Showing posts with label नृत्य. Show all posts
Showing posts with label नृत्य. Show all posts

Thursday, November 26, 2020

जामुनी फल

 

वही कल का समय है. आज अफ़ग़ानिस्तान-वेस्टइंडीज के मध्य मैच चल रहा है. कल पाकिस्तान का मैच है जिसे विश्व कप फाइनल में पहुंचने के लिए बांग्लादेश को 350 रन से हराना होगा, जो एक असम्भव कार्य है. चीन का सस्ता सामान भारत में बिक रहा है जिससे यहां के व्यापारियों को नुकसान हो रहा है, इस मुद्दे को आज के तेनालीरामा में दिखाया जा रहा है, शायद यह समस्या उन दिनों भी रही हो. आज योग साधिकाओं ने शिव तांडव पर नृत्य किया. दिन भर की गर्मी के बाद उसी समय तेज बौछार भी पड़ने लगी, जैसे प्रकृति भी उनके आनंद में सम्मिलित होने आ गयी हो. एक साधिका का जन्मदिन था, वह मिष्ठान लेकर आयी थी, उसे वह लाल कोटा की साड़ी उपहार में दी, जो स्कूल से विदाई के समय उसे मिली थी. सभी को जामुन भी दिए, मीठे और जामुनी रंग के रसीले फल, जो इस वर्ष दोनों पेड़ों में बहुतायत से हुए हैं. जून को नैनी के घर से मछली की गंध ने कल रात्रि परेशान किया, नूना की सूंघने की क्षमता शायद घट गयी है या किसी दिव्य गंध की अनवरत उपस्थिति से उसे जरा भी असुविधा नहीं हुई. जीवन कितना रहस्यों से भरा है न ! सुबह परिवार के एक सदस्य के अवसाद के बारे में व्हाट्सएप पर एक सन्देश देखा, अवसाद से शरीर भी अस्वस्थ हो गया है. उससे फोन से बात की. अन्य सभी को बताने के लिए पारिवारिक ग्रुप पर भी लिख दिया, सभी ने उसके स्वास्थ्य की कामना की, फोन किया, जो मिलकर आ सकते थे, वे गए भी. ऐसे वक्त में ही परिवार के महत्व का पता चलता है, हृदय से निकले हुए सहानुभूति और अपनत्व के शब्द मन को हल्का कर देते हैं. जीवन में बहुत कुछ सहना पड़ा है उसे, किसी को भी सहना पड़ सकता है, फिर भी परमात्मा पर अटूट विश्वास सारे दुखों से पार ले जा सकता है. छोटे भाई के गॉल ब्लैडर के ऑपरेशन का भी पता चला. एक दिन दफ्तर में उसे तेज दर्द हुआ, स्टोन काफी दिनों से था.  


आज नई सरकार का पहला बजट पहली बार महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया. विपक्ष उसका विरोध कर रहा है, उन्हें सदा की तरह सरकार से कई मुद्दों पर शिकायत है. सुबह एक परिचिता के यहाँ गयी, जहां गुरु ग्रन्थ साहिब का अखंड पाठ  चल रहा था, पूरे अड़तालीस घण्टे चलने वाला था. बताया गया, पाँच पाठी होते हैं और हर कोई दो घण्टे तक पाठ करता है. यदि मध्य में किसी को कोई परेशानी होती है तो अन्य पाठी उसकी जगह दस मिनट के लिए पाठ करता है. 


