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Tuesday, March 5, 2024

सरसों का साग

सरसों का साग 


आज प्रातः भ्रमण करते समय कुछ देर ‘वॉकिंग मैडिटेशन’ किया। इसमें हर कदम को सजग होकर उठाना है और दोनों हाथ देह से सटाकर रखने हैं, उन्हें हिलाते हुए नहीं चलना है। ऐसा करने से विचार रुक जाते हैं और भीतर मन ठहर जाता है। मैडिकेशन या मैडिटेशन दोनों से एक का चुनाव हर व्यक्ति को करना ही पड़ेगा। शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से स्वयं को स्वस्थ रखना हो तो ध्यान सर्वोत्तम उपाय है। गुरुजी के बताये कितने ही ध्यान मन को ऊर्जा से भर देते हैं। मन तब मनमानी करने से आनंदित नहीं होता बल्कि अपने लिए स्वयं काम तय करता है। जैसा सुबह तय किया था, उसने दोपहर को एक चित्र बनाया, एक कविता लिखी और एक पोस्ट ब्लॉग पर प्रकाशित की।कितना सही कहा है किसी ने परमात्मा भी उनकी सहायता करते हैं जो अपनी सहायता आप करता है।शाम को वर्षा के कारण बाहर जाना नहीं हुआ।रात को भी हल्की रिमझिम थी, जून को ऐसे मौसम में घर पर रहना ही भाता है, उन्हें लगता है चप्पल भीग जाएगी, कपड़ों पर छींटे पड़ेंगे सो अलग, पर उसके लिए बारिश एक उपहार है और उसके साथ जुड़ी हर बात भी।इसलिए दस-पंद्रह मिनट की छोटी सी वॉक के लिए वह छाता लेकर अकेले ही निकल गई। रात्रि नौ बजे आर्ट ऑफ़ लिविंग की दिव्य कांचीभोटला जी  का इंस्टाग्राम पर कार्यक्रम है। वह ‘ग्लोबल एन्सिएंट नॉलेज सिस्टम’ पर बोलने वाली हैं। उसे ट्रांस्क्राइब करना है। पूरा शब्द ब शब्द नहीं, केवल मुख्य बिंदु लिखने हैं। नौ बजे से आरम्भ होगा।बाद में उसका हिन्दी अनुवाद करना है।दिव्या जी एओएल की रिसर्च विंग श्री श्री इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड रिसर्च की डायरेक्टर हैं। जून ने भी पहले कुछ महीनों तक यहाँ कुछ काम शुरू किया था। यहाँ पर ध्यान, योग, आयुर्वेद और विश्व की अन्य ज्ञान प्रणालियों पर अनुसंधान होता है। सुदर्शन क्रिया के लाभों पर अनुसंधान भी हो रहा है। इस सेवा कार्य  से उसकी ख़ुद की जानकारी भी कितनी बढ़ रही है। उसने मन ही मन गुरुजी का धन्यवाद किया। 


आज सुबह आकाश स्वच्छ था, नीला धुला-धुला सा, कुछ तस्वीरें उतारीं, जो नेट पर प्रकाशित करेगी। नीले शुभ्र आकाश को देखकर किसी को भी अपने अनंत स्वरूप का स्मरण आ सकता है। कल उनके विवाह की वर्षगाँठ है। एक बार उसने एक नाटक सुना था, जिसका सार था, अनेक वर्षों साथ रहने पर भी कोई भी दो व्यक्ति पूरी तरह से एक-दूसरे को कहाँ जान पाते हैं; क्योंकि चेतना अनेक रूप बदल सकती है। एक ही व्यक्ति के भीतर अनेक व्यक्ति रहते हैं। एक वैज्ञानिक और संगीतकार एक साथ रह सकते हैं। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर कितने ही विषयों में सिद्ध थे।जून आजकल ज़्यादा बात नहीं करते। सेवा निवृत्त हुए अभी उन्हें डेढ़ वर्ष हुआ है, कभी-कभी लगता है, वह अभी से बोर हो गये हैं।कोरोना के कारण भी वह बंधन महसूस करते हैं। जबकि उसके मन की उड़ान को देश-काल का कोई बंधन नहीं है। नन्हे ने फ़ोन करके जून के वस्त्रों का  साइज पूछा, शायद उपहार ख़रीदा रहा होगा। उसे इन सब बातों का बहुत ध्यान रहता है। 


