Sunday, August 11, 2013

प्रेम का इन्द्रधनुष



Love is the light of life and its first colour is patience. Today in the morning Dada J P. Vasvani told this beautiful discourse. These morning thoughts have become essential for her. Yesterday she could not listen and felt some void whole day. Today while Nanha was dressing for school she tried to explain him the importance of patience but he was not ready to listen about such things, perhaps he is young yet or that was not the proper time or proper way to tell him such serious things. Today’s children or children of any age do not like “updesh” they want practical examples. Yesterday she was frightened, when jun took about 2 hours to reach home, she was praying for his safety, was it love or her cowardliness ? Then they went to a friend’s house, she made nice tea and served papad. Yesterday they got another letter from father, he knew about that check which they sent for them but they have not accepted it.

The second colour in the spectrum of love is ‘kindness’. Kindness towards all living beings. The opposite of love is not hate but apathy or indifference towards others, animals and birds. Today dada vasvani told about 2nd ray of love and she is feeling such a void in her heart, so many times she did not show any type of kindness towards animals, for a fleeting moment a thought came in mind but could not help them practically. There is a feeling of indifference towards poor and beggars too. She could not help them by money but at least she can listen them but knows in her heart of heart that it will not be possible too… then the solution is whenever and where ever the situation arises she should try her best and rest is will of God. When He is with us, why to worry? Yesterday she stitched a frock for her niece and one will stitch today. Today is sunny weather.  और हमेशा की तरह भाषा की जंजीर ने रास्ता रोक दिया था, विचारों का प्रवाह रुक गया था और ऐसा होने पर मस्तिष्क जैसे एक दबाव महसूस करने लगता है. कल The Dangerous Fortune के कुछ और पेज पढ़े, आज समय नहीं मिल पायेगा. उसकी दायीं आँख में चुभन हो रही है इससे भी लिखने में ध्यान केन्द्रित नहीं हो पा रहा है. दूध वाला भी घंटी बजा रहा है.

Today morning she got up early and could listen from the beginning. Dada told some practical suggestions to attain the peace of mind. He stressed on taking the things easy and to meditate for some time daily, at same time. She sat in silence after reading Gita and felt some unusual calmness and concentration which was not possible without some help and help was from God. She did not feel the weight of her limbs and not a single thought other than meditation came to her mind. It was a great experience. Later  the whole day she was immersed in some different kind of peace of mind and body. आज मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, अभी कुछ देर पूर्व वे टहल कर आये, गर्मी लग रही थी. इस सर्दियों की पहली शाम जब स्वेटर से उलझन हो रही थी. होली भी आने वाली है और मार्च का आरम्भ हो चुका है. यानि वसंत का मौसम और शीत का प्रस्थान.











Saturday, August 10, 2013

अंगूठे का दर्द


आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है कल शाम वे एक मित्र की शादी की सालगिरह की पार्टी में गये. उसने वही ड्रेस पहनी थी जो जून लाये थे, सभी ने तारीफ की. खाना अच्छा था, गृहणी ने घर सलीके से सजाया था, शांत स्वभाव की है, और धीरे-धीरे बोलती है, क्या जीवन की इन छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करना गलत हो सकता है, कभी-कभी ऐसा भी होता है. जब कोई इन छोटी-छोटी बातों को याद करता है, क्या ये पल उसने व्यर्थ गंवाए ऐसा कहना या मानना ठीक है? ईश्वर ने यह सुंदर संसार और महसूस करने वाला मन दिया है, किसी को पीड़ित न करते हुए बिना किसी राग-द्वेष के सुखी रहना और हो सके तो दूसरों को सुखी करना क्या इतना पर्याप्त नहीं है ? संसार में रहकर उसमें लिप्त हुए बिना सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करते जाना और जो मार्ग में आये उसे अपने हित में साधते जाना..नैतिकता के मूल्यों को समझ कर उन्हें धारण करना और सुख-दुःख दोनों में समभाव बनाये रखना यही पूजा इस जन्म में उसके लिए पर्याप्त है. आध्यात्मिकता का अर्थ अच्छाई पर विश्वास, नैतिकता पर पूर्ण श्रद्धा और संयमित जीवन चर्या ही है.

