Monday, February 29, 2016

संधि बेला का सौन्दर्य


आज उसका जन्मदिन है, इतने वर्षों में कितने कड़वे बोल बोले, कितने टेढ़े बोल बोले, कितनों का दिल दुखाया होगा, जीवन कितना अर्थहीन लगता है कभी-कभी, आत्मा के स्तर पर जाते ही जो शांति भीतर महसूस होती है वह मन से देह के स्तर पर आते-आते जैसे वे स्वयं ही लुटाते जाते हैं, संस्कारों के वशीभूत होकर वे न चाहते हुए भी ऐसा कुछ कर जाते हैं, इच्छा शक्ति की कमी या प्रारब्ध. कृष्ण कहते हैं वह कामना ही मनुष्य को बलात पाप की ओर ले जाती है, जिससे उसका ज्ञान ढका है. उसे इस क्षण जगत से कुछ भी नहीं चाहिए, दाता बनना भाता है उसे याचक नहीं, फिर भी जब तक देह है जगत का दिया हुआ ही ग्रहण करना है और समाज में रहते हुए लेन-देन की रीत भी निभानी है. उसे एकांत भाता है. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर सविकल्प तथा निर्विकल्प समाधि का भेद जैसे कोई स्पष्ट कर गया. हर रोज क्रिया के बाद एक नवीन भाव या विचार भीतर जगता है पर आज उसके जन्मदिन का उपहार मिला है, वह अनंत सत्ता, वह अव्यक्त जैसे उसके साथ हर वक्त है, वह भीतर ही है, पर दीखता नहीं, वह सदा सजग है, प्रेरित करता है, एक पल में मुस्कान ला देता है, कितना भी उदास हो मन, एक क्षण की स्मृति उसे प्रसन्न कर देती है और यह उदासी भी तो एक पल की विस्मृति से ही आई होती है. अब तो उसके बिना एक क्षण भी नहीं बीतता, शास्त्रों के सारे वाक्य जैसे सत्य प्रतीत होते लगते हैं !

कल दिन भर जून उसके जन्मदिन की ख़ुशी मनाते रहे. बच्चों के लिए बिस्किट लाये, मृणाल ज्योति के लिए फोटो फ्रेम करके लाये, मिठाई लाये और गाड़ी का इंतजाम भी किया. शाम को ब्रेड रोल तले, टेबल लगाया और ख़ुशी-ख़ुशी जन्मदिन मनाया, पर रात को उसने उन्हें न जाने क्यों नाराज कर दिया. उसका मन उड़ने को बेचैन था, आत्मा की ऊंचाइयों में उड़ने को और वह उसे नीचे ला जाना चाहते थे. वह प्रेम की बात करना चाहती थी और वह बात करना ही नहीं चाहते थे. सुबह भी उनका मूड ठीक नहीं था, वह छोटी सी बात को( उनके लिए बात छोटी नहीं रही होगी, बहुत बड़ी रही होगी) दिल से लगा लेते हैं. उनके मध्य दूरी का एक ही कारण है वह प्रेम के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहती है और वह मात्र..लेकिन वे दोनों ही एकदूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, प्रेम कैसा भी हो आत्मिक, मानसिक या..प्रेम ही होता है और प्रेम का अपमान स्वयं ईश्वर का अपमान है. प्रेम के हर रूप को स्वीकारना सीखना होगा, प्रेम हर रूप में पावन है, प्रेम भरे मन को ठेस पहुंचना पाप ही तो है. अब जून डिब्रूगढ़ से वापस आ रहे होंगे, थोड़ी ही देर में वह उसके सम्मुख होंगे और अब वह उन्हें नाराज नहीं करेगी, उनके प्रेम का प्रत्युतर प्रेम से ही देगी. उनके जीवन के कुछ ही बरस शेष हैं, वे दोनों ही युवावस्था को पार कर चुके हैं, एक-दूसरे की उन्हें आने वाले वर्षों में और भी आवश्यकता होगी. जिसने एक से प्रेम कर लिया उसने सब से प्रेम कर लिया. एक में सब और सब में वह एक ही तो समाया है.

