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Wednesday, June 3, 2015

पैर की मोच



इन्सान जो चाहता है, वह एक न एक दिन उसे मिलकर ही रहता है. चाहे परिस्थितियां वैसी न हों, जिसमें उसने वह कामना की थी. सेवा का अवसर मिले ऐसा उसने चाहा था पर इस तरह नहीं. खैर इसी का नाम जीवन है, यहाँ उतार-चढ़ाव उसी तरह आते हैं जैसे सागर में ज्वर-भाटा, यह प्रकृति का नियम है. समय सदा एक सा नहीं रहता. आज सुबह वे पौने पांच बजे उठे. कल रात को सोने में थोड़ी देर हो गयी थी. क्रिया आदि की, व्यायाम नहीं कर पायी, जो सांध्य-भ्रमण से हो जायेगा यदि जून समय पर आ गये. वह बिलकुल नहीं घबराए हैं सासु माँ के पैर की मोच देखकर. जो उनकी अनुपस्थिति में अपनी एक परिचिता के साथ उनकी किसी परिचिता के घर जाने पर उन्हें लग गयी है. ईश्वर उन सभी को ऐसी दृढ़ता दे. उनके मनों को इतनी शुद्धता भी कि किसी के प्रति कोई नकारात्मक विचार भी न पनपे. सभी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार करते, कहते हैं.

कल से उसे गुरूजी बहुत याद आ रहे हैं, उनकी कृपा दृष्टि उस पर अवश्य हुई है ! आज क्रिया के बाद भी अद्भुत अनुभव हुआ, पहले वंशी की आवाज सुनाई दी फिर कहीं से विचार आया कि ससुराल में पिताजी बच्चों को डिब्बा खोल कर दिखा रहे हैं और रंग-बिरंगे हिलते-डुलते से कुछ आकार डिब्बे में दिखे, उस क्षण कुछ और सोचा होता तो वह भी दिखा होता. बाद में गुरूजी की भी एक झलक दिखी. ईश्वर की कृपा ही धूल के एक कण को हिमालय की विशालता प्रदान करती है. सीमित को असीमित कर देती है. उनका ज्ञान अद्भुत है और सबसे अद्भुत है उनका प्रेम...उसका मन एक ऐसी शांति से भर गया है, असीम स्नेह से, अनंत प्रेम से और अनोखे आनंद से कि इस क्षण यदि मृत्यु उसके सम्मुख आये तो बाहें फैलाकर उसका भी स्वागत करे. उसके 
हाथ इतने बड़े हो गये हैं कि सारा ब्रह्मांड उनमें समा सकता है !


शाम हो चुकी है, वे अभी टहल कर आये हैं. दिन भर कोई गंभीर अध्ययन नहीं किया, बल्कि आजकल पढ़ने का समय कम ही निकाल पाती है. पर मन में चिंतन चलता है. पढ़े हुए को मथकर उसे पचाने के लिए अलग से कोई समय नहीं निकलना पड़ता, कार्य करते हुए ही मनन चलता रहता है. कोई नकारात्मक विचार मन में टिकता नहीं, फौरन कृष्ण का नाम अंतर में प्रतिध्वनित होने लगता है. कभी कोई मन्त्र या भजन की पंक्ति चलती रहती है, फ्लैश बैक म्यूजिक की तरह. कृष्ण बिलकुल सच्चा वादा करते हैं कि उनके भक्तों के कुशल क्षेम का भार वह अपने सिर पर ले लेते हैं. इसलिए जीवन जितना सहज और हल्का आज लगता है वैसा पहले नहीं था, कुछ वर्षों पहले. अब ऐसा लगता है जैसे हर वक्त ही वह ध्यान में है. एक अनोखी ख़ुशी पोर-पोर से फूटती रहती है, फूल से जैसे सुवास फूटती है. कहीं कोई चाह शेष ही नहीं रह गयी है, जीवन जब उस जीवन दाता ने दिया है तो उसे ही यह अधिकार है कि उसे चलाये. वह जो उसके दिल में रहता है, जो उसे उससे ज्यादा जानता है., जो उसके विचारों को सतह पर आने से पूर्व ही पढ़ सकता है, जो जीवन का स्रोत है. 

