Sunday, December 15, 2013

लाल डिब्बा सुनहरा कलम


उसने एक पुस्तक में ये सुंदर बातें पढ़ीं और नोट कर लीं.
some Sai Teachings-
1. The aspirant must realize the absolute triviality and unimportance of the things of the world and of the next.
2. He must have an intense aspiration to get free from the bondage to the lower world.
3. He must turn his gaze inwards and look to his inner world.
4. Unless a man has turned away from wrong doings and composed himself so that his mind is at rest he can not get self-realization.
5. The candidate to the spiritual life must lead a life of truth, penance, insight and right conduct.
6. The would be diciple has to think and choose between good and the pleasant.
7. The aspirant must watch his mind from a distance.
8. He must get rid of the great d illusion “I am the body” or “i am the mind”
9. The aspirant  must have a Guru, If necessary God himself will come down and be your Guru.
10. The most important is the Lord’s grace.

बहुत दिन पहले जून को किसी ने यह पेन दिया था, लाल डिब्बे में काला व सुनहरा पेन, उसने इसे संभाल कर रख लिया, परसों देखा तो स्याही रिस रही थी, सबक सीखा, चीजों को इस्तेमाल भी करना चाहिए सिर्फ संभाल कर रख देने से ही वे ठीक नहीं रहतीं. पर मन की तो बात ही निराली है, सुबह James Hariott की किताब पढ़नी शरू की, पहला अध्याय था, why to meditate, बहुत से कारण बताये थे, पांच मिनट ध्यान करने बैठी तो मन पचास जगह दौड़ गया, कल रात को ही एक बार नींद खुली, मन में विचार तेज ट्रैफिक की तरह दौड़ रहे थे, एक के बाद एक, कहीं कोई विश्राम नहीं, कोई शांति नहीं, एक पल को रुकी, तो फिर शोर सुनाई देने लगा, सपना था या सचमुच का शोर मन से दिमाग तक जा रहा था. विचार थमते ही नहीं, बेवजह, बेमतलब के विचार... आज सुबह नन्हे को स्कूल भेजने तथा रोजमर्रा के कामों में गुजर गयी. उसके बाद पुनः ध्यान की असफल कोशिश के बाद लिख रही है, शायद सभी के साथ आरम्भ में ऐसा ही होता होगा. नियमित अभ्यास तो उसने कब का छोड़ दिया था. आज नन्हे का स्कूल में अंतिम दिन है छुट्टियों से पूर्व का, फिर दो माह का ग्रीष्मावकाश. मौसम बहुत गर्म है आजकल, उन्होंने ए सी चलाकर सोना शुरू किया है.

कल उसने गर्मी की शिकायत की और आज ईश्वर ने वर्षा भेज दी., कितनी तरह से मेहरबानी करता है सबका रक्षक, वह उन्हें प्यार करता है क्योंकि वे उसकी रचना हैं. यह ब्रह्मांड, चाँद, तारे, सूरज और धरती के असंख्य निवासी सभी उसे प्रिय हैं, वह भी चाहता होगा वे भी उसे प्यार करें, यूं उसे..और अभी-अभी लिखने का क्रम छूट गया, यह नया स्वीपर ठीक से काम नहीं करता है, न चाहते हुए भी उसे बार-बार टोकना पड़ता है.. अभी सुबह के नौ भी नहीं बजे हैं, नन्हा नहा धोकर नाश्ता करके ‘डिजनी ऑवर’ देखने बैठ गया है. कल शाम नैनी ने अपने बेटे को देखकर कुछ रूपये मंगवाए टेप रिकार्डर खरीदने के लिए, उन्होंने नहीं दिए शायद इसी बात पर वह चुपचुप सी  है, या उसका वहम् होगा क्योंकि इन्सान को वही दीखता है जो वह देखना चाहता है. आज सुबह भी ध्यान की कोशिश नाकाम रही.

सच कहे तो इस वक्त न मन को चैन है न तन को, अभी-अभी बाएं पैर के अंगूठे के नाखून को ठोकर लगा ली, ख्याल ही नहीं रहा कि ...बेख्याली की भी हद होती है पर यहाँ तो.. किचन में भिंडी अभी बनी ही नहीं थी कि कड़ाही उतार कर रख दी. नैनी ने बताया पर उसे शक है कहीं उसी ने.. कुछ देर पहले नन्हे पर झुंझलाई, शायद मौसम का असर है या अभी व्यायाम नहीं किया है. स्वीपर जल्दी आ गया, आजकल रोज ही जल्दी आ जाता है. कल रात बल्कि शाम से ही जून भी अपने ठीक मूड में नहीं थे, दो-तीन बार घर फोन किया पर छोटे भाई ने उनके पिता की वापसी की रिजर्वेशन नहीं करवाई, वे यात्रा पर जाने वाले हैं. मन है कि बस ही में नहीं आता chatter box की तरह हर वक्त कुछ न कुछ चलता ही रहता है. कल दिन में टीवी देखा, सुबह काफी काम भी था, पूरा दिन पलक झपकते बीत गया, आज उसे पढ़ाने भी जाना है, उससे पूर्व नन्हे को पढ़ाना है, उसकी छुटियाँ होने से सुबह का काम कुछ कम हुआ है पर उसको व्यस्त रखने में ज्यादा वक्त देना होता है. कल शाम उसकी एक सखी ने आज शाम आने की बात कही, पर शंकालु मन ने तुरंत कहा, देखना कुछ न कुछ दूसरा काम उसे आ जायेगा. भगवद गीता में पढ़ा था शंका ग्रस्त का विनाश होता है, उसका तोड़ है विश्वास, पर किसी के विश्वास को एक बार नहीं कई बार ठेस लग चुकी हो तो... तो भी करना होगा विश्वास, सात के गुने सत्तर बार विश्वास. ईश्वर यदि कोई है तो उस विश्वास को बल देगा.     