वही कल का वक्त है, पर मौसम कल जैसा नहीं है, धूप निकल आई है. रातभर की मूसलाधार वर्षा के कारण बढ़ गयी ठंड से राहत दिलाती फरवरी की धूप भली लग रही है. ‘जागरण’ आजकल नहीं देख पा रही है, आजकल प्रवचन की जगह उसमें कोई साक्षात्कार दिखाया जा रहा है. कल उसका टेबल टेनिस का मैच है, उसे यकीन है कोई पुरस्कार तो जीतेगी. अभी कुछ देर पहले एक १८-२० साल का लड़का सफेद धोती पहन कर आया श्राद्ध के लिए पैसे मांग रहा होगा, वह उसकी ड्रेस देखकर ही समझ गयी थी, भीख मांगने का यह बहुत बेहूदा तरीका है.

आज भी पीटीवी पर ‘आधा चाँद’ देखा सुना, पर आज की शायरा में वह बात नहीं थी, सामान्य सी शायरी थी, पर उन्हें अपने पर यकीन था और जिसे खुद पर यकीन होता है वह शायर चाहे अच्छा न हो इन्सान जरुर अच्छा हो सकता है. वह जापानी सिखा चुकी हैं और आज भी सर्विस करती हैं, फिर भी इतना वक्त निकल लेती हैं की मुशायरों में शिरकत कर सकें और इधर वह है कि अपने इस छोटे से घर को ही दुनिया मानकर खुश रहती है. शायद इस जन्म में यही उसकी दुनिया है अपने चंद टूटे-फूटे अश्यार के साथ.

कल मैच में उसने एक मैच जीता पर दो हारे, रात भर इसी के सपने आते रहे. कई चीजों का असर जानबूझ कर न लिया जाये तो भी गहरा पड़ता है, सुबह उठते ही जागरण में ‘श्री सिंघल’ के विचार सुने, क्वांटम थ्योरी के अनुसार शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया फिर प्रकृति और पुरुष अर्थात ईश्वर के सम्बन्ध को. प्रकृति में कुछ भी कारण रहित नहीं होता पर ईश्वर के विधान में कारण खोजना व्यर्थ है. इसी तरह सुख, शांति, प्रेम और इसी तरह की भावनाएं देने से बढ़ती हैं तथा दुःख, अपमान और इसी तरह की भावनाएं लेने से. प्रश्नकर्ता ने उनसे पूछा था, सदा सुख का अनुभव हो तथा दुःख से मुक्ति, ऐसा क्या सम्भव है ? सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करने से वे बढ़ती हैं पर आत्मिक वस्तुओं को बांटने से वे बढ़ती हैं, इस विरोधाभास को समझ कर उसे  ग्रहण कर लेने पर दुःख की प्रतीति नहीं होगी और सुख का अभाव नहीं होगा. आज गीता के चौदहवें अध्याय में सत्व, रज और तम गुणों के बारे में पढ़ा, कल शाम को तम गुण का असर ज्यादा हो गया था जो जून के मन को अपनी बेवजह की तकरार से चोट पहुंचाई, वह किस तरह चुप हो गये थे जैसे कोई फूल मुरझा गया हो पर आज वह जरुर खुश होंगे क्योंकि उनकी पसंद के भोजन ने उनके दिल को पहले सा भर दिया होगा. वह उसके दिल की बातें खूब समझते हैं बस कहने का अंदाज अलग है, उसे भी तो इतने सालों में समझ जाना चाहिए कि ही इज मैन ऑफ़ एक्शन नोट वर्ड्स, उसने मन ही मन उनसे क्षमा मांगी. आज उसने छह पत्र लिखे और होली के लिए सफाई भी शुरू की. नन्हा स्कूल से आ गया है और उसके toenail में बहुत दर्द है फिर भी फोन करके अपने मित्र को बैडमिन्टन खेलने के लिए बुलाया है.


