Sunday, October 9, 2016

जाप साहिब का पाठ


सूर्य की किरणें इस डायरी को छू रही हैं और उसके भीतर भी भर रही हैं ऊष्मा, ताप और सृजन करने की क्षमता ! इस क्षण और आज सुबह से हर क्षण अपनी अनंत क्षमता का अहसास उसे अनुप्राणित किये हुए है, उनके भीतर अपार सम्भावनाएं हैं. उनमें से हरेक ब्रह्म का अधिकारी है, तृप्त है, आनन्द से भरा है और अपने भीतर का प्रेम व शांति इस जगत के लिए बाँट सकता है. दोनों हाथों से उलीचे तो भी खत्म न हो इतना वह अपने भीतर भरे है ! आज वर्षों पूर्व लिखी एक कविता हिन्दयुग्म में भेजी. सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, जागते ही तिरोहित हो गया. ऐसे ही तो जीवन में आने वाली हर परिस्थिति एक स्वप्न ही है, जागकर देखें तो एक खेल ही लगता है सब कुछ. परसों मृणाल ज्योति में बीहू का उत्सव है, जून और उसे बुलाया है. सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल को जा रहा है, शाम के सत्संग की तयारी उसने कर ली है. एक फोन की उसे प्रतीक्षा थी, नहीं आया, एक बच्ची का फोन, हिंदी का कक्षा कार्य करने में उसे सहायता चाहिए थी. परसों एक संबंधी का जन्मदिन है, फेसबुक ने याद दिलाया, उसने एक कविता लिखी. आज उसने गुरु माँ द्वारा ‘गुरू गोविन्द सिंह जी’ के प्रकाशपर्व पर जाप साहिब का पहला भाग सुना. उन्होंने कहा ‘मानव मन यदि समाधि का अनुभव कर ले तो भी उसके भीतर अदृश्य इच्छाएं रहती हैं, जो समाज के हित में लगने के लिए प्रेरित करती हैं. सारी कामनाओं का त्याग कर ऋषि जंगल में जाता है पर पूर्ण सत्य का साक्षात्कार कर पुनः समाज में लौटता है. समाज को कुछ देने के लिए, ऊर्जा तो उसके भीतर पहले की तरह ही है बल्कि कहीं ज्यादा’. उससे भी परमात्मा कुछ कराए इसके लिए वह तैयार है. उसकी शक्ति व्यर्थ न जाये, उसकी श्वासें इस जगत के लिए हों. उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, जो सदा ही उसकी प्रार्थना का उत्तर देते आये थे, उसके पास जो कुछ भी, उस पर सबका अधिकार हो..प्रकृति जिस तरह लुटाती है, संत जिस तरह लुटाता है, उसके अंतर का प्रेम भी सहज ही प्रवाहित होता रहे !    

आज सुबह समाधि के लिए मन को पंच क्लेशों से मुक्त करने की बात सुनी. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष व अभिनिवेष ये पांच क्लेश उनके मन को पंचवृत्तियों में भटकाते रहते हैं. पंच वृत्तियाँ (अनुमान, आगम, प्रत्यक्ष), स्वप्न, निद्रा, निरुद्द्ध और एकाग्र ! इस क्षण उसका मन समाहित है, फोन आ गया सो ध्यान से उठना पड़ा. कल लोहड़ी है. तैयारियां हो रही हैं. उत्सव उनके एकरस जीवन में नया रंग भरते हैं. शाम को वे आग जलाएंगे और स्वयं तथा मेहमानों के लिए खिचड़ी, आलू, खट्टी-मीठी चटनी बनायेंगे. जून ढेर सारा सामान जो अहमदाबाद से लाये थे, वह भी रहेगा तथा गाजर का हलवा. वही लेकर वह मृणाल ज्योति भी जाएगी. दीदी, तथा छोटी बहन भी अपने-अपने घरों में यह उत्सव मना रहे हैं. मकर संक्रांति पर लिखी कविता भी उसने सभी को भेजी.

आज कितने सुंदर शब्द सुने –
केसर, कस्तूरी, पुष्प और स्वर्ण सभी को भाते हैं, वैसे ही संतों की ज्योति भी सभी को भाती है.
घी और रेशमी वस्त्र सभी को भाते हैं, भक्त भी सभी को प्रिय होते हैं.
मन प्याला है और परमात्मा के नाम का रस उसमें भरा है.
मृत देह की चषक बनी ज्यों मृत मन का बनता प्याला !