आज सुबह संधि बेला में भगवान के सुंदर विग्रह का दर्शन हुआ, राम का रूप था या श्याम का, सुंदर मुखड़ा, आभूषण और सुंदर वस्त्र, एक चित्र की भांति क्षण भर के लिए सम्मुख आया और विलीन हो गया. इस बार बहुत दिनों, महीनों के बाद ऐसा दर्शन हुआ है, संधि बेला में तारे दीखते हैं, प्रकाश भी दिखता है और अद्भुत शांति का अनुभव भी होता है. परमात्मा हर पल उनके साथ है, वह यह बात कई तरह से उन्हें समझाना चाहता है, वह अकारण दयालु उनका सुहृद है, वह रस ही है, उसका नाम लेते ही कैसा खिल जाता है मन, वह उनकी आत्मा के रूप में भीतर भी है वही सारे जगत में अव्यक्त रूप से विद्यमान है. आज दीदी का जन्मदिन है, उसने उन्हें शुभकामनायें दीं. उस दिन जून को उसने मना लिया, वह पुनः सहज हो गये हैं. कल बुआजी का फोन आया, उन्होंने कहा, उसकी सभी कविताएँ पढ़ ली हैं, कई दिनों से उसने कोई नई कविता नहीं लिखी है. आधा जीवन बीत गया है, एक दिन मृत्यु सम्मुख होगी, उस क्षण कोई अफ़सोस न रहे इसका ध्यान तो रखना होगा, और अभी ही रखना होगा. आज शाम को एक सखी ने अपने घर बुलाया है, मौसम आज सुहावना है, शीतल पवन, आकाश में बादल तथा बगीचे से आती फूलों की सुगंध, पर इसी वक्त इस धरती पर न जाने कितने ही जन पीड़ा का अनुभव कर रहे होंगे. ईश्वर उन सबके भी साथ है. घर में आजकल चीटियाँ बहुत हो गयी हैं. कल एक अन्य सखी के यहाँ गयी, उसके पुत्र का रुझान धर्म की और है, दिल से वह भी तो कवि है.


Sunday, February 28, 2016

संस्कार चैनल


जीवन एक नये मोड़ पर आकर खड़ा है, पिछले कई वर्षों से रोज सुबह गुरूजी के प्रेरणावाक्य उसे प्रेरित करने के लिए सुनने को मिलते थे पर आज से डिश टीवी पर संस्कार चैनल नहीं दिखाया जायेगा. सुबह से ही मन इस बात से उदास हो रहा है, वह उसे समझाती है तो खुश हो जाता है पर वर्षों का जो संस्कार उस पर पड़ा है, उसके कारण वह व्यथित हो रहा है. गुरूजी उसका हर संस्कार मिटाना चाहते हैं, आसक्ति चाहे अमृत की हो या विष की बुरी ही है. मन चाहे सतोगुण में अटका हो या रजोगुण अथवा तमोगुण में, उसका अटकना ही बताता है कि अभी वह है. अमनी भाव में आये बिना मुक्ति नहीं. मन यदि सुखी-दुखी होता है तो अभी अहम् बरकरार है. इसलिए इस दोराहे पर आकर ऊपर और कठिन रास्ते को चुनना है. कुछ भी न रहे पास, आत्मा कभी साथ नहीं छोडती, परमात्मा का पता जब तक न लगे इस आत्मा का ही आश्रय लेना होगा. उसके दातों की तकलीफ अभी ठीक नहीं हुई है, एंटीबायोटिक का एक कोर्स लेना पड़ेगा.

आज बादल बने हैं, पिछले कई दिनों से रात को वर्षा होती थी और दिन में धूप निकलती थी, मौसम का मिजाज निराला है, उनके मिजाज की तरह. यदि किसी को उसके कारण पीड़ा हो या परेशानी हो तो मन कैसा तो हो जाता है और भीतर कैसा ताप महसूस होता है. नकारात्मकता भीतर तपाती है, बुरा लगना भी तो वही है. वे चाहे आत्मग्लानि से भरें या परपीड़न करें दोनों ही स्थितियों में दुःख पाते हैं. वास्तव में इस सृष्टि में दूसरा कोई है ही नहीं, एक ही सत्ता है तो उसे ही कर्मों का फल भुगतना पड़ेगा. आत्मा के स्तर पर सभी एक हैं. मन की गहराई में जाकर जब वे अपने विकारों को अनुभव करते हैं तो वे छूटने लगते हैं, पर छूटते-छूटते ही छूटते हैं. अब भी न जाने कितने जन्मों के संस्कार पड़े हैं. सद्गुरू कहते हैं हजारों वर्षों का अंधकार एक दीपक के जलते ही क्षण भर में दूर हो सकता है तो क्यों नहीं भीतर का अधंकार दूर हो सकता ? जागरण तो हुआ है पर वह सदा नहीं टिक पाता. बीच-बीच में स्वप्नावस्था भी आती है और निद्रा प्रमाद व तंद्रा भी, तथा इन सबके दंश भी झेलने ही पड़ते हैं.

