Friday, December 30, 2016

जीव और ब्रह्म -आदि शन्कराचार्य


कल शाम और आज पुनः बाबा को सुना. वे नई ऊर्जा से भर गये हैं. अपने अभियान को चलाये रखने का उन्होंने व्रत दोहराया और जोशीले भाषण से अपने विरोधियों के सवालों का जवाब दिया. आज वर्षा की झड़ी लगी है, वे प्रातःभ्रमण के लिए भी नहीं जा सके. कल नन्हे ने कहा उसे कविता अच्छी लगी, एकाध बात समझ में नहीं आयी. आज से नैनी काम पर आ गयी है, अभी पिताजी ने उसके बारे में कुछ कहा, उन्हें घर-गृहस्थी के मामलों में अपनी राय देने में बहुत आनंद आता है, तो नूना ने उन्हें तुरंत जिस तरह तेजी से जवाब दिया, उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, उसने सोचा भी नहीं था, उसके अचेतन से ही यह कृत्य हुआ, उसने किया भी नहीं. इसी तरह हर कोई जो भी व्यवहार कर रहा है, वह संस्कारों के वशीभूत होकर ही कर रहा है. एक अर्थ में कर्ता वह है ही नहीं, यह केवल मानने की बात नहीं है, ऐसा ही है. यदि वह सचेत होकर, कुछ बनाकर उन्हें जवाब देती तो कर्ता होने का दावा कर सकती थी, न ही वे पुण्यकर्मों के कर्ता हैं न पाप कर्मों के, स्वभाव के अनुसार कृत्य होते हैं. स्वभाव वश यदि कोई असत्य भाषण कर देता है तो भी उसका फल उसे मिलेगा ही, उस दंड को भोगते समय भी उसे साक्षी बना रहना होगा.

आज सुबह बाबा के गुरूजी द्वारा शन्कराचार्य के वेदांत सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया. उनके अनुसार ब्रह्म अनादि व अनंत है. अविद्या व अज्ञान अनादि तो हैं पर सांत हैं. ब्रह्म जब अविद्या अर्थात माया में बंधता है तो ईश्वर कहाता है जिसकी शक्ति व ज्ञान अनंत है पर वही ब्रह्म जब अज्ञान से बंधता है तब जीव कहाता है. ईश्वर सृष्टि रचना, पालना व प्रलय का कारण है. जीव कर्मों को करता है व उनके फलों को भोगता है. जीव अपने शुद्ध स्वरूप में ब्रह्म के समान ही है. आज का ध्यान भी अच्छा था. वास्तव में देखा जाये तो इस जगत में न कुछ अच्छा है न बुरा, दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है. गुरूजी भी कहते हैं विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. एक ही चेतन तत्व से यह जगत बना है. जब तक द्वंद्व रहेगा, समाधान हो ही नहीं हो सकता. भीतर एकत्व तभी होगा जब कोई बाहर बांटना छोड़ देगा. वे जो बाहर वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों पर ठप्पा लगते हैं, बांटते हैं तो भीतर दरार पड़ने ही वाली है.


आज का ध्यान अनोखा था. विचारों को महसूस करना था, वे कहाँ से आते हैं ? क्या वे उनके हैं ? आत्मा के अनंत सागर से विचार आते हैं और जिन्हें वे अपना मानते हैं दरअसल वे सब उधार के होते हैं. उनके विचार जैसा कुछ भी नहीं है इस जगत में. केवल मौन ही उनका है. उनके संकल्प वातावरण की, शिक्षा की, उन पुस्तकों की देन होते हैं और जो कुछ उनके बावजूद भीतर से आता है वह संस्कारों के कारण हो सकता है. ‘वे’ हैं ही नहीं तो उनका कुछ भी हो कैसे सकता है. ‘वे हैं’ यह भी एक विचार ही है. ध्यान के बाद कैसी मुक्ति का अहसास हो रहा है. विचारों से ही तो वे राग-द्वेष में बंधते हैं, अहंकार के शिकार होते हैं. दुःख उन्हें पकड़ता है. विचार न हों तो एक गहरा मौन और सन्नाटा भीतर छाया रहता है !        

