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Wednesday, March 10, 2021

मूंगफली मेला

 मूंगफली  मेला 

रात्रि के पौने दस बजे हैं। आज सुबह भी वे प्रतिदिन की तरह अंधेरे में ही टहलने गए। सुबह सोसाइटी की तरफ से बगीचे व गमलों में खाद डाली गई। ग्लैडियोली के बल्ब फूटने लगे हैं। जून को पिटुनिया लगाने का मन है। जिनके लिए  यहीं स्थित सुपर मार्केट में रेलिंग में लगाये जाने वाले दस गमलों का ऑर्डर दिया है, बालकनी में लगाएंगे।  नैनी सुबह सफाई करके नहीं गई, दोपहर को बेटी को साथ लाएगी, ऐसा कहकर। दोपहर को दोनों ने मिलकर सभी खिड़कियों के शीशे साफ किए।अब भाषा के कारण कोई समस्या नहीं होती, वह इशारों से सब समझ व समझा लेती है। 


शाम को वे एओल आश्रम जाने से पहले मैसूर रोड पर स्थित बालाजी नर्सरी गए, पर वहाँ फूलों की पौध नहीं मिली। आश्रम की नर्सरी से  फूल के दो पौधे लिए। वहाँ भीड़ बहुत थी। गुरूजी लगभग साढ़े छह बजे आए, उसके पहले भजन गाए जा रहे थे। आज गुरूजी ने डाक्टर्स तथा वैज्ञानिकों के प्रश्नों के सदा की तरह आनंदित करने वाले जवाब दिए। कुछ पुलिस अधिकारी भी उनसे मिलने आए थे।  जापान से आए एक व्यक्ति ने जल को शुद्ध करने का एक सस्ता व सरल तरीका बताया। उन्हें कुछ सर्दी भी लगी हुई थी, एक-दो बार छींक आयी। वहाँ से आकर मन कितना हल्का लग रहा है।आश्रम के कैफे में ही दोसा खाया।


रात्रि के नौ बजे हैं। नवंबर का महीना है,  कमरे में गर्मी का अहसास हो रहा है। यहाँ सर्दी का मौसम मात्र दिसंबर-जनवरी में ही होता है। दोपहर को टेलर से कपड़े ले आए, ठीक सिले हैं. लक्ष्मी नर्सरी से गुलदाउदी के पौधे लिए तथा एक स्नेक प्लांट, जो कमरे में रखा जा सकता है। आज लेखन का कोई कार्य नहीं हुआ, एक कविता पर एक प्रतिक्रिया लिखी। बड़े भाई ने पिताजी के लिए एक वीडियो बनाया है जिसमें उनकी अकेले तथा सबके साथ तस्वीरें हैं। आज मार्केट में पहली बार ‘रिलाइन्स ट्रेंड्स’ गए वे, घर ले जाने के लिए कुछ उपहार खरीदे, उनके साथ एक चादर मुफ़्त मिली, तथा कुछ कूपन भी, उन्हें आश्चर्य हुआ जितने का समान था उतना ही गिफ्ट, यह कैसा व्यापार है ! 


आज राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गये ऐतिहासिक फैसले का दिन था। सरकार ने बहुत सावधानी बरती और सबको बार-बार कहा कि फैसला किसी के भी पक्ष में हो, हिंसा नहीं होनी चाहिए; और ऐसा ही हुआ है। कई मुस्लिम संस्थाओं ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। पिताजी से बात हुई, उन्हें भी इस फैसले से खुशी हुई है। छोटा भाई आज छोटी ननद के घर गया है, वह बैंक के काम से पूरे भारत में घूमता है। शाम को एक सखी का फोन आया, अब वह उनके असम वाले कंपनी के घर में रहने वाली है। अच्छा है कि वह पुरानी नैनी को सर्वेन्ट रूम में रहने देगी। आज एओल के एक ऐप से योग साधना में सहायता ली। शाम को गुरूजी का एक सुंदर प्रवचन सुना, “फीलिंग द प्रजेन्स”, कितने सरल शब्दों में कितनी गहरी बात उन्होंने बता दी। 


आज वे मूंगफली मेला देखने गए, जिसे यहाँ पर ‘कंदले काई फरशे’ कहते हैं। बसवन गुड़ी में कार्तिक माह के अंतिम सोमवार को आयोजित होने वाला यह मेला चार सौ वर्ष पुराना है। लगभग दो किमी सड़क पर मूंगफली बेचने वाले किसान व व्यापारी अपने दुकानें लगाते हैं। मेले में अन्य दुकानें व झूले आदि भी होते  हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस मेले में लगभग बारह से पंद्रह टन मूंगफली बेची जाएगी। ज्यादा भीड़ होने के कारण वे बीच से ही लौट आए, नन्हे का एक मित्र भी साथ था, पहले वे उसी के घर गए थे, जो उसी इलाके में रहता है। उसने बताया कि बचपन के बाद इतने वर्षों में वह आज पहली बार ही मेले देखने आया है। कभी बाद में देखेंगे यह सोचकर अपने ही शहर के दर्शनीय स्थल देखने लोग नहीं जा पाते हैं।  


