Friday, September 26, 2014

शुभकामना

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
आने वाले सभी पर्वों के लिए शुभकामना के साथ अगले दस-बारह दिनों के लिए विदा. आज ही हम बंगलुरु तथा कुर्ग की यात्रा पर जा रहे हैं. आशा है आप सभी के जीवन में विजयादशमी का उत्सव नई विजय की सूचना लेकर आएगा. परमात्मा हर क्षण हम सभी के साथ है.

अनिता 

साहित्य अमृत - एक पत्रिका


सत्-चित्त-आनन्द और सत-सिरी-अकाल एक ही सत्ता की ओर संकेत करते हैं, उस आनन्द को पाने के लिए ध्यान में उतरना होगा, क्योंकि इस आनन्द को कोई भौतिक इन्द्रियों से महसूस नहीं कर सकता, उसे तो निर्विकार, निर्विकल्प होकर ही अनुभव किया जा सकता है. आज जून ने उसकी किताब के प्रकाशक शर्मा जी से बात की, उन्हें किताब मिल गयी है, पर अभी तक फ्लापी नहीं देखी है. अब उन्हें धैर्य रखना होगा, उनका कार्य समाप्त हो गया है, अब शेष कार्य प्रकाशक का है. आज कोई नया स्वीपर आया है, इसके काम में सुघड़ता है. कल उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ के संपादक को वार्षिक चंदा भेजा. कल एक पुरानी डायरी में लिखी कई कविताओं को पुनः पढ़ा तो कई स्थानों पर नये शब्द सूझ गये, उसकी साहित्य यात्रा का आरम्भ धीरे-धीरे हो रहा है. नन्हा आज स्कूल गया है, आज सुबह जल्दी उठाया था उसे ताकि आराम से तैयार हो सके.  जून कल शाम को थोड़े खफा हो गये लगते थे, ‘स्क्वैश’ की सब्जी में नमक बहुत ही कम था, नन्हा और उसने खा ली पर वह नहीं खा पाए. आजकल वह उनका विशेष ख्याल नहीं रख रही है, अभी-अभी ‘ध्यान’ पर लिखी एक पुस्तक में पढ़ा, दूसरों की भावनाओं का सदा ध्यान रखना चाहिए, स्वयं को महत्व न देकर सामने वाले की ख़ुशी का ध्यान रखना चाहिए, मन जब निज स्वार्थ से ऊपर उठ जायेगा, जब अपनी ख़ुशी ही सर्वोपरि नहीं होगी तभी ध्यान सधेगा, और वास्तव में वही असली स्वार्थ सिद्धि होगी, अर्थात दूसरों का ख्याल रखकर कोई अपना ही ख्याल रख रहा होता है. घोष वाली वह किताब काफी पढ़ ली है, ‘डॉली’ उसकी एक पात्रा भी ध्यान करती है. दिल्ली की जनता CNG बसों के पर्याप्त मात्र में न होने के कारण बेहाल है, हिंसा पर उतर आए हैं लोग, उसे भतीजी का ध्यान हो आया, उसे स्कूल जाने में जरूर दिक्कत हुई होगी इस अव्यवस्था के कारण. अभी उसे दो पत्र और लिखने हैं, समय मिलते ही लिखेगी.

