Tuesday, December 8, 2015

झील की तलहटी


जब तक कोई अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो ही हजार गुना होकर वापस आता है. सद्गुरू को जब कोई समर्पित हो जाता है तो उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ! जीवन की सारी भयानकता सद्गुरू के मिलने तक ही होती है, उसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! हर घटना तब उसके लिए शुभ ही होती है. नया दृष्टिकोण, नयी विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसको भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
ज्ञान तो मिल जाता है पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. सुख के प्रति आसक्ति और कर्म के प्रति आसक्ति इसमें टिकने नहीं देती. टिकने के बाद तो कण-कण में व्याप्त चेतना का सहज ही अनुभव होने लगेगा.

देह प्रत्यक्ष है, आत्मा परोक्ष है. परोक्ष को पाकर ही एक तृप्ति का, शांति का अनुभव होता है. इस शांति को पाकर यदि राग हो जाये तो यह शांति भी अशांति का कारण बन जाती है. उसके भीतर भी मौन उतर आया है, गहरा मौन, विचार आते हैं पर विचार जैसे ऊपर-ऊपर तैरते हैं, नीचे की झील साफ दिखाई देती है. बस चुपचाप इस झील की तलहटी में बिछी ठंडी गीली रेत पर पड़ी सीपियों में से किसी एक पर उसका ध्यान रहता है. वहाँ से ऊपर जगत के कोलाहल में आने का भी मन नहीं होता. ऐसा ही अनुभव आज ध्यान में हुआ जब डेढ़ घंटे से भी ज्यादा कुछ मिनटों तक वह प्रकाश के समुन्दर में डूबती-उतराती रही. वह प्रकाश अब भी गंध रूप में उसके साथ है !

सद्गुरू वह है जिसके ‘भीतर’ को सारी सुप्त शक्तियाँ धारण करने का मौका मिलता है, वह निस्वार्थ भाव से उन शक्तियों का उपयोग जगत के लिए करता है. उसके भीतर अपार करुणा, अपार कृपा होती है, जो सभी को बिना किसी भेदभाव के मिलती है. उसने साधना इन शक्तियों को पाने के लिए नहीं की होती, वे तो सहज प्रेम के कारण ही चेतना का ध्यान करते हैं, आत्मा में रमन करते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाती है कि वे इस दृश्य जगत के पीछे अदृश्य सत्ता को देख लेते हैं. जगत की क्षण भंगुरता, परिवर्तन शीलता, स्वप्नावस्था तथा नश्वरता को पहचान उसे त्याग देते हैं. स्वरूप से तो नहीं त्याग सकते पर मन से त्याग देते हैं ! उनके पास सारी दृष्टियाँ होती हैं, वह सारे मार्ग बता देते हैं, अपनी अपनी योग्यता व रूचि के अनुसार साधक उनमें से किसी एक पर चलने के लिए समर्थ है !


जीवन का एक सत्य है कि संसार को किसी का मन नहीं चाहिए, उसकी सेवा चाहिए, बस उनका काम होता रहे, मन की किसी को जरूरत नहीं है और यह मन न ही परमात्मा के किसी काम का है, वह तो मन से परे है, तो ध्यान और प्रेम के मार्ग पर इसे मर ही जाना होगा. अहंकार को ही केवल मन चाहिए, यह इसी के बल पर जीता है. ‘मैं’ है तो इच्छा है, डर है, कामना है, सुख है, दुःख है, यदि ‘मैं’ ही नहीं तो इनमें से कोई भी नहीं और तब मन भी नहीं. बिना अहंकार के जीने वाले को हो सकता है यह दुनिया पागल कहे, पर उसकी भी कोई चिंता नहीं, पागल तो हर व्यक्ति यूँ भी हर दूसरे को समझता ही है. हर कोई स्वयं को बुद्धिमान ही जानता है और दूसरे को नासमझ, तो यदि कह भी दिया तो सुन लेना चाहिए. कोई ध्यान के द्वार से लौटा हो या भक्ति के, इसका पता तो चले, कोई रेखा तो हो जो उसे और एक संसारी को नास्तिक को अलग करती हो, पर सद्गुरू यह भी तो कहते हैं कि भेद नहीं है. दो हैं ही नहीं तो भेद हो कैसे, दूसरा कोई है ही नहीं, जो भी हैं वे भी तो उसी परमात्मा का ही रूप हैं. परमात्मा ही विभिन्न रूपों में अपने को व्यक्त कर रहा है. एक बार अपने भीतर प्रवेश मिल गया तो सारे भेद मिट जाते हैं !    

