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Monday, January 27, 2020

आंतरिक मौन


आंतरिक मौन 



समय की कीमत जो जानता है, विचार की कीमत जो जानता है, वह और तरह से जीएगा. परिवार, मित्र, जीवन, प्राण, सभी धन हैं. इतनी संवेदना भीतर जगे कि इस जगत को त्यागपूर्वक भोगें. आजकल नियमित ध्यान नहीं होने के कारण मन चंचल रहता है, अनुशासित होकर कम से कम आधा घन्टा ध्यान करना होगा. ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आयल फील्ड गए हैं, आने में शायद देरी हो सकती है. आज नासिकाग्र पर मीठी सी गन्ध का अनुभव हो रहा है. गन्ध पृथ्वी का गुण है. पहले नाद सुनाई देता था जो आकाश का गुण है, फिर प्रकाश दिखता था, जो अग्नि का गुण है. साधना काल के बहुत आरंभ में पूरे शरीर में प्राणों का प्रवाह होता प्रतीत होता था, जो वायु का गुण है. अब वे भी सब होते रहते हैं पर गन्ध प्रमुख है. इन्हें ही तन्मात्रा कहते हैं शायद. कल शाम को क्लब की कमेटी की मीटिंग है, उसे एक और सदस्या के साथ मिलकर चाय-नाश्ते  का इंतजाम करना है. सुबह से ही तैयारी करनी होगी. 

रात्रि के आठ बजे हैं. टीवी पर इंग्लैण्ड-भारत एक दिवसीय क्रिकेट मैच का प्रसारण हो रहा है. भारत के सामने ३२२ रन का विशाल लक्ष्य रखा है. आज शाम  लर्नर ड्राइविंग लाइसेंस के लिए फार्म जमा कर दिया. घर आने से पूर्व वे नदी तक गए. सूर्यास्त का सुंदर दृश्य कैमरे में कैद किया. नदी में पानी बहुत बढ़ गया है. सर्दियों में लोग जहाँ पिकनिक मनाते हैं, रेत के वे मैदान पानी में डूब गए हैं. आज सुबह ड्राइविंग की थ्योरी क्लास थी, वर्षा बहुत तेज होने लगी, टीचर की आवाज सुनाई देना बंद हो गयी. आधा घन्टा सभी ने प्रतीक्षा की, वर्षा रुकी तो क्लास पुनः आरम्भ हुई. दस क्लासेस के बाद लर्नर लाइसेंस मिलेगा. आज सुबह एक योग साधिका अपने माँ-पिता को लेकर आयी थी. वह उन्हें प्राणायाम के लिए प्रेरित करे, ऐसी उनकी मंशा थी. इसी बीच चाची जी का फोन आया और प्रेसीडेंट का भी. पहला फोन बीच में काटना पड़ा, शायद सामान्य हाल-चाल जानने के लिए ही किया होगा. छोटे भांजे से बात हुई, वह क़ानून की पढ़ाई करने कालेज पहुँच गया है, परिवार में पहला वकील बनेगा. आज बगीचे से चार नारियल तुड़वाये हैं एक वर्ष और उन्हें ताजा नारियल पानी पीने को मिलेगा. कल  मीटिंग ठीक से हो गयी. 

सुबह के साढ़े आठ बजे हैं, ड्राइवर के आने का इंतजार है. प्रतीक्षा के इन पलों को रचनात्मक बना लिया जाये तो समय क्षण भर में कट जाता है. आज सुबह से भीतर के मौन को अनुभव कर पा रही है वह, कितना मधुर है यह सन्नाटा ! आज का गुरूजी का सन्देश भी यही कहता है कि  मन के द्वंद्व को समाप्त करने की कोशिश से वह और बढ़ेगा क्योंकि उसे ऊर्जा मिलेगी, बल्कि उसे आत्मा का आश्रय लेकर समाप्त कर देना चाहिए. आत्मा में परम् विश्राम है. परमात्मा में क्या होगा यह तो वही जानता है ! आत्मा व परमात्मा दो हैं या एक, इसका निश्चय आज तक नहीं हो पाया. वे एक ही होने चाहिए. भीतर जो अनन्त मौन है वह परम् मौन ही कहा जा सकता है. कुछ देर पूर्व क्लब की अध्यक्षा का फोन आया. स्कूल के लिए नयी अकाउंटेंट मिल गयी है, उसका इंटरव्यू लेना है, उसे भी जाना होगा. आज भीतर सन्नाटा है तो बाहर भी मौन छाया है. नैनी व सफाई कर्मचारी चुपचाप अपना काम कर रहे हैं. बाहर उनके घर के पांच बच्चों में से इस समय कोई भी नहीं रो रहा है. 






Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..