तन में रंग लगा माया का, प्रेम का रंग चढ़े फिर क्योंकर ?
चेतनता आरूढ़ जीव पर, जीव चढ़ा अहंकार पर.
अहंकार है बुद्धि ऊपर, बुद्धि मन पर रही विराजे.
मन चलता है प्राण रथों पर, प्राण इंद्रियरूपी रथ पर.
इन्द्रियां देह पर करें सवारी, देह भूतों से बनी हुई है.

कभी गगन में चमके दिनकर, कभी घोर अँधेरा छाता.
कभी धुआं, कोहरा धुंधलका, कभी चमकती बिजली पल-पल.
रिमझिम बादल बरसा करते, कभी बर्फ के पत्थर पड़ते.
तरह-तरह के शब्द गरजते किन्तु नभ ज्यों का त्यों रहता.
बाढ़ की विभिषका आये, भूचाल भूमि थर्राए.
कितनी उथल-पुथल हो जाये पर वह निर्विकार सदा सम.

ऐसे ही उस परम सत्ता में कुछ भी अंतर आ नहीं सकता.


Friday, October 7, 2016

क्लब में नृत्य

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आज सुबह जून का फोन आया दो बार, दोनों बार अन्य फोन आ गये सो बात पूरी नहीं हो सकी, वैसे भी बात पूरी हो ही कहाँ पाती है, जीवन की संध्या आ जाती है. मृत्यु शैया पर पड़ा व्यक्ति भी यही सोचता है कि कितनी बातें अनकही रह गयीं. उसे तो आज ही, इसी क्षण ही सबसे हिसाब-किताब खत्म कर लेना है, कोई लेन-देन शेष नहीं रखना, परमात्मा, आत्मा, सद्गुरू, चारों दिशाओं और सभी देवी-देवताओं, पूर्व के स्द्गुरूओं, भावी बुद्धों सभी को साक्षी बनाकर इस क्षण वह घोषणा करती है कि आज के बाद से उसकी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है और वह अपने हृदय की समस्त मंगल कामनाएं उन्हें देकर स्वयं को भी मुक्त करती है. क्योंकि वह जो वास्तव में है वह निर्विकार तत्व है, वह न कुछ ग्रहण कर सकता है न कुछ दे सकता है, प्रारब्ध वश जो भी आगे जीवन चलेगा, उससे उसका क्या संबंध है ? मन, बुद्धि, संस्कार के द्वारा जीवन में जो घटेगा, वह सभी के हित में हो यही प्रार्थना है, यह लिखना भी तो इन्हीं के द्वारा हो रहा है, सात्विक बुद्धि के द्वारा ही यह सम्भव है. आज सभी परिजनों वे सखियों के फोन आये. दीदी का फोन नहीं आया, शायद अभी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ होगा, उसने बात की तो ऐसा ही था. सुबह सद्गुरू को देशी-विदेशी मेहमानों के सामने सहजता से सवालों के जवाब देते सुना. कह रहे थे भीतर कितनी शक्तियाँ छिपी ह्युई हैं, साधना के बल पर कोई उन्हें जागृत कर सकता है, योग के हजारों चमत्कार हैं. कम से कम अपने तन-मन को पूर्णतया स्वस्थ व प्रसन्न रख सके, इतना तो हरेक का कर्त्तव्य है !  

कुछ देर पहले एक सखी के घर गयी, उसकी बहन आई हुई है, जो कई वर्ष पूर्व भी आई थी जब छात्रा थी. उसके पुत्र ने लैपटॉप में डाली कुछ तस्वीरें दिखायीं, दोनों बहनों की बच्चियां सगी बहनें लग रही थीं. जून कुछ ही देर में आने वाले हैं. कल क्लब में मैराथन का पुरस्कार लेने वह नहीं जा सकी, आने वाले कल की दोपहर को विशेष भोज है, उसे टेबल ड्यूटी मिली है, इसी बहाने कई लोगों से मुलाकात भी हो जाएगी. आज जून के लिए लिखी एक कविता ब्लॉग पर डाली, ‘तुम्हारे लिए’. चर्चा मंच पर भी ली गयी है, उसे अपने ब्लॉग पर चर्चा मंच का लिंक डालना सीखना चाहिए. दोपहर को साहित्य अमृत पढ़ा, गन्ना खाया, यानि कुछ तन के लिए कुछ मन के लिए. आत्मा के लिए वैसे भी कुछ करना नहीं है, साक्षी भाव में रहना है, जो हो रहा है, उसे देखते जाना है. सतो, रजो व तमो गुण के कारण ही मन, बुद्धि इन्द्रियां आदि अपना कार्य करते हैं, ये प्रकृति हैं और आत्मा शिव तत्व है. वे चैतन्य हैं लेकिन जड़ के साथ एक होकर स्वयं को सुखी-दुखी मानते हैं. साक्षी भाव में आते ही सब बदल जाता है. पंच क्लेश मंद हो जाते हैं, पंच विकार भी कम होने लगते हैं, एक सन्नाटा छाने लगता है भीतर !