केक की ख़ुशबू


मन की शक्तियाँ जब बढ़ती हैं तो दैवीय सत्ता भीतर जगने लगती है. वे जब पहले बार इस धरा पर आये थे तो देवता स्वरूप थे. उस देवत्व को उन्होंने दबा दिया है पर वह रह-रह कर उन्हें अपनी सत्ता से परिचित कराता है. वे देवताओं के वशंज हैं, अमृत पुत्र हैं, सद्विवेक उनका स्वभाव है. आज उनका विवेक ढक गया है पर भीतर वह पूर्ण जागृत है. उन्हें उसे बाहर निकालना है. सृजन और मनन की शक्ति भीतर है. व्यर्थ के विचारों को यदि आवश्यक विचारों में बदल दें तो उनकी क्षमता पांच गुणी हो जाएगी. मन शांत हो तो सद् संकल्प उठते हैं, सहज ज्ञान भी तभी होता है जब मन अडोल होता है. परमात्मा के प्रति प्रेम भी तभी जगता है. जो उसका है वह उन का भी है यह यकीन होने लगता है. तब वे संसार के लिए भी उपयोगी बनने लगते हैं, परमात्मा उनके द्वारा काम करने लगता है. जीवन उत्सव बनने लगता है !

परमात्मा को मिलना कठिन नहीं है, जो वस्तु उनके पीछे है, उसे देखने के लिए कोई दूरबीन लगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसके सम्मुख होने की आवश्यकता है. भगवान चुनौतियाँ परिवर्तन के लिए देते हैं, क्योंकि परिवर्तन के बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता, अपनी शक्तियों से परिचित नहीं हो पाता. आज गुरु पूर्णिमा है, उसने गुरूजी की आवाज में रिकार्ड किया स्पेस मेडिटेशन किया. शाम को सत्संग है तथा गुरू पूजा भी. जो आत्मज्ञान प्राप्त करता है, हृदय से अज्ञान अन्धकार मिटाता है, जो कण-कण में व्याप्त पर नजरों से छिपे तत्व को उजागर कर देता है, वह सद्गुरु उनके नमन का पात्र है. जो सिद्ध है, अरिहंत है, तीनों गुणों से परे है, जो आत्मा को हस्तामलकवत् देखता है, जो ईश्वर को जानता है ऐसा सद्गुरू जो उनके संशयों को दूर करने की क्षमता रखता है, उनके नमन का पात्र है. आज सुबह समय से उठी, साधना का क्रम भी ठीक चला. रात को सोने में देर हुई. तिलक, टीका, मन्दिर, मूर्तिपूजा पर आचार्य रजनीश के विचार अद्भुत हैं, सुनती रही, कितना विस्तृत ज्ञान है उनका, कितनी तक्ष्ण मेधा और कितनी तीव्र याददाश्त. उनकी तीसरी आंख खुल गयी है. जब कि वे  मस्तिष्क का आधा हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं कर पाते, कोई कहता है कि दस प्रतिशत से भी कम उस क्षमता का प्रयोग मानव करता है जो प्रकृति ने उसे दी है. यह सृष्टि न जाने कितनी बार बनी और नष्ट हुई और कितनी बार मानव ऊंचाइयों पर पहुंचा है और कितनी बार गिरा है. वे आगे बढ़ें यही उनकी नियति है, उन्हें बढ़ना ही है !


शरीर, श्वास, मन, प्राण, भाव ये पांच मिलकर जीवन है. सभी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं. भाव वे सूक्ष्म स्पंदन हैं जो भीतर से आकर स्थूल देह को संचालित करते हैं. प्राण धारा यदि सबल हो तो देह स्वस्थ रहती है. श्वास भी नियमित रहती है. भाव ही मन को भी प्रभावित करते हैं. आज वर्षा थमे दूसरा दिन ही है और अभी सुबह के दस भी नहीं बजे हैं पर गर्मी तेज हो गयी है. घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है, सो आज ध्यान में नहीं बैठी. समय का सदुपयोग किया एक सखी के लिए केक बनाकर, केक की खुशबू आ रही है जैसे कल उसे आ रही थी, कल उसके यहाँ जन्मदिन की पार्टी थी. उनके भीतर जो चेतन शक्ति है, उसका ज्ञान हो जाने के बाद वे कालातीत हो जाते हैं, भूत तथा भविष्य से परे पूर्ण वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, सखी को उसने बताया पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण शांति वर्तमान में ही है. उनके घर काम करने वाली नयी नैनी को उसने कहा दस बजे अपने अपाहिज पति को लेकर आए जिससे प्राणायाम सिखा सके पर वह नहीं आई है. किस्मत में हो तभी यह अमूल्य विद्या प्राप्त हो सकती है. वह नहीं आया तो क्या हुआ, वह स्वयं जाकर उसे सिखा सकती है, अभी-अभी पता चला कि वह चादर पहन कर बैठा है, सारे कपड़े धोने के लिए भिगा दिये हैं, कल आएगा ! कल जून दिल्ली जा रहे हैं एक हफ्ते के लिए, सो समय ध्यान-साधना में बीतेगा, घर की सफाई, सत्संग, संगीत तथा स्वाध्याय और सेवा में भी. सासुमाँ आज सुबह के भ्रमण के समय मिलने वाली अपनी एक परिचिता से किताब के पैसे उनके देने पर ले आयीं फिर नौ बजे वापस करने गयीं, लौटते में धूप लग गयी ऐसा कह रही हैं. शरीर को वे कितना सुकुमार बना लेते हैं. अभी ध्यान कर रही हैं.     

