Friday, March 15, 2013

लाल लाल सा गाल



परसों यानि शनिवार को बापू के ‘एक सौ चौबीसवें’ जन्मदिन के कारण जून का ऑफिस और नन्हे का स्कूल दोनों बंद थे, वह सुबह व्यस्त थी, दोपहर को ‘गाँधी’ फिल्म देखी और शाम को एक मित्र परिवार के लिए भोजन बनाना था, फ्लाईट कैंसिल हो जाने के कारण वे एयरपोर्ट से लौट आये थे, कल गए.
 माली ने टमाटर के पौधे लगा दिए एक क्यारी में, बागवानी की किताब के अनुसार पचास-पचपन दिन में फल लगने लगेंगे. अभी गुलाब की प्रूनिंग करनी है, उसने इस बारे में भी जानकारी बढ़ाने के लिये पढ़ा. घर जाने के पूर्व रोजमिक्स भी डालना है. यकीनन इस वर्ष गुलाब अच्छे खिलेंगे, शेष फूलों के बारे में अभी कहना मुश्किल है, डहेलिया माली पर निर्भर है और गेंदा वह जाने से पहले लगा सकती है.
  आज सुबह सारे काम जल्दी हो गए हैं, उसने शॉपिंग लिस्ट बनायी, जून तो इतनी लम्बी-चौड़ी लिस्ट देखकर घबरा ही जायेंगे. उसका ध्यान लिखने से हटकर किसी आवाज से बाहर चला गया तो बाहर जाकर देखा, आज पड़ोस वाले घर में डिश एंटीना लग रहा है. आज समय बहुत है फिर भी मन से नहीं लिख पा रही है, खुशवंत सिंह की उस बात का असर ज्यादा ही ले लिया है, जिसमें वह कहते हैं, यह तो स्वार्थ हुआ कि आप योग या ध्यान के द्वारा अपने मन को शांत कर लें. अस्थिर मन उनके विचार से स्वार्थी नहीं होता, जबकि उसका मन इसके बिलकुल विपरीत है.

आखिर आज छोटी बहन का पत्र आ गया, जिसके उसे प्रतीक्षा थी, वह सोच रही थी, शायद सलाह देना उसे अच्छा न लगा हो. अभी कुछ देर पहले विवेकानंद के सुंदर विचार पढे-

Religion belongs to supersenses and not to the sense plane. It is a vision, an inspiration, a plunge into the unknown and unknowable, makine the unknowable more than known, for it can never be known.”  

 उसने सोचा तब तो मानव जीवन का उद्देश्य धर्म ही होना चाहिए न कि केवल खाना, पीना और मौज मस्ती. कल माली ने पत्ता गोभी के पौधे भी लगा दिए, पर वायदे के अनुसार कैप्सिकम नहीं लाया, उसे ध्यान आया, कहीं धूप में पौधे कुम्हला न रहे हों, उन पर कागज की टोपियां लगानी होंगी. नन्हा आज बहुत खुश था, वह पहली बार अपने मित्रों के साथ कुछ ही दूर पर स्थित डी प्लस के पार्क में खेलने गया. आजकल जून उसे कैरम में आसानी से हरा देते हैं, ‘चायनीज चेकर’ में भी अक्सर, पहले वह उन्हें हरा देती थी, पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह अच्छा खेलती थी, बल्कि वह अब पहले से बेहतर खेलने लगे हैं, वह वैसी ही है सदा से..

….Whenever anything miserable will come, the mind will be able to say, “I know you as hallucination”, when a man has reached that state he is called Jivanmukta, living fee, “free even living”.

  अभी-अभी विवेकानंद का एक भाषण पढ़ा उसके पास शब्द नहीं हैं यह बताने के लिए कि कितना अद्भुत था उनका मानसिक संसार, कितनी गहन पिपासा होगी उनकी, ज्ञान के इस भंडार को समझकर करोड़ों तक पहुँचाने का काम सिर्फ वही कर सकते थे. शब्दों से तेज टपकता है, धारा प्रवाह वाणी जैसे मन को झिंझोड़ती चली जाती है और रह जाती है पीछे शांति. अब उसे कोई बात पहले की तरह विचलित नहीं कर पाती, क्योंकि आरम्भ में जो लिखा है, यह सब खेल है, नाटक, हमें इसे बस देखते भर जाना है, इसमें खो नहीं जाना है, दर्शक की तरह, कीचड़ में कमल की तरह इस दुनिया से गुजरते चले जाना है. आज नन्हे का पहला यूनिट टेस्ट है, सुबह उसने उसके गाल पर क्रीम लगायी, क्योकि मधुमक्खी या किसी कीट के हल्के दंश से हल्का लाल हो गया था, पर वह बहुत बहादुर है.







