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Thursday, August 8, 2013

खट्टे मीठे बेर


आज उसने पहली बार सत्तू की कढ़ी बनाई है, सोचा, पता नहीं जून को पसंद आती है या नहीं, वैसे ज्यादातर उसे नूना की बनाई हर डिश पसंद आ जाती है, नन्हे और उसका स्वाद ही तो नखरीला है. कल शाम ‘क्रिकेट विश्वकप’ का उद्घाटन समारोह देखा, भव्य और आकर्षक था. दोपहर को उसकी एक सखी आई थी उसने बताया, वह अपने समय का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूजा-पाठ में व्यतीत करने लगी है. उसके लिए वह खुश तो है पर एक बात की आशंका भी है, यह सारे व्रत-उपवास जिस उद्देश्य के लिए वह कर रही है, वह पूर्ण न हुआ तो क्या वह भ्रमित नहीं हो जाएगी, हो सकता है उसका उद्देश्य मात्र समय का सदुपयोग करना और मन को शांत रखना हो, इस दृष्टि से वह सुखी रहेगी. पर अब जब चाहे जिस विषय पर बात करने की आजादी नहीं रहने से उससे बातें करने का आकर्षण ही चला गया है. आज सोमवार है यानि पत्रों के जवाब का दिन. कल माँ-पापा का पत्र मिला, उन्होंने उसके इसहार का लिहाज करते हुए तांत की साड़ी के लिए लिखा है. आज शाम वे दोनों घरों पर फोन करने के लिए पीसीओ भी जायेंगे.

आज वेलेंटाइन डे है, और आज सुबह-सुबह ही उसने नन्हे को धीरे-धीरे खाने के लिए डांट लगाई, पर हर बार की तरह अगले कुछ ही मिनटों में सब भुलाकर वह पूर्ववत हो गया, काश ! बड़े भी खास तौर से वह भी ऐसी ही हो पाती. इस समय वह उपमा खा रहा है और यकीनन सुबह की डांट की परवाह किये बिना अपनी तरह से ही धीरे-धीरे खा रहा होगा. अभी अभी क्लब की सेक्रेटरी का फोन आया वह क्लब बुलेटिन भेज रही हैं, इस बार वह अपने एरिया की को-ऑर्डिनेटर जो है. आज सुबह से इसी सिलसिले में दस फोन आ चुके हैं, सुबह उसने भी अपनी बायीं ओर वाली पड़ोसिन को फोन किया, उसकी नैनी अपने बच्चों को बुरी तरह पीट रही थी, गुस्से में प्यार करने वाली माँ भी कैसे दुश्मन बन जाती है.

कल शाम उसे अपने लिखे कुछ शेर पढ़कर अच्छा लगा, यानि कुछ बात है उसकी कलम में. आज मौसम ने गुनगुनी धूप की चादर ओढ़ी हो, ऐसी गर्माहट है, जो जिस्म और रूह को राहत दे रही है. सुबह उठते ही टीवी खोला तो आचार्य गोयनका जी के प्रवचन का एक सुंदर वाक्य कानों में पड़ा – ‘सदाचरण ही धर्म का सार है, मूल है जहाँ मन में विकार उत्पन्न हुआ हम ऐसा कार्य कर  बैठेंगे जो अधर्म है और विकारी मन अपने आस-पास के वातावरण को भी अशांत कर देता है तथा पहले अपनी हानि करता है फिर उसकी जिसपर हमें क्रोध या द्वेष हो’. सद्वचनों को पढ़ने का सुनने का सुअवसर उसे सुप्राप्य है आजकल. ईश्वर की अनुकम्पा के बिना यह सम्भव नहीं. उस दिन उसकी सखी ठीक ही कह रही थी. वह भी इसी तरह स्वयं में ही संतुष्ट रहकर मन को स्थिर रख पा रही होगी. कल नन्हे के स्कूल में कार्यक्रम था, बहुत खुश था वह, आज सुबह बिना टीवी देखे उसने नाश्ता भी किया पर समय उतना ही लगाया.

दिल है कि एक मीठे जज्बे में सराबोर है और आँखें दूर क्षितिज के पार देखने की हिम्मत रखती हैं. आज सुबह सुने मधुर वचनों का असर हो सकता है या फिर किसी के दुःख को महसूस कर,  कम करने के प्रयास से उत्पन्न शांति. आज भी धूप का साम्राज्य है, कल नैनी के बेटे ने ढेर सारे लाल बेर लाकर दिए हैं, यहाँ इन्हें बोगड़ी कहते हैं. बचपन में वह भी जेबखर्च के लिए मिले पैसों से बेर लेती थी, स्कूल के गेट पर बैठी बुढ़िया से. पर अब खाने के नाम से ही दांत खट्टे हो जाते हैं, वह मीठा आचार बनाएगी इनका. कल दोपहर उसने जून से कहा वे दीदी के लिए भी तांत की साड़ी लेकर जायेंगे और फिर उन्होंने सोचा परिवार में जन्मे चार बच्चों से वे पहली बार मिलेंगे, उनके लिए भी उपहार लेकर जाने हैं. नन्हे की वार्षिक परीक्षाओं के बाद उन्हें घर जाना है, अभी एक माह शेष है पर मन अभी से उमंग से भर गया है.