आज का विशेष दिन भला-भला बीता।सुबह सभी मित्रों व संबंधियों के शुभकामना फ़ोन आ गये। वे हॉर्लिक्स पी रहे थे कि नन्हा और सोनू भी आ गये। वे केक और उपहार लाए थे। उन दोनों के लिए घड़ी और जून के लिए वस्त्र। अपने साथ रसोइये से विशेष रूप से मँगवाया सरसों का साग भी लाए जो यहाँ नहीं मिलता है और जून को बहुत पसंद है। दोपहर को मक्की की रोटी के साथ बनाया। नाश्ते में मोरिंगा के पराँठे बने, जो मोदी जी की पसंद हैं। सहजन के पत्तों से बनाये जाते हैं, यू ट्यूब पर  विधि देखकर बनाये। आज नया कुछ नहीं लिखा, गूगल की मेहरबानी से एक पुरानी कविता के साथ कुछ पुरानी तस्वीरों को जोड़कर एक वीडियो बनाया। शाम को वे आश्रम गये थे । विशाला कैफ़े में सागर नाम के एक युवक ने उनकी तस्वीर खींच दी। पहले वह जून की तस्वीर उतार रही थी। युवक तथा उसकी मित्र यह देख रहे होंगे। उसकी मित्र ने ही प्रेरित किया होगा संभवत:, तस्वीर अच्छी आयी है, उनकी एक और तस्वीर साथ-साथ ! 


Thursday, December 22, 2022

चौथ का चाँद


आज दोपहर पूर्व योग की सप्त क्रियाओं में से एक नेति क्रिया की थी, शाम से ही छींकें आ रही हैं, जब थोड़ा सा भी पानी भीतर नासिका में रह जाता है, तब ऐसा होता है।वर्षों पहले एक बार असम में विवेकानंद योग केंद्र में इसे सीखा था, तब से सप्ताह में एक बार तो कर ही लेती है। नेति के बाद ज़्यादातर कपालभाति करने से पानी निकल जाता है पर कभी-कभी कुछ रह जाता होगा। मंझले भाई ने घर में हुई गणेश पूजा का वीडियो  भेजा  है। गुरूजी ने गणेश चतुर्थी का महत्व व गणेश के जन्म की अनोखी कथा का अर्थ समझाया। जिनका अहंकार से भरा सिर शिव ने काटा तो ज्ञान युक्त सिर लगाया गया। कहते हैं चौथ का चाँद नहीं देखना चाहिए, पर रोज़ की तरह उसकी नज़र आकाश की ओर चली गयी और दर्शन  हो गए। 


आज सुबह नन्हा व सोनू आ गये थे। दोपहर को भोजन के बाद वे सभी एक स्टोर ‘लिव स्पेस’ गये, उन्हें अपने किचन व बेडरूम की अलमारी का दरवाज़ा ठीक करवाना है। सेल्स मैनेजर ने पावर पाईंट प्रस्तुति दी, नयी तकनीक आने से हर क्षेत्र में सब कुछ कितना बदल गया है । अमेजन से कमांड टेप आया है, मेहमानों के कमरे में चित्र लगाना है, अब दीवार पर कील ठोकने की ज़रूरत नहीं है।लगभग पाँच महीने बाद वे शहर की तरफ़ गये थे।हाथों में दस्ताने तथा चेहरे पर मास्क लगाकर। ट्रैफ़िक भी अब सामान्य हो गया है।वापसी में सोसाइटी में नयी खुली दुकान पर चाय पी तथा गणेश पूजा का कलात्मक पंडाल देखने भी गये। तीन दिन उनकी पूजा करने के बाद पूरी विधि से मुहूर्त देखकर कल विसर्जन का जुलूस भी निकलेगा। 


रात्रि के नौ बजे हैं, मन में सुबह सुने एक संत के वाक्य याद आ रहे हैं। कुछ लोग स्वयं को अणु मानते हैं, यह आणवीय मल है। अपूर्ण मानते हैं, यह मायीय मल है। अपूर्ण मानते हैं और उस अपूर्णता को दूर करने की इच्छा करते हैं, यह कार्मिक मल है। अविद्या, काम, कर्म यह तीनों ही बंधन के कारण हैं। वे अनंत हैं, सांत नहीं, वे पूर्ण हैं, अपूर्ण नहीं, वे सत्य हैं, ज्ञान हैं जब तक यह स्वयं का अनुभव नहीं बन जाएगा तब तक मानव को शांति का अनुभव नहीं होगा।नन्हे ने ‘मैजिक फ़्लावर्स पॉट सॉयल’ का दस किलो का एक पैकेट भिजवाया है। बड़े शहरों में मिट्टी भी ख़रीदनी होती है, उन्हें इसका भान नहीं था।  गमलों में भरकर बीज डाल दिए हैं, एक हफ़्ते में निकल जाएँगे। प्रधानमंत्री जी ने मोर का एक वीडियो पोस्ट किया है, कुछ लोगों को उस पर भी एतराज है।  


