Tuesday, September 13, 2016

दर्पण में प्रतिबिम्ब


पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली. आजकल कितनी ही पंक्तियाँ सहज ही मन में आती हैं पर उस वक्त लिखने की सुविधा नहीं होती, बाद में भूल जाती हैं..पर उस क्षण तो वह स्वान्तः सुखाय कुछ रच ही लेती है ! परसों कुछ पंक्तियाँ मन में आ रही थीं-

जीवन एक मौका है
बीज से वृक्ष बनने का
बूंद से सागर और कली से पुष्प
होने का..
मिटना होगा बीज को इस प्रयास में
खोना ही होगा अपना आप बूंद और कली को भी
चूक जाते हैं हम इसी मोड़ पर
‘हमीं’ बनकर पाना चाहते हैं
आकाश की ऊँचाइया
बने रहकर पूर्ववत्
पा सकेंगे क्योंकर
वृक्ष सी विशालता, गहराई सागर सी
सौन्दर्य फूल का..स्वयं बने रहकर
छोड़ दें ‘हम’ होने का लोभ
हो जाएँ रिक्त अपने आप से
तो भीतर जो अनछुआ बीज है
वह पनपेगा..
बूंद बह चलेगी सरिता बनकर 
सागर की तलाश में
और सुप्त कलिका स्वप्न देखेगी प्रस्फुटन का..

पिछले तीन दिन फिर यूँ ही निकल गये और डायरी नहीं खोली. अभी दीदी का ब्लॉग देखा, उनका ब्लॉग पहली बार इतने लोगों ने पढ़ा, जीजाजी भी प्रसन्न होंगे, दीदी इतना अच्छा लिख रही हैं. पंजाबी दीदी का भी जवाब आया है, वह सदा ही तारीफ करती हैं उसकी कविता की. जून आज फिर पिताजी को अस्पताल ले गये, कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ दिन दवा लेनी होगी. माँ का हाल वही है, उन्हें आजकल दिन में लेटना जरा नहीं भाता, बैठे-बैठे थक जाती होंगी पर कहने पर भी लेटना नहीं चाहतीं. आज उनके पड़ोसी जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर भी हैं, मृणाल ज्योति गये हैं, वह अध्यापिकाओं को ध्यान, प्राणायाम आदि के बारे में कुछ बतायेंगे. सद्गुरु भी यही चाहते हैं. आज सुबह ध्यान में उनकी आवाज सुनी, जो उसकी स्मृति में सुरक्षित है, अर्थात यह मन का ही खेल है. लेकिन प्रकाश के वे स्तम्भ तो मन का खेल नहीं हो सकते, उनकी उपस्थिति को वह बिलकुल स्पष्ट अनुभव करती रही है. परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, वह सर्वव्यापी चेतना एक ही है, वह सदा उनके साथ है. इस अनुभव के बाद अब लौटना नहीं होगा. कल शाम को कुछ पलों के लिए मन विचलित हुआ पर वह ऊर्जा का अपव्यय ही था जैसे दर्पण में कोई प्रतिबिम्ब ठहरता नहीं है वैसे ही आत्मा में कोई भाव टिकता नहीं है. वह जैसे पहले थी वैसे ही हो जाती है, केवल मन स्वयं को उसमें देख लेता है. मन ने देखा कि उसे निंदा नहीं भाती, स्तुति भाती है. उन्हें दोनों के पार जाना होगा, एक चाहिए तो दूसरा मिलेगा ही. उनका फोन खराब हो गया है, एक तरह से तो शांति है पर साथ ही अशांति भी है क्योंकि वे भी फोन नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ सब कुछ जोड़े में मिलता है, मन का नाम ही द्वंद्व है. शुद्ध, निर्विकार, अचिन्त्य आत्मा सदा एकरस, आनंद से पूर्ण है, शक्तिसंपन्नदृष्टि आता है  दीदी को अवश्य उसकी बात समझ में आई होगी. कल नन्हे से बात नहीं हुई, वह व्यस्त है आजकल.



