Showing posts with label उलझन. Show all posts
Showing posts with label उलझन. Show all posts

Thursday, January 23, 2014

हिंदी सप्ताह


यह कर देंगे, वह कर लेंगे, संकल्प नित नये बुनता है मन
सम्मुख है जो पल अपने जीना उसको सीख न पाए

अजीबोगरीब उलझनों में स्वयं को उलझा लेता है मन का पागल हिरण फिर उस जाल में से निकलने का प्रयास करता छटपटाता रहता है, मन की कैसी अजीब दुनिया है यह, इसी से निस्तार पाने के लिए ध्यान, योग साधना की खोज हुई होगी, मन में विचारों के बवंडर उठते ही रहते हैं, चारों ओर धूल ही धूल, कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता, धूल जब स्थिर होकर बैठ जाती है तब भी नहीं, इस उहापोह से निकलने के लिए j Krishnamurti इंटेलिजेंस को जगाने की बात करते हैं. इन्सान का मन असंतुष्ट सा क्यों रहता है, खोया-खोया सा, बिखरा-बिखरा सा, लुटा-पिटा सा. क्यों नहीं सदा एक सा रहता, शांत...स्वयं में डूबा हुआ, पर क्या वह भी पलायन नहीं होगा. किताबों से दूर जाना भी तो वह इसीलिए चाहती थी कि उनमें लिखी बातें भी दिमाग को एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती हैं. वह भी तो एक मानसिक नशा हुआ या नहीं, वास्तविकता से दूर भागना ही तो नशा सिखाता है. जून कहीं ज्यादा स्थिर मना दिखाई देते हैं. वह सबल भी मालूम पड़ते हैं और वह कई बार न चाहते हुए भी उनकी हर बात मान लेती है.

आज नन्हा घर पर है, परसों शाम से ही उसे जुकाम ने परेशान किया है, सम्भवतः पिछले दिनों शाम को डेढ़-दो घंटे तैरने का परिणाम है. मौसम आज सोमवार को भी ठंडा है, उस दिन यानि शुक्रवार को उनके बगीचे के लिए आधा ट्रक गोबर आया था पर तब से लगातार वर्षा से बुरी तरह भीग गया है, अब धूप निकलने पर ही उसका उपयोग किया जा सकता है. कल सुबह जून उसे ‘हिंदी सप्ताह’ में कविता पाठ प्रतियोगिता में ले गये और दोपहर बाद अपना काम (रिपोर्ट आदि लिखना) करके उसे जीके पढ़ाते रहे. शाम को वे टहलने गये, चारों ओर शांति थी और नन्हा भी चुपचाप था, एक अनोखी निस्तब्धता का अहसास हो रहा था. कल आखिर उसकी क्रोशिये की जैकेट भी पूरी हो गयी. कल ‘विश्वकर्मा पूजा’ है, उन्हें जून के दफ्तर जाना है लंच के लिए, हर साल इस दिन वे डिपार्टमेंट जाते हैं, कुछ देर उनके रूम में बैठते हैं और फिर सामूहिक भोज होता है, पूजा सुबह ही हो जाती है.

उसने पढ़ा-
Meditation is total release of energy. When there is complete understanding of oneself, then there is the ending of conflict and that is meditation. It means awareness, both of the world and of the whole movement of oneself, to see exactly what is, without any choice, without any distortion. We can know ourselves in relationship, the observation of myself takes place only when there is response and reaction in relationship. To have a relationship with another without friction causes no wastage of energy. That is possible only when we understand what love is, and that is the denial of what love is not ie jealousy, ambition, greed, self centered activity.

All our life is based on thought which is measurable. It measures God, it measures its relationship with another through the image. It tries to improve itself according to what it should be. Meditation is the seeing of what is and going beyond it. When the body, mind and heart are completely one then one lives a different kind of life.

आज सुबह बहुत दिनों के बाद पीटीवी पर धारावाहिक देखा, ‘यह आजाद लोग’, दोनों देशों के हालात एक से हैं, समस्याएं एक सी हैं और लोगों के सोचने का ढंग एक सा है. एक अजीब सी कशमकश में ले जाकर ड्रामा वापस सतह पर ले आता है, जैसे कोई डूबते डूबते तैर कर वापस आ जाये. नन्हा आज स्कूल गया है, जून ने कुछ देर पहले पूछा, कुछ मंगवाना तो नहीं है बाजार से, उन्हें घर का ध्यान सदा रहता है. कल शाम जून दीपावली पर घर जाने के लिये बहुत उत्सुक हो रहे थे, बड़ी ननद के घर आने के कारण माँ-पिता इस बार नहीं आ पाएंगे. यात्रा की बातें करते-करते ही उनके मन पुलकित हो उठे, यात्रा सचमुच मन को जीवंत कर देती है.






