Friday, September 30, 2016

माइक्रोवेव में बैंगन


इस समय दोपहर के सवा तीन बजे हैं. आज दो परिचितों के जन्मदिन हैं. घर पर भतीजी का और यहाँ एक मित्र का. भतीजी के लिए कल कविता लिखी थी, शायद उसने पढ़ी हो. जवाब नहीं दिया..  यही तो बंधन है, कर्म बांधता है यदि करने के बाद भी उसकी स्मृति बनी रहती है. उसे फूलों का एक गुलदस्ता भी बनाना है, शाम को मित्र परिवार से मिलने जायेंगे वे. बिना किसी अपेक्ष के किये गये कृत्य उन्हें मुक्त करते हैं, अपेक्षा ही गुलाम बनाती है. इस सत्य को जितना शीघ्र हृदय में अंकित की लें उतना ही कल्याण होगा. नये वर्ष में नई तरह से जीना होगा ! आज भी ध्यान टिका, पर उसके पूर्व मन में विचारों का प्रवाह था, गुरूजी का सूत्र अब समझ में आने लगा है – ध्यान में वह कुछ भी नहीं है, उसे कुछ भी नहीं चाहिए, उसे कुछ भी नहीं करना है. जून का फोन आया, उन्हें रात्रि भोजन ऑडिटर के साथ गेस्टहाउस में ही करना है.

अभी-अभी उन बुजुर्ग आंटी से बात की, उसके पूर्व उस सखी से जो उनकी बहू है. सब नाटक जैसा लगता है. उनका स्वयं का जीवन भी तो कैसा अलग दीखता है अब. आत्मा का अनुभव जब दृढ़ हो जाता है, ‘हस्तामलक’ तो जीवन बिलकुल बदल जाता है. बुद्धि जो पहले जगत की तरफ दौड़ती थी, अब आत्मा में विश्राम करना चाहती है, उसकी दौड़ खत्म हो गयी है. प्रशंसा व निंदा का कोई महत्व नहीं रह जाता क्योंकि ये जिस मन, बुद्धि से आये हैं वे अनात्मा हैं, यानि माया है, यानि मिथ्या है, यानि उसका क्या महत्व. जैसे हीरे के आगे कंकर व्यर्थ है वैसे ही आत्मा के आगे अनात्मा व्यर्थ है. मौन ही जिसका स्वभाव हो जो स्वयं में पूर्ण हो, जो स्वयं आनंद ही हो, ज्ञान ही हो, प्रकाश ही हो उसे कोई जाकर कहे भी कि तुम ज्ञान हो तो वह क्या हर्षित होगा, वहाँ हर्षित अथवा दुखित होने वाला कोई बचा ही नहीं, माया का साम्राज्य वहाँ नहीं है, फिर उसकी भाषा वहाँ नहीं चलती. सद्गुरु के लिए लिखी उसकी सारी कविताएँ व्यर्थ हैं, उनकी नजर में और इस वक्त उसकी दृष्टि में भी, वहाँ एक ही भाषा का काम है, वह है मौन की भाषा..बुद्धि अब टिकना चाहती है, न जाने कितने जन्मों से यह दौड़ रही थी, मंजिल के करीब आ गयी है, वृत्ति सारुप्य के अनुसार कभी ‘आत्मा’ ‘अनात्मा’ में लीन हो जाती है तो कभी ‘अनात्मा’ ‘आत्मा’ में, पहली स्थिति में संसार है तो दूसरी स्थिति में निर्वाण ! एक स्थिति ऐसी भी आती है जब पूर्व के सब संस्कार नष्ट हो जाते हैं और शेष रहता है एकछत्र आत्मा का साम्राज्य. मन, बुद्धि भी निर्मल हो जाते हैं, निमित्त मात्र बन जाते हैं, अहंकार बस व्यवहार मात्र के लिए रह जाता है, भीतर कोई एषणा नहीं बचती. न कुछ पाना है, न कुछ करना है और न कुछ जानना है, ध्यान के सूत्र सारे जीवन पर फ़ैल जाते हैं. वे प्राप्त-प्राप्तव्य, कृत-कृतव्य तथा ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाते हैं, तब सही मायने में आत्म साक्षात्कार होता है, ऐसा दिन भी शीघ्र आएगा..परमात्मा है, सद्गुरु है और आत्मा है, तीनों मन व बुद्धि को पावन करना चाहते हैं..

