Tuesday, January 15, 2013

हम दीवानों की क्या हस्ती



उल्फा लीडर भारत सरकार से बात करने के पक्ष में नहीं हैं, भगवान जाने असम का भविष्य क्या होगा. कल सूजी व नारियल के लड्डुओं के कारण वह कुछ ज्यादा नहीं लिख सकी, सो दिन भर बेचैनी सी रही, अजीब सी बेचैनी, जैसे हरारत हो गयी हो. दोपहर को जून अभी घर पर ही थे, वह सो गयी, नन्हे ने सब कुछ अपने आप किया, वह अब सचमुच बड़ा हो गया है, बहुत समझदार और बहुत प्यारी बातें करता है. अपने आप होमवर्क करके खाना खाकर सोने चला गया.
कल शाम जून एक फिल्म का कैसेट लाए थे, Hook  इंडिया टुडे में सुबह ही पढ़ा था उसके बारे में, कल्पना की उड़ान है पूरी फिल्म, अजीब-अजीब से दृश्य जादू लोक में ले जाते हैं. अभी पूरी नहीं देखी उन्होंने, नन्हे को बहुत अच्छी लग रही थी, पर सुबह स्कूल जाने से पहले बोला, उसे अंग्रेजी फिल्मों में या तो कॉमेडी अच्छी लगती है या जेम्स बॉण्ड की फिल्म. बच्चे पिता को अपना आदर्श मानते हैं, उसका अच्छा उदाहरण आजकल देखने को मिल रहा है, जून ने कुछ दिन पूर्व कहा कि वह हर सब्जी में आलू क्यों डालती है, उसे आलू अच्छे नहीं लगते, और दो दिन बाद नन्हा भी वही बात कह रहा है, जबकि आलू उसे बहुत पसंद थे. घर से पत्र आया है सासु माँ ने ननद के लिए तकिये के गिलाफ, टीवी कवर, और मेजपोश बनाने के लिए कहा है, कल वे तिनसुकिया जाकर कपड़ा लायेंगे, कल ही बाजार से  वह लक्ष्मी, उनकी नौकरानी के लिए ऊन लायी थी, पर पता नहीं उसे स्वेटर बनाना आता भी है या नहीं.

आज पूरा दिन व्यवस्तता में बीता. सुबह उसकी मित्र का फोन आया उनकी कार का छोटा सा एक्सीडेंट हो गया है, तिनसुकिया जाकर विंड स्क्रीन बदलवानी पड़ेगी. दोपहर के भोजन के बाद वे तिनसुकिया गए, लौट कर टीवी पर पहले बजट देखा, फिर शाम की फिल्म. डॉ मनमोहन सिंह ने कुशलता के साथ बजट पढ़ा बीच-बीच में हँसाते भी रहे, पीवी नरसिंहाराव को एक अच्छे वित्त मंत्री मिल गये हैं. उसने आज अपने केश भी कटवाए, जून को स्टाइल पसंद नहीं आया, चिढ़ाने लगे, कल फिर जाना होगा, टीवी देखते-देखते और दिन में जरा भी आराम न होने के कारण वह थकी हुई तो थी ही, उसे क्रोध  आ गया पर हमेशा की तरह उनका स्नेह, उनकी उदारता और मीठी-मीठी बातें..वह जल्दी ही हँसने लगी.
कल दोपहर उसकी असमिया सखी अपने बेटे को जो नन्हे का हमउम्र है, छोड़ गयी फिर शाम को वे लोग उसे लेने आये. दोनों बच्चों में बहुत दोस्ती है, मनोयोग से खेल खेलते हैं, कभी  कुछ योजनायें बनाते हैं. शाम को वे सब क्लब गए, टीटी खेला, पहले अभ्यास फिर दो गेम खेले.