Sunday, September 11, 2016

भोर के तारे


आज पुनः आल्मारी में वस्त्रों के नीचे छिपाई हुईं टेबलेट्स व अन्य दवाइयाँ मिलीं. पहले भी कई बार बेड के नीचे, गद्दे के नीचे चार-पांच गोलियां मिलती रही हैं. कई दिनों से नहीं मिलीं तो सबने सोचा अब माँ ने मुंह से निकाल कर दवा छिपाना/ फेंकना बंद कर दिया है, पार आज तो पूरी बारह गोलियां थीं. पूछा तो बच्चे की तरह कहने लगीं, हमने ही रखी होंगी. पता नहीं कब रखीं, जबकि पिताजी दवा देकर सामने ही खड़े रहते हैं. कई बार तो दवा खाने की मेज पर ही दी जाती है, पर किसी न किसी तरह वह छिपा लेती होंगी. पिछले सवा साल से दिन भर में दसियों गोलियां खाने पर तो कोई भी ऊब जायेगा और छोड़ देना चाहेगा. इस समय वह अपने कमरे में कुर्सी पर बैठी कुछ धीरे-धीरे बोल रही हैं, शायद जाप कर रही हों. जून पिताजी को दांत के डाक्टर के पास ले गये हैं, उनका डेंचर फिट नहीं हो रहा है. आज शनिवार है, शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने जायेंगे, हो सका तो उसे अपना ब्लॉग दिखाएगी. कल दोपहर की कक्षा में वे एक ड्रामा करवाएंगे, ‘कृष्ण जन्म’, कल बिना ड्रेस के और अगले हफ्ते ड्रेस के साथ. परसों मृणाल ज्योति जाना है. टीचर्स को ध्यान के बारे में बताएगी. एक अवैतनिक अध्यापिका जो हाल ही में विधवा हुई थीं और अब सेवा के भाव से स्कूल आती हैं, काफी परेशान रहती हैं. जब तक परमात्मा को अपने जीवन का केंद्र न बना ले कोई, उसके दुःख कम नहीं हो सकते. यहाँ सभी परेशान हैं, धनी भी निर्धन भी, रोगी भी स्वस्थ भी. यहाँ वही सुखी है जो मन के पार चला गया ! समय का पहिया इसी तरह घूमता जायेगा और एक दिन मृत्यु द्वार पर आ खड़ी होगी. आज सुबह संध्या बेला में तारों भरा गगन देखते समय कितनी सुंदर कविता फूटी थी सहज ही, अब कुछ याद नहीं है. कितनी बार नींद में, तंद्रा में कविता की पंक्तियाँ अपने आप भीतर गूँजने लगती हैं, उन्हें रचा नहीं होता..पर बाद में याद नहीं रहतीं. क्या इसी को वेद के ऋषि द्रष्टा होना कहते थे. वेद वाणी को उन्होंने देखा था, रचा नहीं था..उसे अपने साथ एक छोटी डायरी और पेन रखना चाहिए ताकि फौरन उन्हें लिख ले ! आज सेंट्रल स्कूल जाना है, वाद-विवाद प्रतियोगिता है, ‘क्या भारत विश्व का नेतृत्व कर सकता है, क्या उसके पास यह क्षमता है’ ! उसे निर्णायक बनना है, पहले भी एक बार निर्णायक बनी थी, हिंदी में बोली अंत में, लेकिन आयोजकों का विचार था कि सम्भवतः वह अंग्रेजी में ही बोलेगी. आज अगर बोलने का अवसर आया तो भारत पर लिखी अपनी उस कविता की कुछ पंक्तियाँ ही पढ़ देगी.   