Thursday, September 3, 2015

यस कोर्स की टीचर


कल जून रहे हैं, सो समय का ध्यान रखना होगा. समय की पाबंदी ठीक है पर क्या यह भी एक बंधन नहीं है. सभी तो मुक्ति चाहते हैं, पर भीतर से मुक्ति मिल जाये तो बाहर के बंधन कुछ नहीं बिगाड़ पाते. उन्हें भीतर से मुक्त होना है. अपने विचारों से, आदतों से, परनिंदा से, दुर्बलता से, भय से तथा हर समय कुछ न कुछ करते रहने की खुदबुद से. वे पूर्ण विश्राम में ही राम को पा सकते हैं. आजकल गुरूजी ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर बोल रहे हैं. प्रेम की पराकाष्ठा ही भक्ति है, वह भक्ति पूर्ण विश्राम में मिलती है, जब भीतर सारी चाह मिट जाये. इस जगत में वे कितना भी पालें कभी पूर्णता का अनुभव हो ही नहीं सकता, प्रेम में ही वह पूर्ण हो सकते हैं. अभी जो भीतर कभी-कभी एक बेचैनी सी छा जाती है वह इसी पूर्णता की तलाश है. उनके मन में जो विभिन्न कल्पनाएँ चलती हैं, वे जो राय बना लेते हैं व्यर्थ ही दूसरों के बारे में, वह सबसे बड़ी बाधा है इस पूर्णता की प्राप्ति में. वे अपनी ऊर्जा व्यर्थ ही गंवा देते हैं. जैसे ही स्वयं में आ जाते हैं, वैसे ही पूर्ण शांति का अनुभव होता है. मन से आत्मा में आने में उतना भी समय नहीं लगता जितना पलक झपकने में. साधना सरल है पर उसे कठिन समझ रखा है ! जो अप्रमादी है वही प्रगति करता है. मन तथा आत्मा को अलग-अलग देखना यदि आ जाये तो बाहर का व्यवहार भीतर को छू नहीं पाता, बाहर का व्यवहार तो इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के आधार पर होता है पर आत्मा तो इन सबसे अलग है और वह आत्मा ही वे हैं. उसका व्यवहार सासुमाँ को अवश्य थोड़ा खलता होगा, उसकी उदासीनता !

जून आज वापस आ गये हैं, इस समय ऑफिस गये हैं. कुछ देर में वह टहलने जाएगी और मिसेज परमार के साथ टहलकर वापस आ जाएगी. पिछले तीन दिनों से वह शाम को उसके साथ घर आती हैं, उनकी बेटी आर्ट ऑफ़ लिविंग का बच्चों का ‘यस कोर्स’ करवा रही है. उन्होंने कई रोचक बातें अपने रिश्तेदारों के बारे में बतायीं. नन्हे की फोन पर बातचीत जारी है. आज की पीढ़ी जो सामने है उससे बात नहीं करती, जो दूर है उनसे बात करती है. उसकी खुद की पीढ़ी, जो सामने है न उनसे और जो दूर हैं न उनसे, किसी से भी बात नहीं करती और उनसे पहले की पीढ़ी सबसे बात करना चाहती है, यही जनरेशन गैप है.  


फिर एक अन्तराल..आज पूरे दस-ग्यारह दिनों बाद डायरी खोली है. उसे यात्रा पर जाना था. नन्हा भी साथ गया. जून के साथ होने पर वह निश्चिंत रहती है पर अब सजग रहकर यात्रा करनी थी. कुछ भी परेशानी उन्हें न हो इसके लिए सारा इंतजाम जून ने कर दिया था. दिल्ली से आगे की ट्रेन की टिकट भी यहीं से बुक कर दी थीं. कल ही वे वापस आए हैं, जून भी यहाँ ठीक रहे, यह बड़ी उपलब्धि है वरना पहले उन्हें उसका बाहर जाना बहुत खल जाता था. जब कोई स्वयं संतुष्ट होता है तोआस-पास के लोग भी धीरे-धीरे वैसा ही व्यवहार करना सीखने लगते हैं. इस यात्रा में पिताजी, दीदी, दोनों छोटे भाईयों, बड़ी भाभी, छोटी बहन सभी से अध्यात्म चर्चा हुई. छोटे भाई ने तो अपने भीतर छुपी प्यास तथा गुरू के प्रति प्रेम का वर्णन बहुत सहज शब्दों में किया. ट्रेन यात्रा के दौरान उसने बताया, जब ध्यान में बैठता है तो उसे अपने साथ ही ईश्वर की उपस्थिति सद्गुरु के रूप में होती है. मंझले भाई को ज्ञान तथा योग दोनों की प्यास थी. वे सभी उच्च जीवन की ओर बढ़ रहे हैं, एक ही परिवार के अंश होने के कारण उनके भीतर बहुत कुछ साझा है. यहाँ इस जगत में वे किसी कारण से एक ही साथ इकट्ठे हुए हैं. उसकी यह यात्रा सफल रही ऐसा लगता है. पिता का धैर्य तथा प्रेम, छोटी भाभी की उदासीनता तथा भीतर की लगन, बच्चों की सहजता.. सभी कुछ अपने आप में पूर्ण थे. सभी के रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा हुआ है. दीदी ने एक सत्संग हॉल बनाया है, जहाँ हर हफ्ते कीर्तन होता है. उनके भीतर भी ज्ञान तथा प्रेम का प्रकाश स्पष्ट झलकता है 

