Thursday, June 25, 2015

जस्सी की दुनिया


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, सुबह का वक्त नियमित कार्यों में बीत गया और सप्ताहांत होने के कारण दिन भर अलग तरह की व्यस्तता रही. आज ससुरजी वापस चले गये, नन्हा और जून उन्हें छोड़ने गये हैं तथा उनका पुराना फ्रिज ट्रेन में घर के लिए बुक करवाने भी, इसी महीने उन्होंने नया फ्रिज लिया है फ्रॉस्ट फ्री ! माँ उनके साथ रहेंगी. उनका प्रिय धारावाहिक टीवी पर आ रहा है, जैसे उसका प्रिय है जस्सी, जो अब रोचक मोड़ पर पहुंच चका है. नन्हा और दो हफ्ते साथ रहकर कॉलेज जाने वाला है. उसे एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया है, जो जिसका हकदार होता है उसे ही वह वस्तु मिलती है. वैसे वह आत्मनिर्भर है, जीवन में तरक्की करेगा. दुनिया जिसे तरक्की मानती है वैसी तरक्की न भी करे पर वह खुद की तलाश में लगा है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जून उससे बेहद प्यार करते हैं, इसे मोह ही कहा जायेगा. वे उसे कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. कल शाम को घर में कितनी चहल-पहल थी. सभी पिताजी से मिलने आये थे, आज चुप्पी छायी है. जीवन इसी उतार-चढ़ाव का नाम है, उन्हें इसका साक्षी बनना है !

इस क्षण को देखे तो सिर में हल्का भारीपन है, वर्षा हो रही है, नन्हा सो रहा है, जून कुछ देर पूर्व घर आकर ऑफिस गये हैं, आज से पांच दिनों तक उनकी ट्रेनिंग है, दोपहर के भोजन के लिए घर नहीं आयेंगे. टीवी पर शहनाई वादन हो रहा है. नैनी कपड़े धो रही है. उसके सिर के भारीपन का एक कारण है मानसिक द्वंद्व, उसे तो द्वन्द्वातीत होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है फिर यह क्या ? यह है असहिशुष्णता, किसी अन्य को सहन न कर सकने की प्रवृत्ति, ‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय’ उसका मन एकाकी रहना चाहता है, विरक्त, दीन-दुनिया से परे, उसे किसी भी वस्तु की न तो कामना है न ही परवाह, पर समाज ऐसे व्यवहार को अच्छा नहीं मानता. एकाकी व्यक्ति से समाज को डर लगता है. वह उसे भीड़ में वापस लाना चाहता है. उसके मन का दर्द तन में भी प्रकट होने लगा है. मन में जो भी घटता है उसका प्रतिबिम्ब तन पर पड़ता ही है. मन की थोड़ी सी नकारात्मकता भी शरीर के स्रावों पर काफी प्रभाव डालती है. भीतर जो कुछ भी घटता है उसका कारण भी भीतर होता है. वह जो भी सोचती है, कहती है अथवा करती है, उसका परिणाम भीतर पड़ता है. इधर-उधर के दर्द सब उसी का परिणाम हैं !


Wednesday, June 24, 2015

घन घन गरजें मेघा


जून माह का प्रथम दिन ! वर्षा की झड़ी लगी है, गर्जन-तर्जन भी जारी है. यात्रा से लौटने के बाद से दिनचर्या अभी तक सुव्यवस्थित नहीं हो पायी है. शनिवार को सासु माँ व ससुरजी आ रहे हैं, उसके पूर्व ही सब कुछ संवारना है. भीतर जब तक बिगड़ा है, बाहर भी बिगड़ा रहेगा. झुंझलाहट, अहंकार, कटु शब्द, अवमानना तथा आलस्य ये सारे अवगुण बाहर दिखायी देते हैं, पर इनका स्रोत भीतर है, भीतर का रस सूख गया है. सत्संग का पानी डालने से भक्ति की बेल हरी-भरी होगी फिर रसीले फल लगेंगे ही. संसार का चिंतन अधिक होगा तो उसी के अनुपात में तीन ताप जलाएंगे. प्रभु का चिन्तन होगा तो माधुर्य, संतोष, ऐश्वर्य तथा आत्मिक सौन्दर्य रूपी फूल खिलेंगे. कितना सीधा-सीधा हिसाब है. जगत जो दुखालय है दुःख ही दे सकता है, ईश्वर जो अनंत सुख का भंडार है, नाम लेते ही सारी पीड़ा हर लेता है. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष तथा अभिनिवेष ये पांच ही तो क्लेश हैं जो तामसी बुद्धि होने के कारण सताते हैं. उसने ईश्वर से प्रार्थना की उसकी बुद्धि को प्रकाशित करे.