मानक.आज सुबह जो सुना था वही इस वक्त उसके मन में घुमड़ रहा है. सत्य की राह पर चलने वाले को कदम-कदम पर ध्यान रखना पड़ता है, मन को कुसंग से बचाना है, क्रोध से भी, न जाने कितने जन्मों के संस्कार, कर्म बीजों के रूप में  जो मन में पड़े हुए हैं, जरा सा प्रोत्साहन पाते ही विकसित हो जाते हैं. हर देखे, सुने का चित्र मन पर अंकित हो जाता है, इसलिए अनावश्यक देखना भी नहीं है, सुनना भी नहीं है. जाने अनजाने वे कोई जो भी इच्छा करता है वह समय पाकर किसी न किसी रूप में जरुर पूरी होती है. दुःख को मिटाते-मिटाते और सुख की चाह करते-करते जीवन बीत जाता है, मिथ्या की सत्यता स्पष्ट नहीं होती, तपन कम नहीं होती. ज्ञान रूपी सूर्य को पीठ देकर छाया के पीछे दौड़ते हैं. जीवन में क्रम या नियम तो होना ही चाहिए, इससे ही दक्षता आती है, दक्षता से ही खुद में श्रद्धा होती है, और श्रद्धा से ही खुद को पा सकते हैं. स्वयं को कोसना स्वभाव न बन जाये, इसका अर्थ होगा अपने से तुच्छ को ज्यादा महत्व दे दिया. सुखों के पीछे की गयी अंधी दौड़ पतन के मार्ग पर ही ले जाती है. The glass palace में एक-एक कर सभी मुख्य पात्र मृत्यु के ग्रास बनते चले जाते हैं, उनका भी एक दिन यही हश्र होगा, उससे पूर्व ही सचेत होना है. जिन वस्तुओं के पा लेने पर वे गर्व से फूले नहीं समाते वे उस वक्त काम नहीं आएँगी जब जीवन की अंतिम यात्रा पर जा रहे होंगे. वास्तविक सुख कहाँ है, उसकी खोज करनी है अथवा परम सत्य की खोज करनी है. यह संसार और सारे संबंध सभी वस्तुएं सापेक्ष हैं जो प्रतिक्षण बदलती हैं लेकिन कुछ तो इन सबके पीछे है जो मानक है जिसको मानक मानकर वे उसके जैसा होना चाहते हैं. वह आगे बढ़ते तो हैं, वहाँ तक पहुंच नहीं पाते पर प्रयत्न तो यही रहता है. इस एक परम सत्ता, परम सत्य की खोज में ही वास्तविक आनन्द है, शेष सारे कार्य उनके उस एक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त ही होने चाहिए, उनका व्यवहार, उनका संग, उनकी वाणी इस बात के परिचायक हों कि वे उस पथ के यात्री हैं !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, और आज भी सुबह नहीं लिख पाई, ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, सो बाकी सारे कार्य तो किये बीएस यही रह गया, क्योनी डायरी लिखना यानि खुद के करीब आना, और खुद के करीब आना एक खस मन स्थिति में ही सम्भव है. आज गोयनका जी आये थे, उनकी बताई विधि से ध्यान में देर तक बैठ पायी. बाबाजी ने भी इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को स्व में स्थित कर ध्यानस्थ होने की विधि बताई. कल शाम वे 'ग्लैडिएटर' देखने गये, वापस आये तो जैसे फिल्म का प्रभाव उनके मन, वाणी पर पड़ चुका था, वे एक-दूसरे से क्रोध में बात कर रहे थे. सुबह तक उसे यह असर महसूस हुआ. कल दोपहर को उसे पूसी के बच्चों की आवाजें आयीं, परसों उन्होंने अनुमान लगाया था की पूसी माँ बनने ही वाली है. कल शाम को दूर से उसे देखा, छत के निचे बनी पर छत्ती पर वह बैठी थी. कल रात में स्वप्न में एक मार्जारी को देखा, जो उन्हें पंजों से पकड़ क्र बुला रही थी, बिलकुल वैसे ही जैसे इन्सान बुलाते हैं. आज दोपहर उसने नैनी के लिए उसी के लाये कपड़े का ब्लाउज सिला कपड़ा नया तो नहीं था, पर सही हालत में था. हाथ का काम वह खुद करेगी. पूरे दो घंटे लगाये पर पता नहीं कितना सही बना है. अभी अभी एक सखी को फोन किया तो पता चला परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे तो उनके लिए तरबूज लाये थे, जून से ड्राइवर को भेजकर मंगवाने के लिए कहा है. सवा तीन हो गये हैं, नन्हा अभी तक नहीं आया है, उसका गला बभी सुख रहा है, दोपहर जून के जाने के बाद से चाय या पानी कुछ नहीं पिया है और अब एक गिलास ठंडा पानी पीने का वक्त ही रह गया है, थोड़ी ही देर में जून भी आते होंगे और उनके दिन का तीसरा भाग शुरू हो जायेगा.

  


Thursday, September 25, 2014

अमितव घोष की किताब



पिछले दिनों दो कार्य उससे ऐसे हुए हैं जो आज ध्यान के समय आकर कचोट रहे थे. जून को दफ्तर में किसी ने तोहफा दिया जो नूना के काम में आने वाला था, पहले तो नूना ने आनाकानी की पर बाद में स्वीकार कर लिया, जून ने इसे लिया यह भी ठीक नहीं था चाहे देने वाला उसके बदले में अभी कोई लाभ नहीं चाहता, पर भविष्य में जब भी उनके मध्य व्यवहार होगा इस उपहार की बात दोनों को याद रहेगी. दूसरी बात कि कल एक महिला अपने बीमार पुत्र का हवाला देकर कुछ सहायता मांगने आई थी, देखने में अच्छी खासी लग रही थी, उसने पात्रता/ सुपात्रता का बहाना बनाकर उसे कुछ भी नहीं दिया जबकि उस दिन मीटिंग में कुछ खरीद लिया, यह पैसे उसके कितने काम आ सकते थे. ईश्वर ने उन्हें इस योग्य बनाया है कि वे सहायता कर सकते हैं फिर अपने दरवाजे पर आये याचक को जब वे कठोर हृदय बन दुत्कार देंगे तो ईश्वर के दरवाजे पर उनकी फरियाद अस्वीकार होती रहे इसमें कौन सी बड़ी बात है. कल ही प्रायश्चित के महत्व पर सुना था आज वह अवसर भी आ गया है. उस महिला का दुःख तो किसी न किसी ने दूर कर ही दिया होगा पर उसके मन की कचोट जाने कब दूर होगी.