Thursday, August 8, 2013

ईद का अवकाश


अपने आप को जानो’ आचार्य गोयनका जी का प्रवचन आज सुबह फिर सुना. ध्यान लगाने बैठी तो मन को मुश्किल से दस मिनट के लिए ही स्थिर रख पायी. उन्होंने कितना सहज उपाय बताया है कि मात्र सांस का आना-जाना ही अनुभव करो. मन को उस बिंदु पर केन्द्रित करो जहाँ से साँस आती व जाती है पर मन है कि एक क्षण में कुछ का कुछ सोचने लगता है. अभ्यास से वह अवश्य ही केन्द्रित कर पाएगी. कल शाम उसने कुछ शेर लिखे, ग़ालिब की पुण्य तिथि थी, शायद उसी का असर था. जून आज जल्दी घर आ गये हैं,  कल शाम वे साइकिल से क्लब गये थे, शायद वापसी में सर्द-गर्म हो गया. कल शाम को उसने ‘मारियो पूजो’ की पुस्तक The Dark arena पढ़नी शुरू की है, रोचक है और भाषा भी सरल है.

शनिवार को पीटीवी पर एक पाकिस्तानी शायरा के ‘आजादी’ के पैगाम को सुनकर और वह  खूबसूरत नज्म “सफर जारी रहना चाहिए”....’इसी शहर में सुबह से शाम तक बस एक थैला और एक रोटी....बड़ा मजा आता है’ सुनकर उसके मन में भी घर से निकलने का जोश तारी हो गया. और पड़ोसिन के यहाँ गयी. उसे तो बड़ा मजा आया पर उसकी आजादी की कीमत जून को चुकानी पड़ी. उस शायरा ने यह भी तो कहा था कि एक की आजादी की हद वहीं तक होनी चाहिए जहाँ से दूसरे की आजादी शुरू होती है. पर यह बात उसकी समझ में नहीं आई. दोपहरी थोड़ी सी उदास होकर ठीक हो गयी, शाम क्लब में ‘फ्लावर शो’ देखने गये, फिर एक मित्र के यहाँ, पर वे व्यस्त थे, अनचाहे मेहमान की तरह कुछ देर रुक कर वे वापस आये. आकर कुछ देर साइकलिंग की. इतवार शाम वे क्लब गये टीटी खेलने, जून के साथ घर आकर क्रिकेट मैच देखा, भारत अपना पहला मैच जीत गया. आज फिर खत लिखने हैं, बहुत दिनों बाद बड़ी भाभी का पत्र आया है, वर्षों बाद पाए मातृत्व से वे अभिभूत हैं. मंझले भाई का पत्र भी आया है, लिखता है, उसके पत्र का इंतजार रहता है, आखिर भाई किसका है. अपने आप से किये वायदे को निभाना ज्यादा जरूरी है न कि दूसरों से किये वादों को.

...और आज धूप फिर से निकल आई है, कल दोपहर को फोन पर उस सखी से बात करके दोस्ती का सूरज फिर से निकल आया था, शायद वे खुद भी नहीं जानतीं कि इस मित्रता की जड़ें कहीं गहरे जा चुकी हैं. कल दोपहर पत्र तो नहीं ही लिख पायी, अख़बार पढ़ती रही, और फिर स्वेटर बनाया, शाम को क्लब. आज सुबह गोयनका जी को देर से सुना, कह रहे थे ‘धर्म सार्वजनीन है, प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक जीवन व्यतीत करके अपने जीवन को शांत, सरस व सुखमय बना सकता है’.


आज इदुलफितर है, जून और नन्हे दोनों का अवकाश, और उसका काम तो रोज की तरह ही है. गृहणियों की छुट्टी कभी नहीं होती, लेकिन उसे अपनी यह दिनचर्या भाती है. जून मार्च में उनकी यात्रा के लिए टिकट बुक कराने तिनसुकिया गये हैं. नन्हा आराम से स्नान कर रहा है. छुट्टी के दिन वह स्टीम बाथ लेता है. आज भी बदली छाई है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग थी उसने वही आसमानी सिल्क की साड़ी पहनी जो जून लाये थे. उस साड़ी की तारीफ़ भी हुई, सचमुच जून की पसंद बेहद अच्छी है. जीप की आवाज आ रही है, लगता है वह आ गये हैं और वहीं से इशारा भी किया है, टिकट मिल गयी है. 

