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Wednesday, December 2, 2015

प्रेमचन्द का साहित्य



टीवी पर भक्ति की लहर बहाते हुए भजन गायक गा रहे हैं. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर से जैसे किसी ने कहा कि ध्यान में अद्वैत का पालन होता है, जब आत्मा और परमात्मा के मध्य कोई अंतर नहीं रहता, दोनों एक हो जाते हैं. जब साधक चिंतन-मनन करते हैं अथवा मौन रहते हैं तब द्वैत रहता है. जीवात्मा के रूप में वे मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार के साथ होते हैं, तब वे परमात्मा के अंश हैं. मन लहर है तो आत्मा सागर है, मन बादल है तो आत्मा आकाश है. जब वे व्यवहार जगत में होते हैं, अर्थात वाणी या तन से कुछ काम कर रहे होते हैं तब उस परमात्मा के दास हैं. वह साकार भी है और निराकार भी. उसकी मूर्ति भी उसका साकार रूप है और उसकी बनायी ये चलती-फिरती मानव मूर्तियाँ भी, उनका कर्त्तव्य है इन्हें सुख देना, किसी भी प्रकार से कोई कष्ट न पहुँचाना ! सेवक को अपना सुख-दुःख नहीं देखना है, उसका अहंकार भी मृत हो गया है, क्योंकि वह तो परमात्मा का अंश है, वह शून्य है, ऐसा उन्हें हर पल स्मरण रहे तो सदा वे परमात्मा के साथ हैं !

नन्हे की फ्लाईट छूट गयी, अब वह गोहाटी होकर आएगा ! जून उसे लेने जायेंगे एयरपोर्ट. इस बार जब वह आएगा तो उसे इस बात को समझना ही होगा कि किस प्रकार जीवन जीने की कला सीखी जाती है और हर प्रकार की मुश्किलों से कोई बच सकता है. इस समय सवा दस हुए हैं, टीवी पर भक्ति गीत आ रहा है. प्रार्थना करने से क्या मन वश में हो जाता है, क्या परमात्मा उनके लिए कुछ  कर सकता है जब तक वे स्वयं अपना उद्धार नहीं करते. उनके संकल्प दृढ नहीं होते तभी एक ही गलती बार-बार दोहराते हैं. भजन करने से उतनी देर तो मन स्थिर रहता है, कुछ देर उसका असर भी रहता है. फिर जब-जब उसका स्मरण होता है, मन पावन हो जाता है, लेकिन इस समय उसका मन कुछ बेचैन सा है, जैसे कुछ छूट गया हो. उसे लगता है कि जो भी कार्य करने हैं, उन्हें ठीक से कर नहीं पा रही है, जैसे लिखने के लिए कितना कुछ है पर कुछ भी क्रम से नहीं हो पा रहा है, फिर सोचती है क्या यह आवश्यक है कि वह स्वयं को एक बंधन में बांधे, अपनी प्रतिभा का सही उपयोग नहीं कर पाने पर ( क्या वह वास्तव में प्रतिभा है भी ?) स्वयं को दोषी ठहराए, क्यों न वह सहज होकर जिए, पर सहज होकर जीने के लिए भी अनुशासन की बहुत आवश्यकता है !  