आज का इतवार भी बीत गया, अब गिने-चुने इतवार रह गए हैं उनके पास असम में. शाम को छोटी ननद से बात हुई, ननदोई का तबादला भदोही हो गया है, ट्रेन से अप डाउन करेंगे. नन्हे का जन्मदिन आने वाला है, उसके लिए लड्डू बनाये और चिवड़ा-मूंगफली जो उसे बहुत पसन्द है, उसी दिन जून बंगलूरू जा रहे हैं.  शाम को उन्हें एक विवाह के रिसेप्शन में जाना है. लौटने में दस भी बज सकते हैं. कल वह कुछ सखियों को घर पर बुला रही है, जिनके साथ इतने वर्षों तक कितने ही आयोजनों में भाग लिया. आज दोपहर को कल की लन्च पार्टी के लिए कोफ्ते बनाये और बड़े भी. शाम को जून ने सांगरी की सब्जी बनाई. कल वे कुछ गेम्स भी खेलने वाले हैं. भारत सेमी फाइनल हार गया. अब विश्वकप के लिए चार वर्षों का इंतजार करना होगा. आज बहुत दिनों के बाद कश्मीर पर एक कार्यक्रम देखा, गाँवों की तरक्की के लिए सरकार पंचायतों को सीधी मदद दे रही है. वहां के युवा भी सेना और पुलिस में भर्ती होने के लिये आगे आ रहे हैं. धरती का स्वर्ग कहा खजाने वाला यह भूभाग पुनः शांति और समृद्धि का समय देखे हर भारतीय की यही कामना है. पाकिस्तान को एक न एक दिन इस सत्य को स्वीकारना होगा कि भारत से मित्रता करके ही उसका लाभ है. नन्हे के जन्मदिन पर लिखी कविता की पिताजी ने तारीफ की और बहुत सुंदर शब्दों में प्रतिक्रिया लिखी. उनकी भाषा बहुत अच्छी है और भावनाओं की गहरी समझ भी है, आत्मा की झलक जिसे मिली हो वह गहराई तक महसूस भी कर सकता है और व्यक्त भी कर सकता है. 


कालेज के उन दिनों में जब महादेवी वर्मा की ‘प्रतीक्षा’ पढ़ी थी, उसकी कुछ पंक्तियाँ भा गयीं- 


जब इन फूलों पर मधु की 

पहली बूँदें बिखरी थीं 

आँखें पंकज की देखीं 

रवि ने मनुहार भरी सीं

.....


वे कहते हैं उनको मैं

अपनी पुतली में देखूं 

यह कौन बता जाएगा 

किसमें पुतली को देखूँ ?


Friday, June 15, 2018

विश्व सांस्कृतिक समारोह



सुबह आँख जल्दी खुल गयी थी, यहाँ छह बजे तक अँधेरा रहता है. कुछ देर ध्यान किया, ‘अपने’ घर तक यात्रा की जो उनका वास्तविक घर है. यह संसार तो कुछ पलों का ही खेल है. उस लोक में जाना अब पलों में घट जाता है. इस संसार से कोई मोह न रहे तभी ऐसा होता है, शास्त्रों में कितना सही लिखा है, वैराग्य में कौन सा सुख नहीं है. आज ही समारोह है, जिसके लिए वह आई है. एनजीटी  ने पांच करोड़ का जुरमाना लगाया है पर गुरूजी कहते हैं वे नहीं देंगे. असम का आर्ट ऑफ़ लिविंग का दल दिल्ली पहुंच गया है. उत्सव स्थल की तस्वीरें व्हाट्सअप ग्रुप पर डाल दी गयी हैं. एक घंटे बाद उन्हें यात्रा के लिए निकलना है.