अज शाम को एक सखी के यहाँ जाना है. ब्लॉग पर अनुपमा पाठक ने ‘गीताजंलि’ पर अपनी टिप्पणी भेजी है. अंततः उनके जीवन में प्रेम ही महत्वपूर्ण होता है, उनके मन में सभी के लिए प्रेम, सारी सृष्टि के लिए..पिता जी लॉन में पानी डाल रहे हैं. माँ बाहर बरामदे में बैठी हैं. जून अभी दफ्तर से आये नहीं हैं. सुबह आधा घंटा ध्यान किया, खुद का भी पता नहीं चला, लेकिन जाने कहाँ से विचार आ तरहे थे, पूर्व संस्कार उदित हो रहे थे, ध्यान में संस्कार नष्ट हो जाते हैं. सम्मान पाने की आकांक्षा, कुछ होने की आकांक्षा कितनी कूट-कूट कर भरी होती है मन में, ब्रह्म ने, परमात्मा ने अथवा तो आत्मा ने प्रकृति का संग किया और अहंकार का जन्म हुआ, बस वहीँ से आरम्भ हो गयी लालसा कुछ कर दिखाने की, कुछ पाने की, जबकि वह स्वयं में पूर्ण है, वह खुद ही पूर्ण है यह भूल जाता है, अपने पद से नीचे उतर जाता है और फिर उसे खोजता है जगत में. इस खोज में पीड़ित होता है, शंकित होता है, दुखी होता है, भीतर द्वेष पालता है, उद्व्गिन होता है पर उसकी लालसा का अंत नहीं होता. आज पहली बार माइक्रोवेव में बैंगन भून रही है, उनकी दूसरी ओवन ठीक से काम नहीं कर रही. मंझले भाई-भाभी के लिए कविता लिखी है, स्वान्तः सुखाय:, उन्हें भी ख़ुशी दे जाएगी अवश्य ही, पर इसके लिए वे कुछ कहें ऐसी कोई लालसा नहीं रखनी है. ओशो कहेंगे लालसा रखनी है या नहीं रखनी है, ये दोनों एक ही बाते हैं, नहीं रखने में रखने का भाव आ ही गया. दोनों से ही छूटना है. हर हाल में उसकी ही रजा माननी है. जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा होगा !   

  


Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..

कांगड़ी की आग


यहाँ इस कमरे में झींगुर की आवाज आ रही है. उसके भीतर कुछ पंक्तियाँ गूँज रही हैं.
तुमने ही सींचा है दुःख को
निज प्राणों से सींचा है
साहस करके छोड़ उसे दो
जिसको खुद ही भींचा है
तुमने ही जो राह बनायी
तुम्हीं उसे मिटा सकते हो
काँटों से जो भरी हुई है
तुम्हीं उसे तज सकते हो
खोज रहे हो जिसे जगत में
वह न कभी पा सकते हो
कठिन सही भीतर जाना पर
तुम ही तो जा सकते हो
उलझे हुए हैं सारे रस्ते
जो भी बाहर जाते हैं
एक ही रस्ता भीतर को है
जिस पर संत सभी आते हैं
विधियाँ सारी बाहर-बाहर
छिपा खजाना भीतर है
जब तक स्वयं को खो न डालो
खुद को न पा सकते तुम
स्वयं को खोकर स्वयं को पाते
यह सब प्रश्नों का उत्तर है !