कल क्लब में उसने इतने वर्षों में पहली बार नृत्य किया, कई सारे अंग्रेजी गानों की धुनों पर, गीत तो समझ में नहीं आ रहे थे पर संगीत अच्छा था, भीतर नृत्य उमग आया है, ड्यूटी भी दिल लगाकर की, लोगों को भोजन परोसना एक अच्छा काम है, खाना बना भी अच्छा था, खाया भी और घर आके कुछ हुआ भी नहीं. मौसम यहाँ बहुत सुहावना है, उत्तर भारत में सर्दी ने रिकार्ड तोड़ दिए हैं. नन्हे के लिए जून ने ढेर सारी गजक व खजूर आदि भेजी है, चार-पांच दिनों में उसे मिल जाएगी. माँ ने आज फिर टीवी बंद किया और उसने उनसे कारण पूछा. आदत बदलना कितना मुश्किल है, जून को भी जोर से बोला, वह उसकी बात को यूँही उड़ा देते हैं, पर उसे अपनी वाणी पर जरा भी संयम नहीं है, जब बात मुँह से निकल जाती है, तब होश आता है, पर इतना होने पर भी क्योंकि भीतर कर्ताभाव नहीं है, परमात्मा की कृपा का अनुभव निरंतर होता रहता है. कभी-कभी तो आश्चर्य होता है, पर परमात्मा असीम है, उसकी करुणा भी असीम है, असीम है उसकी दयालुता, उनकी कमजोरियां कितनी भी हों उसकी कृपा से तो कम ही होंगी ! जीत उसी की होगी, ध्यान की समझ भी आने लगी है, भीतर जब समरसता हो, शांति का अनुभव हो तो मन ध्यानस्थ ही होता है, एकाग्रता उसका परिणाम है. जून भी अपने लिए एक डायरी लाये हैं, एक नन्हे को भेजी है. डायरी में लिखने के लिए कितना कुछ है, नये-नये शब्द, नये विचार तथा नये अनुभव ! बहर माली काम करता हुआ पिताजी से बातें कर रहा है, वह पानी डाल रहे हैं, फूलों को जरूर उन दोनों का स्नेह पसंद आता होगा !  

Thursday, October 6, 2016

नये वर्ष के कार्ड्स


आज सुबह-सुबह टीवी पर एक आचार्य जी से (नाम याद नहीं है ) पतंजलि योग सूत्रों की अद्भुत व्याख्या सुनकर मन स्थिर हो गया. द्रष्टा जब अपने आप में स्थित हो, मन समाहित हो, बुद्धि स्थिर हो तो क्षणांश के लिए उस स्थिति का अनुभव होता है. वहाँ से आने के बाद अपूर्व शांति और आनंद सहज ही भीतर उत्ताल तरंगों की भांति व्यक्त होता है. दोपहर को एक कविता की पंक्तियाँ बार-बार मन में आ रही थीं पर अब वह स्मृति खो गयी है, संकल्प जाने कहाँ से उठते हैं फिर विलीन हो जाते हैं, जो संकल्प वे अपने बोध में उठाते हैं वे उनके भाग्य का निर्माण करते हैं. नये वर्ष में एक लक्ष्य तो है वजन घटाना जो पिछले वर्ष बढ़ गया है. घर की साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देना है और सेवा के कार्यों को तरजीह देनी है. जून कुछ कार्ड्स लाये हैं, उसने सोचा उन्हें यहीं उन लोगों को देगी जिनसे उनका वास्ता पड़ता है. लाइब्रेरियन, को-ओपरेटिव मैनेजर, बैंक मैनेजर, मृणाल ज्योति आदि आदि..नैनी अभी अस्पताल में है, उसका आपरेशन कल होगा. दो सखियों के बच्चे छुट्टियों में अपने-अपने घर आये हुए हैं, न मिलने आये, न फोन ही किया. बच्चों की अपनी एक दुनिया होती है जिसमें उनके माता-पिता भी नहीं जा सकते फिर अंकल-आंटी तो दूर की बात है. आत्मा रूप से देखे तो वे भी वह स्वयं ही है, जो निकट ही है, उससे कैसी दूरी और कैसी निकटता. उसके अंतर का स्नेह सदा उन्हें मिलता रहे. आमीन !

