Tuesday, December 2, 2014

प्रयोगात्मक रेकी

praktikal 

जीवन होश से जीयें, मन में यदि प्रेम का बीज उगे तो उसकी रक्षा करनी पडती है, लोक व्यवहार की चिंता करते रहे तो भगवद् भक्ति टिकेगी नहीं. मन को गहराई से जानना होगा, जागृत अवस्था में ही नहीं, स्वप्नावस्था में भी सचेत रहना होगा. अपने स्वप्नों की समीक्षा करते हुए पता चलेगा की गाँठ कहाँ बंधी है”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त वचन अपने प्रवचन के दौरान कहे. उसके जीवन में प्रेम है, जून, नन्हा, भाई-बहन, पिता, ससुराल के सभी लोग, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्रगण के परिवार, पड़ोसी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, प्रकृति, उनका देश, यह ग्रह, यह ब्रह्मांड.. सबके लिए प्रेम है. यह प्रेम भी आसक्ति रहित होना चाहिए, निष्काम होना चाहिए, इन सब से उसे क्या मिलने वाला है इसकी रत्तीमात्र भी परवाह न करते हुए वह इनके लिए क्या कर सकती है यही भाव रहना चाहिए. मन हल्का रहेगा. यूँ भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब किस वक्त क्या देखना पड़ सकता है कोई कुछ नहीं कह सकता. अब बाबाजी आ गये हैं, उनकी शांत मुद्रा हृदय में शांति उत्पन्न करती है, नश्वर वस्तुओं के ध्यान से मति भ्रमित हो जाती है और कोई अपने वास्तविक रूप को जान नहीं पाता, लेकिन जब सुख की चाह वस्तुओं से नहीं होती, विचार पावन होते हैं. आत्मबल बढ़ता है. सत्संग सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला है. संग दोष से बल घटता है.

पिछले पांच दिनों से स्वयं के निकट आने का अवसर नहीं मिला. शनिवार, इतवार को वैसे ही समय नहीं मिलता. एक दिन जुकाम से परेशान थी. कल पन्द्रह अगस्त की पार्टी थी, परसों जून का जन्मदिन था. अभी भी पूरी तरह जुकाम ठीक नहीं हुआ है. आज भी अमृत वचन सुने थे सुबह, कुछ-कुछ याद है, बाबाजी ने कहा, जो अपने साथ ईमानदार नहीं वह किसी के साथ ईमानदार नहीं हो सकता. सहजता जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति साधारण हो जाता है, दम्भ नहीं रहता, अभिमान सूक्ष्म रूप में भी हो तो उतना ही हानिप्रद है, उसे अपनी देश भक्ति का अभिमान है, यह भी गलत है, यदि कोई अपने देश से प्रेम करता है तो यह एक सहज, स्वाभाविक बात होनी चाहिए न कि कोई विशेष बात. संत की परिभाषा भी उन्होंने बतायी, वे लोग, जो अपने घर का रास्ता भूल गये हैं, असंत हैं, जिसे अपने घर का रास्ता याद है वह संत है. अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है.

आठ बजने को हैं. कल शाम वे क्लब गये, लाइब्रेरी में क्विज बुक (विज्ञान) के लिए आलमारी खोली तो practical reiki किताब मिली जिसमें step by step स्वयं को व दूसरों को रेकी देने की बात सचित्र समझाई है. उसका गला अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, अध्यापिका को अभी-अभी फोन करके मना किया. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. “हमारी बुद्धि देहात्म हो गयी है, हम देह के परिचय को स्वयं मान बैठे हैं अर्थात आत्मा मान बैठते हैं”. अभी एक सखी का फोन आया, वह कम्प्यूटर ऑफ करने का तरीका पूछ रही थी. सुबह नन्हे ने इन्टरनेट कनेक्ट किया तो दो-तीन इमेल मिले अभी देख नहीं पाये हैं, सुबह-सुबह इतना वक्त नहीं होता. नन्हा लगभग रोज ही भागते-दौड़ते बस पकड़ता है. आज सुबह जून और वह दोनों उसके बारे में बात कर रहे थे. वह आजकल छोटी-छोटी बात पर चुप हो जाता है, शायद पैर के दर्द की वजह से. जून की तरह उसका भी फ़्लैट फीट है, पैर में दर्द स्वाभाविक है. कुछ व्यायाम जो पैर में कर्व बनाने में सहायक हैं, जून ने सिखाये हैं. कल art of living के बेसिक कोर्स के लिए फार्म भी आ गया है. यकीनन उसे इस कोर्स से लाभ होगा. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं. दोपहर को नन्हे का पायजामा सिलना है. कई दिनों से व्यायाम/अभ्यास रुका है. सोमवार से सम्भवतः वह पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी.