खट्टे मीठे बेर


आज उसने पहली बार सत्तू की कढ़ी बनाई है, सोचा, पता नहीं जून को पसंद आती है या नहीं, वैसे ज्यादातर उसे नूना की बनाई हर डिश पसंद आ जाती है, नन्हे और उसका स्वाद ही तो नखरीला है. कल शाम ‘क्रिकेट विश्वकप’ का उद्घाटन समारोह देखा, भव्य और आकर्षक था. दोपहर को उसकी एक सखी आई थी उसने बताया, वह अपने समय का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूजा-पाठ में व्यतीत करने लगी है. उसके लिए वह खुश तो है पर एक बात की आशंका भी है, यह सारे व्रत-उपवास जिस उद्देश्य के लिए वह कर रही है, वह पूर्ण न हुआ तो क्या वह भ्रमित नहीं हो जाएगी, हो सकता है उसका उद्देश्य मात्र समय का सदुपयोग करना और मन को शांत रखना हो, इस दृष्टि से वह सुखी रहेगी. पर अब जब चाहे जिस विषय पर बात करने की आजादी नहीं रहने से उससे बातें करने का आकर्षण ही चला गया है. आज सोमवार है यानि पत्रों के जवाब का दिन. कल माँ-पापा का पत्र मिला, उन्होंने उसके इसहार का लिहाज करते हुए तांत की साड़ी के लिए लिखा है. आज शाम वे दोनों घरों पर फोन करने के लिए पीसीओ भी जायेंगे.

आज वेलेंटाइन डे है, और आज सुबह-सुबह ही उसने नन्हे को धीरे-धीरे खाने के लिए डांट लगाई, पर हर बार की तरह अगले कुछ ही मिनटों में सब भुलाकर वह पूर्ववत हो गया, काश ! बड़े भी खास तौर से वह भी ऐसी ही हो पाती. इस समय वह उपमा खा रहा है और यकीनन सुबह की डांट की परवाह किये बिना अपनी तरह से ही धीरे-धीरे खा रहा होगा. अभी अभी क्लब की सेक्रेटरी का फोन आया वह क्लब बुलेटिन भेज रही हैं, इस बार वह अपने एरिया की को-ऑर्डिनेटर जो है. आज सुबह से इसी सिलसिले में दस फोन आ चुके हैं, सुबह उसने भी अपनी बायीं ओर वाली पड़ोसिन को फोन किया, उसकी नैनी अपने बच्चों को बुरी तरह पीट रही थी, गुस्से में प्यार करने वाली माँ भी कैसे दुश्मन बन जाती है.

कल शाम उसे अपने लिखे कुछ शेर पढ़कर अच्छा लगा, यानि कुछ बात है उसकी कलम में. आज मौसम ने गुनगुनी धूप की चादर ओढ़ी हो, ऐसी गर्माहट है, जो जिस्म और रूह को राहत दे रही है. सुबह उठते ही टीवी खोला तो आचार्य गोयनका जी के प्रवचन का एक सुंदर वाक्य कानों में पड़ा – ‘सदाचरण ही धर्म का सार है, मूल है जहाँ मन में विकार उत्पन्न हुआ हम ऐसा कार्य कर  बैठेंगे जो अधर्म है और विकारी मन अपने आस-पास के वातावरण को भी अशांत कर देता है तथा पहले अपनी हानि करता है फिर उसकी जिसपर हमें क्रोध या द्वेष हो’. सद्वचनों को पढ़ने का सुनने का सुअवसर उसे सुप्राप्य है आजकल. ईश्वर की अनुकम्पा के बिना यह सम्भव नहीं. उस दिन उसकी सखी ठीक ही कह रही थी. वह भी इसी तरह स्वयं में ही संतुष्ट रहकर मन को स्थिर रख पा रही होगी. कल नन्हे के स्कूल में कार्यक्रम था, बहुत खुश था वह, आज सुबह बिना टीवी देखे उसने नाश्ता भी किया पर समय उतना ही लगाया.