Friday, September 19, 2014

चाणक्य नीति


अभी कुछ देर पूर्व उसके मन में यह विचार आया कि क्यों न अपने नित्य के डायरी लेखन को ऐसा रूप दे जो बाद में पुस्तक रूप में आने के योग्य हो जिसका नाम हो उसकी आध्यात्मिक डायरी और यह उसके उन प्रयासों का लेखा-जोखा हो जो वह एक बेहतर मानवी बनने के लिए करना चाहती है. कभी सफल होती है कभी नहीं भी होती. यह परिवार, समाज, राज्य और देश उससे भी अधिक मानव मात्र के प्रति उसके संबंधों को प्रदर्शित करे जिसमें दिन-प्रतिदिन में (बाहरी तथा आंतरिक दोनों) घटने वाले व्यापारों का निष्पक्ष विवरण हो, जो आज के समय का दर्पण हो, व्यक्तिगत स्तर के साथ साथ देश के स्तर पर भी जो महत्वपूर्ण घटा हो तथा जसका असर किसी न किसी रूप से उन पर पड़ने वाला हो. वह यह लिख रही थी कि नन्हा अस्पताल से चिकन पॉक्स का प्रतिरोधक टीका लगवा कर आ गया. कल ही उसके पापा ने कम्पनी के अस्पताल में बेहद महंगा यह टीका लगवाने का प्रबंध किया था. न जाने क्यों उसे इसके प्रति श्रद्धा नहीं है और उसने देखा कि न ही नन्हे को इसके लग जाने से कोई राहत का अहसास हुआ, भविष्य में क्या होगा कोई नहीं जानता, क्या यह टीका लगवा लेने के बाद कभी भी उसे चिकन पॉक्स नहीं होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता. जिस देश में आपरेशन करा लेने के बाद भी औरते माँ बन जाती हैं वहाँ ऐसा संदेह होना क्या स्वाभाविक नहीं ? कल नन्हे को दसवीं की किताबें मिल गयीं यह वर्ष उसके जीवन का एक महत्वपूर्ण वर्ष है और उनके पूरे परिवार का भविष्य इससे कहीं न कहीं जुड़ा है.

‘तहलका डाट कॉम’ नामक कम्पनी ने खोजी पत्रकारिता के द्वारा देश की सत्तारूढ़ पार्टी तथा गठ्बन्धन के दिग्गज नेताओं व रक्षा मंत्रालय के उच्च अधिकारियों को बेनकाब कर  देश में तहलका मचा दिया है. एक काल्पनिक कम्पनी के प्रतिनिधि बन कर कुछ पत्रकार छह महीनों तक नेताओं व अधिकारियों से बेरोक-टोक मिलते रहे, उनको सौदे कराने में सहायता करने के एवज में रिश्वत देते रहे, उनकी तस्वीरें उतारते रहे और किसी को भनक भी नहीं हुई. इससे यही अर्थ निकाला जा सकता है कि रक्षा संबंधी मामलों में पैसों का लेनदेन एक सामान्य घटना है, कि पार्टी फंड के नाम पर ऐसा तो हमेशा से होता आया है. प्रधान मंत्री और रक्षा मंत्री ने अपने टीवी भाषण में देशवासियों को विश्वास में लेने की कोशिश की है पर जनता जो पहले से ही राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार में लिप्त मानती है, एक और नाटक की साक्षी बनी यह सवाल पूछेगी कि नेताओं का पेट इतना बड़ा क्यों बनाया ईश्वर ने ?

कल शाम कुछ मित्र परिवार मिलने आये, चर्चा का विषय तहलका ही बना रहा. यह भी सम्भव है, सरकार गिर जाये और दुबारा चुनाव हों पर भ्रष्टाचार का अंत तो इससे नहीं हो जायेगा. बातों-बातों में किसी ने कहा, चाणक्य शाम को जब अपने निवास पर लेखन कार्य करता था तो दरबार का कार्य होने पर राज्य की लेखन सामग्री का उपयोग करता था, अपना कार्य अपनी लेखन सामग्री से करता था. आज के मंत्री चाहते हैं, उनके परिवार का ही नहीं आने वाली पीढ़ियों का व्यय भी राज्य वहन करे.

आज नन्हे की नई कक्षा की पहली क्लास होगी, आज पूरे एक महीने की छुट्टियों के बाद  स्कूल खुला है. कल उसकी स्कूल ड्रेस की जाँच की तो पता चला पैंट छोटी हो गयी है और कमीज बेरंग, जून उसी समय नये कपड़े दिलाने ले गये, भाग्यशाली है वह कि आवश्यकता होते ही उसकी पूर्ति का साधन उसके माता-पिता के पास है, ऐसे हजारों-लाखों बच्चे हैं जो धन के अभाव में स्कूल तक नहीं जा पाते हैं. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, उनके वृद्ध माता-पिता आये हुए थे. पिता अशक्त हो गये हैं, डायबिटीज के मरीज हैं लेकिन मन उतना ही सशक्त और इच्छालु है. दूसरों की बात समझना ही नहीं चाहते अपनी इच्छा यदाकदा जाहिर कर देते हैं, वरना चुप रहते हैं. माँ सामान्य हैं. पिछले दिनों कई वृद्धजनों से मिलने का अवसर मिला है. अंत समय तक जो समझदारी का परिचय दे, दूसरों की भी सुने, सदा अतीत में ही न विचरे, ऐसे कम ही मिले. उनकी अपनी वृद्धावस्था आदर्श हो ऐसी उसकी कल्पना है. शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें इसका प्रयास अभी से करना होगा. आर्थिक रूप से किसी पर बोझ न बनें और ऐसी प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना भी त्यागना होगा जो बुढ़ापे में तकलीफदेह होती है जैसे स्वाद के आधार पर भोजन का चुनाव, व्यायाम करने में आलस्य और व्यर्थ ही बोलने की आदत. आज गोयनका जी ने कहा, सम्यक शील और सम्यक समाधि होगी तभी सम्यक प्रज्ञा जागेगी और प्रज्ञा यानि प्रत्यक्ष ज्ञान, अपनी अनुभूतियों पर उतरा ज्ञान ही काम आता है, दूसरों का ज्ञान प्रेरणा भर बन सकता है अपर जीवन दृष्टि नहीं दे सकता.