आज छोटी भाभी का जन्मदिन है, उसके लिए एक कविता भेजेगी. उसने अंग्रेजी में एमए किया है, गाने तथा चित्रकला का शौक है या था. सुंदर है, लम्बी है, गोरी है, रंग ऐसा जैसे दूध में चन्दन व हल्दी मिलायी हो. पढ़ने का शौक है, घर का काम दक्षता से करती है. तीन बहनों में सबसे बड़ी है. आज फिर सासुमाँ ने उसके कमरे में आकर टीवी बंद कर दिया, उन्हें शायद आवाज से भी डर लगने लगा है. जब उसने पूछा, आपने क्यों बंद किया तो कहने लगीं, कमरे में कोई नहीं था. एक सखी से बात की फोन पर, उसकी मौसेरी बहन की कल मृत्यु हो गयी जो बीमार थी. दीदी को भी ज्वर हो गया है. बड़ी ननद की बेटी दुखी है, उसकी बात पक्की होते-होते टूट गयी है. घर से खबर आई, जून की मासी का देहांत हो गया है, एक-एक कर सभी को जाना है, कोई पहले, कोई बाद में जाने ही वाला है. चारों और से मृत्यु, अस्वस्थता और दुःख के समाचार ही आते हैं, उनके भीतर ही जन्नत हो सकती है यदि हो तो, बाहर तो उसके ख्वाब ही देखे जा सकते हैं. जीवन सम्भवतः इतना जटिल पहले कभी नहीं था, अथवा तो हर युग के अपने कुछ दुःख होते हैं. इस वक्त वह बाहर लॉन में झूले पर बैठी है, इस कोने में धूप देर तक रहती है. गुलदाउदी के कुछ फूल वर्षा में खराब हो गये हैं, उन्हें अलग करना है. कल चार डीवीडी लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग के, उनके पड़ोसी टीचर हैं एओल के. कुछ वर्ष पूर्व ऐसा होने पर वे स्वयं को भाग्यशाली मानते, पर अब जून को ज्यादा रूचि नहीं रह गयी है, वह भी अब सत्संग व क्रिया घर पर ही करती है. गुरुजी से कोई दूरी अब लगती नहीं. जून कल तीन दिनों के लिए अहमदाबाद जा रहे हैं. परसों उनके विवाह की सालगिरह है. उन्हें अब इस रिश्ते में दूसरे कई पहलू नजर आने लगे हैं, प्रेम, विश्वास, भरोसा, मित्रता और एक साहचर्य की भावना, देह से ऊपर मन व आत्मा के स्तर पर वे जुड़ गये हैं. अब इस रिश्ते की नींव बहुत गहरी हो गयी है. कुछ वर्ष पूर्व, कई वर्ष पूर्व उसे इसकी चूलें हिलती नजर आई थीं. वैसे मन का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, मन के साथ रहना तो ऐसा ही है जैसे कोई अपने शत्रु के साथ एक ही घर में रह रहा हो !



Wednesday, October 5, 2016

पित्ताशय में पथरी


आज शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसे दो कविताएँ पढ़नी हैं. नेट नहीं चल रहा है आज, कुछ देर ‘गीतांजलि’ के भावानुवाद के कुछ भाग को टाइप किया. नेट न होने से कुछ देर बुरा लगा, फिर खुद को समझाया, अपना लक्ष्य तो एक ही है, और वह है परमात्मा की प्राप्ति, उस एक लक्ष्य में जो सहायक है उसे करना व जो बाधक है उसे छोड़ते जाना ही बुद्धिमत्ता है, उसे लगता है अहंकार की पुष्टि के सिवा अभी उसके लिए नेट का क्या उपयोग है. कविता पोस्ट करना फिर उस पर आये कमेंट्स को पढ़ने की आकांक्षा, यह अहंकार की पुष्टि ही हुई. जो भी होता है उसमें कुछ न कुछ अच्छाई छिपी होती है. परमात्मा की ओर उन्मुख होने में जो भी सहायक हो वही वन्दनीय है, अस्तित्त्व चाहता है कि उसके मन, बुद्धि पावन हों, वह उसके द्वारा प्रकट हो. जीवन का एक-एक क्षण कितना अनमोल है और हर क्षण वह उनके साथ ही है, बस नजर उठाने भर की देर है !