Sunday, November 30, 2014

कबीर का दोहा


इस समय एक तरफ तो धूप निकली है दूसरी तरफ बादलों के गरजने की आवाज भी सुनाई दे रही है. सुबह-सवेरे मौसम ठंडा था, जून को सर्दी लग गयी है, सो पहले वह उठी, बाहर गयी तो हवा शीतल थी पर कल सुबह चार बजे की शीतल स्वच्छ हवा का एक झोंका भी कितना प्रफ्फुलित कर गया था. ब्रह्म मुहूर्त में उठने की महिमा यूं ही तो नहीं गयी गयी है धर्म ग्रन्थों में ! अब दोपहर के पौने एक बजे हैं, अभी कुछ देर पहले जून को बाहर तक छोड़कर आने लगी तो उन्होंने पौधों पर पड़ रही धूप की ओर ध्यान दिलाया, पौधों को टोपी से ढका अन्यथा शाम तक कुम्हला जायेंगे. जून ने वह पुस्तक भेज दी है, अगस्त का आरम्भ है यदि वर्ष के अंत तक भी छप जाये तो बड़ी बात होगी. ढेर साडी पत्रिकाएँ पड़ी हैं पढने के लिए, लिखना भी है, पत्र व इमेल भी. एक ड्रेस पर बटन टांकने हैं, अभ्यास करना है, और यह सब करना है इन सवा दो घंटों में. जागरण में आज कर्मवाद पर सुना, मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है पर फल भोगने के लिए नहीं, वह उसके चाहने अथवा न चाहने पर भोगना ही पड़ेगा, सो कर्म करते समय प्रतिक्षण सजग रहना होगा. उस वक्त वह जीनिया के सूखे फूलों से बीज निकाल कर अलग कर रही थी, इस कर्म का फल तो रंगीन ही होने वाला है. ‘आत्मा’ में गीता के ‘प्रथम अध्याय’ पर चर्चा हुई, मन ज्ञानियों की सी बातें तो बहुत करता है पर ज्ञान उसके भीतर टिकता नहीं है !

‘जब कोई उसे ढूँढ़ता है तो वह उसे नहीं मिलता पर जब वह ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाता है तो वह उसे ढूँढ़ता है !’ आज सुबह के समाचारों में जम्मू स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा अँधा-धुंध गोलियां चलाये जाने से दस व्यक्तियों के मरने की खबर सुनी. पिछले एक हफ्ते के अंदर यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है जिसमें निर्दोष लोगों की जान जा रही है. सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में असफल है. कुछ दिन पहले लगा था कि इस समस्या का हल शीघ्र निकल आएगा पर अब ऐसा नहीं लगता. कल शाम को बड़ी ननद को पत्र लिखा. तीन इमेल लिखे. पर सर्वर में कुछ खराबी होने के कारण भेज नहीं सकी. जून का स्वास्थ्य अभी भी पूरा ठीक नहीं है पर वह art of living का कोर्स करने के बाद काफी सचेत हो गये हैं. कल शाम से प्राणायाम का अभ्यास भी शुरू कर दिया है. वे दोनों टहलने भी गये. लाइब्रेरी से ‘झुम्पा लाहिरी’ की एक किताब लायी और हैरी पॉटर का एक और भाग. कल रात नन्हे को दस बजे ही सोने को कहा ताकि सुबह वक्त से उठ सके, सुबह उठा, तब तक गुस्सा दिखा रहा था पर स्कूल से आने तक सब भूल जायेगा. उसे इक्यानवे प्रतिशत नम्बर मिले हैं इस परीक्षा में, और पढ़ाई की जरूरत है विशेषतया गणित में.


