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Monday, March 2, 2015

मधुमक्खी सा मन





 रात्रि के दस बज गये हैं, जून अभी तक वापस नहीं आए हैं, जहाँ कोपरेटिव की वार्षिक मीटिंग + डिनर चल रहा है. उसने अभी-अभी शुरू से डायरी के पन्नों पर नजर डाली, कृष्ण को समर्पित मन के उद्गारों से भरे थे वे पन्ने, और इस क्षण भी वह अपने भीतर उसी का उजाला महसूस कर रही है, सिर में कोई नाद धम-धम सुनाई दे रहा है, मन शांत है. शाम को संकल्प किया था कि सुबह जल्दी उठना है और स्नान करके ही ध्यान के लिए बैठना है, पर आज सोने में देर हो रही है. छोटे भाई का पत्र आया है, पिताजी ने उसके पत्र का उत्तर उसी में लिखवा दिया, वे स्वयं अभी नहीं लिख पा रहे हैं, आँखों का इलाज चल रहा है. कल छोटी भांजी को कार्ड भेजा, दीदी को पत्र लिखा आज टीवी पर तूफान की चेतावनी दी गयी, रात को तेज वर्षा होने की सम्भावना है. नन्हा आज बहुत दिनों बाद क्रिकेट खेलने गया, लगता है जून आ गये हैं.

जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है स्वयं से पहचान..  ‘किसी को उससे भय न हो और किसी से उसे भय न हो’, ऐसा तभी सम्भव है जब स्वयं की दिव्यता का आभास हो जाये, अन्यथा हृदय के विकार दग्ध करते ही रहेंगे. किसी के व्यक्तित्व के निर्माण में भक्ति का बहुत महत्व है, परमेश्वर से बढकर परम मित्र कौन है जो हृदय को मुक्त करने की कला सिखाता है. कल रात उसने बाबाजी को स्वप्न में देखा, वे उनके आश्रम में हैं. उसने उन्हें प्रणाम किया और बताया कि उन्हीं के एक स्कूल में पढ़ाने का कार्य शुरू किया है. नन्हे को भी प्रणाम करने को कहा. स्वप्न में भी उनसे एक सवाल वह पूछ रही थी कि आप जो कहते हैं वह दिल से आता है या सामने लिखा हुआ रखा रहता है, अजीब सा प्रश्न है पर उनका उत्तर था कि सामने लिखा भी रहता है. आज उन्होंने सिन्धी भाषा में प्रवचन किया. झूलेलाल का उत्सव चेट्टी चाँद मनाया जा रहा था. जून वापस आ गये हैं. हड़ताल के कारण उन्हें व किसी को भी दफ्तर में प्रवेश करने नहीं दिया गया. कल भी हड़ताल हुई थी पर उनका विभाग खुला था. आज धूप तेज है, अभी  सुबह के आठ बजे ही गर्मी का अहसास हो रहा है. देश के बाकी हिस्सों में एक महीने से लोग गर्मी का अहसास कर रहे हैं, वे यहाँ के मौसम की शालीनता के कारण उससे बचे थे. कल एक सखी आयी थी परिवार सहित. नूना भी आलोचना करने से रह नहीं पाई. आत्मा पर कोई न कोई दाग रोज बल्कि हर क्षण लगता ही रहता है, फिर ईश्वर के दर्शन क्योंकर हो सकते हैं. विषपान से भी हानिप्रद विषयों का चिन्तन है, सांसारिक विषयों का चिन्तन ही पथ से विचलित करता है, और वे जितना उस जाल में उलझते जाते हैं, स्वयं को बेबस पाते हैं. आशाओं रूपी नदी, जिसकी लहरें मन की वृत्तियाँ है, को पार करना है. पवित्रता, अभय, धैर्य और क्षमा आदि की पतवार के सहारे ही वे इस नदी को पार सकते हैं ! दूसरों के अंदर दोष देखना आसुरी स्वभाव है. अन्यों के गुणों को देखकर मधुमक्खी की तरह उन्हें स्वयं में भरना चाहिए.

कल से नन्हे को सुबह जल्दी उठकर फिजिक्स पढ़ने जाना है, उन्हें उसे चार बजे ही उठाना होगा. शनिवार को तिनसुकिया से वह बालकृष्ण का एक सुंदर चित्र लायी थी, उसे देखते ही मन प्रसन्न हो उठता है. कृष्ण की मुस्कान मन मोहिनी है. वह उन्हें सदा खिले रहने को प्रोत्साहित करती है !

कल से ही उसके मन में कई प्रश्न उठ रहे थे कि आत्मा यदि अजर, अमर और शक्तिमय है तो मानव को इतने दुःख क्यों उठाने पड़ते हैं..यदि परमात्मा ने अपना अंश स्वरूप उन्हें बनाया है तो इतनी पीड़ा इतनी बेचैनी क्यों...दिल में जैसे एक टीस सी उठती है, इन बन्धनों से मुक्त होने की तीव्र आकांक्षा ! जवाब भी मिल जाता है...राग, द्वेष आदि जीव सृष्टि में ही सम्भव हैं, ईश्वर की सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है. अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार सब प्रेरित हो रहे हैं, तुच्छ स्वभाव को दिव्य स्वभाव में बदलना है. मन को अकारण ही कल्पना करने आदत को भी छोड़ना है, व्यर्थ के चिन्तन अथवा विलाप से बचना है.