आज भी आधा दिन टीवी के नाम, “चाणक्य” और विश्वकप श्रंखला में भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मैच देखने में, भारत जीतते-जीतते... मात्र एक रन से हार गया. उसका मन उदासी से भर गया यह सोचकर कि पूरे भारत में कितने ही व्यक्ति जो मैच देख रहे होंगे बेहद उदास महसूस कर रहे होंगे. अब पाकिस्तान के साथ होगा अगला मैच उसे तो जीतना ही होगा. शाम को उन्हें पड़ोसी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी में जाना था, वहाँ कई लोगो से मुलाकत हुई कुछ परिचित कुछ अपरिचित..रात को सोने की तैयारी करते-करते टीवी पर “मधुरिमा” देखा, भगवतीचरण वर्मा के गीत तो बहुत सुंदर थे पर छायांकन अच्छा नहीं लगा सिर्फ एक गीत छोड़कर...’वह एक छोटा सा विहग...अपनी उमंग में उमग’. ‘हम दीवानों की क्या हस्ती, मस्ती का आलम छोड़ चले’...भी बहुत अच्छा गीत है, बहुत पहले उनके स्वर्गवास पर धर्मयुग में पढा था उसने.
नन्हे का स्कूल शिवरात्रि के कारण बंद था, उसके साथ क्रिकेट खेला, पहले क्लब, फिर उसके मित्र के यहाँ ले गयी उसे. शाम को वे अपने एक परिचित परिवार में गए, शिवरात्रि का व्रत रखा था उन्होंने, छोटा सा आपरेशन होना है पेट का गृहणी का, वैसे तो जरा-जरा सी बात पर घबरा जाती है पर आज निर्भय लगी. घर आयी तो उसके पेट में हल्का दर्द हो रहा था, खाना बनाने का भी मन नहीं कर रहा था, खिचड़ी बना दी उसने जो नन्हे और जून दोनों को पसंद है. फिर चुपचाप बिस्तर में लेट कर ‘सरिता’ पढ़ती रही, सरिता के कुछ पुराने अंक पंजाबी दीदी ने दिए हैं.





Sunday, January 13, 2013

प्रोफेसर पूरण सिंह- पंजाब के शायर



वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा विश्वबैंक से बजट सम्बन्धी पत्राचार को लेकर आज लोकसभा में हंगामा हुआ. रेलवे बजट संतुलित है. टीवी पर पंजाब के कवि, दार्शनिक, चिंतक, शायर के बारे में प्रोग्राम आ रहा है..अमृता प्रीतम उनके बारे में कितनी अच्छी भाषा में बता रही हैं. ‘पूरन सिंह’ धरती के मानस पुत्र थे, उनकी कविता मजदूर चंगे ! कितनी मार्मिक है कितनी सच्ची, १९३१ में उनका देहांत हो गया. प्रोफेसर पूर्ण सिंह की और भी कितनी कवितायें होंगी.. ऐसे ही भारत की अन्य भाषाओँ के भी कितने ही कवि होंगे जो अनोखी बात सीधी-सादी भाषा में कह जाते हैं. पंजाब के कवि की यह नज्म भी कितनी अच्छी है-

उत्तर की हवाओं के चुम्मन पी पीकर ...ओ फाख्ता !

और.. तू हमें छोड़कर कौन सी राह पर चल दिया पंजाब ?
मैं तो एक गीत हूँ हवा में कांपता हुआ..

सुरजीत कुमार का छायांकन कितना सुंदर है..लाल, नीले, पीले, गुलाबी, सलेटी आकाश के ये चित्र और नीले, लाल पानी में पड़ती हुई सूरज की छाया......झील का काँपता हुआ पीला पानी और सलेटी पहाड़..सब कुछ आँखों को मुग्ध कर रहे हैं...और दिल में कैसी हूक सी उठती है आँखें नम होने को आतुर और सीने पर जैसे कोई भार सा है..कितना महान शायर था वह, जिसने उसे पहली बार में ही अपना प्रशंसक बना लिया है. उसने भी कुछ पंक्तियाँ लिखीं-

जैसा मन तूने मेरा बनाया है ओ खुदा !
वैसा उनका क्यों नहीं बनाया
जो छुरियाँ चलाते हैं दरख्तों के सीने पर
रूप बिगाड़ रहे हैं सलोनी धरती का
जो अमृत से पानियों में जहर घोलते हैं
ऊंचें पहाड़ों को बारूद से उड़ाते हैं
ये धरती, हवा, पानी, पहाड़ ही तो जीवन हैं..तेरा सच्चा रूप ओ खुदा !
फिर तू क्यों चुप है ?