भारत ब्राज़ील से आगे निकल जाने वाला है, कोरोना के संक्रमण से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। शाम को वृद्ध पड़ोसी टहलते हुए मिले, कहने लगे, अब कोरोना से डरना छोड़ दिया है, जो पाना था पा लिया, अब क्या खोने को है ? एक पुरानी परिचिता से फ़ोन पर बात हुई। वह कोरोना के कारण अस्पताल में  हैं, शिकायत करती हुई सी कह रही थीं, मरीज़ों को देखने डाक्टर भी नहीं आता और घर के लोग भी दूर से देखकर खाना रखकर चले जाते हैं। नन्हे ने एक और गेम भेजा है। पिछले हफ़्ते वॉल एंड वॉरीअर भेजा था, जो जून रोज़ खेलते हैं। उसके बचपन में वे उसे खिलौने ख़रीदकर देते थे और अब वह उनका बचपन फिर से याद दिला रहा है। आज सुबह दुलियाजान की कम्पनी के हिंदी अनुभाग से भेजा गया पुरस्कार का ड्राफ़्ट मिला, वहाँ से आने से पूर्व कुछ रचनाएँ दी थीं पत्रिका के लिए। जून ने उसे बैंक में जमा कर दिया है। 


Friday, September 21, 2018

दादा-दादी दिवस



आज सुबह टीवी पर सुंदर वचन सुने थे. ज्ञान रत्नों से आत्मा को अपना श्रृंगार करना है, फिर उस  ज्ञान का उपयोग करना है. सुने हुए को यदि व्यवहार में नहीं लाया, अपना संस्कार नहीं बनाया, तो सुनना व्यर्थ ही है. योग की शक्ति से ही ज्ञान को भीतर स्थिर किया जा सकता है, अन्यथा स्वंय को छलना ही कहा जायेगा. परमात्मा से यदि संबंध जुड़े तो आत्मा पवित्र बन जाती है, पवित्रता की शक्ति स्वतन्त्रता की शक्ति है. पवित्र आत्मा को कर्मों के बंधन नहीं बांधते. पञ्च तत्वों से बना यह तन भी तब आत्मा को बंधन नहीं लगता, वह इसका आधार लेकर जगत में लीला करती है. वह देह में रहकर भी अशरीरी ही रहती है. ऐसी स्थिति में दुःख का नाम भी नहीं रहता. इसी खुशी में आत्मा शरीर से मोह निकाल देती है. यदि देह से ममत्व है तो आत्मा बंधन में है, जब तक पवित्र नहीं बने हैं, तथा कर्मातीत अवस्था नहीं हुई है, तब तक विदेह भाव सिद्ध नहीं होता. देह सहित सब वस्तुओं से ममत्व हटा देना है. जब देह इस स्थिति में नहीं है कि आत्मा स्वयं आनंद में हो और अन्यों को आनन्द बांटे तो नई देह लेने का वक्त आ गया है, तब आत्मा नई राह पर निकल पडती है. मक्खन से ज्यों बाल निकल जाता है, वैसे ही देह से आत्मा आराम से निकल जाती है, यदि देह में ममत्व नहीं है.
स्कूल में दादा-दादी दिवस मनाया जा रहा है, उसे एक भाषण देने के लिए कहा है. दोपहर को कुछ लिखने बैठी तो बचपन के कितने ही चित्र सम्मुख आने लगे. दादी से सुनी कहानियाँ और दादा के यूनानी दवाघर से खाए स्वादिष्ट चूर्ण. लगभग दस वर्षों तक वे सब साथ रहे. उसके बाद भी समय-समय पर मिलते रहे. आजकल कम ही बच्चों को दादा-दादी का साथ मिल पाता है.