Thursday, March 14, 2013

बापू ! सुन ले यह पैगाम



सितम्बर का महीना खत्म होने को है, आज कई हफ्तों के बाद कलम उठाई है. पहले जून अस्वस्थ रहे फिर वह कोलकाता चले गये, नूना घर की सफाई में लगी रही. फिर नन्हा अस्वस्थ हुआ और फिर वह व्यस्त रही दुनियादारी में. ईश्वर से जो निकटता उन दिनों वह पुस्तक पढते समय अनुभव की थी उसी का असर है कि इतने झंझटों या कहें सांसारिक कार्यों के बीच भी उसकी याद बनी रही, जिसने उसे शांत रखा है. कुछ देर पूर्व जून से कुछ पूछ रही थी, पर निष्कर्ष यही निकला कि जिन बातों पर वश नहीं उसके बारे में सोच कर अपना समय व्यर्थ करने से कोई लाभ नहीं. आज उन पंजाबी दीदी का पत्र आया है, संभवतः कोलकाता में वे उनसे मिलेंगे. गुलदाउदी के पौधों को धूप में रखा है, लेकिन धूप फिर आँखें चुरा रही है, ईश्वर से थोड़ी धूप मांगी है और वह देगा भी जरूर.

  अभी-अभी वह गमलों की कुड़ाई करके आई है, जब इन पौधों में फूल आएंगे तो यह सारी मेहनत(अगर यह मेहनत है तो) या कार्य सफल होगा, और अगर फूल न भी खिले तो भी उसे कोई अफ़सोस नहीं होगा, पौधों की देखभाल की इतना ही पर्याप्त नहीं क्या ? शनिवार को बाहर ट्रक जो मिट्टी ड़ाल गया था, मजदूर आज उसे अंदर ला रहे हैं, नई मिट्टी में यकीनन फूलों का रंग शोख होगा. आज भी धूप नहीं है, धूप की इतनी कमी शायद ही कभी इतनी महसूस की हो, जब धूप बिखरी रहती थी तब कद्र नहीं की उसकी. जून का एक बटन आज दफ्तर में टूट गया..पहली बार ऐसा हुआ इतने बरसों में. कल उसकी पुरानी पड़ोसिन ने हरा ब्लाउज सिल कर दे दिया, सुंदर सिला है, जून ने भी लो बैक पर कोई एतराज नहीं किया.

 कल मीटिंग सामान्य रही, पहली बार तम्बोला खेला. वह अपनी बंगाली सखी के साथ गयी थी, मगर सदा की तरह उसने वहाँ खुद को अकेला पाया..यह अकेलापन उसकी नियति बन चुका है.. भीड़ में रहते हुए भी अकेलापन. धूप निकली है सुबह से पहली बार, उसने सोचा सारे गमले धूप में रख देगी, यह लिखने के बाद.  
 
   महीने का अंतिम दिन, आज नन्हे का हाफ डे है, बचपन में ऐसा होने पर बच्चे ‘आधी छुट्टी सारी’ गाते हुए आते थे. नन्हा आज सुबह फिर उठना नहीं चाह रहा था, वह पहले से कुछ दुर्बल भी हो गया है, अगले महीने उसके यूनिट टेस्ट हैं, पढ़ाई उतनी नहीं हो पायी है जितन होनी चाहिए. उसके प्रिंसिपल ने यूनिट टेस्ट का टाइम टेबिल देकर अच्छा किया है. निर्माण कार्य भी चल रहा है स्कूल में. कुछ पल पहले राधाकृष्णन व विवेकानंद की पुस्तकों के कुछ अंश पढ़ने का प्रयत्न किया पर सफल नहीं हो पायी, लगता है अब काफी पढ़ लिया है, अमल में लाना चाहिये जितना पढ़ा है. सुबह से झुंझला रही थी, कारण कुछ खास नहीं पर जून के आते ही कहना होगा. कल शाम वे एक परिचित परिवार के यहाँ गए, गृह स्वामिनी ने नूडल्स खिला दिए, रात को वे खाना भी नहीं खा सके, हर बार उनके यहाँ जाने पर ऐसा ही होता है.