Friday, December 13, 2013

सेवेन इयर्स इन तिबत-Heinrich Harrer


अपनी पुरानी जगह पर (बगीचे में खुलने वाली बैठक की खिड़की के पास वाली कुर्सी पर) बैठकर आज हफ्तों बाद डायरी खोली है, पिछले तीन-चार दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. शनिवार को वे तिनसुकिया गये थे, शुक्र को भी छुट्टी थी, नन्ही मेहमान को यहाँ के मार्केट ले गये थे. इतवार को उसे OCS दिखाया, नाहरकटिया भी ले गये. चारों तरफ सड़कों की हालत बहुत बुरी हो गयी है, पहले सी खूबसूरती दिखाई नहीं देती. कल क्लब गये, छत से सारा क्लब दिखाई देता है, उसने भी पहली बार देखा. भांजी ने दो-तीन उपन्यास खत्म कर दिए हैं और अब रुमाल बना रही है, उसे अकेले बैठकर चुपचाप काम करना पसंद हैं. इस मामले में वह उसकी तरह है. seven years in Tibet by Heinrich Harrer उसने ट्रेन में खत्म की थी, रोचक किताब है, कल लाइब्रेरी से चार किताबें और लायी है.
आज घर पूरी तरह साफ लग रहा है. अभी आलमारियां सहेजनी शेष हैं, पर वह बाद में ही करेगी. कल उसकी पड़ोसिन ने पुनः पूछा, लेडीज क्लब के कार्यक्रम में भाग लेने का विचार है या नहीं, सच बात तो यह है कि जो गाना उन्होंने कोरस के लिए चुना है, उसे जरा भी पसंद नहीं है, पर लोकतंत्र में बहुमत की विजय होती है, अब सबने मिलकर पसंद किया है तो साथ खड़ा होना ही पड़ेगा. नन्हे का सभी विषयों का गृहकार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है, कल से उसने नई कक्षा में जाना शुरू किया है. कल वह भी हिंदी कक्षा के लिए गयी थी.

क्यों बेजार होने पर कलम का सहारा लेता है उसका मन, मन की पीड़ा हो या तन का दर्द, जैसे की सिर का दर्द तब भी लगता है ऐसा कुछ पन्नों पर उकरेगा कि...सारा दर्द भी बह जायेगा पर...ऐसा होता कहां है, कुछ पल के लिए ध्यान जरुर बंट जाता है और तब लगता है मुक्ति का क्षण करीब ही है. नन्हे का गृहकार्य कल रात साढ़े दस बजे तक चला. आज उसे ‘हिंदी समाचार’ पढ़ने हैं और कल English में एक स्पीच, उसे सबके सामने बोलने में ज्यादा झिझक नहीं होती.

कल नन्ही मेहमान को वापस जाना है, इतने दिन कितनी जल्दी बीत गये, परसों से दोपहर को उसकी कमी खलेगी, जब वे दोनों टीवी देखते हुए ‘पारले जी’ बिस्किटस् के साथ चाय पीते थे.  कल शाम को वही सहयात्री मित्र परिवार मिलने आया, इतने दिनों बाद मिलकर बहुत खुशी हुई, कल उन्होंने अपनी कुछ घरेलू बातें भी बतायीं, राजस्थान की यात्रा में उनसे दिन-रात का साथ था, निकटता स्वाभाविक है. उनकी एल्बम से कुछ फोटो जो जून ने नहीं खींचें थे, बनवाने हैं. उसने आखिर एक साड़ी में फाल लगाने का कार्य भी खत्म कर लिया है, यह सोचकर कि अपने हाथ से जो काम कर सकें उसे दूसरों पर नहीं डालना चाहिए. पिछले दिनों वापस आकर एक बार छोटे भाई से बात हुई थी, काफी अरसे से बीमार चल रहे छोटे फूफा जी का देहांत हो गया है, बुआ से मिले कई वर्ष हो गये हैं, इतना बड़ा आघात वह कैसे सह पाएंगी, ईश्वर ही उनकी सहायता करेगा. आज भी एक मृत्यु का समाचार मिला है, एक डॉक्टर जिनको ब्रेन कैंसर था, जिनसे पिछले वर्ष इसी महीने फोन पर बात हुई थी, जो अपनी नैनी के लिए चिंतित थे, उनकी कल स्थानीय अस्पताल में मृत्यु हो गयी. उनकी तकलीफों का अंत इसी में था. वे खुशनसीब हैं कि उन्हें ऐसी कोई तकलीफ नहीं है जिससे मुक्ति मृत्यु में ही नसीब होती हो.