आज सुबह एक सुंदर अनुभव हुआ, अब स्वरूप में मन टिकने लगा है. पढ़ा था कितनी बार जैसे एक छोटा सा अवरोध विस्तीर्ण गगन को ढक लेता है, वैसे ही छोटी सी वृत्ति आत्मा को ढक लेती है, आत्मा जस की तस रहती है, उसका कुछ आता-जाता नहीं है, उसे घटते हुए देखा, कितना सुकून है इस अहसास में. उस क्षण भीतर मौन पसर जाता है, कुछ भी जानना, पाना, चाहना शेष नहीं रहता, जीवन एक खेल बन जाता है. एक स्वप्न कहें या खेल..आज शाम को पब्लिक लाइब्रेरी जाना है, जहाँ इस वर्ष एक बार भी नहीं गयी, आज संयोग बना है, एक वरिष्ठ सदस्य की विदाई है. कल मृणाल ज्योति भी जाना है, कम्पनी में पेट्रोलियम सेक्रेटरी आ रहे हैं. उनकी पत्नी कल शाम को वहाँ जाएँगी, स्कूल देखना चाहती हैं. आज नेट चला पर समय सीमा निर्धारित कर दी है. कल वर्ष का अंतिम दिन है, जाते-जाते इस वर्ष वर्ष की विदाई के रूप में नये वर्ष की शुभकामना की कविता लिखेगी. एक बार फिर जीवन को नये अंदाज में जीने का संदेश देने नया वर्ष आया है. नये साल में बहुत कुछ नया करना होगा. जीवन को एक नये अंदाज में जीना होगा, क्योंकि अब मार्ग मिल गया है, सो किस तरह समय का अच्छे से अच्छा उपयोग हो सके, अपनी ऊर्जा का और अपनी योग्यता का इसका ही प्रयास करना है ! अभी-अभी पता चला, नैनी के गॉलब्लैडर में पथरी है, इसलिए उसे इतना दर्द होता है, आपरेशन करवाना पड़ सकता है. वह पिछले कई दिनों से शिकायत कर रही थी. नया वर्ष उसके लिए भी स्वास्थ्य लायेगा.   



Tuesday, October 4, 2016

सलाद पत्ता


आज उसने ब्लॉग पर यीशू पर लिखी एक कविता पोस्ट की है, जिसे और भी कुछ लोगों को भेज सकती है, फेसबुक पर भी. हिन्दयुग्म, हिंदी कविता, सरस्वती सुमन, ऋशिमुख, साहित्य अमृत, नन्हे, पिताजी सभी को भेज सकती है. प्रिंट करके स्थानीय स्कूल के फादर को भी दे सकती है. बड़ी ननद की बड़ी बेटी के लिए जो कविता लिखी थी, उसे भी भेज देना ठीक रहेगा, उसकी शादी की बात पक्की हो गयी है. आज गुलदाउदी के गमले घर के द्वार पर सजाये हैं, घर से निकलते, प्रवेश करते उन पर नजर पड़े और दिल महक जाये, फूल खुदा की खबर देते हैं !

आज क्रिसमस है. सुबह जल्दी उठी, प्राणायाम आदि किया. आज जून ने मेथी का पुलाव बनाया है अभी सलाद पत्ता लेने बाहर बगीचे में गये हैं. क्रिसेन्थमम के फूल घर से निकलते ही दिखाई देते हैं, सुंदर हैं, ऐसे ही जब उनकी आत्मा की कली खिल जाती है तो वे भी फूल बन जाते हैं, उनकी मुस्कान तब कोई नहीं छीन सकता, सारे विरोध समाप्त हो जाते हैं, सारी वासनाएं मिट जाती हैं, कामना का अंत हो जाता है और भीतर एक रस शांति का अनुभव होता है !


