Friday, May 24, 2013

चन्द्रकान्ता संतति- एक रोचक उपन्यास


कल दोपहर का भोजन उसने दो सखियों के साथ खाया, अच्छा लगा, संयोग था कि सभी अकेली थीं. आज राई का पेस्ट बनाया गाजर की कांजी के लिए. शाम को टी.टी खेलने गये, बहुत दिनों बाद, बाहर हरी घास पर स्किपिंग भी की, ठंडी हवा चेहरे पर भली मालूम पडती थी. आज साइकिल से एक सखी के यहाँ जाएगी. कल तीन पत्र आये, एक दीदी का भी जो चाहती हैं, अगला पत्र वह अंग्रेजी में लिखे. उनके भारत आ जाने पर तो वे उनसे मिल ही पाएंगे अगले एक दो वर्ष में. आज अभी तक नैनी नहीं आई है, लगता है चावल आज कड़ाही में बनाने होंगे.

 दोपहर के डेढ़ बजे हैं, मन में कई विचार लिए वह अपने करीब आना चाहती है. आज सुबह  सब कार्य समय पर हो गया, यहाँ तक कि नन्हे के फोटो के लिए भी पांच मिनट का समय मिल गया. लेकिन उसने आज तक कैमरा हैंडल ही नहीं किया था सो बैटरी बदलने के चक्कर में रील एक्सपोज हो गयी लगती है, जून ने कहा तो है, पूरी रील खराब नहीं होगी, कैमरे के बारे में कितनी कम जानकारी है उसे, परसों लाइब्रेरी से इस विषय पर कोई किताब लाएगी. जून आज सासोनी गये हैं, देर से आने को कहा है, उसने स्पेशल बाथ लिया समय का सदुपयोग करते हुए. सुबह फूफाजी का पत्र आया, उन्हें कई बार नया पता लिखने के बावजूद वह जून के पुराने पते पर ही पत्र भेजते हैं, यह तो अच्छा है, वे लोग उनके विभाग में भेज देते हैं. उनकी असमिया की कक्षा आज है पर उसे लगता है, जब तक बोलने का अभ्यास नहीं होगा कोई लाभ नहीं है. आज उसने पहली बार करी पत्ते की चटनी बनाई जो जून को पसंद आई.

आज ऐसा लग रहा है जैसे गर्मियों का मौसम आ गया हो. नन्हे को दिगबोई में गर्मी लग रही होगी, आज वह दोस्तों के साथ वहाँ गया है, स्कूल की तरफ से. कल रात उनके पुराने परिचित, पंजाबी दीदी के पति खाने पर आये, साढ़े दस बजे वे गये. उसे लगता है, उन्हें भोजन अच्छा लगा. पर हर बार किसी को खाने पर बुलाने से सब्जियां बच जाती हैं, उसे बासी खाना पसंद नहीं, पर...वे तेजपुर से बेंत की जो बैलगाड़ी लाये थे, वह उसने दीदी के लिये भिजवाई, वे मट्ठियाँ और बर्फी लाये थे. आज सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ अपने बगीचे की एक पत्तागोभी लेकर गयी पर उसने उससे बहुत बड़ी गोभी अपने बगीचे से निकल कर उसे दे  दी. पिछले दरवाजे पर दस्तक हुई है शायद, शिबू आया है, उसकी किताब का एक पेज थोड़ा सा फट गया है, वह थोड़ा परेशान है, उसे सेलोटेप से जोड़ देना चाहिए. कल उन्हें तिनसुकिया जाना है, अगले महीने घर भी जाना है और उसके बाद दो माह की गर्मी की छुट्टियाँ...वे चन्द्रकान्ता सन्तति के शेष भाग तब पढ़ेगी, नन्हे को भी बहुत अच्छा लग रहा है तिलिस्म भरा कथानक. जून आज भी कोई पत्रिका नहीं लाये, पहले जब वह मैगजीन क्लब के ऑर्गेनाइजर नहीं थे, हर दिन घर में एक पत्रिका आती थी, पर अब वह भूल जाते हैं.





Wednesday, May 22, 2013

ईद की सेवइयाँ



मार्च की पहली तारीख, पर मौसम कितना ठंडा और भीगा है, कमरे में हीटर जल रहा है,  जैसे जनवरी का कोई दिन हो. नन्हा स्कूल गया है, उसने सोचा उसे भी ठंड लग रही होगी, वह तो अच्छा हुआ, स्काउट की ड्रेस पहन कर नहीं गया. उसे याद आया वे भी बचपन में बेहद ठंडे दिनों में स्कूल जाया करते थे. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, कैरम खेला और रुबिक क्यूब बनाया, आज उसने बीस मिनट में ही ‘रुबिक क्यूब’ बना लिया.