फिर कुछ दिन का अन्तराल, रोज शाम को उसे कोरस के रिहर्सल के लिए जाना होता था, कल उनकी मीटिंग हो गयी, लेडीज क्लब की मासिक सभा जो इस बार उनके एरिया की तरफ से थी, पहली बार उसने कुछ कविताएँ पढ़ीं, कइयों ने तारीफ की, अच्छा लगा अपने पाठकों को स्वयं सुनाने का मौका मिला, पर उसे ज्यादा वक्त देना चाहिए, कल ढूँढने बैठी तो कोई अच्छी कविता मिल ही नहीं रही थी. परसों दो मित्रों के यहाँ जाना था, एक के यहाँ नॉनवेज खाने की गंध आ रही थी, दूसरे के यहाँ शेष मेहमान इतनी देर से आये कि तब तक भूख लग कर समाप्त ही हो गयी थी, बचपन में सुनी दादी के एक बात याद आई, घर से खाकर जाओ तभी बाहर मिलता है.  




Thursday, December 12, 2013

साबरमती आश्रम-बापू की यादें



आज वे साबरमती आश्रम देखने गये, बापू की आवाज भी सुनी और अहमदाबाद में उनके जीवन की घटनाओं पर आधारित एक चित्र प्रदर्शनी भी देखी. बापू के तीन बन्दर दरवाजे पर ही स्वागत करते दिखाई दिए. उनका कमरा, खडाऊं, छड़ी, चश्मा व अन्य सामान भी रखे हुए हैं पर राष्ट्रपिता का स्मारक जैसा होना चाहिए वैसी हालत में नहीं रखा है. इससे पूर्व वे एक अन्य आश्रम में भी गये, वहाँ विशाल मंडप में कुछ लोग ध्यान कर रहे थे, प्रवचन एक बजे शुरू होना था. बाद में वे G-C. रोड गये. विशाल शो रूम और बड़ी बड़ी दुकानें थीं. यहाँ ट्रैफिक बहुत है, आँखों में प्रदूषण से जलन होने लगी थी. यहाँ मिलें भी बहुत हैं, स्थान-स्थान पर चिमनियाँ नजर आ रही थीं. नन्हे के लिए एक जींस खरीदी और वे वापस आ गये.

आज इतवार है, घर पर पाव भाजी का नाश्ता बना है, सभी ने स्नान कर लिया है, गर्मी यहाँ बहुत है, अभी उन्हें तीन दिन और यहाँ रहना है, शाम को छत पर टहलने जाते हैं तो चारों ओर रोशनियों की लम्बी कतारें दिखाई देती हैं. पास ही हवाई अड्डे से उड़ान भरते व उतरते हवाई जहाजों की रोशनियाँ भी उनमें शामिल होती हैं.

आज उसने एक गुजराती साड़ी ली, शाम को वे इण्डिया कालोनी के बाजार में उनकी नैनी के लिए साड़ी लेने गये थे, वहाँ एक पारंपरिक चित्रों से सजी सुंदर सूती साड़ी बहुत अच्छी लगी, जून ने तुरंत हामी भर दी, सामान ज्यादा होते जाने की शिकायत भी नहीं की, साड़ी का प्रिंट वाकई बहुत सुंदर है. राजस्थान के बाद गुजरात की साड़ी और उससे पहले उसने लखनऊ से एक साड़ी मंगवाई थी, इस बार गर्मियों के स्वागत के लिए वह तैयार है. कल शाम को जून बच्चों को पास में घुमाने भी ले गये रेत में स्कूटर फंस गया और बच्चे रेत में गिर गये, बड़ी बिटिया को घटना का विवरण देते हुए बड़ा मजा आ रहा था. बाद में छत पर जाकर पुच्छल तारा देखा, और भोजन के बाद बाहर टहलने गये, सडक पर रोशनियाँ ही रोशनियाँ थीं, मगर उनके पीछे छिपा है प्रदूषण का कड़वा सच. कल उन्हें अक्षर धाम जाना है, जो यहाँ से २० किमी की दूरी पर है. दिन भर इधर-उधर की बातों के बीच ब्रह्मकुमारी आश्रम से लायी वह किताब पना अच्छा लगता है, सरल शब्दों में मन में उठने वाले प्रश्नों का समाधान इस पुस्तक में मिल जाता है. जिन्दगी का सार मूल्यों का निर्वाह करने में है न कि नकली चकाचौन्ध के पीछे भागने में.

जून आधे घंटे में उन्हें कार से अक्षर धाम ले गये. मन्दिर एक विशाल प्रांगण में स्थित है वहाँ चारों ओर सुंदर बाग़-बगीचे, बच्चों के झूले आदि हैं. मन्दिर में श्री स्वामी नरायन जी भगवान की, जो गुजरात के एक सन्त थे, अनेक मूर्तियाँ हैं. मुख्य मूर्ति स्वर्ण के समान चमक रही थी. एक प्रदर्शनी भी थी. वहाँ से वे एक पार्क में गये, लौट कर भोजन किया. शाम को वह पास ही सब्जी लेने गयी, देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ सभी महिलाएं ही सब्जी खरीद रही थीं, गुजरात में महिलाओं की स्थिति बहुत सशक्त है. कल उन्हें दिल्ली की ट्रेन पकडनी है.