आकाश में घने बादल छाये हुए हैं, गरज भी रहे हैं और बरस भी रहे हैं. हवा शीतल हो गयी है और मन भी. ध्यान में कुछ देर बैठी, ज्यादा समय नहीं मिलता. ईश्वर प्राप्ति के लिए मन में दृढ़ता नहीं है तभी नियम में दृढ़ता नहीं रहती. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा बना रह सकता है.

आज ध्यान में कई दृश्य दिखे, अंतर्मन की गहराइयों में कितना कुछ छिपा है. एक संस्कार जगते ही उसके पीछे विचारों की एक श्रंखला जग जाती है. ऊपर-ऊपर से वह कहती है कि देह नहीं है पर भीतर जाकर पता चलता है, चिपकाव देह से, मन से, बुद्धि से कितना गहरा है.


उसे फिर इस सत्य का अनुभव हुआ, न बोलना ज्यादा अच्छा है, व्यर्थ बोलने से, यह सही है कि बहुत बार वह बोलकर बाद में सचेत हुई है, न बोलने से कभी कोई समस्या नहीं हुई. वे जो बोल सकते हैं यह सोच सकते हैं पर जो बोल ही नहीं सकते वे कितनी विवशता का अनुभव करते होंगे. इस जगत में कितनी विचित्र परिस्थितियाँ हैं, एक से एक सुखकारी तथा एक से एक दुखकारी. यह जगत अनोखा है पर अब यह उसे आकर्षित नहीं करता. उसके भीतर का जगत ज्यादा सुंदर है, वह उसकी पहुंच में भी है. पूरा का पूरा ब्रह्मांड भीतर है. सूक्ष्म संवेदनाएं, सूक्ष्म भाव, सूक्ष्म तरंगें और विचित्र रंग, विचारों का उदय..ये सभी कुछ तथ कुछ दृश्य जो ध्यान में दीखते हैं , एक नयी दुनिया में ले जाते हैं, शायद मृत्यु के बाद और जन्म से पहले की दुनिया ! एक दिन तो उन्हें वहीं जाना है ! 