Monday, April 28, 2014

विश्वकर्मा पूजा का भोज


Today again she is alone at home at this hour, Nanha and Jun both went to their respective destinations at 6.30 am. Weather is hot and she is feeling it. It is hot and stuffy so is her mind and so are her clothes. Mind is not as fresh and spirit is not as calm, something is troubling her either it is heat or something concerned with mind. But just she read, mind is not everything, also read some useful ways to avoid worries and start living meaning fully. But all the kings horses and all the king’s men can not join her broken heart… Last night she saw a dream, mother is going and she gave her pink sari, and one more thing in the dream was about the women of the house, they all used to show their gratitude by wailing when their men brought them new clothes, men were so puzzeled they stopped bringing any new garments. It was a strange dream.

उम्र के इतने पतझड़ देखने के बाद (वसंत भी तो) भी आज तक वह यह नहीं समझ पायी कि उसे क्या करना चाहिए या उसे क्या पसंद है या वह क्या अच्छी तरह कर सकती है, एक उहापोह की स्थिति हर वक्त मन में बनी रहती है, लगता है जैसे जो कुछ वह कर रही है अर्थयुक्त नहीं है बल्कि कुछ और है जिसे करने पर उसे पूर्ण संतुष्टि का अहसास होगा. यह अहसास भी सताता है कि अपने समय का सदुपयोग नहीं कर रही है, कर पा रही है. पढ़ाना उसे पसंद है और नन्हे को पढ़ाने का समय भी तय किया है लेकिन वह उन लोगों को पढ़ाना चाहती है जिनके पास साधन नहीं हैं. पर कहते हैं न कि इच्छा यदि दृढ़ हो, इरादे मजबूत हों तो राह खुदबखुद निकल आती है, उसके इरादे पानी के बुलबुलों की तरह होते हैं. उस दिन अपने आप से वादा किया कि रोज कुछ न कुछ लिखेग पर कल तो सारी दोपहर ‘करीब’ देखने में लगा दी. अच्छी फिल्म है शुरू में कुछ खास जम नहीं रही थी पर बाद में सभी का अभिनय अच्छा था. सही है कि टीवी और फिल्में वास्तविकता से दूर सपनों की दुनिया में ले जाती हैं, कल्पना की दुनिया में.. जहाँ सिर्फ ख्याल ही ख्याल होते हैं, हकीकत में होने वाले काम नहीं होते. पर वे ख्याल कभी-कभी असली जिन्दगी में काम भी तो आते हैं, प्रेम करना सिखाते हैं, जीने का नया अंदाज भी !


आज सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी, बिजली चमक रही थी और बादल गरज रहे थे, मौसम मोहल हो गया है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, जन्मदिन का उपहार बच्चों को दिया और कुछ देर बैठे, सखी ने पूछा क्या लिख रही हो, वह इतना ही बता पायी डायरी नियमित लिखती है. कल जून के दफ्तर में पूजा का भोज-प्रसाद ग्रहण करके वे दो बजे घर लौटे. वहाँ कई महिलाओं से कई दिन बाद मुलाकात हुई, इस तरह के get-together में बातचीत बड़ी formal सी ही रहती है फिर भी अच्छा लगता है लोगों के हाव-भाव देखना उन्हें सुनना. नन्हा देर से आया, उसकी वैन का ड्राइवर ज्यादा पी लेने के कारण अपनी चाबी खो बैठा था. इस पूरे इलाके में विश्वकर्मा पूजा पर पीने का रिवाज है, ड्राइवर अपनी गाड़ी की पूजा करते हैं और खुद ‘पानी’ पी लेते हैं. नन्हे का गणित का टेस्ट कल बेहतर हुआ, आज फिर उसका टेस्ट है, इस स्कूल में जाने के बाद से गणित में उसकी रूचि बढ़ी है. अपने इर्द-गिर्द नजर डाले तो ऐसा लगता है कि चीजों को सतही तौर पर जानना और उनमें गहरे उतरना दोनों बिलकुल अलग-अलग बातें हैं, गहरे उतरने में खतरा है पर असली स्वाद वहीं है, जीवन की तल्खियाँ हों या उम्मीदें, दोनों को आखिरी घूँट तक महसूस करना ही सच्चा जीवन है, उसने सोचा, यदि मन की बात माननी ही है तो इस कदर माने कि खुद को भूल जाए.