दिल है कि एक मीठे जज्बे में सराबोर है और आँखें दूर क्षितिज के पार देखने की हिम्मत रखती हैं. आज सुबह सुने मधुर वचनों का असर हो सकता है या फिर किसी के दुःख को महसूस कर,  कम करने के प्रयास से उत्पन्न शांति. आज भी धूप का साम्राज्य है, कल नैनी के बेटे ने ढेर सारे लाल बेर लाकर दिए हैं, यहाँ इन्हें बोगड़ी कहते हैं. बचपन में वह भी जेबखर्च के लिए मिले पैसों से बेर लेती थी, स्कूल के गेट पर बैठी बुढ़िया से. पर अब खाने के नाम से ही दांत खट्टे हो जाते हैं, वह मीठा आचार बनाएगी इनका. कल दोपहर उसने जून से कहा वे दीदी के लिए भी तांत की साड़ी लेकर जायेंगे और फिर उन्होंने सोचा परिवार में जन्मे चार बच्चों से वे पहली बार मिलेंगे, उनके लिए भी उपहार लेकर जाने हैं. नन्हे की वार्षिक परीक्षाओं के बाद उन्हें घर जाना है, अभी एक माह शेष है पर मन अभी से उमंग से भर गया है.

Tuesday, August 6, 2013

आर्मी कैंटीन


अभी कुछ देर पहले ही एक सखी का फोन आया, कल दोपहर को उसने ‘मौन व्रत’ रखा था, सो फोन नहीं उठाया. उसने सोचा गाँधी जी की आत्मकथा में उपवास और मौन के बारे में पढ़ेगी. आज धूप तेज है जो उनके नये लगाये भिंडी और मकई के बीजों के लिए अच्छी है. इस समय उसका मन कैसे एक बात से दूसरी बात पर जा रहा है. आज पीटीवी पर एक मजाहिया ड्रामा भी देखा कुछ देर, कैसे दोनों पति-पत्नी एक दूसरे की मौत का इंतजार करते-करते एक दूसरे की फ़िक्र करने लग जाते हैं. अचानक उसे ख्याल आया बरसों बाद जब जून और वह रिटायरमेंट के बाद जीवन बिता रहे होंगे तो यह सब पढकर हँसेंगे, पर कुछ भी हो, कुछ तो मिलता ही है...घास की नोक पर ओस की बूंद सा सुख का अहसास या सुकून !

कल घर से पत्र आया, माँ ने लिखा है, शायद उसने अपनी पत्र लिखने की आदत छोड़ दी है, लो..और इधर वह उनका पत्र न मिलने से परेशान थी. यानि उन्हें भी पत्र समय पर नहीं मिल रहे हैं. आज बहुत दिनों बाद शाम से ही बादल घिर आये हैं, सुबह ही उसने उड़द दाल की बड़ी बनाई थी, हर साल की तरह किचन में ही सुखानी पड़ेगी. जून अभी क्लब से नहीं आए हैं, नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है और वह अभी अभी पीटीवी पर यह सुनकर आ रही है कि इन्सान जिस तरह झाड़ियों से अपना दामन बचाकर निकलता है, वैसे ही संसार में रहते हुए संसार के गुनाहों से बचकर निकल जाना चाहिए. बुराइयाँ बुराई का रूप धरकर नहीं आतीं, वह रूप बदल कर आकर्षित करती हुई आती हैं, और लोग उनके वश में हो जाते हैं, उनसे बचना तभी सम्भव है जब हर वक्त  अल्लाह की मौजूदगी का अहसास होता रहे. अध्यात्मिक उन्नति करने के लिये पहले नैतिक बनना होगा. हर क्षण इस तरह बिताना कि पवित्रता का अहसास हो न कि अपराध बोध का. उसे महसूस हुआ की सारे धर्म एक ही बात कहते हैं.