दा-विंसी-कोड-एक रोचक उपन्यास


उन्होंने शब्दों की होली खेली, कुछ शब्दों की बौछार इधर से हुई और कुछ शब्दों की बौछार उधर से और लग गई आग दिलों में. इस होली से तो भगवान ही बचाए. न जाने क्यों वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते फिर वही वाणी के रूप में बाहर आ जाती हैं. जानती है वह कि बाद में पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ आने वाला नहीं है. समाज में परिवार में सभी को साथ लेकर चलना है, साधना के लिए स्वार्थी तो नहीं हुआ जा सकता, उसकी आवश्यकता को कोई अन्य कैसे समझ सकते हैं, उसे ही धीरे-धीरे इस पथ पर लाना होगा. संसार का पथ तो अनेक जन्मों में चल कर देख चुकी है, यह बेपेंदी के लोटे जैसा है कितना भी जल डालो यह खाली ही रहेगा. परमात्मा के पथ पर आनंद ही आनंद है, लेकिन इस आनंद का भी यदि लोभ वह करने लगी तो...सहज रहना सीखना होगा, समभाव में रहना. परीक्षा की घड़ियाँ आएँगी पर स्वयं पर नियन्त्रण रखना है.
आज होली है, उसने ज्ञान की पिचकारी का रंग लगाया है, अब कोई और रंग उस पर चढ़ता ही नहीं. होली का अर्थ है सारी पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं को ज्ञान की आग में जलाकर मन को खाली कर देना. फिर से नव जीवन का आरम्भ हो, भुला देना सारे शिकवे-शिकायत, तब जो भीतर उमड़ेगा उसमें सारे रंग मिले होंगे.
कल रात को नन्हे ने जब फोन पर कहा कि उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही है तो जून और उसका चिंतित होना स्वाभाविक था. उन्होंने उसे आवश्यक निर्देश दिए और अपने रोज के कार्य सामान्य रूप से करते रहे. सुबह वह उठी तो जून ने कहा उन्हें देर तक नींद नहीं आयी, वह नन्हे की अस्वस्थता की बात से परेशान हो गये थे. वह भी जब अपने मन की अवस्था पर नजर डालती है तो उनसे बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती. यह बात और है जब मन को परेशान देखा उसने तो भगवन्नाम का ही आश्रय लिया, परमात्मा को सब कुछ सौंपना चाहा. उससे प्रार्थना भी की. भक्ति के लिए भक्ति अर्थात उससे कुछ भी न मांगे, यह दृढ़ता तो दूर हो ही गयी. उसने उन सबके लिए सुख व स्वास्थ्य माँगा. वह दाता है, सबकी सुनता है, किसी को निराश नहीं करता, उसकी मर्जी से ही वे सब इस दुनिया में आए हैं. वही चैतन्य है, उसका अंश आत्मा रूप से उनमें स्थित है. अभी यह उनका अनुभव नहीं है तभी वे मन की समता खो बैठते हैं. जैसे चित्रकार चित्र बनाता है वे दुःख बना लेते हैं.
कल की रात्रि स्वप्नों भरी थी, नन्हे को कई बार देखा, वह छोटा सा है और खाली फर्श पर सोया है. मन भी कितना पागल है, खुद ही सपने बनाता है और खुद ही परेशान होता है. नन्हे का रिजल्ट आ गया है उसने पहली बाधा पार कर ली है. जून भी निश्चिन्त हुए हैं. उसने da-vinci-code पढ़ ली है, बहुत रोचक किताब है. अज गुरूजी ने ‘योग वशिष्ठ’ पर चर्चा शुरू की. जीवन में दुःख है इसे पहचानना जरूरी है. तभी तो मन के पार जाया जा सकता है.

आज उन्हें यात्रा पर जाना है, इस यात्रा का उद्देश्य है नन्हे को सालभर की कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा दिलाकर घर वापस लाना, परीक्षा से पहले उसे उत्साह दिलाना तथा उसका स्वास्थ्य ठीक रहे उसका ध्यान रखना. ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी यात्रा को सफल करे.

Tuesday, June 23, 2015

विवाह की धूमधाम


मकर संक्रांति के दिन वे यात्रा पर निकले थे और दो हफ्ते बाद वापस आये, सो आज कई दिनों के बाद डायरी खोली है. सभी से मिलकर अच्छा लगा, बड़ी भांजी की शादी भी भली प्रकार से हो गयी. उन्होंने नये-नये स्थान देखे, पुराने मित्रों से मिले. कुल मिलाकर दो हफ्ते उनके लिए उम्मीदों व आशाओं से भरे थे. कभी-कभार ऐसे पल भी आए जब मन चिन्तन में लीन था. संगति का असर पड़ना स्वाभाविक था, लोभ भी जगा, कामना भी उठी. नये वस्त्रों की चाह उठी, संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी. चमचमाते बाजार देखकर खरीदने की इच्छा उठी, पर अब अपने पुनः अपने घर लौट आये हैं. यात्रा  बहुत कुछ सिखाती है, बीच-बीच में समय मिला तो सद्गुरु के वचन भी सुने. क्रिया नियमित रूप से की. मन टिका रहा इसी कारण. प्रमाद ने घेरा अवश्य पर भीतर की आग बुझी नहीं. कल रात को एक स्वप्न देखा, जिसमें ईश्वर चर्चा चल रही थी. भीतर जिसने आत्मा को एक बार जाना है वह उससे कभी भी विलग नहीं हो सकता चाहे गला डूब संसार में उसे क्यों न रहना पड़े.