‘कलम का सिपाही’ आज पूरी पढ़ ली, पिछले कुछ दिनों से पढ़ रही थी. प्रेमचन्द का बचपन, उनकी संघर्ष भरी जीवन कथा, उनका अनोखा ज्ञान, साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा, किस्सा गढ़ने का उनका अनोखा अंदाज, भाषा पर पकड़, भीतरी विश्वास, फक्कड़पन, गरीबों के प्रति गहरा प्रेम, भोलापन, सादगी और आत्मीयता ! उनके इतने सारे गुणों का परिचय कराती यह पुस्तक बहुत अच्छी लगी. प्रेमचन्द पर एक छोटा सा लेख लिखेगी इस किताब के आधार पर. वह ईश्वर को नहीं मानते थे पर प्रेम उनके भीतर पगा था. वह भाग्यवादी नहीं थे, कर्मकांड में उनका जरा भी विश्वास नहीं था, उन्होंने संस्कृत नहीं पढ़ी पर गीता की स्थित प्रज्ञता उनके भीतर भरी थी, अनोखा था वह इन्सान ! उनकी किताबें उनको अमर कर चुकी हैं, भारत ही नहीं विश्व के साहित्य में अपना स्थान बना चुकी हैं. साहित्य के माध्यम से जन जाग्रति लाने का उनका इरादा कितना दृढ़ था, गरीबी का बोझ सर पर था ही और स्वास्थ्य भी उतना ठीक नहीं था, पर भीतर जो ज्ञान था वह कलम की नोक से कागजों पर अंकित होता जा रहा था. वे भूत की गरिमा के गायन में कभी नहीं लगे, वे वर्तमान को ही देखते थे, उसे ही जीते थे और उसी को सुधारने का प्रयत्न करते थे, अपने वक्त की नब्ज पर उनकी गहरी पकड़ थी !


नन्हे ने उसका पत्र पढ़कर कहा, पढ़ने के लिए ठीक है पर मानने के लिए नहीं, अर्थात ज्ञान केवल सुनने की वस्तु है अपनाने की नहीं ! वे सभी तो यही करते हैं, भीतर तो ज्ञान है पर व्यवहार में नहीं उतर पता, जो व्यवहार में न उतरे वह ज्ञान तो बोझ ही है ! तन यदि स्वस्थ न हो तो मन पर उसका प्रभाव पड़ेगा पर मन यदि पूर्ण स्वस्थ हो तो तन को भी स्वस्थ कर सकता है, मन आत्मा का ही अंश है और आत्मा परमात्मा का ! मन अंततः परमात्मा को ही चाहता है, जगत का कितना भी सुख उसे मिले वह प्यासा ही रहेगा. अनंत को चाहने वाला सीमित से प्रसन्न रहे भी तो कैसे ? अभी उसका मन उस अलौकिक सुख की कामना करता है तभी ध्यान में डूबना चाहता है पर जब इस सुख की चाह भी नहीं रहेगी तब भीतर एक नया सूरज उगेगा, वह सच्चा आत्मबोध होगा, अभी तो एक झलक भर मिली है !   

Tuesday, December 1, 2015

कलम का सिपाही


कल शाम को जो द्वंद्व शुरू हुआ उसकी परिणति हुई सुबह, जब वातावरण में फैले तनाव ने सभी को प्रभावित किया, तनाव के परमाणु वातावरण में किस तरह छा जाते हैं. उसका मन इतना संवेदनशील हो गया है कि रंचमात्र तनाव भी इसे पहाड़ सा चुभता है. यह समता में आने के लिए छटपटा उठता है. साधक का हृदय बहुत कोमल होता है, एक तरफ तो वह चट्टान की तरह कठोर होता है, दूसरी ओर फूल की तरह कोमल. कल रात उसने पीड़ा को निमन्त्रण दिया और आज सुबह उसने कंठ में हार पहना दिया. सद्गुरू कहते हैं इच्छाएं अवश्य पूरी होती हैं, यदि वे सच्चे हृदय से निकली हों. ईश्वर उसके सामने नई-नई परिस्थितियाँ भेज कर अपने को शुद्धतम बनाने का अवसर दे रहे हैं. उसके कल शाम के रवैये ने बताया कि अभी अहंकार शेष है. बात यदि सही भी हो तो उसको कहने का तरीका गलत होने होने से वह गलत हो जाती है. कृतज्ञता भुलाकर यदि कोई अपना पक्ष रखना कहेगा तो बात बिगड़ेगी, परिणाम अच्छा नहीं होगा. यदि उनकी किसी अच्छी बात से भी दूसरे को दुःख हुआ तो वह अच्छी बात व्यर्थ है. उन्हें कहने का ढंग ही नहीं आया. उनकी मंशा ठीक है इसकी खबर तो बस उन्हें ही है, सामने वाला तो वही जानता है जो उसे दीखता है, प्रभु उसे सिखा रहे हैं. अहंकार और क्रोध उसके भीतर हैं, उन्हें बाहर लाकर वह उसे सचेत कर रहे हैं.