जीवन को यदि एक सुमधुर संगीत में बदलना हो, एक सुंदर चित्र में बदलना हो या एक कविता में ढालना हो तो जीवन में एक लय की बहुत आवश्यकता है. एक नियम, एक मर्यादा का यदि पालन नहीं किया तो जीवन एक अभिशाप बन जाता है. सभी कुछ समय पर हो तथा सभी कृत्यों को सम्मान मिले. यहाँ कुछ भी हेय नहीं है. प्रातः काल उठना भी जरूरी है और रात्रि को समय पर सोना भी. दिन में आधा घंटा विश्राम भी जरूरी है और नियमित व्यायाम भी. जीवन का एक ही पक्ष यदि दृढ़ हो शेष नहीं तो जीवन बेडौल हो जायेगा. कल दोपहर से देर रात्रि तक वह अस्वस्थ थी, कारण थी मर्यादाहीनता. पिछले दिनों दिनचर्या सुचारुरूप से नहीं चल पाई, कभी देर तक पुस्तक लेकर बैठी ही रह गयी, कभी बिना भूख लगे ही क्योंकि समय हो गया था, भोजन कर लिया, कभी अधिक खा लिया, कभी कोई मिलने वाला आ गया तो चाय ज्यादा हो गयी. आज सब कुछ नियमित चल रहा है. पिछले दिनों नियमित साधना भी नहीं की, मन कुछ ज्यादा ही वाचाल हो गया है, उसे साधना होगा, नियमित ध्यान बहुत जरूरी है. जून कल मुंबई से लौट आयेंगे. मौसम अच्छा हो गया है. दिसम्बर की धूप भाने लगी है, पिछले बरामदे में बैठे हुए उसके पैरों पर धूप पड़ रही है, जो सुहा रही है, तेज नहीं लग रही. अस्वस्थता उन्हें स्वास्थ्य की कद्र कराती है, स्वस्थ होने पर वे लापरवाह हो जाते हैं. आज सुबह बड़ी भाभी व भतीजी से बात की, उसका जन्मदिन था. सर्दियों में पिछवाड़े नैनी क्वार्टर्स से कितनी आवाजें सुनाई पड़ती हैं, सब घर के ठंडे कमरे छोडकर बाहर धूप में आ जाते हैं. यूरोप में ठंड बढती जा रही है, काश्मीर में लोग कांगड़ी खरीद रहे हैं, गर्म अंगारों को फिरन के भीतर रखते हैं, मौसम की मार से बचने के लिए आग को अपनी देह के साथ सटा कर रखते हैं. जीवन कितना विचित्र है, महाश्चर्य है.

इसी महीने मंझले भाई व भाभी के विवाह की पचीसवीं सालगिरह है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. दोनों का विवाह भी अनोखी परिस्थितियों में हुआ. बड़ी भाभी की छोटी बहन से विवाह का शुरू में विरोध हुआ था, घर में किसी को भी पसंद नहीं आया था यह कार्य. लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया और अब तो सभी को लगता है दोनों एक-दूजे के लिए बने थे. दोनों की एक बेटी है जो होशियार है, धीर-गंभीर है. अपना घर है, धन-दौलत है, कोई कमी नहीं है. भाई ने इंजीनियरिंग की, भाभी ने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से पढ़ाई की, कुछ वर्ष नौकरी भी की विवाह से पूर्व. देखते-देखते समय बीत गया और आज पच्चीस वर्ष हो गये हैं.


Monday, September 26, 2016

ओबामा की किताब


नवम्बर का आरम्भ हो चुका है. दो दिन बाद दीवाली है. आज सुबह एक सखी के साथ मृणाल ज्योति गयी, बच्चों के लिए मिठाई और नमकीन लेकर. प्रिंसिपल ने बताया उन्हें व्यावसायिक शिक्षा की योजना के अंतर्गत लड़कियों के लिए सिलाई स्कूल खोलना है, यदि मिल सकें तो पुरानी मशीनें चाहिए. वे लोग लेडीज क्लब में सूचित कर देगीं. इसी माह के अंत में नेशनल ट्रस्ट का एक कार्यक्रम भी है, जिसमें किसी हुनर को सिखाने की ट्रेनिंग भी दी जाएगी, इन बच्चों को भी तो बड़े होकर अपने पैरों पर खड़ा होना है. दीवाली के लिए सुंदर दीये भी बनाये हैं वहाँ के बच्चों और अध्यापिकाओं ने, जिन्हें को-ओपरेटिव स्टोर में बिक्री के लिए रखने कल वे आयेंगे. आज लेडीज क्लब की पत्रिका के लिए कोई नाम का सुझाव देने के लिए फोन आया. एकता में अनेकता, मेल, मित्रता, मिलन, सहयोग, भागेदारी, अपनापा, समन्वय, मिलाप, सहभागिता को व्यक्त करता हुआ कोई एक शब्द. वार्षिक उत्सव आने वाला है.