Monday, February 3, 2014

शेफाली का दरख्त


कल-परसों वह कुछ लिख नहीं पायी, आज जून देर से आने वाले हैं, सो समय का सदुपयोग करते हुए डायरी उठा ली है. पर मन में कार्यों की एक सूची बनने लगी है, घर जाने से पहले गाउन ठीक करना है, भाई दूज पर टीका भेजना है. वह तो अपना कर्तव्य पूरा करेगी ही, मन में कई विचार आये और ऊपरी तौर पर हलचल मचाकर चले गये, क्या स्नेह की कोई परीक्षा हो सकती है, या कीमत या बदला, नहीं स्नेह तो बस स्नेह ही है. उसके गले में खराश अभी तक शेष है, पाचन भी पूरी तरह ठीक नहीं है, नन्हे को भी सर्दी लग गयी है, फिर ईश्वर के सिवाय कोई सहाय नजर नहीं आता, वही मदद करेगा जैसे अब तक करता आया है. सुबह दो-तीन फोन करने थे सो व्यायाम भी नहीं कर पायी.

कल दोपहर जून से वह कुछ बात करना चाहती थी, पर वह इसके लिए तैयार नहीं थे. उसने कहीं पढ़ा था, कुछ लोग किसी कीमत पर भी बहस में पड़ना नहीं चाहते सो ऐसी बात कह देते हैं जिन्हें सुनकर सामने वाला घबरा ही जाये. उनका स्वभाव ही ऐसा होता है, खुलकर बात करने से झिझकते हैं, पता नहीं क्यों, सब ठीक-ठाक रहे, दबा छिपा सा, ऊपर से सब सही लगे बस ऐसा ही वे चाहते हैं. सम्बन्धों में खुलापन सहन नहीं कर पाते. किसी विषय पर बात को गहराई तक ले जाना उन्हें नहीं भाता. उथला-उथला ही रहता है सब, ताकि कुछ बिगड़े भी तो ऊपर से संवार दें. यह उनकी परवरिश का हिस्सा है और इसमें यदि वे कुछ चाहें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा नहीं, वह उनके अनुरूप स्वयं को ढाल सके कोशिश तो यही रहती है पर जब कभी अपनी विवशता का अहसास होता है तो..उसके ख्याल से हर स्त्री को अपनी मर्जी से आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जहां उसकी रूचि-अरुचि की परवाह वह स्वयं करे, अपने लिए अपने परिवार के लिए और..यह स्वप्न कभी पूरा होगा...या ?

पिछले दिनों मन कुछ खिंचा-खिंचा सा था, वह कहते हैं न sound body has sound mind सो गले की खराश का असर मन पर हुआ और मन का दायीं कोहनी के ऊपर तथा कान पर. पर अब हालात सुधर रहे हैं और साथ ही मन भी. नन्हा भी कल से बेहतर है.

नन्हे के यूनिट टेस्ट खत्म हो गये, परसों उन्हें जाना है. जून उन दोनों को लेकर होमियोपैथी डॉ के पास गये थे, यात्रा के लिए कुछ दवाएं दी हैं. कल दोपहर उसने तीनों आल्मरियाँ साफ कीं, सलीके से लगे हुए कपड़े अच्छे लग रहे हैं. शाम को वे टहलने भी गये, शेफाली का पेड़ श्वेत फूलों से भर गया है और सुगंध बरबस अपनी ओर खींच लेती है. उसने सोचा उसकी उस बातूनी सखी को यह सुगंध और पेड़ अच्छा लगेगा. माँ का पत्र आया है, उन लोगों ने अभी तक नये घर में शिफ्ट नहीं किया है, वह घर जो उनके घर के सामने है, भविष्य में कई वर्षों के वाद जब वे उस घर में रहने जायेंगे तो पड़ोसी अपने ही लोग होंगे. आज सुबह साढ़े चार बजे उठी, अलार्म सुनने के बाद और सायरन बजने के बीच मन सपनों की दुनिया में उठा, गेट खोला, बाहर फूल थे और धुंधली सी सुबह !

उसकी संगीत अध्यापिका के ससुर की मृत्यु हो गयी कल रात आठ बजे यहीं अस्पताल में. अभी अभी पता चला, पिछले कई दिनों से वह अस्वस्थ थे. पिछले कई दिनों से वह उनके घर जा रही थी पर एक दिन भी बात नहीं की. उन्हें उसके जाने से असुविधा भी होती होगी पर अब वह यह कभी जान नहीं पायेगी. मानव जीवन नश्वर है और जितना समय हमें मिला है शांति और सद्भाव के साथ गुजर सकें तो ही उचित है. पर ऐसा हो हो नहीं पाता है. कभी किसी और कभी किसी कारण लोग संतुष्ट नहीं रह पाते. ईश्वर भी तब अपरिचित लगता है. शायद यह असंतोष उसी का नतीजा है. पूर्णतया स्वयं पर निर्भर रहना इतना आसान नहीं है, अपने हर एक क्षण की, हर मूड की जिम्मेदारी स्वयं लेनी पडती है, तो कभी अपराध भाव, कभी उदासी, कभी असंतोष, कभी आत्मविश्वास की कमी यानि सभी के सभी नकारात्मक भावों का सामना करना पड़ता है. जीवन एक कड़वी दवा लगने लगता है और आसपास की शांति भी असहनीय लगने लगती है.