Wednesday, December 28, 2016

बैलगाड़ी से यात्रा


आज दसवें दिन बाबा ने अपना अनशन तोड़ दिया. गुरूजी और बापू के कहने पर ही यह सम्भव हुआ. उसके मन से भी जैसे कोई बोझ उतर गया है. चार जून को राजधानी में जो हुआ वह अप्रत्याशित था. उसके बाद की घटनाएँ भी कम दुखद नहीं थीं. आज वह अस्पताल से छूट जायेंगे. शायद कल से वे उन्हें पुनः आस्था पर देख पायें. कल दिन भर गर्मी बहुत रही पर आज बदली छायी है. नन्हे के लिए जो कविता उसने लिखी थी वह जून को भेजी है, पत्र से अच्छा है उसे ही भेज दे. समझदार को इशारा ही काफी है. आजकल नेट पर उसकी कविताएँ ज्यादा लोगों द्वारा पढ़ी जा रही हैं. परमात्मा की कृपा है, बल्कि कहना चाहिए उसीका गुणगान हो रहा है. भगवद्गीता का पांचवा अध्याय लिखना आरम्भ करना है. मन में अब भी विकार नजर आते हैं, संस्कार पुराने हैं लेकिन ध्यान में उनकी स्मृति भी नहीं रहती. तब केवल प्रकाश ही शेष रहता है. वाणी की कठोरता जाते-जाते भी नहीं जाती, शायद यह उसका प्रारब्ध है, लेकिन इससे नये कर्म तो संचित नहीं हो रहे, सद्गुरू हँस रहे होंगे उसकी इस बात पर. जिसने अपना-आप परमात्मा के साथ एक करके देख लिया वह अभी तक कर्मों के फेर में पड़ा है. यदि कोई यह मान ही बैठा है कि उसकी वाणी कठोर है और इसमें कभी कोई परिवर्तन हो ही नहीं सकता तो नहीं हो सकता. मान्यता ही संस्कारों को दृढ करती है !

कल दोपहर हिंदी पढ़ने उसकी दोनों छात्राएं आयीं और बैठी रहीं, उसे बुलाया नही और वह दूसरे कमरे में नई कविता टाइप करती रही यह सोचकर कि आज गुरूवार है. असजगता ही इसका कारण है. आज सुबह माली को डांटा, बाद में लगा क्रोध उचित नहीं था. वे किस तरह जीते हैं, रोबोट की नाईं  ही तो. आज नैनी का आपरेशन है, पिताजी को उसकी चिंता हो रही है. उनका हृदय बहुत कोमल है, उसकी बेटी से भी उन्हें मोह हो गया है.

आज फिर उसके सिर में हल्का दर्द है कारण वही पेट से सम्बन्धित होना चाहिए. उस दिन सुना था कि देह में मैल तभी जमता है जब मन में बात जम जाती है. उसके मन में एक ही नहीं अनेक बातें जम गयी हैं. भगवद्गीता पढ़ रही है तो पता चल रहा है, मन कितना चंचल है, कुछ पल भी इसे टिकाना कितना कठिन है और मक्खी की तरह यह जाता भी बार-बार कीचड़ की तरफ ही है. काम, क्रोध व लोभ को नर्क के द्वार बताया है. कितना सही है. रोग से बढ़कर और कौन सा नर्क होगा. अचेतन मन एक अथाह सागर है. कितने जन्मों की वासनाएं छिपी हैं उसमें. साधना की गति बैलगाड़ी की चाल से बढ़ रही है फिर भी भीतर एक आनन्द छाया रहता है. सद्गुरू के निकट रहकर जो साधना कर पाते हैं वे शीघ्र पहुँच जाते हैं, ऐसा भी कोई नियम नहीं है. आज बड़े भाई को दो कहानियाँ भेजी हैं, देखे, उनकी बिटिया को स्कूल में काम आती हैं या नहीं.