कल वे क्लब गए थे पर सिर्फ आधे घंटे के लिए, जून ऑफिस से देर से आये थे और नन्हे ने टेबल्स में बहुत सी गलतियाँ की थीं. कल कोई खत नहीं आया, फोन भी नहीं मिला, शाम को जून ने कोशिश की थी.आज फिर कल की तरह मौसम खिला-खिला है, धूप अब तेज लगती है, बाहर देर तक बैठा नहीं जाता. आज उसने सूजी के लड्डू बनाये थे. कल रात उसने एक स्वप्न देखा-

कल रात स्वप्न में आकाश में उड़ता एक जहाज देखा
जिसमें पीछे-पीछे
आग की एक लपट भी थी
जाने वह जहाज की अपनी थी या
उसका पीछा कर रही थी
फिर आकाश की दसों दिशाओं में
रोशनियाँ प्रज्ज्वलित हो उठीं
युद्ध की दुन्दुभी बजने लगी
और पर कटे पंछी सा जहाज
धरती पर आ गिरा
वह उसके पास गयी
एक पुतला
झीने आवरण में लिपटा लेटा था
और पास ही एक छोटी बच्ची सिसक रही थी
रात्रि से सुबह, और सुबह से शाम हो गयी है और यह स्वप्न उसके पीछे-पीछे है, क्या स्वप्नों का कोई अर्थ होता है, यदि हाँ, तो क्या वह जहाज उसका तन था और बच्ची उसकी आत्मा ?

Saturday, January 12, 2013

वंशी की धुन



कांग्रेस आई को पंजाब के चुनावों में पूर्ण बहुमत मिला है. श्री बेअंत सिंह जी मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे. अच्छा है पंजाब में पुनः जनता का शासन होगा. आज पंजाबी दीदी ने नन्हे और उसे दोपहर को अपने घर बुलाया है, उन्हें कुछ पौध भी देनी है. आज नन्हे के टेस्ट के कारण कल शाम वे घर पर ही खेले, पहला गेम बैडमिंटन का वह अच्छा खेल पाती है पर उसके बाद इतना थक जाती है कि अक्सर जून दूसरा गेम आसानी से जीत जाते हैं. कल रात को एक टेलीफिल्म देखी, “टूटे पंख” रुला दिया जिसने, यूँ तो उसका दिल बहुत कमजोर है जरा सा दुःख देखते ही पिघल जाता है, सिर्फ दुःख ही क्यों कोई भी दिल को छूने वाली बात हो कि आँखें नम हो जाती हैं. हर रोज एक बार तो ऐसा होता ही है, आंसू बिलकुल तैयार रहते हैं. कोई कहानी पढ़े या कविता कोई भाव भरी बात नन्हे से हो या जून से, ऐसा ही होता है. फिर फिल्म में सुधा का अभिनय करने वाली कलाकार ने तो कईयों को रुलाया होगा. वह  उपेक्षित थी और यही दुःख उसे खा रहा था. प्यार न मिले कोई बात नहीं पर उपेक्षा का जहर बहुत दुखदायी होता है. किसी के अस्तित्त्व को नकारना, किसी के प्रति उदासीन रहना वह भी पति या पत्नी के सम्बन्धों में, सचमुच उसका दुःख बहुत बड़ा था. कितनी देर हो गयी है, खाना अभी तक नहीं बना है पर रोज की तरह, पिछले दो-तीन दिन की तरह कुछ पंक्तियाँ उसे लिखनी ही हैं-
बहुत दिन हुए उसके मन की धरती में
एक बीज बोया था किसी ने
प्रेम का बीज
और वह भूल गया
अब उस बीज में अंकुर फूटा है
नन्हीं-नन्हीं शाखाएँ निकलेगी
फिर पत्तियों और फूलों से भर जायेगा
उसके मन का आंगन...
जहां पक्षी कलरव करेंगे