दो बजे वे दिल्ली स्टेशन पहुंचे. दो मेट्रो बदल कर घर पहुंचे और भोजन किया जो भाभी ने साथ में दिया था पर ट्रेन में नहीं खा सके. तीन बजे घर से निकले, द्वारिका के सेक्टर बारह के मेट्रो स्टेशन पहुंचे, जहाँ लोगों की बहुत भीड़ थी. डेढ़ घंटे बाद ‘मयूर विहार एक्स्टेंशन’ पहुंचे, वहाँ भी भीड़ का वही आलम था, बाहर निकले तो वर्षा आरम्भ हो गयी. कुछ देर रुककर थमने की प्रतीक्षा की फिर चल पड़े. कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते पर ढाई-तीन किमी भीड़ में धीरे-धीरे चलते हुए यमुना तट पर आर्मी द्वारा बनाया गया पुल पार किया. आयोजन स्थल पर आये तो कुर्सियां भीगी हुई थीं, उन्हीं पर बैठे पर स्टेज से काफी दूर बैठे थे सो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और सामने बैठे लोग खड़े हो गये थे. मंत्रोच्चार सुना, फिर कथक नृत्य हुआ, पर मन अधिक उत्साहित नहीं था, थके पैर, भीगे वस्त्र, ठंडी हवा चल बह रही थी, सो सोचा वापस ही चलते हैं. इतनी यत्नपूर्वक की गयी यात्रा के बाद फिर वैसी ही भीड़ में वापसी की यात्रा..कीचड़ भरे रास्ते पर नृत्य करके आते हुए कलाकार भी चल रहे थे. सुंदर वस्त्र पहने, घाघरा जरा सा टखनों से ऊपर कर नंगे पावों चलती छोटी-छोटी लडकियों को देखकर उन पर करुणा आ रही थी, पर वे सब उत्साह से परिपूर्ण थीं. गुरूजी ने सबको एक अनोखे जोश से भर दिया है. सारे कष्ट सहते हुए भी सभी हंसते रहते हैं. दुनिया के १५५ देशों के कलाकार और प्रतिनिधि आए हैं या इसे देख रहे हैं. अद्भुत कार्यक्रम है यह अपने आप में अनोखा. घर पहुंचे तो पौने दस बज चुके थे, भीगे वस्त्र बदले और गर्म-गर्म चॉकलेट वाला दूध पिया. चीज का परांठा खाने में बनाया, फिर एक घंटे बाद ही नींद आई. 

पौने तीन बजे हैं. वे विश्व सांस्कृतिक समारोह के लिए बनाये गये विशाल आयोजन स्थल पर आ चुके हैं. सामने विशाल स्टेज है, जिस पर रिहर्सल चल रही है. नेपाल का नृत्य हुआ, फिर घूमर नृत्य, इस समय जर्मनी की रिहर्सल चल रही है जो एक समूहगान गा रहे हैं. हजारों लोग अभी से आ चुके हैं. शाम होते-होते सभी कुर्सियां भर जाएँगी. साढ़े ग्यारह बजे वे घर से निकले थे, कल शाम भर वे सब मिलकर टीवी पर कार्यक्रम का लाइव प्रसारण देखते रहे. अभी-अभी जून का फोन आया, कह रहे थे छह बजे ही वापसी के लिए रवाना हो जाना चाहिए, पर वे आठ बजे वापस जायेंगे. आज वर्षा के आसार नहीं हैं. अभी कार्यक्रम शुरू होने में दो घंटे हैं, मोहक संगीत बज रहा है. पाकिस्तान से भी एक सूफी गायकी का समूह आया है. सीरिया के एक मुफ़्ती भी आये हैं. नरेंद्र मोदी, शिक्षा मंत्री, गृह मंत्री तथा कई अन्य राजनेता भी उपस्थित हैं. श्री श्री ने कहा है यह उनका प्राइवेट कार्यक्रम है, सही है क्योंकि सारा विश्व ही उनका परिवार है. अध्यात्म अणु से विभु बना देता है. लोगों का ताँता लगातार लगा हुआ है. भारत के कोने-कोने से इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लोग आए हैं. नृत्य और संगीत का आनन्द लेने तथा गुरूजी का दर्शन पाने. पुलिस के सिपाही भी जगह-जगह तैनात हैं, महिला पुलिस भी उतनी ही तत्परता से काम कर रही है. इस समय स्टेज पर सुंदर पीत वस्त्र पहने कलाकार बालाएं तैयार हैं. भाई सर पर छाता लगाये शांति से बैठे हैं, उन्हें भी उसके साथ धूप में बैठना पड़ रहा है. बड़े से घूमते हुए रॉड से कैमरा घूम-घूम कर तस्वीरें ले रहा है. कुछ स्वयंसेवक जगह-जगह से कूड़ा उठा रहे हैं, इस जगह को साफ करके ही वापस सौंपना है. आज के कार्यक्रम में श्रीखोल(एक प्रकार का ढोल) का वादन है तथा बीहू नृत्य भी. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की ग्रैंड सिम्फनी का तो कहना ही क्या जिसमें साढ़े आठ हजार कलाकार हैं जो पचास तरह के वाद्य यंत्र बजा रहे हैं. सात बजे तक लोगों की भीड़ इतनी अधिक हो गयी कि कुछ लोग सामने आकर खड़े हो गये, उन्होंने वापस जाने का मन बनाया. लौटते समय विशाल जनसमूह को देखकर, जो शांति से बैठकर कार्यक्रम का आनन्द ले रहे थे, मन में गर्व का अनुभव हुआ. लोगों की एक बड़ी भीड़ अभी भी आया रही थी, उतने ही लोग वापस भी जा रहे थे, पौने तीन घंटे की यात्रा के बाद घर पहुंचे.