अभी तक गला ठीक नहीं हुआ है न उसका और न ही नन्हे का. शायद आने वाले सफर और आने वाले दिनों के बारे में सोचकर ही मन परेशान है, या फिर शरीर की अस्वस्थता के कारण सदा उत्साहित रहने वाला मन मुरझा सा गया है, हो सकता है इसका कोई और कारण भी हो, जिसके बारे में वह सोचना नहीं चाहती, जिसने जिन्दगी की गाड़ी में पिछली सीट ले ली है. सुबह उसकी असमिया सखी का फोन आया था, उसने एक ऐसी बात बताई जो उसके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, उसके परिवार में एक नया मेहमान आने वाला है और उसने यह बात किसी और को बताने से मना किया है.




Saturday, May 11, 2013

ऊर्जा संरक्षण


   

 दिन खिला-खिला है आज, दोपहर के लिए उसने कई काम सोचे हुए हैं, शाम नन्हे को परीक्षा की तैयारी कराते ही गुजरेगी. कुछ देर के लिए टहलते हुए लाइब्रेरी भी जा सकते हैं. कल दोपहर वे घूमने गए थे पाइप ब्रिज पर, रोमांचक अनुभव था. कल उनकी असमिया टीचर ने व्याकरण पढ़ाई, और साथ ही कहा अब वे नहीं आ पाएंगी, उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया. उनकी याद हमेशा बनी रहेगी और एक दिन जब वे भाषा सीख जायेंगे उनके घर जायेंगे उनसे मिलने. दीदी का खत नहीं आया न ही छोटी बहन का बहुत दिनों से, क्या हुआ होगा वह कल्पना कर सकती है, और इसलिए कोई विशेष इंतजार भी नहीं है, अर्थात बेताबी भरा इंतजार. आज क्लब जाना है, इम्ब्रायडरी किट के साथ, कल दोपहर भर अभ्यास किया, देखें क्या होता है, फ़िलहाल तो अभी पौने दस हुए हैं, अभी कुछ काम बाकी है...पेट में कुछ हलचल सी लगती है, लगता है ठंड भी लग गयी है एक नामालूम सी बेचैनी भी है..पर इतनी नहीं कि रोजमर्रा के कामों में रुकावट पड़े, सो सब ठीकठाक ही है. जून को सुबह आलू+मकई की रोटी बना कर  दी थी, उसने भी खायी थी, शायद उसी का असर हो. नन्हा आज बिना स्वेटर पहने ही बस में चढ़ गया, फिर पड़ोस के बच्चे के हाथ उसे स्वेटर भिजवाया.

 मौसम आज कल जैसा बिलकुल नहीं है, कल शाम से ही बदली बनी है, बरसने को तैयार.. ठंडी हवा भी बह रही है. कल शाम से ही मन में विचारों का बवंडर उठ रहा है, वही खामख्याली...अपने आप से शिकायतें...उसकी बंगाली सखी ठीक ही करती है कि इन सब से ऊपर रहती है. न पानी में उतरेंगे न डूबने का डर रहेगा..मगर उसे आजकल ओखली में सर देने का शौक जो हो गया है. खैर, बहुत हो गया, इस पर और मगजमारी करना ठीक नहीं, जानती है सिर्फ इतना लिख भर देने से ही उस से मुक्ति नहीं है, वह तो समय ही लाएगा...समय जो सबसे बड़ा मरहम है हर जख्म को भर देता है. नन्हा आज जल्दी आयेगा, माह का अंतिम दिन है, खाना वे एक साथ ही खायेंगे. परसों जून एक सुंदर नया जग लाए हैं, प्लास्टिक बॉडी है अंदर स्टील है, शाम को कोई मेहमान आया तो वे उसे पहली बार इस्तेमाल करेंगे.

  दिसम्बर महीने के दो दिन गुजर गए, वक्त पंख लगाये उड़ रहा है जैसे. कल दोपहर उसकी पुरानी पड़ोसिन आई अपनी बहन के साथ, अच्छा लगा, पुरानी यादें फोटो देखकर ताजा कीं और शाम को मिलकर सबने कवितायें भी पढीं, पर रात होते तक इतना थक चुकी थी कि बिस्तर पर जाते ही नींद ने घेर लिया. कल जून क्लब मीट के सिलसिले में एक नोटिस लाये जिसमें सोविनियर में हिंदी अनुभाग के लिए उसका नाम भी था, अच्छा लगा पहली बार अपना नाम कमेटी मेम्बर्स की लिस्ट में देखकर. दो दिन पहले ऊर्जा संरक्षण के लिए स्लोगन व कविता लिखने का काम भी दिया था जून ने, जो अभी तक शुरू भी नहीं किया है.