जून और पिताजी कोलकाता गये हैं, परसों आयेंगे. घर में माँ और वह है. उनका होना और न होना बराबर है, चुपचाप बैठी रहती हैं. वह एक सखी के आने की प्रतीक्षा कर रही है, उसने आने की बात कही थी. कल उसकी एक कविता पर काफी लम्बी टिप्पणी पढ़ने को मिली, ज्ञान बढ़ा और लगा कि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो परमात्मा से उसी तरह मिले हुए हैं जैसे कभी-कभी वह मिलती है, जब केवल वही रहता है, तब दो नहीं होते, वैसे तो दो कभी भी नहीं होते, दो परिधि पर होते हैं, लहरें सतह पर ही तो हैं, वह सदा ही है, एक ही है, वह उनका मूल है, कितना आश्वस्त करती है यह बात...

पिछले कुछ हफ्तों से डायरी नहीं लिखी, पहले मेहमान फिर सभी के लिए उनके व्यक्तित्त्व को दर्शाती हुईं कविताएँ...समय इसी में गुजर गया. आज फुर्सत है. दोपहर के डेढ़ बजे हैं. मौसम ठंडा है बादलों के कारण, नवम्बर की सर्दी के कारण नहीं. वह ध्यान कक्ष में है. माँ-पिताजी अपने कमरे में सोये हैं. माँ उठकर बिस्तर के पास वाली कुर्सी पर बैठ गयी होंगी, वह वहीँ घंटों बैठी रहती हैं. बच्चों जैसी बातें करने लगी हैं, हँसी आती है उन सबको उनकी बातों पर, लेकिन बुढ़ापे में उनका भी क्या हाल होने वाला है यह तो भविष्य ही बतायेगा. जून को इसी हफ्ते मुम्बई जाना है. बड़ी ननद के ज्येष्ठ की अचानक मृत्यु हो गयी है. जब वह उन्हीं के घर में रात को भोजन के बाद सोये थे. जीवन कितना क्षणभंगुर है. नन्हा कल हस्पेट गया था मोटरसाईकिल से. आज वापस जा रहा है. उसका फोन अभी तक नहीं आया है, वह सकुशल होगा. जून छोटी बहन की किताब को आकार दे रहे हैं. वह वापस जाने वाली है आज ही. बड़ी बहन से कई दिनों से बात नहीं हुई है. परसों बड़े भाई का जन्मदिन है और दो दिन बाद उनकी बिटिया का, वह दोनों के लिए कविता लिख सकती है. सर्दियों के फूल खिलने लगे हैं, यहाँ उनके क्लब में भी वार्षिक उत्सव की तैयारी शुरू हो गयी है, उसने बहुत दिनों से कोई पुस्तक भी नहीं पढ़ी है. आज लाइब्रेरी जाकर ओबामा की किताब वापस करनी है. कल से वे सत्संग का समय शाम पांच बजे से कर रहे हैं, आजकल अँधेरा चार बजे के थोड़ा बाद ही शुरू होने लगता है. इस समय कितनी शांति है. नैनी के बेटी के रोने की आवाज आ रही है और कौए की कांव-कांव भी सुनाई दे रही है, घड़ी की टिक-टिक कितनी स्पष्ट सुनने में आ रही है. परसों विश्व विकलांग दिवस है, वह ब्लॉग पर मृणाल ज्योति के बारे में लिखेगी.


Friday, September 23, 2016

नई गाड़ी में सैर


तू ही रस्ता, तू ही मंजिल, तू ही राही है..!

