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Tuesday, January 23, 2018

पनामिक के गर्म चश्मे

कल शाम वे ऊंट सफारी के लिए तैयार हुए. कुछ ही दूरी पर वह स्थान था. रेतीले मैदान जो मार्ग में दूर से लुभा रहे थे अब निकट से देख पाए. लगभग २५-३० सजे हुए ऊंट थे जिनपर लाल अथवा गहरे रंगों की गद्दियाँ लगी थीं. दूर एक लाल झंडा लगा था जहाँ तक जाकर ऊंट चालक वापस मुड़ते हैं और एक उचित स्थान देखकर तस्वीरें उतारते हैं. ऊंट चालक ने हर कोण से चार-पांच तस्वीरें लीं जैसे कोई प्रशिक्षित फोटोग्राफर हो. वहाँ से लौटकर वे उस तम्बू में गये जहाँ से संगीत की ध्वनि आ रही थी. विभिन्न पोशाकों में नृत्यांगनाओं ने सहज मुद्राओं में स्वयं गीत गाकर नृत्य दिखाया. अनेक पर्यटकों के साथ उन्होंने भी लद्दाखी लोक नृत्य का आनंद लिया. उनके बोल मधुर थे और समझ में न आने पर भी एक पवित्रता का अनुभव करा रहे थे. उनके हाथों का संचालन ही मुख्य था, शरीर सीधा ही रहता है तथा नृत्य धीमी गति से चलता है. कुछ समय वहाँ बिताया और एक लद्दाखी पोषाक पहन कर तस्वीर भी खिंचाई. 

बाहर निकले तो देखा रेतीले मैदान में एक तरफ भेड़ों-बकरियों का एक रेवड़ हरी-घास व कांटेदार वृक्षों के पत्ते खा रहा था. लगभग दो घंटे वहाँ बिताकर लौट आये, कुछ देर के विश्राम के बाद साढ़े सात बजे भोजन कक्ष में पहुंचे. टमाटर सूप और पापड़ से शुरुआत की, भोजन में मुगल नामका एक स्थानीय साग भी था जो वहाँ काम करने वाली महिला ने अपने घर में बिना किसी रासायनिक खाद के बनाया था यानि ऑर्गैनिक. अरहर की घुली हुई दाल, पनीर-मटर, पास्ता तथा फुल्के... इतनी दूरस्थ जगह में इतनी कठिन परिस्थितियों में इतना स्वादिष्ट भोजन मिल सकता है उन्हें उम्मीद नहीं थी. रात को सोये तो नदी की कलकल धारा जैसे लोरी सुना रही हो. हल्की बूंदा-बांदी भी शुरू हो गयी थी, जो तम्बू की छत पर गिरती हुई टपटप आवाज से असम की याद ले आई. 

 सुबह उठे थे तो जल्दी से जैकेट-टोपी आदि पहनकर बाहर निकले थे, पंछियों की मधुर ध्वनियाँ आकर्षित कर रही थीं. पीले व काले पंखों वाली एक चिड़िया यहाँ बहुतायत से मिलती है जैसे और जगह गौरैया. आकार में उससे कुछ बड़ी है. उसकी कई तस्वीरें लीं, यहाँ मैगपाई नहीं दिखा पर काले रंग का पीली चोंच वाला एक बड़ा पक्षी था. उस जल से जो स्फटिक के समान स्वच्छ थासीधा ग्लेशियर से आ रहा था और सूर्य की किरणों से गर्म किया गया था, नहाकर वे ताजगी का अनुभव कर रहे थे. नाश्ता भी उतना ही लाजवाब था, लाल तरबूज, कॉर्न फ्लेक्स, उपमा, पनीर व आलू परांठा तथा छोले, चाय या काफ़ी. 

 साढ़े आठ बजे तैयार होकर गाड़ी में बैठ चुके थे पनामिक जाने के लिए, जहाँ गर्म पानी के चश्मे हैं. रस्ते में सूमुर गाँव भी आया जहाँ वापसी में उन्हें रुकना था. पनामिक का ३५ किमी का रास्ता बहुत मनोरम है. रेतीले बालू भरे तट तथा बड़े-बड़े पत्थर, ऊंचे नंगे पहाड़ तो कभी हरे-भरे खेत. नुब्रा नदी भी साथ-साथ बह रही थी. एक घंटे की यात्रा के बाद वे उस स्थान पर पहुंचे. तीन विभिन्न स्रोतों से पानी निकल रहा था, भाप भी नजर आ रही थी, छूकर देखना चाहा पर तापमान काफी अधिक था, कुछ लोग उसमें पैकेट वाला भोजन भी पका रहे थे. कई जगह गुजराती पर्यटक मिले थे, यहाँ भी उनकी भाषा से ऐसा लगा. दूर घाटी में सरसों के पीले खेत भी नजर आये. किसी बीते समय जब बाहरी दुनिया से लद्दाख का कोई संपर्क नहीं था, यहाँ के निवासी जौ और सरसों से काम चलाते थे, भेड़ों की ऊन से बने वस्त्र स्वयं ही बुनते थे जिन्हें पट्टू कहते हैं. 