आज सुबह साढ़े पांच बजे स्वतः ही नींद खुल गयी, नहा धोकर साढ़े छह बजे ही तैयार थी. मंझली भाभी के यहाँ चाय पी, उसने लंच पैक भी दिया. भाई एअरपोर्ट ले आए. उन्होंने इस सात-आठ दिनों में उसका बहुत ध्यान रखा. उनका स्वभाव बहुत कोमल है, हृदय सदा सभी की सहायता के लिए तत्पर रहता है. उनके हृदय में भाभी के प्रति एकनिष्ठ प्रेम की ज्योति जल रही है. एकमात्र पुत्री को भी वे बहुत स्नेह करते हैं. ध्यान की उनकी समझ भी गहरी है. ईश्वर उन्हें प्रसन्न रखे. जीवन के इस मोड़ पर पर उन्हें ईश्वरीय शांति ही आगे बढ़ते रहने का बल प्रदान कर सकती है.   


Tuesday, January 23, 2018

पनामिक के गर्म चश्मे

कल शाम वे ऊंट सफारी के लिए तैयार हुए. कुछ ही दूरी पर वह स्थान था. रेतीले मैदान जो मार्ग में दूर से लुभा रहे थे अब निकट से देख पाए. लगभग २५-३० सजे हुए ऊंट थे जिनपर लाल अथवा गहरे रंगों की गद्दियाँ लगी थीं. दूर एक लाल झंडा लगा था जहाँ तक जाकर ऊंट चालक वापस मुड़ते हैं और एक उचित स्थान देखकर तस्वीरें उतारते हैं. ऊंट चालक ने हर कोण से चार-पांच तस्वीरें लीं जैसे कोई प्रशिक्षित फोटोग्राफर हो. वहाँ से लौटकर वे उस तम्बू में गये जहाँ से संगीत की ध्वनि आ रही थी. विभिन्न पोशाकों में नृत्यांगनाओं ने सहज मुद्राओं में स्वयं गीत गाकर नृत्य दिखाया. अनेक पर्यटकों के साथ उन्होंने भी लद्दाखी लोक नृत्य का आनंद लिया. उनके बोल मधुर थे और समझ में न आने पर भी एक पवित्रता का अनुभव करा रहे थे. उनके हाथों का संचालन ही मुख्य था, शरीर सीधा ही रहता है तथा नृत्य धीमी गति से चलता है. कुछ समय वहाँ बिताया और एक लद्दाखी पोषाक पहन कर तस्वीर भी खिंचाई. 

बाहर निकले तो देखा रेतीले मैदान में एक तरफ भेड़ों-बकरियों का एक रेवड़ हरी-घास व कांटेदार वृक्षों के पत्ते खा रहा था. लगभग दो घंटे वहाँ बिताकर लौट आये, कुछ देर के विश्राम के बाद साढ़े सात बजे भोजन कक्ष में पहुंचे. टमाटर सूप और पापड़ से शुरुआत की, भोजन में मुगल नामका एक स्थानीय साग भी था जो वहाँ काम करने वाली महिला ने अपने घर में बिना किसी रासायनिक खाद के बनाया था यानि ऑर्गैनिक. अरहर की घुली हुई दाल, पनीर-मटर, पास्ता तथा फुल्के... इतनी दूरस्थ जगह में इतनी कठिन परिस्थितियों में इतना स्वादिष्ट भोजन मिल सकता है उन्हें उम्मीद नहीं थी. रात को सोये तो नदी की कलकल धारा जैसे लोरी सुना रही हो. हल्की बूंदा-बांदी भी शुरू हो गयी थी, जो तम्बू की छत पर गिरती हुई टपटप आवाज से असम की याद ले आई. 