Tuesday, November 19, 2013

लौह पुरुष- सरदार वल्लभ भाई पटेल


आज बहुत दिनों बाद सुबह लॉन में धूप में बैठकर लिख रही है, हल्की हवा भी बह रही है जो प्रातः उठने पर बर्फीली थी पर अब सूर्य के उगने से उसका दंश कम हो गया है. बहुत दिनों से बड़ी बहन का खत नहीं आया, एक बार उन्हें लिखा था, अब पहले की सी कंपाने वाली ठंड नहीं पडती पर इस बार पूरे देश में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में ठंड बहुत है. उधर ऑस्ट्रेलिया में तापमान ५० डिग्री तक पहुंच गया है. पहले दूध वाला आया फिर स्वीपर, सो वह घर के अंदर चली गयी. कुछ देर पूर्व एक धारावाहिक का अंश देखा, उसकी नायिका एक लेखिका है, भावुक और सच्चे प्रेम की आकांक्षी, अंत अच्छा था. जैसे उसकी और जून की नाराजगी का अंत कल अच्छा हुआ, कल उन्होंने परेड देखी, नन्हे ने बाहर झंडा भी फहराया और आटे का एक तिरंगा भी बनाया है. दोपहर को ‘सरदार’ फिल्म देखी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन कितना महान था. उन्होंने देश की आजादी के बाद सारे राज-रजवाड़ों को एक करने में, एक राष्ट की स्थापना में अमूल्य सहयोग दिया. परेश रावल ने पटेल की भूमिका अच्छी बनाई. ‘दो आँखें बारह हाथ’ भी कुछ देर देखी, अच्छी कहना उपयुक्त नहीं होगा, ऐसी फ़िल्में अब कभी नहीं बनेगीं. शाम को पड़ोसिन के यहाँ से मिली ब्रोकोली बनाई सबको बहुत पसंद आई.

पिछले दो दिन फिर यूँ ही निकल गये, नन्हे के स्कूल न जाने से कल सुबह उसी के साथ व्यस्त रही. परसों भी उसकी बस एक घंटा लेट आई थी, सेन्ट्रल स्कूल के बस ड्राइवरों की हड़ताल आज भी जारी रही और शायद कुछ दिन और चलेगी. नन्हा आज पड़ोसी की गाड़ी में गया और वापस अपने मित्र के साथ आया. सुबह एक सखी का सुंदर बगीचा देख कर आयी थी सो आज शाम अभी कुछ देर पहले उसने भी बगीचे में काम किया. उसने बहुत स्वादिष्ट गाजर का हलवा खिलाया, जून को बताया तो उनके मुंह में पानी भर आया. परसों दोपहर वह ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर कविता या कहें तुकबन्दी करने की कोशिश करती रही, तीन ‘नारे’ भी लिखे हैं, जो आज जून ने भिजवा दिए हैं, देखें इस मशक्कत का क्या परिणाम निकलता है.

कभी ओस से भीगी घास पर पाँव पड़े
जो ठंडक दिल में समा गयी
वही मेरे और तुम्हारे मन के बीच पुल बन गयी है
कभी फूलों के झुरमुट में सिकुड़ा तन
उनकी रंगत और खुशबु समेटे नयन
तुम्हारे स्वप्न उकेरने लगे...  
ग्यारह बजने वाले हैं और अभी खाने में फिनिशिंग ट्चेज शेष हैं, पर सुबह से इधर-उधर के कामों को निपटते हुए अब थोड़ी थकन सी महसूस होने लगी है. नन्हा और पड़ोस का उसका मित्र आज साइकिल से स्कूल गये हैं, बसों की हड़ताल लम्बी खिंचती चली जा रही है. थक तो काफी गये होंगे, चार-पांच किमी दूर है उनका स्कूल, सवा नौ बजे निकले थे आधे घंटे में पहुंच गये होंगे. सुबह एक अजीब सा स्वप्न देखा, अब कुछ भी याद नहीं है पर वह फीलिंग याद है जिसने उसे उठा दिया, फिर ‘जागरण’ सुना, बाद में ध्यान करते समय मन केन्द्रित नहीं कर पाई, वे आवाजें भी तब और स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं वैसे जिनकी तरफ ध्यान भी नहीं जाता.

कल दोपहर वह बैकडोर पड़ोसिन के साथ बैडमिंटन खेलने क्लब गयी, अच्छा लगा पर जून के साथ जाना और खेलना उसे ज्यादा पसंद है, उसने सोचा, देखे, यह दोपहर का रूटीन कितने दिन चलता है, वैसे उसकी पड़ोसिन अच्छा खेलती है और वह उससे कुछ सीख सकती है. फिर cycling का अपना आनन्द है, कुछ दिन यही सही. आज सुबह गोयनका जी ने बताया, धर्म जब तक धारण न किया जाये उस पर चर्चा करना व्यर्थ है. कल उसकी एक सखी आई थी जो अपनी चचेरी, ममेरी बहनों की खूब बातें बताती है, इधर उसकी कजिन्स तो कभी भूलकर भी याद नहीं करतीं या कहें वह ही नहीं करती. कल दोनों बहनों को पत्र लिखे जून ने भी, वे यकीनन खुश होंगीं.