आजकल कितने अजीब-अजीब स्वप्न आते हैं. देखते समय यह भी पता चलता है, यह स्वप्न है. उस दिन स्वप्न में एक जैन मुनि को प्रवचन देते सुना और बाद में एक गोल-गोल घूमने का, ध्यान का अनुभव हुआ. परसों एक यात्रा की, मोटरबाइक पर लम्बी यात्रा. मन की क्या कहे कोई, कहाँ-कहाँ घूमने चला जाता है. कल रात स्वप्न में साईं बाबा को देखा. विशाल प्रांगण था. वह दूसरी मंजिल की बालकनी में थी. एक गार्ड बारी-बारी से उनसे मिलाने ले जा रहा था. एक वृद्ध व्यक्ति उनके चरणों को छू रहा था पर वह नाखूनों को एक-एक कर पकड़ रहा था. उनका चेहरा नहीं दिखा पर उनके गाउन का केसरिया रंग झलक रहा था. वह एक डायरी पर कुछ लिख रही थी, शायद वे प्रश्न जो उसे पूछने थे. पर जब उसकी बारी आयी तो गार्ड ने कहा, आप पढ़-पढ़ के उनसे बात करेंगी तो उसने  डायरी और पेन रख दिए और कहा, नहीं वह ऐसे ही जाएगी. तब वह एक ऐसे कमरे में पहुंची जहाँ जमीन पर काले रंग का बिछावन बिछा था. कई लोग साधना कर रहे थे. वह बैठ गयी तो साईं बाबा प्रवचन देने वाले थे पर एक महिला वहाँ खड़ी होकर उनकी जगह बोलने लगी और उसकी नींद खुल गयी अथवा तो स्वप्न टूट गया. यह स्वप्न कहीं उसके मन का मायाजाल तो नहीं अथवा..लेकिन आज सुबह ध्यान में कृष्ण के दर्शन हुए तथा भीतर चलने वाले यज्ञ का आभास हुआ जिसमें श्वासों की समिधा निरंतर पड़ रही है. उसने एक कविता लिखी थी ‘यज्ञ भीतर चल रहा है’  पर आज उसका अर्थ स्पष्ट हुआ. कृपा निरंतर बरस रही है..वे ही अपना पात्र उल्टा करके बैठे रहते हैं. देह को ही सब कुछ मानकर उस अनुपम खजाने से वंचित रह जाते हैं. परम ही चारों ओर खेल कर रहा है. उनका मन एक रोबोट की नाईं है, बटन दबाया और उसका काम शुरू हो जाता है. वे खुद तो सोये रहते हैं तो जीवन का हाल तो बेहाल होना ही है...सद्गुरू के बिना कौन बतायेगा यह सब ? आज विश्व संगीत दिवस है.     

Tuesday, December 27, 2016

रामलीला मैदान में रामदेव


आज बाबा रामदेव ने हजारों सत्याग्रहियों के साथ मिलकर दिल्ली के रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन आरम्भ किया है. वह पिछले कई वर्षों से कालाधन वापस लाने की बात कह रहे हैं, लेकिन सरकार के कानों पर जून तक नहीं रेंगी. इस बार सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ ठोस कदम उठाने ही पड़ेंगे. कल रात को निष्काम कर्म की व्याख्या सुनते-सुनते सोयी थी. मन उल्लास से भरा था. एक अद्भुत स्वप्न देखा. किसी ने उसे ऊपर उठाया, देह नीचे पड़ी थी और स्वयं की आवाज सुनाई दी, वह ...( नाम) नहीं है, वह है..कई बार यह वाक्य गूँजा और उसे नीचे छोड़ दिया गया, बाद में भी मन में यही विचार आता रहा..स्थिरता की सी मन: स्थिति बनी है सुबह से..

