Thursday, September 5, 2013

अटलांटा ओलम्पिक


कल वे क्लब में English फिल्म  Rising sun देखने गये, उसे ज्यादा अच्छी नहीं लगी, जबकि जून को रोचक लगी, पसंद अपनी-अपनी. शनिवार है आज, परसों से नन्हे के इम्तहान हैं. अभी जून के आने में एक घंटे का समय है, उसने सोचा इसका सदुपयोग करना चाहिए कोई कविता लिखकर या ध्यान लगाकर, कोई पत्रिका या पुस्तक पढ़ना तो बहुत आसान कार्य होगा जो बाद में भी किया जा सकता है.

कल उनके मित्र ट्रेन से आने वाले थे, पर कामरूप जिला बंद है, ट्रेन लेट है सो वे कल आयेंगे. इन आए दिन के ‘बंद’ का और कुछ असर होता है या नहीं, लोगों को परेशानी अवश्य होती है. कल दोनों घरों को पत्र भेज दिए और वे दोनों कविताएँ भी जो जून को बहुत अच्छी लगी थीं. उनके बाएं तरफ वाली पड़ोसिन किसी से फोन पर बात कर रही अहै उसके हंसने और बातों की आवाज यहाँ तक आ रही है, वह तेज तो बोलती ही है पर सन्नाटा भी तो है.

इस वक्त भी वर्षा हो रही है, पिछले कई दिनों लगातार वर्षा की टिप-टिप कानों में सुनते-सुनते अब तो इसका अभ्यास हो गया है, जैसे ईश्वर नल खुला छोड़कर भूल गये हों. नन्हा शुक्रवार को स्कूल नहीं गया, कल उसके दो पेपर थे, शाम को उसके दोस्तों को बुलाकर छोटी सी पार्टी की उसके जन्मदिन की. सभी बच्चों को बहुत अच्छा लगा. कितने भोले और कितना साफ़ दिल होते हैं बच्चे, निष्पाप, निर्द्वन्द्व, बड़े उनकी तुलना में कभी-कभी छोटे लगने लगते हैं, सारी उम्र बच्चे ही क्यों नहीं बने रह पाते. अगर बड़े भी उनकी तरह बातों के पीछे छिपे अर्थ न निकालें, जो जैसा है उसे वैसा ही लें, तो कितने ही उहापोहों से बच जाएँ, चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की आदत मात्र से. कल एक जापानी उपन्यास पढ़ा, अच्छा था, इतना रोचक की एक बार कोई हाथ में ले तो छोड़ने का मन ही न हो. जून नन्हे के लिए एक पत्रिका लाये हैं wisdom काफी ज्ञान है उसमें शुद्ध खालिस जानकारी.

आज से एटलांटा में ओलम्पिक खेलों का शुभारम्भ हो रहा है, यूँ वहाँ के समय के अनुसार १९ जुलाई यानि कल से खेल आरम्भ हुए अर्थात इस समय वहाँ कल शाम के साढ़े चार बज रहे होंगे. उसने उद्घाटन समारोह देखकर अच्छा लगा.

सिमट आया है सारा विश्व
मानो एक प्रांगण में आज
निहारते स्वप्न नगरी करोड़ों उत्सुक नयन
थिरकते एक लय में बद्ध नर्तक
लहराते इन्द्रधनुष रंगों के वस्त्र
धरा से गगन तक गून्जतीं ध्वनियाँ
सजतीं रौशनी की लड़ियाँ
और दमकते चक्र
अनुपम ! अद्भुत !
जैसे परीलोक उतर आया हो
एकता के सूत्र में पिरोता है पांच महाद्वीपों को
यह ओलम्पिक का महाकुम्भ !