नन्हे को बुखार है, जून जब फोन पर उसे हिदायत देते हैं तो लगता है उनके भीतर जैसे एक माँ का दिल है. कल उसकी परीक्षा भी है और अभी-अभी उससे बात की. उसका ‘आई-कार्ड’ जो खो गया था, उसे लेने डीन के ऑफिस में गया था. जून अब पहले की तरह देर तक नाराज नहीं रहते, परिपक्वता की यही निशानी है. कल सुबह नैनी को उसने अपनी पुरानी आदत (पैटर्न) के अनुसार कुछ ज्यादा ही कड़े शब्द बोले, उसके प्रति नूना के मन में जरा भी द्वेष नहीं है पर वह उसे जवाब दे, यह उसका अहंकार सहन नहीं कर सका. अहंकार कितना प्रबल है इसका पता तो चल हो गया, उधर उसका अहंकार भी कुछ कम नहीं है. कल से वह काम पर नहीं आई है. जो काम करने को उसे कहा था, बगीचे का वह काम भी वैसे ही पड़ा है. वह शायद अब वह काम करना नहीं चाहती. खैर, वक्त ही बताएगा कि इस समस्या का क्या हल निकलता है. फ़िलहाल एक लडकी बाहर से आकर काम कर जाती है.

वह प्रेमचन्द पर लिखी किताब ‘कलम का सिपाही’ पढ़ रही है जो उनके छोटे बेटे अमृत राय ने लिखी है, किताब इतनी रोचक है और बताती है प्रेमचन्द कितने साफ दिल तथा हंसमुख थे, लिखना उनके लिए बेहद जरूरी एक काम था, पूजा से भी बढकर जरूरी ! उनके लिए लेखन कितना सहज था जैसे श्वास लेना, वह रोज नियम से लिखते थे, इस बात से बेखबर कि कौन उन्हें पढ़ता है या साहित्य के नियम क्या हैं, लिखना उनके खून में था. उसने लिखने को कभी इतना महत्व दिया ही नहीं, ज्यादातर समय तो घर-गृहस्थी के कार्यों में गया, जब से अध्यात्म के रास्ते पर चलना शुरू किया तब से तो पढ़ने तथा प्राणायाम करने में ज्यादा समय लगता है. टीवी पर संतों व महात्माओं को सुनने में भी बहुत समय लगाया है, जिसका परिणाम है अपने भीतर का अनुभव ! वह अनुभव अनोखा है, वह तो इस ब्रह्मांड की सबसे कीमती शै है ! किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद, जिसे एक बार अपने भीतर उस आनन्द की झलक मिल जाये वह खुद को ही भूल जाता है संसार की तो बात ही और है. कवि कहता है, अपना पता न पाऊँ तुझे देखने के बाद, और ऐसा मन स्वालम्बी होता है, उसे जो चाहिए उसके लिए वह अपने दिल का द्वार खटखटाता है, वह जो चाहता है भीतर ही मिल जाता है.