आज शनिवार है, नन्हे का स्कूल बंद है, सारी सुबह उसके साथ खेलते-खिलाते, बतियाते  बीती. इसी कारण साढ़े दस बज गए हैं और उसका काम खत्म नहीं हुआ है, आज कुछ लिखना मुश्किल लगता है फ़िलहाल अभी तो. कल फिर इधर-उधर के कामों में वक्त गुजर गया. चिट्ठियों के जवाब देने थे, छोटी बहन, मंझले भाई, माँ तथा छोटी ननद को खत लिखे. पिछले हफ्ते भी उसने सात पत्र लिखे थे, तीन के जवाब आ चुके हैं. कल धूप थी आज फिर बादल हैं. आज कई सारे पुराने खत पढ़कर जला दिए, फुफेरे भाई के खत में लिखी एक कविता मिली पढ़कर लगता नहीं था कि उसने खुद लिखी है, शायद लिखी भी हो, बहुत अच्छी कविता है, उसने उसे जलाने से पहले डायरी में नोट कर लिया. इतवार रात को बड़ी भाभी का फोन आया, वह एक पल को तो घबरा ही गयी, पर उन्होंने ऐसे ही फोन किया था हाल-चाल जानने के लिए. कल क्लब में टीटी खेला पर अभ्यास छूट जाने के कारण ठीक से नहीं खेल पायी. टीवी पर दुर्गा खोटे पर एक कार्यक्रम देखा, बहुत अच्छा लगा और उनकी यह बात कि हर काम को पूरे मन से करना चाहिए चाहे वह कितना भी छोटा या बड़ा काम हो...यानि  श्रम का सम्मान..और कल सुबह एक महिला चित्रकार तथा कविताओं का संकलन “स्वांत सुखाय” वाली कुमुदनी जी से साक्षात्कार देखा. आजकल टीवी पर बहुत प्रेरणात्मक कार्यक्रम आ रहे हैं, बेहद अच्छे लगते हैं. मन को जैसे उत्साह से भर देते हैं, कुछ भी नहीं बदलता पर फिर भी मन में कहीं वंशी की धुन बजने लगती है. वह भी कुछ करे ऐसा मन होता है, पर ज्यादा कुछ कर नहीं पाती, दोपहर को कल नन्हे को सुलाते-सुलाते खुद भी सो गयी. सोने का मोह छोड़ना होगा, बस कभी-कभी सुबह का यह वक्त मिलता है, शाम को जून के आ जाने के बाद तो पता ही नहीं चलता समय कैसे बीत जाता है.




Thursday, January 10, 2013

बॉम्बे टू गोवा



सतावन महीनों के राष्ट्रपति शासन के बाद पंजाब में आज चुनाव हो रहे हैं. कल से रसोईघर के बाहर गैस लीक हो रही थी अभी कुछ देर पूर्व ठीक करके गए हैं कम्पनी के कर्मचारी. आज मौसम निखा पर है, धूप खिली है और सारे पेड़-पौधों ने, लॉन की घास ने जैसे राहत की साँस ली है. बाहर से पंछियों की मधुर आवाजें आ रही हैं, हौलिऔक के फूलों में एक लाली पक्षी तरह-तरह की आवाजें निकाल रहा है. कैलेंडुला के फूल अब सारे खिल गए हैं, उसने सोचा अगले साल उन्हें और घना लगायेगी. नन्हा आज सुबह पूछ रहा था, आप डायरी क्यों लिखती हैं, क्या फायदा है इससे ? आज सुबह वह इस सर्दी में पहली बार प्रातः स्नान करके गया है, वरना ग्यारह बजे वापस आकर ही करता है. कद के हिसाब से वह छोटा लगता है पर समझ के हिसाब से बड़ा. कल वे क्लब गए पर बच्चों की भीड़ थी, वे पुस्तकालय में चले गए, ‘लाइफ’ पत्रिका पहली बार देखी, अच्छी है, ‘परेड’ अब शायद नहीं आती, अगली बार तिनसुकिया जाने पर खरीदेगी उसने मन ही मन सोचा. कल उन दीदी से बात हो गयी, वे लोग अगले महीने चले जायेंगे, इतवार को उसने उन्हें लंच पर बुलाया है. कल दोपहर उसकी आँख लग गयी और जब जगी तो जून के आने का समय होने ही वाला था, आज उसने न सोने का तय किया है फूल बनाएगी, ढेर सारे फूल, बेंत की वह सुंदर टोकरी जो वे गोहाटी से लाए थे, खाली पड़ी है, कल ‘तलाश’ की थी और आज ‘सवाल’ क्योंकि हर ‘सवाल’ के ‘जवाब’ की तलाश ही तो जिंदगी का सफर है-