Sunday, December 6, 2015

मित्रता की सुगंध


आज सुना..'भक्ति का आरम्भ वहाँ है जहाँ ईश्वर में जगत दिखता है और चरम वह है जहाँ जगत में ईश्वर दिखता है. पहले-पहल दिव्यता के दर्शन अपने भीतर होते हैं फिर सबके भीतर !’ वर्षा की झड़ी लगी है, भीतर का आसमान भी धुल गया हो जैसे ! सद्गुरू ने कहा, साधक उनका काम करें और वे उनका काम कर देंगे. सारी चिंता, दुःख, परेशानी उन्हें समर्पित कर दें और स्वयं साधना, सेवा तथा सत्संग में लग जाएँ. अपनी नजर को विशाल बनाएं, कोई पराया नजर ही नहीं आएगा, कोई बुरा भी नहीं दिखेगा. ठीक ही तो है, हर ऐसा व्यक्ति जो न करने योग्य कार्य करता है, स्वयं भी अज्ञान का दुःख भोग ही रहा है, उसे बुरा कहकर वे न तो उसका भला कर सकते हैं न अपना ही. जब उन्हें दोषी न मानकर शोषित मानते हैं जो अपने ही द्वारा शोषित हो रहा है, तो उसे दुःख से निकाल सकते हैं तथा स्वयं को भी धर्म ध्यान में रख सकते हैं, कर्म बाँधने से बच सकते हैं. संसार में सबके साथ रहना भी सीखते हैं. संगठन का गुण जगत में बड़े काम करने में सहायक है. राम कहते हैं, जो स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देते हैं, वही कुछ करके जगत का कल्याण कर सकते हैं.

जो नश्वर को जानता है वह शाश्वत होता है, स्थायी होता है. वही वह है ! उसने अपने तन में होती संवेदनाओं को देखा, जो देखते-देखते नष्ट हो गयीं, क्योंकि वे नश्वर थीं. उनके मन में उठने वाली प्रत्येक भावना, कल्पना, विचार नश्वर है, वे जो उसके साक्षी हैं, शाश्वत हैं. वे व्यर्थ ही मन की कल्पनाओं को सत्य मानकर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. उन्हें तो इन्हें ये जब जैसी हैं वैसी मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए.  

इस वक्त वह लॉन में झूले पर बैठी है, ठंडी हवा बह रही है. घास में, हरी घास में अद्भुत सुन्दरता है जो वे देख नहीं पाते पर ईश्वर उन्हें दिखाते हैं. वर्षा हो चुकी है सो सभी कुछ धुला-धुला सा है, हरा, निर्मल और शीतल..उसका हृदय भी ईश्वर के प्रेम से हरा-भरा है, निर्मल है और शांत है. सारी सृष्टि इस क्षण इतनी सुंदर लग रही है. पेड़ों की शाखाएँ व पत्ते हवा में सरसराहट उत्पन्न कर रहे हैं. रह रहकर कोई बूंद टप से गिरती है, दूर से घंटे की आवाज आई और फिर किसी पंछी की. उसकी किताब ‘इन्द्रधनुष’ छप कर आ गयी है. आज एक सखी की बेटी ने sms भेजकर कहा कि भगवद्गीता के लिए धन्यवाद तथा उसकी दोस्त भी पढ़ना चाहती है अंग्रेजी भाषा में. अच्छा लगा जानकर कि आज की पीढ़ी में भी ऐसे लोग हैं. नन्हे का मित्र आज चला गया, बेहद शांत व सभ्य विद्यार्थी, उस पर एक कविता लिखेगी. सबसे पहले उसने एक बुजुर्ग परिचिता को खबर दी किताब आने की, किताब में उसका फोटो ठीक नहीं आया है, उनका चुनाव ठीक नहीं था. आज दीदी व छोटी बहन दोनों से बात हुई, छोटे भाई की तबियत ठीक नहीं थी, उसके मन की पीड़ा ही उसे मजबूत बनाएगी. फुफेरी बहन से भी वह मिली, इतनी तकलीफ में भी हँस रही थी. ईश्वर उनमें से हरेक के साथ है, वही तो है, उनके दुःख उनके पथ के कांटे नहीं फूल बन जाते हैं, जब वे उन्हें उसी के द्वारा भेजा मानते हैं !