कहाँ जा रहा यह मानवदल, किसे ढूँढ़ते होता बेकल
सुबह-सवेरे उठते ही क्यों, चिंता ने आ इनको घेरा
गगन, फूल, कलियां तो छोड़ो, पंछी सुर न सुनते देखा
कदम-कदम पर निशां हैं जिसके, ढूँढा करते जाकर मन्दिर
जिसके कारण हैं दुनिया में, ढूँढा करते हैं उसका घर
कैसे बेसुध दीवाने हैं, आग लगाते स्वयं ही मन में
कभी क्रोध की, कभी ईर्ष्या, अकुलाते सुंदर जीवन में
स्वयं जगाते तृष्णा, आशा, सुखी रहें करते अभिलाषा
सुख से ही तो बने स्वयं हैं, थमकर न सीखें यह भाषा
तन में एक आग जलती है, मन हारा चिन्तन कर करके
फिर भी रुकना न जानें, क्या पाना कुछ साबित करके
पीना और पिलाना सीखा, जीना न आया अब तक
चाहा जिसको सदा भुलाना, मन वह वश में किया न अब तक
तन के लिए सभी उपाय, दौड़, खुराक कभी जिम जाये
मन पाता विश्राम जहाँ, उस निज घर जाना न आये
तन पाता विश्राम नींद में, मन पाता आराम कहाँ
जाना जिसने भेद वह ज्ञानी, मिलते उसको राम यहाँ
नैन थके तो मुंद जाते हैं, श्रवण कहाँ सुनते निद्रा में
बैन हुए चुप अधर शांत हैं, मन फिर भी दौड़े निद्रा में
घर से निकले पहुंचे मंजिल, पैरों ने पाया विश्राम
मन की गति न थमती देखो, कैसे हो हमको आराम
तन के सेवक पांच इन्द्रियां, खुद के तीन सिपाही सच्चे
मन, बुद्धि व अहंकार के, आगे होते अनगिन बच्चे
स्वयं की महिमा स्वयं ही जाने, सेवक न बखान कर पाए
स्वयं में टिक जाये पल भर तो, तीनों को तुष्टि मिल जाये
जीने का है यही सलीका, लौट के कुछ पल घर में आये !

आज क्लब में मीटिंग है, उसे संचालन का कार्य करना है. कल रात्रि देर तक ज्ञान श्रृंखला सुनती रही. दोपहर को नींद आ गयी, उठकर एक नये ब्लॉग पर पूर्व की लिखी कविताएँ डालीं. कल जून नई गाड़ी में उन्हें घुमाने ले गये, कुछ देर एक मित्र के यहाँ रुके. परमात्मा जब तक अपना नहीं बन जाता तब तक जीवन से दुःख नहीं जाता, पर उसे जो हर वक्त एक नामालूम सी ख़ुशी घेरे रहती है, लगता है वह आसपास ही है. सद्गुरू के शब्दों में पास-पास. मन से परे, बुद्धि से परे एक और सत्ता है जो प्रेम से ही बनी है, उसमें और नूना में दूरी नहीं है, वे दोनों एक ही हैं, कितना अद्भुत ज्ञान है यह.     


  