Friday, July 19, 2013

पर्ल एस बक - एक महान लेखिका


आजकल हर पल एक ख्याल साये की तरह उसके वजूद के आस-पास टहला करता है कि कहीं कुछ है, अधूरा सा.. जो पूरा होना चाहिए. हर काम करते वक्त यह अहसास तारी रहता है कि इस वक्त उसे कुछ और बेहतर काम करते हुए होना चाहिए था. और बस इसी कशमकश में वह किसी भी काम को पूरे मन से नहीं कर पाती, यह नामालूम सी बेचैनी उसकी फितरत में यूँ तो हमेशा से है पर आजकल यह ज्यादा ही असरदार हो गयी है. शायद इसकी वजह यह है कि हफ्तों से उसका पढ़ना-लिखना छूटता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा फायदा है कि  जिन्दगी बेकायदा नहीं रहती, कोई रहता है जो अनुशासित रहना सिखाता है, टोकता है, और यह वही आत्मा ही तो नहीं जिसके बारे में कई जगह पढ़ती रहती है, सुबह जागरण में जिसे सुनती है और एक योगी की आत्मकथा पढ़कर महसूस करने का प्रयत्न करती है. जाने क्यों उसकी दायीं आँख में हल्का दर्द है, यूँ दर्द का किस्सा सुनाने बैठे तो अफसाना लम्बा होता चला जायेगा, अभी तो वह पड़ोस के बच्चे के जन्मदिन की पार्टी से आ रही है, जून भी आते होंगे, नन्हा अभी वही है. बच्चे बहुत खुश हैं, बच्चों को हंसते-खिलखिलाते देखकर रश्क होता है, एक वे हैं की बेबात ही खुश हुए जाते हैं और एक उसके जैसे बड़े हैं कि  उदास होने का बहाना हर पल ढूँढा करते हैं.

आज कई दिनों बाद सुबह के साढ़े दस बजे उसके सुबह के सारे काम हो चुके हैं. मौसम में जादू है, गुनगुनी सी धूप बेहद भली लग रही है. नवम्बर का अंतिम सप्ताह आने को है पर ठंड अभी उतनी ज्यादा शुरू नहीं हुई है. कल शाम नन्हे को पढ़ाने से पूर्व वह अकेले टहलने गयी, अच्छा लगता है शामों की ठंडक और अँधेरे को अपने तेज कदमों से चीरते हुए भेदना. और थक जाने के अहसास होने तक चलते ही चले जाना. फिर वापस आकर लेडीज क्लब की पत्रिका ‘जागृति’ में असमिया के लेख व कहानी पढने का प्रयत्न किया. पढ़ सकेगी एकाध बार और इसी तरह मन लगाकर पढ़ने का प्रयत्न किया तो. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, उसकी तैयारी आज से ही करनी है,.. नदी की तेज धारा, बड़े-बड़े पत्थरों का किनारा, खुला आकाश और उड़ान भरता मन, सचमुच अच्छा लगेगा, ऐसे पलों को शिद्दत से महसूस करना चाहिए, सारी उलझनों को पीछे छोडकर, यूं उसकी तो फ़िलहाल कोई उलझन ही नहीं है, ‘ऊर्जा संरक्षण’ की प्रतियोगिता के लिए कविता लिखने को जून ने कहा था, सो कल दोपहर को लिख दी है, उसे लगता है इस बार कोई पुरस्कार मिलना चाहिए. यूँ न भी मिले, स्वान्तः सुखाय से प्रेरित होकर लिखी है, मात्र अपने मन की खुशी के लिए. क्लब की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में नन्हे को द्वितीय पुरस्कार मिला है, वह जेम्स बॉंड बना था.

फिर दो दिन का अन्तराल, रविवार को वे पिकनिक पर गये, और उसी दिन सुबह-सुबह उसकी पड़ोसिन को छाती में दर्द के कारण अस्पताल में दाखिल होना पड़ा, अब वह ठीक है लेकिन दिल की बीमारी क्यों और कितनी है, किसी बड़े अस्पताल में जाकर विस्तृत जांच से ही पता चलेगा. उसके बेटे को भी मम्प्स हो गये हैं. परेशानी आती है तो सब ओर से एक साथ. सोमवार को जून ने प्रथम अर्धांश में अवकाश लिया, पिकनिक की थकान थी, और कल मंगल को वह सुबह  धर्मयुग की एक कहानी पढ़ने बैठ गयी सो सारे काम देर से हुए, काम खत्म करके पड़ोसिन का हाल-चाल पता करने चली गयी. दोपहर को अरुण शौरी की किताब ‘द वर्ल्डस ऑफ़ फ़तवा’ के अंश पढ़े ‘संडे’ में, वह मुस्लिम विरोधी लगते हैं लेकिन वास्तव में ऐसे हैं नहीं, उनकी विचारधारा से किसी हद तक वह सहमत है, लेकिन एक किताब को इतना महत्व देने की आवश्यकता ही क्या है.परसों लाइब्रेरी से वह कुछ किताबें लायी है, एक Pearl. S. Buck की China as I see it,  इस किताब के बारे में कई जगह उसने पढ़ा है. एक सामान्य ज्ञान की किताब जून की आने वाली क्विज प्रतियोगिता के लिए और अंतिम योग की किताब जो दुबारा ली है. पर सबसे पहले वह असमिया ही पढ़ेगी यानि उनके क्लब की पत्रिका ‘जागृति’ !