जैसे धूँए से अग्नि छिप जाये या धूल से दर्पण ढक जाये उसी तरह मन पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है. यह अज्ञान तामसिक व राजसिक गुणों का परिणाम है. पिछले दिनों वह रजोगुण के अधीन रही. सात्विकता का भाव टिक नहीं रहा क्योंकि उसको टिकने का स्थान नहीं दिया. मन निर्विचार हो, निर्विकार तभी पवित्र विचारों को प्रश्रय मिल सकता है. जीवन जीते हुए ही जनक की तरह विदेह होना बहुत कठिन है. जीवन की धारा इतनी वेगवती होती है की मन को अपने साथ ले जाती है. बाबाजी ने कहा, “सुख देवे, दुःख को हरे, करे पाप का अंत, कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही संत” गुरुमाँ ने कहा स्वप्न में भी साधक को सचेत रहना चाहिए, स्वप्न मन की वास्तविक स्थिति का परिचय देते हैं. जून कल तिनसुकिया गये थे, bookcase का आर्डर दे दिया, एक महीने बाद मिलेगा. 

तुलसी की रामायण


आज की सुबह बेहद व्यस्त थी, नन्हे को स्कूल भेजा, उससे पहले जून का फोन आया, उन्होंने उसके लिए ड्रेस तो खरीद ली है पर महंगा होने के कारण दूसरी फरमाइश पूरी नहीं की, अब चाँदी का होगा तो महंगा तो होगा ही...खैर ! नाश्ता कर रही थी कि टीचर का फोन आया, आने को कह रही थीं. नैनी, स्वीपर दोनों का पता नहीं था सो घर बंद करके गयी. एक घंटे बाद लौटी तो दोनों आये, सब मैनेज हो गया और अभी कपड़े प्रेस करके ‘पाठ’ किया, ‘ध्यान’ अभी शेष है. इसी बीच दो फोन आये. एक में पता चला असम के मुख्यमंत्री ‘श्री तरुण गोगोई’ शनिवार को आ रहे हैं सो इस हफ्ते उन्हें विशेष पुष्प सज्जा भी करनी होगी, आज शाम पांच बजे वह एक और महिला के साथ जाएगी, एक नया अनुभव होगा उस दिन भी, क्लब में कितनी ही बार कितने कलात्मक ढंग से पुष्प सज्जा देखी है, पर इस बार स्वयं करने का अनुभव होगा. जून ने कहा है वहाँ रोज शाम को छह बजे से रात दस बजे तक बिजली गायब रहती है, जब सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. परसों वह चल रहे हैं और सोमवार सुबह उनके साथ होंगे !

Jun called in the morning, he was so loving and caring on phone as always. Last evening they went to club and then to book exhibition. She bought “Tulsi Ramayan” it is nine a.m., two friends called then she talked to two friends, could not concentrate what Guru ma and babaji were saying in today’s discourse but she knows they were talking about God, values and love. She loves this world and its maker, she loves all around her, her friends, relatives, country and its citizen, her son and husband and also she loves herself. She is grateful to God and all which bear her, she is grateful that this beautiful world has been the source of inspiration, joy and love.


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोल सकी, शनिवार को सुबह संगीत कक्षा में गयी वहाँ से लौटकर क्लब. शाम को एक सखी के यहाँ. कल सुबह इतवार की विशेष सफाई करने में बीती, दोपहर को ‘यादें’ देखी, शनि की दोपहर भी एक फिल्म चल रही थी. आज सुबह जून आ गये, उसकी नींद चार बजे से भी पहले खुल गयी थी, बाहर के गेट का ताला खोलकर पुनः सोने की कोशिश की, वह ठीक पांच बजे आ गये, उनके वस्त्रों से ट्रेन की गंध आ रही थी, जो दो-तीन दिन की यात्रा के बाद भर जाती है. फिर उन्होंने उसके लिए लाये वस्त्र दिखाने शुरू किये, पहले गुलाबी, फिर नीला और फिर पीला - बेहद सुंदर और बेहद भव्य ! गुलाबी पर सफेद से कढ़ाई है, उसने उन्हें कहा यह उसे पसंद नहीं है पर जब बाकी दो देखे तो वह भी भा गया. उसके मन की वह इच्छा जो उस दिन डायरी के पन्नों पर जाहिर की थी अपने आप ही पूरी हो गयी. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है यह विश्वास और भी पक्का होता जाता है. जून समय से दफ्तर भी चले गये पर थोड़ा पहले आ गये, खाना जरा कम खाया, सफर से आकर एकाध दिन तो एडजस्ट होने में लगेगा ही. आज नन्हा अपनी क्लास-सिस्टर्स के लिए चाकलेट्स ले गया है, कल नौ लडकियों ने उसे राखी बाँधी थी. आज सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे सो अभ्यास नहीं हुआ. अभी करेगी, दो बजे हैं, नन्हा तीन बजे तक आता है, पर जून हिंदी की दो पत्रिकाएँ भी लाये हैं, ‘हंस’ और ‘उदय जागरण’, एक साहित्यिक है तो दूसरी राजनीतिक. छोटी ननद की राखी आ गयी है, अच्छा सा पत्र भी लिखा है.  