  दोपहर के पौने दो बजे हैं, पंखे की घर-घर के आलावा और कोई आवाज कहीं से भी नहीं आ रही है, जैसी ख़ामोशी बाहर है, वैसी ही मन में भी, खुशवंत सिंह कहते हैं कि शांत मन क्रियेटिव नहीं हो सकता, लेकिन अशांत मन क्रिएटिव ही होगा, ऐसा भी तो नहीं है न. कल बापू का जन्मदिन है, संडे मैगज़ीन में एक लेख आया है उनके बारे में, अभी पढ़ा नहीं है, लाल बहादुर शास्त्री नेहरु के प्रिय थे एक जगह पढ़ा, उनका भी जन्मदिन है कल. बचपन में यह गीत कितना सुना करते थे- आज है दो अक्टूबर का दिन...  सुबह समाचारों में भूकम्प से हुई तबाही के चित्र देखे, सुन-देखकर यह ख्याल आता है कि कौन जाने एक दिन उनका भी यही हश्र हो, दुःख तो होता ही है उन ग्रामवासियों के लिए, जो सोये-सोये ही गहन निद्रा में लीन हो गए, पूरा परिवार एक साथ..मानव कितना बेबस है प्राकृतिक आपदाओं के सम्मुख. उन्हें इसी माह घर जाना है, पता नहीं कैसा होगा इस बार का सफर, एक लिस्ट भी बनानी है जो सामान कोलकाता से खरीदना है, चचेरे भाई-बहन, भतीजियों के लिए उपहारों की भी, उपहार देने में जो सुख है वह लेने में कहाँ ?



Wednesday, March 13, 2013

एक योगी की आत्म कथा



कल दोपहर जून ने बताया, फोन पर छोटी बहन बहुत उदास थी, यह सुनते ही नूना को भी अपने मन पर वश नहीं रहा, बहुत देर तक मन में यही एक बात गूंजती रही, इससे हटने के लिए वह अपनी एक सखी के पास चली गयी, जब वापस लौटी मन शांत हो चुका था, इसका अर्थ है कि यदि कोई  परेशान है तो वातावरण में परिवर्तन से काफी सहायता मिल सकती है. उसके यहाँ फ्रॉक भी देखे, भांजी के लायक कोई पसंद नहीं आया, उसने एक और दिखाने का वायदा किया है. ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं वे छोटी बहन के लिए, उसे साहस दे, अच्छे-बुरे का ज्ञान दे और सहनशक्ति भी. सपनों में जीना छोड़कर वह जितना जल्दी हो सके यथार्थ को अपना ले. कल शाम को वे एक उड़िया परिवार से मिलने गए, वही हर बार की तरह..ज्यादातर दूसरों की बातें....उस दिन चित्रहार में एक अच्छा गाना आ रहा था- दूसरों की बुराई जब किया कीजिये...सामने आईना रख लिया कीजिये. हाँ एक बात अच्छी हुई, उसके पास भगवद्गीता के कैसेट हैं, सभी अध्यायों के संस्कृत में श्लोक फिर उनका हिंदी अनुवाद. पहला अध्याय थोड़ा सा सुना.

 “एक योगी की आत्मकथा” उसकी सखी ने परसों दी थी, अभी कुछ देर पूर्व कुछ पृष्ठ पढे, ईश्वर पर विश्वास करो तो वह किस-किस तरह हमारी सहायता करता है, मन संशय युक्त हो तो विश्वास टिक नहीं पाता और इसलिए सहज प्राप्त ईश्वर की दया भी दिखाई नहीं देती, कितनी ही बार स्वयं उसने इस बात का अनुभव किया है, सच्चे मन से निस्वार्थ प्रार्थना कभी भी बेकार नहीं गयी, लेकिन मन ईश्वर की कृपा को कितनी जल्दी भूल जाता है और फिर संशयात्मक हो जाता है. इस पुस्तक को पढ़ने पर उसकी ईश्वर में श्रद्धा दृढ़तर होगी ऐसा उसे विश्वास है. क्या वह किसी को एकांतिक अहैतुक प्रेम दे पायी है...ऐसा प्रेम जो निस्वार्थ हो..सिर्फ देना जानता ओ...किसी एक क्षण भी ऐसा प्रेम किया है उसने...प्रेम में अपना सुख अपनी खुशी सर्वोच्च रखता है मनुष्य, लेकिन वह प्रेम नहीं है..वह तो दुनियादारी है..सौदा है. यह सच है कि वह अपने परिवार से बेहद प्रेम करती है, उनका दुःख उससे सहन नहीं होता..परन्तु फिर भी ऐसे कई अवसर आए हैं जब अपने स्वार्थ को ऊपर रखा है. प्रयत्न करेगी कि ऐसा न हो..कल उन्होंने सर्कस देखी. अजब करतब दिखाते है ये लोग, जिन पर हैरत से आँखें खुली रह जाएँ, लेकिन जानवरों की निरीहता देखकर मन में पीड़ा होती है.

