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Friday, April 19, 2013

बेल का शर्बत



आज बिजली ने फिर बहुत परेशान किया, पूरी दोपहर.. फिर शाम को भी गायब रही, नौ बजे के बाद आई. गर्मी भी बेहद थी, पसीना बहा देने वाली गर्मी. दोपहर को पाकिस्तानी लेखक ‘इब्ने इंशा’ की आखिरी किताब के कुछ पन्ने पढ़े. तंज बड़ा चुभता हुआ है इस किताब में. उसने जून को तीन कवितायें भेजने का वायदा किया है, कभी ऐसा होगा कि एक ही पल में पंक्तियाँ फूटतीं जाएँगी....मन उभर कर पन्ने पर अंकित हो जायेगा. शाम को वे भाई-भाभी के यहाँ गए, भाई के स्वभाव में गम्भीरता अभी तक नहीं आई है, बिलकुल बच्चों का सा स्वभाव है उसका. उन्होंने बर्फ वाला बेल का शर्बत पिलाया, जो उसे पसंद नहीं आ रहा था,पर वे दोनों इतनी तारीफ कर रहे थे कि उसने भी हाँ में हाँ मिला दी. आने के बाद से ही उसका गला शिकायत करने लगा था. साढ़े दस हो गए हैं, नन्हा सो गया है, दोपहर को सो नहीं पाया ठीक से, उसके दांत में छोटा सा काला पदार्थ फंस गया  था, उसका पूरा ध्यान नहीं रख पाती, वह कभी-कभी. छोटी-छोटी बात पर टोक देती है, कल से इस बात का ध्यान रखेगी. पापा के प्यार से दूर वह उसके पास ही तो रह रहा है, दोनों का प्रेम देना चाहिए न. उसके लिए उससे बढ़कर कुछ है ?

  आज जून का फोन आया, पर दो-तीन बार कट जाने के बाद, बात पूरी न हो सकने के कारण मन कुछ उखड़ा-उखड़ा सा रहा सुबह. फोन पर वह कुछ उदास भी लगे, शायद उसके खत में मकान की परेशानियों की बात पढ़कर, लेकिन अपने और उनके प्रति ईमानदार तो रहना ही चाहिए. उसने सोचा, वे दोनों कितने भी चिंतित हो लें, बातों को दिल से लगा लें. होना तो वही है जो होना है, जहां तक हो सके अपने आपको इन सारी दुनियावी बातों से ऊपर ही रखना चाहिए. उसने सोचा, वैसे भी जून का दिल बहुत बड़ा है, वह सदा की तरह उसकी भूल को भुला देंगे. दोपहर को भाभी, भतीजी आ गए सो घर में हलचल रही. उसने तुलसी-अदरक की चाय पीकर गले को ठीक किया.

 कल से घर के बाहर की पुताई शुरू हो जायेगी. कल शाम को वे अपने घर की छत पर गए, छत पर पड़ी मार्बल चिप्स को बोरी में भरकर रखा, पिता भी वहीं थे. नन्हा भी, शायद उसी धूल से उसकी आँखें फिर हल्की लाल हो गयी हैं. माँ-पिता उनके मकान के लिए कितना श्रम कर रहे हैं. वे सदा उनका भला चाहते हैं, किसी का बुरा न चाहने वाले सीधे-सादे स्वभाव के... सब्जी वाले ने थोड़ी सब्जी ज्यादा दे दी तो परेशान हो जाते हैं कि कल जाकर उसे पैसे  दे देंगे. सुबह पॉलिश लाए तो सोच रहे थे कि गलती से कहीं दुकानदार ने कम पैसे तो नहीं ले लिए. उस दिन अखबार वाले को चालीस पैसे देकर ही माने. मनोरमा में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कवितायें पढीं.







Friday, July 13, 2012

कच्चे बेल


कई दिनों से ससुराल के घर से चिट्ठी नहीं आयी है, जून ने तार भेजा है, उम्मीद है सोमवार तक जवाब आ जायेगा. छोटू जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है समझ आती जा रही है उसे, ज्यादा ध्यान और समय माँगने लगा है. कल सारी दोपहर और शाम पांच बजे तक वह उसके साथ ही खेलती रही पर वह मान ही नहीं रहा था. इस समय सो रहा है, उसके लिये हरे मटर और फूलगोभी के चंद टुकड़े उबालने हैं. जून तिनसुकिया गया है, घर फोन करने का प्रयत्न किया, पर यह संभव नहीं हो सका, एक टेलीग्राम और भेजा है उसने, वह उदास है इस बात से. इसी हफ्ते पत्र आ जाये तो कितना अच्छा हो. आज सुबह से वर्षा हो रही है, कितना अन्धेरा है उस कमरे में, जहाँ नन्हा सोया है. माँ का पत्र आया है वे लोग यहाँ आएँगे ऐसा लिखा है, शायद मई, जून में या नन्हें के पहले जन्मदिन पर. चाची का पत्र भी आया है बहुत दिनों बाद. आज पहली बार टीवी पर दूरदर्शन में सुबह का नया कार्यक्रम देखा, ‘राजा रामन्ना’ का इंटरव्यू अच्छा था और कन्नड़ गीत भी.

एक नया दिन, सुबह के सात बजे हैं, अभी-अभी जून ऑफिस गया है, रात भर वह कितने सपने देखती रही. वह बैगन के पकौड़े तल रही है पर वे हैं कि खत्म होने को ही नहीं आते. एक बहुत बड़ा सा जुलूस निकल रहा है सड़क पर..कल वह बाजार से दो बेल के फल लायी थी. सोच रही है उसका शर्बत बनाएगी, लेकिन माँ कैसे बनाती थीं उसे याद ही नहीं आ रहा.

वही कल का सा समय है और कल का सा मौसम, कल दोपहर बाद ही बादल एकत्र हो गए और रात भर बहुत बरसे. रात दो बजे बादलों के शोर से नन्हा उठ गया और उसके बाद सोने का नाम ही नहीं, जून ने दूध बनाया वह उसे चुप कराती रही कितनी देर उसे सुलाने का प्रयत्न किया एक बार सोया फिर उठ गया, अब कैसे सो रहा है मस्ती से. पत्र आज भी नहीं आया न ही तार का जवाब, आज हो सकता है जून डाकघर जाकर पता करें. वे बेल तो कच्चे निकले.