आवाज और अभिनय पर पकड़ पूर्ववत् ही है. कल क्लब में तीन घंटे से भी ज्यादा वक्त लग गया, आज भी तीन-चार घंटे तो देने ही होंगे. जून और नन्हे को उसकी अनुपस्थिति का धीरे-धीरे अभ्यास हो रहा है. आज मौसम अच्छा है रात भर वर्षा होती रही. पहले-पहल नींद कुछ अस्त-व्यस्त सी रही पर बाद में आ गयी. काफी देर तक नाटक के संवाद बिन बुलाये मेहमान की तरह चक्कर लगते रहे. स्वप्न में वह घंटों नेपाल के राजा से बातें करती रही, उनके राज्य में विद्रोह करने वाले नेताओं, क्रांतिकारियों से भी मिली. जून ने कल पिता से बात की, उनके घर में नये मालिक आ गये हैं, अब वह उनका कहाँ रहा ?

आज गोयनकाजी ने महावीर स्वामी और गुरुनानक का उदहारण देते हुए विपासना का महत्व समझाया. महावीर ने कहा है, जो भीतर है वही बाहर है और जो बाहर है वही भीतर है. बाहर की सच्चाई को बुद्धि के स्तर पर समझा जा सकता है पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर ही समझना होगा. नानक ने कहा है, “थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई” भीतर की सच्चाई को देखने के लिए कुछ आरोपित नहीं करना है न ही कुछ करना है, जो अपने आप है वही हरि है !  कबीर ने भी इस प्रश्न के उत्तर में, कि हरि कैसा है ? कहा, जब जैसा तब वैसा रे...जिस क्षण हमारे अंतर की स्थिति जैसी होगी हरि उस क्षण वैसा ही होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखते  रहना ही विपासना है. यदि मन में विकार भी जगा है तो उसे देखना है कि उसके प्रति कैसी संवेदना जगी है. उस संवेदना के मूल का ज्ञान होने से वह स्वतः ही नष्ट हो जाती है और ऐसे धीरे-धीरे विकार जड़ से दूर होते हैं, दमन करने से जड़ भीतर ही रह जाती है और वह विकार पुनः-पुनः सर उठाते हैं. उसे यह सब सुनना अच्छा लगता है, लगता है  अपनी विचार शक्ति को जितना ऊंचा बनाएगी उतना ही जीवन उन्नत होगा. वह कहाँ है और क्या करती है यह उतना महत्व नहीं रखता जितना कि उसका मन कहाँ है और वह कैसी भावना से कर्म करती है, इसका महत्व है.



Wednesday, April 18, 2012

राष्ट्रीय युवा दिवस


भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की बीसवीं पुण्य तिथि. दोपहर को नूना ने टीवी पर एक फिल्म में उनकी आवाज सुनी. अमोल पालेकर का एक कार्यक्रम देखा “आ बैल मुझे मार”, शाम को देखा एक नाटक, ‘काठ की गाड़ी’ जो बहुत ही मार्मिक था, उदासी भरा एक गीत हो जैसे. अपने सामने किसी ऐसे रोगी को देखकर क्या वह सामान्य रह पायेगी उसने सोचा. कौन जाने ? फिर भी कई भ्रम तो टूटते हैं ऐसे नाटक देखकर. आज जून ने भी टीवी देखा होगा, वह जरूर उस वक्त उसे याद कर रहा होगा, वह कैसे दिन बिताता होगा, वह उसे एक बार देखना चाहती थी पर कैसे? उसने आज खत लिखा होगा जो अगले हफ्ते किसी दिन मिलेगा. दवा लेनी आज भी शुरू नहीं की, अब कल से अवश्य लेनी है. कल घर में दोसा बनेगा, शकुंतला से दाल-चावल पिसवाये हैं आज. पिता भी आज घर पर थे, नवनीत का दीवाली विशेषांक उन्हें अच्छा लगा.
रविवार को वे दिन भर साथ रहा करते थे, उसने सुबह उठते ही सोचा, दोसे ठीक वैसे ही बनाये जैसे वह सीखकर आयी थी दक्षिण भारतीय मित्र से. सुबह हल्की वर्षा हुई, काफ़ी ठंड थी, वह होता तो कहता शाल लेकर बैठो. आज उसे वापस जाना है. आज राष्ट्रीय युवा दिवस है विवेकानंद का जन्म दिवस...
  

Tuesday, February 28, 2012

रेडियो नाटक


दोपहर के तीन बजे हैं अभी, आज दोपहर उसने कुछ देर उसने किताब पढ़ी, क्रोशिये से मेजपोश आगे बनाया, जून के आने पर लस्सी बनायी और वे बाइक से नदी पर गए, मुख्यमंत्री आने वाले थे सो जगह-जगह पुलिस के सिपाही खड़े थे, वे पहले की तरह पुल पर खड़े होकर नदी को देर तक नहीं देख सके. ‘एक सच सारे जीवन का निर्णायक हो सकता है, पर कभी-कभी कितना कटु होता है कोई सच’ चंदामामा में से एक कहानी पढ़कर सुनाई उसे जून ने, उसी का अंतिम वाक्य था यह. विवाह  पूर्व लगभग हर शुक्रवार की रात वह रेडियो पर नाटक सुना करती थी, पर यहाँ नहीं सुन पाती है, सो जून ने उसे पढ़कर सुनाया. शाम को एक परिचित परिवार अपने दो बच्चों के साथ आया था, उन्हें बहुत अच्छा लगा.
आज उमा(महरी) नहीं आयी है. वह रेडियो पर समाचार सुनते हुए बर्तन साफ कर रही थी. अकाली दल को पूर्ण बहुमत मिला है, सुरजीत सिंह बरनाला पंजाब के मुख्यमंत्री बनाये गए हैं, अब उम्मीद करनी चाहिए कि पंजाब में फिर पहले की तरह शांति रहेगी. और भारत का सबसे समृद्ध राज्य होने का गौरव वह कायम रख सकेगा.