आज उसने सुना, उन्हें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है, सब एक है. स्थूल में भेद है, वहीँ सारे विकार हैं, सूक्ष्म निर्दोष है, निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले इन्द्रियों को तपाना होगा, मन को जमाना होगा और तब उसमें आत्मा का नवनीत प्रकट होगा. कल रात उसके मन की अवस्था विचित्र थी, ईर्ष्या का अनुभव इतनी तीव्रता से हो रहा था. अहंकार के कारण ही ईर्ष्या आदि विकारों को प्रश्रय मिलता है. सद्गुरु ने कहा है, जिस क्षण यह ज्ञात हो जाये कि वह भूल कर रहा है, भूल से बाहर आ जाता है. वह भूल से बाहर तो आ पा रही थी पर भीतर कोई मंथन चल रहा था. बार-बार वही भावना प्रकट हो रही थी. ऐसे लगता है उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है. रूखा-सूखा ज्ञान कब तक हृदय को हरा-भरा रखेगा उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. ज्ञान के सहारे कोई भले आत्मा को जान ले पर आत्मा का आनन्द भक्ति के सहारे ही मिल सकता है, उसके कृष्ण की भक्ति और सद्गुरू की भक्ति ! आज का ध्यान कृष्ण का ही ध्यान होगा उसके ही मन्त्र का जाप होगा, आज सत्संग का दिन भी है. गोयनका जी कह रहे हैं की जिसकी जप प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ जाती है, यदि अहंकार नहीं गया तो प्रज्ञा नहीं मिली. संतुष्टि यदि नहीं है तो अभी तृष्णा नहीं मिटी. जो मिले उसमें संतुष्टि हो, दूसरों को देखकर ईर्ष्या न जगे, ईर्ष्या व्याकुलता को ही जन्म देती है. संतोष धन के सामने कोई धन नहीं !  

Friday, October 31, 2014

प्रेमचन्द की कहानियाँ


आज उसका जन्मदिन है, सुबह से कई फोन आ चुके हैं. सखियों के, भाई बहनों के, पिता का फोन और मामीजी का जवाब भी आ गया है. सुबह से कई बार माँ को याद कर चुकी है, उनका फोटो देखती है तो हाथ अपने आप ही जुड़ जाते हैं. शाम को छोटी सी पार्टी है. आज सुबह एक कहानी टाइप की, नन्हे को हिंदी में भावार्थ लिखाया, अब वह सो रहा है वरना यह समय भी उसी के साथ बीतता. कुछ देर पहले सोचा क्यों न समय का सदुपयोग करते हुए बैठक की थोड़ी सफाई ही कर दी जाये पर हाथ के झाड़न से वह थर्मस कप टूट गया जो मंझले भाई ने विवा हके अवसर पर उसे तोहफे में दिया था. खैर..पर उसका कुछ असर और कुछ इसका कि बगीचे में पत्ते बिखरे हैं, नैनी ने अभी तक सफाई नहीं की है, मन उत्साहित नहीं है. जन्मदिन पर क्या उदास होने का भी हक नहीं है ! यूँही मन भी बदलते मौसमों की तरह होता है जैसे कोई बाहर के मौसम का साक्षी रहता है उसमें अपनी इच्छा से फेर बदल नहीं कर सकते वैसे ही भीतर के मौसमों को साक्षी भाव से देखते रहना होगा. शाम को कोई दूसरा मौसम आ जायेगा. जून और नन्हा दोनों ने उसे बहुत सुंदर कार्ड्स दिए हैं. उसने सोचा एक कविता यदि लिखे तो मन फिर अपने आप में लौट आए !

न ही परसों और न ही कल वह ‘जागरण’ सुन सकी, आज सुना है. मौसम की तरह मन शांत है. रात भर होने के बाद इस समय वर्षा रुकी हुई है. मन में ईश्वर के लिए यानि अच्छाई के लिए, सत्य के लिए चाह बनी रहे, स्मृति बनी रहे तो संसार का आश्रय नहीं लेना पड़ेगा. निर्भयता का भाव उदय होगा. ईश्वर कार्य का प्रेरक भी है, निर्वाहक भी है, और फलदाता भी है. उसकी स्मृति बनाये रखें तो जीवन की नाव अबाध गति से चलती रहेगी. मन. बुद्धि और अहंकार के शोर में ईश्वरीय प्रेरणा सुनाई नहीं पडती. वह इतने निकट है कि उससे निकट कोई और नहीं. वह हर क्षण सद्कार्यों के लिए प्रेरित करता है लेकिन मन अनसुनी करता है. और संसार के शोर को सुनने के लिए अपने को व्यस्त रखता है.