रात्रि के आठ बजे हैं. चार दिनों के बाद आज कलम उठाई है. ब्लॉग पर आज कुछ भी पोस्ट नहीं किया, फेसबुक पर तस्वीरें अवश्य पोस्ट कीं. कल बड़े भाई चले गये, जाते समय उनका भी मन भर आया था, दिन भर मन थोड़ा उदास रहा, पर वक्त के साथ भावनाएं अपने आप ही सम्भल जाती हैं. उन्हें यकीनन यहाँ रहना अच्छा लगा होगा. जून जब से आये हैं, उन्हें सर्दी-जुकाम की शिकायत है, ठंडे देशों से ही शायद यह सौगात मिली है. उन्हें नीचे बैठने में दिक्कत हो रही है, सो कुछ देर कुर्सी पर बैठकर प्राणायाम किया. दोपहर को एक सखी के घर गयी उसकी सासुमाँ का श्राद्ध था. उसके बाद बच्चों की योग कक्षा में, अगले हफ्ते गाँधी जयंती मनाने के लिए उनसे कहा है. कुछ सार्थक होना ही चाहिए. स्वच्छता अभियान के लिए कुछ करे ऐसा भी मन में आता है. अपने समय और शक्ति का पूरा उपयोग करना होगा उसे, एक-एक क्षण का उपयोग करना होगा. जून कल से दो दिनों के लिए गोहाटी जा रहे हैं. कल से दीवाली की सफाई भी आरम्भ करनी है. पुब्लिक लाइब्रेरी से आयुर्वेद पर एक किताब भी लायी है, उस दिन भाई को लाइब्रेरी दिखने ले गयी थी, वहीं मिली थी. काफी अच्छी किताब है.
मौसम आज भी सुहाना है. पिछले दिनों लेखन व साधना में जो गतिरोध उत्पन्न हुआ, उसे पटरी पर लाने का सुंदर अवसर मिला है. सुबह स्कूल गयी. बच्चों को योग सिखाया. कुछ बच्चे वाकई करना चाहते हैं, पर अन्यों के कारण कर नहीं पाते. शिक्षिकाएं यदि अपनी-अपनी कक्षा के बच्चों पर थोड़ी नजर रखें तो सभी शांत रह सकते हैं. उसने सोचा अगली बार यदि ऐसा हुआ तो वह स्कूल इंचार्ज से कहेगी. प्रधानाध्यापिका कुछ दिनों के लिए बाहर गयी हैं. उनकी माँ वृद्धा हैं, उन्हें भूलने का रोग हो गया है. भाई विदेश में रहते हैं. समाचारों में सुना, प्रधानमन्त्री ने पाकिस्तान के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने का निर्णय लिया है.


Sunday, April 24, 2016

नीलवर्णी शिव


सोलह दिनों की यात्रा के बाद परसों वे वापस लौट आये हैं. सुबह के दस बजे हैं, बच्चे पढ़ने आये हैं. मौसम सुहावना है, धूप खिली है, बगीचा साफ-सुथरा मिला. वापस आकर सभी परिवार जनों से बात भी हो गयी है. सभी परिपक्व हो रहे हैं उम्र के साथ-साथ, पर बड़ी भाभी अभी भी मन के जाल में कैद हैं, यहाँ उसकी एक सखी का भी वही हाल है. बड़ी बहन ने स्वयं को देह से अलग महसूस करना तो वर्षों पहले ही शुरू कर दिया था अब वह देह को बंधन मानने लगी हैं. देह से मुक्त होकर वह परमधाम में जाकर शांति का अनुभव करना चाहती हैं. देह की अपनी सीमाएं हैं पर देह के बिना आत्मा कुछ जान भी तो नहीं सकती. यदि आत्मा आनन्द है तो इस बात का ज्ञान उसे देह धारण करके ही होता है. ध्यान के द्वारा देह रहते भी यह सम्भव है. विदेह जनक को ऐसा ही अनुभव होता होगा. उसे हिंदी के लेख-कविताएँ एकत्र करने हैं, फोन किये हैं सम्भवतः इतवार तक कुछ बात बनेगी. सद्गुरु का एक सुंदर प्रवचन छोटी ननद से लायी है, बाबाजी का भी, ओशो के दो संगीतमय ध्यान के कैसेट भी. जून ने आज सुबह व्यायाम/ साधना आदि के बाद कहा, आज उन्हें कई हफ्तों के बाद अच्छा अनुभव हुआ. शाम को वे एक वृद्धा परिचिता को जन्मदिन की बधाई देने जायेंगे.

आज सुबह नींद देर से खुली, इतनी गहरी नींद थी कि अलार्म भी सुनाई नहीं दिया, दोनों में से किसी को भी नहीं. अभी तक यात्रा की थकान उतरी नहीं है. सुबह अभी पौने सात ही बजे थे, एक दक्षिण भारतीय सखी का फोन आया, उसकी माँ जो पिछले एक वर्ष से पुत्र के साथ विदेश में रह रही थी, देह सिधार गयी. भाई उनकी देह को भारत लाने का प्रयास कर रहा है. कल शाम को प्रेस गयी थी प्रूफ रीडिंग करने. ‘ध्यान’ पर लिखा लेख उसने तीसरी बार छपने को दिया है क्योंकि यह विषय है ही इतना महत्वपूर्ण !