एक-एक पल कीमती है, श्वास-श्वास में उसका नाम लेना है, लूट मच रही है. चारों ओर वह बिखरा हुआ है, उसे कैसे समेटे, समझ में नहीं आता..कहना चाहिए कि कैसे बिखेरे..जो पाया है भीतर कैसे लुटाये उसे अनोखा है यह प्रेम ..जो सृष्टि के कण-कण के लिए भीतर घुमड़ता है, अनोखी है यह प्रीत जो सारे ब्रह्मांड के लिए दौड़ी जाती है, सबको गले लगाने को आतुर है..इतना पाया है भीतर कि समेटे नहीं सिमटता..आत्मा में अनंत शक्ति है, अनंत प्यार है, अनंत आनंद है..अनंत..ये सारे शब्द उसके मुख से प्रकट होते थे अब उनका साक्षात अनुभव होता है..होते होते ही यह घटा है..मिलते-मिलते ही मिला है..भरते-भरते ही घड़ा भरा है..बूंद-बूंद से सागर होता है कितना सही कहा गया है..जीवन जैसे एक वरदान बन गया है, एक उत्सव..परमात्मा की, सद्गुरु की कृपा से जीवन एक मशाल बन गया है, एक फूल बन गया है और बन गया है एक मिसाल...जो शहद से मीठे इस प्रेम को एक बार अनुभव कर ले वह तो जैसे बौरा ही जाता है..कदम बहकने लगते हैं, आँखें चमकने लगती हैं..नयन बरसने लगते हैं..वचन बहने लगते हैं..क्या नहीं होता उस एक की प्रीत में..जो उससे लगन लगा लेता है वह धनी हो जाता है..फिर कुछ भी पाने की लालसा नहीं रहती, इसी का नाम योग है..आत्मा का परमात्मा से योग...!


आज सुबह ध्यान में सद्गुरु की उपस्थिति को बिलकुल स्पष्ट किया उनके बोल भी सुने, परमात्मा हर जगह है, हर समय है इसमें कोई संशय नहीं रह गया है, वही तो है, उसके सिवाय कोई है भी नहीं..अभी-अभी दीदी से बात की, वे लोग चाय पीने जा रहे थे, अब परांठे के साथ वाली चाय छोड़ दी है ! परमात्मा सबका सुहृद है ! आज भी पिछले कई की तरह वर्षा का मौसम बना हुआ है, सुबह वे टहलने भी नहीं जा सके. कल शाम से आज सुबह तक कितनी पंक्तियाँ भीतर गुजरीं पर अब कुछ याद नहीं है, एक में तो देवी-देवों का जिक्र था. त्रिदेव तथा त्रिदेवियाँ साथ में सन्तोषी माँ, शीतला माँ सभी देवता उनके इस तन में ही तो वास करते हैं !    

Friday, September 9, 2016

सागर में नदियाँ


आज उसे अनुभव हुआ भीतर एक ज्वाला है जिसमें निरंतर हवन चल रहा है, कामनाओं की समिधा पड़ रही है, विचारों का धूना जल रहा है और हृदय ही वह हवन कुंड है जिसमें से प्रेम की सुगंधि चारों ओर फ़ैल रही है. भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं ज्ञानी का हृदय सागर की तरह होता है, जिसमें चारों और से नदियाँ आकर गिरती हैं. वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता. सत्व, रज और तम तीनों गुण उसके उर में समा जाते हैं. प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह तीनों का आगमन उसे मोहित नहीं करता. उसका हृदय उस भूमि की तरह होता है जहाँ सारा कूड़ा-करकट आकर खाद बन जाता है और फूल उगाता है..सुगन्धि फैलाता है, उस आकाश की तरह होता है जहाँ बादल, कुहरा, गर्जन-तर्जन, बिजली, वर्षा, ओले, सूरज सब होते हैं पर वह ज्यों का त्यों रहता है..तपता नहीं, गलता नहीं..अग्नि की तरह होता है जिसमें सारे विकार आकर जल जाते हैं और..उस जल की तरह जो सब कुछ पावन कर देता है..आज जून आने वाले हैं परसों छुट्टी है कृष्ण जन्माष्टमी की..पंजाबी दीदी को कविता भेजेगी !