इन्सान का दिल यानि मन दुनिया की सबसे अनोखी वस्तु है. मन में इतने तरह के विचार आते हैं, छोटे, बड़े, सुंदर, असुन्दर और कोई-कोई तो इतने बेतुके कि..मन खुद भी शर्मा जाये और यही वह मन है जिसने अपने विचारों की नवीनता से संसार को कई खोजें प्रदान कीं, कितनी पुस्तकें, कितने सुंदर चित्र और कलाकृतियाँ, कोमल भावनाएं भी इसी मन में अंकुरित होती हैं और कठोर निर्णय भी, कटु भाषा भी इसी मन के धरातल पर उत्पन्न होती है, और वह जो अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झुंझला उठती है उसके मन की कमजोरी की निशानी है. आज सुबह सुना, कार्य विचार की निरन्तरता का परिणाम है, जैसे हमारे विचार होंगे हम वैसा ही कार्य करेंगे और वैसा ही स्वयं को पाएंगे. कल शाम उसने अपनी एक सखी के साथ क्लब में स्विमिंग पूल के किनारे ठंडे शांत वातावरण में हल्का-फुलका व्यायाम किया, शाम का वक्त, पानी बहुत स्वच्छ था और वर्षा होकर थमी ही थी.    



Monday, September 2, 2013

पड़ोस की बिल्ली


आज नन्हा पानी की बोतल ले जाना भूल गया, जबकि वह उसके बैग के निकट ही रख देती है. बस में चढ़ने के बाद उसने इशारा  किया, पर जब तक वह घर जाकर बोतल लेकर आती बस को चले ही जाना था, उसने सोचा यही ठीक है कि आज वह पानी के बिना ही रहे, तभी भविष्य में ऐसी भूल नहीं करेगा. परसों शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, फोन करके सबको बताना है, कल तैयारी भी करनी होगी. आज सुबह से पड़ोस के बच्चे की सूसी नाम की एक बिल्ली उनके स्टोर में आकर सोयी है, शायद उसे यह घर भी अपना घर लग रहा है. उसे आवाज सुनाई दी, धोबी आ गया था, वैसे भी आज इधर-उधर की बातें लिख कर वह पेज भर रही थी, सही मायनों में जिसे आत्मशोध कहते हैं या आत्मज्ञान उसके करीब जाने का प्रयास नहीं था. आज ध्यान में अपेक्षाकृत सफलता मिली. मन को जब चाहे तब संयमित कर पाने की विद्या कुछ-कुछ सध रही है. पर कल दोपहर को उसे नैनी पर क्रोध करना पड़ा, क्या वह असंयम नहीं था, शायद नहीं, क्योंकि वह सोच-समझ कर उठाया गया कदम था. क्या इसका अर्थ यह नहीं कि यदि कोई गलत कार्य करे और उसे उचित ठहरने के लिए तर्क का सहारा ले तो कार्य सही हो जाता है. उसे तो लगता है क्रोध एक प्रभाव में आकर किया जाता है सम्मोहन की अवस्था में और वह मन का ही एक रूप है.

आज सुबह नन्हे को उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी, उसकी एक आँख तो चिपकी होने के कारण खुल ही नहीं रही थी. आज न तो जागरण पर ही ध्यान टिका पायी और न ही बाद में ध्यान के लिए बैठी. मीटिंग के लिए फोन करते-करते ही सारी सुबह निकल गयी. दोपहर पढ़ने-पढ़ाने में, शाम भ्रमण व बागवानी में. कल रात सैलाब में शिवानी को इतना बेबस देखा की उसके दुःख में शामिल हो गयी.

जून के आने में अभी काफी वक्त है और उसका सुबह का काम लगभग समाप्त हो गया है. जागरण में आज दादा का संदेश सुना- what is silence is turning to God बाहर का शोर यदि न भी हो तो हमारे भीतर जो आवाजों का शोर है उसे खत्म करके ही सच्चा मौन पाया जा सकता है. There are voices of desires, of anger, of so many feelings, so many useless thoughts then one can not turn to God even for a single minute. ईश्वर को पाना इतना कठिन क्यों है ? दूरदर्शन पर ‘मजहब नहीं सिखाता’ में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर एक भाव प्रवण दृश्य देखा, बच्चों का जन्मदिन मनाने जो नाराज मुसलमान पड़ोसी हिन्दू के घर नहीं आते वे रात को उसकी चीख सुनकर आ जाते हैं. जब तक लोगों में एक-दूसरे के मजहब के प्रति नफरत है तब तक लोग मजहब का असली रूप पहचान ही नहीं सकते. दादा कहते हैं, Make a relationship with God ! पर यह उसके लिए पहले कभी सम्भव था जब वह बरबस यह वाक्य बोला करती थी, God is with her always because he is her friend. लेकिन अब इतनी निकटता अनुभव नहीं कर पाती, भावना पर बुद्धि हावी हो जाती है और कभी-कभी लगता है कि ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं है. पर वह जानती है, किसी भी विपत्ति के आने पर उतनी ही श्रद्धा से फिर उसे पुकारेगी. ईश्वर उसका मददगार है क्योंकि उसमें यह चाह है.