आज सुबह वह नहाकर ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढ़ने बैठी ही थी, फोन की घंटी बजी, अभिमान जगा और मन ने कहा उसी सखी का फोन होगा जिसने उसका फोन नहीं उठाया था, वह भी तो पाठ कर रही है, पर पांच मिनट बाद फिर घंटी बजी, उसी का था, अपने साथ आर्मी कैंटीन ले जाना चाहती थी, वे गये और उसने ढेर सारा सामान खरीदा, उसे भी ख़ुशी का इजहार करते हुए एकाध सामान खरीदना पड़ा और समय तो गया ही, इसी कारण घर में सफाई नहीं हो पायी. एक सखी के कहने पर उसने ढेर सारे मटर छिलवा कर फ्रिज में रखवाए हैं. इस उम्मीद में कि अब उन्हें गर्मी के मौसम में भी मटर-पुलाव व मटर-पनीर खाने को मिल सकेगा. इन्सान जन्मजात संग्रही होता है, अगले क्षण का भरोसा नहीं पर अगले महीनों, सालों के लिए जुगाड़ कर लेता है. मानसिक शांति व स्थिरता भंग करने वाले कारणों में एक यह संचयी प्रवृत्ति भी है.

हवा चलेगी तो मेरी खुशबू बहेगी
पाकिस्तान की शायरा से गुफ्तगू उसे पसंद आई और यह है उनकी गजल-