 सुबह उठे थे तो जल्दी से जैकेट-टोपी आदि पहनकर बाहर निकले थे, पंछियों की मधुर ध्वनियाँ आकर्षित कर रही थीं. पीले व काले पंखों वाली एक चिड़िया यहाँ बहुतायत से मिलती है जैसे और जगह गौरैया. आकार में उससे कुछ बड़ी है. उसकी कई तस्वीरें लीं, यहाँ मैगपाई नहीं दिखा पर काले रंग का पीली चोंच वाला एक बड़ा पक्षी था. उस जल से जो स्फटिक के समान स्वच्छ थासीधा ग्लेशियर से आ रहा था और सूर्य की किरणों से गर्म किया गया था, नहाकर वे ताजगी का अनुभव कर रहे थे. नाश्ता भी उतना ही लाजवाब था, लाल तरबूज, कॉर्न फ्लेक्स, उपमा, पनीर व आलू परांठा तथा छोले, चाय या काफ़ी. 

 साढ़े आठ बजे तैयार होकर गाड़ी में बैठ चुके थे पनामिक जाने के लिए, जहाँ गर्म पानी के चश्मे हैं. रस्ते में सूमुर गाँव भी आया जहाँ वापसी में उन्हें रुकना था. पनामिक का ३५ किमी का रास्ता बहुत मनोरम है. रेतीले बालू भरे तट तथा बड़े-बड़े पत्थर, ऊंचे नंगे पहाड़ तो कभी हरे-भरे खेत. नुब्रा नदी भी साथ-साथ बह रही थी. एक घंटे की यात्रा के बाद वे उस स्थान पर पहुंचे. तीन विभिन्न स्रोतों से पानी निकल रहा था, भाप भी नजर आ रही थी, छूकर देखना चाहा पर तापमान काफी अधिक था, कुछ लोग उसमें पैकेट वाला भोजन भी पका रहे थे. कई जगह गुजराती पर्यटक मिले थे, यहाँ भी उनकी भाषा से ऐसा लगा. दूर घाटी में सरसों के पीले खेत भी नजर आये. किसी बीते समय जब बाहरी दुनिया से लद्दाख का कोई संपर्क नहीं था, यहाँ के निवासी जौ और सरसों से काम चलाते थे, भेड़ों की ऊन से बने वस्त्र स्वयं ही बुनते थे जिन्हें पट्टू कहते हैं. 

 पनामिक से लौटकर वे सूमुर गाँव के गोम्पा पहुंचे जहाँ कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता. गोम्पा अपेक्षाकृत बाहर से आधुनिक लगता है तथा सेब व खुबानी आदि फलों के कई वृक्ष अहाते में लगे हैं.  कुछ तस्वीरें लीं, फिर मुख्य कक्ष में गये जहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति थी तथा तारा की दो मूर्तियाँ थीं. मंजुश्री तथा वज्रपाणि की भी एक-एक मूर्ति थी. बौद्ध धर्म के बारे में कुछ जानकारी वहाँ के लामा ने दी जो एक पुस्तक पढ़ रहे थे पर प्रश्न पूछने पर सहजता से जवाब देने लगे. कक्ष से बाहर निकले तो एक वृद्ध लामा आते हुए दिखाई दिए, ‘जूले’ कहने पर मुस्कुरा कर उन्होंने भी जवाब दिया. शेष हर तरफ एक गहन शांति छायी हुई मिली. सूमुर गाँव से वे चले तो सीधे खरदुम गाँव में रुके जहाँ पुनः पहले दिन की तरह चाय मिली. आज यात्री बहुत ज्यादा थे सो चाय में दालचीनी का स्वाद नहीं आया तथा चीनी भी अधिक थी. एक साथ बीसियों लोगों के लिए चाय बनाना कोई आसान काम तो नहीं. लोग मैगी का आर्डर भी दे रहे थे, हर ब्रांड के नूडल्स को मैगी ही कहा जाता है यहाँ. खर्दुन्गला दर्रे तक वे पहुंचे तो दोपहर के दो बजे थे. इस बार  गाड़ी में बैठ-बैठे ही कुछ तस्वीरें लीं तथा वापसी की यात्रा का आरम्भ किया. 