  छोटी बहन को उस दिन फोन तो नहीं कर सकी लेकिन अभी-अभी एक पत्र लिखा है जो उम्मीद है उसके कुछ काम आयेगा.. कल वे तिनसुकिया गए थे, वह मोदी का ‘क्विक स्टिच किट’ लाई है, आज दोपहर शुभारम्भ करेगी. कल लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसकी पुरानी  पड़ोसन भी क्लब ज्वाइन कर रही है. पिछले तीन-चार दिनों की तरह आज भी वर्षा हो रही है. आज सुबह बहुत दिनों बाद नींद देर से खुली, जून जल्दी-जल्दी में कुछ खाकर ऑफिस गए.

  उस दिन यानि नरसों, सोमवार को जून दोपहर को घर आए तो स्वस्थ नहीं थे, हल्का ज्वर था, तब से आज तक ज्वर बढता-घटता तो रहा है पर उतरा नहीं है. आज बृहस्पतिवार है, आज दोपहर अस्पताल जायेंगे. वह इसी कारण मीटिंग में नहीं जा पायी, उसने कल भी और आज भी ईश्वर से प्रार्थना की है और उसे पूर्ण विश्वास है, आज वह बिलकुल ठीक हो जायेंगे. ईश्वरसे प्रार्थना करना मात्र उसके लिए शब्द नहीं हैं परन्तु एक अनुभव है. ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढकर तो लगता है ईश्वर यहीं उसके पास है, हवा में, धूप में, फूलों की सुगंध में, बादलों में और उसके अंतर्मन में भी. उसने उसे वचन दिया है कि अब वह सांसारिक वस्तुओं का मोह नहीं करेगी क्यों कि उसकी  सभी आवश्यकतायें तो वह स्वयं ही पूर्ण करता है. इच्छा करने से पहले ही वह उसे जान जाता है. उसने यह भी कहा है क कभी किसी को मनसा, वाचा, कर्मणा दुःख नहीं पहुंचायेगी, और न ही किसी कई बुराई या निंदा में भाग लेगी. उसके मन में सभी के प्रति समान भाव है और उसके जून का भी. वह उसके सभी वचनों में शामिल है.

Tuesday, March 12, 2013

ला ओपेला का सेट



गुलदाउदी के पौधे एक-दो दिनों में मिल जायेंगे, फोन उसकी सखी ने ही किया था, सो उसका यह आक्षेप कि सदा उसे ही फोन करना पड़ता है, गलत सिद्ध हो गया जिसकी उसे खुशी है. शाम को असमिया सखी के घर जाना है, उससे भी बात हुई है, वह उसके नए लाल सूट में इंटर लॉकिंग कर के देगी अपनी नई फ्लोरा पर, और आज सुबह से दो बार प्रेम की अधिकता या भावों की अधिकता के कारण उसकी आँखों में अश्रु झलक आये, कल भी ऐसा हुआ था, कहीं यह उस स्वप्न का असर तो नहीं, या सम्भव है सात्विक भाव प्रगट हुए हों. लेकिन मन ने कल एक-दो बार ऐसा सोचा कि उनकी परवाह किसी को नहीं, उन्हें ही सबकी परवाह है - लेकिन यह सत्य नहीं है, और अगर ऐसा हो भी तो इसमें उदास होने की कोई बात नहीं, बल्कि उन्हें किसी से अपेक्षा करने का कोई अधिकार नहीं. जून के दांत का दर्द कम है, कल उन्हें फिर जाना है. नन्हा आज जल्दी उठ गया था, पर तैयार होते-होते उसे पौने नौ बज गए, शायद उसे खांसी फिर से परेशान कर रही है, वैसे वह गंध के प्रति बहुत संवेदन शील है, हल्की सी गंध से खांसने लगता है.

मौसम भीगा-भीगा है, बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. खिडकी से नजर बाहर डालो तो बस हरियाली ही हरियाली है. जून इस वक्त तिनसुकिया में होंगे. नन्हा कह रहा था आज से उसकी छुट्टी देर से होगी, उसका टाइम टेबिल आज से बदल रहा है. उसकी पुरानी पड़ोसिन का फोन आया तो उसे अच्छा लगा. कल रात को एक बार गर्मी के कारण नींद खुली फिर सुबह ठंड के कारण- एक जमाना था कि नींद आती थी तो सर्दी-गर्मी और मच्छर किसी का पता नहीं चलता था. बेसुध और बेखुद हो जाती थी. रात बचपन को याद करके सोयी थी, बचपन के माँ-पिता को भी. कल उनका पत्र आया था, लिखा है, अगले महीने उनका घर बनना आरम्भ हो जायेगा, जनवरी तक पूरा भी हो जायेगा. कल जून एक महिलाओं की एक अंग्रेजी पत्रिका लाए, इंग्लैण्ड में प्रकाशित, वहाँ कि संस्कृति यहाँ से कितनी अलग है, उसने गार्डनिंग पर एक लेख पढ़ा, फिर पड़ोसिन से हेज के पास खड़े होकर बात करने लगी पता ही नहीं चला सवा घंटा कैसे बीत गया. उसके बेटे को चिकन पॉक्स हो गया है, वह सो रहा था.