  

Sunday, September 1, 2013

कालिदास का मेघदूत


आज बहुत दिनों के बाद ऐसा हुआ कि वह दोपहर को घर पर अकेले है, पुरानी दिनचर्या के अनुसार पहले अख़बार पढ़ती रही, यूँ काफी देर तक पढ़ा पर अब दोहराने बैठे तो कुछ विशेष याद नहीं, फिर भी अख़बार पढ़ना अच्छा लगता है. कुछ देर लाइब्रेरी से लाई वह पुस्तक modern Asian literature भी पढ़ी. दोपहर को टीवी देखने का अभ्यास पिछले कई हफ्तों से छूट गया है सो यही उचित लगा कि मन को साधा जाये यानि विचारों को लिखकर पहले एक बिंदु पर केन्द्रित किया जाये फिर गोयनका जी की सिखाई विपश्यना की क्रिया द्वारा कुछ देर साधना की जाये. सुबह दादा वासवानी ने भी मौन और प्रार्थना की शक्ति पर बल दिया. बाद में स्टोर की सफाई में लग गयी सो धयान नहीं कर सकी, रोज प्रयत्न ही करती है, ध्यान में सचमुच बैठने का अवसर मात्र एक बार मिला है. मन है कि विचारों की ओर दौड़ने लगता है. आज यूँ अपेक्षाकृत मन शांत है. लेकिन अभी कुछ देर में नन्हा आने वाला है, वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर भी रात तक तरोताजा रहता है, बच्चों में या कहें मानव में शक्ति अपार है बस उसका सही इस्तेमाल करना आना चाहिए. उसके मन के खजाने में न जाने कितनी कविताएँ सोयी पड़ी होंगी, कितने अछूते भाव और ढेर सारा काम करने की कुव्वत, बस कमर कस के निकल पड़ने की देर है. फ़िलहाल तो किचन की ओर कदम बढ़ाने हैं, उसके बाद कहीं और !

वही दोपहर का वक्त और आकाश काले बादलों से घिरा हुआ. खिड़की से ठंडी हवा का झोंका आकर पीठ को छू जाता है सिर्फ दूर से किसी वाहन की ध्वनी आकर निस्तब्धता भंग कर देती है. काफी देर से reader’s digest पढ़ रही थी इस पत्रिका में पढ़ने के लिए बहुत कुछ है. आज सुबह उठने से पूर्व एक स्वप्न देख रही थी, वर्षों बाद एक पुराना स्वप्न, शायद वे स्मृतियाँ उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगी, जैसे आज सुबह ध्यान में बैठने पर पांच मिनट में ही नन्हे ने माँ, माँ की गुहार लगा दी और उसके बाद इस वायु की गति से भी तेज भागते मन को पकड़ कर रखना सम्भव नहीं हो पाया. लेकिन उसे प्रयास तो करते ही रहना है, एक दिन अवश्य ऐसा आयेगा जब आचार्य के उपदेशानुसार वह अपने मन के विकारों को दूर करके उसे सम्पादित कर उस परम सत्य के दर्शन कर सकेगी अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों को बहुत कठिन तपस्या करनी पडती है. अपने मार्ग में आये हुए सभी कार्यों को साधित करके उन्हें अपने कर्त्तव्य पालन का सदा स्मरण रहता है वे सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते और सदा स्वयं भी तथा दूसरों को भी आनन्दित रखने का प्रयास करते हैं.