आज हाईस्कूल का रिजल्ट आया है, एक सखी के पुत्र के अंक नब्बे प्रतिशत से अधिक हैं. उसकी छात्रओं के हिंदी में तिरासी व अट्ठासी प्रतिशत अंक आए हैं. इतने वर्षों की उनकी मेहनत का फल कुछ अच्छा तो नहीं मिला. खैर, आज गर्मी है. बाहर की गर्मी का असर भीतर भी हो ही जाता है. कृष्ण कहते हैं सुख-दुःख, गर्मी-सर्दी इन्द्रियों द्वारा अनुभव किये जाते हैं, आत्मा पर इनका कोई असर नहीं होता, पर उसे लगता है कि भीतर तक सब तपने लगता है जैसे ही कोई नकारात्मक भाव जगता है. नन्ही छात्रा को गिनती लिखाते वक्त या माँ को सब्जी बनाने में सहायता करते वक्त कभी-कभी भीतर कैसी तल्खी सी आ जाती है, जो ध्यान में आते ही गायब हो जाती है, पर कैसा कड़वा स्वाद मन में छोड़ जाती है. संस्कारों के वशीभूत होकर ही ऐसा होता है. उसकी मुक्त आत्मा तो प्रेम व शांति से भरी है, पर मन किसी का शासन नहीं मानता, न ही किसी पर शासन करना चाहता है. वह सबको आत्मनिर्भर व मुक्त देखना चाहता है, ऐसा न होने पर वह विद्रोह कर बैठता है. अहंकार को पोषने के लिए कहीं वह बड़े-बड़े शब्दों का सहारा तो नहीं ले रही. गोयनका जी कहते हैं जब भी भीतर असहजता का अनुभव हो तो यह पाप है, जब भी भीतर दुःख हो, क्रोध हो तो कारण अहंकार ही है. जब भीतर शांति हो, सुख हो, प्रेम हो तो मानो अहंकार नहीं है. वह यह भी कहते हैं जब भीतर ताप होता है तो कोशिकाओं पर इसका असर होता है. चेहरे पर क्रोध के भाव जितनी बार भी पड़ते हैं, अपनी छाप छोड़ते जाते हैं. तभी तो संतों का चेहरा कितना प्यारा लगता है और आम इन्सान का..        

Friday, February 26, 2016

अगरबत्ती की खुशबू


आज गुरूजी का जन्मदिन है, सुबह उन्हें देखा टीवी पर, जन्मदिन का अद्भुत संदेश देते हुए, ‘मैं तेरा’ उस दिन भी ‘मैं तेरा’ आज भी ‘मैं तेरा’..(may 13) उन्होंने कहा जीवन एक अगरबत्ती की तरह होना चाहिए जो स्वयं जलकर वातावरण को सुगन्धित करती है. एक फूल की तरह या एक मधुर फल की तरह वे अपने भीतर उस ख़ुशी को पालें इतना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि आस-पास सभी उसका अनुभव करें. आज सुबह से ही मन उल्लसित है. सेंटर में सुबह फॉलोअप था जाने का प्रयास ही नहीं किया, शाम को तो उत्सव में जाना ही है, दोपहर को तैयारी करनी है. सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा लॉक टाइट की छोटी सी ट्यूब..हँसी भी आ रही है, God loves fun गुरूजी ठीक ही कहते हैं. पिछले दिनों कई अजीबोगरीब स्वप्न देखे, वह ऊर्जा का धक्का और.. अब तो कई भूल ही गयी है. गुरूजी कहते हैं स्वप्नों पर ज्यादा भरोसा करना ठीक नहीं, यह तो मन का खेल है. गर्मी के कारण  सम्भवतः सिर में हल्का दर्द है. आज सुबह वर्षा हो रही थी जैसे उसके जन्मदिन पर होने वाली है.