कल सुबह से ही उसे असमिया क्लास की प्रतीक्षा थी, पर शाम को उनके सहपाठीजनों  का फोन आया कि आज वे नहीं आ पाएंगे, उसे खराब लगा और उसकी आवाज की तल्खी जरुर उस तक पहुँची होगी, उन्हें जिम्मेदारी का थोड़ा सा भी अहसास नहीं है. कल नन्हे का एडमिशन लेटर भी आ गया, खशी तो है ही पर जून की बातें और उनके व्यव्हार से यही लगा कि ज्यादा फ़ीस को लेकर वह चिंतित हैं. नन्हा खुश है यही बात मन को संतोष देती है. आज कई दिनों बाद धूप निकली है, गमलों में जरबेरा के सात फूल खिले हैं, और इम्पेशेंट के छोटे-छोटे गुलाबों जैसे फूल भी.

परसों सुबह उसने जून की पैसों को लेकर चिंता के बारे में लिखा था वह शत प्रतिशत सही लिकला. जब जून खाना खाने आये, उन्होंने प्रिंसिपल से बात की और निराश हुए, बात दरअसल पर्सनल मैनेजर से ही हो सकी, हर वर्ष १५% से २०% की बढ़ोतरी भी वार्षिक खर्च में होगी. वे दोनों ही परसों दिन भर उदास रहे, शाम को अमिताभ बच्चन की एक फिल्म लाये. कल ईद की छुट्टी थी दोनों की, उसने सेवइयाँ बनाई थीं. शाम होने तक वे काफी सामान्य हो चुके थे. जून के ऑफिस में कम्प्यूटर गेम खेला. और फिर एक मित्र के यहाँ गये, वह एक और मित्र भी थे, फिर तो बहुत बातें हुईं, सार यही निकला क नन्हे को तीन-चार वर्ष के बाद बाहर भेजना ज्यादा अच्छा रहेगा, तब तक उन्हें पैसों का बन्दोबस्त कर लेना चाहिए. कल शाम को ही पड़ोसी भी आ गये, उन्हें भी शायद नन्हे की पढ़ाई के बारे उत्सुकता रही होगी. जून ने फैक्स भी भेजा है और किन्हीं श्री बोरबोरा से बात भी करने वाले हैं जिन्हें ज्यादा फ़ीस की वजह से अपने बेटे को वापस बुला लेना पड़ा था. आज फिर बदली छाई है, दिन में भी शाम जैसा अहसास हो रहा है. कल रात उन्हें फिर नींद नहीं आ रही थी, जून ने कहा फिल्म देखते हैं, ऐसा वह कम ही कहते हैं, सवा बारह बजे वे सोये पर उसके बाद भी परेशान करने वाला वही स्वप्न आया जो कई बार पिछले दो वर्षों में आ चका है.