आज दीदी का जन्मदिन है, सुबह उन्हें फोन पर शुभकामनायें दीं. पिता से भी बात हुई, मकान का सौदा हो गया है. इसी महीने रजिस्ट्री भी हो जाएगी, सम्भवतः जून को जाना पड़े. इस समय नन्हा और वह दोनों घर पर नहीं हैं. वह अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता के मूड में नहीं है. बाबाजी की बात पूर्णरूप से सही है जब कोई ईश्वर का स्मरण करता है तो अंदर का स्रोत अपने आप खुल जाता है. इधर जन्मदिन के बाद से वह सुबह ठीक से ध्यान आदि नहीं कर पा रही है, हो सकता है इसका कोई शारीरिक कारण भी हो, वही हरमोन का चक्कर, खैर इस महीने की साहित्य अमृत भी आ चुकी है, प्रेमचन्द की कहानियों की किताब भी लायी है, सो हिंदी का वातावरण तो है घर में और नन्हे को हिंदी भी पढ़ा रही है पर लिखें के लिए समय व एकांत चाहिए जो फ़िलहाल नहीं मिल पाते, थोड़ी ही देर में वे दोनों आते होंगे. लंच का समय होने वाला है.




Wednesday, March 19, 2014

सफलता के सात सुनहरे सूत्र


ठंडी हवा शीतलता दे रही है और हरीतिमा आँखों को सुकून. आज श्री अरविंद पर एक कार्यक्रम देखा, विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री अरविंद महान चिंतक थे, भारत के प्रति प्रेम से परिपूर्ण, इस देश की यात्रा को आगे ले जाने वाले एक मनीषी ! कल शाम लाइब्रेरी से दो पुस्तकें लायी, तसलीमा नसरीन की ‘लज्जा’ और दीपक चोपड़ा की ‘Seven golden laws for success’. कल शाम ही पहला अध्याय पढ़ा, ध्यान, मौन और दूसरों का आकलन न करने का प्रण, तीन बातों पर जोर दिया है. घटनाओं, मनुष्यों, परिस्थितियों को आंकते चले जाने की आदत ही दुखी रखती है. कल दोपहर अखबर में ‘हरिवंश राय बच्चन’ का एक इंटरव्यू पढ़ा, काट कर फ़ाइल में रखने योग्य है. कल जून नन्हे के स्कूल गये थे, सभी टीचर्स से मिले, सभी ने उसकी तारीफ की तथा उपयोगी सुझाव दिए. हिंदी लेखन के कोर्स में एक प्रश्न प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ पर है, जून ने कहा है कि वह हिंदी पुस्तकालय से उनकी पुस्तक ला देंगे. जून हमेशा सहायता करने को तैयार रहते हैं. आज वह उसे ‘सैकिया प्रिंटर्स’ भी ले जायेंगे, लेडीज क्लब के बुलेटिन लाने के लिए. आज महादेवी वर्मा की एक कविता पढ़ी, ‘जो तुम आ जाते एक बार’, अज्ञात प्रेमी के लिए उनकी तड़प स्पष्ट शब्दों में व्यक्त है. वह रहस्यमय व्यक्ति या शक्ति, अथवा ईश्वर कोई भी रहा हो, रचने की प्रेरणा उसी ने दी. किसी की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा के लिए..जैसे कला कला के लिए.