छुपा हुआ मेरा घर इस्तराब रहने दो
कि कर चुके हो बहुत अभी बात रहने दो

सफर का साथ है यह मंजिलों का साथ नहीं
गुजर ही जायेंगे लम्हे हिसाब रहने दो

शिकस्ता करके इन्हें फासले बढ़ा दोगे
सजे हुए मेरे हाथों में ख्वाब रहने दो

और इसके आगे चंद अश्यार उसके खुद के कुछ इस तरह हैं-

इकतरफा ही सही सिलसिला जारी रहे
जगह दो दिल में खत का जवाब रहने दो

सूखे हुए पत्तों को धीमे से रख वर्कों में
 घर के किसी कोने में किताब रहने दो

बरसों से उजड़े इस वीरान चमन से

 काट दो जंगल जंगली गुलाब रहने दो 

Monday, August 5, 2013

सपनों का ताजमहल



....और कल शाम बस स्टैंड पर बेहद प्रतीक्षा करने के बाद जून आ गये, नन्हे ने दूर से ही देख लिया था, बढ़ी हुई दाढ़ी मैले कपड़े और सफर की थकान, उसने आते ही मौन में ही उससे बात की, उनके एक मित्र भी वहीं थे, उन्हीं की कार से वे लोग गये थे बाद में नहा-धोकर जब वे बाथरूम से निकले तो पहले से नजर आने लगे छलकती हुई मुस्कान के साथ. इस बार भी वह  उनके लिए ढेर सारे उपहार लाये हैं, अपने लिए प्याजी रंग की ऊन जो पहली नजर से देखने पर उसे उतनी अच्छी नहीं लगी पर अब पसंद आ रही है. नन्हा अपना स्कूल बैग पाकर खुश है. घर कैसा भरा-भरा लग रहा है. काम भी जैसे बढ़ गया है, अब उसे समय बिताने के तरीकों के बारे में नहीं सोचना होगा, हर वक्त वे साथ जो होंगे.
आज शाम जब वे टहलने गये तो जून ने सुझाव दिया, सूरत वे नहीं जा रहे तो आगरा ही चलते हैं, ताजमहल देखने की उसे बरसों से तमन्ना है. नन्हे को भी बहुत अच्छा लगा, उसने अभी-अभी ताजमहल के बारे में काफी कुछ पढ़ा है. साथ ही देहरादून जाने पर एक दिन के लिए मसूरी भी जाया जा सकता है.
फरवरी का प्रथम दिन. जून ने फोन किया वह गैराज जाने के कारण देर से आएंगे. धूप बहुत तेज है सो वह खिड़की के पास वाली कुर्सी पर कमरे में ही बैठी है. जैसा कि संदेह था वह आंवले वाला बूढ़ा आज नहीं आया और अभी-अभी उसने पड़ोसिन से उसके माली से बात करने के लिए कहा है. परसों दीदी का पत्र आया था, उन्होंने लिखा है घर में चोरी की बात सुनकर उन्हें अपना आत्मनिर्भर न होना खल रहा था. वह लिख रही थी कि अचानक कानों को चुभने वाला तेज शोर शुरू हुआ और लगभग ५-७ मिनट तक जारी रहा, एक अजीब सी कैफियत थी, और अब वह शोर थम गया है, नन्हा गेट तक देखने गया आकर बताया, गैस को लीक किया जा रहा था. कुछ देर बाद फिर से शोर आने लगा.
 आज उसने लाहौर रेडियो से गजलें सुनी, तो.. टीवी पर रेडियो का भी आनन्द लिया जा सकता है. इस वक्त धूप में बैठे हुए जब बीच-बीच में ठंडी हवा का झोंका आकर सहला जाता है तो हल्की ठंडक का अहसास होता है. कल इतवार था, दोपहर को थोड़ी देर फिल्म देखी, शाम को ब्यूटी पार्लर गयी, एक मोटी सी लडकी थी वहाँ, उसके चेहरे पर एक अच्छा सा भाव था जैसे पुरानी जान-पहचान हो, पार्लर वाली सभी लडकियों के चेहरे पर एक अलग ही भाव होता है, जैसे देखते ही सब जानना चाहती हों. वहाँ से वे एक मित्र के यहाँ गये जहाँ उनके एक मित्र मिले, बता रहे थे, सुबह पांच बजे उठ जाते हैं, ७ बजे तक बेटा पढ़ाई करता है, नन्हा सुबह उठकर पढ़ाई नहीं कर पाता, पर आज समझाने पर थोड़ी देर की. अचानक वह पंछियों की आवाजें सुनने लगी और दस मिनट तक वही सुनती तरही, लॉन में झाडू लगाती नैनी की बेटियों की आवाज भी आ रही थी, वे दोनों कल रात भर अपनी सहेली के यहाँ रहकर आई हैं, कल शाम से उनकी माँ परेशान थी.

अभी कुछ देर पहले सुबह के काम खत्म हुए थे कि ध्यान आया, एक सखी से बात कर ली जाये, उसने कल शाम अपने बगीचे से पत्ता गोभी भिजवाई थी. वह एक सुलझी हुई पढ़ी-लिखी अच्छी मित्र है, उसके साथ कभी नाराजगी या गलतफहमी होने का डर नहीं है. कल शाम बहुत दिनों बाद असमिया सखी से भी मिली, लेकिन जैसी उम्मीद थी, वह इतने दिन न मिलने पर नाराज होगी, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, शायद उसने भी यह मूलमंत्र समझ लिया है कि अपेक्षा ही दुःख देती है. कल सुबह खत लिखने बैठी ही थी, जून आ गये वह छोटी बहन का पत्र लाये थे, पढ़कर अच्छा नहीं लगा, रिश्तों के कारण कितना खिंचाव हो सकता है इस जगत में. जून भी थोड़ा परेशान हो गये. मार्च में उनके घूमने जाने के कार्यक्रम के बारे में सोचकर, वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे उन्हें अपनी ओर से हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए और अपने कार्यक्रम को दर्शनीय स्थानों को देखने तक ज्यादा केन्द्रित रखना चाहिए न कि रिश्तेदारों से मिलने तक. एक तटस्थता बनाये रखकर अपने उन स्वप्नों को सच होते देखना चाहिए जो ताजमहल और मसूरी की कल्पना में उन्होंने देखे हैं. माँ-पापा तो यकीनन उन्हें देखकर प्रसन्न होंगे ही...इतना ही पर्याप्त है.