Monday, September 15, 2014

दुःख का अस्तित्त्व


कल शाम दीदी व छोटी बहन का फोन आया, वे दोनों टहलने निकलीं थीं तो पीसीओ से फोन कर लिया, जबकि घर पर दो फोन हैं. कल तेहरवीं है, जिस पर उसे जाना चाहिए था पर परिस्थिति वश नहीं जा पा रही है. उसका अपने परिवार के प्रति कर्त्तव्य आड़े आ गया. घटनाएँ कब क्या मोड़ लेंगी कोई कुछ नहीं कह सकता. अब माँ को याद करके उसे दुःख नहीं होता बल्कि शांति का अनुभव होता है. वह अब मुक्त हैं तथा हर समय उसके पास हैं. उनके बचपन से लेकर अपने बचपन तक फिर अपने बचपन से उनकी वृद्धावस्था तक के सारे चित्र सजीव हो उठते हैं. जून आज भी हमेशा की तरह पहले उठे वह एक स्वप्न देख रही थी जिसमें वह अपना मान तथा धन दोनों बचाने में सफल हो जाती है. एक लुटेरा उसके पीछे था पर वह स्वयं अपमानित होता है.

उसने सुना, अहंकार का त्याग और समर्पण की भावना का विकास ही शांति प्रदान करता है. अहंकार और स्वाभिमान में अंतर है, स्वाभिमान की आहुति देने के बाद तो पास में कुछ भी नहीं रह जाता. एक सखी ने पूछा वे घर जा रहे हैं या नहीं, यह उनके लिए एक अबूझ प्रश्न बन गया है जिसका उत्तर समय ही बतायेगा. सुबह-सुबह एक अन्य का फोन आया. कल सुबह दो परिचित महिलाएं मिलने आई थीं. दुःख इन्सान को इन्सान से जोड़ता है. इस समय सुबह के नौ बजे हैं, आज धूप तेज है, पिछले दिनों दोपहर तक कोहरा रहता था फिर मद्धिम सी धूप के दर्शन होते थे. अभी उसे भोजन तैयार करना है फिर रियाज और दोपहर से कविताएँ टाइप करने का काम. कल का दिन तो गंवा दिया पर अब और नहीं, कहीं उसके इस आलस्य के कारण उसका सपना अधूरा न रह जाये और जिन्दगी की शाम आ जाये. मृत्यु हर मोड़ पर बाट जोहती खड़ी रहती है. जीवन इतना अल्प, इतना कीमती है कि हर पल का सदुपयोग होना ही चाहिए.

आज सुबह एक स्वप्न देखा जिसमें वह अकेले विदेश यात्रा पर जा रही है. माँ को भी देखा. जून ने उठकर विश किया और दफ्तर जाने से पूर्व उसने उन्हें फिर उस फोन की याद दिलाकर नाराज कर दिया. ससुराल से फोन आया था, पिता को भी यही उम्मीद थी कि जून अवश्य तेहरवीं में शामिल होने गये होंगे. कल छोटी बहन का फोन आया उसने किन्हीं मामीजी से उसकी बात करवाई, वह पहचान नहीं पायी. सभी रिश्तेदार वहाँ आये हुए हैं. छोटी बुआ व ममेरी बहन भी आए हैं, उसे एक बार फिर न जा पाने का दुःख हुआ, शायद जीवन भर यह अपराध बोध उसे सालता रहेगा. बाबाजी कहते हैं, सुख-दुःख मिथ्या हैं सिर्फ मानने से होता है न मानें तो इसका कोई अस्तित्व  ही नहीं है. यदि वह जाती तो यहाँ जून और नन्हा परेशान रहते किसी को सुखी करके किसी को दुखी होना ही पड़ता, फिर जो नितांत उसके अपने हैं उन्हें दुखी करने का उसे क्या हक है ? कल स्वप्न में बहुत दिनों बाद कॉलेज भी देखा, गणित के अध्यापक को भी. जैसे सुबह नींद खुलने पर स्वप्न टूट जाता है वैसे ही ये स्मृतियाँ भी कुछ वर्षों बाद भुला दी जाएँगी. जीवन फिर भी चलता रहेगा. नन्हा आज फिर देर से उठने के कारण हाथ-मुंह धोकर ही स्कूल गया है, उनके समझाने का उस पर कोई असर नहीं होता, कभी-कभी जिन्दगी इतनी मुश्किल हो जाती है कि.. कल शाम फिर दो मित्र परिवार मिलने आये थे, वे भी उनके घर जाने के बारे में पूछ रहे थे. भविष्य के गर्भ में ही छिपा है इसका उत्तर, कौन जाने तब तक असम में भी भूचाल आ जाये, उन्हें इसका जवाब अपने आप ही मिल जायेगा.
कल रात पहले छोटी बहन का फोन आया, फिर मंझले व बड़े भाइयों का, उन्हें कल उसका वह पत्र मिला जिसमें “हमारी माँ - एक सम्पूर्ण व्यक्त्तित्व” में माँ के बचपन से लेकर जैसा उन्हें देखा, समझा लिखा था. इतने दिनों से संबंधों में जो बर्फ जम गयी थी पिघली. सुबह उठते ही पिता को फोन किया, वह चाय बना रहे थे. माँ के बिना रहने की आदत उन्हें धीरे-धीरे पड़ती जा रही है. आज फिर बदली छाई है, नन्हे की आज संगीत की लिखित परीक्षा है. सोमवार से मुख्य विषयों की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं.   