नदियाँ, पहाड़, हिमपात  तथा वर्षा के दृश्य समेटे वापस पौने चार बजे लेह लौटे. खर्दुन्गला से पहले ही हिमपात शुरु हो गया था. बर्फ के सूक्ष्म कण कार की जरा सी खुली खिड़की के शीशे से भी अंदर आ रहे थे. कितने ही मोटरसाइकिल चालक दिखे जो इसी खराब मौसम में फिसलन भरी सड़क पर अपनी जान को जोखिम में डाल रहे थे. उनको देखकर उनकी बहादुरी पर रश्क भी होता था और करुणा भी. भगवान बुध के इस पावन स्थल पर सभी एक-दूसरे के लिए सद्भावना से भरे नजर आए. यहाँ कोई ऊंची आवाज में बात करता नजर नहीं आया, लोग विनम्र हैं, तथा धर्म उनके लिए जीवन का अभिन्न अंग है, धर्म तथा जीवन दो अलग-अलग बातें नहीं हैं. 

Friday, October 7, 2016

क्लब में नृत्य

Image result for dance in club
आज सुबह जून का फोन आया दो बार, दोनों बार अन्य फोन आ गये सो बात पूरी नहीं हो सकी, वैसे भी बात पूरी हो ही कहाँ पाती है, जीवन की संध्या आ जाती है. मृत्यु शैया पर पड़ा व्यक्ति भी यही सोचता है कि कितनी बातें अनकही रह गयीं. उसे तो आज ही, इसी क्षण ही सबसे हिसाब-किताब खत्म कर लेना है, कोई लेन-देन शेष नहीं रखना, परमात्मा, आत्मा, सद्गुरू, चारों दिशाओं और सभी देवी-देवताओं, पूर्व के स्द्गुरूओं, भावी बुद्धों सभी को साक्षी बनाकर इस क्षण वह घोषणा करती है कि आज के बाद से उसकी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है और वह अपने हृदय की समस्त मंगल कामनाएं उन्हें देकर स्वयं को भी मुक्त करती है. क्योंकि वह जो वास्तव में है वह निर्विकार तत्व है, वह न कुछ ग्रहण कर सकता है न कुछ दे सकता है, प्रारब्ध वश जो भी आगे जीवन चलेगा, उससे उसका क्या संबंध है ? मन, बुद्धि, संस्कार के द्वारा जीवन में जो घटेगा, वह सभी के हित में हो यही प्रार्थना है, यह लिखना भी तो इन्हीं के द्वारा हो रहा है, सात्विक बुद्धि के द्वारा ही यह सम्भव है. आज सभी परिजनों वे सखियों के फोन आये. दीदी का फोन नहीं आया, शायद अभी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ होगा, उसने बात की तो ऐसा ही था. सुबह सद्गुरू को देशी-विदेशी मेहमानों के सामने सहजता से सवालों के जवाब देते सुना. कह रहे थे भीतर कितनी शक्तियाँ छिपी ह्युई हैं, साधना के बल पर कोई उन्हें जागृत कर सकता है, योग के हजारों चमत्कार हैं. कम से कम अपने तन-मन को पूर्णतया स्वस्थ व प्रसन्न रख सके, इतना तो हरेक का कर्त्तव्य है !  