  कल उसके जीवन का एक बहुत अच्छा दिन था, शाम को उसकी एक छात्रा अपने माँ-पिता व छोटी बहन के साथ आयी. वे लोग उसके लिए एक उपहार भी लाए. उन्हें उन सबके आने की उम्मीद नहीं थी, उसके पहले एक मित्र परिवार आया था, घर काफी अस्त-व्यस्त सा हो गया था, खैर.. वे लोग अचछे लगे सरल और सहज..और इतना सुंदर ला ओपेला ला का dessert set.

  उसके पैरों में आज वही दर्द है, डायरी उठाई है, दस बजने को हैं अभी..बस..कुछ..भी..ये चारों शब्द उसके मन की अस्थिरता के परिचायक हैं. कल फेमिना में एक बहुत अच्छा लेख पढ़ा. रात को देर तक सोचती रही कि उसे अपने वक्त का सदुपयोग करना चाहिए, कोई न कोई काम करते रहने की वैसे उसकी आदत तो है ही, बस काम थोड़ा उद्देश्यपूर्ण हो इसका ध्यान रखना होगा. लेकिन अब इस दर्द में तो सिर्फ आराम से बैठकर पढ़ा जा सकता है, नहीं जी, अब इतना भी नाजुक नहीं होना चाहिए इंसान को कि जरा सा मौका मिला नहीं कि लम्बी तान ली...मगर वह तो पढ़ने की बात कर रही थी और वह भी विवेकानंद की किताब का तृतीय अध्याय.  

  दोपहर के पौने दो बजे हैं. किसी परिचिता ने बताया कि नन्हे को कल बस में किसी बच्चे ने मारा था, उसने उन्हें बताया नहीं, शायद इसका कारण यह तो नहीं कि वे उसे कमजोर कहते हैं, मार खाकर आने पर, इस तरह तो वह अपनी समस्या बताएगा नहीं, उसने मन ही मन तय किया, अब से वह ऐसा नहीं करेगी. वह आजकल सुबह सब काम समय पर कर लेता है, पहले की तरह बार-बार नहीं कहना पड़ता. नन्हे से पूछने पर उसने इंकार कर दिया कि बस में किसी से झगड़ा हुआ था, इसका अर्थ हुआ कि सूचना सही नहीं थी. उसका गणित का टेस्ट कल फिर नहीं हुआ. कल ड्राइंग प्रतियोगिता है, पिछले दो-तीन दिनों से उसके मित्र शाम को खेलने आ जाते हैं. वे सब अँधेरा होने तक खेलते रहते हैं, उसे अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब माँ भीतर से आवाज देती थीं और वह अपनी सहेलियों के साथ रस्सी कूदने, गेंद गिट्टी खेलन में व्यस्त रहती थी.

Monday, March 11, 2013

भोज के वृक्ष



भारत छोडो आन्दोलन की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में आज अवकाश है, वे तिनसुकिया गए, एक और परिचिता व उसके छोटे से बेटे के साथ. शाम को एक परिवार मिलने आया, दिन भरा-भरा सा रहा. शाम को जून को थकावट हो गई, धूप में ड्राइविंग करने के कारण ही शायद.
अभी-अभी कल्याण में उसने पढ़ा, जिसके हृदय में भगवान रहते हैं वहाँ भय, विषाद, शोक, व्याकुलता, उद्वेग, निराशा, क्षोभ, संदेह, अश्रद्धा, ईर्ष्या, कायरता, द्वेष आदि का स्थान कहाँ है ? वहाँ तो निर्भयता, शक्ति, तेज, प्रकाश, प्रेम, निष्कामता, संतोष और परम आनंद का निवास होता है. जब ईश्वर अपना लेते हैं, तब वही जो कुछ विधान करेंगे, कल्याण के लिए करेंगे. दुःख हम अपनी ही भूल से अनुभव करते हैं, उस भूल को मिटाने की देर है कि चित्त स्थिर रह सकता है. जैसे स्वप्न में वह तरह-तरह की आपदाओं को झेलती है मगर यह भान होते ही कि यह तो स्वप्न है, मन शांत हो जाता है उसी तरह जीवन में कोई परेशानी हो तो उसे स्वप्न वत मानकर झेल लेना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सुदिन आएंगे ही.