आज बहुत दिनों बाद कुछ लिख रही है. पिछले हफ्ते वे अहमदाबाद में थे, उसके बाद दिल्ली की वापसी यात्रा, फिर देहरादून, घर, वापस गोहाटी, पहली बार उन्होंने इतनी सारी जगहें एक साथ देखीं. कल सुबह ही वे घर लौटे हैं, पड़ोसिन ने नाश्ते पर बुलाया, और एक सखी ने दोपहर को खाने पर, दूसरी सखी ने रात्रि के भोजन पर आमंत्रित किया तो इस बार साथ आयी भांजी को भी सुखद आश्चर्य हुआ. अच्छा ल्ग्यता है यह सोचकर कि वे अकेले नहीं हैं. इस वक्त दोपहर के तीन बजे हैं, बच्चे टीवी देख रहे हैं. उसने सोचा, भांजी को यहाँ उदासी तो महसूस नहीं हो रही है, पहली बार घर से दूर रहने पर भी वह सामान्य है, एक तरह से अच्छा ही है, सबसे जुड़े रहकर भी सबसे अलग, विरक्त ! घर में सफाई का बहुत काम शेष है, जो धीरे-धीरे ही पूरा होगा. आज सुबह अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौटने का प्रयास किया, हफ्तों बाद आसन ठीक से नहीं कर पायी. यात्रा की थोड़ी सी थकान शायद अभी तक शेष है.




Wednesday, December 11, 2013

उदय पुर - झीलों का शहर


उदयपुर में यह उनकी दूसरी सुबह है, मौसम अच्छा है और कल की वर्षा के कारण हवा में ठंडक है. कल दोपहर वे चित्तौडगढ़ देखने गये जो यहाँ से १२५ किमी दूर है. बूढ़ा बस ड्राइवर बड़ी सावधानी से गाड़ी चला रहा था तथा गाइड का काम भी कर रहा था. वहाँ राजा रतन सिंह तथा रानी पद्मिनी का महल देखा. जय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, राणा कुम्भा पैलैस, मीरा तथा कृष्ण के मन्दिर देखे. एक संग्रहालय भी था जो वे देख नहीं पाए. काली माता का एक ८०० साल पुराना मन्दिर भी वहाँ था, जिसका सहन बहुत बड़ा था. कुछ जैन मन्दिर भी थे. वे जय स्तम्भ के  ऊपर तक चढ़े. पास में ही एक विशाल पीपल का वृक्ष था जिस पर सैकड़ों श्वेत लंगूर थे, छोटे, बड़े, मोटे, पतले हर तरह के लंगूर बेहद आराम से वहाँ झूल रहे थे. वापसी की यात्रा में एक अद्भुत  दृश्य देखने को मिला, उनकी सड़क के किनारे एक खेत से उगता हुआ इंद्र धनुष दूसरी ओर के खेत को छू रहा था, मानो स्वागत के लिए कोई द्वार हो. एक अन्य हल्का इन्द्रधनुष उससे थोड़ा आगे भी था. दो को एक साथ देखने का यह पहला अनुभव था, उन्होंने फोटोग्राफी भी की. एक जगह चाय पीने रुके तो कुछ पनिहारिनें पानी भर रही थीं, एक बहुत सुंदर थी और सिर पर दो मटके (एक सुनहरा, एक रुपहला) एक के ऊपर एक रखे तथा एक काली मटकी हाथ में लिए आराम से चल रही थी. होटल पहुंचते पहुंचते पौने न हो गये थे, ‘सैलाब’ का थोड़ा सा भाग देखा, पर नायक-नायिका को रोते हुए देखना अच्छा नहीं लग रहा था.

कल रात्रि भी वर्षा हुई पर इस वक्त आकाश नीला है. सुबह के सात बजे हैं, धूप खिली है. शाम सात बजे की ट्रेन से उन्हें अहमदाबाद जाना है, उससे पूर्व उदयपुर के दर्शनीय स्थानों पर जाना है. उसके आसपास की कुछ महत्वपूर्ण स्थान उन्होंने कल देखे, आठ बजे रवाना होकर ग्यारह बज रणकपुर के मन्दिर पहुंच गये, एक विशाल प्रांगण में बना २९ मन्दिरों का समूह, संगमरमर का यह विशाल मंदिर है, जिसमें पत्थर पर अद्भुत कलाकृतियाँ उकेरी हुई हैं. मन्दिर ट्रस्ट की ओर से ही भोजन की भी व्यवस्था थी, अल्प मूल्य में इतना स्वादिष्ट प्रसाद जैसा भोजन पाकर सभी हर्षित हुए. वहाँ से कंकरोलीराज समंद गये, जहाँ द्वारकाधीश का मन्दिर तथा एक विशाल सुंदर झील है, झील में हजारों की संख्या में मछलियाँ थीं, जिनको उन्होंने आटे की गोलियां खिलायीं. चतुर्भुज जी का एक मन्दिर एक गली में से होकर था, जहाँ स्वर्ण व चांदी का बहुत प्रयोग हुआ है. तथा छत पर शीशा लगा था व मीनाकारी भी थी. इसी तरह नाथ द्वारा मन्दिर तथा एकलिंगी मन्दिर भी देखे, वर्षा बहुत तेज हो रही थी सो भीगते-भीगते नाथद्वारा जी के दर्शन किये. काले पत्थर की सजी हुई मूर्ति थी, सोने-चांदी की चक्की, मीरा माँ का मन्दिर और घी का कुंड आदि भी गाइड ने दिखाए. एक लिंगी जी का मन्दिर ८वी शताब्दी का है. चांदी के दरवाजे और सोने की प्रतिमा, कहानियों में पढ़ी बातें सच में देखने को मिलीं. टैक्सी की हालत अच्छी नहीं थी, एक-दो बार जून को धक्का भी लगाना पड़ा और एक बार तो सडक से छींटे भी अंदर आये, इन दिक्कतों को छोडकर यात्रा अच्छी रही.