कुछ देर पहले एक सखी के घर गयी, उसकी बहन आई हुई है, जो कई वर्ष पूर्व भी आई थी जब छात्रा थी. उसके पुत्र ने लैपटॉप में डाली कुछ तस्वीरें दिखायीं, दोनों बहनों की बच्चियां सगी बहनें लग रही थीं. जून कुछ ही देर में आने वाले हैं. कल क्लब में मैराथन का पुरस्कार लेने वह नहीं जा सकी, आने वाले कल की दोपहर को विशेष भोज है, उसे टेबल ड्यूटी मिली है, इसी बहाने कई लोगों से मुलाकात भी हो जाएगी. आज जून के लिए लिखी एक कविता ब्लॉग पर डाली, ‘तुम्हारे लिए’. चर्चा मंच पर भी ली गयी है, उसे अपने ब्लॉग पर चर्चा मंच का लिंक डालना सीखना चाहिए. दोपहर को साहित्य अमृत पढ़ा, गन्ना खाया, यानि कुछ तन के लिए कुछ मन के लिए. आत्मा के लिए वैसे भी कुछ करना नहीं है, साक्षी भाव में रहना है, जो हो रहा है, उसे देखते जाना है. सतो, रजो व तमो गुण के कारण ही मन, बुद्धि इन्द्रियां आदि अपना कार्य करते हैं, ये प्रकृति हैं और आत्मा शिव तत्व है. वे चैतन्य हैं लेकिन जड़ के साथ एक होकर स्वयं को सुखी-दुखी मानते हैं. साक्षी भाव में आते ही सब बदल जाता है. पंच क्लेश मंद हो जाते हैं, पंच विकार भी कम होने लगते हैं, एक सन्नाटा छाने लगता है भीतर !

कल क्लब में उसने इतने वर्षों में पहली बार नृत्य किया, कई सारे अंग्रेजी गानों की धुनों पर, गीत तो समझ में नहीं आ रहे थे पर संगीत अच्छा था, भीतर नृत्य उमग आया है, ड्यूटी भी दिल लगाकर की, लोगों को भोजन परोसना एक अच्छा काम है, खाना बना भी अच्छा था, खाया भी और घर आके कुछ हुआ भी नहीं. मौसम यहाँ बहुत सुहावना है, उत्तर भारत में सर्दी ने रिकार्ड तोड़ दिए हैं. नन्हे के लिए जून ने ढेर सारी गजक व खजूर आदि भेजी है, चार-पांच दिनों में उसे मिल जाएगी. माँ ने आज फिर टीवी बंद किया और उसने उनसे कारण पूछा. आदत बदलना कितना मुश्किल है, जून को भी जोर से बोला, वह उसकी बात को यूँही उड़ा देते हैं, पर उसे अपनी वाणी पर जरा भी संयम नहीं है, जब बात मुँह से निकल जाती है, तब होश आता है, पर इतना होने पर भी क्योंकि भीतर कर्ताभाव नहीं है, परमात्मा की कृपा का अनुभव निरंतर होता रहता है. कभी-कभी तो आश्चर्य होता है, पर परमात्मा असीम है, उसकी करुणा भी असीम है, असीम है उसकी दयालुता, उनकी कमजोरियां कितनी भी हों उसकी कृपा से तो कम ही होंगी ! जीत उसी की होगी, ध्यान की समझ भी आने लगी है, भीतर जब समरसता हो, शांति का अनुभव हो तो मन ध्यानस्थ ही होता है, एकाग्रता उसका परिणाम है. जून भी अपने लिए एक डायरी लाये हैं, एक नन्हे को भेजी है. डायरी में लिखने के लिए कितना कुछ है, नये-नये शब्द, नये विचार तथा नये अनुभव ! बहर माली काम करता हुआ पिताजी से बातें कर रहा है, वह पानी डाल रहे हैं, फूलों को जरूर उन दोनों का स्नेह पसंद आता होगा !  