आज जैन मुनि को सुना, त्याग पर भोग हावी होता रहा तो पर्यावरण को संतुलित बनाये रखना बहुत कठिन होगा. अनावश्यक भोग भी न हो तथा अनावश्यक कर्म भी न हों, कहीं तो विकास के लिए सीमा रेखा भी खींचनी होगी. जीने का सरल रास्ता उन्हें ढूँढ़ निकालना होगा ऐसा रास्ता जो परमात्मा की और ले जाये. उसे लगा वह उसकी ही बात कह रहे हैं, वह परम प्रभु ही तो उनकी मंजिल है, उसे प्रेम करना ही तो उनके जीवन का एकमात्र कर्त्तव्य है. किन्तु यह ज्ञान होने के बावजूद वे प्रेम से वंचित रह जाते हैं. प्रेम करने में कंजूसी करते हैं और प्रेम लेने में झिझकते हैं, उन्होंने अपने चारों ओर एक दीवार सी खड़ी कर ली है. वे स्वयं को बांटना नहीं चाहते, जाने कौन सा डर उन्हें रोके रहता है, यह अहंकार की दीवार है या माया की. यह कठोरता का आवरण जो वे स्वयं पर ओढ़े रहते हैं, जबकि भीतर प्यार का सागर लहलहाता रहता है. वे बहुत बार ठगे गये हैं, बहुत बार धोखा खा चुके है, उन्हें बहुत बार प्रेम में उदासीनता ही मिली है, शायद इसी कारण वे अपने खोल में सुरक्षित महसूस करते हैं, किन्तु एक दिन जीवन हाथ से निकल जायेगा, मृत्यु सम्मुख खड़ी होगी और तब कहीं पछताना न पड़े. ध्यान में परमात्मा का आनन्द पाकर विभोर हुआ मन उस ख़ुशी को बिखरने से डरता क्यों है. शास्त्रों में जिस शांत भाव का जिक्र है कहीं यह वही तो नहीं, निरा शान्त, कोई उछाह नहीं, कोई लहर नहीं. नदी की शांत धारा सा अपने आप में समाहित मन, जो न कुछ चाहता है न देता है.

पिछले कई दिनों से नियमित डायरी नहीं लिखी है, सुबह का वक्त नैनी की बेटी को होमवर्क कराने, खाना बनाने तथा नाश्ते आदि में ही निकल जाता है. अब नियमित ध्यान भी नहीं होता है, अधिक से अधिक पन्द्रह-बीस मिनट ही मिलते हैं. संयुक्त परिवारों में इसलिए व्यक्तिगत कार्यों के लिए समय निकालना कठिन होता होगा. ऑंखें बंद करते ही प्रकाश का अनुभव होता है और मन कहीं खो जाता है, वास्तव में मन कुछ है ही नहीं. आत्मा का अभाव ही मन है और आत्मा का कभी अभाव होता ही नहीं. जैसे ही कोई जगता है मन सो जाता है तब केवल शुद्ध चेतना ही शेष रहती है. इसी जागृति की बात कवि अपनी कविता में कहते आये हैं. इसी जागरण की बात शास्त्र कहते हैं. आत्मा की स्मृति होते ही बुद्धि भी शांत हो जाती है वहाँ एक ही रह सकता है दो नहीं, ‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय’ संतों के ये वचन जब भीतर घटने लगते हैं तभी उनके अर्थ स्पष्ट होते हैं.