  

Friday, March 7, 2014

भारतेंदु हरिश्चन्द्र का कवित्त


आज नन्हे की काम करने की गति देखते ही बनती है, सुबह साढ़े सात बजे उठकर भी नहा-धोकर नाश्ता करके पढ़ाई करने बैठ गया ताकि नौ बजे खेलने जा सके. जाते समय फरमाइश करके गया है कि दोपहर को भोजन में दाल माखनी, मिक्स्ड वेज तथा मलाई कोफ्ता तीनों ही होने चाहियें. सो नूना का ध्यान आज किचन की ओर ही लगा हुआ है. कल उसने पापा से एक केक के लिए भी ढेर सारा सामान मंगवाया है, पर स्वयं बनाने या सहायता करने के लिए घर में रुकना गवारा नहीं, खैर, उसकी पहली पसंद टेनिस है, इससे यह तो पता चलता है है. कल शाम जून बहुत अच्छे मूड में थे, पर आने वाले कल की शाम नहीं होंगे, क्यों कि कल शाम चार बजे उसे फिर मीटिंग में जाना है. उसके बिना उनकी शामें बेहद अकेली हो जाती हैं.

नन्हे का Black Forest cake बन कर तैयार हो गया है, उसने जून से कहा भी इसकी एक तस्वीर खींच लें, बहुत सुंदर दिख रहा है पर उन्हें उसके स्वाद से मतलब है न कि रूप से.. नन्हा और वह दोनों ही उसे काटने के लिए बेताब हो रहे हैं.

मार्च की एक सुहानी सुबह ! अलसुबह तेज आंधी आई, कुछ क्षणों के लिए अँधेरा छा गया, हवा की गति प्रचंड थी, फिर वर्षा हुई और देखते ही देखते हवा भी थम गयी, बादल न जाने कहाँ उड़ गये, सूर्य का राज्य पुनः छा गया और धूप चमकने लगी. ईश्वर के मंच पर दृश्य परिवर्तन इतनी शीघ्र होता है कि मन रोमांचित हो उठता है. आज सुबह उसकी छात्रा आयी थी, आधुनिक हिंदी साहित्य के जन्मदाता प्रसिद्ध कवि भारतेंदु हरिश्चन्द्र की एक कविता कवित्त छंद में पढ़ी, पढ़ायी. अभी नौ भी नही बजे हैं, नन्हे का मित्र उसे लेने आ गया है, वह अभी पढ़ रहा है, अच्छा तो यही होगा कि मित्र उसकी पढ़ाई में मदद करे. कल कमेटी मीटिंग में सेक्रेटरी देर से आई, उसे ही पिछली मीटिंग के मिनट्स पढ़ने पढ़े, बाद में उन्हें अपने पति के कोलकाता से लौटकर आने के बाद भी पूरे समय रुकना पड़ा, उनका मन घर पर रहा होगा लेकिन ड्यूटी तो ड्यूटी है. वह देर से आई तो भी जून सामान्य मूड में थे, बल्कि उन्होंने डिनर भी बना दिया था. कल रात उसने एक विचित्र स्वप्न देखा, मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि स्वप्न छिपी हुई इच्छाओं और कामनाओं का प्रतीक होते हैं तो बिना उसे ज्ञात हुए कब उसकी यह कामना हुई, समझ से बाहर है, नींद को मोहक इसीलिए कहा गया है न कि व्यक्ति एक दूसरी ही दुनिया में विचरण करने लगते हैं जहाँ कोई नियन्त्रण नहीं रहता.


