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Thursday, September 12, 2024

टैंट हाउस


टैंट हाउस

आज उन्होंने कोरोना से बचाव के लिए कोविशील्ड वैक्सीन लगवा ली। मेडिकल कॉलेज में काफ़ी अच्छा इंतज़ाम था। दिन आराम से बीता, पर इस समय थोड़ी हरारत जैसी महसूस हो रही है।कल भी आराम करना है, उम्मीद है परसों से सब सामान्य हो जायेगा।दीदी से बात हुई, वे लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे हैं। 


सुबह उठी तो ज्वर सौ से ऊपर था। नन्हा और सोनू दिन में आ गये थे। उसका एक मित्र अपने भाई-भाभी व भतीजी के साथ आया था, एक अन्य मित्र दंपति भी आये थे। उसे किसी ने कोई काम नहीं करने दिया। मेहमानों ने घर देखा, चाय-नाश्ता किया और चले गये।बच्चे शाम तक रुके रहे। उसके सिर में दर्द था, सोनू ने तेल लगाया। नन्हे ने एक दवा दी। उसने बिग बास्केट से ढेर सारे फल व सब्ज़ियाँ भी भिजवा दिये हैं।  इस समय ज्वर नहीं है। भीतर ऊर्जा का अहसास हो रहा है। 


आज स्वास्थ्य अपेक्षाकृत ठीक है। दोपहर बाद माली आया। उससे गमले गैराज में रखवाये। आजकल धूप बहुत तेज होती है। कॉसमॉस की पौध लगवायी। कल से प्रातः भ्रमण, योग साधना आदि के साथ सामान्य दिनचर्या शुरू होगी। असमिया सखी का फ़ोन आया, अपनी पोती के कई क़िस्से बड़े मज़े ले लेकर बता रही थी, जो अमेरिका में रहती है, और जिससे उसकी बात केवल वीडियो चैट में ही होती है।उन्हें भी वैक्सीन लगाने के बाद दो दिनों तक कुछ तकलीफ़ हुई। दोपहर को छोटी ननद का फ़ोन आया, उसने बताया, निजीकरण के विरोध में दो दिनों के लिए बैंकों में हड़ताल है। सरकार कह रही है, धीरे-धीरे सभी व्यापार प्राइवेट कंपनियों के हाथों में दे दिये जाएँगे। सरकार के पास अति आवश्यक कार्य ही रह जाएँगे। समय के साथ परिवर्तन अवश्यंभावी है। सुबह से मन में विचार आ रहा था कि फुफेरी बहन से बात करनी है, और शाम को उसका फ़ोन आ गया। कल सखी से बातचीत में कहा, वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट में पाचन भी बिगड़ सकता है, और सुबह से हालत पतली है। आजकल मन में विचार आते ही पूरे हो जाते हैं।कल रात को जब भी नींद खुली, मन में ‘ध्यान’ का विचार आया, सुबह उठते ही पहला काम यही किया। इस जगत में एक यही तत्व है, जो शाश्वत है, शेष सब अनित्य है।’कंचन से इल्तजा’ कविता प्रकाशित की, कंचन के इस पेड़ पर फूल क्यों नहीं आते, इस सवाल का जवाब कौन दे सकता है ? क्या जाने उसकी इस प्रार्थना का कुछ असर हो और वह खिलना शुरू कर दे।


आज ऐसा लगा कि ज़िंदगी फिर पटरी पर आ गई है।दोपहर को छोटी बहन से बात हुई। कल रात उसे नाइट ड्यूटी में खड़े रहना पड़ा था, यूएइ में भी कोरोना के मरीज़ बढ़ते जा रहे हैं। भारत में भी कोरोना की दूसरी लहर आ गई है।एक तरफ़ टीके लग रहे हैं दूसरी तरफ़ केस बढ़ते जा रहे हैं। आज शिरड़ी के साईं बाबा पर आधारित एक धारावाहिक का एक भाग देखा। जिसमें श्रद्धा और सबूरी के साथ वह प्रेम करना सिखाते हैं।परमात्मा पर विश्वास करना भी। जीवन में प्रेम न हो तो, जीवन काँटों की तरह चुभता है। क्योंकि जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ अहंकार होगा और अहंकार से बड़ा कांटा भला कोई और भी है जगत में, वही तो मनुष्य को मनुष्य बने नहीं रहने देता। 