Thursday, February 25, 2016

शांति का पाठ


आज सुबह-सुबह ही उसके मुख से अपशब्द निकले, ऐसे शब्द जो नहीं निकलने चाहिए थे, व्यर्थ थे, जो जून को चुभे. उसके भीतर इतनी कठोरता, इतनी रुक्षता, इतनी हृदयहीनता छिपी हुई है इसका उसे भी भान नहीं था. नीरू माँ कहती हैं जो वे रिकार्ड करके लाये हैं वही तो निकलेगा, विडम्बना यह थी कि उसने क्रोध इसलिए किया कि उसे शांति का पाठ सीखने जाना था, सत्संग में जाने के लिए उसने क्रोध किया. उसका आज तक का सीखा हुआ ज्ञान जैसे उस पल तिरोहित हो गया था, इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि घर में सभी लोग थे, जिनमे काम करने वाले दो व्यक्ति भी थे. अगले ही क्षण उसे लगा कि कुछ गलत हो गया है, भीतर तो शांति हो गयी पर जून को जो पीड़ा उसने दी उसका क्या, वह चुपचाप सब सह गये, उनका कोई दोष नहीं था, उसका पूर्वाग्रह ही उसे भ्रमित कर रहा था, इसका प्रायश्चित यही होगा कि वह सत्संग में न जाये पर इससे आत्मा की उन्नति का एक अवसर वह गंवा देगी. उसे जाना तो है पर समय से लौट आना है. पिछले दिनों तथा आज भी, अन्य कई अवसरों पर भी उसने दूसरों के दोष देखे, यह आदत उसकी बहुत हानि क रही है. अहंकार भीतर कूट-कूट कर भरा है, वही क्रोध बनकर तो कभी परदोष देखने वाला बनकर सामने आता है. उसकी साधना में इससे बड़ी बाधा क्या हो सकती है ? कई दिनों से लिखने का अभ्यास भी नहीं किया, डायरी लिखने से अपने भीतर झाँकने का अवसर मिलता है. आज बहुत दिनों बाद दो सखियों से बात की, तीसरी को उस दिन फोन किया पर उसने उठाया नहीं, आज पुनः करेगी.

आज सुना, मन एक मिनट में पच्चीस से तीस संकल्प उठाता है, एक दिन में चालीस से पचास हजार विचार मन में उठते हैं. जैसे विचार मन उठाता है वैसी ही भावना भीतर जगती है. जैसी भावना होगी वैसा ही दृष्टिकोण उनका बनता है, फिर वही कर्म में बदलता है. बार-बार वह कर्म करने से वही आदत बन जाती है. विचार-भावना-दृष्टिकोण-कर्म-आदत-व्यक्तित्त्व, तो आज वे जो भी हैं वह अपने ही विचारों का ही प्रतिफल हैं, और वे जो भी काम करते हैं वही उनका भाग्य बनाते हैं.

नन्हा आज पंजाब में है, वह पहली बार किसी कम्पनी में काम करने गया है. शाम को वे उससे बात करेंगे. जून फिर से नाराज हैं, पता नहीं क्यों, आज सुबह पिताजी ने कहा कि स्त्रियों को जप-तप करने की जरूरत नहीं है, वह सेवा करके ही पुण्य लाभ कर सकती हैं. सास-ससुर की सेवा करने में ही स्त्री का मोक्ष है. समाज अभी भी उसी पुरानी सोच को लेकर बैठा हुआ है. कल शाम वह एक घंटे के लिए घर से बाहर गयी तो घर में किसी को पसंद नहीं आया, खैर इसमें उनका कोई दोष नहीं है, यहाँ किसी का कुछ भी दोष नहीं है, सब न्याय है. जो कुछ भी उसे मिल रहा है, वही उसका प्राप्य है बाहर. पर भीतर का क्षेत्र उसका अपना है जहाँ वह जो चाहे पा सकती है. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है. वह कल्पतरु है, जो मांगो उससे मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है, शक्ति है, भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है, जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, जहाँ जाकर लौटने की इच्छा नहीं होती, वह उसका अंतर्जगत ही तो उसका आश्रयस्थल है. वही उसका घर है, बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए वे घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ अथवा तो दूसरे देश या दूसरे शहर जाएँ !