कल इतवार के कारण दिन भर कुछ नहीं लिखा. सुबह सफाई में जुट गये, दोपहर को कुछ देर टीवी और शाम को सुहाने मौसम में भ्रमण. The Golden Palace भी पढ़ी, काफी रोचक किताब है. आज इस समय सुबह के सवा आठ बजे हैं. राम नवमी है आज. उतर भारत में अवकाश का दिन. कुछ देर पूर्व छोटे भाई का फोन आया, उसके बैंक में क्लोजिंग है सो जाना पड़ेगा. उससे बात करके ख़ुशी हुई, सहोदरों से बात करके एक विशेष प्रसन्नता का अनुभव होता है. आज प्रार्थना में देर तक बैठ सकी. सुबह समाचारों में सुना, देश भर में कस्टम अधिकारियों के यहाँ छापे पड़ रहे हैं, करोड़ों की सम्पत्ति जब्त की जा रही है. वर्षों तक सरकार आख मूंद कर बैठी रहती है जबकि उसकी आँखों के सामने ही सब घटित हो रहा होता है. आज नन्हे के लिए एक लडकी का फोन आया जिसने दोस्त कहकर परिचय दिय नाम नहीं बताया. आवाज उसकी पुरानी स्टूडेंट से मिलती-जुलती थी. नन्हे के स्कूल में सभी टीचर्स काफी गम्भीर हैं इस वर्ष, वह भी नियमित पढ़ने बैठता है. उनके वक्तों से आज काफी कुछ बदल गया है. वे किसी तरह रट कर पास हो जाते थे पर आज के बच्चे सीखते व समझते हैं तभी इतने इतने अंक भी पाते हैं, उस समय पढ़ाई का सिस्टम ही अलग था.

कल रात भर वर्षा होती रही, मौसम ठंडा हो गया है. सुबह-सुबह एक सखी का फोन आया, नन्हे के बारे में पूछ रही थी, कल स्कूल से आया तो ढीला था, टिफिन भी वापस ले आया था, सो गया, रात को दवा दी अब ठीक है. वह फिल्म देखने के लिए बुला रही थी, नहीं जाना था उसे, वह इतने अधिकार से बुला रही थी कि एक बार तो मन हुआ पर जून और नन्हे को देखकर नहीं गयी. इतने दिनों से ‘रूपकुमार राठौर’ के कार्यक्रम में जाने को उत्सुक थी अब वह शौक भी नहीं रहा है. परिवार के सभी सदस्य जहाँ न जा सकें वहाँ जाना कुछ जंचता नहीं. गजल सुनना और वह भी तरन्नुम में... एक नायाब अनुभव होगा. अभी उस कार्यक्रम में बहुत दिन शेष हैं सो उसके बारे में सोचकर ज्यादा समय और ऊर्जा व्यय करना व्यर्थ है. कल शाम उड़िया सखी आई, उसे गुलदाउदी के पौधे चाहिए थे, उसने कुछ पौधे नये गमलों में से भी दिए जिनके फूल उन्होंने भी अभी तक नहीं देखे हैं. नन्हा आज घर पर ही पढ़ाई कर रहा है. आज भी भाई से बात हुई, जून ने उससे घर में चल रहे कार्य के बारे में पूछा, लकड़ी का काम अभी तक चल रहा है. फर्श जो उनके सामने बन गया था उसकी घिसाई का काम भी अभी तक नहीं हुआ है. जितना जल्दी हो सके उन्हें इस मकान को बेच देना है. उसकी किताब की पांडुलिपि मिल जाने की खबर अभी तक नहीं मिली है, वक्त आने पर सभी कार्य अपने आप होते जायेंगे, उसे ईश्वर पर उसके कार्यों पर पूरा भरोसा है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह भाग्यवादी है बल्कि यह कि वह धैर्यशील है. उसने ध्यान दिया लिखाई उतनी सुंदर नहीं है यह उसके मन की उद्व्गिनता का संकेत तो नहीं, यह बेचैनी ही तो जीवन का संकेत है !


Tuesday, September 23, 2014

भागवद पुराण का श्लोक


आज उनके महिला क्लब की मीटिंग है, उस दिन अंध विद्यालय में जाने के बाद से क्लब के प्रति उसका सम्मान बढ़ गया है, सो आज वह जा रही है. सुबह भाई-भाभी से बात की. आज जून उसकी किताब भेज रहे हैं. अभी-अभी असमिया सखी का फोन आया, उसने दूरदर्शन पर एक नीति वचन सुना था, बताया, यह भी कहा कि उसकी किताब देखकर उसे बेहद ख़ुशी हुई है. उम्र के साथ-साथ उनकी मित्रता भी परिपक्व हो रही है. बाबाजी ने आज एक श्लोक का अर्थ बताया जो भागवद पुराण से लिया गया था, “कल का अजीर्ण आज के उपवास से दूर किया जा सकता है और कल का प्रारब्ध आज के पुरुषार्थ से”. मानव अपने भाग्य का विधाता स्वयं है. वास्तव में यदि वे प्रयत्न करें और सच्चे हृदय से ईश्वर के मार्ग पर चलें, ईश्वर का मार्ग यानि सच का मार्ग, तो उनके कार्य सफल होने लगते हैं. खोट भीतर नहीं होनी चाहिए, ईमानदारी का सौदा है यह. आज नैनी ने कहा उसके पास एक धार्मिक पुस्तक है जिसमें उर्दू और असमिया दोनों भाषाओँ में लिखा है. एक सूरा ऐसी है जिसको पढ़ पाने से शैतान कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता. अन्धविश्वास में डूबा है आज भी मुस्लिम धर्म. वह उस किताब को पढ़ना चाहती है क्यों कि उसे कुरान को छूने की इजाजत नहीं है. कल रात वर्षा हुई और कहीं पास ही बिजली भी गिरी. बादलों की गड़गड़ाहट की जोरदार आवाज हुई उसकी नींद खुल गयी और उस कविता का स्मरण हो आया जिसमें दिल धड़कने का जिक्र है. संसद में अवकाश है सो पता नहीं चल पाता दोनों पार्टियाँ कितना विरोध कर रही हैं, धीरे-धीरे तहलका का ज्वर उतरने लगा है. लोग एक दूसरे से क्षमायाचना कर रहे हैं. भविष्य में वे लोग सचेत रहेंगे इतना तो फायदा इस प्रकरण से होगा ही. उसे आज दोपहर को वह अधूरी गजल पूरी करनी है.  