इन्सान का मन मिटटी के कोमल लोंदे की तरह होता है, जैसी छाप डाल दें वैसा ही बन जाता है, दुनिया की कोमलतम वस्तु से भी कोमल, छुईमुई की तरह लजीला और यही मन वक्त पड़ने पर कठोर भी बन जाता है, जो हल्की सी उपेक्षा भी सहन नहीं कर पाता वही समय के थपेड़ों को सह पाने में सक्षम हो ही जाता है, भावुक मन हो तो सोने पर सुहागा, जहाँ अपने प्रतिकूल कुछ भी होता या घटता दिखाई दिया, झट कुम्हला गया, जैसे किसी ने ऊर्जा शक्ति ही छीन ली हो, मुरझाए हुए फूल की तरह फिर पड़ा है जमीन पर. आज पत्रों के जवाब का दिन है और अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया, तिनसुकिया जाने का दिन भी है. कल शाम वे असमिया सखी की बेटी के नामकरण संस्कार में गये, उसने एक स्वेटर बुना था उसके लिए, लेकर गयी पर वह अभी भी उठने की हालत में नहीं थी, पतिदेव की समझ में नहीं आ रहा था मेहमानों का स्वागत कैसे करें. वहाँ से वे लाइब्रेरी गये, और कुछ नई किताबें लाये, Gods of small things भी मिल गयी. अरुंधती राय की किताब ! जिसमें उसका एक बहुत सुंदर सा फोटोग्राफ है. 

Friday, February 7, 2014

संस्कृत की परीक्षा


आज बीच-बीच में धूप निकल रही है, वर्षा भी कल रात्रि से नहीं हुई. नन्हे की आज संस्कृत की परीक्षा है, वह स्कूल जाते वक्त थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था, पर उसका इम्तहान अच्छा होगा, क्योंकि मेहनत तो की है. उसे पढ़ाते समय नूना को कठोर वचन नहीं बोलने चाहिए पर कभी-कभी अनजाने में कह जाती है, उसे भी लापरवाही से काम करना छोड़ना होगा, खैर.. जीवन भर इन्सान कुछ न कुछ सीखता रहता है. जून ज्यादा काम के कारण आज सुबह की तरह लंच के बाद भी जल्दी चले गये. उसने कुछ देर ध्यान किया पर ईश्वर से संवाद का अभ्यास न होने के कारण मन भटक कर संस्कृत पर आ गया. कल स्वेटर भी पूरा हो गया, आज से नन्हे का स्वेटर बनाना शुरू करेगी, एक महीने में यह भी बन जाना चाहिए. उसकी पीली साड़ी भी तैयार होकर आ गयी है, अभी पहनकर नहीं देखी, उस पर यह रंग अच्छा भी लगेगा या नहीं ? पिछले दिनों स्वयं पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, व्यायाम नहीं किया, सम्भवतः इसी कारण या डाइटिंग की वजह से चेहरा कमजोर लग रहा है, पर डाइटिंग से एक लाभ अवश्य हुआ है, भारीपन की फीलिंग कम हो गयी है. गुलदाउदी के फूल खिलने शुरू हो गये हैं, गेंदा, गुलाब पहले से ही खिल रहे हैं, माँ-पापा के आने तक कैलैंडुला तथा फ्लॉक्स भी खिलने लगेंगे, उनका आना अभी तो एक स्वप्न ही लगता है जो कभी हकीकत बन जाये !

आज सुबह उसने पढ़ा, इन्सान को मूडी नहीं होना चाहिए, जो अनजाने में वह होती जा रही थी. ध्यान किया पर दस मिनट से ज्यादा नहीं कर सकी, चारों ओर से विचार आने लगे. कुछ देर पहले सेन्ट्रल स्कूल से एक अध्यापिका ने फोन किया, वह चाहती हैं नूना गणित पढ़ाने वहाँ जाये और तब से वही विचार मन में छाया है.