कल सुबह टीवी पर जब सुना, बाबा रामदेव को गिरफ्तार कर लिया गया है, उन्हें वस्त्र बदल कर छुपना पड़ा, जब वह भाग रहे थे तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और मैदान में सोये हजारों लोगों को वहाँ से निकाल दिया गया है तो मन विषाद से भर गया. कल दिन भर समाचार ही सुनते बीता. लोगों के मनों में दर्द है, उनके कार्यकर्ताओं को खदेड़ा गया, पीटा गया और कइयों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. शासन में रहने वाले लोग स्वयं को खुदा मानने लगते हैं. लोकतंत्र में ऐसी अमानवीय घटना का होना कितना दुखद है. सरकार को इसका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा. देश में जो माहौल बन रहा है वह कुछ परिवर्तन लाकर ही रहेगा. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में इसकी अति आवश्यकता है. इतिहास बन रहा है, पीड़ादायक क्षणों से गुजरना होगा, तभी तो नये राष्ट्र का जन्म होगा.

आज सुबह उन्होंने फूलों से भरे वृक्षों की कुछ तस्वीरें उतारीं. यह जगत कितना सुंदर है कोई ध्यान से देखे तो..जून को उसने कहा वह एक ब्लॉग की शुरुआत करें, जिसमें हर दिन कोई सूक्ति लिखी जाये. दीदी ने लिखा है, वह भगवद्गीता को ब्लॉग में लिखकर एक शुभ कार्य कर रही है, पर उसे लगता है वही करवा रहा है जिसकी यह गीता है. बाबा का अनशन जारी है, उन्होंने शेष सभी को तोड़ने के लिए कह दिया है. उनका जज्बा और जोश बरकरार है. अपनी तरफ से उन्होंने सबको क्षमादान भी दे दिया, सन्यासी का दिल कितना कोमल होता है. सरकार उन्हें राष्ट्रभक्त की जगह राष्ट्रद्रोही मान रही है. आज उनका उद्बोधन सुनते-सुनते उसका मन भी द्रवित हो गया.
आज सम्भवतः बाबा अपना अनशन तोड़ देंगे. श्री श्री और मुरारी बापू उनसे मिलने जाने वाले हैं.  उनके गुरूजी ने कहा, “शब्दों की शक्ति को पहचानना है, कुछ भी बोलने से पहले सोचना चाहिए कि श्रोता उसे किस रूप में ग्रहण करता है. आत्मा में मन लगे तो पुण्य और पदार्थ में लगे तो पाप होता है.” पाप और पुण्य की यह परिभाषा बहुत अच्छी है.


Monday, December 26, 2016

चटकीले फूलों वाले पेड़

पूर्ण जगत को ब्रह्ममय देखने की विधि मुरारीबापू ‘तुलसी’ के माध्यम से बता रहे हैं. उनकी कथा अद्भुत भावों से भर देती है. अहंकार, गर्व, दर्प, अभिमान या अविश्वास जब जीवन में हों तो दुःख आने ही वाला है, रावण को उसका अहंकार ही ले डूबा. बापू कह रहे हैं, अहंकार मोह के कारण है और  मोह रूपी वृक्ष की जड़ें हैं, अज्ञान, मूढ़ता, अभाव, कमी तथा अनादर. इसका तना है जड़ता अर्थात अपनी मूढ़ता से टस से मस न होना. भ्रांतियां ही उसकी शाखाएं हैं, संशय, कुतर्क, भ्रमित चित्तवृत्ति ही डालियाँ हैं, चंचलता ही पत्ते हैं. दुःख ही इस वृक्ष का फूल है. सद्गुरू की कृपा से ही यह सम्भव है कि कोई अहंकार शून्य हो सके. भीतर जो रजोगुण है, वह संतों की चरणरज से ही मिटता है. कल रात ऐसा लगा सोई और जग गयी. जून और नन्हा कल आश्रम गये थे, गुरूजी भी वहाँ थे, भेंट भी हो गयी. उन्होंने जून से पूछा, हैप्पी ? जून का विश्वास दृढ़तर होता जा रहा है. नन्हे का विश्वास भी समय आने पर दृढ होगा, उसे परमात्मा स्वरूप सद्गुरू के दर्शन हुए, इतने पुण्य तो जगे हैं, अब सब उन्हीं पर छोड़ देना होगा. उसने नये दफ्तर में शिफ्ट कर लिया है, आजकल वह बहुत व्यस्त है. रजोगुण शेष दोनों गुणों को दकर प्रमुख हो रहा है. यही उचित है, ऊर्जा को निकास के लिए कोई तो मार्ग चाहिए..


आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. सम्भवतः पिछले जन्मों की झलक थी, कुछ दृश्य इतने स्पष्ट दिखे. पहले एक स्त्री फिर मार्जारी तथा फिर एक राजस्थानी भाषा बोलती एक आकृति, महिला या पुरुष कुछ समझ में नहीं आया, केवल भाषा मारवाड़ी सुनाई दे रही थी. कितने रहस्य भरे हैं उनके अचेतन में. आज उसका जन्मदिन है, बिलकुल अनोखा और अलग सा..जब भीतर का सब कुछ बदल गया हो तो बाहर सब कुछ अपने आप बदलने लगता है.

जून का प्रथम दिन ! वर्षा बदस्तूर जारी है. सुबह वे टहलने गये तो फुहार पड़ने लगी. सडकों पर कई जगह पीले अमलतास, लाल गुलमोहर, गहरे पीले रस्ट वुड तथा बैंगनी रंग के फूल बिछे थे, रूद्र पलाश भी अनेक जगह बिखरे हुए थे. प्रकृति में रंगों की भरमार है, अनूठे, चटख रंगों के फूल वर्षा  पूर्व पेड़ों को मनमोहक बना देते हैं. इस तेल नगरी की ये सैरें उन्हें बाद में याद आयेंगी. लेकिन उन्होंने तो वर्तमान में रहने का अनोखा गुर अपना लिया है. परसों उसका जन्मदिन था, सुबह अनोखी थी, दोपहर को अहंकार आड़े आ गया, जिससे शाम का कार्यक्रम भी प्रभावित हुआ. मन ही सारे दुखों की जड़ है, आत्मा सारे सुखों की खान है. आत्मा में रहो तो कितने हल्के-हल्के रहते हैं तन-मन दोनों ! दीदी को जन्मदिन की कविता भेजी है. ब्लॉग पर कथा से प्रेरित होकर भक्ति भाव से लिखी कविता पोस्ट की है. आज बरामदे में व बाहर बगीचे में दो सर्प दिखे, उसने फोटो भी लिए और वीडियो भी.



Friday, November 18, 2016

घना घना सा जंगल


आज सुबह फिर किसी ने कहा, अब अलार्म बजेगा और तत्क्षण बजा, कौन है वह जो सुबह-सुबह उसे चेता जाता है. रात को स्वप्न में जंगल देखा, भीगा घना जंगल, उन्हें उसमें रेंग कर जाना पड़ रहा  था. कितना अद्भुत है स्वप्न लोक और यह जागृत अवस्था का लोक भी ज्ञानियों के लिए स्वप्न से बढ़कर नहीं.  उस दिन भी एक अजीब सा स्वप्न देखा था, अपने ही तन के एक अंग को कटोरा बनाकर उसमें भोजन करते हुए और फिर एक सखी का दरवाजे से झांक कर छि छि कहते तथा स्वयं को तो क्या हुआ कहते हुए, फिर नन्हे का आना..उनका अचेतन मन एक अजीब गोरखधन्धा है. भीतर न जाने कितने जन्मों की कितनी गांठें पड़ी हैं, आत्मज्ञान इन्हीं गांठों को खोलने का काम करता है. दरअसल साधना का आरम्भ होता है आत्मज्ञान के पश्चात !