कल की मीटिंग अच्छी रही. एरिया टेन ने एक रीमिक्स कोरस गया और एक समूह नृत्य भी पेश किया. एक महिला कुछ कास्मेटिक प्रोडक्ट्स लेकर आई थी और कुकिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था. वह पड़ोसिन सखी के साथ गयी थी. उसने ‘ध्यान’ करने का प्रयास किया पर सफल नहीं हुई, नैनी का बेटा तेज संगीत बजा रहा था, सडक पर वाहनों की आवाजें थीं और वर्षा की रिमझिम भी, जो कल रात से हो रही है. उसने आँखें बंद कीं तो तंद्रा घेरने लगी, कभी-कभी ऐसा होता है जब मन शांत नहीं हो पाता. आज का दिन सामने पड़ा है कोरे कागज की तरह, जो चाहे लिख दे. दोपहर का कार्य नियत है. शाम कुछ भिन्न हो सकती है. कल लाइब्रेरी से अमितव घोष की एक पुस्तक लायी है कल शाम ही थोड़ी सी पढ़ी. अभी robert फ्रॉस्ट की कविताएँ भी पढ़नी हैं. ढेर सारी पत्रिकाएँ भी अनपढ़ी पड़ी हैं. रोज का अख़बार पढ़ने में भी समय जाता है. इन्सान का छोटा सा दिमाग (ब्रह्मांड से भी विशाल है वास्तव में ) कितना कुछ समेटना चाहता है. कल GLSV का प्रक्षेपण किसी खराबी के कारण टाल देना पड़ा, शुरू होने से पहले उसका दिल धड़क रहा था, लग रहा था, सब कुछ ठीक नहीं होगा. खैर, अगली बार जरूर वैज्ञानिकों को सफलता मिलेगी. कल भारत मैच भी हार गया. नैनी ने असमिया में वह पुस्तक लाकर दी है जिसमें से उसे ऐसी सूरा चाहिए जिसे पढ़कर शैतान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

कल की शाम एक सखी और उसके बेटे के नाम थी. वे शाम को साढ़े चार बजे ही आ गये थे, जून को हाउसिंग सोसाइटी की मीटिंग में जाना था. साढ़े आठ पर वे वापस आये तब तक नन्हा और उसका मित्र खाना खा चुके थे. वह सखी के साथ पहले टहलने गयी फिर चाय पी और बाद में डिनर की तैयारी. उसका साथ सहज लगता है, कितनी बातें बतायीं उसने अपने परिचितों की और इधर-उधर की. कुछ देर उन्होंने क्रॉस वर्ड्स हल किया. समाचार नहीं सुन पायी कल रात. आज सुबह सुना पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रही हैं. राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र अथवा विरोधी नहीं होता. आज जागरण में एक सन्त का भावपूर्ण प्रवचन सुना, कह रहे थे रोना, हँसने से ज्यादा बेहतर है बशर्ते आँसूं पश्चाताप के हों यहाँ तो कोई गलत है यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होता तो पछतावा क्यों करेंगे, हर कोई अपने को सही साबित करने पर तुला है. आज सुबह ससुराल से फोन आया, कल वे लोग नये घर में रहने चले गये हैं, गृह प्रवेश में बड़ी ननद भी आई है, काफी चहल-पहल रहती होगी. दिन भर किचन में भी हलचल रहती होगी. आजकल ‘ध्यान’ में वह पांच-दस मिनट से ज्यादा नहीं बैठ पाती है सम्भवतः आस-पास होती हलचल इसका कारण हो, उसे दूसरा समय चुनना होगा जब कोई बाधा न हो. यह भी सही है कि जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक पढ़े काफी समय बीत गया है और प्रतिपल सजग रहने का जो अभ्यास उन दिनों हो गया था आजकल छूट गया है. एक बेखुदी सी छायी रहती है जैसे वह किसी spell के अंदर है. जमीन पर आ जाना ही बेहतर होगा,. वास्तविकता की ठोस जमीन पर, जहाँ अपनी कमियां भी बखूबी नजर आती रहें. एक परिचिता से मिलने का वादा किया था जो आज ही पूरा करना होगा.