शमशेर की कविता ‘उषा’ पढ़ाई, कविता अच्छी है, पर सीधी सपाट नहीं, नील जल में झिलमिल गौर देह... का क्या तात्पर्य है, सूरज या सफेद बादल.. सम्भवतः बादल ही. आज सुबह अलार्म सुनते ही उठ बैठे वे. रात को नूना दीपक चोपड़ा की किताब पढकर सोयी थी, सपनों को व्यवस्थित करती रही, वह कहते हैं, हर दिन मिलने वाले हर व्यक्ति को कुछ न कुछ देना चाहिए, चाहे वह एक फूल हो, एक शुभकामना हो अथवा कम्प्लिमेंट ही क्यों न हो ! कुछ देर पूर्व पड़ोसिन से बात हुई, उसकी तबियत फिर खराब है, अस्वस्थ होने को लोग इतना सामान्य क्यों मानते हैं, स्वस्थ रहना, चुस्त रहना तो हर एक का कर्त्तव्य है और जीवन का सबसे बड़ा सुख भी. इस वक्त, इस क्षण में वह स्वयं को बहुत स्पष्ट देख पा रही है, मानसिक स्तर पर कोई उहापोह नहीं है, जीवन से कोई शिकायत नहीं, कोई उलाहना नहीं देना. जो हो रहा है वही होना चाहिए था, इस सृष्टि में हर घटना के पीछे एक कारण है, भविष्य में जो होगा वह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वर्तमान में कोई क्या कर रहा है. यदि वर्तमान संतुष्टि प्रदान करता है, उसे अपने लाभ के लिए साधा जा सकता है. अपने लाभ में अपने परिवेश का, अपने परिचितों का, समाज का सबका लाभ है.

जो क्रम उसने सुबह निर्धारित किया था, अभी तक तो उसके अनुसार चल रही है, आधा घंटा ध्यान, आधा घंटा व्यायाम, आधा घंटा लेखन..इसी बीच दो फोन भी कर लिए. एक सखी से बात की तो लगा...नहीं उसे किसी का मुल्यांकन नहीं करना है, वह जैसी है, वैसी है, और जैसा सोचती है उसे वैसा सोचने का हक है. अंततः आज उनका कम्प्यूटर इंस्टाल हो गया, जून और नन्हा दोनों उसमें व्यस्त हैं, उसे भी बुलाया तो हाथ जोड़कर उसने माउस पर हाथ रखा, हल्के से छूने पर भी स्क्रीन पर चित्र बदल जाते हैं, उसमें वे गीत सुन सकते हैं, चित्र बना सकते हैं, लिख सकते हैं, फिल्म देख सकते हैं, जितने CD उनके पास हैं अभी सारे नहीं देखे हैं. एक नई दुनिया के द्वार उनके लिए खुल गये हैं.

जून को कुछ देर पहले फोन किया, लगा, जैसे कोई उनके पास बैठा था, सो, ‘ठीक है’, ‘हाँ’ के अलावा कोई उत्तर नहीं दे रहे थे. आज एक सखी के विवाह की सालगिरह है, उसके लिए एक कविता लिखने का प्रयास किया. कल सुबह नहाते समय उसकी आंख में रीठे-आंवले का पानी चला गया था, अभी तक हल्का दर्द है. अभी ग्यारह भी नहीं बजे हैं पर धूप इतनी तेज है कि लगता है दोपहर बाद का वक्त हो. आज से खिड़कियाँ खोलकर रखने के दिनों की शुरुआत हो गयी है और  हल्के रंगों के ढीले-ढाले सूती वस्त्र पहनने के दिन भी, जो सर्दियों की शुरुआत में सहेज कर रख दिए गये थे. उसे अचानक महसूस हुआ आज कहीं कुछ छूटा हुआ सा लग रहा है, जैसे कोई बहुत जरूरी बात कहीं रह गयी हो. वर्तमान में रहने के सुनहरे नियम के अनुसार उसे फ़िलहाल तो किचन में जाना चाहिए. खिड़की से गन्धराज के फूलों की और कमरे में रखे गुलाब की बासी मीठी महक हवा में भर गयी है.  