वर्षा की बूंदें पड़ने लगी हैं जो उसकी डायरी के इस पन्ने को भिगो रही हैं. सुबह के सवा पांच बजे यहाँ बाहर drive way पर जहाँ दोनों ओर से बेला के फूलों की सुंदर महक आ रही है और किसी पंछी की आवाज एक लय में आ रही है जिसमें अब बूंदों की टप टप भी मिल गयी है ऐसे सुहाने वक्त में तो मन शांत कोमल भावों से भरा होना चाहिए. उस एक की आराधना में लीन जो इस सुंदर दृश्य का चितेरा है और हर क्षण साथ रहकर चेताता रहता है, वह जो पल-पल मन को सजग रहने का निर्देश देता है गलती होने पर आत्मग्लानि से मन को भर देता है, और जिसकी बात वह सुनी-अनसुनी कर जाती है फिर भी वह नाराज नहीं होता. जो इस जगत में हर एक का रखवाला है. आज जुलाई का पहला दिन है, यानि आषाढ़ का महीना, सदियों पूर्व जब मेघों की सुन्दरता से प्रभावित होकर कालिदास ने मेघदूत की रचना की होगी. कल सुबह जून ने घर फोन किया तो पिता ‘कृष्ण’ देख रहे थे टीवी पर सबके साथ, वे लोग उसमें साक्षात् भगवान को देखते हैं, और वह नाटक, तभी देख नहीं पाती. 

Saturday, August 31, 2013

ताय कांडू yani taekwondo


‘दिल का मरहम कोई न जाने जो जाने सो ज्ञानी’

दिल का प्याला कभी छलक उठता है
और कभी खाली हो जाता है
दूर समुन्दर में कभी दिखते कभी छिप जाते
जहाज के प्रकाश की तरह
वह एक जादूगर जो छिपा है
सात पर्दों के पीछे
चुपचाप हँसता रहता है
या शायद उसकी हँसी भी रूठ जाती हो
दिल के टूटने की आवाज पर
जो वह हजार पर्दों के पीछे भी सुन सकता है !

आज मौसम ठंडा है, कल दोपहर जब वे एक और मित्र के यहाँ थे, वर्षा की मधुर झंकार सुनाई दी और तीन बजे तक बिजली भी आ गयी थी. आज शनिवार है, पिछले दो शनिवारों को नन्हे ने कोई विशेष डिश बनाने में सहायता की थी, आज भी वह तरला दलाल की किताब से कोई नई रेसिपी खोज रहा है.

टीवी पर खबरें सुनकर उसने सोचा, राजनीति यानि राज करने की नीति, राज यानि शासन और नीति यानि कुछ नियम अथवा आचार संहिता, जिसके अनुसार राज चलाया जाना चाहिए. पर राजनीति शब्द का गलत अर्थ निकाला जाता है जब उसे आज के हालात में देखा जाये, राजनीति यानि जोड़-तोड़ करके पाई गयी सत्ता का दुरूपयोग !

शाम के छह बजने को हैं, जून क्लब गये हैं, नन्हा पढ़ाई कर रहा है. वह स्कूल से आकर तायकांडू देखने एक अन्य स्कूल में गया था, आजकल वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर क्लब तायकांडू सीखने जाता है. उसके साथ वे भी उठ जाते हैं, कुछ देर टहलते हैं, फिर समाचार देखते हुए चाय, उसके बाद जागरण. आज स्वीपर से घर का जाला आदि साफ करवाया, घर साफ-सुथरा, भला सा लग रहा है. दोपहर को हिंदी पढ़ाने गयी, लौट कर नाश्ता बनाने के बाद एक घंटा बगीचे में काम किया. कल उसने धूप की कामना की थी, जिससे आज गुलदाउदी के पौधे लगा सके, अब आज धूप न निकलने की कामना है ताकि नन्हे पौधे धूप में कुम्हला न जाएँ. इन फूलों का जिक्र आते ही उसे बंगाली सखी याद आया ही जाती है, पता नहीं वह उसे याद करती है या नहीं. सुबह से वह व्यस्त रही है फिर भी एक खालीपन का अहसास मन पर छाया हुआ है. पिछले दो तीन दिनों से जून कोई पत्रिका भी नहीं ला रहे हैं जिसे पलटकर दिल का खालीपन को भर लिया जाये, पर यह खालीपन उस एक की प्रतीक्षा में है वह उसका खुदा जाने कहाँ है ? घर से खत आया है, माँ ने लिखा है, उन्हें खुशी है कि उसकी दिनचर्या व्यस्त है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग में गयी थी, वहाँ कुछ खास नहीं हुआ पर घर आई तो नन्हे और जून ने जिस तरह स्वागत किया वह मन को छू गया. फिर ‘हम पांच’, सैलाब और समाचार के बाद जब आँख बंद कर लेटी तो मन में क्लब की बातें ही थीं.