आज सुबह वे टहलने गये तो आकाश पर चौथ का सुंदर चंद्रमा चमक रहा था। कल रात सोने से पूर्व एक अद्भुत आकृति देखी, जिसमें ऊपर का भाग है और कूल्हे के नीचे का भाग है, पर मूर्ति में मध्य भाग नहीं है। पता नहीं ये स्वप्न किसकी ओर इशारा कर रहा है, कमर ग़ायब होती जा रही है शायद उसी की ओर ! स्वप्न के आधार पर लिखी कविता ब्लॉग पर प्रकाशित की।दोपहर को सोते समय एक अजीब सा स्वप्न देखा, एक स्लैब पर कूड़ा पड़ा है, जैसे उसे सजा कर रखा हो। भला कोई गंदगी को भी ऐसे रखता है ? कल भांजा पूरे आठ महीने बाद वापस लौट आया है। ढेर सारी मिठाई लाया है। दोपहर को वह अपने घर चला गया। घर तबसे बंद पड़ा था, ठीक-ठाक करवाना होगा।


आज शाम को नन्हे और सोनू के साथ मिलकर उन्होंने छत पर एक टैंट लगाया है, जिसमें चार लोगों के लिए पर्याप्त स्थान है। इस समय वह उसी में बैठकर लिख रही है। बाहर तेज हवा चल रही है, चाइम की आवाज़ भीतर आ रही है पर हवा नहीं आ रही। किसी न किसी दिन वे इसे किसी नदी किनारे या पहाड़ी की तलहटी में ले जाएँगे और रात वहीं बितायेंगे, जाने यह स्वप्न कब पूरा होगा।          


Friday, September 11, 2015

ऍफ़ एम् रेनबो रेडियो चैनल


आज शाम को उसे एक युवा महिला से मिलने जाने के लिए तैयार रहना है. वह आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर है, यहाँ तथा आस-पास के क्षेत्र के लिए. उससे ज्यादा परिचय तो नहीं है, ऊपरी-ऊपरी ही बातें हुई हैं, गहरा परिचय हो सके इसीलिए आज वह जा रही है. पर क्या थोड़ी सी देर की बात में वे एक-दूसरे को जान सकते हैं..वह तो उसे अपने प्रेम का पात्र मानती है और टीचर भी सदा प्रेमपूर्ण भाषा बोलती है, तो उनकी निभ जाएगी, उन दोनों के मध्य सद्गुरु हैं जो दोनों के आराध्य हैं तो दूरी रह ही नहीं सकती. उसने कल रात को जो सोचा वह आज तोड़ दिया, सबसे अच्छा तो यही है कि वह स्वयं को मुक्त रखे, कोई नियम स्वयं पर न लादे. आत्मा सर्वदा मुक्त है, वह शुद्धात्मा है तो फिर बंधन उसे रास नहीं आएगा. आज सुना सच्चाई सैकरीन की तरह है, ऐसे ही इसका उपयोग किया तो कड़वी लगेगी, पर अन्य गुणों जैसे नम्रता, प्रेम के साथ घोलकर प्रयोग करें तो मीठी लगेगी. अहंकार रूपी अंधकार में उसकी आत्मा का सूर्य छिपा हुआ है. सद्गुरु कहते हैं, अस्त्तित्व प्रेम से बना है और सारी समस्याओं के मूल में प्रेम का विकृत रूप ही है. भक्ति इसी प्रेम की पराकाष्ठा है जब कोई इस सारे ब्रहमांड से एकत्व अनुभव करता है, मन जब भेद नहीं करता, आत्मवत देखता है सभी को. आत्मा में जब सब कुछ समा जाता है, वैसे भी सब कुछ वहीं से उपजा है, आत्मा प्रेम ही है, प्रेम ही परमात्मा है. प्रेम में रहे कोई तो समाधान मिलने लगता है.
ऍफ़ एम् रेन बो पर दिल का गीत आ रहा है, वे दिल के गुलाम बन जाते हैं तभी तो दर्द का अनुभव करते हैं. गानों में भी कितनी सच्चाई होती है, जिद्दी है, गिरता है, सम्भलता नहीं.. कभी हल्का, कभी भारी, कभी तोला ही नहीं..अपनों को कोई मन के आगे दुर्बल माने तो उसकी ही गलती है. वे जो अनंत शक्ति के पुंज हैं.
मन कैसा तो हो रहा है, ध्यान के बाद मन बचता ही कहाँ है, जो बचता भी है तो वह भीगा-भीगा सा होता है, शांत बिलकुल सोये बच्चे की तरह ! मन को कोई देख पाता है उसके सारे रूपों में तो चकित रह जाता है, वह राजा भी है और सेवक भी, वही देवता है वही दानव !