आज सुबह अचानक वर्षा होने लगी है. बादल रात में एकत्र हुए होंगे. उस वक्त वे निद्रा में मग्न थे. कल रात कैसे अनोखे स्वप्न देखे. भगवान शंकर को देखा, नीला रंग, तन पर वही सब आभूषण जो चित्रों में दिखाई देते हैं. जादू, तिलिस्म तथा कंकाल को झपटते देखा. अजीब सा स्वप्न था पर उस वक्त कितना सहज लग रहा था. कल रात एओल का कार्यक्रम देखा था. गुरूजी को बहुत दिनों बाद देखा व सुना, फिर ‘कृष्णा’ देखा इसी का असर रहा होगा जो मन रहस्यों की दुनिया खो गया. यह जगत एक रहस्य ही तो है ! कल छोटी बहन से बात की, वह एक और मकान खरीद रही है, यानि तीसरा मकान और अपने काम से, जीवन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. सच ही है लोग जीवन से कभी भी पूर्ण संतुष्ट कहाँ हो पाते हैं, वे जीवन का अर्थ समझे बिना ही जीवन जिए चले जाते हैं. ग्यारह बजने को हैं, जून कुछ देर में आने वाले होंगे उन्हें बाजार भी जाना था पर इस भीगे मौसम में शायद सम्भव नहीं हो सकेगा. उसका देवदिवाली पर लेख पूरा होने को है !

Saturday, May 23, 2015

हरिवंशराय बच्चन की आत्म कथा


आज उसने सुना, जिसका जन्म होता है वह विनाश को प्राप्त होगा ही. आज पुनः उसे कृष्ण मिले, भक्ति भी प्यार की तरह है जो कभी-कभी अपने मुखर रूप में होता है. तन-मन दोनों फूल की तरह हल्के हैं. हृदय में ज्ञान की ज्योति जल रही है, अभी कुछ कितना स्पष्ट है. यह सृष्टि, ईश्वर, प्राणी और इनका आपस में संबंध ! सत्य ही जानने योग्य है, सभी उसी की खोज में हैं. कोई पहली सीढ़ी पर है, कोई पांचवीं तो कोई सौवीं पर पहुंच गया है. जब कोई भीतर-बाहर एक हो तभी उसे अनुभव कर सकता है. उसको जानने के लिए उसके जैसा होना पड़ता है. आज सद्गुरु की आँखों में नमी थी, वह अपने गुरू के प्रति कृतज्ञता का अनुभव कर रहे थे. गुरू का ऋण चुकाना असम्भव है. वह इतना अनमोल खजाना साधक को सौंप देते हैं. सुबह साढ़े चार पर उठे वे, कोहरा भी था और बदली भी. नन्हे को स्कूल भेजा. छोटी बहन को फोन किया वह ‘हवन’ करके अपनी शादी की वर्षगाँठ मना रही है. भांजियों से भी बात की. कल छब्बीस जनवरी के विशेष भोज के लिए सभी सखियों को आमंत्रित किया.