आज वह लेडीज क्लब की एक सदस्या से मिलने गयी थी. उनके पैर में प्लास्टर लगा था, बरामदे में बैठी थीं. उनके लिए भी एक कविता लिखी, कल सेक्रेटरी के लिए लिखी थी. पिताजी आज बहुत दिनों बाद टहलने गये. यह वर्ष बीतने को है. नये वर्ष में उसे अपने ब्लॉग को भी बदलना है. आज सुबह अभी नींद में ही थी कि एक सुंदर दृश्य दिखा, वह स्वप्न नहीं था, ध्यान की एक अवस्था थी, सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था. अचानक भाव उठा कि सद्गुरु ऐसे ही सब घटनाओं के बारे में जान जाते होंगे, तभी उन्हें सर्वज्ञ कहते हैं. वह साधक के मन की बातें भी यदि चाहें तो जान सकते हैं. श्रद्धा से मन भर गया और कुछ देर वहीं बैठी रही. न ठंड का अहसास हो रहा था न ही कहीं दर्द या असुविधा का. सद्गुरु का आश्रय लिया है उस शिव तत्व ने, उनका मन स्फटिक सा शुद्ध है, वह परमात्मा ही हो गये हैं अथवा तो हैं, इस भाव को तीव्रता से अनुभव किया. सुबह नौ बजे तक मन इसी भाव दशा में रहा. उनकी उपस्थिति का अहसास इतनी शिद्दत से हुआ. बाद में घर के कामों में वह भाव लुप्त हो गया. अभी-अभी चंपा की गंध आई एक पल के लिए...वह परम उनके द्वारा प्रकट होना चाहता है. वे हर तरह से उसमें बाधा देते हैं. अहंकार, लोभ, मोह, काम, क्रोध, दम्भ और न जाने कितने-कितने अवरोध रास्ते में खड़े कर देते हैं अन्यथा तो वह सदा उपलब्ध है, उपलब्ध ही नहीं वह आतुर भी है, बात एकतरफा नहीं है, एकतरफा यदि हो भी तो उसकी तरफ से ही है, उनमें न वह शक्ति है न वह आतुरता !

Friday, September 30, 2016

माइक्रोवेव में बैंगन


इस समय दोपहर के सवा तीन बजे हैं. आज दो परिचितों के जन्मदिन हैं. घर पर भतीजी का और यहाँ एक मित्र का. भतीजी के लिए कल कविता लिखी थी, शायद उसने पढ़ी हो. जवाब नहीं दिया..  यही तो बंधन है, कर्म बांधता है यदि करने के बाद भी उसकी स्मृति बनी रहती है. उसे फूलों का एक गुलदस्ता भी बनाना है, शाम को मित्र परिवार से मिलने जायेंगे वे. बिना किसी अपेक्ष के किये गये कृत्य उन्हें मुक्त करते हैं, अपेक्षा ही गुलाम बनाती है. इस सत्य को जितना शीघ्र हृदय में अंकित की लें उतना ही कल्याण होगा. नये वर्ष में नई तरह से जीना होगा ! आज भी ध्यान टिका, पर उसके पूर्व मन में विचारों का प्रवाह था, गुरूजी का सूत्र अब समझ में आने लगा है – ध्यान में वह कुछ भी नहीं है, उसे कुछ भी नहीं चाहिए, उसे कुछ भी नहीं करना है. जून का फोन आया, उन्हें रात्रि भोजन ऑडिटर के साथ गेस्टहाउस में ही करना है.