Tuesday, January 27, 2015

नटनागर का नृत्य


अभिमान में न आना इतना ख्याल रखना
यह राह बहुत कठिन है, पाँव संभाल रखना !

उसे अपने ज्ञान पर, अपनी भक्ति पर अभिमान होने लगा था और गुरू चेताने के लिए आ गये हैं. किसी के शब्दों पर मुरझाना या खिलना अहंकार के पोषण के कारण ही तो है. प्रज्ञा का अपराध ही इस स्थिति में डालता है. बुद्धि का विकास करना है इसका लक्षण है अनाग्रह, सत्य की खोज में लगे व्यक्ति को दुराग्रही या पूर्वाग्रही नहीं होना चाहिए. अपनी बात को ऊपर रखने की व्यर्थ चेष्टा यदि है तो बुद्धि अभी विकसित नहीं हुई है. सत्य को स्वीकार करना ही बुद्धिमत्ता है. प्रज्ञा का दोष न हो तो मन समत्व योग में स्थित रहता है. ऐसा अडिग हो सके अपना मन जो अनुकूल व प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में समान व्यवहार करे तो ऐसा मन ध्यानस्थ है. ऐसा ही मन भक्ति कर सकता है, भक्ति का मार्ग इतना सहज नहीं है, सिर कटाकर ही इस मार्ग पर चला जा सकता है. आज जून शिवसागर गये हैं, नन्हा घर पर ही है, टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है.

गलतफहमियों में जिन्दगी गुजरी
कभी तुम न समझे, कभी हम न समझे

मन अहंकार से मुक्त हो तो छोटी-छोटी बातें पानी पर लकीर की तरह बेअसर हो जाती हैं, साथ ही दूसरों की व्यर्थ बातों पर ध्यान न देने की कला भी आती है व्यर्थ के विवादों से बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि भीतर के आँख और कान खुले रहें, बाहर के कान और नेत्र यदि बंद भी रहें तो कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है.
आज तीस जनवरी है, बापू की पुण्य तिथि ! सुबह-सुबह भजन सुना, वैष्णव जन तो तेने कहिये....नरसिंह मेहता का यह भजन मन को ऊंचे केन्द्रों पर ले जाता है. प्रेम सिखाता है, देना सिखाता है. सद्गुरु का यही काम है कि वह अपने हृदय की उदारता और प्रेम साधकों के अंतर में प्रवाहित करता है. उनके दिल-दिमाग को विस्तार देता है. वैदिक ऋचाओं का संदेश पहुंचाता है. सद्गुरु कहते हैं, भागवद समाधि भाषा है, उसे पढ़कर हृदय में रस उभरने लगता है, ‘बिगड़ी जन्म अनेक की, सुधरे अभी और आज’ !

आज फरवरी का पहला दिन है, सुबह जल्दी उठे वे. नन्हे की परीक्षा है, साइंस ओलम्पियाड. कल दीदी का पत्र आया, बड़े भांजे को अखिल भारतीय परीक्षा में प्रथम स्थान मिला है कम्प्यूटर की ‘c’ परीक्षा में. अब यह c में क्या सिखाते हैं, o लेवल क्या है उसे पता नहीं पर बहुत ख़ुशी हुई उसका नाम अख़बार में छपा देखकर. अभी-अभी ‘आत्मा’ में मुम्बई स्थित मन्दिर में आने का निमन्त्रण मिला, कीर्तन में शामिल होने व नृत्य देखने का भी. आज गुरुमाँ ने भी आधा घंटा नृत्य करने की सलाह दी जो सब कुछ भुला कर किया जाये. आँखें बंद हों और हृदय की उमंग इतनी तीव्र हो कि पैर स्वयंमेव ही थिरक उठें. परसों दोपहर भागवद् पढ़कर कुछ देर के लिए उसे भी ऐसा अनुभव हुआ था ! अभी कुछ देर पहले एक परिचिता का फोन आया, इस महीने क्लब में उनके एरिया को कार्यक्रम प्रस्तुत करना है, उसे कविता पाठ करना है तथा कोरस में भी भाग लेना होगा.