Showing posts with label ठंडक. Show all posts
Showing posts with label ठंडक. Show all posts

Wednesday, May 8, 2013

सैंड प्रोड्यूसिंग वैल




   पिछले हफ्ते पहले जून को सर्दी-जुकाम हुआ फिर उनका ठीक होते न होते उसे हो गया. आज भी हल्की खराश गले में बाकी है.  बदलते हुए मौसम की पहली सौगात...खैर अब सब ठीक है, अंशतः और अंततः भी. कल बिल्ली की मालकिन आ रही है, देखते-देखते तीन हफ्ते बीत गए वक्त अपनी रफ़्तार से गुजरता जाता है, वे ही हैं कि वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं. मौसम भी बदलते रहते हैं. ठंडक सुबह-शाम बढ़ने लगी है.

  फ्रिज की आवाज और घड़ी की टिकटिक को छोड़कर कितनी नीरवता छायी है. पिछले दो-तीन दिनों की तरह धूप आज भी नहीं निकली है. जून शायद आज देर से आयें, उनकी व्यस्तता sand producing well  पर चल रहे कार्य के कारण ज्यादा ही बढ़ गयी है. रात को इतना थके होते हैं कि खाना खाते ही सो जाते हैं, दोपहर का आराम तो गुजरे दिनों की बात हो गयी है, लेकिन  इस तरह उन्हें काम में व्यस्त देखकर उसे अच्छा लगता है, एक संतुष्टि का भाव उनके चेहरे पर भी छाया रहता है, थकान के बावजूद.

  आज धूप खिली है, सर्दियों की शुरुआत की एक अच्छी सी भोर..जून आज घर पर हैं. नन्हे के स्कूल में कल ‘बाल दिवस’ पर फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता थी, उसे बहुत आनंद आया. शाम को वे उड़िया परिवार से मिलने गए उनके बेटे के जन्मदिन पर. कल नन्हा तीन साल पुरानी उसकी डायरी निकल लाया और एक पेज खोलकर पढ़ने लगा, नहीं पढ़ पाया तो उसे पकड़ा दी, उसने देखा छब्बीस जनवरी का विवरण लिखा था, जून को भी तब समझ में आया कि डायरी लिखना कितना सुखदायक हो सकता है. यूँ तो उन्हें उस दिन की कोई बात याद नहीं थी, हजारों दूसरे दिनों की तरह वह भी बीत गया लेकिन वे छोटी-छोटी बातें जो उसने उस दिन कागज पर उतार ली थीं, हमेशा रहेंगी उन पन्नों पर.

   आज भी मौसम अच्छा है, मधुर, गुलाबी ठंडक लिए, लगता है हर वक्त वे एसी में बैठे हैं, एक ठंडा सा अहसास गालों को छूता हुआ सा रहता है. कल दोपहर जून और उसने बगीचे में काफी देर तक काम किया, माली से भी करवाया, तीन नए पौधे भी लगाये, दो गुलाब और एक मुसन्दा. मूली भी फिर से लगाई. गुलदाउदी में कलियाँ आने लगी हैं, बिलकुल वैसी ही जैसी उसने स्वप्न में देखी थीं. कल शाम जून ने कुकिंग बुक में पढकर सांभर बनाया, बहुत जायके दार बना, और अब से वे लोग बाजार से सांभर पाउडर नहीं लायेंगे. नन्हे का आज दूसरी यूनिट टेस्ट है, उसे हॉस्टल भेजना उस पर अन्याय करना ही होगा, जिस तरह वह  आँखों में पानी भर लाता है, हॉस्टल जाने की बात पर.

    आज सुबह व्यस्तता में गुजरी, सो दोपहर के पौने एक बजे वह लिखने बैठी है. Baked cabbage, beans, peas with white sauce बनाने में समय कुछ ज्यादा ही लगता है, फिर पीछे आंगन में कल ब्लीचिंग पाउडर डलवाया था,  सुबह नन्हा तो वक्त से तैयार हो गया था फिर भी रोज की तरह एकाध बार तो उस पर झुंझलाई ही. आज उसका हिंदी का टेस्ट है और कल ‘गुरुपर्व’ का अवकाश. कल शाम एक परिवार मिलने आया था, उनके बच्चे ने ला-ओपेला की एक कटोरी तोड़ दी, माँ को बहुत बुरा लगा, यूँ शायद वह उसकी जगह होती तो उसे भी बुरा लगता, पर कल थोड़ा भी नहीं लगा, यूँ भी भौतिक वस्तुओं के प्रति इतना लगाव होना ठीक नहीं न. आज शाम दो परिवार आने वाले हैं, इसी तरह मिलने-जुलने रहने का नाम ही तो जिंदगी है. 