कल का भोज अच्छा रहा. सभी मित्र परिवार आये थे. बाहर लॉन में सब बैठे थे. सुबह कुछ देर परेड देखी. नन्हा नेहरू मैदान में परेड देखने गया था. उसने वापस आने में बहुत देर की. वे परेशान हो गये थे, मन कहीं लग नहीं रहा था. जून को गुस्सा था और उसे चिंता, पर दोनों ही व्यर्थ थे, क्योंकि नन्हा आराम से वहाँ परेड देख रहा था. आज उसने छोटी भाभी से बात की. कल सुबह मंझले भाई ने भी ‘हवन’ करवाया, माँ की बरसी इस तरह उन्होंने मनायी. वे लोग उनके बारे में, उनकी बीमारी व उनके इलाज के बारे में बातें करते हैं, उनके वस्त्र वक्त-वक्त पर दान करते हैं. आज वह भी मन्दिर जाएगी और कुछ दान देगी. माँ कहाँ होंगी कोई नहीं जानता. उनकी आत्मा तो शाश्वत है, वह किसी देह को धारण कर चुकी होंगी और सम्भवतः इस जन्म की बातें भूल भी गयी हों. वे जन्म से पूर्व भी अव्यक्त होते हैं और मृत्यु के बाद भी, बीच में कुछ ही समय तक व्यक्त रहते हैं. इस क्षणिक जीवन में जितने शुद्ध होते जाते हैं, उतना ही मृत्यु का भय कम होता जाता है. अपने उस स्वरूप का अनुभव इसी रूप में होने लगता है जो मृत्यु के बाद अनुभव में आने वाला है. यह रूप तो उन्हें अपनी पूर्वजन्म की इच्छाओं और वासनाओं के कारण मिला है. उनके कर्म यदि इस जन्म में निष्काम हों तो अपने शुद्धतम रूप में प्रकट हो सकते हैं, वैसे भी इस जगत में ऐसा है ही क्या जो उन्हें तुष्ट कर सके !
आज बहुत दिनों बाद सुबह टीवी पर जागरण नहीं सुन पा रही है. केबल नहीं आ रहा है. सुबह वे समय पर उठे, नन्हे को पढ़ने जाना था, गया, पर टीचर नहीं मिले. आज बसंत पंचमी का अवकाश है. आज ही सरस्वती पूजा भी है. उसके लिए तो एकमात्र आराध्य कृष्ण हैं, उन्हीं से सभी देवी-देवताओं का प्रागट्य हुआ है. कल उसने जून से गुस्सा किया जब उन्होंने कहा केबल एक साल के लिए कटवा देते हैं, उसे सुबह के सत्संग का आकर्षण था, पर देखो, आज कृष्ण ने वह भी मिटवा दिया. उन्हें किसी भी वस्तु से बंधना नहीं है. मुक्ति के पथ पर चलना शुरू किया है तो जंजीर यदि सोने की भी हो तो उसे काट देना चाहिए. सतोगुण तक पहुंच कर उससे भी पार जाना होता है सच्चे साधक को, पर वह तो अभी भी तमोगुण का शिकार हो जाती है. कल जून ने उसे ‘हरिवंशराय बच्चन’ की आत्मकथा के तीन भाग  उनकी सर्वश्रेष्ठ कविताओं का संकलन तथा दो अन्य कविता की पुस्तकें लाकर दीं. उनका प्रेम ही तो है यह, वह उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा को पूर्ण करना चाहते हैं, यही प्रेम है, पर वह इसका प्रतिदन नहीं दे पाती है. ईश्वर साक्षी है कि उसके मन में शुद्ध प्रेम जगा है, जो सामान्य प्रेम से थोड़ा अलग है. इस संसार के हर जीव के प्रति, जड़-चेतन सभी के प्रति, उस परम सत्ता के प्रति, पंचभूतों, धरा, आकाश, नक्षत्र, सूर्य तथा चन्द्रमा सभी उसके प्रेम के पात्र हैं. इस प्रेम का कोई रूप नहीं, यह अव्यक्त है, अनंत है और सर्वव्यापी है. इस प्रेम ने उसके स्व को अनंत विस्तार दे दिया है. कृष्ण को प्रेम करो तो वही प्रेम कृष्ण की सृष्टि की ओर भी प्रवाहित होने लगता है !

  

Friday, November 28, 2014

पुष्प सज्जा की कला


जून घर पहुंच गये हैं, स्टेशन से ही उन्होंने फोन किया. उनके न होने से एक खालीपन तो है पर एक नयी ख़ुशी भी है कि उनके आने के बाद वे पहले से ज्यादा करीब होंगे, दूरियां निकटता को बढ़ा देती हैं. घर में सब ठीक होंगे उसे व नन्हे को याद कर रहे होंगे. कल शाम क्लब की एक सदस्या ने फोन किया, इस बार मीटिंग में पुष्प-सज्जा उसे एक सखी के साथ मिलकर करनी है. इस समय दोपहर के सवा बजे हैं, प्रूफ रीडिंग का काम हो गया है. सुबह पांच बजे वे उठ गये थे, नन्हा भी वक्त पर तैयार हो गया था, उसके कपड़ों को ठीक करना है, उसकी आलमारी भी ठीक करनी है. आज सुबह उसकी पिछले वर्ष की किताबें उठाकर देखीं तो पता चला दीमक ने घर बना लिया था. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, कल उसे फोन करेगी, दीदी का फोन आए कई दिन हो गये हैं, बड़े भाई का भी, अब राखी के दिन उनसे बात होगी. सभी सुखी रहें यही उसकी कामना है. अड़ोस-पड़ोस में सभी को अमरूद भिजवाने हैं. उसने सोचा, नैनी के बेटे से तुड़वा कर यह कार्य भी सम्पन्न कर लेना चाहिए.