Tuesday, May 21, 2013

शिवरात्रि का व्रत



सोमवार की सुबह वे तेजपुर के लिए रवाना हुए. नन्हे के इन्टरव्यू के बाद परसों, मंगल की शाम को वापस आये. कल सुबह घर व कपड़ों की सफाई में गुजर गयी. जून को पूरा विश्वास है, दाखिला हो जायेगा. उन्हें स्कूल की इमारत काफी शानदार लगी, अभी फर्नीचर वगैरह नहीं थे कक्षाओं में. पहली अप्रैल से स्कूल शुरू हो रहा है. इतने कम समय में कैसे होगा और अभी टीचर्स का इन्टरव्यू भी होना शेष है. लेकिन ये सब स्कल वालों की समस्याएं हैं. उनके सामने  है, नन्हे की कक्षा तीन की वार्षिक परीक्षा. जिन बातों का कोई हल नहीं उन्हें वक्त पर छोड़ देना ही बेहतर है. नन्हे ने कल पहली बार स्वयं बोर्डिंग स्कूल जाने को कहा, वे जानते हैं, वह  वह खुश रहेगा और कक्षा में अच्छे विद्यार्थियों में से भी. तीन महीने शुरू में रहने के बाद दो महीने की छुट्टियाँ होंगी. जिन्दगी में परिवर्तन होगा, पिछले नौ-दस सालों से चली आ रही जिन्दगी में.
आज फिर कुछ दिनों के अन्तराल के बाद डायरी खोली है. कुछ दिन अस्वस्थता और फिर अव्यवस्था, यानि ओढ़ी हुई व्यस्तता. आज माह का अंतिम दिन है. सुबह से वर्षा के कारण  मौसम काफी ठंडा हो गया है. कल शाम नन्हे को जून ने किस बात पर डांटा तो वह बहुत रोया, उसके डांटने पर वह इतना परेशान कभी नहीं होता. कल शिवरात्रि का व्रत था, जून ने भी उसका साथ दिया और उन्होंने सिर्फ फलाहार किया, शाम को मन्दिर गये पर विधि के अनुसार पूजा करना उसे आता ही नहीं है, सिर्फ दर्शन करके आ गये. पिछले कई महीनों से उसने कोई कविता नहीं लिखी, अपने आप से सम्बोधित होते हुए अपने करीब जाते हुए कतराने लगी है, कविता तभी उपजती है जब अपने अंतर में झांक कर पूरे दिल से कुछ महसूस करें, ऊपर –ऊपर से शान्त दिखने वाल मन रूपी सागर के अंदर जो खलबली मची है उसे देखना होगा, एक दर्द से दो चार होना पड़ेगा, पिछले दिनों जून धर्मयुग की कई प्रतियाँ एक साथ लये, क कविताएँ उनमें अच्छी थीं. छोटी बहन ने उसके खत का जवाब नहीं दिया, अपनी जिन्दगी की बागडोर जब तक वह स्वयं अपने हाथ में नहीं लगी, खुश नहीं रह पायेगी, जितनी जल्दी यह बात समझ ले अच्छा है. ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर लिखी कविता के लिए उन्हें पुरस्कार मिला है, हिंदी दिवस पर एक नारे के लिए भी एक पुरस्कार घोषित हुआ था. एक  स्वेटर पूरा हो गया है, अब दूसरा शुरू किया है.





Monday, May 20, 2013

गोल्फ फ़ील्ड में भ्रमण



कल दोपहर उसने टमाटर प्यूरी बनाई, उनके घर में उगे टमाटर अब साल के उन दिनों में भी उनका साथ देंगे जब वे बाजार में नहीं मिलते. परसों शाम उन्होंने ‘अलादीन’ फिल्म देखी. बहुत अच्छी लगी. कल शाम उसकी बंगाली सखी ने खाने पर बुलाया था, उसे अच्छा लगा, उसकी बातें अच्छी लगती हैं, और वह जानती है कि वह भी उसका साथ पसंद करती है. उसने शाम को क्लब में होने वाले “संगीत कार्यक्रम” में जाने के लिए कहा है, उसने सोचा यदि जून और नन्हा मान जाएँ तो वह जा सकती है.

अज भी ठंड ज्यादा है, उसने सारे काम निपटा लिए और हीटर के सामने आ गयी, जून का कहना है कि उसके घर आने से पूर्व खाना बिलकुल तैयार होना चाहिए. छह खतों के जवाब लिखे. जून एक स्वास्थ्य पत्रिका भी लाये हैं, जो वह तभी लाते हैं जब घर में कोई अस्वस्थ होता है.
आज मन में एक विचार आया है क क्यों न धूप में कुछ देर टहल आया जाये, इस समय सडकें भी खाली होती हैं. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, उनके पिता आए हुए थे, उसने सोचा तेजपुर से लौटकर वे भी उन्हें अपने घर बुलायेंगे, इतना लिखकर वह गोल्फ फील्ड तक टहलकर आयी है, कुछ दूर फील्ड के अंदर भी गयी, सूखी घास पर, सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लग रहा था. कल रात वर्षा के साथ तूफान भी आया, उनके बगीचे में कई नाजुक पौधे जमीन पर गिर गये हैं, उसने सहारा देकर उन्हें खड़ा तो कर दिया पर बाद में माली ही उन्हें ठीक से सम्भालेगा. आज धूप में कई दिनों बाद तेजी है, वह चटाई पर बैठी है पिछले बरामदे में.