यह जिंदगी एक सवाल है?
हम क्यों हैं? कब से हैं?
जैसे बड़े सवाल
और छोटे-छोटे सवाल भी
पिताजी गुस्सा क्यों करते हैं ?
भैया गुमसुम क्यों है ?
गुडिया हँसती क्यों नहीं ?
या माँ की ऑंखें नम क्यों हैं?

कल शाम वह अपनी बंगाली सखी से मिली, बातें हुईं बहुत देर तक. अच्छा लगा, कभी उलझन भी, वह बहुत सारे पूर्वाग्रहों से ग्रसित लगती है, खैर..किसी और की जिंदगी का विश्लेषण करने का उसे क्या अधिकार है? फिर भी वह बहुत धीरे-धीरे काम करती है, इतनी धीरे चलकर वह जिंदगी के साथ चल पायेगी. आज छोटी ननद का पत्र आया है, अपने विवाह को लेकर वह बहुत उत्सुक है जैसा कि स्वाभाविक है. उसे शनिवार को ही जवाब देगी. कल छोटी बहन का भी पत्र आया वे लोग गोवा से वापस आ गए हैं, विवाह के बाद घूमने गए थे, उसने सोचा कभी वे भी गोवा जायेंगे. कल क्लब न जाकर उन्होंने घर पर ही बैडमिंटन खेला.  ‘कशिश’ देखा टीवी पर नायिका को गुस्सा कुछ ज्यादा ही आता है.कल मार्केट में उनके एक पुरने परिचित दम्पत्ति मिले, उनसे मिलना उसे हमेशा ही अच्छा लगता है, दोनों ऊर्जा से भरे होते हैं, चहकते हुए से. कल शाम जून ने उसे पिघला कर रख दिया, कल जब उसने कहा कि एक-दूसरे की निकटता में ही सब कुछ मिल गया, बाकी तो सब फार्मेलिटी है, तो उसे बहुत अच्छा लगा. कई बातों में वे दोनों एक सा सोचते हैं पर बहुत सी बातों में नहीं और शायद यही वजह है जो उनके सम्बन्धों को जीवन प्रदान करती है.

जब तुम मेरी आँखों में अपना चेहरा तलाशते हो
मेरी ऑंखें समुन्दर बन जाती हैं
फिर डूबते-उतराते हो लहरों में तुम
और मैं ऑंखें बंद कर लेती हूँ अब तुम कैद हो मेरे अंतर्मन में
गहरे और गहरे उतरते जाते हो
फिर सीप में मोती की तरह
आँखों से एक बूंद बन बरस जाते हो..!













Wednesday, January 9, 2013

हर कोई चाहता है...क्या?