 वक्त सदा एक सा नहीं रहता, परिस्थितियाँ बदलती हैं, हालात बदलते हैं. इस बदलती हुई दुनिया में एक ही चीज निश्चित है और वह है परिवर्तन. कुछ हफ्ते पहले उसने सोचा भी नहीं था कि अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ेंगे. आज कुछ टेस्ट कराए, कल भी बाकी सारे टेस्ट होंगे. कुछ दिनों से पैरों में दर्द हो रहा था. देह को वे कितना ही नकारें, वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देती है. मन शान्त है , वह तो इस सबको साक्षी भाव से देख रही है. कल उन्होंने बैंक में लॉकर भी खुलवाया, आज वहाँ सामान रखा. अभी एक छात्रा पढ़ने आएगी, मौसम ठंडा है, पिछले हफ्ते विश्वकर्मा पूजा के दिन जून के एक मित्र को कमर में दर्द हुआ अभी तक बेड पर हैं. कभी-कभी शरीर सजग रहने की हिदायत इतनी देर से देता है..शायद वे पहले समझ नहीं पाते, या समझना नहीं चाहते. ईश्वर सदा न्याय करता है, उन्हें ज्यादा सजग रहने की जरूरत है. आज नीरू माँ ने कहा कि जो कुछ स्थूल रूप में किसी के साथ घटता है वह सब उसके कर्मों का फल है तथा जो भीतर सूक्ष्म रूप में घटता है वह कर्म बंधन बनते हैं. भाव शुद्धि होनी बहुत आवश्यक है तभी कर्म शुद्धि होगी. भीतर का वातावरण ठंडा रहना चाहिए तब बाहर अपने-आप शीतलता ही प्रकट होगी. उसने प्रार्थना की, भीतर सदा प्रभु और सद्गुरु का सत्य रहे !   

Thursday, September 25, 2014

अमितव घोष की किताब



पिछले दिनों दो कार्य उससे ऐसे हुए हैं जो आज ध्यान के समय आकर कचोट रहे थे. जून को दफ्तर में किसी ने तोहफा दिया जो नूना के काम में आने वाला था, पहले तो नूना ने आनाकानी की पर बाद में स्वीकार कर लिया, जून ने इसे लिया यह भी ठीक नहीं था चाहे देने वाला उसके बदले में अभी कोई लाभ नहीं चाहता, पर भविष्य में जब भी उनके मध्य व्यवहार होगा इस उपहार की बात दोनों को याद रहेगी. दूसरी बात कि कल एक महिला अपने बीमार पुत्र का हवाला देकर कुछ सहायता मांगने आई थी, देखने में अच्छी खासी लग रही थी, उसने पात्रता/ सुपात्रता का बहाना बनाकर उसे कुछ भी नहीं दिया जबकि उस दिन मीटिंग में कुछ खरीद लिया, यह पैसे उसके कितने काम आ सकते थे. ईश्वर ने उन्हें इस योग्य बनाया है कि वे सहायता कर सकते हैं फिर अपने दरवाजे पर आये याचक को जब वे कठोर हृदय बन दुत्कार देंगे तो ईश्वर के दरवाजे पर उनकी फरियाद अस्वीकार होती रहे इसमें कौन सी बड़ी बात है. कल ही प्रायश्चित के महत्व पर सुना था आज वह अवसर भी आ गया है. उस महिला का दुःख तो किसी न किसी ने दूर कर ही दिया होगा पर उसके मन की कचोट जाने कब दूर होगी.