साल के अंतिम महीने का प्रथम दिवस ! आज धूप निकली है, इस वक्त वह संगीत कक्षा से आ रही है. वर्षों पहले बचपन में जब वह कक्षा छह में थी, संगीत कक्षा में दाखिला नहीं ले पायी थी, क्योंकि जिस दिन टेस्ट था वह अनुपस्थित थी. और फिर साल भर कला की कक्षा में बैठना पड़ा था. अजीब था वह स्कूल भी. पर आज ‘राग यमन’ सीख कर आ रही है, संगीत का कोई एक सुर तो ऐसा होगा जो उसके गले से निकल सकता है, ‘करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान’ ! हल्का दर्द है सिर में, जून होते तो फौरन एक कप चाय बनाकर ले आते. उन्हें उसका स्कूल में काम करना इसीलिए पसंद नहीं, वह उसे थका हुआ, नन्हे और स्वयं को उपेक्षित नहीं देखना चाहते. वह ऐसे ही खुश हैं जैसे वे लोग अभी हैं. उन अध्यापिका को उसने फोन नहीं किया तो उन्होंने स्कूल से फोन करके पूछा, उन्हें बुरा तो लगा होगा पर वह न के सिवा और कुछ कह ही नहीं सकती थी. नन्हे के स्कूल जाने के बाद उसने कुछ देर वह किताब पढ़ी जिसमें बहुत सरल भाषा में जीवन जीने का सही तरीका सिखाया गया है.

आज जून ने आधे दिन का अवकाश लिया है. कल उन अध्यापिका को मना करने के बाद से कई बार स्वयं से बात कर चुकी है मन ही मन. कुछ देर जून से भी बात की पर परिणाम वही रहा. अपने लिए जीने वाले सामान्य लोग ही तो हैं न वे, अपने आसपास की जरूरतें भी महसूस नहीं कर पाते, अपने परिवार व अपनी सुख-सुविधाओं से आगे कुछ सोच नहीं पाते, सीमित दायरा और सीमित सोच है, शायद इसीलिए अपनी सामर्थ्य सीमित जान पडती है, भरोसा नहीं होता अपनी शक्तियों पर, अपनी सही कीमत तक नहीं आंक पते. आज धूप आंखमिचौनी खेल रही है. पत्रिका के लिए पहली कविता व लेख मिला आज. बगीचे से एक पका हुआ पपीता भी मिला आज, उसे याद आया पिछली सर्दियों में बगीचे में घास पर फूलों के बीच बैठकर लिखती थी, उनकी महक का असर भी विचारों पर पड़ता ही होगा. कल वह ठीक से गा सकी पर बिना हारमोनियम के गाना बहुत मुश्किल है.




Wednesday, November 20, 2013

द लॉन मोअर मैन


आज सात तारीख है, उसने सोचा,  जून के आने पर उसे ‘विश’ करना है. सात तारीख आने पर कुछ याद दिला देती है. चाहे किसी भी माह की हो. आज यूँ भी बड़े दिनों बाद धूप निकली है, पर ठंडी हवा भी बह रही है. कल शाम तापमान १० डिग्री था, ढेर सारे वस्त्र पहन कर वे टहलने गये, उसका काम आज जल्दी हो गया है, सोचा वह किताब पढ़ेगी जो कल लाइब्रेरी के चिल्ड्रेन सेक्शन से लायी है, “Little Woman”, नन्हे को सुनाने के लिए अच्छी रहेगी. कल फिर उसने सोने में सवा दस बजा दिए, वह दीर्घ सूत्री है, किसी काम को जल्दी से समाप्त नहीं करता, आराम-आराम से करता है, शायद अपने चाचा पर गया है, जिसे वह ठीक से पहचानता भी नहीं. कल मंझले भाई का पत्र बहुत दिनों बाद आया, लिखता है ‘’ग्रह दशा कुछ ठीक नहीं चल रही है, इन्सान को अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल यहीं भोगना पड़ता है’’.