आज फिर कई दिनों के बाद उसने डायरी खोली है, सोचती रोज थी, पर कुछ लिखे ऐसा मन नहीं होता था. आज खत लिखने बैठी तो इसे भी ले आई और अब यह उसके सामने है. सबसे पहले ध्यान आया कि कुछ देर पूर्व पंजाबी दीदी को फोन किया था मिली नहीं, शायद अस्पताल गयी हों, कल अगर फ्लाईट आई हो तो उसकी एक मित्र भी आ गयी होगी. पर वह  यह सब क्यों लिख रही है, वह तो अपने आप से बातें करने आई थी. क्या खुद का सामना करना इतना मुश्किल है, शायद आजकल हो गया है उसके लिए. कितना कुछ हुआ इन दिनों में, छोटी बहन का विवाह हो गया, वे घर गए, दिल्ली गए, कोलकाता गए वापस आये. उसका गला भी खराब हुआ, कल पिकनिक में गए और भी न जाने कितनी बातें. पर यह सब तो वह  लिखना नहीं चाहती थी, फिर वह क्या है जो लिखना चाहती है, जो उसके मन के अंदर कहीं दबा, छुपा सा रहता है, पर फूट कर नहीं आता...वह कोशिश ही नहीं करती, पर कुछ है जरूर..जो उसे औरों से पृथक करता है, जो सिर्फ उसका है, ऐसा कुछ जो आजतक बाहर आने के लिए ही वहाँ बसा है. धीरे-धीरे वह अपने आप ही बाहर आएगा, जब वह कागज-कलम लिए उसका स्वागत करने को तत्पर रहेगी, जो बाहर आकर भी उसके मन को खाली नहीं करेगा बल्कि भर डालेगा उसे, सम्पूर्णता देगा उसे, कविता में कितनी बड़ी ताकत है यह...कवि को रीता  नहीं करती, जब एक भाव कवि उड़ेंलता है तो कहीं अंतर में एक घट भर जाता है, और ऐसे ही कई भाव सुगबुगा रहे हैं उसके अंतर्मन में, कहीं तो कोई है जो इन्हें समझेगा...पर जब तक ये बाहर नहीं आते खुद ही कहाँ समझती है..और वह कोई कौन होगा शायद कोई भावी पाठक...कितने दिनों वंचित रखा है उसने उन्हें..कितने दिनों प्रतीक्षारत रखा है स्वयं को..पर कभी तो टूटेगा यह मौन?

आज मौसम फिर ठिठुर रहा है, धूप एक पल के लिए आती है फिर चली जाती है. कल नूना ने लिखना शुरू किया तो समय का आभास ही नहीं रहा, जून के आने पर ही पता चला, दिन कैसा अच्छा बीता..शाम को टीटी खेलने गए, हॉल खाली था, वे आराम से खेल सके. कल यात्रा से यहाँ आने के बाद का पहल पत्र बड़े भाई-भाभी का मिला. नन्हा आज सुबह उठना ही नहीं चाह रहा था, कल दोपहर सोया नहीं था शायद इसीलिए, उसे दस-ग्यारह घंटे तो सोना ही चाहिए. पंजाबी दीदी फिर नहीं मिलीं फोन पर, उसने सोचा कुछ देर में फिर करेगी, उन्हें यहाँ से चले ही जाना है इसीलिए शायद वह पहले सा जुडना नहीं चाहतीं, नहीं तो इतने दिन फोन न करें, ऐसा नहीं हुआ. होता है ऐसा, इंसान जब जहां से जाना चाहता है नाते तोड़ना चाहता है पर जब इस दुनिया से जाना होगा...कितनी भयावह लगती है मृत्यु, शायद उतनी है नहीं पर कभी-कभी जब वह सोचती है एक दिन यह सब कुछ छोडकर शून्य हो जाना होगा तो डर लगता है, जीवन से इतना मोह है तभी समझ में आता है. अचानक उसे अपनी असमिया मित्र का ध्यान हो आया, आज उसका मन इधर-उधर ही जा रहा है, वह एकाग्रता जो लेखन में चाहिए, आ ही नहीं रही है, कोई एक विषय हो या एक बिंदु हो जिस पर मन साधना है तो आसान होगा. पर वह आधार, वह बिंदु कहाँ से लाये ? लाना भी अपने अंदर से होगा..ढूँढना होगा मन में गहरे उतर कर, यह खोज भी तो एक विषय हो सकता है. हर इंसान को हर पल किसी न किसी कई तलाश रहती ही है, किसी को सुख की किसी को शांति की तो किसी को दोस्त की और किसी को दुश्मन की... तलाश करते-करते ही जीवन चूक जाता है, किसी को भगवान की तलाश है...भगवान जो कभी नहीं मिलते, कभी उसका मन भगवान को मानने से इंकार क्यों करता है...तब जब दिमाग मन पर हावी हो जाता है. यह मानना न मानना भी तो एक तरह की तलाश है.