 पनामिक से लौटकर वे सूमुर गाँव के गोम्पा पहुंचे जहाँ कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता. गोम्पा अपेक्षाकृत बाहर से आधुनिक लगता है तथा सेब व खुबानी आदि फलों के कई वृक्ष अहाते में लगे हैं.  कुछ तस्वीरें लीं, फिर मुख्य कक्ष में गये जहाँ भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति थी तथा तारा की दो मूर्तियाँ थीं. मंजुश्री तथा वज्रपाणि की भी एक-एक मूर्ति थी. बौद्ध धर्म के बारे में कुछ जानकारी वहाँ के लामा ने दी जो एक पुस्तक पढ़ रहे थे पर प्रश्न पूछने पर सहजता से जवाब देने लगे. कक्ष से बाहर निकले तो एक वृद्ध लामा आते हुए दिखाई दिए, ‘जूले’ कहने पर मुस्कुरा कर उन्होंने भी जवाब दिया. शेष हर तरफ एक गहन शांति छायी हुई मिली. सूमुर गाँव से वे चले तो सीधे खरदुम गाँव में रुके जहाँ पुनः पहले दिन की तरह चाय मिली. आज यात्री बहुत ज्यादा थे सो चाय में दालचीनी का स्वाद नहीं आया तथा चीनी भी अधिक थी. एक साथ बीसियों लोगों के लिए चाय बनाना कोई आसान काम तो नहीं. लोग मैगी का आर्डर भी दे रहे थे, हर ब्रांड के नूडल्स को मैगी ही कहा जाता है यहाँ. खर्दुन्गला दर्रे तक वे पहुंचे तो दोपहर के दो बजे थे. इस बार  गाड़ी में बैठ-बैठे ही कुछ तस्वीरें लीं तथा वापसी की यात्रा का आरम्भ किया. 


नदियाँ, पहाड़, हिमपात  तथा वर्षा के दृश्य समेटे वापस पौने चार बजे लेह लौटे. खर्दुन्गला से पहले ही हिमपात शुरु हो गया था. बर्फ के सूक्ष्म कण कार की जरा सी खुली खिड़की के शीशे से भी अंदर आ रहे थे. कितने ही मोटरसाइकिल चालक दिखे जो इसी खराब मौसम में फिसलन भरी सड़क पर अपनी जान को जोखिम में डाल रहे थे. उनको देखकर उनकी बहादुरी पर रश्क भी होता था और करुणा भी. भगवान बुध के इस पावन स्थल पर सभी एक-दूसरे के लिए सद्भावना से भरे नजर आए. यहाँ कोई ऊंची आवाज में बात करता नजर नहीं आया, लोग विनम्र हैं, तथा धर्म उनके लिए जीवन का अभिन्न अंग है, धर्म तथा जीवन दो अलग-अलग बातें नहीं हैं. 

Monday, December 9, 2013

जैसलमेर का किला


जैसलमेर, सरोज पैलेस – कल सुबह दस बजे वे दर्शनीय स्थान देखने निकले थे. सर्वप्रथम जोधपुर का किला देखने गये, जो लगभग ५०० वर्ष पुराना है, शानदार किले की दीवारों, छतों और बड़े-बड़े दालानों में सुंदर काम किया गया है. तोपें, गुम्बद और छतरियां दर्शनीय हैं, किले की विशालता का अनुमान उसका पूरे शहर से दिखाई दे सकने से लगाया जा सकता है. किले की छत से पुराना जोधपुर शहर नीले सफेद मकानों से बहुत सुंदर लग रहा था. संग्रहालय में घोड़े, पालकियां और हथियार थे, पगड़ियाँ, संगीत यंत्र, अनूठी पेंटिग्स, और पुराने ताले सभी कुछ देखने योग्य था. बाद में वे जसवंत तड़ा देखने गये जो सफेद संगमरमर का बना है, उमेद पैलस में १९४३ में बना संग्रहालय है, जिसमें घड़ियों व तस्वीरों का विशाल संग्रह है. आधे हिस्से को पांच सितारा होटल में बदल दिया गया है. जोधपुर के राजा की ३८वीं पीढ़ी अब भी वहाँ रहती है. शाम को वे नेहरु उद्यान देखने गये और रात ११ बजे की ट्रेन से चलकर वे सुबह सवा छह बजे जैसलमर  पहुंच गये, कल जोधपुर में गर्मी बहुत थी. आज यहाँ मौसम अच्छा है, बदली बनी हुई है, सो गर्मी कम है. आज वे रेतीले मैदान देखने जायेंगे.