Monday, September 22, 2014

ब्रेल लिपि में पुस्तक


अभी-अभी जून का फोन आया उन्हें उसका फोटोग्राफ चाहिए था जो किताब के अंतिम पृष्ठ पर छपेगा. प्रकाशक का इमेल आया था उसने पूछा है कि वे पाण्डुलिपि कब भेज रहे हैं. वे अगले हफ्ते के शुरू में ही भेज पाएंगे, उसका स्वप्न अब आकार लेता हुआ प्रतीत हो रहा है. इसके बाद ही वह सबको पत्र लिखेगी. तहलका प्रकरण इस कदर मन पर छा गया है और इसको बढ़ावा देने वाले हैं टीवी व अख़बार. क्या ये सब मिलकर सड़ी-गली इस व्यवस्था में सुधर ला पायेंगे ? वे पत्रकार जिन्होंने पर्दे के पीछे छिपे ढके कारनामों को सबके सम्मुख ला दिया है, क्या सचमुच बदलाव चाहते हैं ? कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये, उनका छोटा बेटा अस्वस्थ था, घर में सीलन की सी एक गंध आ रही थी जो बीमारी का कारण हो सकती है. आज सुबह एक परिचिता से बात हुई, उनका पुत्र दसवीं की परीक्षा दे रहा है, आगे की पढ़ाई के लिए कहीं भेजना चाहते थे पर अब यहीं रहकर पढ़ेगा. उन्हें भी नन्हे के लिए निर्णय लेना है, वह भी बारहवीं तक की पढ़ाई यहीं रहकर करे तो उन सभी के लिए अच्छा होगा. अभी-अभी एक सखी से बात हुई, बात तहलका से शुरू होकर मिसेज गाँधी पर लिखी किताब के जिक्र पर पहुंच गयी जिसमें उनके प्रेम प्रसंगों की जानकारी है. किसी के व्यक्तिगत जीवन पर कलम चलाना, फिर जो व्यक्ति कितने उच्च पद पर रह चुका हो और जो इस दुनिया में नहीं है, बहुत साहस का काम है, सच को उजागर करना इतना आसन नहीं है, लेकिन यही कार्य यदि कोई सस्ती लोकप्रियता के लिए करे तो बेहद निचले स्तर का लेखन है यह.

पिछले दो दिन व्यस्तता में गुजरे, परसों यानि शनिवार की सुबह उन कार्यों में व्यस्त रही जो इतवार की सुबह करती है और कल यानि इतवार की सुबह मोरान जाने के लिए तैयार होने में. बहुत समय से उसका मन था वहाँ के अंध विद्यालय जाने का, एक बार वे गये थे तो अवकाश चल रहा था, बहुत थोड़े से विद्यार्थी ही वहाँ थे. कल लेडीज क्लब की दो सदस्याओं के साथ उन लोगों के लिए भोजन लेकर वह गयी थी. इतने सारे अंध बच्चों या व्यक्तियों को देखने का यह उसका प्रथम अनुभव था. पहली नजर में वे सामान्य ही लगते हैं, वैसे ही बातें करते, मुस्कुराते चलते हैं पर पास से देखने पर उनके चेहरे के भाव सामान्य नहीं लगते. वे ज्यादा शांत लगते हैं. उन्हें दुनिया की कुरूपता को देखने का मौका जो नहीं मिला. लडके-लडकियाँ दोनों ही थे, हर उम्र के थे. वे आपस में या उनसे एक बार भी नहीं टकराए. अपनी-अपनी नियत सीट पर आकर बैठ गये और भोजन आरम्भ करने से पूर्व समूह प्रार्थना के स्वर गूँजे, जिसमें मधुरता थी. प्रिंसिपल के ऑफिस में कई वाद्य यंत्र पड़े थे, उन्होंने कहा, यदि वे इतवार अथवा छुट्टी के दिन आयें तो स्कूल का वातावरण देख पाएंगे, बच्चे उनके लिए संगीत का आयोजन करेंगे और वह चहल-पहल जो आमतौर से किसी भी स्कूल में होती है उन्हें देखने को मिलेगी. उसने पहली बार ब्रेल लिपि की पुस्तक भी देखी. यह विद्यालय पश्चिम बंगाल के फिल्म कलाकार विक्टर बनर्जी के पिता ने आरम्भ किया था, पच्चीस साल हो चुके हैं. स्कूल के पास काफी जमीन है बिल्डिंग भी बड़ी है, निर्माण कार्य चल रहा है. आस-पास की समाजसेवी संस्थाएं मदद देती रहती हैं. उनका क्लब भी हर महीने बच्चों के लिए भोजन भेजता है. वे बच्चे एक दूसरे से सामान्य बच्चों की तरह छेड़खानी भी कर रहे थे. उन्हें अपनी कमी का जैसे अहसास ही नहीं था क्यों कि दुनिया की रंगीनियों से वे बेखबर हैं.