Friday, November 28, 2014

पुष्प सज्जा की कला


जून घर पहुंच गये हैं, स्टेशन से ही उन्होंने फोन किया. उनके न होने से एक खालीपन तो है पर एक नयी ख़ुशी भी है कि उनके आने के बाद वे पहले से ज्यादा करीब होंगे, दूरियां निकटता को बढ़ा देती हैं. घर में सब ठीक होंगे उसे व नन्हे को याद कर रहे होंगे. कल शाम क्लब की एक सदस्या ने फोन किया, इस बार मीटिंग में पुष्प-सज्जा उसे एक सखी के साथ मिलकर करनी है. इस समय दोपहर के सवा बजे हैं, प्रूफ रीडिंग का काम हो गया है. सुबह पांच बजे वे उठ गये थे, नन्हा भी वक्त पर तैयार हो गया था, उसके कपड़ों को ठीक करना है, उसकी आलमारी भी ठीक करनी है. आज सुबह उसकी पिछले वर्ष की किताबें उठाकर देखीं तो पता चला दीमक ने घर बना लिया था. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, कल उसे फोन करेगी, दीदी का फोन आए कई दिन हो गये हैं, बड़े भाई का भी, अब राखी के दिन उनसे बात होगी. सभी सुखी रहें यही उसकी कामना है. अड़ोस-पड़ोस में सभी को अमरूद भिजवाने हैं. उसने सोचा, नैनी के बेटे से तुड़वा कर यह कार्य भी सम्पन्न कर लेना चाहिए.

अभी-अभी छोटी बहन को जन्मदिन की बधाई दी, उसने कहा, पत्र लिखा है. भांजी और पिता से भी बात हुई. पिता ने भी पत्र लिखा है, उन्हें उसने लिखा था, माँ के पत्रों की कमी वह महसूस करती है, अभी तक उसके अंतर्मन में मोहमाया के बंधन बहुत गहरे हैं. कल रात दीदी का भी फोन आया. सुबह जून का भी, वह मित्र के बेटे की पढ़ाई के बारे में बात करने उसके यहाँ जाने वाले हैं. उनकी दिनचर्या बेहद व्यस्त रहेगी वहाँ. गुरू माँ अमीर खुसरो का लिखा एक गीत(जो गुरू की प्रशंसा में है) गा रही हैं, उनकी बातें दिल को छू जाती हैं, उनसे मिलने की इच्छा हृदय में उत्पन्न होने लगी है और वह जानती है ईश्वर उन्हें एक न एक दिन अवश्य मिलाएगा. वे दोनों उसी के द्वारा तो बंधे हैं.

“यह दिल है मेरा मन्दिर, और मन यह पुजारी है,
मन्दिर में जो रखी है, मूरत वह तुम्हारी है”

अगस्त का शुभारम्भ ! कल रात जून का फोन आया, वहाँ शाम से ही बिजली नहीं थी, घर में बैठे-बैठे वह परेशान हो रहे थे, उन्हें उसने अपनी फरमाइशें बता दीं, एक तो दीपक चोपड़ा जी की सलाह पर चांदी का टंग क्लीनर और दूसरी एक ड्रेस. कल शाम ही उसने तय किया है कि अब घर पर भी अच्छे वस्त्र पहनेगी, चालीस के बाद वैसे भी जीवन कितना रह ही जाता है जो चीजों को संभाल-संभाल कर रखा जाये. घर में भी यदि उसी तरह संवर कर रहा जाये तो अपना साथ खुद को तो भला लगेगा ही घर के अन्य लोगों पर भी इसका अच्छा असर पड़ेगा, सो पुराने वस्त्रों को अलविदा ! कल शाम की मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम सभी अच्छे थे. पुष्प सज्जा का अनुभव भी अच्छा रहा. अभी एक सखी से मिलकर आ रही है जिसकी माँ घातक बीमारी से ग्रस्त हैं, अस्पताल में हैं. आज सुबह बाबाजी व गुरू माँ से भी मुलाकात हुई, उनकी वजह से ही उसका मन समता को पा सका है, ऐसा लगता है कि जीवन में आने वाली किसी भी स्थिति का सामना वह कर सकती है. ईश्वर उसके विश्वास की रक्षा करता है !