संस्कारों के बीज


फिर एक अन्तराल ! नये वर्ष का चौथा महीना बीतने को है, कितने ही पल हाथ से गुजरते जा रहे हैं, कुछ खट्टे कुछ मीठे, वह साक्षी है उन सभी की. सभी के प्रति सम्मान का भाव सदा मन में रहता है पर कभी-कभी वाणी कठोर हो जाती है, पूर्व के संस्कार कभी-कभी प्रकट हो जाते हैं. उनकी भावनाएं चाहे शुद्ध हों पर कर्म जब तक उनकी साक्षी नहीं देते तब तक वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते. आज सुबह इतने वर्षों में पहली बार स्वीपर को भी उसके क्रोध का प्रसाद मिला. चाहे उनके क्रोध करने का कारण कितना भी सही क्यों न हो पर क्रोध सदा करने वाले को तथा जिस पर किया गया हो उसे, दोनों को जलाता है, क्योंकि क्रोध में वे द्वैत का शिकार होते हैं. क्रोध क्षणिक पागलपन ही है, वही बात जो वे क्रोध में कह रहे हैं, शांत भाव से भी तो कह सकते हैं. क्रोध के बाद सिवाय पछतावे के कुछ भी हाथ नहीं आता. उसके भीतर अभी भी कितनी नकारात्मक भावनाएं भरी हैं. इतने वर्षों का ध्यान भी उन्हें मिटा नहीं पाया, बीज रूप में वे संस्कार पड़े हैं जो मौका मिलते ही पनप उठते हैं, लेकिन गुरू का ज्ञान तत्क्षण हाजिर हो जाता है और भीतर प्रतिक्रमण होने लगता है, पुनः हृदय पूर्ववत शांत हो जाता है. लेकिन जहाँ वे शब्द गये हैं वहाँ तो पीड़ा पहुँच ही चुकी है, दूसरे की गलती होने पर भी उसे पीड़ा पहुँचाने का उन्हें कोई हक नहीं बनता, उसमें उनकी ही हार है, स्वयं के लिए ही उन्हें शांत रहना सीखना होगा.


सुबह पांच बजने से पूर्व उठी, सद्विचारों को सुना. क्रिया आदि की. भीतर झाँका तो पाया सम्मान पाने की, अपने लिखे लेख पर कुछ प्रतिक्रिया सुनने की आकांक्षा भीतर बनी हुई है. उसका लिखने किसी अन्य के लिए महत्वपूर्ण क्यों हो ? किसी को क्या पड़ी है कि पहले तो वह पढ़े फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे. यदि वह लिखती है तो इसलिए कि उसे उसमें सुख मिलता है, बस वही उसका प्राप्य होना चाहिए. ईश्वर ने उसे यश का भागी बनाकर अहंकार से भरने के लिए तो इस संसार में नहीं भेजा है. उसके जीवन का उद्देश्य परम सत्य को पाना ही तो है, उसमें बाधक हैं यश, सुख-सुविधाएँ, अति व्यस्तता. उसका जीवन तो कितना साधारण है, यहाँ एकांत है, समय है, साधना का उपयुक्त वातावरण है. ऐसा सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन पाकर और क्या चाहिए. आत्मस्वरूप में स्थिति बनी रहे, बोध बना रहे, किसी को उसके कारण रंचमात्र भी पीड़ा न हो, उसके मन को भी कभी कोई दुःख स्पर्श न करे. सहज हों उसके सभी कार्य, उसके सभी संबंध भी सहज हों तभी तो भीतर सत्य प्रकट होगा. उसके लिए अनुकूल वातावरण भीतर बनाना है, कोई चाह नहीं, कोई कामना नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, बस एक प्रतीक्षा ! कब आएगा वह, और एक अटल विश्वास कि वह परम भीतर प्रकटेगा अवश्य ! वह अस्तित्त्व, वह चिन्मय तत्व जो भीतर कभी नाद तो कभी प्रकाश रूप में दिखाई देता है, वह स्पष्ट हो उठेगा, पर उसके पूर्व धो डालना होगा सारा कलुष, धो डालनी होगी सारी आतुरता, सारा द्वेष, सारी असंवेदनशीलता, भरना होगा प्रेम से भीतर का वातायन !