 कल पिछले साल की डायरी में कविताएँ ढूँढ़ रही थी, कुछ पन्नों पर दृष्टि अटक गयी, लगा उस वक्त वह सत्य के ज्यादा निकट पहुंच गयी थी. उन्ही दिनों एक पेज पर ‘मिशन स्टेटमेंट’ लिखा था, पुस्तक छपवाने का और आज वह फलीभूत हो रहा है. प्रतिपल मन पर नजर रखने का प्रयास तो चलता ही रहता है, लेकिन वक्त के एक-एक क्षण का सदुपयोग और वाणी का संयम, ये नहीं सधते. पिछले दिनों आहार का विशेष संयम भी नहीं किया सो भारी तन से विचार भी गरिष्ठ ही उत्पन्न होंगे न. पत्र लिखने क कार्य शुरू नहीं कर पा रही है, अंतर्प्रेरणा की प्रतीक्षा है. कल दीदी, छोटे भाई व बहन तीनों से ही बात हुई. वे सभी भाई-बहन एक दूसरे के मन को समझते हैं, एक अटूट डोर से बंधे हैं. माँ की आँखें सामने रखे फोटो में यही कहती हुई प्रतीत हो रही हैं. जून उसकी किताब के लिए पूरे मनोयोग से जुटे हैं, उनका प्रेम उसके प्रति असीम है, जो हर छोटे-बड़े काम में झलकता है. नन्हा अपने मन की करना चाहता है, वह उम्र के उस दौर से गुजर रहा है जहाँ अपने निर्णय स्वयं लेने की प्रवृत्ति बेहद बलवती होती है. कल शाम वे पड़ोसी के यहाँ गये. पिता की मृत्यु होने पर उन्होंने मुंडन करवा लिया था. उसे लगा उनके पंजाबी समाज में यह रिवाज अब खत्म सा ही हो गया है. पड़ोसिन सखी ने कई अंग्रेजी फिल्मों के बारे में बताया. उन्हें फ़िल्में देखने का समय ही नहीं मिल पाता. वर्षों पहले नूना बहुत देखती थी पर अब अपनी संस्कृति ही भाती है. आज समाचारों में पाकिस्तान में टेप पर रहस्योद्घाटन की बात सुनी जिसमें नवाज शरीफ द्वारा जज पर जोर डाला गया है कि बेनजीर के खिलाफ मुकदमे का फैसला जल्दी हो और उसके खिलाफ हो. पत्रकारिता और जासूसी में कोई भेद नहीं रह गया है. आजकल फोन पर हों या अपने घर में, राजनेता कहीं सुरक्षित नहीं हैं. उनके पाप का घड़ा भर गया लगता है.


Saturday, September 20, 2014

अदरक वाला पुलाव


जो उसका है, उसकी मान्यता अथवा उसका विचार है, वही सत्य नहीं है, बल्कि जो सत्य है वह सम्पूर्णता के साथ उसे स्वीकार्य है. सत्य अंततः प्रकट होकर ही रहता है, देश इस वक्त ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहाँ सच- झूठ में भेद स्पष्ट नहीं दीख रहा. कानपूर के लोगों को कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार होना पड़ा. जो शहर ऐसे लोगों को प्रश्रय देता है उसे उसका फल कभी न कभी भुगतना ही पड़ता है.
कल उन्होंने एक सौ दस कविताओं की सूची बना ली और सभी को जाँच भी लिया है. आज प्रकाशक से फोन पर बात करेंगे, सम्भव हुआ तो इसी हफ्ते अथवा सोमवार को पाण्डुलिपि भेज देंगे. कल शाम कम्प्यूटर के सामने ही बीती, सांध्य भ्रमण का वक्त भी नहीं निकाल पाए. नन्हे के स्कूल में पढ़ाई शुरू हो गयी है. इस वर्ष से हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम प्रतिशत में नहीं बल्कि ग्रेड्स पर आधारित होगा, इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति जो डर बैठा हुआ है, विशेषतया हाई स्कूल के लिए, वह कम होगा. पिछले दिनों उनकी अनुपस्थिति में माली ने बगीचे की उपेक्षा की और आने के बाद उसने भी ठीक से देखभाल नहीं की, कल शाम ऐसे बहुत से कार्यों पर नजर गयी जो शीघ्र ध्यान चाहते हैं. गन्धराज का वृक्ष एक तरफ से सूख गया है, कुछ वर्ष पूर्व यह फूलों से लद जाता था, एक बार ज्यादा कटवा दिया तो छोटे भाई के शब्दों में वह नाराज हो गया, वृक्ष बहुत संवेदनशील होते हैं. कल उसने हफ्तों बाद रियाज किया, मन-प्राण संगीत के रस में डूब गये.