Thursday, September 22, 2016

दीवाली के कार्ड


कोई है जो हर क्षण जागता रहता है, उनके भीतर वह साक्षी ही उनका वास्तविक मित्र है. मन, इन्द्रियों से परे जो एक शांत अवस्था है उसी का नाम है साक्षी भाव ! कल रात ऐसा लगा कि सोते-सोते भी कोई भीतर जगा हुआ था ! कल सत्संग में दो भजन गाने वाली सखियाँ आयीं, गाने की बारी उसकी भी आयी. कल बहुत सी पत्रिकाएँ, किताबें तथा पेपर्स निकाले, घर में सामान जितना कम हो उतना अच्छा है, एक दिन सारे कार्ड्स भी निकाल देने हैं अथवा तो उन्हें रहने देते हैं कितनी यादें जुड़ी हैं उनसे..दीवाली पर सबको कार्ड्स भेजने का उत्साह जगा है, पिताजी, तीनों भाई, चचेरे व फुफेरे भाई सबको भेजेगी बहनों को भी..आज सुबह वेद ज्ञान सुना, कितने अद्भुत श्लोक हैं, आत्मा को बलशाली बनाने की ही सारी प्रार्थनाएं हैं. कल ओशो को सुना हरेक को अपने ईश्वर का निर्माण स्वयं करना है उसकी माँ बनना है. इसका भी अर्थ वही है कि उन्हें स्वयं को शक्ति से भरना है. आत्मा को जागृत करना है. मन, बुद्धि के पार जाकर एक ऐसी शून्यावस्था का अनुभव करना है जो प्रेम, शांति व ज्ञान से ओत-प्रोत है. उनका छोटा मन जब शांत हो जाता है तो आत्मा जो सदा से वहीँ है उजागर हो जाती है, वह आत्मा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में परमात्मा है जब वह देह से परे होती है, वासना तथा तृष्णा से मुक्त होती है, उसे भी अपने भीतर उस आत्मशक्ति को परिपक्व करते जाना है, व्यर्थ विचारों से स्वयं को बचाना है, ऊर्जा बचानी है ताकि वह ऊर्जा ध्यान में सहायक हो. लेखन में, पठन में सहायक हो. ऊर्जा को व्यर्थ गंवाया तो भीतर नकारात्मकता छाएगी स्वयं को आत्मा रूप में अनुभव करने के बाद भी यदि कोई उदास रहे तो ...कहीं कुछ धोखा है..हँसी ही उनकी पहचान हो और शांति उनका घर..प्रेम उनका स्वभाव..कल छोटी बहन से बात हुई, वह भी खुद की तलाश में लगी है, यात्रा जारी है, एक दिन मंजिल भी मिल जाएगी. आज देखा, गीतांजलि के भावानुवाद पर कुछ कमेंट आये हैं तथा तीन महिलाएं फ़ॉलो भी कर रही हैं. अभी कितनी कविताएँ ब्लॉग पर डालनी हैं. कल लक्ष्मी पूजा का अवकाश है. जून नयी गाड़ी ले रहे हैं. अपने भोजन का खास ख्याल रखते हैं, दर्द भी कम हो गया है. अगले महीने मेहमान आ रहे हैं घर की सफाई का काम ठीक चल रहा है अब कुछ ही शेष है. बड़ी भांजी को निबन्ध के लिए कुछ जानकारी भेजनी थी, वही काम शेष रह गया है.


होश को कायम रखना तलवार की धार पर चलने जैसा है, बार-बार मन फिसल जाता है, पुराने संस्कारों का शिकार होकर वाद-विवाद में फंस जाता है. अहंकार अपना सिर उठाने लगता है, भीतर कोई देख रहा है, साक्षी है, यह भाव खो जाता है. जाग-जाग कर भी वे सो जाते हैं, लेकिन जैसा कि सद्गुरू कहते हैं पहले तो इतना भी होश नहीं था कि वे अज्ञानी हैं, कम से कम अब अपने अज्ञान का बोध तो होता है ! पांच एम्पीयर का एक स्विचबोर्ड लगाने दो लोग आये हैं, शोर हो रहा है पर बाहर का यह शोर भीतर की शांति को भंग नहीं करता, उसे तो भीतर का शोर ही भंग करता है. अभी एक सखी को फोन किया सुबह उनके यहाँ फूल भिजवाये थे, लगता है वह कुछ परेशान है या व्यस्त है. धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे संबंध ओढ़े हुए होते हैं, वे अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे उन्हें उतार देते हैं, जब चाहे पहन लेते हैं ! यहाँ हर कोई अपने आप में एक द्वीप है. उन बुजुर्ग आंटी की शिकायत कम होने में नहीं आती, बढ़ती ही जाती है यहाँ माँ की भी. अभी-अभी उस सखी का फोन आया, उनके यहाँ भी बिजली नहीं है. उनका जीवन जितना सुविधाजनक होता जाता है उतने ही वे बेहोश होते जाते हैं. 