मन जिस भाव में टिकता है, समझना चाहिए उस समय वही प्रबल है. उसका मन स्मरण में न टिककर संसार में जा रहा है. कल फिल्म देखी, जस्सी का भी आकर्षण है. सद्गुरु कहते हैं अपनी परीक्षा स्वयं नहीं लेनी है. अंततः मन लौट कर वहीं तो जाता है जो उसका आश्रय है. आज सुबह सड़क दुर्घटना में डा.विद्यानिवास मिश्र के निधन का समाचार सुना, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. ईश्वर उनके साथ सदा था, उनके भी और उनकी धर्मपत्नी के भी जिनका देहांत अभी डेढ़ महीने पूर्व ही हुआ था. आनंद के महासमुद्र में निरंतर वास करने वाली आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, नित्य है, चेतन है, अविनाशी है तथा प्रेममयी है. इसे जानते हुए यह जगत का व्यवहार उन्हें  करना है. जगत तब उन्हें छू भी नहीं सकता.


आज सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, एक संत जो भक्ति में नृत्य कर रहे थे और गा रहे थे, उसके सम्मुख आए. उनसे दृष्टि मिली, उसके देखते-देखते उनकी दृष्टि प्रखर होती गयी, आँखों की पुतलियाँ जैसे स्थिर हो गयीं और उनमें से कोई तेज निकलने लगा. उसकी आँखों तक पहुंचा और उसके सिर पर रखा दुप्पटा बल से ऊपर उठ गया और शरीर पर किसी आघात का अनुभव हुआ और अगले ही क्षण अभूतपूर्व आनंद तथा हँसी उसके सारे अस्तित्त्व से फूट पड़ी तो उसके आसपास के लोग भी चकित हो रहे थे, तभी अलार्म बजने लगा और उसकी नींद खुल गयी. आज जब ध्यान में बैठी तो निर्विचारिता के क्षण अधिक देर तक टिके तथा मौन का अनुभव भी हुआ. कितना अनोखा अनुभव था, आँखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था. आज की अनुभूति अलग थी. वैसे तो हर दिन का ध्यान अलग होता है. 

Monday, June 22, 2015

सुनामी की लहरें


नये वर्ष में पहला कदम, मन नव उत्साह से भरा है. जीवन की यात्रा में एक नया अध्याय लिखने का वक्त आ गया है. बगीचे में गुलाब व गुलदाउदी के फूल खिल रहे हैं. इस वर्ष पहले से ज्यादा सजग रहना है, समय का सदुपयोग करना है. अपने लक्ष्यों को पुनः निर्धारित करना है तथा नियमित दिनचर्या को भी. प्रतिदिन किये जाने वालों कार्यों की एक सूची यह भी हो सकती है- क्रिया, व्यायाम, संगीत अभ्यास, बागवानी, डायरी लेखन, कविता सृजन, कम्प्यूटर पर कार्य, सेवा कार्य, शास्त्र अध्ययन, घर के किसी हिस्से की सफाई, हस्त कला का कोई कार्य, अख़बार व पत्रिकाएँ पढ़ना. सोनामी लहरों के कहर को  बरपे एक हफ्ता हो गया है पर उसका प्रभाव अभी तक ताजा है पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया को तबाह करने वाला भूकम्प तथा तूफान एक लाख पचास हजार लोगों को मृत्यु के मुंह में झोंक गया है. लाखों लोग बेघर हो गये हैं, कितनों के पूरे जीवन की कमाई खत्म हो गयी है लोगों को इस झटके से उबरने में अभी काफी लम्बा वक्त लग सकता है. प्रकृतिक आपदा के शिकार लोग अपने भीतर की ऊर्जा को एकत्र कर पुनः अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं. कहाँ है वह कृष्ण ? जिसने गोकुल को वर्षा के कहर से बचाया था.