अभी-अभी उन बुजुर्ग आंटी से बात की, उसके पूर्व उस सखी से जो उनकी बहू है. सब नाटक जैसा लगता है. उनका स्वयं का जीवन भी तो कैसा अलग दीखता है अब. आत्मा का अनुभव जब दृढ़ हो जाता है, ‘हस्तामलक’ तो जीवन बिलकुल बदल जाता है. बुद्धि जो पहले जगत की तरफ दौड़ती थी, अब आत्मा में विश्राम करना चाहती है, उसकी दौड़ खत्म हो गयी है. प्रशंसा व निंदा का कोई महत्व नहीं रह जाता क्योंकि ये जिस मन, बुद्धि से आये हैं वे अनात्मा हैं, यानि माया है, यानि मिथ्या है, यानि उसका क्या महत्व. जैसे हीरे के आगे कंकर व्यर्थ है वैसे ही आत्मा के आगे अनात्मा व्यर्थ है. मौन ही जिसका स्वभाव हो जो स्वयं में पूर्ण हो, जो स्वयं आनंद ही हो, ज्ञान ही हो, प्रकाश ही हो उसे कोई जाकर कहे भी कि तुम ज्ञान हो तो वह क्या हर्षित होगा, वहाँ हर्षित अथवा दुखित होने वाला कोई बचा ही नहीं, माया का साम्राज्य वहाँ नहीं है, फिर उसकी भाषा वहाँ नहीं चलती. सद्गुरु के लिए लिखी उसकी सारी कविताएँ व्यर्थ हैं, उनकी नजर में और इस वक्त उसकी दृष्टि में भी, वहाँ एक ही भाषा का काम है, वह है मौन की भाषा..बुद्धि अब टिकना चाहती है, न जाने कितने जन्मों से यह दौड़ रही थी, मंजिल के करीब आ गयी है, वृत्ति सारुप्य के अनुसार कभी ‘आत्मा’ ‘अनात्मा’ में लीन हो जाती है तो कभी ‘अनात्मा’ ‘आत्मा’ में, पहली स्थिति में संसार है तो दूसरी स्थिति में निर्वाण ! एक स्थिति ऐसी भी आती है जब पूर्व के सब संस्कार नष्ट हो जाते हैं और शेष रहता है एकछत्र आत्मा का साम्राज्य. मन, बुद्धि भी निर्मल हो जाते हैं, निमित्त मात्र बन जाते हैं, अहंकार बस व्यवहार मात्र के लिए रह जाता है, भीतर कोई एषणा नहीं बचती. न कुछ पाना है, न कुछ करना है और न कुछ जानना है, ध्यान के सूत्र सारे जीवन पर फ़ैल जाते हैं. वे प्राप्त-प्राप्तव्य, कृत-कृतव्य तथा ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाते हैं, तब सही मायने में आत्म साक्षात्कार होता है, ऐसा दिन भी शीघ्र आएगा..परमात्मा है, सद्गुरु है और आत्मा है, तीनों मन व बुद्धि को पावन करना चाहते हैं..

अज शाम को एक सखी के यहाँ जाना है. ब्लॉग पर अनुपमा पाठक ने ‘गीताजंलि’ पर अपनी टिप्पणी भेजी है. अंततः उनके जीवन में प्रेम ही महत्वपूर्ण होता है, उनके मन में सभी के लिए प्रेम, सारी सृष्टि के लिए..पिता जी लॉन में पानी डाल रहे हैं. माँ बाहर बरामदे में बैठी हैं. जून अभी दफ्तर से आये नहीं हैं. सुबह आधा घंटा ध्यान किया, खुद का भी पता नहीं चला, लेकिन जाने कहाँ से विचार आ तरहे थे, पूर्व संस्कार उदित हो रहे थे, ध्यान में संस्कार नष्ट हो जाते हैं. सम्मान पाने की आकांक्षा, कुछ होने की आकांक्षा कितनी कूट-कूट कर भरी होती है मन में, ब्रह्म ने, परमात्मा ने अथवा तो आत्मा ने प्रकृति का संग किया और अहंकार का जन्म हुआ, बस वहीँ से आरम्भ हो गयी लालसा कुछ कर दिखाने की, कुछ पाने की, जबकि वह स्वयं में पूर्ण है, वह खुद ही पूर्ण है यह भूल जाता है, अपने पद से नीचे उतर जाता है और फिर उसे खोजता है जगत में. इस खोज में पीड़ित होता है, शंकित होता है, दुखी होता है, भीतर द्वेष पालता है, उद्व्गिन होता है पर उसकी लालसा का अंत नहीं होता. आज पहली बार माइक्रोवेव में बैंगन भून रही है, उनकी दूसरी ओवन ठीक से काम नहीं कर रही. मंझले भाई-भाभी के लिए कविता लिखी है, स्वान्तः सुखाय:, उन्हें भी ख़ुशी दे जाएगी अवश्य ही, पर इसके लिए वे कुछ कहें ऐसी कोई लालसा नहीं रखनी है. ओशो कहेंगे लालसा रखनी है या नहीं रखनी है, ये दोनों एक ही बाते हैं, नहीं रखने में रखने का भाव आ ही गया. दोनों से ही छूटना है. हर हाल में उसकी ही रजा माननी है. जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा होगा !   

  


Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..