  कल शाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनकी ‘असमिया क्लास’ हुई. उसके कुछ देर बाद उसकी असमिया सखी आ गयी, उसके साथ वह बहुत अपनापन महसूस करती है. नन्हा कल शाम फिर कह रहा था, बोर्डिंग स्कूल नहीं जायेगा, पर बाद में उनके समझाने पर मान गया, यदि उसका दाखिला हो जाता है तो उसके भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. वह कहाँ रहकर पढ़ेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा.

अभी अभी उसकी हमराशि पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, लिखने का क्रम टूट गया तो अब कुछ मुश्किल हो रही है विचारों को पकड़ पाने में, मन कितना तेज भागता है. इस एक पल में जब वह एक वाक्य लिखती है, मन में एक पूरा विचार अंकित होकर जा चुका होता है. ऐसी कोई मशीन कभी न कभी बनेगी जो मन के एक एक भाव को पकड़ सके. ऋषि-मुनियों ने इसी भागते हुए मन को लगाम लगाने का प्रयास तपस्या के बल पर किया था. उसका सारा प्रयास उस वक्त व्यर्थ चला जाता है जब वह मन ही मन गीता पाठ करती है. उस दिन उसकी सखी ने ठीक ही कहा था, बोल कर पाठ करने से मन जल्दी एकाग्र होता है.  




Friday, May 17, 2013

तेजपुर का स्कूल



फरवरी का प्रथम उजला-उजला सा दिन ! दोपहर को जून जब गये तो अख़बार उठाई पढ़ने के लिए, उसके नचे ही एक पत्रिका दिख गयी, उसने ऐसा बांधा कि...ये सितारे भी किसी जादूगर से कम नहीं होते, अपने आकर्षण में खच ही लेते हैं, खास तौर से उस जैसे कमजोर इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति को...अब दोपहर के दो बजे हैं, नन्हा कह गया था एक बजे तक लौट आएगा पर अभी तक नहीं आया है, सम्भवतः अब जून उसे अपने साथ लायेंगे लौटते वक्त. सुबह उसने वाशिंग मशीन लगाई, मच्छरदानी धोयी जैसा कि उसे मालूम था, जून ने कहा, क्या जरूरत थी, साफ तो थी. कल नन्हे का एडमिशन कार्ड भी आ गया, इसी माह की तेरह को तेजपुर जाना होगा. स्कूल की इमारत आदि सब देखकर आएंगे, शायद देखने के बाद नन्हे का मन परिवर्तित हो. टीवी पर ‘शांति’ शुरू हो गया है, अब वह स्वेटर बुनेगी, तीनों भांजियों के लिए स्वेटर बना रही है, चमकदार पीले रंग की ऊन से.

  आज टीवी पर केरल के इमरान खान की, सोलह राज्यों की ४४९ दिनों की दौड़ कर की गयी यात्रा का, विश्व रिकार्ड बनने की खबर सुनकर मन प्रेरित हुआ और अपनी दिनचर्या को सुचारू रूप से चलाने का भाव उदित हुआ. जीवन क्षण भंगुर है और जिसे पलों में जीना आ जाता है वह अनंत में जीता है. जो हो चुका उस पर उनका वश नहीं और जो होगा वह वे जानते नहीं. तो वर्तमान जो उनका अपना है क्यों न ख़ुशी ख़ुशी जिएँ... उद्देश्य पूर्ण, क्रियाशील और सारे आरोपों, प्रत्यारोपों से परे. कल शाम उसने काले चने बनाये थे, जून के एक मित्र भी आये थे, दोनों को पसंद आये. आज नन्हे की पसंद पर मटर-पनीर बनाया है. उसके स्कूल में सोशल साइंस की विशाल प्रदर्शनी लगी है, जून ने भी कल देखी, और वापस आते समय उन्हें काफी देर हो गयी थी.