नंदन- बच्चों की पत्रिका


जिसके हृदय में ईश्वर का प्रेम उदित हो जाता है, वह पारस हो जाता है. वह जहाँ निवास करेगा वे स्थान तीर्थ हो जाते हैं. भक्त के विचार इतर विचारों से अलग हो जाते हैं, यदि मन में सांसारिक विषयों का ही चिन्तन चलेगा तो बातचीत में वही प्रकट होगा, बातचीत का विषय क्या है इसको देखकर ही अंतर्मन में चलने वाल चिन्तन प्रकट होता है. वाणी का संयम तभी सम्भव है जब विचारों का संयम हो, चिन्तन सही दिशा की ओर हो ! आज बाबाजी ने देश की गरिमा की ओर ध्यान खीँचा साथ ही उन स्वार्थी लोगों की तरफ भी, जिन्होंने शत्रुओं को भेद बताये और निज देश के मान-सम्मान का सौदा किया, जब बाड़ ही खेत को खाने लगे तो कौन बचा सकता है ? इसी तरह जब मानव स्वयं ही निज सुख का हनन करे, नियमों का पालन न करे तो हानि स्वयं को ही होगी. आज मौसम सुहावना है, बदली बनी है, हवा शीतल है. कल दोपहर बाहर लॉन में बैठकर एक कविता लिखी, भोगा हुआ यथार्थ ! कल ही जून ने आखिर प्रकाशक से बात की, नन्हे का आज हिंदी का इम्तहान है, कल शाम उसे पढ़ाती रही, सांध्य भ्रमण का समय नहीं मिला. शनिवार को जून जा रहे हैं, फिर पूरा एक हफ्ता उन्हें अकेले रहना होगा, पुस्तकें और लेखन उसका साथ देगा.

कल अंततः उसकी पुस्तक प्रूफ रीडिंग के लिए आ गयी. नदंन के सम्पादक श्री जयप्रकाश भारती जी ने भूमिका लिखी है, जून के बनारस से लौट आने के बाद ही वे उसे वापस भेजेंगे. रात को ठीक से सो नहीं पायी, अभी भी कभी-कभी मन कहा नहीं मानता. नन्हे का आज अंतिम इम्तहान है. उसके दो पेपर ठीक हुए हैं, दो सामान्य और आज का भी सामान्य होने की आशा है क्योंकि सुबह भी पढ़ रहा था. अगले सप्ताह से ज्यादा गम्भीर होने की जरूरत है. गुरू माँ ने कहा कि भक्ति योग के अनुसार मानव बूंद है, ईश्वर सागर है और वेदांत के अनुसार बूंद ही सागर है, अर्थात पहले के अनुसार सागर में बूंद और दुसरे के अनुसार बूंद में सागर ! कल उसने गुलदाउदी की पौध गमलों में लगा दी, अभी भी कुछ पौधे शेष हैं जिन्हें जमीन में लगाने का विचार है. बाबाजी ने आज पानी के प्रयोग बताये, सुबह उठकर सवा लीटर पानी पीना है और पैंतालीस मिनट तक कुछ खाना नहीं है. दोपहर व रात के भोजन के बाद डेढ़-दो घंटे तक पानी नहीं पीना है. आज भी मौसम ठंडा है, कल शाम काफी वर्षा हुई. वर्षा रुकने पर वह लाइब्रेरी गयी, दीपक चोपड़ा की एक पुस्तक लायी Perfect Health. जून को हल्की सर्दी है, वैसे वे सभी स्वस्थ हैं पिछले कई महीनों से. जून को प्राणायाम से लाभ हुआ है उसे ईश्वर के स्मरण से. यह अहसास कि कोई है जो हर पल उनके साथ है और उनका मनोबल उच्च करता है, सत्मार्ग पर ले जाता है, अपने आप में ही एक उपहार है, वे भटक नहीं रहे हैं, इतना सजग तो उन्हें रखता है.