Thursday, August 29, 2013

बिजली चली गयी


आज उसने सुना, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से सुख-दुःख को भोगना ही सम्यक प्रज्ञा है. आरम्भ में बाधाएँ तो आएँगी ही, लेकिन होश सहित श्रद्धा के बल पर और ज्ञान के बल पर इस पथ पर बढ़ा जा सकत है. अनंत मैत्री, अनंत करुणा, अनंत मुदिता, अनंत उपेक्षा, ये चार गुण साथ में लेकर यदि श्रद्धा करें तो ही सच्ची श्रद्धा है, यानि विवेक युक्त श्रद्धा.

आज धूप बहुत तेज है, और अभी-अभी बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है, शीतलता यहाँ तक महसूस हो रही है. इस हफ्ते सात पत्र मिले हैं, जवाब देने के लिए कम से कम एक घंटा तो लगेगा.

नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण वह इतनी सुंदर सुबह का आनन्द उठा पा रही है. आज सुबह साढ़े चार बजे ही उठ गया और आधे घंटे में तैयार होकर नन्हा चला गया है. बादल जो कल शाम से बनने शुरू हुए थे, अभी भी है, रात भर बरस चुके हैं सो मौसम में ठंडक है. आज उसकी एक मित्र का जन्मदिन है, कल रात नींद आने तक कुछ पंक्तियाँ उसके लिए मन में गढ़ रही थी-

आँखें हंसती रहें लब मचलते रहें
गीत अधरों से यूँ ही झरते रहें

दुःख की छाया न ही गम अँधेरा कभी
कदम दर कदम फूल खिलते रहें

सुख में शामिल सदा दुःख में भी साथ हों
सिलसिले दोस्ती के यूँ चलते रहें

खुशनुमा ही रहे हर दिवस इस तरह
बरस दर बरस वह चहकते रहें

जिन्दगी का हर इक रुख हो रोशन सदा
दिल में चाहत के दीपक जलते रहें

हमसफर साया बन के सदा साथ हो
चाहे मौसम फिजां के बदलते रहें

आज सुना, “अनित्य के प्रति जो आकर्षण है उसे तोड़ने के लिए उसका दर्शन करते करते ही नित्य तक पहुंचा जा सकता है. देखना जानने की क्षमता पैदा करता है. नित्य अवस्था में न तो उत्पाद होता है न क्षय होता है. स्थूल से सूक्ष्म तक आने के बाद उसका भी अतिक्रमण हो जाये”.

कल आखिर विश्वास मत पारित हो गया और देवेगौडा सरकार ने संसद में पूर्णमत हासिल कर लिया यानि अब हमारी एक अदद सरकार है. आज फिर मौसम बेदर्द होकर तपन बरसा रहा है, वे लोग जो बंद कमरों में पंखों और कूलरों के सामने रहते हैं उन्हें शिकायत करने का क्या हक है, जब हजारों लाखों लोग खुले आसमान के नीचे अपनी रोज़ी कमाने को विवश हैं.