Monday, September 19, 2016

घर की सफाई


आज सुबह वह उठी तो सीधे आँख बंद करके बैठ गयी, अनोखा था वह अनुभव ! भीतर एक शांति भर गया है, फोन की घंटी बज गयी और बीच में ही छोड़ना पड़ा. भीतर कितनी अटूट संपदा है. परम पिता परमेश्वर स्वयं ही विराजमान है, एक दिव्य चेतना, एक प्रकाश और एक मुखर मौन...शब्द कहाँ कह पाएंगे उस अनुभव को..इसलिए कहते हैं कि जो जानता है वह कहता नहीं, कह सकता नहीं..उसकी बुद्धि तब बचती ही नहीं, मन खो जाता है. भीतर कोई है जो हर क्षण देख रहा है. उस देखने वाले को सारे कृत्यों को देखते हुए वह देख रही है. वह सदा जगा है और उसकी जागृति उसे भी जगा रही है. क्योंकि उसे देखने के लिए उसे भी सजग रहना पड़ रहा है. एक पल को ध्यान हटा तो भी भीतर यह बोध रहता है कि वह देख रहा है ! जागरण का यह अनुभव अनोखा है. कल देवी पर कुछ पंक्तियाँ लिखीं. मौसम आज भी बदली भरा है. एक सखी आज घर जा रही है, एक पहले ही जा चुकी है. इस बार पूजा पर वे दोनों नहीं रहेंगी. वे एक दिन तिनसुकिया जायेंगे, पत्रिकाएँ देनी हैं लाइब्रेरी में. पिछले कुछ दिनों से वे घर की सफाई कर रहे हैं. कितनी पत्रिकाएँ तथा किताबें जो वर्षों से इकट्ठी हो गयी हैं, वे लाइब्रेरी में भिजवा रहे हैं. वह खाली होना चाहती है, सारे पेपर्स भी धीरे-धीरे करके निकालने हैं. सारी डायरी भी धीरे-धीरे हटानी हैं, एक दिन केवल आत्मा ही रह जाने वाली है, नितांत अकेली, उस अकेलेपन का अनुभव इसी जीवन में कर लेना कितना अनूठा होगा. वे अपने मन में भी अतीत का बोझ तथा भविष्य की चिंताएं ढोये रहते हैं और वर्तमान को बोझिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, उन्हें जीवन का मोह इतना सताता है कि वर्षों पुराना भी कुछ त्यागते उन्हें पीड़ा होती है, जिसका उपयोग भी उन्होंने न किया ही, न करना हो..जून का फोन आया अभी-अभी, वह भावांजलि को प्रिंट करके ला रहे हैं. अभी तक किसी ने उसे पढ़ा नहीं है, लेकिन एक दिन लोग उसे पढ़ेंगे. मानव के भीतर यह कामना कितनी बलवती होती है कि वे जो भी करें लोग उसे सराहें, यह इतनी भीतरी है कि...

आज षष्ठी है. उन वृद्धा आंटी ने अपने पुत्र व पुत्रवधू के लिए भोजन बनवाया, खीर बनवाई, लेकिन उनकी फ्लाईट छूट जाने के कारण आज वे वापस नहीं आ पाए हैं. दोपहर को वह उनके घर गयी थी. मौसम में थोडा बदलाव आ गया है. शाम को जल्दी अँधेरा हो जाता है और सुबह जल्दी दिन नहीं निकलता. कल शाम दीदी से बात की, उन्होंने कहा वे उसकी सभी कविताएँ पढ़ती हैं, उन्हें भी अपने लिखे पर उसकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है. उस क्षण उसका हृदय भीग गया था.

आज सुबह भीतर स्पष्ट आवाज सुनाई दी, आजतक जो भी कहीं से पढ़ा या सुना हुआ बिना कृतज्ञता जताए लिख दिया, वह धोखा है. आज से पूर्व उसे इस बात का जरा भी अहसास नहीं था, पर आज कितना स्पष्ट है कि वह गलत था. इसी तरह जो व्यक्ति गलती कर रहा होता है, उसे पता नहीं होता..वरना वह ऐसा कभी करे ही न. उन्हें किसी को दोषी देखने का अधिकार नहीं है, उनके हाथ भी तो खून से रंगे हुए हैं. कितने जन्मों में कितने अपराध उनके हाथों हुए हैं. वे धीरे-धीरे परमात्मा के मार्ग पर आये हैं किन्हीं  पुण्यकर्मों के कारण सद्गुरू मिले हैं और अब उनका जीवन सही अर्थों में जीवन कहलाने के योग्य हुआ है. साक्षी की तरह कोई सदा साथ रहता है. हरेक के साथ रहता है, भय का कोई कारण ही नहीं, वे सुरक्षित हाथों में हैं.