अहमदाबाद- आज सुबह सात बजे वे यहाँ पहुंच गये थे, कल सुबह नौ बजे उदयपुर दर्शन के लिए निकले, भारतीय लोक कला मंडल में कठपुतली नृत्य देखा. और राज्य की विभिन्न कलाओं के चित्र आदि भी. फतेह सागर लेक में मोटरबोट से नेहरु स्मारक देखने गये. सिटी पैलेस में गाइड ने महाराणा प्रताप के हल्दी घाटी युद्ध के बारे में विस्तार से बताया, शीशे पर पच्चीकारी का काम, मोती महल तथा दरबार दर्शनीय थे. चौथी मंजिल से पिछौला झील में जल महल देखा, जिसमें आजकल एक पांच सितारा होटल खुल गया है. वर्मा उद्यान तथा गुलाब बाग के दर्शन बाहर से ही कर लिए, धूप बहुत तेज थी. सबसे अच्छा स्थान लगा प्रताप स्मारक जहां महाराणा की एक विशाल प्रतिमा है, उद्यान है, एक धूप घड़ी है और उनके सेनापति की एक मूर्ति भी थी. शाम के साढ़े पांच बजे उन्होंने होटल छोड़ दिया मित्रों से विदा लेने का वक्त आ गया था, सहयात्री परिवार का गन्तव्य अब उनका घर था और जून अपनी बहन से मिलने जा रहे थे. बिछड़ते समय दोनों परिवारों का मन भारी हो गया था. उनकी ट्रेन डेढ़ घंटा लेट थी, रात आराम से गुजरी, सुबह स्टेशन पर वे लोग लेने आये थे. घर काफी खुला-खुला सा है, हाइवे पर है इसलिए शोर ज्यादा सुनाई देता है.  




माउन्ट आबू - एक सुंदर पहाड़ी स्थल


सुबह के नौ बजे हैं, नाश्ता लेकर वह होटल के अपने कमरे में आ गयी है., जून नन्हे को लेकर ‘हेयर कट’ कराने गये हैं, आज दोपहर को उन्हें माउंट आबू के लिए प्रस्थान करना है. बस की यात्रा है और जोधपुर में बस बदलनी भी होगी जो कल सुबह चार बजे गन्तव्य पर पहुंचा भी देगी. कल शाम उन्होंने स्वेटर्स भी खरीदे, नन्हे की स्कूल ड्रेस के, माउन्ट आबू में ठंड भी होगी. रात्रि ने सारी थका न को समेट कर मन को ताजा कर दिया है, जो उत्साह से भरा है यह सोचकर कि माउन्ट आबू में क्या-क्या देखने को मिलेगा.

माउन्ट आबू-होटल राणा प्रताप सुबह के ११.४० हुये हैं. – आज उसे घर की बहुत याद आ रही है, कल दोपहर दो बजे उनकी बस जैसलमेर से जोधपुर के लिए चली थी, मार्ग में कई सुंदर मोर देखे जो सड़क के किनारे तक आ जाते थे. किन्तु RTDC की बस में सफर करने के बाद प्राइवेट बस का अनुभव अच्छा नहीं रहा. पहली बस से उतर कर प्रदूषण भरी सडकों पर चलकर वे काफी हाउस गये, दोपहर को उसने केवल ककड़ी खायी थी, खाली पेट काफी पी ली, शायद उसी का असर रहा हो, रात दो बजे जोधपुर से माउन्ट आबू आने वाली बस में उसकी तबियत बहुत बिगड़ गयी थी, अभी तक उसका असर बाकी है, बाहर का खाना, आराम की कमी, धूल-धुआं और बस के यात्रियों की हुड़दंग बाजी सभी का मिला-जुला असर रहा होगा. खैर, जो भी कारण रहा हो, असुविधा सभी को हुई है. जून उसे बाहर ले गये और कुछ देर बाद तबियत संभल गयी. सुबह बस स्टैंड के पास ही में एक होटल मिल गया और आते ही वे सब सो गये. सारी रात शोर के कारण वह एक मिनट भी नहीं सो पायी थी. उसने सोचा, बस की यात्रा में स्वस्थ रहे ऐसा प्रयास करना है, स्वस्थ मन भी स्वस्थ तन में निवास करता है, इतने सारे मन्दिरों को देखने के बाद मन में पवित्र भाव जागृत होने चाहिए, ईश्वर उसकी सहायता करेंगे जैसे कल रात की और उनकी यात्रा यूँ ही जारी रहेगी.