कल उसे प्रेरणा हुई है कि जीवन यात्रा लिखे डायरी के पन्नों के माध्यम से तथा एक नया ब्लॉग भी आरम्भ करे आध्यात्मिक यात्रा पर, जिसमें प्रेरणादायक विचार लिखेगी. आज ही दोनों का आरम्भ करेगी, आज शुभ दिन है, अब लेखन ही उसके जीवन का केंद्र होगा. वही उसकी साधना होगी और वही मोक्ष भी लायेगा. योग आदि तो रहेंगे ही. हर चीज का एक वक्त होता है. जीवन ने उसे जो दिया है, उसे जाने से पहले लौटा दे यही इस लेखन का अभिप्राय है. अहम का विसर्जन हो और सेवा का कुछ कार्य भी हो. परमात्मा की बात है तो परमात्मा के लिए ही है, वही उसके मार्गदर्शक हैं, सद्गुरू और परमात्मा एक ही हैं और उसकी अंतरात्मा भी. जून भी आजकल उसकी कविताओं में रूचि लेने लगे हैं. प्रकृति का सौन्दर्य उन्हें भी लुभाने लगा है. हरी घास पर लेटने में उन्हें कोई डर नहीं लगता..यह भी तो चमत्कार है !


चर्चामंच पर उसकी दो कविताएँ आयी हैं. दो नये ब्लॉग पढ़े आज, इस दुनिया में परमात्मा के भक्तों की कमी नहीं है, जो भी इस रास्ते पर चलता है उसे अनंत प्रेम मिल जाता है. जून आज बैंगलोर गये हैं. अब तक तो नन्हे से भेंट हो गयी होगी. वह वहाँ फ़्लैट लेने की सोच रहे हैं. आदमी जीवन भर जो कमाता है, ईंट-पत्थरों के मकान में लगा देता है. उनके भविष्य में यह काम आयेगा, रिटायर्मेंट के बाद वे बैंगलोर में ही रहने वाले हैं. भविष्य ही बतायेगा क्या होने वाला है, इन्सान तो योजनायें ही बनता है. टीवी पर थाईलैंड में हो रही मुरारी बापू की कथा का सीधा प्रसारण आ रहा है. कल रात को फिर एक अनोखा स्वप्न देखा. जैसे किसी ने उसे देह के बाहर कर दिया हो, आवेशित कर दिया हो या पीछे से पकड़ लिया हो और हवा में उड़ने का अनुभव करा रहा हो. उसे लग रहा था कि देह मृत है या हो जाएगी और वह पृथक है, पर कोई भय नहीं महसूस हो रहा था. बाद में नींद खुल गयी पर तब भी कुछ प्रतिबिम्ब नेत्रों के सामने आते रहे. जागते हुए भी वे स्वप्न देखते रहते हैं, वास्तव में वे कभी जगे ही नहीं, एक गहरी नींद में सोये हैं, वे एक सम्मोहन का अनुभव कर रहे हैं और उसी कारण इतने दुःख हैं. जो जैसा है वैसा न देखकर वे अपने मन को ही आरोपित कर देते  हैं, मन जो अभिमान और दुःख का पोषक है. इस मोह को तोडना ही साधक का उद्देश्य है.   

Wednesday, November 16, 2016

मूल से उगा फूल


दस बजे हैं, मौसम गर्म है. परसों शाम को मेहमानों के आने से पूर्व अंततः उसके मन ने विद्रोह कर दिया और जून से उसने उनके उस दिन के व्यवहार की शिकायत कर दी. विवाद का कोई भी परिणाम नहीं होता, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कल सुबह हुई बातचीत से निकला. खैर, मन हल्का है. परमात्मा की कृपा से सद्गुरू मिले, सद्गुरू की कृपा से ज्ञान और उस ज्ञान को टिकने में साधना का सहयोग रहा फिर क्यों यह बाहर के अशांत वातावरण ने भीतर अशांति पैदा की. माँ की हालत बिगड़ती जा रही है पर पिताजी व जून के भीतर दुःख का बढ़ते जाना घर के माहौल को अशांत कर रहा है. पहले जिन बातों को वे हँसी में उड़ा देते थे अब उन्हीं पर झुंझला जाते हैं. उसने ‘श्रद्धा सुमन’ ब्लॉग में बहुत दिनों से कोई कविता पोस्ट नहीं की ह. एक नयी कविता का भाव भीतर भगवद गीता पढ़ते-पढ़ते प्रकट हुआ है कि परमात्मा को पाने के लिए कितने जोड़-तोड़ किये, उपाय किये पर जब तक करने वाला रहा तब तक वे सब व्यर्थ ही सिद्ध हुए ! गुरूजी के लिए कविता लिख रही है, उनका जन्मदिन आने वाला है, परसों ही तो है.