आज उसने सुना, ‘अनुभूतियों से सच्चाई जानना ही धर्म ध्यान है. अपने भीतर उठने वाले विकारों पर तुरंत रोक लगाना और उन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंकने को ही उपशमन कहते हैं. दमन नहीं चाहिए. जो क्षण अविद्या में बीतता है, विकारों का संवर्धन होता ही जाता है. मानस में एक विकार जागा तो उसके फल के साथ उस विकार का बीज भी आता है, और अज्ञान के कारण हम उसे सींचते रहते हैं. हमारे विकारों के दो सेनापति हैं, राग और द्वेष जिन्हें खत्म करना है ताकि हम अपने शिव को मंगल को न कुचल डालें. ध्यान जब जागता है तो हमारे पुराने कर्मों का बल समाप्त होता जायेगा और मन करुणा से भर जाता है. पुराने समाप्त हो गये नये बनते नहीं यही तो मुक्त अवस्था है. लेकिन बुद्धि के बल पर इसे समझने से कोई लाभ नहीं, होश में रहकर ही आग का मुकाबला पानी से करते हैं. अंदर तक स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास करना होगा, अपने भीतर होने वाली संवेदनाओं के प्रति सजग रहने का अभ्यास नहीं किया तो स्वभाव वैसे का वैसा रहेगा. प्रज्ञ प्रत्यक्ष ज्ञान है”.

पिछले कई दिनों से मौसम बहुत गर्म है, पसीने से तर हैं वे लोग. कल रात बिजली चली गयी थी और इस समय भी वही हाल है, इस खिड़की के पास बैठकर कभी-कभी हवा का एक झोंका आकर गर्दन को छू जाता है. अभी जून को फोन किया तो वह कहने लगे आज दिन में करेंट जायेगा यह तो पता था पर कब आयेगा यह पता नहीं. देखें तब तक उनका क्या हाल होता है, ये नन्हे के शब्द हैं. कल रात वे एक मित्र के यहाँ सोये वहाँ बिजली थी, उनके घर की चाबी उनके पास थी. आज दोपहर को वे “एक बन्दर होटल के अंदर” देखने वाले थे और पीटीवी पर दायरे भी देखना  था पर अब बिजली के बिना सारे कार्यक्रम धरे रह गये हैं. पर उन्हें बिजली पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए, उन लोगों की तरफ देखना चाहिए जिन्हें ये सब सुविधाएँ नहीं मिलती हैं, या फिर बड़े शहरों में जहाँ बिजली अक्सर जाती ही रहती है.
  





Tuesday, August 27, 2013

तीसरी कसम


Today is her birthday, oh God ! how long she has lived on this beautiful earth ! so many years and so many memories of those years, some good and ofcourse some  not  so  good. It is 9 a m  and  she has got  birthday wishes from her friend and didi. When she gotup in the morning  jun  gave her  a nice greeting card and a chocklate with lots of love. He is so loving and caring always but sometimes she can’t see this, perhaps she remains aloof or may be she takes it as naturally as their being together. Last night in a dream she saw father also wishing her good. When there are so many people how can be she lonely ever. Nanha wished her also but he is too lazy to make a card. Today weather is excellent and they will have some mouth watering dishses in dinner.

आज सुबह जागरण भी देखा और सुना, आचार्य ने मैं औए मेरा के बंधन से मुक्त होने की बात कही. तृष्णा के त्याग की और आसक्ति से मुक्ति की भी. बातें सुनने में तो बहुत अच्छी लगती हैं पर सदियों से मन मैं, मेरा के समीकरण में लिप्त है. उससे निकल पाना दुष्कर लगता है. जन्मदिन के दिन ऐसी दुर्बलता क्या ठीक है ? बल्कि उसे तो प्रण लेना चाहिए कि अनावश्यक तृष्णाओं के जाल से दूर रहकर अनासक्त भाव से जो मार्ग में आए उसे साधित करते हुए अपना जीवन व्यतीत करे अर्थात अपने कर्त्तव्यों का पालन करे, व्यर्थ की चिंताओं और प्रपंचों में न पड़े. मन को विकारों से धीरे-धीरे दूर करते हुए वर्तमान में जीना सीखे.