चलो उठ खड़े हों, झाड़ें सिलवटों को
मन के कैनवास को फैला लें क्षितिज तक
प्यार के रंगों से फिर कोई खूबसूरत सोच रंग डालें
बांटे आपस में हर शै जो अपनी हो
चलो आँखें बंद करें, गहरे उतर जाएँ
जानें पर्त दर पर्त अंतर्मन को
आत्मशक्तियाँ जागृत होकर एक हो जाएँ
अपना छोटे से छोटा सुख भी साझा हो जाये
चलो कह दें, सुना दें मन की हर उलझन
समझ लें, गिन लें दिल की हर धडकन
अपना सब कुछ सौंप कर निश्चिंत हो जाएँ
विश्वास का अमृत पियें
चलो करीब आयें, जश्न मनाएं
मैं और तुम से ‘हम’ होने की याद में
कोई गीत गुनगुनाएं
खुली आँखों से सपने देखें
मौसम की मस्ती में डूबे उतरायें !

परसों सुबह नन्हा घर पर था, दुसरे शनिवार को उसका स्कूल बंद रहता है. शाम को उसने चाट बनाई महीनों अथवा वर्षों बाद. वर्षा हो रही थी, सो टहलने भी नहीं जा सके, घर पर ही कैसेट लगाकर थिरकन कम व्यायाम किया. अच्छा लगता है गाने की या सिर्फ संगीत की लय पर शरीर को ढीला छोड़ देना. कल सुबह कड़कती ठंड में इतवार के सारे कार्य किये, शाम को क्लब में फ्लावर शो था, वे देखने गये. फिर एक मित्र के यहाँ, उसकी सखी ने बहुत स्वादिष्ट समोसे खिलाये, घर पर  ही बनाये थे, उनके बेटे का रोना भी बदस्तूर हुआ, वह अपने हाथ से सिले सूट के बारे में बताने का लोभ संवरण नहीं कर पाई, कभी-कभी ऐसी बचकानी हरकतें कर ही बैठती है. पर कल एक और अच्छी बात हुई भारत का जिम्बाब्वे को हरा कर फाइनल में पहुंच जाना. हफ्तों बाद कल ‘मालाबार हिल’ भी देखा. सबा ने शिवम को कैसे अपने दिल की बात कही होगी और अब उसके भाई का क्रोध, सुमन लेकिन अच्छी लग रही थी. आज सुबह धूप निकली है, वह यहीं गुलाब के पौधों के पास बैठी है, पड़ोसिन से बात हुई, वह तिनसुकिया से सिल्क की दो साड़ियाँ लायी है, खुश है, लेकिन साड़ियों से मिलने वाली ख़ुशी कितनी क्षणिक होती है न. सुबह गोयनका जी ने बताया, हमारे मन की ऊपरी पर्त भले ही स्वच्छ, साफ दिखाई दे भीतर राग-द्वेष , लोभ, क्रोध का विशाल साम्राज्य है, परत दर परत उसे उघाड़ते जाना है और साफ करते जाना है.

‘The Lawnmower man’ यही नाम था, कल शाम क्लब में दिखाई गयी फिल्म का, जो रोमांचक थी, अद्भुत थी और कुछ कुछ डरावनी भी. एक सीधा-सादा आदमी अपने दिमाग की छुपी ताकत को पाकर कैसे शक्तिशाली बन जाता है. कम्प्यूटर की शक्ति का कमाल, विभिन्न रंगों से अनोखे आकार बनते हैं पर्दे पर, एक के बाद एक सुंदर चित्र बनते हैं. इंसानी कल्पना की उड़ान की कोई सीमा नहीं, हर बार ऐसा कुछ देखने पर बेहोशी की अवस्था में हुआ उसका अनुभव याद आ जाता है. नीले रंग, अजीब सी आवाजें और कोई लक्ष्य पूरा करने की चाह...मानव मस्तिष्क में क्या-क्या रहस्य हैं, अभी भी मानव जान नहीं पाए हैं. नन्हे को कल स्कूल में कबड्डी खेलते वक्त चोट लग गयी, कहता है अब कभी जूते उतार कर कबड्डी नहीं खेलेगा. अभी-अभी उसने खिड़की से झांक कर देखा, बादलों को परे कर सूरज निकल आया है जिसमें फ्लाक्स और गुलाब के फूलों पर गिरी बूंदें चमक रही हैं.