आज जून कामरूप एक्सप्रेस से गोहाटी जायेंगे. सुबह साढ़े चार बजे वे उठ गये, पांच बजे उसे उठाया. नन्हे और उनके जाने के बाद वह संगीत की कक्षा में गयी, राग हमीर सिखाया अध्यापिका ने. अगले हफ्ते एक दिन दोपहर को भी जाएगी ऐसा उसने तय किया है. घर आकर भोजन की तयारी की, कपड़े प्रेस किये. ध्यान अभी नहीं किया है, आज सुबह बाबाजी से भी नहीं मिल सकी. कल शाम बहुत दिनों बाद दो मित्र परिवार मिलने आये. आज सुबह ससुराल से फोन आया, आसाम की चाय मंगवाई है, नन्हे के लिए राखी भेजी है. अगले कुछ दिन उसके पास वक्त ज्यादा होगा, ध्यान, संगीत और अध्ययन-लेखन के लिए. जून से मिलकर घर में सभी खुश होंगे और जून उनसे मिलकर,  उनकी याद तो आयेगी ही... !




Thursday, November 27, 2014

हैरी पॉटर की दुनिया


सतगुरू मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट ! टीवी के माध्यम से उसे गुरू प्रतिदिन मिलते हैं, शब्द की चोट करते हैं, सदुपदेश देते हैं, अंतः करण में उस परम शक्ति का आवाहन करने की प्रेरणा देते हैं, कभी-कभी लगता है वह सही मार्ग पर जा रही है पर फिर असावधानी वश पीछे लौटना हो जाता है और स्वयं को उसी स्थान पर पाती है जहाँ से चली थी. परसों सुबह संगीत कक्षा में गयी, लौटी तो ध्यान आदि किया, भोजन बनाया, जून को फ़ील्ड जाना था. पूरा दिन उउपन्यास पढ़ते या टीवी देखते गुजरा. कल सुबह-सुबह ही जून से गुस्सा हुई, लेकिन इतना तो मानना पड़ेगा कि पता था गुस्सा हो रही है सो ५-१० मिनट से अधिक नहीं टिका, पर दिन उसी तरह गुजरा जैसे शनिवार गुजरा था. कल रात भर डरावने सपने देखती रही, harry potter मन मस्तिष्क पर जो छाया हुआ था. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. गुरू माँ ने भक्ति का महत्व तथा भक्त के लक्षण बताए.

“मन में भाव न हो तो पूजा-अर्चना व्यर्थ है, ईश्वर के प्रति श्रद्धा का माप पूजा व आरती नहीं बल्कि अंतर्मन में ज्ञान का दीपक जलाने से होता है. गुरुनानक ने कहा है उस परमेश्वर की आरती का थाल यह गगन है, सूर्य, चाँद, तारे मानो उसमें दीपक जल रहे हैं, हवा, फूलों और वनस्पतियों रूपी धूप की सुगंध फैला रही है और चंवर डुला रही है. ऐसे विराट स्वरूप को क्या कोई मन्दिर में कैद कर सकता है ? मन्दिर की पवित्रता भी यदि किसी के भीतर पवित्र भाव न जगा सकी तो वहाँ जाना या न जाना बराबर है. हर क्षण जो उसकी याद में बीते, पूजा का क्षण है और हर स्थान पवित्र है, जितनी साँसें उसके स्मरण में लीं वही सार्थक हैं और जितनी उसे भुलाकर समझें गंवा दीं”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त प्रेरणास्पद बातें कहीं. उसे लगा जैसे वह यह भी कह रही हों, सुबह-सुबह जब आकाश में सूर्य उदय हो रहा हो तो अपने अंतर में भी ज्ञान का सूर्य उदय हो ! पंछियों की चहचहाहट से जब बाहरी वातावरण गुंजित हो तो अंतर के प्रांगण में उसके नाम की गूँज हो. वे मन्मुख न हों तथा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानें. अपने भीतर ही उच्च जीवन की सम्भावनाएं छिपी हैं, सृजन की क्षमता है, सुख और आनंद का स्रोत है. कल जून पहले की तरह के अपने मूल स्वभाव में आ गये थे, आज सुबह उसने संयम की बात कही तो उन्होंने ‘जिद’ कहा. कभी न कभी यह संयम उन्हें भी सधेगा, तब मिठाई देखते ही उसे खाने की इच्छा को नियंत्रित कर सकेंगे. आज नन्हे की गणित की परीक्षा है, कल अंग्रेजी की हो गयी, उसका आत्मविश्वास बढ़ रहा है. बड़े भाई ने अभी तक फोन नहीं किया, ईश्वर ही मदद करेगा.