Tuesday, January 8, 2013

आँखों वाला पानी -नीरज



एक दिन उसने टीवी पर ‘नीरज’ को सुना जो अपने चिरपरिचित अंदाज में यह कविता सुना रहे थे-
“आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहिए
और लिखने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं आँखों वाला पानी चाहिए”

उसने सोचा, क्या यह जरूरी है की हर प्रेम कथा आंसुओं से ही लिखी जाये ! फिर तो यह तय है कि प्रेम के पथ पर चलना हो तो आंसुओं से गुजर कर ही जाना होगा..आंसू जो दुःख को हसीन बना देते हैं, ये न होते तो इंसान के अंदर ज्वालामुखी दबे रहते या तो चट्टानें..भारी से भारी दुःख भी इंसान इन के सहारे झेल जाता है, आंसू पानी नहीं एक वरदान हैं ईश्वर का मानव को...

अगर वह कुछ लिखना चाहे तो पहले विषय की तलाश करनी होगी, जाहिर है वह वही चुनेगी जो उसके लिए ज्यादा महत्व का होगा, तो बात यहाँ पर रुकी कि वह किसे ज्यादा महत्व देती है...हँसी को..आकाश को.. जीवन को.. मृत्यु को.. सम्बन्धों को.. या स्वाधीनता को...जुड़ाव को..प्यार को..बच्चों को..या मौसम को..कर्म को अर्थात कार्य को या कर्त्तव्य को..नहीं कर्त्तव्य के बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं, पर काम करना, कुछ करना, कुछ करते रहना यह उसे सबसे जरूरी लगता है, नहीं तो इंसान अपनी नजरों में गिरने लगता है. जिन पलों में वह व्यस्त रहती है, खुश रहती है पर मात्र खुशी ही काम करने का कारण नहीं है इससे कहीं ज्यादा एक संतोष, एक अर्थ मिलता है जीवन को..लेकिन काम करने को कविता का विषय कैसे बनाया जा सकता है ? वह भी है उसके मन में क्या..

कर्महीन जीवन से सांसें प्रश्न पूछतीं
क्या आना-जाना ही हमारा
जीवन का उद्देश्य तुम्हारा ?
किसने दिया तुम्हें अधिकार
व्यर्थ करो ऊर्जा अपार !
ढक के रखो ज्योतिपुंज को
छाया हो घन अंधकार !
जो भर सकता जीवन का घट
क्यों प्यासा है?
जो चल सकता पर्वत पर्वत
क्यों बैठा है?
जो रच सकते अद्भुत सृष्टि
क्यों बेसुध हैं?
वरदान मिले इन हाथों को
अज्ञान रज्जु से क्यों बांधा ?
उसने कई कवितायें लिखीं उस दिन के बाद से अगले कई दिन तक रोज एक.

स्वप्न उसे अचरज से भर देते हैं, नींद को रहस्यमय बनाने वाले स्वप्न..

जब ईश्वर ने स्वप्न रचा होगा
कितना विचलित होगा
कभी झिझक, कभी डर तो कभी
मुस्कान भी झलकी होगी मन में
स्वप्न में वह छिपा जो नहीं रहता
अनदेखा, अनजाना वह स्वप्नों में
सदा से आया करता है !
स्वप्न रहस्यमयी सृष्टि का एक अनोखा रहस्य
जिसमें वह स्वयं को उजागर करता है
नई-नई राहें दिखाता
सवालों को हल करता कभी
नई चुनौतियों का सृजन करता है..










आक छीं...