कल रात्रि वे देर से सोये, जन्मदिन का विशेष डिनर (मलाई कोफ्ते भी थे) खाते-खाते ही दस बज गये, फिर छोटी बहन और उसके पति से बात की. छोटी बहन ने बताया वह ‘ए आर ओ’ बन गयी है, शायद इसका अर्थ असिस्टेंट रीजनल ऑफिसर होता हो या कुछ और मेडिकल लाइन से सम्बन्धित. सोते-सोते ग्यारह बज गये, नतीजा सुबह नींद देर से खुली और अभी तक रात के भारी खाने का असर बाकी है, हर ख़ुशी की कीमत चुकानी पडती है. कल छोटे भाई का फोन भी आया. बड़े भाई के यहाँ उसने स्वयं ही किया पर घंटी बजती रही किसी ने उठाया नहीं, शायद गर्मी और बिजली न रहने के कारण वे लोग बाहर निकल गयर होंगे. बड़े शहरों में रहने के कुछ फायदों के साथ नुकसान भी हैं. नन्हा इस समय story book पढ़ रहा है जबकि उसका बहुत सा गृहकार्य शेष है. मौसम आज मेहरबान है, कुछ देर पहले एक फोन आया, एक महिला ने अपनी बारहवीं में पढ़ रही बेटी को गणित पढ़ाने के लिए कहा है.

जून का प्रथम दिन..यानि गर्मी के एक और महीने की शुरुआत. उसने काश्मीर फ़ाइल का एक अंक देखा, अछ अलग, वहन शांति पूर्ण चुनाव हो गये हैं और मतदान का प्रतिशत भी अच्छा रहा है. आज टीवी पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म दिखायी जाएगी, राजकपूर की पुरानी फिल्म जिसके गाने बहुत अच्छे हैं. आज फिर वर्षा हो रही है, नन्हे के जाते ही शुरू हो गयी, वह न छाता लेकर गया है न बरसाती ही, जुकाम से पहले ही परेशान है, अभी कुछ देर पहले फोन पर बताया कि दोस्त के यहाँ से छाता लेकर जा रहा है, उसकी आवाज फोन पर बहुत मीठी लगती है. कल वे दिगबोई और फिर तिनसुकिया गये, ट्रिप अच्छा रहा पर शाम को लौटकर थकान महसूस हो रही थी. उसके साथ ऐसा ही होता है, कार से उतरते वक्त तक थकन का नामोनिशान भी नहीं होता पर कपड़े बदलते-बदलते ही पता चलता है कि दिन भर कितना चले.


आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ है, एक वक्त था जब पर्यावरण शब्द का अर्थ खोजने के लिए शब्दकोश खोलना पड़ता था, आज बच्चे-बच्चे को इसका अर्थ ज्ञात है. जब पहली बार यह शब्द सुना था अर्थ जानकर एक कविता लिखी थी, काले, धूसर पहाड़ों की, जो पेड़ कटने से अपनी हरियाली खो चुके हैं, किसी ‘डाल्यु के दड्गया’ के लिए यानि पेड़ों का दोस्त. उसके सामने आज एक पीला होता हुआ पौधा है, जो कभी एकदम हरा था, आज उसे बचाने का प्रयास कर रही है, शायद फिर से उसमें नई पत्तियां आने लगें. उनका पुराना मनी प्लांट भी सूख रहा है उसका भी नवीकरण करना है यानि पीली पत्तियों और सूखी टहनियों को तोडकर हरे भरे पत्तों को रखना है. 

Monday, August 26, 2013

देवेगौड़ा जी का शासन



सुबह सोकर उठी तो मन में फिर वही बातें घूम गयीं, समूह गान तथा skit... कल दीदी का खत आया, बहुत अच्छा लगा उसे, बुआ जी के बारे में उनके विचार पढकर और भी अच्छा..बचपन की यादें कभी-कभी वर्तमान पर भी हावी हो जाती हैं.. सुबह गोयनका जी फिर समझा रहे थे, अनुभूति के स्तर पर किया गया दर्शन ही मुक्ति की ओर ले जायेगा. मानव के कर्मों का फल ही उसे निरंतर सुख या दुःख के रूप में मिलता है, दैहिक या वाचिक कर्मों का ही नहीं मानसिक कर्मों का भी क्यों कि हर क्षण मानव जो भी है अपने मन का प्रतिबिम्ब ही है, मन में कोई दूषित विचार आया नहीं कि दुःख का एक बीज रोपित हो गया. हमारे सारे सुख-दुःख परछाई की तरह हमारे साथ चलते हैं और उनका उद्गम है मन. आँखें बंद करती है तो स्वयं को एक उहापोह में घिरा पाती है, एक तनाव भी, जो इस कार्यक्रम की सफलता-असफलता को लेकर है और एक उलझन भी कि इस टीम वर्क में उसका कितना योगदान होना चाहिए. एक क्षण को यही लगता है कि सारी बागडोर अपने हाथों में संभाल लेना ही ठीक है या सिर्फ सुपरविजन ! देखें क्या होता है, मूक भाव से सारी घटनाओं का निरिक्षण व दर्शन करना भी तो उसके मन का काम है.