  आज जन्माष्टमी है, सुबह से जो मन शांत था अभी कुछ देर पूर्व नन्हे पर झुंझला ही गया, बच्चे तो आखिर बच्चे ही हैं, काम धीरे-धीरे ही करेंगे न. आज उसने व्रत रखा है, नन्हे और उसने मिलकर मंदिर सजाया है, अच्छा लगता है ईश्वर के करीब रहना लेकिन मन फिर कहीं  और चला जाता है. कल दीदी का छब्बीस का लिखा पत्र आया और कैसा संयोग है उसी दिन उसने भी उन्हें लिखा था. कल छोटे भाई के लिए जन्मदिन का कार्ड लायी थी. नन्हे का स्कूल खुला है, जून आज किसी से लिफ्ट लेकर ऑफिस गए हैं, ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ ने चौबीस घंटे का बंद घोषित किया है, कार ले जाना ठीक नहीं था. कल शाम एक सखी के बुलाने पर वे लोग उसके यहाँ गए. लेकिन आज उसे इन दुनियादारी की बातों से मन हटाकर पूर्णता की ओर ले जाना है, जहाँ कोई उलझन नहीं..अद्भुत प्रकाश है, जिसके आगे कुछ पाना शेष नहीं रहता न ही कुछ जानना. दीदी ने लिखा है, “कहीं कुछ ऐसा पढ़ो जिसके आगे लगे कि अब और कुछ नहीं, फ़िलहाल कुछ भी नहीं, तो लिखना”. उसने सोचा अभी पढ़ेगी विवेकानंद की दूसरी पुस्तक उसमें अवश्य ही ऐसा कुछ मिलेगा.

  कल का उपवास अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया. जून को कल दोपहर दांत में दर्द था, आज तिनसुकिया गए हैं डेंटिस्ट के पास. आज उसने लंच अकेले ही खाया, जून अभी एक घंटे बाद आएंगे. शायद उन्हें रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा. कई बार जाना होगा. सुबह अलमारी की सफाई के काम में लगी रही. पढ़ने की कोशिश की पर मन नहीं लगा, रात को फिर स्वप्न देखे, इधर-उधर के, अभी उस दिन ही मरते-मरते बची थी एक स्वप्न में. शाम को उन्हें एक परिवार के साथ बैठकर “हम हैं राही प्यार के” देखनी है, कल जून का जन्म दिन है, उसने अभी-अभी एक कार्ड बनाया है. कुछ देर पहले जून को विवाह से पूर्व लिखे कुछ खत पढ़े, कितन प्रगाढ़ था उनका रिश्ता, प्यार के रिश्ते सचमुच कितने मजबूत होते हैं.

  जून का जन्मदिन अच्छा रहा, उसने केक बनाया था. घर पर ही भुजिया भी बनाई थी. पन्द्रह अगस्त पर वे तीनों नेहरु मैदान गए, झंडा आरोहण में सम्मिलित होने. कल रात को एक मधुर स्वप्न देखा, वर्षों बाद भी वह सब उसके अवचेतन में उतना ही सजीव है जितना उस क्षण था, सोलह-सत्रह वर्ष पहले की बात है जब वे पहाड़ों में रहे थे, लेकिन अब भी स्मृति पटल पर सब कुछ कितना स्पष्ट है. वर्षों से स्वप्नों में ही मिलती रही है, लगता है हर साल एक बार मिलना हो जाता है उन वादियों से. यूँ फूट-फूट कर रोना...एक अनजानी तृषा..एक अधूरा वादा लिए ही लगता है इस जग से जाना होगा...वे झरने.. वे रास्ते..वे पहाड़ कभी मिलेंगे उसे? अभी तक जैसे पोर-पोर महसूस कर रहा है वह सब कुछ..स्वप्न इतने मधुर भी हो सकते हैं ? अभी तक उसके मन का एक कोना सुरक्षित है उन यादों के लिए यह उसे स्वयं भी मालूम नहीं था, इतनी शिद्धत से महसूस कर सकती है उस छुअन को इस पल जो वर्षों पहले भी अनजानी थी और आज भी है पर स्वप्न सारे बांध तोड़ देते हैं..नदियाँ मिल जाती हैं..तट तोड़कर...और स्वप्न क्या सिर्फ उसके हिस्से में ही हैं ? और यह भी कि प्रेम सिर्फ बचपना नहीं है..प्रेम उम्र की सीमाओं से परे है. जैसे उसका मन इस समय एक अनोखे प्रेम से लबरेज है..कसक भरा प्यार उन भोज वृक्षों के लिए और फूलों की घाटी में बहती उस चांदी के समान जल धार के लिए..   