कल शाम और फिर रात्रि से ही कुछ छूट गया सा लगता है, जो खो जाये वह था ही नहीं, पर जो एक बार मिले और कभी न खोये ऐसा भी कहीं होता है यह तो अनंत यात्रा है और अनंत अनुभवों से भरी. प्रकाश, प्रवृत्ति और और मोह तीनों के अनुभव होते ही रहेंगे. कल शाम वे मार्केट गये, छोटी ननद ने जो सूट भेजा, उसे सिलने दिया. अब उसकी कलम आगे बढने से इंकार कर रही है. संस्कार कितने गहरे होते हैं और मन कितना बलशाली..बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की वहाँ एक नहीं चलती. इस संस्कार को मिटना ही होगा, वह यदि इस क्षण निर्णय कर ले तो कौन है जो रोकेगा. उसका ही अंतर्मन, अवचेतन मन, अचेतन मन, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ..लेकिन आत्मा ही एकमात्र सत्य है, ये सब अनित्य हैं, आत्मा के सातों गुणों को भीतर धारण करे तो सारा नकार क्षण भर में बह जायेगा. सद्गुरू की वाणी को याद करे तो जो वह हैं वही वह है, वही यह सारा जगत है, एक ही तत्व से यह सारा संसार बना है, प्रेम का जितना विस्तार हो उतना अच्छा है..सारा जगत उनका अपना हो जाये, प्रेम ही आत्मा में ले जाता है, प्रेम ही बहता हुआ दरिया है..प्रेम को रोका तो वह सड़ेगा...दुर्गन्ध देगा. सहज होकर सभी को स्वीकारना है तभी मुक्ति है. स्वयं को मुक्त करके वे औरों को भी मुक्त कर देते हैं. स्वयं को बाँध कर रोककर वे दूसरों के लिए भी बाधा खड़ी कर देते हैं. दूसरे को अपना सा जानकर कभी उनके मार्ग में बाधा न बनें, यह भी सेवा है..जियो और जीने दो’ का सिद्धांत यही तो कहता है. उनके कारण किसी का विकास न रुके, सहज ही ईश्वर का प्रेम उनके भीतर से बहता रहे..बहता रहे..  

आज दो दिनों बाद डायरी खोली है, परमात्मा अपनी उपस्थिति हर क्षण ही प्रकट करता है, पर वे सोये रहते हैं तो उसे देख नहीं पाते, वे यानि उनका विवेक...विवेक जगता है तो आत्मा का अनुभव करता है..जिसका अर्थ है जीवन के हर क्षेत्र में सजगता...हर श्वास में सजगता, हर पल जागरूक होकर जीना..वर्ष का नौंवा महीना शुरू हो चुका है. इस वर्ष के शेष रह गये कार्यों को करने का अभी भी वक्त है. परिवार में सभी के साथ संबंध मधुर हों..समाज में जो प्रतिबद्धताएं हैं वे निभती रहें और मन सदा समता में रहे. गुरूजी को आज यू ट्यूब पर सुना, उनेक कितने रूप हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’...एक व्यक्ति कितना विकास कर सकता है हजारों, लाखों ही नहीं यहाँ तो करोड़ों व्यक्ति उनसे सीख रहे हैं...परमात्मा उनके द्वारा स्वयं को व्यक्त कर रहा है. उन्हें स्वयं को हटाकर परमात्मा के लिए मार्ग छोड़ देना है...वह अनंत है..ज्ञान स्वरूप है..वह जीवन को सुगंध से भर देना चाहता है..प्रेम, शांति, ज्ञान और आनंद की सुगंध से..



Monday, September 5, 2016

मेलुहा के मृत्युंजय


परसों राखी है, क्यों न राखी पर एक और भी कविता लिखे, छोटी सी पर प्रेम भरी...

रंगबिरंगी
छूती दिल को
जाने कितने भाव समेटे
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

दूर-दूर सफर तय करतीं
मीलों की दूरी को हरतीं
यादों के तारों को बुनतीं
मस्तक पर तिलक लगाए
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

चमचम गोटे तारों वाली
सलमे और सितारों वाली
रेशम के धागों से बनी हैं
चमकीली मोती, माणिक से
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

आज सुबह नींद खुली तो छह बजकर दस मिनट हो गये थे. रात को देर से सोई, सम्भवतः एक बजे..नन्हे ने जो किताब भेजी है The Immortal of Mehula, बहुत रोचक है, देर तक पढ़ती रही. सुबह घर की सफाई का काम पिताजी के साथ मिलकर किया, माँ दर्शक बनकर चुपचाप देखती रहती हैं, किसी काम में हाथ नहीं बंटाती, उनकी चेतना किसी और ही तल पर रहती है. शाम को क्लब जाना है और कल मृणाल ज्योति, वहाँ राखी का उत्सव मनाने. लेडीज क्लब का वार्षिक समारोह आने वाला है, उसके लिए थीम मांगी है. उसे तो एक ही शब्द याद आता है – निर्वाण NIRVANA, N - naturalness, I - intuition, R - rest, V - vitality, A - awareness, N - novelty, A – amazement. ज्ञान, करुना, समन्वय, स्थिरता और आनन्द का प्रदाता, जहाँ न कोई दुःख है न चिंता, केवल आनंद, मुक्ति सुख और शांति ! संतोष और जागरण का कालातीत अनुभव. निर्वाण और संसार दो नहीं हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. संसार समस्या है तो निर्वाण समाधान है, सीमाहीन, अनंत आकाश की तरह मुक्त मन ही निर्वाण है. सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह यह प्रेम, आनंद, सुख, पवित्रता, ज्ञान, शांति, ऊर्जा और ज्ञान के सप्तरंगों से बुना है.