आज का ध्यान एक बड़ी सिखावन दे गया. वे जो भी भाव अन्यों के कारण प्रकट करते हैं, उनका स्रोत उनके ही भीतर होता है, वे ही कारण हैं, बाहर तो बस खूंटियां होती हैं, जिनपर वे अपने मन की भावनाओं को टांग देते हैं. उनका प्रेम या उनकी घृणा उनकी निज की सम्पत्ति है. आज सुबह एक स्वप्न देखकर उठी थी पर याद नहीं है. परसों रात को उड़ने वाला स्वप्न देखा था जिसकी स्मृति सुबह बनी हुई थी.

कल भी वर्षा हुई ! आज सुंदर शब्द सुने जो भीतर अभी भी गूँज रहे हैं. जग की आपाधापी में कहीं चुक न जाये संवेदना उर की... अंतर भीगा हो, वाणी में ओज हो और सहज ही सबको साथ लेकर चलने की कला हो..कलाकार की कला तभी फलती-फूलती है. कला का अभिमान भीतर की संवेदना को हर लेता है ! मार्ग में यदि कांटे हों तो कोई अनदेखा कर देता है, कोई खुद को बचा कर निकल जाता है पर संवेदनशील कांटे बीनता है और राह को अन्यों के लिए कंटक विहीन बना देता है ! जो सहनशील होगा वही अपनी कला को विकसित कर सकता है, सृजन शील हो जो वही कलाकार नित नया सृजन करता है. हर दिन कोई नया विचार, कोई नया गीत रचे मन.. प्रकृति ज्यों नित नई है, सनातन मूल्यों को पकड़ कर नया सृजन हो वैसे ही जैसे मूल को पकड़ कर नया फूल खिलता है.. स्वप्नशील हो अंतर उसका, एक शिव संकल्प जलता रहे भीतर जो सदा प्रेरित करे..

कल रात स्वप्न में मुस्लिम समाज को देखा, कोई जलसा हो रहा है, मुस्लिमों का इतिहास बताया जा रहा है, वह भी उसी हुजूम का हिस्सा है. कुछ दिन पहले भी कई मुस्लिम औरतों को, जो सफेद बुर्के पहने थीं, देखा था. शायद कोई पिछला जन्म रहा हो. स्वप्न में एक सखी को भी देखा. मन कितनी गहरी याद भीतर छिपाए रखता है. वे किसी के लिए कुछ भी करते हैं तो उसके पीछे यही भावना होती है कि लोग जानें. अहम की तुष्टि के लिए ही वे सारे कर्म करते हैं, ऊपर से भले यह दिखाई न पड़े.



Tuesday, November 15, 2016

सूरज और बादल


अप्रैल का अंतिम दिन ! देखते-देखते नये वर्ष के चार माह गुजर गये और गुजर गया उनके जीवन का का भी एक और हिस्सा. एक दिन सारी सांसें गुजर जाएँगी और वे आकाश में स्थित होकर देखेंगे अपने ही तन को निस्पंद ! उससे पहले ही यदि संसार को कुछ देना है तो दे देना चाहिए कुछ और गीत कुछ और कविताएँ ! ! मार्च माह की कविताओं में भी उसकी कविता सातवें पायदान पर आयी हुई, ‘पिता’ नामकी कविता अभी अगले तीन हफ्ते तक कहीं प्रकाशित नहीं करनी है. आज जून ऑफिस में ही लंच लेने वाले हैं. मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है. उन्होंने काफी कलात्मक भाषा में विदाई भाषण लिखा है. नन्हा पिछली बार एक किताब लाया था जिसमें साईं बाबा के किसी भक्त ने उनके साथ घटे अपने अनुभवों को लिखा है, आज कुछ देर पढ़ी.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, गले में दर्द था परसों शाम से ही. आज काफी ठीक है, लेकिन नाक बंद है. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई है तभी जुकाम हुआ या फिर यह किसी कर्म का परिणाम है. यदि भीतर प्रश्न जिन्दा रहते हैं तो समय-समय पर नये विचार आते हैं. यदि समझा-बुझा कर मन को शांत कर दिया और भीतर तक पहुंचे नहीं तो मार्ग अवरुद्ध हो गया, उदासीन होकर बैठ जाने से रास्ता मिलता नहीं.