Thursday, March 7, 2013

गुलदाउदी के फूल



अगस्त की शुरुआत..यानि कल का इतवार अच्छा रहा, धीमे-धीमे से गूंजती स्वर लहरी सा, शांत धारा पर तैरती नौका सा, सोचा था शाम को पड़ोसी के यहाँ जायेंगे, पर किसी कारण से गृहस्वामी को कहीं जाना पड़ा. आज सुबह वे उठे तो तेज धूप थी, नौ बजते-बजते इतनी ठंडी हवा बहने लगी और फिर वर्षा आने में भी ज्यादा देर नहीं हुई. कल शाम जून के साथ मद्धिम रौशनी में नन्हा और वह बातें करते रहे, वह अगले महीने सोलह-सत्रह दिनों के लिए बाहर जायेंगे, वे दोनों अकेले रहेंगे, उस दिन उसकी एक सखी, जो आजकल अकेले रह रही है, कह रही थी, बहुत मुश्किल होती है शाम व रात गुजारना, वही अनदेखे, अनजाने डर, लेकिन उनसे उन्हें मुक्ति पानी ही होगी. कल रात स्वप्नों में बीती, दोपहर को दो घंटे सो गयी थी शायद उसी का परिणाम था, अजीब-अजीब सपने, कुछ दिन पूर्व पाकिस्तान गयी थी सपने में, उसका आकर्षण खींचता है अपनी ओर, शायद पूर्वजों की जन्मभूमि है इसलिए या इसलिए कि उसका पिछला जन्म वहीं हुआ होगा.

  आज भी मौसम अच्छा है, बदली भरा, सुबह नन्हे को बस में छोड़ने गयी तो वर्षा काफी तेज हो रही थी. सुबह देर से उठी तो व्यायाम का समय नहीं मिला, पीछे आंगन में उसने स्किपिंग की, बचपन में सहेलियों के साथ रस्सी कूदना कितना मजेदार खेल हुआ करता था. रात को बिस्तर पर लेटे कितने विचार आते हैं पर उस वक्त कागज-कलम पास नहीं होता, और जब पेन हाथ में है तो मन खाली है, अभी ठंडी हवा का एक हल्का सा झोंका आया, अच्छा लगा जैसे कल की फिल्म में एक गाना. कल की फिल्म ‘बुलंदी’ को देखकर ‘सर’ की याद आ गयी, शिक्षक का असर काफी पड़ता है विद्यार्थियों पर, अगर शिक्षक वैसा हो जैसा फिल्म में दिखाया गया था, दोनों ही फिल्मों में शिक्षक मृत्यु से नहीं डरता, और जो मरने से नहीं डरता उसे दुनिया की किस बात से बात से डर लग सकता है? कल शाम वह अपनी बंगाली सखी के यहाँ गयी, उससे बातें करना अच्छा लगता है. पड़ोसी के यहाँ एक कुत्ता अजीब सी आवाज निकाल रहा है, उनके यहाँ नई नैनी रहने आयी है, उसका सात-आठ साल का बेटा एक कुत्ते के साथ ऐसे खेलता है जैसे उसका सगा भाई हो, उसने जून से उन दोनों की एक फोटो खींचने को कहा है.

 कल सुबह क्रोध ने उसके मन पर आक्रमण किया और आज सुबह भी, कल पानी खोल कर  छोड़ देने के कारण स्वीपर उसका शिकार हुआ और आज नन्हा जो नाश्ता ठीक से न खाने पर उसे बोध दिलाने का कारण बना. दोनों ही दिन उसे क्रोध का असर भुगतना पड़ा है मन की अस्थिरता के रूप में, कल लिख नहीं पायी, आज भी प्रयास ही कर रही है. कल विवेकानंद की दूसरी पुस्तक लायी है, कुछ देर पूर्व पढ़ रही थी, पढ़ने में बहुत अच्छी लगती हैं अच्छी बातें, पर व्यवहार में लाना...असम्भव तो नहीं पर उसके जैसे अज्ञानी के लिए कठिन अवश्य है. बेवजह ही क्रोधित हो जाना चाहे कुछ क्षणों के लिए ही क्यों न हो, जून से बहस करना, यह ठीक तो नहीं और बेजरूरत ही असत्य भाषण करना. कल उसने माली से फिर असत्य कहा कि लॉन मोअर ठीक होने के लिए वर्कशॉप में गया है. पता नहीं क्यों ?

  उन्होंने गुलदाउदी के लिए नए गमले तैयार किये हैं. उसमें लगाने के लिए कटिंग्स देने की बात उसकी सखी ने कही थी, सुबह से वह चिंता कर रही थी यह सोचकर कि उससे कैसे मांगे, पर आखिर फोन पर कह ही दिया, उसने कहा, पौध अभी तैयार हो रही है, दस-बारह दिनों में दे देगी. उसे राहत मिली, अनुभव इतना खराब नहीं था. आज उसके मन में जून के प्रति प्रेम के साथ कृतज्ञता का भाव उपज रहा है. ट्रांजिस्टर पर एक मधुर गीत बज रहा है, नन्हे को सुबह का नाश्ता फिर पसंद नहीं आया, शाम को उसकी पसंद का नाश्ता यानि नूडल्स बनाएगी, उसे याद आया कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गए कैरम खेला बहुत दिनों बाद. उसके हाथ में एक बार कम्पन था, शायद यह उसकी घबराहट की निशानी है, क्योंकि कभी-कभी यह बिलकुल नहीं होता, पर जब भी होता है उन दिनों की याद दिला देता है.