 It is alluring! Untouched and virgin, pure state of mind. It is ultimate a human can feel. It is fullness of heart! It is unconditioned love! It is immense gratitude and great fullness! It is rejoicing in self without any conflict! Reposing in oneself without any sorrow! It is stilling, cooling and peace of mind. It is the highest happiness enduring happiness attained through knowledge rather than the happiness derived through impermanent things.


Saturday, September 3, 2016

हर्मन हेस की किताब - सिद्धार्थ


आज जून का जन्मदिन है. सुबह उन्हें कहा कि जितने वर्ष के हो गये अपने भीतर उतने गुणों की तलाश करें. वह करें या न करें, उसने सोचा वह ही कर लेती है- सहनशीलता, धैर्य, वात्सल्य, स्नेह, ममता, आदर, अनुशासन, अध्ययन, अनुशासन, संयम, सजगता, प्रेम, निर्भयता, अभय, क्षमा, दया, करुणा, सहानुभूति, दान, सहयोग, उदारता, ईमानदारी, सत्यता, स्वच्छता, पारदर्शिता, प्रसन्नता, उत्साह, आनंद, मिलनसारिता, दूरदर्शिता, मेधा, बुद्धि, वाकपटुता, व्याख्यान करने की कला, व्यायाम, नई भाषा सीखना, हास्य, अनुकरण, स्मृति, परोपकार, विश्वास, आत्मसम्मान, आस्था, भक्ति, साधना, समर्पण, कुशल क्रेता, शीघ्रता, मैत्री....

आज कई हफ्तों के बाद झूले पर बैठ कर लिख रही है. सामने गुलमोहर पर लाल फूल उग आये हैं, लॉन की घास कटी है, गुड़हल में एक लाल चटख फूल खिला है. आकाश में पीले, सलेटी, नीले बादल छाये हैं. अस्त होते हुए सूर्य की रोशनी उन पर पड़ रही है. मौसम बेहद सुहावना है. अगस्त माह की शीतल शाम बस ढलने को है. पिताजी गमलों में पानी डाल रहे हैं. माँ कुर्सी पर रोज की तरह बैठी हैं, वह चुप ही रहती हैं ज्यादातर, भोजन में भी रूचि घटती जा रही है. जून भीतर बैठे डायरी लिख रहे हैं, उनके मध्य संबंध पूर्ववत् हो गये हैं, सहज स्नेह भरे. आज गुरूजी के अष्टावक्र गीता पर दिए गये प्रवचन के बारे में कुछ मेल पढ़े, शेष कल पढ़ेगी, उन दिनों जब वे यह प्रवचन दे रहे थे नहीं पढ़ पायी थी. आज एक लेखिका का ब्लॅाग देखा, कितना सजाते हैं लोग, लेकिन बात पर उतना ध्यान नहीं देते. कुछ लोग उससे भी और अच्छा लिखने की उम्मीद रखते हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी है, अच्छा हुआ कि वह पहले से ही बाहर है, अभी दिन थोड़ा शेष है. आज मृणाल ज्योति से कोई जीवन सदस्यता के फार्म दे गया.