आज नन्हा वापस चला गया. कल शाम को जब सामान पैक करने का समय आया, जिसे वह जहाँ तक सम्भव हो टालता रहता है, तो वह उदास लग रहा था. नूना ने जब पैकिंग में सहायता करने की बात की तो पहले सदा की तरह मना किया पर बाद में मान गया. वह अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करता, मन में ही छुपा कर रखता है. मित्रों के साथ बहुत उन्मुक्त व्यवहार करता है. अच्छा लगता है कि उसके इतने मित्र हैं और सभी के साथ एक सा प्रेम. इस बार जाते समय तथा सामान सहेजते समय नूना की आँखें भर आयीं, ये मोह के नहीं प्रेम के अश्रु थे, जिन्हें सद्गुरू बहुमूल्य बताते हैं. इस समय वह कोलकाता पहुँच चका है, कल बंगलूरू वहाँ से परसों कालेज चला जायेगा. उसका मित्र भी उन्हें सदा याद रहेगा, पहले स्कूल का एक मित्र फिर कोचिंग का और अब कालेज का, ये तीनों घर में आकर भाइयों की तरह रहे. भाई तो आपस में झगड़ते हैं पर इनमें कभी मनमुटाव होते नहीं देखा, मित्रता का रिश्ता निभना नन्हा खूब जानता है. वर्षा पुनः तेज हो गयी है, माली जो बाहर काम कर रहा था, गैराज में चला गया है. उसे घर में कल से सफाई का काम शुरू करना है और आज से पत्र लिखने का भी !


Saturday, December 5, 2015

बुद्धं शरणम् गच्छामि !


आज सत्संग उनके यहाँ है, मौसम गर्म है सो ज्यादा लोग नहीं आएंगे, ऐसे भी आजकल गिने-चुने लोग ही आते हैं. सुबह क्रिया भी पीछे आँगन में की, सुबह साढ़े पांच बजे ही हवा का नाम नहीं था, जैसे प्रकृति की लीला ! उन्हें उसे सहज भाव से स्वीकारना चाहिए. नन्हा सुबह अपने मित्र को लेने रेलवे स्टेशन गया. उसका मित्र बौद्ध है, उसके बाल लम्बे हैं, पीछे बांधता है, चौड़ा चेहरा, दोहरा तन, हिंदी अच्छी बोल लेता है क्योंकि बनारस में रहा है, उसके पिता सारनाथ में बौद्ध विश्व विद्यालय में कार्यरत हैं. गर्मी के कारण उसकी आँखों में हल्का दर्द है तथा जी भी भारी हो रहा है. अभी कुछ देर पूर्व उन्होंने सूप पिया था और सम्भवतः बार बार पानी पीने से भी भरा-भरा सा लग रहा है.

आज सुबह उसने सुंदर शब्द सुने थे, जिन्हें बाद में स्मृति के आधार पर लिख लिया. उनकी साधना इस जन्म में जहाँ तक पहुँचती है, अगले जन्म में वहीं से आरम्भ हो जाती है. कुछ वर्ष पूर्व एक दिन उसने स्वप्न में स्वयं को एक चारपाई पर पड़े देखा था, शायद अंतिम क्षण थे, आस-पास के लोग मन्त्र उच्चार रहे थे, फिर उसने भी ॐ नमो भगवते वासुदेवाय कहना शुरू कर दिया था, और थोड़ी ही देर में वह देह से ऊपर उठ गयी थी, तब कुछ भी समझ में नहीं आया था पर वह स्वप्न आज समझ में आ रहा है. हर पल उनकी भाव मृत्यु हो रही है, क्योंकि वे अज्ञानावस्था में रहते हैं, देह मानते हैं स्वयं को, पर जब ज्ञान होता है और स्वयं को आत्मा जान लेते हैं तब मृत्यु नहीं होती, जिसकी भाव मृत्यु बंद हो गयी, वह मरता ही नहीं, वह अजर, अमर, अविनाशी है. जो भाव मृत्यु है वह अहंकार की है, शरीर की द्रव्य मृत्यु होती है, भाव मृत्यु का परिणाम द्रव्य मृत्यु है. जो-जो कर्म उन्होंने आज तक मन, वाणी और देह से किये हैं उनका बंध तभी तक है जब तक अज्ञानावस्था है. जब तक सफलता अहंकार से भर देती है और असफलता निराशा से तब तक वे देह से ही बंधे हैं. जगत को दोषी न समझना साधना का मुख्य भाग है, यदि किसी को दोषी मान लिया तो फौरन प्रतिक्रमण करके मन को निर्मल कर लेना होगा, नहीं तो कर्म बंधन में पड़ ही जायेंगे. जो स्वयं को आत्मा देखता है वह अन्यों को भी आत्मा देखता है, आत्मा सदा निर्मल है.

आज मौसम अपेक्षाकृत ठंडा है, रात को वर्षा हुई और उसके भीतर का तापमान तो सदा एक सा है. नन्हे के मित्र से सुबह प्राणायाम की बात की, ध्यान की बात की, वह बौद्ध है, ध्यान का संस्कार उसे जन्म से मिला है. वह शांत है, प्राणायाम भी थोडा बहुत जानता है. अच्छा है कि नन्हे का मित्र है उस पर अच्छा प्रभाव डालेगा.

आज नन्हे का जन्मदिन है वे पावभाजी बनाने वाले हैं. उसे सुबह उठाया, फूल और कार्ड दिए. आज ही के दिन वह धरती पर आया था, उनके जीवन को नया अर्थ देने और उन्हें माँ-पिता का पद देने.