अभी-अभी छोटी बहन को जन्मदिन की बधाई दी, उसने कहा, पत्र लिखा है. भांजी और पिता से भी बात हुई. पिता ने भी पत्र लिखा है, उन्हें उसने लिखा था, माँ के पत्रों की कमी वह महसूस करती है, अभी तक उसके अंतर्मन में मोहमाया के बंधन बहुत गहरे हैं. कल रात दीदी का भी फोन आया. सुबह जून का भी, वह मित्र के बेटे की पढ़ाई के बारे में बात करने उसके यहाँ जाने वाले हैं. उनकी दिनचर्या बेहद व्यस्त रहेगी वहाँ. गुरू माँ अमीर खुसरो का लिखा एक गीत(जो गुरू की प्रशंसा में है) गा रही हैं, उनकी बातें दिल को छू जाती हैं, उनसे मिलने की इच्छा हृदय में उत्पन्न होने लगी है और वह जानती है ईश्वर उन्हें एक न एक दिन अवश्य मिलाएगा. वे दोनों उसी के द्वारा तो बंधे हैं.

“यह दिल है मेरा मन्दिर, और मन यह पुजारी है,
मन्दिर में जो रखी है, मूरत वह तुम्हारी है”

अगस्त का शुभारम्भ ! कल रात जून का फोन आया, वहाँ शाम से ही बिजली नहीं थी, घर में बैठे-बैठे वह परेशान हो रहे थे, उन्हें उसने अपनी फरमाइशें बता दीं, एक तो दीपक चोपड़ा जी की सलाह पर चांदी का टंग क्लीनर और दूसरी एक ड्रेस. कल शाम ही उसने तय किया है कि अब घर पर भी अच्छे वस्त्र पहनेगी, चालीस के बाद वैसे भी जीवन कितना रह ही जाता है जो चीजों को संभाल-संभाल कर रखा जाये. घर में भी यदि उसी तरह संवर कर रहा जाये तो अपना साथ खुद को तो भला लगेगा ही घर के अन्य लोगों पर भी इसका अच्छा असर पड़ेगा, सो पुराने वस्त्रों को अलविदा ! कल शाम की मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम सभी अच्छे थे. पुष्प सज्जा का अनुभव भी अच्छा रहा. अभी एक सखी से मिलकर आ रही है जिसकी माँ घातक बीमारी से ग्रस्त हैं, अस्पताल में हैं. आज सुबह बाबाजी व गुरू माँ से भी मुलाकात हुई, उनकी वजह से ही उसका मन समता को पा सका है, ऐसा लगता है कि जीवन में आने वाली किसी भी स्थिति का सामना वह कर सकती है. ईश्वर उसके विश्वास की रक्षा करता है !



Saturday, September 20, 2014

अदरक वाला पुलाव


जो उसका है, उसकी मान्यता अथवा उसका विचार है, वही सत्य नहीं है, बल्कि जो सत्य है वह सम्पूर्णता के साथ उसे स्वीकार्य है. सत्य अंततः प्रकट होकर ही रहता है, देश इस वक्त ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहाँ सच- झूठ में भेद स्पष्ट नहीं दीख रहा. कानपूर के लोगों को कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार होना पड़ा. जो शहर ऐसे लोगों को प्रश्रय देता है उसे उसका फल कभी न कभी भुगतना ही पड़ता है.
कल उन्होंने एक सौ दस कविताओं की सूची बना ली और सभी को जाँच भी लिया है. आज प्रकाशक से फोन पर बात करेंगे, सम्भव हुआ तो इसी हफ्ते अथवा सोमवार को पाण्डुलिपि भेज देंगे. कल शाम कम्प्यूटर के सामने ही बीती, सांध्य भ्रमण का वक्त भी नहीं निकाल पाए. नन्हे के स्कूल में पढ़ाई शुरू हो गयी है. इस वर्ष से हाईस्कूल का परीक्षा परिणाम प्रतिशत में नहीं बल्कि ग्रेड्स पर आधारित होगा, इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति जो डर बैठा हुआ है, विशेषतया हाई स्कूल के लिए, वह कम होगा. पिछले दिनों उनकी अनुपस्थिति में माली ने बगीचे की उपेक्षा की और आने के बाद उसने भी ठीक से देखभाल नहीं की, कल शाम ऐसे बहुत से कार्यों पर नजर गयी जो शीघ्र ध्यान चाहते हैं. गन्धराज का वृक्ष एक तरफ से सूख गया है, कुछ वर्ष पूर्व यह फूलों से लद जाता था, एक बार ज्यादा कटवा दिया तो छोटे भाई के शब्दों में वह नाराज हो गया, वृक्ष बहुत संवेदनशील होते हैं. कल उसने हफ्तों बाद रियाज किया, मन-प्राण संगीत के रस में डूब गये.