आज सुबह देर से उठे, दोपहर में वे सर्दियों की धूप का आनंद लेने घर के सामने वाले चाय बागान में घूमने गये वापसी में नन्हे के एक मित्र के यहाँ गये. नन्हा कोटा में है, उसे एक ऑब्जेक्टिव परीक्षा के दैरान बीच से उठकर आना पड़ा. फुफेरी बहन से बात की, आज फूफाजी की तेहरवीं है. योग रहस्य सीडी देखा व सुना, बाबाजी बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बताते हैं.

आज सुबह पंछियों की आवाजों के साथ नींद खुली, कोहरा घना था पर इस समय धूप खिली है. आज दोपहर एक सखी परिवार सहित भोजन पर आ रही है. वे लोग आज ही घर से आये हैं, उसकी माँ का दिल का आपरेशन पिछले माह हुआ था, जो अब स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं. सुबह आस्था पर स्वामी रामदेव जी का योग कार्यक्रम देखा. मन में एक द्वंद्व चल रहा था, मृणाल ज्योति के लिये कार्यरत रहने वाली लेडिज क्लब की सदस्या से मिलने का वायदा किया था, पर जा नहीं जा पाई, मिलकर आई तो मन जैसे हल्का हो गया.


आज सर्दियों की पहली बरसात हो रही है, रात को भी बादल गरजते रहे. मौसम ज्यादा ठंडा हो गया है, रात को एक स्वप्न में एक घायल बच्चे को देखा. सुनामी लहरों के विनाश की खबरों से आजकल अख़बार भरा रहता है. इतन दुःख उन लोगों को झेलना पड़ रहा है. जीते जी नर्क का अनुभव उन्हें हो रहा है, पर मानव के अंदर एक ऐसी शक्ति है जो हार नहीं मानती, वह फिर से खड़ा होता है. समय के साथ घाव भी भरने लगते हैं. जीवन क्षण भंगुर है यह संत सदा से सिखाते आये हैं. 

Friday, June 19, 2015

अनुभव की गूंज


परसों रात को लगभग साढ़े दस बजे होंगे जब सद्गुरु के दर्शन निकट से प्राप्त हुए, ‘अब खुश हो’ ये तीन शब्द उन्होंने उससे कहे, जब उसने एक हाथ से उनका पांव छूने का प्रयत्न करते हुए उनकी आँखों में झाँका. कैसी भ्रमित कर देती है उनकी उपस्थिति, वह कुछ भी न बोल पायी, मात्र सिर हिला कर मुस्करा दी, पर उनकी दृष्टि भीतर तक छू चुकी थी, उसने अपना काम कर दिया था. बाहर निकलते-निकलते तो मन भावों से इतना भर चुका था कि एक अनजान महिला ने, जो सत्संग में उसे देख चुकीं थी, कहा, जय गुरुदेव तो वह उनके गले लगकर रोने लगी. आसपास के लोगों को अजीब लगा होगा स्वयं वह महिला भी पूछने लगी कि आपने ऐसा क्यों किया, पर इन बातों का कोई उत्तर नहीं होता, बस मौन रह जाना पड़ता है. होटल वापस आकर चुपचाप सो गयी. ऐसी मधुर नींद आई जो सुबह साढ़े चार बजे खुली. क्रिया के दौरान अनोखा अनुभव हुआ, जैसे कोई अंतर्मन में प्रविष्ट होकर कुछ समझा रहा हो, तुम वही हो, वही तो हो, तुम्हीं वह हो की गूँज भीतर उठने लगी. वह यह मानकर गोहाटी गयी थी कि इस बार उसे सद्गुरु में ईश्वर के दर्शन होंगे. उसका विश्वास दृढ़ कराने के लिए ही ऐसे दुर्लभ अनुभव कराए. पहले से ही विश्वासी मन अब पूरी तरह ठहर गया है. उस क्षण से जिस भाव समाधि में डूबा है वह अभी तक उतरी नहीं है, रह-रह कर नेत्र भर आते हैं. ट्रेन में लेटे हुए आँखें बंद करने पर न जाने क्या-क्या दिखाई दे रहा था. जंगल, नदी, कभी तालाब, वृक्ष और आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा दर्शन हुआ. गुरू की कृपा उसके साथ है !

