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Sunday, June 26, 2016

कामायनी- मुक्तिबोध की नजर में


‘प्रेम अमृत है, कामना सुरा है ! कामना की सुरा आरम्भ में तो मदहोश कर देती है, सुख का आभास देती है किंतु बाद में सिवाय पश्चाताप के कुछ हाथ नहीं आता’ ! अभी-अभी सुना यह वचन. परसों सरस्वती पूजा है. वह यूनिकोड में टंकण करके अपनी कविता हिन्दयुग्म के पाठकों के लिए भेजेगी. जून लैपटॉप इसीलिए छोड़ गये हैं. आज ही सुबह वह मुम्बई गये हैं, चार दिन बाद लौटेंगे. तब तक उसे अपने भीतर प्रेम की सुवास जगा लेनी है तथा कामना की सुरा का मद उतार फेंकना है ! मौसम पुनः सुहावना हो गया है. नैनी स्टोर की सफाई कर रही है. पिताजी बगीचे में पानी डाल रहे हैं. माँ मटर छील रही हैं, सभी कार्य में  लगे हुए हैं और वह कार्य की योजना बना रही है. नया वर्ष आरम्भ हुए इतने दिन बीत गये, एक भी नई कविता नहीं लिखी. सिंगापुर पर जो लेख लिखना है, उसकी भी शुरुआत नहीं की है. दोपहर को कामायनी पर मुक्तिबोध की पुस्तक पढ़ रही थी. मनु आत्ममोह से ग्रस्त है, वह भी तो आत्ममोह से ग्रस्त होकर ही आलस्य व मूढ़ता का शिकार हो जाती है. भीतर के खालीपन को भरने के लिए उन वस्तुओं का आश्रय लेती है जो स्वयं ही रिक्त हैं. पिछले कुछ सप्ताह ऐसे ही बीत गये, अपने भीतर जाने का अवसर नहीं मिला. बाहर की चकाचौंध देखकर मन बाहर ही भागता रहा. स्वप्न अभी तक सिंगापुर में देखे बाजारों के ही आते हैं. धन का ऐसा प्रदर्शन था वहाँ. हैती में लोग भूख से पीड़ित हैं. लेकिन वहाँ की स्वच्छता देखकर उसने कितने दिवास्वप्न देखे थे, इस नगर को सुंदर बनाने के स्वप्न, पहले अपने घर को बगीचे को सुंदर बनाना है. काम तो कितने सारे हैं. अब जुट जाना है. परसों सभी को संदेश भी भेजेगी. लोहड़ी पर फोन नन्हे के पास था सो नहीं भेज पाई थी.

सुंदर वचन सुने आज. ‘जहाँ प्रेम होता है, वहाँ समर्पण होता है. घट-घट में वह साईँ रमता कटुक वचन मत बोल रे !’ शब्दों का घाव सदा के लिए इन्सान के भीतर घर कर जाता है और जो ऊंची आवाज में बोलता है, उसको भी पछताना होता है. ऊर्जा का नाश होता है सो अलग ! वाणी पर संयम साधक की पहली आवश्यकता है. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर अनायास ही मन हुआ कि दोनों पड़ोसियों के बच्चों को सिंगापुर से लायी चॉकलेट दे. ध्यान, प्राणायाम तथा योग का यह कैसा चमत्कार है. वे साधना के द्वारा जब कुछ प्रसाद पा लेते हैं तो मानने लगते हैं कि अब यह कभी नहीं  जायेगा, किन्तु साधना छोड़ते ही मन माया का साम्राज्य स्थापित हो जाता है. सद्गुरु कहते हैं कुछ होने के लिए कुछ न होना सीखना है. खाली होना है. जब कोई स्वयं को कुछ मानता है तो अहम को चोट लगने ही वाली है. जो आकाशवत शून्य है उसे कोई हानि नहीं हो सकती. तब किसी पर कोई अधिकार न होते हुए भी सब अपने होते हैं. वे इस विशाल ब्रह्मांड के आगे शून्यवत हैं, पर  जब अपने भीतर उस शून्य को पा लेते हैं, सारा ब्रह्मांड अपना हो जाता है !


आज वसंत पंचमी है. उसने धानी वस्त्र पहने और पीत स्वेटर. सुबह साढ़े पाँच पर उठी,. कितना प्रमाद ! फिर सभी को संदेश भेजती रही. अभी तक साधना भी नहीं की. एक सखी के यहाँ मूर्ति पूजन होगा, उसने बुलाया है. उनके पीछे वाली लेन में भी पूजा का पंडाल लगा है. रात को वहाँ से तम्बोला खेलने की आवाजें आ रही थीं. मस्ती का माहौल रहा होगा, लेकिन जब तक भीतर की मस्ती का अनुभव नहीं हो जाता, बाहर की मस्ती मात्र कोलाहल बनकर रह जाती है. आह सद्गुरु योगसूत्र पर बोल रहे थे. कल व परसों उनकी बताई विधियों से ध्यान किया, अच्छा अनुभव हुआ. नन्हा उसके लिए गुरूजी की आवाज में रिकार्ड किये हुए ध्यान के कई सीडी लाया था. आज मौसम बहुत अच्छा है. बसंत के आने की सूचना देता हुआ. जून के आने में अभी दो दिन हैं, उनका ऊनी मोजा ठीक करना है, आलमारी ठीक करनी है. नन्हे का सामान भी सहेज कर रखना है. पिताजी की रजाई पर धुला कवर चढ़ाना है, पर सबसे पहले क्रिया व ध्यान करना है.