कल इतवार के कारण दिन भर कुछ नहीं लिखा. सुबह सफाई में जुट गये, दोपहर को कुछ देर टीवी और शाम को सुहाने मौसम में भ्रमण. The Golden Palace भी पढ़ी, काफी रोचक किताब है. आज इस समय सुबह के सवा आठ बजे हैं. राम नवमी है आज. उतर भारत में अवकाश का दिन. कुछ देर पूर्व छोटे भाई का फोन आया, उसके बैंक में क्लोजिंग है सो जाना पड़ेगा. उससे बात करके ख़ुशी हुई, सहोदरों से बात करके एक विशेष प्रसन्नता का अनुभव होता है. आज प्रार्थना में देर तक बैठ सकी. सुबह समाचारों में सुना, देश भर में कस्टम अधिकारियों के यहाँ छापे पड़ रहे हैं, करोड़ों की सम्पत्ति जब्त की जा रही है. वर्षों तक सरकार आख मूंद कर बैठी रहती है जबकि उसकी आँखों के सामने ही सब घटित हो रहा होता है. आज नन्हे के लिए एक लडकी का फोन आया जिसने दोस्त कहकर परिचय दिय नाम नहीं बताया. आवाज उसकी पुरानी स्टूडेंट से मिलती-जुलती थी. नन्हे के स्कूल में सभी टीचर्स काफी गम्भीर हैं इस वर्ष, वह भी नियमित पढ़ने बैठता है. उनके वक्तों से आज काफी कुछ बदल गया है. वे किसी तरह रट कर पास हो जाते थे पर आज के बच्चे सीखते व समझते हैं तभी इतने इतने अंक भी पाते हैं, उस समय पढ़ाई का सिस्टम ही अलग था.

कल रात भर वर्षा होती रही, मौसम ठंडा हो गया है. सुबह-सुबह एक सखी का फोन आया, नन्हे के बारे में पूछ रही थी, कल स्कूल से आया तो ढीला था, टिफिन भी वापस ले आया था, सो गया, रात को दवा दी अब ठीक है. वह फिल्म देखने के लिए बुला रही थी, नहीं जाना था उसे, वह इतने अधिकार से बुला रही थी कि एक बार तो मन हुआ पर जून और नन्हे को देखकर नहीं गयी. इतने दिनों से ‘रूपकुमार राठौर’ के कार्यक्रम में जाने को उत्सुक थी अब वह शौक भी नहीं रहा है. परिवार के सभी सदस्य जहाँ न जा सकें वहाँ जाना कुछ जंचता नहीं. गजल सुनना और वह भी तरन्नुम में... एक नायाब अनुभव होगा. अभी उस कार्यक्रम में बहुत दिन शेष हैं सो उसके बारे में सोचकर ज्यादा समय और ऊर्जा व्यय करना व्यर्थ है. कल शाम उड़िया सखी आई, उसे गुलदाउदी के पौधे चाहिए थे, उसने कुछ पौधे नये गमलों में से भी दिए जिनके फूल उन्होंने भी अभी तक नहीं देखे हैं. नन्हा आज घर पर ही पढ़ाई कर रहा है. आज भी भाई से बात हुई, जून ने उससे घर में चल रहे कार्य के बारे में पूछा, लकड़ी का काम अभी तक चल रहा है. फर्श जो उनके सामने बन गया था उसकी घिसाई का काम भी अभी तक नहीं हुआ है. जितना जल्दी हो सके उन्हें इस मकान को बेच देना है. उसकी किताब की पांडुलिपि मिल जाने की खबर अभी तक नहीं मिली है, वक्त आने पर सभी कार्य अपने आप होते जायेंगे, उसे ईश्वर पर उसके कार्यों पर पूरा भरोसा है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह भाग्यवादी है बल्कि यह कि वह धैर्यशील है. उसने ध्यान दिया लिखाई उतनी सुंदर नहीं है यह उसके मन की उद्व्गिनता का संकेत तो नहीं, यह बेचैनी ही तो जीवन का संकेत है !