Sunday, November 25, 2012

युद्ध की अनिवार्यता...?



मौसम बेहद ठंडा है, दस डिग्री होगा तापमान, दोपहर को नन्हे को सुलाते सुलाते उसे भी नींद आ गयी, सुबह अमृता प्रीतम की नई किताब ‘कोई नहीं जानता’ पढ़ती रही, उसे लगा इस कहानी पर टीवी सीरियल बनाया जा सकता है. पत्र लिखने का काम शुरू नहीं हो पाया. पहले पड़ोस की एक माँ-बेटी मिलने आयीं, जिन्हें चिवड़ा-मटर खिलाया उसने फिर शाम को उसकी छात्रा आ गयी, जून के न रहने पर सोनू बार-बार कुछ न कुछ पूछने या उसके पास आ जाता था . दोपहर को बहुत दिनों बाद उसने पंजाबी कढ़ी बनायी दही वाली, ठीक सी ही थी पर बहुत अच्छी नहीं. पंजाबी गीत भी सुने उसने बहुत मीठे हैं, गजलें अभी ध्यान से सुनी ही नहीं, यूँ ही काम करते करते ...कुछ खास नहीं लगीं..शायद शब्दों को ध्यान से सुनकर अर्थ समझे तो ज्यादा लुत्फ़ आए.

जून ग्यारह बजे आए, उससे पूर्व वह अपने दायें तरफ वाली पडोसिन से आज सुबह हुए दुखद हत्याकांड पर बात कर  रही थी. जून भी इसी कारण आये थे. असम के भूतपूर्व मंत्री के भतीजे के घर जाकर गोलियों से निर्मम हत्या, राष्ट्रपति शासन होते हुए भी सम्भव हो पाई. लेकिन हत्यारे पकड़े जायेंगे, बचेंगे नहीं. आतंकवाद कितनी गहरी जड़ें जमा चुका है हमारे देश में, निर्दोष लोगों की हत्या..? आज नेता जी का जन्मदिवस है, कहाँ हैं उन जैसे लोग, आज तो अपने ही लोगों पर गोली चलाने वाले क्रान्तिकारी कहलाते हैं.  उसके सामने यहाँ यह दूसरी हत्या है, घर में जाकर पत्नी के सामने पति को गोलियों का शिकार बनाना..कैसे पत्थर दिल होते हैं वे लोग..कैसा करुण चीत्कार होगा उस महिला का जिसकी आँखों के सामने उसका जीवन नष्ट हो रहा हो. आज और कुछ भी लिखने का मन नहीं करता, जून आते समय अस्पताल से देखकर आए, सर के पीछे से खून तब तक निकल रहा था. खून कितना सस्ता हो गया है, कब बंद होगा यह सिलसिला. लड़ाईयां बढती जा रही हैं. इसराइल स्कड मिसाइल से किया हमला कितना निर्मम है. अमेरिका के बम भी बगदाद में कितनो की जानें ले चुके होंगे और सिपाही.. उनके तो जन्म ही शहीद होने के लिए हुए हैं.

बहुत दिनों के बाद आज वे लोग पैदल शाम को सात बजे के बाद घर से निकले. जून कर तलप में ही छोड़ आए हैं, सर्विसिंग करानी है. निकट ही एक कन्नड़ परिवार के यहाँ गए, उन्हें बैठे हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे कि सामने नारियल के लड्डू और नमकीन रख दी उन्होंने, अपना-अपना रिवाज है. लड्डू अच्छे बने थे, गृहणी कुछ दिनों बाद घर जा रही हैं, शायद ले जाने के लिए बनाये होंगे.

उसने फिर सिलाई-कढ़ाई के अधूरे काम को छोडकर एक और किताब पढ़ी, ‘आक के पत्ते’, उसके गौतम का दुःख आँसू बनकर उसकी आँखों से बहने लगा था. कितनी गहरी चोट लगी थी उसको...इतनी चोट खाए बिना कोई कैसे लिख सकता है वह सब, जरूर अमृता प्रीतम ने भी ऐसी ही पीड़ा को सहा होगा. उसकी जिंदगी में तो सुख ही सुख चाहा है उसने..सुख, आराम, सुविधा,...मन की शांति, स्थिरता..थोड़ी सी भी पीड़ा उससे सही नहीं जाती...पर कभी कभी थोड़ा सा भी दुःख विशाल लगने लगता है उसके साथ भी यही हुआ है. कई बार ऐसा हुआ है..अब भी तो बीती कड़वीं बातें सोचने बैठ जाये तो मन कैसा रोना-रोना हो जाता है. जब याद ही इतनी तकलीफदेह है तो..उस समय क्या स्थिति रही होगी.



प्रिय ब्लॉगर साथियों,  मैं बनारस व बैंगलोर की यात्रा पर जा रही हूँ, अब दिसंबर के तीसरे सप्ताह में मुलाकात होगी. आने वाले वर्ष के लिए तथा क्रिसमस के लिए अग्रिम शुभकामनायें...