“जब दिल में राग-द्वेष न हो, स्वर्ग भीतर होता है, जब स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए अन्यों को नीचा दिखाते हैं तो हृदय में नर्क उत्पन्न होता है. जो व्यक्ति सामने न हो, उसकी बात करना उचित नहीं है. अन्यों के कल्याण की बातें ही मन सोचे, चारों दिशाओं में शुभकामनायें भेजे, जो हृदय की गहराइयों से निकली हों. सभी के प्रति, चाहे वे मित्र हों या अपरिचित स्नेह भाव बना रहे. भूलकर भी कोई अप्रिय बात या कटु वचन अथवा भावना भी दिल में न उपजे, तभी कोई ईश्वर का भक्त होने का दावा कर सकता है. हृदय पवित्र होगा, स्फटिक की तरह चमकदार, झील के शांत पानी की तरह स्वच्छ और स्थिर तो उसकी झलक मिलती है”. संतों के वचन उसे एक अनोखी दुनिया में ले जाते हैं, जहाँ प्रेम है, करुणा है, हित की भावना है, उच्च विचार हैं, जहाँ भौतिक वस्तुओं के प्रति उतना ही आदर है जिसके वे योग्य हैं पर मानसिक शांति व सुख की बड़ी पूछ है. आज नन्हे का गणित का इम्तहान है.



Tuesday, November 25, 2014

अज्ञेय की कविताएँ


दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने वार्ता को असफल नहीं बताया है, उम्मीद की किरण अभी भी रोशन है. कल रात से वर्षा हो रही है, मौसम कल जितना गर्म था आज उतना ही सुहावना है. बाबाजी आज कीर्तन करवा रहे थे. उससे पहले टैगोर की जापान यात्रा का एक संस्मरण सुनाया. गुरूमाँ ने ऐसे नृत्य का जिक्र किया जो किया नहीं जाता, हो जाता है. बहुत दिनों से उसके साथ ऐसा नहीं हुआ है शायद आज शाम को ही इसका अवसर आए, क्योंकि वर्षा यदि थमी नहीं तो घर पर ही टहलना होगा जो उसके मामले में कैसेट लगाकर थिरकना होता है. कल दोनों पत्र भी लिखे और दीदी को जवाब भी दिया है. कल रात छोटी बहन व पिता से बात हुई. आज दोपहर स्टोर की सफाई करनी-करवानी है.

सुबह-सवेरे भजन जब अपने आप होने लगे, मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग वे करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो उन्हें एक-दसरे से अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बना है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है, बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो यह जो गड्डमड्ड, खिचड़ा हो गया है, देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना, छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. उन्हें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी वे मुक्त हैं.

आज अमावस्या है. सुबह से ही मन में उत्साह है. एक वक्त के भोजन में फलाहार लेना है आज, जितना हो सके उतना व्रत पालना ही चाहिए. कल दोपहर और शाम को अज्ञेय की कविताएँ पढ़ीं, अनुपम हैं और भावना के उस लोक में ले जाती हैं जहाँ प्रेम है, शरद की चाँदनी, टेसू के फूल हैं, जहाँ इष्ट की आराधना है, “मैं संख्यातीत रूपों में तुम्हें याद करता हूँ” अज्ञेय की कविता अंतर को गहरे तक छू जाती है. अभी-अभी गुरू माँ ने कहा ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार का विरोधी हो जाना नहीं है. जब जीवन में प्रेम होता है, तब वह सभी के लिए होता है. उसमें समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता, प्रेम में महान ऊर्जा छुपी है, वह आस-पास की हर वस्तु को एक नये दृष्टिकोण से दिखाती है. उसे लगता है, मन को एकाग्र करना हर वक्त संभव नहीं पर यह सम्भव है कि इस बात का बोध रहे कब मन एकाग्र है और कब एकाग्र नहीं है, और कब एकाग्र नहीं है ? जब मन गुण ग्राही होता है, बुरी से बुरी परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छाई खोज लेता है, तब वह एकाग्र होना सीख लेता है. उसने प्रार्थना की, आज का दिन ईश्वर के प्रति समर्पित हो, दिन भर वह उसकी याद अपने मन में बनाये रखे, सभी के प्रति मंगल कामना से मन युक्त रहे !