Monday, March 5, 2012

सूना सूना घर



आज जबसे जून गया है वह उसे याद कर रही है. जानती है वह भी उसे याद कर रहा होगा चाहे वह कितना ही व्यस्त क्यों न हो. सुबह उसकी जीप अभी मोड़ तक ही गयी थी कि उसकी आँखें...और  दिल जैसे बैठने लगा. अंदर आयी तो याद आयी उसकी बात खुश रहना..सो सम्भल गयी. कुछ खाकर क्रोशिया उठा लिया. दस बजे तो खाना बनाया सब कुछ वैसे ही क्या जैसे उसके होने पर करती. किताब पढ़ी फिर भोजन किया. सोचा वह भी पहुँच गया होगा. दोपहर को कढ़ाई की फिर सोने का प्रयास किया पर नींद नहीं आयी. फिर प्रेमचन्द का उपन्यास कायाकल्प पढ़ती रही. तभी उसका  फोन आया हँस कर बात की पर वापस आयी तो वह और भी याद आया. पांच बजे तक तो किसी तरह रही फिर अकेला घर किसी तरह अच्छा नहीं लगा किसी तरह नहीं सो पड़ोस में उसी उड़िया परिचिता के घर चली गयी उसे खुद नहीं पता था कि उससे दूर रहना इतना कठिन होगा. 

Tuesday, February 21, 2012

बंद खिड़कियों वाले मकान


आज सुबह बस का हॉर्न सुनाई दिया तो जून बाहर निकला, मोटरसाइकिल ठीक करानी थी सो उसे ही ले गया. नूना के लिये दस्ताने लाया है कपड़े धोने में उसके हाथ खराब न हो जाएँ इसलिए. उसका मन यहाँ नहीं लग रहा है कितना बंद-बंद लगता है खिड़की से बाहर देखने पर मकान ही मकान दिखाई देते हैं, बंद खिड़कियों वाले मकान. नूना ने ऐसा कहा तो जून भी उदास हो गया पल भर को, फिर वे शेष कामों में लग गए. शाम को सब कैलेंडर भी लगाये, अभी पर्दों के रिंग लगाने बाकी हैं. जोशीमठ से छोटे भाई का पत्र आया है. पड़ोस के किसी घर से ‘रजिया सुल्तान’ फिल्म के गाने बजने की आवाज आ रही है.
वह जानती है कि उसे यहाँ रहना अच्छा लगने लगेगा. सुबह के नौ बजे हैं वर्षा हो रही है जो टिन की छत पर गिरकर एक अद्भुत संगीत उत्पन्न कर रही है. कल रात जून ने प्रेमचन्द की पुस्तक 'अहंकार' पढ़नी शुरू की पर तीन-चार पेज पढ़ते ही सो गया. स्वप्न में वह लगभग रोज ही माँ, छोटी बहन व दीदी को देखती है. भाई की शादी की तिथि तय नहीं हुई है, वे उसमें जायेंगे.

Monday, January 30, 2012

प्रेमचन्द की किताबें


प्रेमचन्द की बीस पुस्तकें लाइब्रेरी में आई हैं. हिंदी की पुस्तकों का यहाँ की लाइब्रेरी में आना एक सुखद घटना है उनके लिए, और आज ही वे प्रेमाश्रम व मानसरोवर(१) लाए हैं. उसने सोचा वह कल से पढ़ना शुरू करेगी. कल से माली काम करने लगा है, आखिर वह शुभ दिन आ ही गया पर पता नहीं कब उन्हें दूसरे मकान में जाना पड़े, डीएक्स टाइप मकान में, इस घर का नम्बर है सी ७६, यह उन्हें सदा याद रहेगा. कल प्रभा, दायीं ओर की पडोसन आयी थी, दो कहानियों पर चर्चा की, उसने कहा कि उनमें से एक कहानी पर वे लोग कभी फिल्म बनाएंगे. जून चाहता है कि वह मोटी हो जाये, ढेर से फल लाकर रखे आज, पर उसे लगता है वह कभी मोटी नहीं होगी, हाँ एक बार उस तरह ‘मोटी’ होकर देखना है, दोपहर को स्वप्न में कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ था.