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Friday, March 2, 2012

पुराने खत


आजकल सुबह शाम ठंड बढ़ जाती है और दोपहर को गर्मी रहती है. अक्टूबर शुरू हो गया है. कल वे टहलते हुए क्लब गए, धर्मयुग का नया अंक पढ़ा नूना ने और जून ने स्वामी विवेकानंद की एक किताब के कुछ पन्ने. लाइब्रेरी में ही एक परिचिता मिलीं, पुरानी पड़ोसिन, कहने लगीं, उनके पति शाम को देर से घर आते हैं सो वे लोग इतने दिनों से मिलने नहीं आ सके.
कल जब जून घर आया तो नूना पुराने खत पढ़ रही थी. कितनी स्मृतियाँ सजीव हो उठीं. उसने कहा कि वह बस यही चाहता है, वह खुश रहे, जब तक वह साथ रहता है, नूना खुश रहती है, उसके जाने के बाद उसकी बातें याद करके. रेडियो पर हिंदी फ़िल्मी गीत की धुन पर आधारित एक असमिया गीत बज रहा है. वह कढ़ाई का काम लेकर बैठी है.
सात अक्तूबर ! आज पूरे नौ महीने हो गए उन्हें साथ-साथ रहते हुए. यह तिथि कितनी यादों को समेट लाती है. विवाह पूर्व के वे वर्ष, महीने और दिन इसी तारीख पर आकर सिमटे थे और विवाह के बाद का यह अनुराग पूर्ण जीवन इसी तिथि से प्रारम्भ हुआ था. उस दिन आधी रात्रि को जून उसे उसके परिवार से बाहर एक नए घर में लाया था. आश्वासन था उसके स्पर्श में, एक पल को लगा था उसकी आँखें देखकर कि वह उदास है या कहीं मन में घबराया हुआ है कि क्या होगा आगे, पर दूसरे ही पल उसका साथ उसे बहुत पुराना लगने लगा था. जैसे वे तो पहले से ही साथ-साथ थे. जैसे उन्हें तो सब मालूम था कि आगे क्या होने वाला था. उसने इतना स्नेह दिया है कि पहले के जीवन में जिसकी झलक कहीं-कहीं ही दिखाई पड़ती थी. कल उसे मोरान जाना है कुछ दिनों के लिये, नूना को अकेले रहना होगा, रहना ही होगा उसके लिये, उनके लिये.