Friday, June 29, 2012

यह दिल दीवाना है


अंततः वह दिन आ ही गया, जून की परीक्षा का दिन. कल इंटरव्यू है आज लिखित परीक्षा है. पिछले कई हफ्तों से वह तैयारी कर रहा था. उसे अवश्य ही सफलता मिलेगी, विभाग में पदोन्नति होगी. सुबह का पहला पहर है, नन्हा उठकर फिर सो गया है, कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, नूना कब सो गयी उसे भान नहीं, जून ने ही फिर उसे  संभाला. ज्यादातर ऐसा ही होता है शाम को घर आने के बाद दोनों का साथ छूटता ही नहीं. उन्होंने जो तस्वीरें उतारी थीं, कुछ बहुत अच्छी आयी हैं, कुछ सामान्य, पहली बार खीचीं थी शायद इसीलिये, छत का पंखा कितना गंदा हो गया है, उसकी नजर ऊपर की ओर गयी तो आभास हुआ. पूरा घर ही एक बार सफाई मांगता है, सफेदी भी होनी चाहिए अब. कुर्सियों के कवर भी धोने चाहिए, पिछले दो महीनों से इस ओर नजर ही नहीं गयी. अब अगले महीने पूजा की छुट्टियाँ है, तभी यह काम होंगे उसने मन ही मन निश्चय किया. तब नन्हा भी तीन माह का हो जायेगा. पाकशाला में भोजन बनाते हुए वह ट्रांजिस्टर पर भारत-आस्ट्रेलिया क्रिकेट मैच का आँखों देखा हाल सुन रही थी कि  उसके कुनमुनाने की आवाज आयी, वह सब काम छोड़ कर कमरे में गयी.

मन में कितनी ही बातें आती हैं पर उसकी समझ में नहीं आता कैसे कहे और किससे ? पता ही नहीं चलता, दिन कैसे बीत जाता है, समय जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है हर रोज वही दिनचर्या, सुबह, शाम, रात. आज सुबह जून की बस छूट ही जाती उसकी बातों में, पता नहीं क्यों वह बार-बार उसे उन दिनों की याद दिलाती है जब वे मुक्त होकर शाम को दूर तक घूमने जाया करते थे, कभी मन होने पर कोई फिल्म ही देख आते थे, या यूँही आराम से लेटे रहते थे घंटों...क्यों नहीं वह समझ लेती कि वह कल था और आज, आज है, इस परिवर्तन को स्वीकार करना ही होगा, और बदलाव ही तो जीवन में रंग भरता है. यूँ ऊपर से देखा जाये तो ये कोई आवश्यक कार्य नहीं, जिनके पूरे न होने से कोई शिकायत होनी चाहिए. पर मन तो मन है कुछ भी सोचता है. उसे परेशान किए बिना कहीं नहीं लगता है, बेचैनी का दूसरा नाम ही मन है. एक चिंता और है मन में अगले सप्ताह डॉक्टर के पास जाना है जिसके निवारण के लिये.

Wednesday, June 27, 2012

पल-पल रंग बदलता मौसम


ग्यारह बजने को हैं, भोजन भी बन गया है और स्नान भी हो गया, कभी-कभी एक ही काम हो पाता है, दूसरा जून के आने के बाद और कभी एक भी नहीं, जब नन्हा पूरी सुबह जगता है. वैसे  पिछले दो-तीन दिनों से उसका उठने-सोने का समय कुछ-कुछ निश्चित होता जा रहा है. सो अब उतनी जल्दबजी नहीं होती. धीरे-धीरे वह बड़ा हो जायेगा. एक साल का फिर दो तीन वर्ष का, स्कूल जाने लगेगा फिर वह अकेली रह जायेगी, उन दोनों की प्रतीक्षा करते हुए. वह मुस्कुराई, अभी बहुत दिन हैं उस बात को, फ़िलहाल तो आज की बात करनी है. नन्हे की दायीं आँख से पानी आ रहा है, डॉक्टर को दिखाना होगा. उसे डिब्बे का दूध देना भी बंद कर दिया है, शायद अभी इसकी जरूरत ही नहीं थी. उसे घर की याद आयी, छोटी बहन के पत्र की प्रतीक्षा थी, पहली बार घर से बाहर गयी है अभ्यस्त होने में थोड़ा वक्त लगेगा. उसने अगस्त माह की सर्वोत्तम उठा ली, लगभग हर अंक में वैवाहिक जीवन पर एक न एक लेख होता है, जो बहुत व्यवहारिक होता है, सीधी-सादी भाषा में. जून आज बाइक से दफ्तर गया है थोड़ा जल्दी आ सकता है.

एक सप्ताह बीत गया, सब कुछ सामान्य चलता रहा. कल नन्हें के फोटो भी बन कर आ गए, कितना छोटा सा लगता है वह उनमें. जून अपनी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा है. उसे अवश्य ही सफलता मिलेगी. आजकल यहाँ छात्र संगठन के कारण तनाव है. वह तो दिन भर घर में ही रहती है. जून कहता है कि शाम पांच-छह बजे के बाद बाजार या क्लब जाना सुरक्षित नहीं है. मौसम आजकल रोज ही कितने रूप बदलता है, सर्दी, गर्मी, वर्षा तीनों एक ही दिन में.  