वृक्ष के मूल में यदि खाद डालें तो फल प्रदान करता है और प्राणी फल ग्रहण करके खाद देते हैं. जीवन किस तरह एकदूसरे पर आधारित है और एक चक्र में बंधा है. आज उसने आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान का अर्थ सुना. आरम्भ के दो ध्यान त्याज्य हैं और अंत के दो ग्रहणीय. भूत के कारण आत्मग्लानि अथवा भविष्य की चिंता के कारण दुःख में पड़ जाना आर्त ध्यान है जो दुर्गति में ले जाता है. दूसरों को दुःख देने की भावना से रौद्र ध्यान तथा सुख देने की भावना से धर्म ध्यान होता है. धर्म ध्यान का फल मोक्ष है. शुक्ल ध्यान में आत्मा की जाग्रति सदा बनी रहती है. आत्मा का ध्यान मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है. मुक्ति की अनुभूति शुक्ल ध्यान से तत्क्षण शुरू हो जाती है और क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, मोह तथा मत्सर खत्म होने लगते हैं.  


Friday, December 4, 2015

अंग्रेजी गाने


नन्हा बहुत तेज आवाज में अंग्रेजी गाने बजाता है जो जून और नूना को समझ में नहीं आते, उन्होंने कभी समझने का प्रयत्न भी नहीं किया. शोर बहुत होता है इन गानों में और इन्हें धीमे सुनने का रिवाज नहीं है. उसका मित्र जब आ जायेगा तब दोनों मिलकर और शोर करेंगे, आज की पीढ़ी इसी शोर में जीना पसंद करती है ! उसने अभी कुछ देर पहले कुछ पत्रिकाएँ उलटीं-पलटीं, अब उनमें रूचि नहीं रह गयी है, बाहर जो कुछ भी हो रहा है, घट रहा है उसका भीतर से क्या संबंध है ? मन के विकारों से क्या संबंध है ? जानकारी बढ़ाए चले जाने से भीतर परिवर्तन तो होता नहीं, साधक के लिए उतना ही जानना जरूरी है जो उसकी साधना में सहायक हो. वे इस दुनिया में पहली बार तो आए नहीं हैं, न ही अंतिम बार, न जाने कितनी बार पहले इन दृश्यों को आँखें देख चुकी हैं, वे न जाने कितनी बार हँस-रो चुके हैं, अब इन सबसे जैसे अरुचि हो गयी है, वीतरागता...अब तो आत्मा के भीतर गहरे और गहरे प्रवेश करने की एक मात्र कामना प्रबल हो गयी है, कैसे भीतर शांति हो, मन निर्मल हो और वाणी पवित्र हो ताकि कोई आवरण आत्मा को ढके नहीं, वह मुखर हो जाये, सुबह से शाम तक अंतर में यही भाव प्रमुख रहता है.

अहंकार के कारण ही वे हर बार प्रभु से दूर हो जाते हैं, तभी दुःख उनका पीछा नहीं छोड़ता. जो दुःख दूसरों को दुखी देखकर आया हो सात्विक है तथा जो अहंकार से आया है, अज्ञान से आया है, तामसिक है. आज धूप तेज है, कल गर्मी थी पर बादल भी थे. इस वक्त सुबह के पौने नौ बजे हैं, समय से उठी पर आज आसन नहीं कर पायी. कल शाम सासु माँ का जन्मदिन मनाया, रात को देर से सोये, अभी भी उसका असर आँखों पर लग रहा है. नन्हा आज ट्रेनिंग पर गया है. उसका चित्त इस वक्त जरा भी स्थिर नहीं है, तभी डायरी में इधर-उधर की बातें लिखी जा रही हैं. आसन करने से तन के साथ मन भी शांत व स्थिर होता है. सुबह नाश्ते में पोहा बनाया. कल पिताजी का फोन आया, बड़ी बुआ जी का भी जन्मदिन था कल, मंझली भाभी का भी, वे भूल ही गये थे.

अभी कुछ देर पूर्व एक अनोखा अनुभव हुआ, उसने विचार किया कि परमात्मा के नाम के सिवा सभी कुछ अपावन है, तत्क्षण सारा दृश्य बदल गया, सुंदर हो गया, दरवाजा, फर्श और एक भाप जैसा या रंगहीन धुएं जैसा या कुछ रेडिएशन जैसा निकला, लगा जैसे अस्तित्त्व ने उस परम शक्ति ने उससे सम्पर्क किया. उसके मन के विचार का जवाब दिया. विचार तो आत्मा की गहराई से उपजा था, उनके भीतर एक अथाह स्रोत है जो चमत्कार कर सकता है. अभाव से निकल कर वह उन्हें स्वभाव में लाता है. प्रभाव से मुक्त कर भी वह स्वभाव में लाता है. सहज ही उनके कर्म सेवा बन जाते हैं, लेकिन करने का भाव नहीं है. अकर्ता भाव भी आता है. परमात्मा उनका सुहृदय है, सखा है, आत्मीय है, मीत है और ऐसा सखा जो कभी उन्हें गलत राह पर जाने नहीं देता, जो सदा उनकी उन्नति ही चाहता है, जो उन्हें प्रेम करता है. वे उससे दूर चले जाते हैं तो जगत में फंस जाते हैं, घबराते हैं, दुखी होते हैं तथा ईर्ष्या व द्वेष का शिकार होते हैं. उनका मन जब कृष्ण से विमुख हो जाता है तो ही वे सजग नहीं रह पाते. जब वे सजग नहीं रह पाते तो अपने स्रोत से दूर हो जाते हैं, अपनी शक्तियों से दूर हो जाते हैं. आत्मा के पद से हट जाते हैं ! शरीर और आत्मा के भेद को भूल जाते हैं !