Monday, October 1, 2012

आलू की भुजिया





कल दोपहर को बड़ी ननद अपने पति व बिटिया के साथ आयी है, घर जैसे भर गया है, दामाद जी तो रात को ही लौट गए, वे दोनों रहेंगी. वे सब बाजार गये थे, गंगा किनारे की विश्वनाथ गली में, जो बनारस का मीनाबाजार है, जहां सैकड़ों दुकाने हैं, खिलौनों, कपड़ों, बर्तनों, पूजा के सामानों, चूड़ियों, और साड़ियों के साथ-साथ न जाने कितनी वस्तुओं की. उसने कुछ खिलौने खरीदे. कल पड़ोस का एक छात्र उससे एक सवाल पूछने आया, वह समस्या को इस तरह रख रहा था जैसे टीचर क्लास में रखते हैं, जैसे वह खुद भी रखती थी जब पढ़ाती थी, अब काफी समय से पढ़ाई से सम्पर्क नहीं रहा तो जैसे सब भूल गयी है. पिछले दो-तीन दिनों से नन्हा कुछ भी खाने में रूचि नहीं दिखा रहा है. गर्मी भी बढ़ गयी है, सुबह अपेक्षाकृत ठंडी होती है पर दिन बेहद गर्म. कल जून के पत्र मिले पर उसने लिखा नहीं है कि वह जश्न के अवसर पर आ रहा है या नहीं. कल माँ ने उससे पूछा कि वह कितने दिनों के लिए जा रही है, फिर बोलीं, चार-पाँच दिन में लौट आए, वरना उनका मन नहीं लगेगा. उसने सोचा, सभी को अपने मन का ही ध्यान रहता है दूसरे के मन की बात कोई क्यों सोचे. वह पिछले वर्ष कुछ दिनों के लिए घर गयी थी, सोचती है इस बार दसेक दिनों के लिए तो जायेगी ही. दीदी का पत्र भी आया है वे लोग उसी दिन पहुँचेंगे. भाई का पत्र भी आया है, वह छब्बीस को रात साढ़े आठ बजे की गंगा-सतलज एक्सप्रेस से आ रहा है, उन्हें लेने. उसने सोचा वह उसे लेने स्टेशन जायेगी, यदि ट्रेन लेट न हुई. टीवी पर गुफ़्तगू कार्यक्रम में उर्दू के मशहूर शायर जौक का लिखा एक खूबसूरत शेर उसने सुना, ‘लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले, न अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले’.

आज सुबह पाँच बजे से पहले ही वह उठ गयी थी, देर तक स्नान किया, ताकि भीतर तक ठंडक को भर ले. आज भी हवा की वही स्थिति है, बनारस में गर्मी बढती जा रही है. सीढ़ियों पर जहां वह रोज बैठती थी, आज बिलकुल हवा नहीं है. सुबह के मात्र सवा छह बजे हैं. सोच रही है कपड़े प्रेस करने की बात, दिन में तो यह कमरा तपता है, बैठने का मन ही नहीं होता. फिर समय भी कहाँ मिल पता है. प्रेस गर्म हो रही है. आज बंदर न ही आयें तो अच्छा है...सोनू ऊपर ही सो रहा है. कल रात सोने से पहले कहानी सुनते-सुनाते समय उसके साथ छत पर एक-डेढ़ घंटे का समय बिताया जो अनमोल था, वह बेहद खुश था और वह भी, उसकी तुलना में नीचे गर्मी और घुटन भरे कमरे में फिल्म देखना व्यर्थ था. जून इस समय ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे होंगे. अचानक एक हवा का झोंका आया और चेहरे को सहला गया, उसने उसका शुक्रिया किया. लखनऊ से उसकी छोटी बहन भी घर साथ जायेगी, उसने लिखा है.

कल घर में सुबह चार बजे से ही कार्य शुरू हो गया था, दोपहर को होने वाले छह ब्राह्मणों के भोज के लिए, सो लिखने-पढ़ने का वक्त नहीं मिला. सब कुछ ठीकठाक ही रहा, सिवाय उससे हुई दो गलतियों के, एक तो आलू की भुजिया का न देना और दूसरा खरबूजे को न छीलना, भविष्य के लिए एक सीख पर किसी ने कुछ कहा नहीं, यहाँ सभी लोग उसका बहुत ध्यान रखते हैं. कल जून को एक पत्र लिखा पर वैसा नहीं जैसा वह चाहता है या जैसा वह लिखा करती थी. दिन भर दिमाग स्थिर तो हो ही नहीं पाता, इधर-उधर की बातें...और फिर गर्मी, कुछ भी तो ऐसा नहीं जो दिल की बातें उभार दे...जो थोड़ा सा रोमानी होने के लिए प्रेरणा दे.