मन यदि एक बार उच्चावस्था में चला जाये तो उसे और कुछ भाता भी नहीं, कोई अमृत पाकर विष क्यों चाहेगा, कृपा से उसने उस अवस्था का अनुभव किया है अब वहीं लौटने के लिए ही सारी साधना है. पहले आलम यह था कि ध्यान में मन टिकता नहीं था और अब आलम यह है कि ध्यान से मन हटता नहीं है. परमात्मा को पाना कितना सरल है, जगत को पाना उतना ही कठिन, जगत को आज पाया कल खोना ही पड़ेगा, परमात्मा शाश्वत है एक बार मिल जाये तो कभी छोड़ता नहीं. जगत यदि थोड़ा सा मिले तो और पाने की इच्छा जगती है, परमात्मा एक बार मिल जाये तो और कोई चाह शेष नहीं रहती. जगत मिलता है तो दुःख भी दे सकता है, परमात्मा सारे दुखों का नाश कर देता है. और ऐसे परमात्मा का ज्ञान सद्गुरु देता है. सद्गुरु से सच्ची प्रीति किसी के हृदय में जग जाये तो उसका जीवन सफल हो जाता है. गुरु भौतिक रूप से कहीं भी हों, वह शिष्य को तत्क्ष्ण उबार लेते हैं. परसों रात को सोने से पूर्व उसके मन में जो पीड़ा थी, उसे उनके स्मरण ने कैसे हर लिया था. ‘अब खुश हो’ यह वाक्य उसके लिए एक मन्त्र ही बन गया है. गुरुमुख से निकला हर शब्द एक सूत्र ही होता है. कल रात को मृत्यु का ख्याल करके जब वह थोड़ी देर को शंकित हो गयी थी तो प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में अनोखा अनुभव हुआ जैसे वह बड़े वेग से शरीर छोड़कर ऊपर की ओर जा रही है, थोड़ा सा भय था, फिर नीचे आना शुरू हुआ और पुनः शरीर में वापस आ गयी. मृत्यु का अनुभव भी कुछ ऐसा ही होता होगा. एक दूसरे स्वप्न में बाथरूम के पॉट से विशाल जानवर निकलते देखे. ईशवर की महिमा विचित्र है. यह सृष्टि अनोखी है और इसका रचियता इससे भी अनोखा है, वह जादूगर है और यह उसकी लीला है. कोई यदि लीला समझकर जगत में रहे तो जगत बंधन में नहीं डाल सकता.         