कल इतवार था यानि लिखने का भी अवकाश, सुबह तो सारी टीवी के कार्यक्रमों में निकल जाती है, दोपहर को उन्होंने आर्गन्डी के कपड़े से फूल बनाये, पहले उन्हें अलग अलग रंगों में रंगा, फिर स्टार्च लगाया और तब  अलग अलग आकार के फूल बने. शाम को फिल्म देखी. नन्हे का आज विज्ञान का टेस्ट है, उसको सुबह बिस्तर से उठाना बड़ा मुश्किल है, ठंड भी काफी थी आज, पर अब धूप निकल आई है. कल शाम वह बेवजह उदास हो गयी ,कभी-कभी होता है ऐसा उसके साथ, पता नहीं क्यों ? जून उसे गाइड करते, उसे कुछ सिखाते, उससे ज्यादा रूचियाँ होतीं तो....शायद यही कारण है, उन्हें ऑफिस के काम के अलावा दुनिया की किसी वस्तु में दिलचस्पी नहीं है और अगर जरूरी न हो तो शायद..., हो सकता है कि वह कुछ ज्यादा ही सोच रही है पर यह बात सच है किसी हद तक..नन्हे के लिए उन्हें एक आदर्श होना चाहिए जो उसे मार्गदर्शन दे सके, उसे उत्साहित कर सके...पर उसे उनसे इतनी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि वह स्वयं ही उनकी अपेक्षाओं पर खरी नही उतरती. शायद कोई भी इंसान ऐसा नहीं जो अपनी अपेक्षाओं को पूर्ण कर पाता हो. लेकिन वह कोशिश तो करती है, उनके प्रति जागरूक तो है, पर वह तो उदासीन हैं जैसे...मस्त अपने आप में. गेंदे की जो पौध उन्होंने लगाई थी उसमें अच्छे फूल नहीं आ रहे हैं, सब खिल जायेंगे तब शोभा बढ़ेगी, वैसे हर फूल की अपनी सुंदरता होती है, आज वह अपनी कही हर बात काट रही है, शायद यह मौसम का असर है, खिली-खिली धूप का उजास मन को स्थिर रहने ही कहाँ दे रहा है. कुछ देर पहले वह उन पंजाबी दीदी को फोन करने की सोच ही रही थी कि उनका फोन आ गया, उनकी नौकरानी के यहाँ कल रात लड़ाई हो गयी, खून खराबे तक बात पहुंच गयी. पहले दिन से लेकर इस सृष्टि पर कितना खून बहा होगा इस धरती पर...पर समुन्दर अभी तक लाल नहीं हुआ..भगवान ?

कल लिखना शुरू ही किया था कि जून आ गए. और फिर दो दिन बीहू का अवकाश..वे बहुत घूमे, कार से, वैन से.. पैदल चलना, मीलों निकल जाना दूर-दूर.. यहाँ सम्भव नहीं है. हरे-भरे पेड़ों के बीच घूमना, काँटों भरे रास्तों पर, ऊबड़खाबड़ पगडंडियों पर ...जैसे उस दिन वे म्याऊं में घूम रहे थे, जो अरुणाचल प्रदेश में है, उसे बहुत अच्छा लगा था प्रकृति के बिल्कुल करीब होना. उसकी तीन कवितायें क्लब की वार्षिक पत्रिका में छपी हैं. सोचा था उसने एक तो अवश्य होगी. मौसम फिर बदली-बदली हो गया है, नन्हा जब स्कूल जा रहा था वर्षा भी हो रही थी. उन्हें घर जाने में बहुत कम दिन रह गए हैं.

परसों उन्हें जाना है, आश्चर्य है घर से न कोई पत्र न कार्ड आया है, वे लोग शादी की तैयारियों में इतने व्यस्त हो गये हैं कि...शायद आज आए. सिर्फ दो दिन के लिए जाना है उन्हें पर सर्दी की वजह से सामान काफी हो गया है, तैयारी लगभग हो गयी है, यात्रा करने से पूर्व जो उत्सुकता, उत्साह और थोड़ी घबराहट सामान्यतः होती है, शुरू होने लगी है. आस्ट्रेलिया और भारत के बीच फाइनल मैच खेला जा रहा है.

कल भारत छह रन से हार गया. शाम को दीदी मिलने आई थीं, उन्हें विदा करते समय दस-पन्द्रह मिनट वह बाहर खुले में खड़ी थी ओस टपक रही थी, उसे सुबह-सुबह दो तीन छींकें आयीं. नन्हे की चम्पक भी आई कल, बहुत खुश था.