विश्राम करने के बाद कल दोपहर वे नक्की ताल व सूर्यास्त देखने निकले. झील बहुत बड़ी है और चारों ओर से चट्टानों से घिरी है, बीच-बीच में चट्टानें थीं जिनपर पेड़ उगे थे, एक किनारे पर टोड की शक्ल की एक चट्टान उभरी हुई थी. उन्होंने नौका यात्रा भी की, पर तन व मन दोनों स्वस्थ न हों तो दृश्य कितने भी सुन्दर क्यों न हों मन पर वह असर नहीं छोड़ पाते. वहाँ से वे जीप द्वारा हनीमून पॉइंट गये, घाटी के दृश्य ऐसे लग रहे थे जैसे हवाई जहाज से देख रहे हों. एक टेलिस्कोप से नन्हे ने दूर नीचे एक मन्दिर व एक गाँव देखा. sunset point पर बहुत से लोगों के बैठने की जगह थी, एक घंटा इंतजार करने के बाद जब सूर्यास्त का समय आया तो बादलों के पीछे छिप गया वह, और तीसरी बार भी वे सूर्यास्त नहीं देख पाए. वापस आकर होटल में खाना मंगाया पर खाना बेहद मिर्च-मसाले वाला था. नन्हे की भी उसे फ़िक्र है, घर पर सादा भोजन खाने का उसे अभ्यास है.

आज माउन्ट आबू में उनका अंतिम व दूसरा दिन है, कल से बसों की हड़ताल शुरू होने वाली है इसलिए उन्हें आज ही निकलना है. शाम आठ बजे तक वे उदयपुर पहुंच जायेंगे.

उदयपुर – अप्रैल महीने का प्रथम दिन, यहाँ मौसम काफी गर्म है. माउन्ट आबू में कल सुबह वे प्रजापति ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय देखने गये, वहाँ दस मिनट का एक लेजर शो देखा तथा दस मिनट का एक सम्भाषण भी सुना. उसने एक पुस्तक भी खरीदी. उनके संग्रहालय में सुंदर विशाल मूर्तियाँ थीं, और केंद्र में एक विशाल हॉल था जिसमें ३५०० व्यक्तियों के बैठने की सुविधा थी, पर जिसमें एक भी स्तम्भ नहीं था. पूरा वातावरण स्वच्छ, पवित्र व सुंदर था, गमले फूलों से भरे हुए थे. यहाँ एक शांति पार्क भी है जो बाहर से देखा. उसके स्वास्थ्य पर भी इन सभी का अच्छा असर पड़ा. इसके बाद वे अर्बुदा देवी का मन्दिर देखने गये जहाँ ३३८ सीढ़ियाँ चढनी थीं, मन्दिर एक गुफा में था, दोनों तरफ विशाल चट्टानें और बीच में मार्बल का फर्श, यह अन्य मन्दिरों से अलग लगा. तत्पश्चात वे गुरु शिखर देखने गये जहाँ १८० सीढ़ियाँ  चढनी पड़ीं, आधे रस्ते में वे सब थक चुके थे सो वापस लौट आये. लौटकर अचलगढ़ गये गये जहाँ भगवान शिव के दाहिने पैर के अंगूठे के नाख़ून की पूजा की जाती है. मन्दिर के बाहर नंदी की विशाल प्रतिमा थी, जिसमें अन्य धातुओं के आलावा ८०० किलो स्वर्ण का प्रयोग भी हुआ है. उनका अंतिम पड़ाव था देलवाड़ा के पांच मन्दिर, जो पत्थर पर महीन काम के लिए विश्व विख्यात हैं. मुख्य मन्दिर वस्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाइयों ने बनवाया है, पाँचों मन्दिर बहुत सुंदर हैं. फोटो खींचना वर्जित है, उन्होंने एक गाइड खरीदी जिसमें सजीव मूर्तियों के चित्र हैं. मन्दिर देखने के बाद वे बस स्टैंड आ गये जहाँ से उदयपुर आने के लिए बस पकड़ी और रात सवा आठ बजे यहाँ पहुंच गये.  