 मन के बन्धनों को उन्हें स्वयं ही खोलना है, अज्ञान ने उन्हें बेसुध कर रखा है. ज्ञान जो शाश्वत है वही साधन बनेगा और ज्ञान को ही उन्हें साध्य भी बनाना है. यह सही है सदा उसके दुःख, पीड़ा या परेशानी का कारण अज्ञान ही होता है. सच का आश्रय लेकर यदि जीवन के यात्री बनें तो यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न हो सकती है. लेकिव वे क्षणिक सुख की ललक अथवा लोभ वश झूठ का साथ दे देते हैं. सुविधाओं का आकर्षण ही तो रिश्वत लेने पर विवश करता है. देश या राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्ति भी जब अनैतिक कार्य करते हैं तो साधारण जन में दिशाहीनता व अराजकता की भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. कानपूर के दंगे इसी का परिणाम हैं. पिछले कई घोटालों की तरह यह बात भी धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाएगी और लोग फिर विश्वास करने लगेंगे उसी व्यवस्था पर, जो आज पूरी तरह सड़ चुकी है. पर इसी विनाश में से पुनः निर्माण होगा, करोड़ों लोगों की आस्था व्यर्थ नहीं जाएगी. कल शाम उन्होंने उसकी पुस्तक का मुखपृष्ठ भी बना लिया, नीला रंग जो उसे प्रिय है और शांति व पवित्रता का प्रतीक भी है, मुख्य है. कल छोटी बहन का फोन आया, एक वृद्धा के बारे में बताया जो कई व्याधियों से ग्रस्त हैं पर अपने स्वाद पर संयम नहीं रख पातीं. रसमलाई, बेसन के लड्डू और तला हुआ चिवड़ा-मूंगफली बहुत अधिक मात्रा में बना कर रख रही हैं. उनका मन भोजन में बुरी तरह से अटका हुआ है, खाना बनाना उनका प्रिय कार्य है. कल शाम एक मित्र परिवार मिलने आया, दोनों बच्चे बेहद दुबले थे, हाथ-पैर जैसे बांस की खरपच्चियों के बनाये हों, जिन्हें छूने से भी डर लगता था. बातों में उसने महसूस किया बच्चों की माँ भी अपने स्वर्गीय माँ-पिता को बहुत याद करती है.

आज बाबाजी ने कहा, “भक्ति स्वयंफल रूपा है. जब मन पूरी तरह समर्पित होता है, ध्यान अपने आप होने लगता है. परमात्मा की प्रतीक्षा नहीं करनी है बल्कि समीक्षा करनी है. बुद्धि और हृदय जब एक हो जाते हैं तब कृपा का अनुभव होता है.” कल शाम पुस्तक का प्रारूप लगभग तैयार हो गया, अब आत्मपरिचय देना शेष है जो आज दोपहर वह टाइप करने वाली है. टीवी पर तहलका मामले के खिलाफ़ और पक्ष में इतने बयान  आते हैं कि सच-झूठ का फैसला करना कठिन होता जा रहा है. लेकिन उसकी निजी राय यह है कि यह प्रकरण सरकार गिराने के लिए किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. कल दोपहर पिता को पत्र लिखना आरम्भ किया, पर पूरा नहीं कर पाई, अधूरा ही फाड़ देना पड़ा, माँ के बिना उन्हें पत्र लिखना एक कष्टप्रद कार्य है. माँ की तस्वीर जबकि हमेशा सामने रहती है, वह मुस्काते हुए आश्वासन देती हुई सी लगती हैं. फिर भी दिल है कि मानता नहीं.


कल दोपहर जून लंच पर नहीं आये, उसने अदरक डाल कर पुलाव बनाया, घर से आने के बाद भोजन पर ज्यादा ध्यान जाता है. वहाँ सभी हष्ट-पुष्ट नजर आते थे, उनका परिवार ही सबसे दुबला-पतला लगता था. वे अपना वजन कम रखने के चक्कर में नन्हे को भी कम तेल-घी का भोजन दे रहे हैं, हो सकता है यही कारण हो कि वह अभी तक पूरी लम्बाई नहीं ले पाया है. उसके लिए ही केक बनाया था, अगले हफ्ते चॉकलेट केक की फरमाइश की है उसने. कल जून उसके लिए हिंदी का अख़बार लाये जिसमें वह अपनी कविताएँ भेजना चाहती है. 

Friday, September 19, 2014

चाणक्य नीति


अभी कुछ देर पूर्व उसके मन में यह विचार आया कि क्यों न अपने नित्य के डायरी लेखन को ऐसा रूप दे जो बाद में पुस्तक रूप में आने के योग्य हो जिसका नाम हो उसकी आध्यात्मिक डायरी और यह उसके उन प्रयासों का लेखा-जोखा हो जो वह एक बेहतर मानवी बनने के लिए करना चाहती है. कभी सफल होती है कभी नहीं भी होती. यह परिवार, समाज, राज्य और देश उससे भी अधिक मानव मात्र के प्रति उसके संबंधों को प्रदर्शित करे जिसमें दिन-प्रतिदिन में (बाहरी तथा आंतरिक दोनों) घटने वाले व्यापारों का निष्पक्ष विवरण हो, जो आज के समय का दर्पण हो, व्यक्तिगत स्तर के साथ साथ देश के स्तर पर भी जो महत्वपूर्ण घटा हो तथा जसका असर किसी न किसी रूप से उन पर पड़ने वाला हो. वह यह लिख रही थी कि नन्हा अस्पताल से चिकन पॉक्स का प्रतिरोधक टीका लगवा कर आ गया. कल ही उसके पापा ने कम्पनी के अस्पताल में बेहद महंगा यह टीका लगवाने का प्रबंध किया था. न जाने क्यों उसे इसके प्रति श्रद्धा नहीं है और उसने देखा कि न ही नन्हे को इसके लग जाने से कोई राहत का अहसास हुआ, भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता, क्या यह टीका लगवा लेने के बाद कभी भी उसे चिकन पॉक्स नहीं होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता. जिस देश में आपरेशन करा लेने के बाद भी औरते माँ बन जाती हैं वहाँ ऐसा संदेह होना क्या स्वाभाविक नहीं ? कल नन्हे को दसवीं की किताबें मिल गयीं यह वर्ष उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष है और उनके पूरे परिवार का भविष्य इससे कहीं न कहीं जुड़ा है.

