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Wednesday, August 21, 2019

दिव्य समाज का निर्माण



साढ़े आठ बजने को हैं रात्रि के. आज का दिन कुछ भिन्न था. सुबह एक स्वप्न देखकर उठी. एक विशाल मैदान में जहाँ ताज़ी खुदी हुई मिटटी है, हवा और आँधी के साथ उड़कर हजारों छोटे-छोटे बीज बिखर रहे हैं. पता नहीं कहाँ से आ रहे हैं वे बीज. तभी विचार आया, सृष्टि के आरम्भ में सम्भवतः ऐसे ही इतने वृक्ष व वनस्पतियां उगी होंगी. विचार आते ही स्वप्न कहीं खो गया. अद्भुत है यह सृष्टिकर्ता...प्रातः भ्रमण के समय चारों ओर उगे विविध वृक्षों और घास में उगे जंगली पौधों को देखकर एक अपनापन जगा महसूस हो रहा था. दूब घास पर कदम धरते ही भीतर एक अनोखी सिहरन को महसूस किया, यह अनुभव पहले भी कई बार उसे हुआ है, दूब घास अपनी ओर खींचती सी लगती है. उसमें कोई चुम्बकीय तत्व अवश्य है. प्रातःराश के बाद मृणाल ज्योति के कार्यक्रम में बोलने के लिए एक छोटा सा वक्तव्य लिखा. जाने से पहले भोजन बनाया. कार्यक्रम ग्यारह बजे आरम्भ हुआ. 'डाउन सिंड्रोम डे' के साथ 'आपदा प्रबन्धन' की ट्रेनिंग भी दी गयी. विभिन्न गाठें बांधनी सिखाई गयीं, पट्टी बांधना भी और स्ट्रेचर बनाना भी. आग बुझाने का प्रदर्शन भी किया गया. शाम की योग कक्षा में उपस्थिति कम थी. एक ने बताया कमर में दर्द है, दूसरी ने कहा, जुकाम है. मालिन कल नहीं आई थी, आज आई, बताया माली से झगड़ा हुआ था, कितना सह रही है वह दूसरी पत्नी बनकर.

आज 'विश्व जल दिवस' है. कुछ दिन पहले जब नारे लिखे थे, पढ़ा था इसके विषय में. असम में तो जल की कमी नहीं है, पर बंगलूरू में हो सकती है, जहाँ वे अगले वर्ष अक्तूबर में सदा के लिए रहने  जाने वाले हैं. जून को कल सुबह खाली पेट रक्तजाँच करानी है, सो रात्रि भोजन हो चुका है ताकि बारह घंटों का उपवास निश्चित हो सके. अगले महीने वे बंगलूरू जा रहे हैं, उनकी दूसरी आँख का भी कैट्रैक ऑपरेशन होना है. बारह दिन वे वहाँ रहेंगे. एक योग साधिका को वह कक्ष की चाबी देकर जाएगी, जिससे उसकी अनुपस्थिति में भी वे लोग नियमित साधना करती रहें. कुछ देर पूर्व नन्हे से बात हुई, वह आज सुबह ही देहली गया था, अब वापसी की यात्रा में है. ग्यारह बजे रात घर पहुंचेगा. पिछले एक हफ्ते से देर रात तक दफ्तर में काम करता रहा है, इस बार भी सप्ताहांत में भी व्यस्त रहेगा. आज सुबह नर्सरी स्कूल में मीटिंग थी, जिसमें अध्यापिकाओं को स्कूल के नियमों की पुस्तिका दिखाई गयी. प्रेसिडेंट के उसूल बहुत अच्छे हैं, बस थोड़ा ज्यादा बोलती हैं. शाम को फोन पर पता चला बुआ जी घर लौट आई हैं, पर दो-चार शब्द ही बोले गये उनसे. कल दोपहर बाद मृणाल ज्योति में मीटिंग है और शाम को एक मित्र परिवार को भोजन पर बुलाया है, अगले हफ्ते वे लोग सदा के लिए यहाँ से जा रहे हैं. कुछ वर्ष पूर्व भी एक बार उनका तबादला हुआ था, उस समय उनके संबंध पूर्ण सहज नहीं थे. हालात अलग थे तब, अब उस सखी में काफ़ी परिवर्तन आया है और उसे भी सुमति मिली है. उन्होंने अपने संस्कारों को पहचाना है और उनमें परिवर्तन आया है. परमात्मा की कृपा ही इसके पीछे काम कर रही है.

आज सुबह वे उठे तो वर्षा के आसार थे, रात को हो चुकी थी. टहल कर जैसे ही घर के निकट आ गये, बूँदें पड़नी शुरू हुईं. जून को आज भी रक्त जाँच के लिए जाना था, सो नाश्ते की जल्दी नहीं थी. आराम से साधना की. शाम के भोजन की तैयारी में न ध्यान हुआ न लेखन का कोई कार्य. दोपहर को तीन बजे तक सब तैयारी करके मीटिंग के लिए गयी. बारिश  में लडकों के छात्रावास का जो कमरा नष्ट हो गया था, उसे बनवाने का निर्णय हुआ, एक अन्य कमरे का फर्श भी ठीक करवाना है. उसे उन महिला को पत्र लिखना है, जिन्होंने स्कूल के लिए सहायता राशि देने की बात कही है. वापसी में एक टीचर ने स्कूल में उगे 'सब्जी वाले केले' दिए. योग कक्षा में एक बार फिर प्राणायाम का महत्व उसने बताया और सही तरीका भी. एक सप्ताह बाद 'दिव्य समाज का निर्माण' नामक आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक कोर्स होने वाला है. कितना सही समय है, जून उसी दिन गोहाटी जा रहे हैं, उनकी कार भी खाली रहेगी और समय भी अपने हाथ में रहेगा. परमात्मा ने ही यह सुयोग रचा है. वह अकारण दयालु है. वह आज ही ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए जून से कहेगी. पिछली बार यह कोर्स करने गोहाटी गयी थी पर प्रतिभागियों की संख्या कम होने के कारण कोर्स हुआ ही नहीं. कोर्स से एक दिन पहले महिला क्लब की मीटिंग है, तीन महिलाओं का विदाई समारोह, उनके लिए कविताएँ लिखी हैं उसने. मित्र परिवार के साथ रात्रि भोज ठीक रहा, उनका सामान पैक हो रहा है.