Sunday, August 4, 2013

कितने आदमी थे ?


आज सरस्वती पूजा है, नन्हे का स्कूल बंद है, कल शाम जब वह स्कूल से लौटा तो उसका एक जूता जो पहले से क्रैक था ज्यादा फट गया था, उसने अपनी सखी से कहा है वे लोग उन्हें भी बाजार ले जायेंगे. कल शाम जून का फोन आया, वे खुश थे, अपने मित्र के यहाँ से किया था फोन , जरुर उन्हें भी उसकी आवाज ख़ुशी भरी लगी होगी, कभी-कभी उसे स्वयं पर आश्चर्य होता है कब वह धीरे से मोह से बाहर निकल कर स्वयं पर आश्रित होना सीख गयी, उसे स्वयं ही पता नहीं चला. जून का साथ अब मात्र उसके आश्रय के लिए नहीं चाहिए बल्कि इसलिए कि उसका साथ जिन्दगी को और कई अर्थ देता है, और उसे सामान्य देखकर नन्हा भी पहले की तरह पापा को याद नहीं करता है, पहले अक्सर उदास हो जाया करता था. कल उसे हिंदी प्रतियोगिताओं में मिले पुरस्कार, हाथ में मिले और हिंदी पढ़ाने के लिए मानदेय भी. जून के एक मित्र आकर दे गये.

४७वां गणतन्त्र दिवस ! सुबह टीवी पर परेड देखी, दोपहर को वे साइकिल से एक मित्र के यहाँ गये, चार बजे लौटे. उनके साथ टीवी पर शोले फिल्म देखी, उसने सोचा शायद जून ने भी देखी हो. पहले उसे लग रहा था शायद इस बार वह इस फिल्म को इतना पसंद नहीं करेगी पर नहीं, हर बार देखने पर भी उतनी ही अच्छी लगती है., फिर छब्बीस जनवरी का मूड और उसकी सखी ने खाना भी बहुत अच्छा बनाया था, टमाटर आलू की सब्जी, पूरी, मटर-पुलाव और बेक्ड मिक्स्ड वेज ! नन्हे ने भी शौक से देखी, उसे एक सीन न देख पाने का अफ़सोस था, कितने आदमी थे ? उस वक्त वे घर के रास्ते में थे.  घर आकर उसने बाकी की फिल्म देखी. और अब रात हो गयी है, कल नन्हे के दो टेस्ट हैं, जिनकी तैयारी वह कर चुका है, समाचारों में जयपुर और मणिपुर में हुए बम विस्फोटों के बारे में सुना, जैसे किसी ने फूले हुए गुब्बारे में पिन चुभा दिया हो. सुबह परेड देखते वक्त और देश भक्ति के तराने सुनते वक्त धमाकों और विस्फोटों की बात कैसे भुला दी, सच्चाई यह भी है और सच्चाई वह भी थी.

आज यहाँ धूप में बैठे हुए उसे सन्नाटे से उपजी अनोखी शांति का अनुभव हो रहा है, ‘इंडिया२४ऑवर’ में सुना था, जब मन शांत हो तो जिसका चित्रण करें या देखें उसमें सच्चाई होती है, जब वस्तुओं के देखने का अर्थ मात्र उन्हें देखना नहीं बल्कि महसूस करना हो. आजकल एक बूढ़ा व्यक्ति उनके यहाँ आकर पेड़ से आंवले ले जाता है, परसों वह बोरी भर के आंवले ले गया था और आज फिर आ गया, उसने कहा पहले थोड़ा सा काम करो बगीचे में तब आंवले ले जाओ. वह मान गया है. आज सुबह उसने ‘जागरण’ में सुना, ‘सुख लेने की वस्तु नहीं है देने की है. और दुःख भोगने की वस्तु नहीं बल्कि विवेक का उपयोग करते हुए पार निकलने की चीज है’. उसने सोचा जून इस समय बस में होंगे. घर तथा उनके बारे में सोचते हुए..