और कल उनकी skit हो गयी, उसकी एक भूल के कारण एक छोटा सा दृश्य नहीं हो पाया, जिसके लिए वह कल शाम से ही परेशान है, लगता है इस बार उन्हें पुरस्कार वितरण समारोह में जाने की जरूरत नहीं है, वैसे भी जून कल शाम को मोरान जा रहे हैं. नन्हा कम्प्यूटर क्लास में गया है. और कल शाम से अचानक शुरू हुई वर्षा के कारण उसका मन भी शांत है, आज से उसने घर की सफाई का काम भी शुरू किया है, खतों के जवाब भी देने हैं, आज बच्चे भी पढ़ने आएंगे यानि सारा दिन व्यस्त रहेगी जो ठीक ही है, जून की कमी उतनी नहीं खलेगी. कल शाम से एक विचार मन में यह भी आ रहा है कि प्रेम उसके जीवन से भाप बनकर उड़ गया है, जून के लिए या संसार में किसी के लिए भी. दो दिनों के लिए जून दूर गये हैं तो इसकी भी परीक्षा हो जाएगी.

जून का फोन आया तो वे सो ही रहे थे, उनके बिना न तो वे खाना ही ठीक से खा सके और नींद भी रात को खुलती रही. कल दिन भर की तरह आज भी टीवी पर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष में हुई बहस सुनी. बीजेपी और यूनाइटेड फ्रंट दोनों दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े हैं और कोई भी दूसरे को समझना नहीं चाहता सिर्फ राजनीति के लिए राजनीति कर रहे हैं ये लोग, देश के लिए क्या अच्छा है यह नहीं सोचते. अब तक तो मतदान भी हो गया होगा और बीजेपी हार गयी होगी. देश में बहुत सारे लोगों के चेहरे उतर गये होंगे. जगजीत सिंह का कैसेट बज रहा है अभी तक एक साथ बैठकर पूरा नहीं सुन पाई है, उसने सोचा अब जून का इंतजार करते-करते सुनना अच्छा लगेगा.


कल जून पूरे छह बजे आये, INSIGHT पूरा सुन लिया सबसे अच्छे लगे दोहे और यह गजल, ‘’बदला न अपने आपको जो थे वही रहे...’’जून आए तो घर जैसे उत्साह से भर गया. आज दोपहर को वह ढेर सारा सामान ले आए उसके जन्मदिन के लिए और कल चप्पल भी लाये थे बहुत सुंदर चप्पल है अब उसके पैर उन निशानों से बच जायेंगे जो हवाई चप्पल पहनने से पड़ने लगे हैं. कल आखिर अटल बिहारी वाजपेयी जी को इस्तीफा देना पड़ा और अब देवगौड़ा जी को सरकार बनाने का निमन्त्रण दिया गिया है. १२ जून तक उन्हें सरकार बनानी है इस बीच में न जाने कितने मतभेद उभरेंगे. धर्मयुग में पढ़ा, इन्सान रोटी, पूजा और प्यार एक साथ चाहता है, सच ही है भोजन इन्सान की सबसे बड़ी जरूरत है और प्यार के बिना वह अधूरा है. श्रद्धा या पूजा इसे आदमी से इन्सान बनती है. श्रद्धा यानि अच्छाई के प्रति आस्था, उस परम शक्ति के प्रति आस्था जिसने इस सुंदर ब्रह्मांड की रचना की है. कल उसका जन्मदिन है पर जाने क्यों इस बार पहले की सी उत्सुकता या उछाह नहीं है, शायद बढ़ती हुई उम्र का तकाजा या..भय. उम्र मन की गिनी जाये तो अभी मन इतना तो बड़ा हुआ नहीं कि जन्मदिन की ख़ुशी मनाना ही भूल जाये.