उसने कालेज के दिनों की डायरी में पढ़ा, विनोबा के विचार उसने लिखे थे। ‘अध्यात्म-ज्ञान से बगावत की हिम्मत आएगी’ 


“हम देह से अलग अविनाशी, आत्मरूप हैं, परमेश्वर अंदर विराजमान है, इसी जन्म में उसका दर्शन सुलभ है, सारे जीव हमारे रूप हैं” इस अध्यात्म विचार में प्रवीण होना चाहिए। 

शिक्षण में सत्यनिष्ठा और जीवन में तपस्या की सख्त आवश्यकता है जिससे मौजूद समाज के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत आए। जिसके अंदर अध्यात्म विद्या है उसे सारी दुनिया भी दबाना चाहे तो दबा नहीं सकती। मेरा विश्वास है कि अध्यात्म विद्या से हम जबरदस्त क्रांति कर सकते हैं। पुस्तकों से मदद अवश्य मिलती है, परंतु अगर मूल विचार मिलता है तब ही आगे की बात हो सकती है । आत्मजज्ञान ही सही ज्ञान है जिसकी सबको जरूरत है। मुख्य रूप से तीन प्रकार का ज्ञान हरेक को होना चाहिए - आरोग्य ज्ञान, नीति ज्ञान, आत्मज्ञान ! 


Tuesday, July 23, 2013

जालोनी क्लब - घर जैसा


जून अभी तक नहीं आए हैं, वह कुछ देर पूर्व क्लब से पैदल वापस आ गयी है, और पिछले पांच मिनटों से समझने में असमर्थ थी कि  इस वक्त का सबसे अच्छा उपयोग कैसे करना चाहिए. नजर आ गया बिन पढ़ा अख़बार, कुछ देर पढ़ा और पीया जून के हाथ का बना गर्म-गर्म अच्छा सा सूप, नन्हे को पढ़ाया. दोपहर को छोटी बहन की लिखी चिट्ठी मिली उसने बिस्तर में बैठकर मूंगफली खाने की बात लिखी है, वह तो यहाँ हो नहीं सकता, पहली बात यहाँ मूंगफली छिली हुई ही मिलती है, दूसरी वे बिस्तर में बैठकर कुछ भी नहीं खाते, ब्रश करने के बाद ही न बिस्तर में आते हैं.

क्लब से आते वक्त सोच रही थी कि क्लब की वार्षिक पत्रिका के लिए क्या लिखे, तभी मन में एक शीर्षक कौंधा, “घर से दूर एक घर, जालोनी क्लब”. विचार क्रम स्वतः ही चल पड़ा, वर्षों पूर्व जब वे यहाँ आये थे तो प्रतिदिन संध्या को उनके कदम क्लब की ओर बढ़ जाते थे. पुस्तकालय का विशेष आकर्षण था, पहली बार अंग्रेजी पुस्तकों से साक्षात्कार हुआ था और जिन लेखकों के सिर्फ नाम भर सुने थे, उनकी किताबें हाथों में पाकर एक नई दुनिया के जैसे द्वार खुल गये थे. उन दिनों टीवी भी नहीं था, सोनी और स्टार का तो किसी ने नाम भी नहीं सुना था. कितनी ही शामों को जब मन बेवजह उदास हो जाता, अपनी बाहें फैलाये क्लब स्वागत करता, चाहे बैडमिन्टन या टीटी कोर्ट में दो-दो हाथ करके समय गुजरा हो या हर शुक्रवार को दिखाई जाने वाली हिंदी फिल्म देखकर. और कुछ नहीं तो सर्दियों में खिलने वाले फूलों को निहारते ही. वार्षिक क्लब मीट हो या गर्मी की छुट्टियों में नन्हे-मुन्नों के कार्यक्रम, गीत या गजल नाईट हो अथवा किसी अतिथि का भाषण, हर मिजाज के लोगों के लिए कुछ न कुछ आकर्षण रहता ही है. यह लिखते समय यह अहसास मन को कचोट रहा है कि उसे यह इतना कुछ देता  है पर बदले में उसने यदि कुछ दिया है तो बस अपना मूक स्नेह.


उसने आगे लिखा, ईश्वर की बनाई इस अनोखी नगरी में यूँ हर व्यक्ति अकेला है उसे परिवार के सहारे के साथ समाज का सहयोग भी अपेक्षित है और क्लब जैसी संस्थाएं इस कमी को पूरा करती हैं,.. यह क्लब उन्हें एक मंच प्रदान करता है. इन्सान की यह प्रवृत्ति होती है कि कहीं न कहीं से जुड़ा रहे  जमीन से जुड़ कर जैसे पौधे अपना रंगरूप पाते हैं, मानव मन भी एक आधार चाहता है. तभी तो पहले परिवार, फिर कबीले, गाँव, शहर और राष्ट्र की रचना हुई होगी. यही अपनेपन की भावना उन्हें इस क्लब से जोड़ती है. आने वाले वर्षों में इसी तरह यह फले-फूले, और जब वे यहाँ नहीं रहें तब भी इसकी यादें मन में संजोये रहें, आखिर यह घर से दूर एक घर ही तो है.