‘तहलका डाट कॉम’ नामक कम्पनी ने खोजी पत्रकारिता के द्वारा देश की सत्तारूढ़ पार्टी तथा गठ्बन्धन के दिग्गज नेताओं व रक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों को बेनकाब कर  देश में तहलका मचा दिया है. एक काल्पनिक कम्पनी के प्रतिनिधि बन कर कुछ पत्रकार छह महीनों तक नेताओं व अधिकारियों से बेरोक-टोक मिलते रहे, उनको सौदे कराने में सहायता करने के एवज में रिश्वत देते रहे, उनकी तस्वीरें उतारते रहे और किसी को भनक भी नहीं हुई. इससे यही अर्थ निकाला जा सकता है कि रक्षा संबंधी मामलों में पैसों का लेनदेन एक सामान्य घटना है, कि पार्टी फंड के नाम पर ऐसा तो हमेशा से होता आया है. प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री ने अपने टीवी भाषण में देशवासियों को विश्वास में लेने की कोशिश की है पर जनता जो पहले से ही राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार में लिप्त मानती है, एक और नाटक की साक्षी बनी यह सवाल पूछेगी कि नेताओं का पेट इतना बड़ा क्यों बनाया ईश्वर ने ?

कल शाम कुछ मित्र परिवार मिलने आये, चर्चा का विषय तहलका ही बना रहा. यह भी सम्भव है, सरकार गिर जाये और दुबारा चुनाव हों पर भ्रष्टाचार का अंत तो इससे नहीं हो जायेगा. बातों-बातों में किसी ने कहा, चाणक्य शाम को जब अपने निवास पर लेखन कार्य करता था तो दरबार का कार्य होने पर राज्य की लेखन सामग्री का उपयोग करता था, अपना कार्य अपनी लेखन सामग्री से करता था. आज के मंत्री चाहते हैं, उनके परिवार का ही नहीं आने वाली पीढ़ियों का व्यय भी राज्य वहन करे.

आज नन्हे की नई कक्षा की पहली क्लास होगी, आज पूरे एक महीने की छुट्टियों के बाद  स्कूल खुला है. कल उसकी स्कूल ड्रेस की जाँच की तो पता चला पैंट छोटी हो गयी है और कमीज बेरंग, जून उसी समय नये कपड़े दिलाने ले गये, भाग्यशाली है वह कि आवश्यकता होते ही उसकी पूर्ति का साधन उसके माता-पिता के पास है, ऐसे हजारों-लाखों बच्चे हैं जो धन के अभाव में स्कूल तक नहीं जा पाते हैं. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, उनके वृद्ध माता-पिता आये हुए थे. पिता अशक्त हो गये हैं, डायबिटीज के मरीज हैं लेकिन मन उतना ही सशक्त और इच्छालु है. दूसरों की बात समझना ही नहीं चाहते अपनी इच्छा यदाकदा जाहिर कर देते हैं, वरना चुप रहते हैं. माँ सामान्य हैं. पिछले दिनों कई वृद्धजनों से मिलने का अवसर मिला है. अंत समय तक जो समझदारी का परिचय दे, दूसरों की भी सुने, सदा अतीत में ही न विचरे, ऐसे कम ही मिले. उनकी अपनी वृद्धावस्था आदर्श हो ऐसी उसकी कल्पना है. शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें इसका प्रयास अभी से करना होगा. आर्थिक रूप से किसी पर बोझ न बनें और ऐसी प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना भी त्यागना होगा जो बुढ़ापे में तकलीफदेह होती है जैसे स्वाद के आधार पर भोजन का चुनाव, व्यायाम करने में आलस्य और व्यर्थ ही बोलने की आदत. आज गोयनका जी ने कहा, सम्यक शील और सम्यक समाधि होगी तभी सम्यक प्रज्ञा जागेगी और प्रज्ञा यानि प्रत्यक्ष ज्ञान, अपनी अनुभूतियों पर उतरा ज्ञान ही काम आता है, दूसरों का ज्ञान प्रेरणा भर बन सकता है अपर जीवन दृष्टि नहीं दे सकता.