Thursday, June 18, 2015

श्याम सुंदर का आगमन


आज कृष्ण जन्माष्टमी है, उन्होंने फलाहार लेने का व्रत किया है. मौसम भीगा-भीगा है जैसे उस दिन जब हजारों वर्ष पूर्व कृष्ण ने मथुरा की जेल में जन्म लिया था. कृष्ण उनकी आत्मा हैं, जगत में रहते हुए यदि उनका स्मरण बना रहे तो ही कोई अपने स्वरूप में स्थित रह सकता है. कृष्ण का अवतरण जब-जब भीतर होता है, तब-तब कोई अपने में स्थित होता है, अन्यथा स्वरूप से हट जाता है. कितने नाम हैं कृष्ण के, श्यामसुन्दर का अर्थ उसने सुना, श्याम हो गयी आत्मा को जो सुंदर बना दे वही है श्यामसुंदर ! गोपियों ने कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण किया था पर राधा ने स्वयं को मिटा ही दिया. स्वयं को मिटाकर वह कृष्ण रूप ही हो गयी. जब वह कृष्ण से अलग रही ही नहीं तो कैसा विरह, कैसी पीड़ा. विसर्जन करना बहुत कठिन है, अहम् का विसर्जन, शक्ति, समय, सेवा का विसर्जन, प्रिय के साथ एकाकार हो जाना. भक्त भगवान को स्वयं से अलग मानकर उसकी पूजा करता है, वह अपनी निजता को बचाए रखता है पर ज्ञानी भक्त स्वयं को मिटा देता है, वह स्वयं को उनसे अलग कैसे मान सकता है. किन्तु सेवा की यह भावना किसी बिरले को ही प्राप्त होती है. जन्मों के संस्कार अहंकार से मुक्त होने नहीं देते. कर्म का बंधन काटना उनका कर्त्तव्य है, मुक्तामा ही भक्ति कर सकता है. उसने प्रार्थना की, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ भी न करे जो किसी को दुःख दे, ईश्वर उसे सुबुद्धि दे. एक न एक दिन लक्ष्य मिलेगा, अहम् का विसर्जन होगा और वह परम प्रिय परमात्मा के प्रेम की भागी बनेगी. ज्ञान के साथ जीना यदि आ जाये तो संसार में दुःख का नाम भी नहीं दीखता, वही संसार जो पहले अशांति का कारण बन जाता था उसकी जगह एक सुंदर संसार ने ले ली है !
अभी कुछ देर पहले उसे कान्हा की झलक मिली, कितना सुंदर रूप था उसका, ऐसा रूप क्या उसका मन बना सकता है, विश्वास नहीं होता, वह परब्रह्म परमात्मा ही कृष्ण बनकर उसकी बंद आँखों के सामने प्रकट होने आया था. उनके मध्य माया का पर्दा थोड़ा झीना हुआ है, पर्दे के पार से वह कितना मोहक है तो जब सम्मुख आएगा तो हालत क्या होगी. प्रकृति पहले उन्हें तैयार करती है फिर अपने रहस्य खोलती है. उसका मन अभी तक पूर्ण शुद्ध नहीं हुआ है, तभी एक झलक दिखाकर कृष्ण लुप्त हो जाते हैं. शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा तीनों एक ही बात है. ईश्वर की निकटता का अहसास ही जब इतना मधुर है तो स्वयं ईश्वर कैसा होगा. संतजन इसलिए उसकी महिमा का बखान करते नहीं थकते. सद्गुरु की कृपा भी अनंत है जो अनंत का दर्शन करा देती है. सारा ज्ञान भीतर ही है, कहीं-कहीं वह प्रकट होता है, वे संतजन होते हैं जिनके भीतर का ज्ञान प्रकट होने लगता है.

तन की पीड़ा की झलक अब भी विचलित करती है मन, बुद्धि को, अभी देहात्म बुद्धि का क्षरण नहीं हुआ. क्षण दो क्षण को ही सही पर झुंझला जाता है मन अब भी, अर्थात मन का निग्रह अभी नही हुआ, पर भीतर जाते ही कैसा आनंद मिलता है और तब सब कुछ विस्मृत हो जाता है. सद्गुरु के ज्ञान का आश्रय लेकर स्वयं को समझाने में सफल भी हो जाती है वह. वाणी में कोमलता नहीं तो भक्ति अभी अधूरी है, कभी-कभी न चाहते हुए भी बोलना पड़ता है, तब भी भीतर का प्रेम जाना तो नहीं चाहिए, प्रेम तो सभी से बड़ा है न, प्रेम तो ईश्वर है न, ईश्वर किसी से बात करेगा तो प्रेमपूर्वक ही करेगा, चाहे वह पुण्यात्मा हो या पापी, और फिर वह तो उनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं, तो उसे अपनी वाणी पर प्रतिक्षण नजर रखनी होगी. कठोर बात न निकले, कहने का ढंग भी अप्रिय न हो, साधक यदि सचेत नहीं रहेगा तो पीछे चला जायेगा.