आज सरस्वती पूजा है, वसंत पंचमी अर्थात फूलों का मौसम. अगले शनि-रवि को क्लब में फ्लावर शो और गार्डन कम्पीटीशन है. कल तीन खत मिले, छोटी बहन, मंझले भाई व माँ-पिता के. छोटे भाई का पत्र पहले ही आ चका है, दीदी का पिछले महीने आया था, एकाएक सारे भाई-बहन उसके करीब आना चाहते हैं. छोटे भाई ने लिखा था जब भी वह खुश या उदास होता है, उन्हें अपने करीब पाता है. छोटी बहन ने लिखा है कि वह जानती है वे उसकी बात सुनेंगे अनसुनी नहीं कर देंगे. उसका खत पढ़कर थोड़ी सी हँसी भी आई और उदासी भी, वह अभी तक ससुराल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पायी है. उसको जवाब लिखा तो है, पता नहीं उसे पकर साहस मिलेगा अथवा वह यह सोचेगी कि उपदेशों की उसे जरूरत नहीं है. जून ने भी कल रात उसे व उसके पति को पत्र लिखा. कल शाम एक मित्र के यहाँ एक नया बोर्ड गेम खेला. घर में आज काम चल रहा है, सुबह आठ बजे से ही खट-खट  की आवाजें आ रही हैं, जो खल तो रही हैं पर काम एक न एक दिन तो होना ही था, कुछ दीवारों में क्रैक आ गये हैं. नन्हा आज घर में है, उसने सोचा आज वह उनके साथ ही ग्यारह बजे लंच करेगा, रोज स्कूल में साढ़े बारह बजे तक उसे इंतजार करना पड़ता होगा टिफिन टाइम का. आज वह पीले चावल बनाएगी तथा प्याज, टमाटर, धनिये का रायता और मिक्स्ड वेजिटेबल.


बथुए का रायता


  



पिछले हफ्ते बुध को दोपहर में पुरानी पड़ोसिन के यहाँ गयी, बृहस्पतिवार को मौसम बेहद ठंडा था, सुबह साढ़े दस बजे तक कोहरा छाया था, शुक्र को तबियत कुछ नासाज थी, शनी-इतवार वैसे ही व्यस्तता बढ़ जाती है, और अब आज सोमवार हो गया है, सुबह से अभी तक सभी कुछ सामान्य है, आज खतों के जवाब का दिन भी है, दीदी का पत्र भी पिछले हफ्ते आया है. देवांग पर जो कविता वह लिखने वाली है, एक पंक्ति  और मिली है, उसी ईश्वर ने  दी है, जिसे एकमात्र उपहार जो वह दे सकती है, वह है ‘प्रेम’, ईश्वर ने हर बार उसे मार्ग से विचलित होने से बचाया है. कल दोपहर एक पल के लिए जून झुंझला गये थे, पर बाद में अपने ढेर सारे स्नेह से भिगो ही तो दिया. वह सचमुच उसे और नन्हे को बेहद-बेहद प्रेम करते हैं. उन तीनों का ही वजूद एक-दसरे से है, एक के बिना दूसरा कुछ भी नहीं.

 आज फिर तीन दिनों के बाद डायरी खोली है. कल वे इन सर्दियों की आखिरी पिकनिक पर गये, आनन्द उतना तो नहीं आया पर अच्छा ही था. आज उसके मुंह का जायका जीभ में हो गये छाले की वजह से कुछ अजीब सा हो गया है, शायद गार्गल करने से कुछ ठीक होगा.  सुबह नन्हे से वह किसी बात पर नाराज हो गयी, उसे सॉरी बोलना चाहिए था, पर सारा काम चुपचाप खुद करता रहा, बिना एक भी शब्द बोले, जाते समय भी यही कहा, माँ, हो गया. उसे थोड़ा कठोर होना पड़ा पर उसे यह सिखाना जरूरी था कि सॉरी बोलने में कोई हर्ज नहीं. आज मौसम अच्छा है, उसके सारे सुबह के काम भी हो चुके हैं, फिर भी एक नामालूम सी बेचैनी है, शायद छाले की वजह से या स्कूल जाते समय नन्हे की आँखों में छलक आये दो आंसुओं की वजह से. वैसे भी ग्यारह बजने में सिर्फ बीस मिनट हैं, उसे अभी दाल में तड़का लगाना है, बथुए को मसलकर दही में डालना है, सलाद काटना है और फुल्के सेंकने हैं. सो लिखना यहीं बंद. आज जून को मिले नये साल के सारे ओफ़िशिअल कार्ड्स को भेजने वालों की लिस्ट बना दी है, देखें अब वे इसका इस्तेमाल भी करते हैं या नहीं ?