Monday, December 9, 2013

जैसलमेर का किला


जैसलमेर, सरोज पैलेस – कल सुबह दस बजे वे दर्शनीय स्थान देखने निकले थे. सर्वप्रथम जोधपुर का किला देखने गये, जो लगभग ५०० वर्ष पुराना है, शानदार किले की दीवारों, छतों और बड़े-बड़े दालानों में सुंदर काम किया गया है. तोपें, गुम्बद और छतरियां दर्शनीय हैं, किले की विशालता का अनुमान उसका पूरे शहर से दिखाई दे सकने से लगाया जा सकता है. किले की छत से पुराना जोधपुर शहर नीले सफेद मकानों से बहुत सुंदर लग रहा था. संग्रहालय में घोड़े, पालकियां और हथियार थे, पगड़ियाँ, संगीत यंत्र, अनूठी पेंटिग्स, और पुराने ताले सभी कुछ देखने योग्य था. बाद में वे जसवंत तड़ा देखने गये जो सफेद संगमरमर का बना है, उमेद पैलस में १९४३ में बना संग्रहालय है, जिसमें घड़ियों व तस्वीरों का विशाल संग्रह है. आधे हिस्से को पांच सितारा होटल में बदल दिया गया है. जोधपुर के राजा की ३८वीं पीढ़ी अब भी वहाँ रहती है. शाम को वे नेहरु उद्यान देखने गये और रात ११ बजे की ट्रेन से चलकर वे सुबह सवा छह बजे जैसलमर  पहुंच गये, कल जोधपुर में गर्मी बहुत थी. आज यहाँ मौसम अच्छा है, बदली बनी हुई है, सो गर्मी कम है. आज वे रेतीले मैदान देखने जायेंगे.

आज दिन भर मौसम मेहरबान रहा, सो वे राजस्थान की उस गर्मी से बच गये जिसका जिक्र कई बार सुना था. होटल हवादार है और स्वच्छ भी. शाम चार बजे वे सैम सैंड ड्युन्स देखने जीप में रवाना हुए. रास्ते में लौद्रवा मन्दिर देखा जो एक हजार साल पुराने मन्दिर का जीर्णोद्धार करके बनाया गया है. रानी मूमल की कथा यहाँ से जुडी है. उससे पहले अमर सागर में एक जैन मन्दिर देखा जिसका जाली का काम अनोखा है. आज भी हमारे देश में ऐसे अद्भुत कारीगर हैं जो पत्थर में जान डाल सकते हैं. आगे जाकर एक उजड़ा हुआ गाँव मिला जहाँ के निवासी पालीवाल राजा के डर से सदियों पूर्व रातों-रात गाँव छोड़कर पलायन कर गये थे. यहाँ से ४५ किमी दूर रेतीले मैदान शुरू हो गये, जहाँ उन्होंने ऊंट की सवारी भी की. रेत के सुंदर ऊँचे-नीचे पहाड़ों पर जो हवा से बनते बिगड़ते थे ऊंट पर सवार होकर जाना एक अनोखा अनुभव था. हवा से रेत पर लहरें पैदा हो रही थीं, और नदियों के किनारे देखी चांदी सी रेत के बजाय यहाँ सुनहरी रेत थी. तभी इस स्थान को ( पूरे जैसलमेर में पीले पत्थर के मकान बने हैं ) गोल्डेन लैंड कहते हैं. रास्ते में विदेशी यात्री भी दिखे जो ऊंट पर सवारी करते हैं और तम्बुओं में रहते हैं.


जैसलमेर में आज उनकी दूसरी शाम है. कुछ देर पूर्व ही वे sunset point से आये हैं. बादलों के कारण सूर्यास्त तो नहीं देख सके पर उस जगह से किले का दृश्य बहुत भव्य प्रतीत हो रहा था. वे गजरूप सागर नामक एक स्थान देखने गये जहाँ देवी का एक मन्दिर है. बड़ा बाग़ में कई छतरियां देखीं जो अब टूटने के कगार पर हैं. सुबह किला देखने गये थे, जो यहाँ से निकट ही है. किले के प्रथम द्वार पर एक गाइड मिल गया जिसने १२वीं शताब्दी में बने राजा जैसल के, भारत के दूसरे सबसे बड़े किले के बारे में कई जानकारियां दीं. मन्दिर में बने सात जैन मन्दिरों में पत्थर पर बनी मूर्तियाँ तथा अन्य कलाकृतियाँ दर्शनीय हैं. किले में लगभग ४००० हजार लोग रहते हैं. काफी बड़ा भाग टूट गया है किन्तु जो भी शेष है, भव्य है. वहाँ से निकल कर वे गदीसर झील देखने गये, जहाँ एक कृत्रिम झील में राजा के निवास के लिए एक छोटा सा कमरा है. आस-पास कई बुर्ज हैं और द्वार पर सत्य नारायण का एक मन्दिर है, एक संग्रहालय भी था पर वे बहुत थक गये थे सो नहीं देखा. आटोरिक्शा करके पटवां हवेली गये जो एक सेठ ने अपने पांच बेटों के लिए बनवाई थी. हवेली के बाहर एक साढ़े चार फीट लम्बी मूंछ वाले आदमी के साथ बच्चों ने तस्वीर खिंचवायीं. नथमल हवेली बाहर से देखी और बाजार होते हुए वापस आ गये. कुछ और खरीदारी भी की. उसने नीले हरे रंग का एक गाउन खरीदा और बड़ी बहन के लिए एक वाल हैंगिंग . सामान बढ़ता ही जा रहा है और जून की झुंझलाहट भी. अभी उन्हें दो हफ्ते और सफर में रहना है. 