अगस्त माह भी बीतने ही बीतने को है. समय का रथ अविराम चलता जा रहा है. वे रुक कर देखते भी नहीं कि कहाँ जा रहे हैं, किधर जा रहे हैं, कहाँ जाने के लिए निकले थे, कहाँ उन्हें पहुंचना था, रास्ता ठीक है या नहीं, राह दिखने वाला साथ है या नहीं ? जून के साथ बैठकर उसने अगले पांच वर्षों की एक योजना बनायी. संभव हुआ तो तो वे ये बारह कार्य करेंगे. बंगलूरू में एक घर खरीदना है, पुरानी कार बेचकर नई खरीदनी है. नन्हे के विवाह की तैयारी करनी है. बंगलूरू आश्रम में एडवांस कोर्स करना है और इगतपुरी में विपासना कोर्स. छोटी बहन की किताब पूरी करवानी है. कविताओं को  नई किताब में संकलित करना है. फोटोग्राफी की कला विकसित करनी है. सेवा का कार्यक्षेत्र बढ़ाना है. लेख लिखने हैं. ब्लॉग पर लिखना है. यूरोप की यात्रा करनी है. 


पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली. आज समय मिला है. शाम के सात बजे हैं. जून आज दोपहर  एक सप्ताह के लिए बाहर गये हैं. सुबह वे जल्दी उठे, प्रातः भ्रमण को गये, रविवार की सफाई का कार्यक्रम स्थगित किया कल तक के लिए. दोपहर को संडे स्कूल के बच्चों के साथ राखी का उत्सव मनाया. पिछले दिनों हर्मन हेस का उपन्यास सिद्धार्थ पढ़ा, अच्छा है, एक बार फिर पढ़ना होगा, नदी की बातें समझने के लिए ! संसार और परमात्मा एक ही हैं, दो नहीं हैं, यही अद्वैत इसका सार है और यह अनुभव में जब भी उतरता है तो भीतर प्रेम भी पनपता है, सहज प्रेम जो सारी सृष्टि के लिए होता है, ऐसा प्रेम पाना ही उनमें से हरेक का लक्ष्य है और उन्हें उसी की तलाश भी है. 

Friday, September 2, 2016

सुख - दुःख का झूला


दोपहर के ढाई बजे हैं, ध्यान कक्ष में या कहें कम्प्यूटर कक्ष में वह बैठी है, सुबह शाम जो साधना के काम आता है, दोपहर को वहीँ बैठकर वह कम्प्यूटर पर काम करती है. अगस्त माह के लिए हिन्दयुग्म पर नई कविता पोस्ट की. एक ब्लॉग पर भी. पन्द्रह अगस्त के लिए एक पुरानी कविता और मिली. डायरी के पन्नों में न जाने क्या-क्या है. माँ की कहानी लिखनी शुरू की थी, अधूरी ही छोड़ दी है. इंटरनेट एक अच्छा माध्यम है लेकिन उसके पास अन्यों की कविताएँ पढने के लिए समय नहीं मिलता या कहें कि रूचि नहीं है. इसी महीने छोटे भाई का जन्मदिन है क्यों न उसके लिए एक कविता लिखे, सन्यासी हुआ है वह. अगले महीने कृष्ण जन्माष्टमी है, उसके लिए भी लिख सकती है. कल रात जून और सहज हुए और आज सुबह वह अपने सहजतम रूप में थे. उन्हें स्वयं को बदलने में वक्त लगेगा पर यात्रा शुरू हो गयी है तो मंजिल दूर नहीं है. शाम को उनके यहाँ सत्संग है.