जनवरी का महीना देखते-देखते ही बीत गया, यानि नया साल एक महीना पुराना हो गया. आज स्वस्थ अनुभव कर रही है, सामान्य ढंग से बात भी कर पा रही है, शायद यह बाहर खाना खाने की वजह से हुआ हो, खैर अब सब ठीक है तो इन पलों को कायदे से जीना चाहिए. सुबह कुछ पलों के लिए कुछ अच्छा सा फिर नहीं लग रहा था फिर एक गिलास पानी पिया और ईश्वर को याद किया, जिसे आजकल ज्यादा ही याद करने लगी है, कबीर दास ने सही कहा है, दुःख में सुमिरन सब करे...नन्हे का स्वेटर बन गया है, बांह की सिलाई शेष है, अभी करे तो वह स्कूल से आकर पहन सकता है. कल दोपहर टीवी पर एक फिल्म देखी, “संध्या छाया” बहुत मार्मिक थी, बुढ़ापे में आदमी इतना अकेला हो जाता है ?



Thursday, May 16, 2013

चॉकलेट, फूल और कार्ड्स



दोपहर के पौने एक बजे हैं, वह पीछे वाले बरामदे में चटाई पर धूप में बैठी है, हल्की खुमारी वातावरण में है. भोजन के बाद उन्होंने धूप में ही विश्राम किया रोज की तरह और झपकी लग गयी, दही, खिचड़ी व मीठी गाजर की सब्जी का भी योगदान रहा होगा इस नींद में. जून ने कहा है, उनका मोजा आज पूरा कर दे, शाम को वह पहनना चाहते हैं, वह संडे मैगजीन पढ़कर ही बुनना शुरु करेगी. धूप एकाएक चली गयी है, शायद बादल का कोई बड़ा टुकड़ा सूरज के सामने आ गया है. नन्हा आज सुबह ठंड से बहुत डर रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया. उसने सोचा, अपने आप होस्टल में सभी काम कैसे कर पायेगा. कल शाम उन्होंने स्क्रेम्ब्लर खेला, वह जीत गया बहुत खुश था जीतकर.

आज सुबह कुछ वक्त “फिरदौस” देखने में गुजरा, और कुछ जमीन-आसमान. आयशा की हालत देखकर ही अशरफ को समझ आयेगी. उधर स्मृति को एक बार फिर जुगल धोखा देकर जा रहा है, बेचारा जुगल अपनी अब तक की करनी का फल भुगत रहा है. आज जून उसके लिए एक चॉकलेट लाये और बहुत स्नेह से शुभकामनायें भी दीं, उसे उम्मीद थी कि एक कार्ड भी लायेंगे, उसने शिकायत भी कर दी मजाक में ही सही कंजूस कहकर, पर उनके जाने के बाद सोचती रही, फूल, कार्ड आदि उतने महत्वपूर्ण नहीं जितना मन का प्यार. महीनों पहले से इस दिन के बारे में सोचती आ रही थी की विवाह की दसवीं सालगिरह कुछ विशेष होगी, पर रोज की तरह ही आज का दिन भी बीत जायेगा और जिन्दगी यूँ ही चलती चली जाएगी. यदि कल नन्हे का टेस्ट न होता तो आज शाम वे एक छोटी सी पार्टी का आयोजन करते. माँ-पिता और मंझले भाई की शुभकामनायें मिली हैं. अभी थोड़ी देर बाद वे शादी का अलबम देखेंगे  फिर टहलने जायेंगे जनवरी की ठंडी शामों को स्कार्फ, स्वेटर से लदे-फदे टहलने जाने का अपना ही आनन्द है.

जून की फरमाइश है, मैदे के नमकपारे बना कर रखे, अभी शुरू करने से दो बजे तक बन जायेंगे.
उसी दिन जिस दिन नमकपारे बनाये थे शाम को गिरकर नन्हे ने अपना सामने वाला दांत तोड़ लिया पूरा नहीं सिर्फ एक कोना, पर वे तीनो ही उस शाम बेहद उदास हो गये थे. जिसका असर अगले दिन भी रहा, पर शाम को लोहड़ी मनाते मनाते वे उसका दर्द भूल गये. शनी और इतवार अरुणाचल की अलौकिक सुन्दरता को निहारते गुजरे. कल यानि बीहू का अंतिम अवकाश, आराम करते हुए. आज नन्हा स्कूल गया है और जून दफ्तर. कल शाम खांसी से नन्हे को वमन हो गया, नागमणि अच्छी है रजाई का खोल खंगाल कर गयी है. अब बाकी का काम जून करेंगे, आज उसका रेस्ट डे है इस तरह के कामों के लिए. वर्षों पहले स्कूल में थी तब डायरी में यह बात लिखी थी तो उसकी सखी कितना हंसी थी, जाने कहाँ होगी अब वह ?