Thursday, May 31, 2012

नामकरण संस्कार


इस समय टीवी पर ‘गंगा प्रदूषण मुक्ति’ अभियान दिखाया जा रहा है, जो वाराणसी में राजीव गाँधी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया जा रहा है. प्रधानमंत्री इस परियोजना के प्रतीक का अनावरण कर रहे हैं. उसे याद आ रहे हैं वे दिन जब पूरे परिवार के साथ वह गंगा भ्रमण के लिये जाती थी, जो भी मेहमान उनके यहाँ आते थे, उन्हें भी गंगा दर्शन के लिये ले जाना होता था. पानी तब इतना दूषित नहीं था.
आज इतवार है, अभी तक का समय खट्टा-मीठा बीता है और यह इस बात का प्रतीक है कि अभी जीवन में स्पदंन है. बिना कोई परेशानी आये, सीधे-सीधे जीवन का पथ तय होता जाये तो आनंद ही क्या. कल शाम वे नवजात शिशु से मिलने गए थे जो कल ही घर आया है, अभी तक उसका नाम नहीं रखा गया है, नामकरण संस्कार होने पर ही नाम रखेंगे उसकी माँ ने बताया, नूना को थोड़ा आश्चर्य हुआ, उसने तो अभी से नाम सोच रखा है. कल वह फिर जायेगी उसके लिये उपहार लेकर, आज तो बाजार बंद है. वे घर लौटे तो दो परिवार उनसे मिलने आये हुए थे. रात को स्वप्न में वह अमेरिका पहुँच गयी थी, और छोटी बुआ को भी देखा. सुबह नींद देर से खुली, पर जून ने बिना कोई जल्दबाजी किये आराम से ही ऑफिस जाने की तैयारी कर ली. उसकी यही बात नूना को बहुत भाती है, वह कभी भी घबराता नहीं है, न दूसरे को ही इसका अनुभव करने देता है.

कल टीवी पर व्ही. शांताराम की प्रसिद्ध फिल्म देखी, ‘झनक झनक पायल बाजे’ उसे तो बहुत अच्छी लगी, पर जून को ऐसी फ़िल्में अच्छी नहीं लगतीं शायद, वह बीच-बीच में उठ कर चला जाता था. रात दस बजे फ़्रांस में हुए ‘इंडिया फेस्टिवल’ की समाप्ति पर एक विशेष कार्यक्रम था, कितना मन था उसका देखने का पर यह जून है न जो, उसे नींद आती है दस बजे ही, बेड में आने के बाद चाहे ग्यारह, बारह बजे तक जगता रहे.
   

Monday, April 9, 2012

गुलदान में फूल


वह बहुत खुश है, फोन पर जून ने कहा है कि वह आ रहा है. पर जिस कार्य के लिये वे लोग गए थे वह तो अधूरा ही रह गया है, फिर भी वह खुश है क्यों कि इतने दिन बाद वे साथ होंगे. उसने सोचा, कोई अच्छा सा नाश्ता बनाये अगले ही पल विचार आया अभी पांच भी नहीं बजे हैं और उसे आने में दो घंटे से भी ज्यादा लगेंगे सो खाना ही बनाएगी. पुलक भरे मन से उसने फटाफट काम करना शुरू किया और दो सब्जियां बना डालीं. आज कई पत्र भी आये हैं पर उसने एक भी नहीं पढ़ा है अब दोनों साथ-साथ पढेंगे. खाना बन गया तो समय काटना कठिन हो गया तो उसने गुलदान में फूल सजाये, फिर स्वेटर बुनने बैठ गयी.
 



Friday, March 9, 2012

फोन पर मुलाकात


शाम हो गयी है, नूना को उसके फोन का इंतजार है, जो सात से आठ बजे के बीच कभी भी आ  सकता है. पर फोन पर वह कुछ भी बात नहीं कर पाती, सिर्फ सुनती है. अभी तीन दिन और हैं जून को वापस आने में. आज सुबह से वह घर पर ही थी. सामने वाली उड़िया लड़की घर गयी है और दूसरी काफ़ी देर से घर आयी है. बाहर अँधेरा हो गया है. सुबह का भोजन फिर बच गया है. एक किताब पढ़ी, The Promise अच्छी प्रेम कहानी है, उसने सोचा जून के आने पर उसे सुनाएगी. आज एक खत भी आया है घर से.
कल शाम जून का फोन नहीं आया, काफ़ी इंतजार के बाद उसने कुछ नहीं किया, भोजन भी वैसे ही पड़ा रहा. बाद में पता चला कि फोन किया था पर जिनके यहाँ किया था वे ही बता नहीं पाए थे. आज शाम वह बाजार गयी, वे तीन थीं, कार आ गयी थी, उसने खीरा व कोल(केले) खरीदे. दोपहर को एक तेलुगु परिचिता के यहाँ गयी. इस समय उसके सर में हल्का दर्द हो रहा है, शायद दिन भर आराम नहीं किया इसलिए या कि मार्केट से वापस वे पैदल आये इसलिए. उसने सोचा जून के न रहने से ही सारी समस्या है. उसकी दिनचर्या भी यहाँ की तरह नियमित नहीं रह पाती होगी.
आज उन्होंने फोन पर आराम से बात की. नूना बहुत खुश है. जून ने बताया काम बहुत है, दिन भर व्यस्त रहना होता है, तो उसने कहा, कोई बात नहीं, वह तो कभी काम से घबराता नहीं, जिस काम के लिये वह गया है बस उसे शीघ्र ही पूरा करके लौट आये. दोपहर को वही तेलुगु परिचिता आ गयी थीं, कुछ देर लूडो खेला फिर रमी भी, कुछ समय पंख लगा के उड़ गया. आज रात भी वह फलाहार करने वाली है, पहले खीरा, फिर कुछ देर बाद केला व दूध. सुबह तोरई की सब्जी व रोटी बनायी थी पर रात को कुछ बनाने का मन नहीं होता.