Sunday, December 8, 2013

उमेद पैलेस - जोधपुर की शान


आज होली है और उनकी यात्रा में आराम का दिन, कल सुबह नौ बजे वे होटल से निकले, आटो ड्राइवर एक खुशदिल आदमी था, वह समय पर दर्शनीय स्थलों पर जाने के लिए आ गया. सबसे पहले एक कैफे में ले गया, कॉफी के एक बढ़िया कप के बाद तन व मन दोनों  यात्रा के लिए तैयार थे. फिर वे ‘राज मन्दिर’ पिक्चर हॉल गये जो एशिया का दूसरा सबसे अच्छा हॉल है जहाँ वे एक फिल्म भी देखने वाले हैं. इसके बाद पिंक सिटी में प्रवेश किया और सर्वप्रथम ‘हवा महल’ की अद्भुत वास्तुकला का अनुभव लिया. वहाँ दुनिया की विशालतम धूप घड़ी भी देखी. अगला पड़ाव था, सिटी पैलेस जहाँ वस्त्रालय, शस्त्रालय तथा कला दीर्घा दखने योग्य हैं. हाथी द्वार तथा मयूर द्वार बेहद आकर्षक हैं. भोजन के लिए ड्राइवर उन्हें खंडेलवाल होटल ले गया, स्वादिष्ट भोजन मिला वह भी बिना मिर्च का.

आम्बेर महल के रास्ते में जल महल देखा जो चारों ओर से पहाड़ों से घिरी झील में स्थित है., अब वहाँ जाना मना है. यह महल जमीन से ५०० फीट की ऊँचाई पर एक पहाड़ पर स्थित है, वहाँ शीशमहल देखा जहाँ दिन में भी तारे दिखाई दिए. महल कला का अनूठा नमूना है, छतों पर सुंदर नक्काशी की गयी है. राजस्थान पर्यटक विभाग के हस्त कला केंद्र में ब्लॉक प्रिंटिंग देखी. वापसी में राजस्थान कॉटेज उद्योग भी गये जहाँ से कानों के बुँदे तथा दो ऊंट लिए जो पंच धातु के बने हुए हैं. वहाँ जाने से पूर्व गोविन्द मन्दिर तथा नटवर मन्दिर देखने गये जहाँ एक सुंदर कनक उद्यान देखा, कनक उद्यान में अनेकों फौवारे तथा छतरियां थीं, वहाँ कई फिल्मों की शूटिंग हुई है. किसी ने कहा, जूही चावला और आमिर खान का गीत घूँघट की ओट से.... वहीं फिल्माया गया था. जयपुर चिड़ियाघर तथा केन्द्रीय अजायबघर भी देखा. चिड़ियाघर में घुसते ही बाघ दिखा, तथा अनेकों मगरमच्छ एक साथ देखे. जयपुर एक साफ-सुथरी अच्छी जगह है. यहाँ के लोग भी काफी अच्छे हैं, शांत व सहयोग करने वाले, उन्हें वहाँ घूमते समय कोई परेशानी नहीं हुई. कल सुबह उन्हें जोधपुर के लिए निकलना है.  

जोधपुर गेस्ट हाउस - कल सुबह वे जयपुर से साढ़े सात बजे की डीलक्स बस से रवाना हुए और यहाँ दोपहर सवा तीन बजे पहुंच गये. रास्ते में कैक्टस के बड़े-बड़े वृक्षों पर लाल रंग के फूल खिले थे, चारों ओर थी धूल और सूखे पहाड़ व चट्टानें, जोधपुर शहर किन्तु स्वच्छ, आकर्षक और हरा-भरा भी है. यात्रा आरामदेह थी पर Midway का भोजन उतना अच्छा नहीं था. मार्ग में एक वैन-ट्रक दुर्घटना देखी, गाड़ी की हालत बहुत बुरी थी पर वह गैराज में जाकर ठीक कराई जा सकती है पर दुनिया में कोई ऐसा गैराज नहीं जो उस व्यक्ति को ठीक कर सके जो सड़क किनारे अपनों से दूर धूल में लिटाया हुआ था.

यहाँ इस गेस्ट हाउस में जो लोग इन कमरों में रह रहे थे वे बाहर गये हैं सो एक रात्रि  के लिए उन्हें यहाँ स्थान मिल गया है. शाम को वे बाजार भी गये, जहाँ से राजस्थानी चादरें, रजाई व एक सूती साड़ी भी ली, जिन पर अनेक रंगों से कलात्मक चित्र बने हुए हैं. वापस आकर वे टीवी पर ‘सैलाब’ देख रहे थे कि एक पुराने परिचित मिलने आ गये, बातचीत से जाहिर हुआ, उनकी शिकायतें करने की आदत अभी तक वैसी ही है. दुनिया जहाँ से उनको शिकायते हैं, मगर बहुत अनुग्रह से उन्होंने अपने घर बुलाया है, आज वे जायेंगे. आज दस बजे उन्हें भ्रमण के लिए निकलना है, उमेद पैलेस, मन्दौर गार्डन और जोधपुर किला आदि देखने हैं. आज ही रात्रि ग्यारह बजे की ट्रेन से वे जैसलमेर जा रहे हैं, जब तक वे वहाँ पहुंचेगे प्रातः की लालिमा आकाश में बिखर चुकी होगी.