Thursday, October 18, 2012

नए वर्ष का स्वागत



दिसम्बर का प्रथम दिवस, सर्दी जितनी होती है इस महीने में उतनी नहीं है. सम्भव है इस महीने में ठंड बढ़े. आज बड़े भाई का जन्मदिन है. आज उसने कक्षा आठ को अंकगणित में समानुपात पढ़ाया, उनका कोर्स बहुत कम हुआ है, और छात्राएं भी होशियार नहीं लगीं, गलती छात्राओं की कम, अध्यापकों की अधिक है. गणित के वह टीचर..लगातार पान चबाते हुए...क्या प्रभाव डाल पाएंगे विद्यार्थियों पर. वितृष्णा सी होती है देखकर..खैर, किसी तरह ग्यारह दिन और पढ़ाना है.

अभी तक जून के पहुंचने की कोई खबर नहीं आयी है, उसे चिंता होने लगी है. पता नहीं क्या बात है, उसके मन में विचारों की श्रंखला चलने लगी, वह ठीक तो होगा, क्या उसे यह बात पता होगी कि उसका कोई समाचार उन्हें नहीं मिल रहा है. फिर भीतर से किसी ने कहा कि परसों यानि सोमवार को उसका पत्र अवश्य आयेगा. उसने मन ही मन ढेरों शुभकामनायें उसके स्वास्थ्य के लिए कीं, उसकी खुशी के लिए कीं और मन हल्का हो गया. आज ही उसे पता चला कि जब अगले शनिवार तक उसके गणित के सत्रह पाठ हो जाएंगे और विज्ञान के ग्यारह, उसी दिन अध्यापन का अंतिम दिन है.

इतने दिनों से डायरी नहीं खोली, आज जाकर अवसर मिला है, अध्यापन फ़िलहाल तो समाप्त हो गय है. अब सोमवार से पढ़ाई शुरू होगी. आज माँ-पिता व छोटे भाई-भाभी के पत्र आये हैं. छोटी बहन का पत्र आया था, उसे जवाब लिखा है, पता नहीं उस पर क्या प्रतिक्रिया होगी. काकू की तबियत अभी तक ठीक नहीं हुई है, उसने सोचा कि उसे एक कार्ड भेजेगी. जीजाजी भी नहीं होंगे सो दीदी का पत्र तो आने से रहा. उसकी ननद भी जो बैंक की तरफ से ट्रेनिंग में गयी हुई थी, आजकल में लौटने वाली है.

आज बहुत दिनों बाद थ्योरी की कक्षाएं हुईं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था. सुबह से वे खाली थे, फिर अंतिम दो कक्षाएं हुईं, सुधा मैम का लेक्चर अच्छा था, आरती मैम का विषय बहुत उबाऊ था, और किसी दिन पढातीं तो शायद ऐसा न होता पर दिन भर प्रतीक्षा करते करते मन थक चुका था. कल कालेज में गेम्स होंगे, पीटी करवानी होगी, उसने अपना नाम तो दे दिया है. परीक्षा की तारीखें आ गयी हैं, १५ अप्रैल से शुरू होंगी और अप्रैल के आखिर तक चलेंगी संभवतः. मई में वे अपने घर जायेंगे.

आज जून का पत्र आया है. शाम को बाजार गयी थी, लौटी है कुछ देर पूर्व ही, मन-मस्तिष्क थका हुआ है. कल कालेज में कुछ नहीं हुआ सिवाय बातों के. आज सोचा है देर से जायेगी. सिर्फ ‘बागवानी’ होगी और सम्भवत ‘जनसंख्या’ का पीरियड हो, पर उसे बाद में नोट किया जा सकता है. वह नए वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स लायी है.

नववर्ष के शुभागमन के साथ ही
तुम्हारे सौभाग्य का उदय हो...
चलते चलो
जीवन के पथरीले पथ पर
दर्द जितना अधिक हो
सुख उतना ही ज्यादा होता है उसके मिटने पर
तपकर ही निखरोगे
जीवन की धूप में तपकर
निखार आएगा
नए वर्ष में स्वप्न देखो
तारों को छूने के
तभी आकाश तक पहुंच पाओगे
जीवन के इस समुद्र में
तैर कर पार हो जाओगे
चलना, तपना, तैरना और स्वप्न पूर्ण करना
क्या चारों पर्यायवाची नहीं..?