Wednesday, March 6, 2013

ताड़ के पत्ते




विशुद्ध प्रेम कभी रुकता नहीं, घटता नहीं, मिटता नहीं. जो रुकता, घटता और मिटता है वह  विशुद्ध नहीं और वह जानती है कि वह अपनी सखी से विशुद्ध प्रेम करती है, अभी-अभी उसने उससे बात की और जब पता चला कि वह ठीक है तो उसे भी अच्छा लगा, जून ठीक कहते हैं कि वह व्यर्थ ही अपनी कल्पना में दूसरों को परेशान देखकर खुद परेशान होती है. दस बजे हैं, कुछ देर पूर्व ही वर्षा की झड़ी लगकर थमी है, न जाने कहाँ से एकाएक काले बादल छा गए और अब मौसम फिर खुल रहा है. नन्हे की बस आज छूट गयी जून उसे स्कूल छोड़ने गए, इस अनुभव से वह अगर कुछ सीखे तो अच्छा है, सुबह उसे बहुत समय होता है पूरे दो घंटे.. पर मजे-मजे से करता है सब कार्य, धीरे-धीरे.. आज जून की पसंद पर इडली बनाई है उसने बहुत दिनों बाद.

अभी-अभी ‘कल्याण’ में पढ़ा कि दुःख का कारण विवेक का अनादर तथा विश्वास में विकल यानि विश्वास में कमी है. नन्हे का आज कक्षा दो में पहला हिंदी का टेस्ट है. कल उसकी बंगाली सखी कुछ देर के लिए आयी थी, बहुत सुंदर लग रही थी, और उसे भी हेलेन रॉबिंसन की किताब पढकर कुछ लाभ तो हुआ है. उसने समाचारों में सुना, सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव तीसरी बार फिर गिर गया है, गुवाहाटी से अभी तक रेलें चलनी शुरू नहीं हुई हैं. महाराष्ट्र में भी बाढ़ आ गयी है. बाढ़ की विभीषिका का अनुभव उसने नहीं किया है पर जिनके घर ड़ूब जाते हैं उनका दुःख..  उसने सोचा जिन बातों पर वश नहीं है उन्हें न सोचना ही बेहतर है. कल जून को एक सप्लायर ने सुपारी के दो और डिब्बे दिए...क्या यह मित्रता में दिया उपहार है..फिर उसे लेते हमें थोड़ी भी झिझक क्यों नहीं होती. कितनी सहजता से हम स्वीकार लेते हैं...

मंझले भाई का पत्र आया है. कल माँ-पिताजी का पत्र भी आया, मकान संबंधी कुछ सवाल थे, जून उनसे फोन पर बात करना चाहते थे, आज नहीं हो सकी, कल होगी. आज नन्हा सुबह जल्दी उठ गया, बस आने से काफी पहले तैयार था. सुबह स्कूल जाने से पूर्व उसने याद दिलाया, ताड़ के पत्तों से गुलदस्ता बनाना है, आज दोपहर उसी पर कार्य करेगी, एक पंखा और एक गुलदस्ता, और अभी एक कविता..

उसने सोचा जून ने पिता से फोन पर बात कर ली होगी, अगर वह भूल न गए हों, वह कम ही भूलते हैं, यह काम उसके ही जिम्मे है. नन्हे ने कल फिर ‘मोटू’ कहकर पुकारे जाने की शिकायत की, उस दिन कुछ लिख तो रही थी, उसी को पूरा करेगी पहले. कल पहले दिन ही उसने नया बैज खो दिया, स्कूल से आया तो उदास था. कल शाम के सिरदर्द के लिए कौन जिम्मेदार था शायद पत्तों पर रंग करना या फिर..खैर..खत्म होने का इंतजार करते करते लेटे हुए उसने एक कहानी बुनी, शेखर, शैल और दामिनी की..शेखर को एक का चुनाव करना है. तभी एक परिचित पंजाबी परिवार आ गया मिलने. क्रिकेट मैच के कारण आजकल ट्रांजिस्टर पर देर तक गाने आते है, ‘दुनिया’ फिल्म का गाना आ रहा है- जिंदगी मेरे घर आना ..कितने मधुर भाव हैं इस गीत के..