आज दिन भर मौसम मेहरबान रहा, सो वे राजस्थान की उस गर्मी से बच गये जिसका जिक्र कई बार सुना था. होटल हवादार है और स्वच्छ भी. शाम चार बजे वे सैम सैंड ड्युन्स देखने जीप में रवाना हुए. रास्ते में लौद्रवा मन्दिर देखा जो एक हजार साल पुराने मन्दिर का जीर्णोद्धार करके बनाया गया है. रानी मूमल की कथा यहाँ से जुडी है. उससे पहले अमर सागर में एक जैन मन्दिर देखा जिसका जाली का काम अनोखा है. आज भी हमारे देश में ऐसे अद्भुत कारीगर हैं जो पत्थर में जान डाल सकते हैं. आगे जाकर एक उजड़ा हुआ गाँव मिला जहाँ के निवासी पालीवाल राजा के डर से सदियों पूर्व रातों-रात गाँव छोड़कर पलायन कर गये थे. यहाँ से ४५ किमी दूर रेतीले मैदान शुरू हो गये, जहाँ उन्होंने ऊंट की सवारी भी की. रेत के सुंदर ऊँचे-नीचे पहाड़ों पर जो हवा से बनते बिगड़ते थे ऊंट पर सवार होकर जाना एक अनोखा अनुभव था. हवा से रेत पर लहरें पैदा हो रही थीं, और नदियों के किनारे देखी चांदी सी रेत के बजाय यहाँ सुनहरी रेत थी. तभी इस स्थान को ( पूरे जैसलमेर में पीले पत्थर के मकान बने हैं ) गोल्डेन लैंड कहते हैं. रास्ते में विदेशी यात्री भी दिखे जो ऊंट पर सवारी करते हैं और तम्बुओं में रहते हैं.


जैसलमेर में आज उनकी दूसरी शाम है. कुछ देर पूर्व ही वे sunset point से आये हैं. बादलों के कारण सूर्यास्त तो नहीं देख सके पर उस जगह से किले का दृश्य बहुत भव्य प्रतीत हो रहा था. वे गजरूप सागर नामक एक स्थान देखने गये जहाँ देवी का एक मन्दिर है. बड़ा बाग़ में कई छतरियां देखीं जो अब टूटने के कगार पर हैं. सुबह किला देखने गये थे, जो यहाँ से निकट ही है. किले के प्रथम द्वार पर एक गाइड मिल गया जिसने १२वीं शताब्दी में बने राजा जैसल के, भारत के दूसरे सबसे बड़े किले के बारे में कई जानकारियां दीं. मन्दिर में बने सात जैन मन्दिरों में पत्थर पर बनी मूर्तियाँ तथा अन्य कलाकृतियाँ दर्शनीय हैं. किले में लगभग ४००० हजार लोग रहते हैं. काफी बड़ा भाग टूट गया है किन्तु जो भी शेष है, भव्य है. वहाँ से निकल कर वे गदीसर झील देखने गये, जहाँ एक कृत्रिम झील में राजा के निवास के लिए एक छोटा सा कमरा है. आस-पास कई बुर्ज हैं और द्वार पर सत्य नारायण का एक मन्दिर है, एक संग्रहालय भी था पर वे बहुत थक गये थे सो नहीं देखा. आटोरिक्शा करके पटवां हवेली गये जो एक सेठ ने अपने पांच बेटों के लिए बनवाई थी. हवेली के बाहर एक साढ़े चार फीट लम्बी मूंछ वाले आदमी के साथ बच्चों ने तस्वीर खिंचवायीं. नथमल हवेली बाहर से देखी और बाजार होते हुए वापस आ गये. कुछ और खरीदारी भी की. उसने नीले हरे रंग का एक गाउन खरीदा और बड़ी बहन के लिए एक वाल हैंगिंग . सामान बढ़ता ही जा रहा है और जून की झुंझलाहट भी. अभी उन्हें दो हफ्ते और सफर में रहना है.