Wednesday, February 10, 2016

या देवी सर्वभूतानां


नवरात्रि उत्सव आरम्भ हो गया है. देवी की आराधना का उत्सव अर्थात चेतना की शक्ति की आराधना. सद्गुरु ने कितनी सहजता से इसका अर्थ बताया. विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न मधु-कैटभ को मारने में जब विष्णु असमर्थ हुए तो देवी को आना पड़ा. चंड-मुंड का नाश भी देवी करती है. चंड अर्थात ऐसी चेतना जो केवल शरीर के निचले हिस्से में स्थित है, हृदय को प्रमुखता देती है, भावुक है तथा मुंड जो दिमाग को प्रमुखता देती है. दोनों ही अकेले-अकेले खतरनाक हैं, दिल व दिमाग का सामंजस्य ही व्यक्ति को पूर्ण बनाता है. जब आत्मा की शक्ति जगती है तो दोनों में संतुलन होता है. रक्तबीज का नाश भी देवी ने किया, अर्थात रक्त में घुले विकार चाहे वे शारीरिक रोग हों या मानसिक रोग, उनका नाश भी आत्मा की शक्ति से सम्भव है. नवरात्रि के नौ दिन गर्भ में नौ महीनों के वास के समान है, जिसके बाद नई सृष्टि देखने को मिलती है.

बचपन से अभी तक उससे कितनी ही भूलें हुई हैं, असत्य बोलना, चोरी और वाणी के अनगिनत अपराध, बुरे संकल्पों के, ईर्ष्या, द्वेष, परनिन्दा व और भी कितने-कितने अपराध होते ही रहे हैं, जो अनजाने में हुए उन्हें तो परमात्मा भी सम्भवतः क्षमा कर देता हो, लेकिन जो लोभ वश, स्वार्थ वश, अज्ञान वश, मोह वश हुए या किये उनसे छुटकारा तो वक्त ही देगा, कभी दुःख के रूप में, कभी ग्लानि के रूप में. लेकिन कल दोपहर मन को एक ग्रन्थि से छुटकारा मिल गया, भीतर जैसे कोई घड़ों जल डालकर धो गया हो ऐसी स्वच्छता का अनुभव हुआ ! गुरूजी भी कहते हैं सभी विकार प्रेम का ही विकृत रूप हैं, तो वह प्रेम ही था जो अभी अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं आया था, जो उन दिनों उसे भरमा रहा था. विकृत प्रेम ही ईर्ष्या है, अब जब स्वयं को आत्मा जान लिया है, भीतर सन्नाटा है. शास्त्र कहते हैं ज्ञान की अग्नि में सारे संचित कर्म जल जाते हैं, अब केवल प्रारब्ध कर्म ही शेष हैं. जिनका भुगतान समता से करना है. ससुरल से माँ-पिताजी आये हैं, उन्हें कोई बात दुःख देने वाली न लगे, वाणी पर नियन्त्रण रहे, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है. जून अपने दफ्तर में व्यस्त हैं, आईएसओ सर्टिफिकेट लेने के लिए उन्हें काफी काम करना पड़ रहा है.  

आज सुना, उन्हें स्मृति के साथ-साथ धृति का विकास करना है. धृति का अर्थ है धारणा, धैर्य ! धारणा यदि दृढ हो, मन यदि एक वस्तु पर टिककर उसी का चिन्तन करे तो समाधान हो जाता है. धैर्य की कमी से ही आज संबंध बिगड़ रहे हैं. सहन शक्ति की कमी से ही दूसरों के दोष दिखाई देते हैं, वाणी का अपराध होता है. इस जीवन में सभी को अपनी यात्रा अपने ढंग से करनी है. साधक को आग्रह त्यागकर प्रेम से मध्य मार्ग निकलना है. जीवन की परिस्थितियाँ तो बदल रही हैं, उनके हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह उन्हें बहा ले जा सकता है. समता से ही आंतरिक प्रसन्नता बनी रह सकती है. परमात्मा सभी के भीतर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है, सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है उसके भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. वे इस जगत में प्रेम अनुभव करने व बांटने ही तो आये हैं, अथवा तो सहयोग करने, शरीर द्वारा सहयोग करना तथा मन द्वारा प्रेम देना ही तो साधक का लक्ष्य है !