‘रहो भीतर, जीओ बाहर’ यह प्रेक्षा ध्यान का सूत्र है. जब तक भीतर कोई केंद्र नहीं है तो वे कैसे वहाँ टिक सकते हैं. आत्मा ही वह केंद्र है, इसे भूलकर वे मन को ही सत्य मानकर उसके सुख-दुःख में लिप्त होते रहते हैं. इस संसार में जो कुछ भी उन्हें मिला है, वह व्यवस्थित है, उनके ही कर्मों के अनुसार मिल रहा है. वे यदि इसमें राग-द्वेष करेंगे तो नये कर्म भी बांधेंगे. यदि समता में रहेंगे तो शान्ति से इन कर्मों को करेंगे जो उनके प्रारब्ध में हैं तथा आत्मा की शक्ति का सदा अनुभव करेंगे. ‘भीतर’ तब स्वस्थ रहता है, शांत और स्थिर रहता है, ऐसा ‘भीतर’ सारे दुखों से मुक्त करके आश्रय देता है. मन साधन रूप में मिला है पर वे उसे साध्य मान लेते हैं, उसको संतुष्ट करना ही वे अपना लक्ष्य बना लेते हैं, आत्मा रूपी भीतर ही साध्य है !   

Wednesday, December 2, 2015

प्रेमचन्द का साहित्य



टीवी पर भक्ति की लहर बहाते हुए भजन गायक गा रहे हैं. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर से जैसे किसी ने कहा कि ध्यान में अद्वैत का पालन होता है, जब आत्मा और परमात्मा के मध्य कोई अंतर नहीं रहता, दोनों एक हो जाते हैं. जब साधक चिंतन-मनन करते हैं अथवा मौन रहते हैं तब द्वैत रहता है. जीवात्मा के रूप में वे मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार के साथ होते हैं, तब वे परमात्मा के अंश हैं. मन लहर है तो आत्मा सागर है, मन बादल है तो आत्मा आकाश है. जब वे व्यवहार जगत में होते हैं, अर्थात वाणी या तन से कुछ काम कर रहे होते हैं तब उस परमात्मा के दास हैं. वह साकार भी है और निराकार भी. उसकी मूर्ति भी उसका साकार रूप है और उसकी बनायी ये चलती-फिरती मानव मूर्तियाँ भी, उनका कर्त्तव्य है इन्हें सुख देना, किसी भी प्रकार से कोई कष्ट न पहुँचाना ! सेवक को अपना सुख-दुःख नहीं देखना है, उसका अहंकार भी मृत हो गया है, क्योंकि वह तो परमात्मा का अंश है, वह शून्य है, ऐसा उन्हें हर पल स्मरण रहे तो सदा वे परमात्मा के साथ हैं !

नन्हे की फ्लाईट छूट गयी, अब वह गोहाटी होकर आएगा ! जून उसे लेने जायेंगे एयरपोर्ट. इस बार जब वह आएगा तो उसे इस बात को समझना ही होगा कि किस प्रकार जीवन जीने की कला सीखी जाती है और हर प्रकार की मुश्किलों से कोई बच सकता है. इस समय सवा दस हुए हैं, टीवी पर भक्ति गीत आ रहा है. प्रार्थना करने से क्या मन वश में हो जाता है, क्या परमात्मा उनके लिए कुछ  कर सकता है जब तक वे स्वयं अपना उद्धार नहीं करते. उनके संकल्प दृढ नहीं होते तभी एक ही गलती बार-बार दोहराते हैं. भजन करने से उतनी देर तो मन स्थिर रहता है, कुछ देर उसका असर भी रहता है. फिर जब-जब उसका स्मरण होता है, मन पावन हो जाता है, लेकिन इस समय उसका मन कुछ बेचैन सा है, जैसे कुछ छूट गया हो. उसे लगता है कि जो भी कार्य करने हैं, उन्हें ठीक से कर नहीं पा रही है, जैसे लिखने के लिए कितना कुछ है पर कुछ भी क्रम से नहीं हो पा रहा है, फिर सोचती है क्या यह आवश्यक है कि वह स्वयं को एक बंधन में बांधे, अपनी प्रतिभा का सही उपयोग नहीं कर पाने पर ( क्या वह वास्तव में प्रतिभा है भी ?) स्वयं को दोषी ठहराए, क्यों न वह सहज होकर जिए, पर सहज होकर जीने के लिए भी अनुशासन की बहुत आवश्यकता है !  