Sunday, September 23, 2012

क्यों चुप हैं तारे



साढ़े ग्यारह बज चुके हैं, रोज वे लोग इस समय तक दोपहर का भोजन खा चुके होते हैं, आज पिता गली में लगा चापाकल ठीक करने गए हैं, यह नल अगर खराब हो जाये तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी पिता और बाबूजी(मकान मालिक) की है, और अगर ठीक रहे तो इस्तेमाल सारा मोहल्ला करता है. पिता का व्यवहार कभी-कभी उसके समझ में नहीं आता, कभी इतने कठोर, कभी इतने उदार. कल जून का पत्र आया, उसे नहीं लगता कि वह भी उसके पिताजी की सेवानिवृत्ति के उत्सव पर घर जाने की बात पर राजी होंगे, उसने सोचा है वह दस दिन वहाँ रहेगी, कितने दिन हो गए हैं उन सब से मिले हुए, विशेषतया माँ-पिता से.
कल अंततः उसकी पासबुक बनवाने के लिए बैंक से देवर के एक मित्र आकर फार्म भरवा कर ले गए. वह ड्राफ्ट ऐसे ही पड़ा था, जो जून ने उसके लिए भेजा था. उसके पास पैसे खत्म हो गए थे, आखिर उसने माँ से कह ही दिया.
कल सुबह से समय ही नहीं मिला कि अपने निकट आ सके, यानि उसके पास, दिन भर कैसे बीत  गया पता ही नहीं चला. दिन में सोना हर तरह से हानिप्रद है, कल रात देर तक नींद नहीं आ रही थी, जिससे सुबह भी देर से उठी, और दिन में पढ़ नहीं पाई वह अलग. आज नन्हा उसके साथ ही सुबह पांच बजे ही उठ गया था, सो उसका स्नान, नाश्ता भी हो चुका है. वे दोनों ऊपर बैठे हैं, उसने सोचा एक घंटा यहाँ पढ़ाई करके ही नीचे जायेगी, यहाँ कितना शांत है वातावरण, नीचे तो शब्दों का शोर ही शोर हर तरफ.. जून के मित्र भी अजीब हैं, टिकट के पैसे ही नहीं ले रहे, अब आज तो वह आ नहीं रहे, कल आएंगे तो किसी भी तरह उन्हें पैसे देने हैं. एक अजीब तरह की बेचैनी छायी है मन पर कल शाम से जब से उन्होंने पैसे वापस किये. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही.

आज शायद उसकी दो भांजियों में से किसी एक का जन्मदिन है, कितनी बार सोचा कि चारों बच्चों  के जन्मदिन डायरी में नोट करने हैं पर ऐसा कभी कर नहीं पायी. कल रात एक फ्रेंच फिल्म देखने नीचे कमरे में गयी, नन्हा छत पर सो चुका था, पर निर्धारित समय पर फिल्म शुरू नहीं हुई, वह बैठे-बैठे ही सो गयी, फिर अचानक नींद खुली तो फिल्म शुरू हो चुकी थी, नींद का आवेग मन पर छाया था, सो वह समझ नहीं पायी कि पर्दे पर क्या चल रहा है, सो वापस छत पर आ गयी, पर आश्चर्यचकित रह गयी कि आकाश पर चमकते तारे देखकर नींद पता नहीं कहाँ खो गयी और काफी देर वह तारे ही गिनती रही. अभी कुछ देर पूर्व ही वह स्नान करने गयी, पानी में ठंडक नहीं थी और पानी की बहुत कमी भी है यहाँ, सो स्नान के बाद भी तन में ठंडक नहीं समायी है. उस जून का ख्याल आया, वह भी तैयार हो रहे होंगे. पांच दिनों बाद उन्हें भी एक परीक्षा देनी है, खूब पढ़ाई हो रही होगी. कल उसकी पासबुक व चेकबुक मिल गयी, उसने सोचा आज बैंक जाना चाहिए, देखेगी.
कल शाम जून के मित्र आए और उसने टिकट के पैसे दे दिए, कल बैंक भी गयी. उसके पेन की रीफिल खत्म हो गयी, सो घर में पड़ा एक पेन उसने उठाया, पर वह भी रुक-रुक कर चल रहा है.