  

Monday, February 8, 2016

दशावतार


सद्गुरु को आज भी सुना. दसों अवतार मानव की चेतना में निरंतर कैसे घट रहे हैं इसके बारे में बता रहे थे. कल्कि का अवतार भीतर ही होगा जब जगत में कोई पराया नहीं रह जायेगा. आज भी सुबह से बादल बरस रहे हैं. सभी देवी-देवता भी चेतना में विद्यमान हैं. आत्मा कितनी पावन है, शुद्ध, शांत, ज्ञानयुक्त, आनन्द और सुख से पूर्ण शक्तिशाली. वे व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों से परेशान होते हैं. जीवन कितना विशाल है और कितने अनोखे रहस्यों से भरा हुआ, उन्हें बस आँख खोलकर देखने की जरूरत है. प्रेम चारों ओर बिखरा है. आज के ध्यान में कमल पर बैठ देवी की हल्की सी झलक मिली.

कल शाम वर्षा की झड़ी लगी थी, क्लब में मीटिंग थी पर वह जा नहीं पाई. परसों घर में ही होली मिलन में महिलाओं की मीटिंग का आनन्द लिया. आज धूप निकली है. गुरू जी आज से दिल्ली में सत्संग, प्राणायाम शिविर कर रहे हैं, रोहिणी सेक्टर-१० में उनका कार्यक्रम है. एक सखी ने फोन करके कहा, इस बार क्लब के वार्षिक उत्सव की थीम ‘लव एंड पीस’ है, उस पर अपने विचार लिखने हैं. प्रेम और शांति तो उनका मूल स्वभाव है, वे बने ही उसी के हैं. प्रकृति के कण-कण में यह प्रेम झलकता है, आकाश की नीलिमा में घोर शांति है, अन्तरिक्ष में गहन शांति है और प्रेम वह शक्ति है जिसके कारण ग्रह सूर्य के चारों ओर एक चक्र में अनवरत घूम रहे हैं, उनका अस्तित्त्व ही इस पर आधारित है. उसके दांत में हल्का दर्द अभी भी हो रहा है, परसों पुनः डेंटिस्ट के पास जाना है. कुछ देर पूर्व दीदी का फोन आया, डाक्टर के कहने पर जीजाजी ने सामिष भोजन लेना शुरू किया है.

आज सद्गुरु ने काली के भयंकर रूप की व्याख्या की. शक्ति यदि शांत चेतना से उदित हुई हो तभी कल्याणकारी होती है. ज्ञान शक्ति, क्रिया शक्ति तथा इच्छा शक्ति ! उनके भीतर तीनों शक्तियाँ हैं तथा परम चेतना भी है. उनका जीवन तभी सार्थक होगा जब इन शक्तियों का सदुपयोग वे कर सकें, अन्यथा ये शक्तियाँ विनाशकारी भी हो सकती हैं. अपने भीतर की सौम्यता, सहजता, शांति, सरलता, प्रेम का विनाश तथा अपने बाहर की समरसता का विनाश ! उन्हें हर पल सजग रहने की आवश्यकता है, जीवन का कीमती समय पल-पल कर यूँ ही बीत रहा है, हाथ में कुछ आ नहीं रहा. कभी लगता है कि इस परम खजाने की तलाश थी वह तो यहीं है, पूर्ण तृप्ति का अहसास होता है फिर जरा सा चूके नहीं कि वह तृप्ति कहीं खो जाती है, फिर तलाश..क्या यही साधना की नियति है, अनवरत खोज, मंजिल सदा दूर चली जाती है. यदि खोज समाप्त हो जाये तो वह तृप्ति बासी नहीं लगने लगेगी, शायद इसीलिए प्रकृति उनके मार्ग में नित नए आकर्षण फैलाती है कि बचो इनसे. पिछले कुछ दिनों से पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन के प्रति आकर्षण बढ़ गया था. जब सारी वासनाएं छूट गयीं तो नया  जाल फेंका इंद्र ने और वह उसमें फंसती ही जा रही थी कि कल सचेत हुई. भोजन उन्हें इसलिए चाहिए कि शरीर स्वस्थ रहे न कि स्वाद के लिए. पिछले दिनों होली के उत्साह में आत्मा से दूर चली गयी, मन कितने-कितने रूपों में उन्हें ठगने आता है और वे उसके शिकार हो जाते हैं. पिछले दिनों स्वाध्याय भी कम हुआ, आज सजगता बढ़ी है. तीन दिनों बाद उन्हें एक और यात्रा पर निकलना है. यह जीवन एक यात्रा है और इस विशाल यात्रा में छोटी-छोटी कुछ यात्रायें हैं.