‘कलम का सिपाही’ आज पूरी पढ़ ली, पिछले कुछ दिनों से पढ़ रही थी. प्रेमचन्द का बचपन, उनकी संघर्ष भरी जीवन कथा, उनका अनोखा ज्ञान, साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा, किस्सा गढ़ने का उनका अनोखा अंदाज, भाषा पर पकड़, भीतरी विश्वास, फक्कड़पन, गरीबों के प्रति गहरा प्रेम, भोलापन, सादगी और आत्मीयता ! उनके इतने सारे गुणों का परिचय कराती यह पुस्तक बहुत अच्छी लगी. प्रेमचन्द पर एक छोटा सा लेख लिखेगी इस किताब के आधार पर. वह ईश्वर को नहीं मानते थे पर प्रेम उनके भीतर पगा था. वह भाग्यवादी नहीं थे, कर्मकांड में उनका जरा भी विश्वास नहीं था, उन्होंने संस्कृत नहीं पढ़ी पर गीता की स्थित प्रज्ञता उनके भीतर भरी थी, अनोखा था वह इन्सान ! उनकी किताबें उनको अमर कर चुकी हैं, भारत ही नहीं विश्व के साहित्य में अपना स्थान बना चुकी हैं. साहित्य के माध्यम से जन जाग्रति लाने का उनका इरादा कितना दृढ़ था, गरीबी का बोझ सर पर था ही और स्वास्थ्य भी उतना ठीक नहीं था, पर भीतर जो ज्ञान था वह कलम की नोक से कागजों पर अंकित होता जा रहा था. वे भूत की गरिमा के गायन में कभी नहीं लगे, वे वर्तमान को ही देखते थे, उसे ही जीते थे और उसी को सुधारने का प्रयत्न करते थे, अपने वक्त की नब्ज पर उनकी गहरी पकड़ थी !


नन्हे ने उसका पत्र पढ़कर कहा, पढ़ने के लिए ठीक है पर मानने के लिए नहीं, अर्थात ज्ञान केवल सुनने की वस्तु है अपनाने की नहीं ! वे सभी तो यही करते हैं, भीतर तो ज्ञान है पर व्यवहार में नहीं उतर पता, जो व्यवहार में न उतरे वह ज्ञान तो बोझ ही है ! तन यदि स्वस्थ न हो तो मन पर उसका प्रभाव पड़ेगा पर मन यदि पूर्ण स्वस्थ हो तो तन को भी स्वस्थ कर सकता है, मन आत्मा का ही अंश है और आत्मा परमात्मा का ! मन अंततः परमात्मा को ही चाहता है, जगत का कितना भी सुख उसे मिले वह प्यासा ही रहेगा. अनंत को चाहने वाला सीमित से प्रसन्न रहे भी तो कैसे ? अभी उसका मन उस अलौकिक सुख की कामना करता है तभी ध्यान में डूबना चाहता है पर जब इस सुख की चाह भी नहीं रहेगी तब भीतर एक नया सूरज उगेगा, वह सच्चा आत्मबोध होगा, अभी तो एक झलक भर मिली है !   

Tuesday, December 1, 2015

कलम का सिपाही


कल शाम को जो द्वंद्व शुरू हुआ उसकी परिणति हुई सुबह, जब वातावरण में फैले तनाव ने सभी को प्रभावित किया, तनाव के परमाणु वातावरण में किस तरह छा जाते हैं. उसका मन इतना संवेदनशील हो गया है कि रंचमात्र तनाव भी इसे पहाड़ सा चुभता है. यह समता में आने के लिए छटपटा उठता है. साधक का हृदय बहुत कोमल होता है, एक तरफ तो वह चट्टान की तरह कठोर होता है, दूसरी ओर फूल की तरह कोमल. कल रात उसने पीड़ा को निमन्त्रण दिया और आज सुबह उसने कंठ में हार पहना दिया. सद्गुरू कहते हैं इच्छाएं अवश्य पूरी होती हैं, यदि वे सच्चे हृदय से निकली हों. ईश्वर उसके सामने नई-नई परिस्थितियाँ भेज कर अपने को शुद्धतम बनाने का अवसर दे रहे हैं. उसके कल शाम के रवैये ने बताया कि अभी अहंकार शेष है. बात यदि सही भी हो तो उसको कहने का तरीका गलत होने होने से वह गलत हो जाती है. कृतज्ञता भुलाकर यदि कोई अपना पक्ष रखना कहेगा तो बात बिगड़ेगी, परिणाम अच्छा नहीं होगा. यदि उनकी किसी अच्छी बात से भी दूसरे को दुःख हुआ तो वह अच्छी बात व्यर्थ है. उन्हें कहने का ढंग ही नहीं आया. उनकी मंशा ठीक है इसकी खबर तो बस उन्हें ही है, सामने वाला तो वही जानता है जो उसे दीखता है, प्रभु उसे सिखा रहे हैं. अहंकार और क्रोध उसके भीतर हैं, उन्हें बाहर लाकर वह उसे सचेत कर रहे हैं.