 मन के बन्धनों को उन्हें स्वयं ही खोलना है, अज्ञान ने उन्हें बेसुध कर रखा है. ज्ञान जो शाश्वत है वही साधन बनेगा और ज्ञान को ही उन्हें साध्य भी बनाना है. यह सही है सदा उसके दुःख, पीड़ा या परेशानी का कारण अज्ञान ही होता है. सच का आश्रय लेकर यदि जीवन के यात्री बनें तो यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न हो सकती है. लेकिव वे क्षणिक सुख की ललक अथवा लोभ वश झूठ का साथ दे देते हैं. सुविधाओं का आकर्षण ही तो रिश्वत लेने पर विवश करता है. देश या राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्ति भी जब अनैतिक कार्य करते हैं तो साधारण जन में दिशाहीनता व अराजकता की भयावह स्थिति उत्पन्न हो सकती है. कानपूर के दंगे इसी का परिणाम हैं. पिछले कई घोटालों की तरह यह बात भी धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाएगी और लोग फिर विश्वास करने लगेंगे उसी व्यवस्था पर, जो आज पूरी तरह सड़ चुकी है. पर इसी विनाश में से पुनः निर्माण होगा, करोड़ों लोगों की आस्था व्यर्थ नहीं जाएगी. कल शाम उन्होंने उसकी पुस्तक का मुखपृष्ठ भी बना लिया, नीला रंग जो उसे प्रिय है और शांति व पवित्रता का प्रतीक भी है, मुख्य है. कल छोटी बहन का फोन आया, एक वृद्धा के बारे में बताया जो कई व्याधियों से ग्रस्त हैं पर अपने स्वाद पर संयम नहीं रख पातीं. रसमलाई, बेसन के लड्डू और तला हुआ चिवड़ा-मूंगफली बहुत अधिक मात्रा में बना कर रख रही हैं. उनका मन भोजन में बुरी तरह से अटका हुआ है, खाना बनाना उनका प्रिय कार्य है. कल शाम एक मित्र परिवार मिलने आया, दोनों बच्चे बेहद दुबले थे, हाथ-पैर जैसे बांस की खरपच्चियों के बनाये हों, जिन्हें छूने से भी डर लगता था. बातों में उसने महसूस किया बच्चों की माँ भी अपने स्वर्गीय माँ-पिता को बहुत याद करती है.

आज बाबाजी ने कहा, “भक्ति स्वयंफल रूपा है. जब मन पूरी तरह समर्पित होता है, ध्यान अपने आप होने लगता है. परमात्मा की प्रतीक्षा नहीं करनी है बल्कि समीक्षा करनी है. बुद्धि और हृदय जब एक हो जाते हैं तब कृपा का अनुभव होता है.” कल शाम पुस्तक का प्रारूप लगभग तैयार हो गया, अब आत्मपरिचय देना शेष है जो आज दोपहर वह टाइप करने वाली है. टीवी पर तहलका मामले के खिलाफ़ और पक्ष में इतने बयान  आते हैं कि सच-झूठ का फैसला करना कठिन होता जा रहा है. लेकिन उसकी निजी राय यह है कि यह प्रकरण सरकार गिराने के लिए किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. कल दोपहर पिता को पत्र लिखना आरम्भ किया, पर पूरा नहीं कर पाई, अधूरा ही फाड़ देना पड़ा, माँ के बिना उन्हें पत्र लिखना एक कष्टप्रद कार्य है. माँ की तस्वीर जबकि हमेशा सामने रहती है, वह मुस्काते हुए आश्वासन देती हुई सी लगती हैं. फिर भी दिल है कि मानता नहीं.


कल दोपहर जून लंच पर नहीं आये, उसने अदरक डाल कर पुलाव बनाया, घर से आने के बाद भोजन पर ज्यादा ध्यान जाता है. वहाँ सभी हष्ट-पुष्ट नजर आते थे, उनका परिवार ही सबसे दुबला-पतला लगता था. वे अपना वजन कम रखने के चक्कर में नन्हे को भी कम तेल-घी का भोजन दे रहे हैं, हो सकता है यही कारण हो कि वह अभी तक पूरी लम्बाई नहीं ले पाया है. उसके लिए ही केक बनाया था, अगले हफ्ते चॉकलेट केक की फरमाइश की है उसने. कल जून उसके लिए हिंदी का अख़बार लाये जिसमें वह अपनी कविताएँ भेजना चाहती है.