आज प्रातः भ्रमण के समय एक परिचित मिले, उसका वजन बढ़ गया है ऐसा उन्होंने कहा, घर आकर देखा तो उनकी बात सही थी. पिछले कुछ दिनों से वे प्रोटीन युक्त भोजन ले रहे हैं. जून आज डिब्रूगढ़ गये थे, डाक्टर से मिलने. अब उनका दर्द ठीक हो जाना चाहिए. आज शाम को वह देर से आने वाले हैं, कम्पनी की पंचवर्षीय योजना के टास्क फ़ोर्स में इस बार उन्हें भी शामिल किया गया है. व्यस्तता उनके लिए ठीक भी है. कल सत्संग में पहली बार एक परिचिता आयीं, जो वर्षों पहले उनकी पहली पड़ोसिन थीं. पंचकोश ध्यान भी किया, साक्षी होकर स्वयं को देखा, ऐसा लगा कितना सहज है सब कुछ, लेकिन जब तक भीतर का पता न था कितना जटिल था. परमात्मा का और उनका सहज स्वभाव कितना मिलता-जुलता है, कितना जटिल बना दिया है शास्त्रों ने, लेकिन अब शास्त्र भी अपना रहस्य खोलते चलते हैं !
वह नन्हीं ही थी अभी, जीवन के चार वसंत भी न देखे थे, किसी वस्तु को पाने की जिद की होगी या किसी के साथ बाहर जाने की, उसे इतना याद है किसी ने जोर से उसे बिस्तर पर पटक दिया..तो सारे दुलार की जो उसने पाया था यह कीमत चुकानी पडती है, यहाँ कोई सुख मुफ्त नहीं मिलता. स्कूल के दिनों की बात है, किसी कारणवश गृहकार्य की जांच समय पर नहीं करवा पायी. डांट के डर से या इस डर से कि कक्षा में जो अपनी प्रतिष्ठा है, वह दांव पर लग जाएगी, अध्यापिका के हस्ताक्षर लाल स्याही से बना लिए. भीतर कुछ टूट गया होगा, आत्मा पर एक धब्बा लग गया होगा, दुःख का एक बीज बो दिया गया होगा. लेकिन कारण था वही कि दुनिया उसे अच्छा समझे. उम्र बढती रही, भीतर नये तरह के स्वप्न जगने लगे. पढ़ाई-लिखाई छोडकर मन कल्पनाओं में गुम हो गया. आदर्श प्रेम को आधार बनाकर न जाने कितने दिवास्वप्न देखे लेकिन तब यह ज्ञान नहीं था कि स्वयं को जाने बिना, स्वयं को प्रेम किये बिना, ईश्वर को प्रेम किये बिना असली प्रेम से पहचान ही नहीं होती. भाई-बहनों के साथ झगड़े किये, दुःख के और बीज बोये. रेडियो पर गाने सुने, कानों को तृप्ति मिले, मन को तृप्ति मिले..उस मन को जिसका स्वभाव ही अतृप्त रहना है. जो कभी संतुष्ट होना जानता ही नहीं. जो सदा रोता ही रहता है, अभाव का रोना..अभी स्कूल में ही थी, एक बार घर में सबके नये वस्त्र सिले, उसके लिए क्यों नहीं आये..भीतर कोई घाव फूट पड़ा हो जैसे..माता-पिता के स्नेह पर इल्जाम लगाया कि उसे छोड़कर सभी प्रिय हैं. दुःख का बीज बोया गया. विवाह हुआ तो भीतर नये स्वप्न करवट लेने लगे..एकाधिकार की भावना ने बहुत दुःख दिया. जिस पर पूर्ण विश्वास किया वही कठोर भी हो सकता है, जो कोमल है वही कठोर भी है, लेकिन यह स्वीकार नहीं था. अहंकार को चोट लगती तो भीतर यह भाव जगा कि क्या इस जगत में बिना दुःख के कोई सुख नहीं है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मन सदा विश्रांति का अनुभव करे. यह सुख-दुःख का झूला बहुत झूल लिया अब तो इसके पार क्या है, यह देखना है. जगत का सत्य सामने आ गया यह ज्ञात हुआ कि जिन संबंधों पर जीवन टिका था, वे कुछ ऐसे तत्वों पर टिके हैं जिनके नीचे आधार नहीं है, रेत का महल है यह संसार, अपने मन के सरे खेल नजर आने लगे !