कल चार तारीख थी, बच्चों को पढ़ाते समय उसने तीन लिखी, उन्होंने भी नहीं बताया, जबकि वे स्कूल भी गये थे. सोये-सोये ही वे सारी उम्र गुजार देते हैं, आखिर कब होगा जागरण ? आज मौसम गर्म है. मई में यही स्वाभाविक ही है. गले में चुभन है सो चावल खाने का मन नहीं है. योग वशिष्ठ में पढ़ा कि जब भोजन पचता नहीं तब व्याधि होती है. तनाव होने से भोजन नहीं पचता. महीनों से भोजन के समय वातावरण बोझिल हो जाता है, माँ कुछ खाना नहीं चाहतीं तो कभी पिताजी झुंझला जाते हैं कभी जून. आत्मा है ऐसा भान हर समय बना नहीं रहता, रहे तो भी मन, बुद्धि, शरीर सब अपनी जगह हैं जो प्रकृति के अनुसार चलेंगे. आज उसे लग रहा है अवश्य ही साधना में कोई गहरी भूल हो रही है अभी तक परमात्मा की कृपा को पूर्ण रूप से अनुभव नहीं कर पायी है. अब भी लगता है कुछ नहीं जानती !

उस साधक की लिखी किताब पढ़कर काफी कुछ स्पष्ट होता जा रहा है, कितने सोये रहते हैं वे, आसक्ति, राग व द्वेष के शिकार होते हैं और सोचते हैं कि सब जानते हैं. अपने अज्ञान का ज्ञान होना ही वास्तव में ज्ञान की पहली सीढ़ी है. मन कैसा धुला-धुला सा लग रहा है, पर अभी भी कितनी परतें छुपी होंगी, दबी होंगी. सद्गुरू दूर रहकर भी शिष्य को सन्मार्ग पर लाने का कार्य करते रहते हैं. सद्गुरू का प्रेम अनंत है, वे उन्हें क्या प्रेम करेंगे, उनके पास एक बूंद भी नहीं जो है भी तो उसमें न जाने कितनी वासनाएं घुली-मिली हैं. परमात्मा को जो अर्पित होगा वह पावन होगा, पर परमात्मा कृपालु है, वह कोई भेद करना जनता ही नहीं, जो उसे पुकारे उसी पर कृपा लुटाता है !

तन स्वस्थ हो तो मन भी स्वस्थ रहता है. आज एक गर्मी भरा दिन है, बाहर धूप बहुत तेज है. चमचमाता हुआ सूर्य जैसे गुस्सा गया है, बादलों को चिढ़ा रहा है कि अब देखें वे उसे ढक के...उधर बादल भी जब मौका देखेंगे बदला लेगें ही. पिताजी बाहर बैठे हैं, अख़बार पढ़ चुके हैं, चुपचाप बैठे हैं, भीतर कमरे में अपनी कुर्सी पर माँ बैठी हैं जैसे उनकी दुनिया से बाकी दुनिया जुदा है, वैसे ही बाकी दुनिया से उनके बच्चों की दुनिया जुदा है. कल नन्हे को साईं बाबा की बात कही तो वह उन्हें जादूगर कह रहा था. भगवान से बड़ा कोई जादूगर है क्या ? परमात्मा की ओर जो ले जाये वह जादूगर कृष्ण भी तो था..