नन्हे को बुखार है, जून जब फोन पर उसे हिदायत देते हैं तो लगता है उनके भीतर जैसे एक माँ का दिल है. कल उसकी परीक्षा भी है और अभी-अभी उससे बात की. उसका ‘आई-कार्ड’ जो खो गया था, उसे लेने डीन के ऑफिस में गया था. जून अब पहले की तरह देर तक नाराज नहीं रहते, परिपक्वता की यही निशानी है. कल सुबह नैनी को उसने अपनी पुरानी आदत (पैटर्न) के अनुसार कुछ ज्यादा ही कड़े शब्द बोले, उसके प्रति नूना के मन में जरा भी द्वेष नहीं है पर वह उसे जवाब दे, यह उसका अहंकार सहन नहीं कर सका. अहंकार कितना प्रबल है इसका पता तो चल हो गया, उधर उसका अहंकार भी कुछ कम नहीं है. कल से वह काम पर नहीं आई है. जो काम करने को उसे कहा था, बगीचे का वह काम भी वैसे ही पड़ा है. वह शायद अब वह काम करना नहीं चाहती. खैर, वक्त ही बताएगा कि इस समस्या का क्या हल निकलता है. फ़िलहाल एक लडकी बाहर से आकर काम कर जाती है.

वह प्रेमचन्द पर लिखी किताब ‘कलम का सिपाही’ पढ़ रही है जो उनके छोटे बेटे अमृत राय ने लिखी है, किताब इतनी रोचक है और बताती है प्रेमचन्द कितने साफ दिल तथा हंसमुख थे, लिखना उनके लिए बेहद जरूरी एक काम था, पूजा से भी बढकर जरूरी ! उनके लिए लेखन कितना सहज था जैसे श्वास लेना, वह रोज नियम से लिखते थे, इस बात से बेखबर कि कौन उन्हें पढ़ता है या साहित्य के नियम क्या हैं, लिखना उनके खून में था. उसने लिखने को कभी इतना महत्व दिया ही नहीं, ज्यादातर समय तो घर-गृहस्थी के कार्यों में गया, जब से अध्यात्म के रास्ते पर चलना शुरू किया तब से तो पढ़ने तथा प्राणायाम करने में ज्यादा समय लगता है. टीवी पर संतों व महात्माओं को सुनने में भी बहुत समय लगाया है, जिसका परिणाम है अपने भीतर का अनुभव ! वह अनुभव अनोखा है, वह तो इस ब्रह्मांड की सबसे कीमती शै है ! किससे नजर मिलाऊँ तुझे देखने के बाद, जिसे एक बार अपने भीतर उस आनन्द की झलक मिल जाये वह खुद को ही भूल जाता है संसार की तो बात ही और है. कवि कहता है, अपना पता न पाऊँ तुझे देखने के बाद, और ऐसा मन स्वालम्बी होता है, उसे जो चाहिए उसके लिए वह अपने दिल का द्वार खटखटाता है, वह जो चाहता है भीतर ही मिल जाता है.


आज उसने सुना, उन्हें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है, सब एक है. स्थूल में भेद है, वहीँ सारे विकार हैं, सूक्ष्म निर्दोष है, निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले इन्द्रियों को तपाना होगा, मन को जमाना होगा और तब उसमें आत्मा का नवनीत प्रकट होगा. कल रात उसके मन की अवस्था विचित्र थी, ईर्ष्या का अनुभव इतनी तीव्रता से हो रहा था. अहंकार के कारण ही ईर्ष्या आदि विकारों को प्रश्रय मिलता है. सद्गुरु ने कहा है, जिस क्षण यह ज्ञात हो जाये कि वह भूल कर रहा है, भूल से बाहर आ जाता है. वह भूल से बाहर तो आ पा रही थी पर भीतर कोई मंथन चल रहा था. बार-बार वही भावना प्रकट हो रही थी. ऐसे लगता है उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है. रूखा-सूखा ज्ञान कब तक हृदय को हरा-भरा रखेगा उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. ज्ञान के सहारे कोई भले आत्मा को जान ले पर आत्मा का आनन्द भक्ति के सहारे ही मिल सकता है, उसके कृष्ण की भक्ति और सद्गुरू की भक्ति ! आज का ध्यान कृष्ण का ही ध्यान होगा उसके ही मन्त्र का जाप होगा, आज सत्संग का दिन भी है. गोयनका जी कह रहे हैं की जिसकी जप प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ जाती है, यदि अहंकार नहीं गया तो प्रज्ञा नहीं मिली. संतुष्टि यदि नहीं है तो अभी तृष्णा नहीं मिटी. जो मिले उसमें संतुष्टि हो, दूसरों को देखकर ईर्ष्या न जगे, ईर्ष्या व्याकुलता को ही जन्म देती है. संतोष धन के सामने कोई धन नहीं !