Thursday, September 1, 2016

काफिलों का दौर


बहन की डायरी के कुछ पन्ने पढ़े. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना बड़ा संसार छिपाए रखता है. हर व्यक्ति एक अपार सम्भावना लिए इस दुनिया में आता है. उसे वह बचपन से जानती है, पर लगता है कितना कम जानती है. बचपन में माँ उसकी गोद में बहन को लिटा देती थीं और स्वयं घर के काम करती थीं. उसका स्कूल दोपहर बारह बजे का था, फिर याद आता है दीदी उसके लिए सुंदर वस्त्र बनाती थीं, जिन्हें पहनकर वह परी सी लगती थी. स्कूल जाने से बहुत डरती थी. याद है पलंग के नीचे छिप जाती थी, जबरदस्ती उसे स्कूल भेजना पड़ता था. फिर नये शहर में वे दोनों एक स्कूल में गयीं. टीचर उसे चाहती थीं और नूना की कक्षा की छात्राएँ भी उसे मिलकर खुश होती थीं. जब भाभी आ गयीं तब वही उसे तैयार करती थीं. इंटर कालेज में उसने सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती थी, फिर मेडिकल की तैयारी और पांच वर्षों के लिए हॉस्टल चली गयी. नूना की शादी हो गयी थी जब वह कालेज में गयी. उसके बाद तो मिलना साल में कभी दो साल में एक बार ही होने लगा. कितना वक्त गुजर गया है. वह चाहती है उसकी डायरी पढ़कर नूना कोई कहानी लिखे, मानव मन की कहानी, उसकी इच्छाओं, कामनाओं की कहानी, पूर्णता को पाने की उसकी तड़प की कहानी, वह भी तलाश रही है लेकिन उसका मार्ग बौद्धिक है. वह चाहती है कि खुद भी बनी रहे और परमात्मा भी मिल जाये, लेकिन परमात्मा को पाने की शर्त यही है कि खुद को तो मिटना होगा, जो मिट गया स्वयं फिर उसकी कोई कहानी नहीं रहती. वह बचता ही नहीं. जून के लिए एक कविता लिखी तो है पर उसमें दर्द समा गया है, उत्साह भरी एक कविता और लिखनी होगी !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. कल दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी, कविता पढ़ी, तारीफ हुई, अच्छा लगा अर्थात जब अपमान होगा तब दुःख भी होगा. ब्लॉग पर जब कोई प्रतिक्रिया करे तो भी अच्छा लगता है, यह खतरनाक है, लेकिन तब भी कोई इस मन को देख रहा होता है, साक्षी सजग रहता है तब कोई खतरा नहीं...कल छोटी भांजी से बात की, उसे पिताजी का इतिहास चाहिए, यानि अपने नाना जी का. उसने याद किया, उनके पिता व का दादा-दादी का नाम, नाना-नानी का नाम भी. पाकिस्तान का एक जिला जन्मस्थान, स्कूल का नाम, विभाजन के समय सोलह वर्ष के थे, पचास किमी पैदल चलकर आये. दो जगह रुका उनका चालीस-पचास हजार लोगों का काफिला. बीच में बच्चे व बूढ़े थे. गाँव के लोग शामिल, हमले भी हुए, फौजियों की जीप साथ थी. पहली रात भोजन मिला, दूसरी रात सामान नहीं था. पानी की दिक्कत भी थी. छोटी बहन चार वर्ष की थी और भाई ग्यारह वर्ष का. उन पर लिखी कविता उसे भेज देगी. जून का मन जो घायल हुआ था अब धीरे-धीरे सहज हो रहा है, आज दोपहर वह कुछ पिघले, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. वह बहुत भावुक हैं और उनके लिए परिवार ही सर्वोच्च मायने रखता है. वह परिवार के लिए ही जीते हैं, उनका दिल बहुत कोमल है, कामना युक्त है पर वे जन्मों के संस्कार हैं. धीरे-धीरे वह भी स्वयं को जान लेंगे, तब तक उन्हें बहुत स्नेह और सहारे की जरूरत है. उसके जीवन का लक्ष्य तो पूरा हो चुका है अब जो भी प्रारब्ध शेष है वह पाना है और शेष लुटाना है. अनंत प्रेम, अनंत करुणा, अनंत स्नेह और अनंत खुशियाँ..भीतर अनंत खजाना है. परमात्मा उसके माध्यम से प्रकट होने को उत्सुक है, उसने स्वयं को खाली कर दिया है. सद्गुरु उसके माध्यम से गीत बनकर फूटना चाहते हैं. वह उनकी ही वाणी बोल रही है..भीतर एक सन्नाटा है और है अंतहीन फैलाव..जिसमें से ख़ुशी रिसती रहती है...टप टप टप टप...सारी दुनिया उस ख़ुशी की हकदार है और सबसे पहले जून पर उसका हक है..वह उसके जीवन में सर्वोच्च स्थान रखते हैं..उसके अन्तरंग के सहचर हैं..उनसे ही समाज में उसका नाम है. वह स्वस्थ रहें, सानंद रहें..आज तक उससे जो भी पीड़ा उन्होंने पायी है, शायद वह प्रारब्ध का खेल था..जब जागो तभी सवेरा..वह उसके लिए अब आराध्य हैं !