Friday, October 12, 2012

रेल रोको आन्दोलन



कल उसने सभी भाइयों को राखियां भेज दीं, उनके पत्र भी आए हुए थे, जवाब में पत्र भी लिखे. उसके बाद एक किताब पढ़ती रही, पर इस वक्त मन जाने कैसा उखड़ा सा है, अँधेरे घर में सिर्फ टेबल लैम्प जला कर बैठना तो अच्छा लग रहा है पर विचारों को केंद्रित नहीं कर पा रही है. जिस दिन वह योगासन नहीं कर पाती, तभी ऐसा होता है, आज सुबह नींद देर से खुली फिर समय नहीं मिला, कुछ खा लेने के बाद तो आसन किये नहीं जा सकते. पहला कीट आया है रोशनी से आकर्षित होकर, अभी धीरे धीरे पंक्ति लगेगी, उसने सोचा रात्रि भोजन बना लेना चाहिए जब तक नन्हा और जून लौट कर आयें.

नन्हा स्कूल गया है, कल स्कूल से लौटा तो भोजन के बाद बजाय सोने के खेलने जाना चाहता था, उसने समझाया, नहीं माना फिर, डांटा और एक चपत भी लगायी, पर बाद में पश्चाताप हुआ. खुद से वादा किया कि डांटने से वह उसकी बात भले मान ले पर उसके लिए ठीक नहीं है, आज से ध्यान रखेगी. उसे अब गृहकार्य करने में उतना आनंद नहीं आता जितना पहले आता था, पर स्कूल जाना अब भी उसे अच्छा लगता है पर टिफिन खाना नहीं, सब कुछ वैसे ही वापस ले आता है.
उसने कैलेंडर पर नजर डाली, नौ अगस्त, ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का दिन. आखिर आज बनारस से चिर-प्रतीक्षित खत आया है, लेकिन पूरी तरह स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी. उसने सोचा अब उन्हें स्वयं वहाँ जाकर ही स्थिति का आकलन करना होगा. कल जून टिकट लेने तिनसुकिया गए पर लौट आए, आज फिर जायेंगे. कभी-कभी उनका व्यवहार उसे समझ नहीं आता शायद वह स्वयं भी कन्फ्यूज्ड हो गए हैं. अपने भीतर झांकती है तो अब उसे वहाँ जाकर पढ़ाई करने का पहले का सा जोश नहीं है, जून चाहते हैं कि उसे जाना चाहिए और सभी परिचित भी जानते हैं कि वह जा रही है. पर अपने इस शांत जीवन को छोडकर..खैर देखा जायेगा.

कल शाम वे क्लब गए, उसने लाइब्रेरी में पहले की एक अधूरी कहानी पढ़ी. नन्हा भी दस-पन्द्रह मिनट तक किताब पलटता बैठा रहा. अपनी एक मित्र के यहाँ से भी पांच-छह धर्मयुग लायी है, कितने महीने हो गए हैं, धर्मयुग पढ़े, पहले वह नियमित पढ़ती थी. उन्होंने क्लब में ही दोसा भी खाया. 

टिकट मिल गए हैं, वे सभी जा रहे हैं, एक हफ्ता रहकर जून वापस आ जायेंगे. आठ बजे हैं आज नन्हे का स्कूल बंद है, वह सो रहा है, पूरे हफ्ते की नींद जैसे आज ही पूरी करना चाहता है. दाखिला नहीं हुआ तो अक्तूबर में वह वापस आ जायेगी अन्यथा वह अब जून में वापस आयेगी यानि दस महीनों के बाद. उसे ख्याल आया कि कामवाली अभी तक नहीं आई है, पता नहीं अब तक वहाँ भी होगी या नहीं, हर हाल में वहाँ उसे कपड़े तो खुद ही धोने होंगे.

कल वे मन में कितने बातें लेकर उम्मीदें और सपने लेकर ट्रेन में बनारस जाने के लिए रवाना हुए मगर मरियानी से ही उलटे मुँह वापस आए. बंद के कारण रेलें नहीं जा रही थीं, फिर से सब सामान खोला. आज दिन भर यही तो किया. कल रात बारह बजे वे वापस पहुंचे. अब तो निश्चित हो गया कि उसकी पढ़ाई एक स्वप्न ही रह जायेगी. जून और सोनू गेस्ट रूम में हैं पढ़ाई कर रहे हैं. उसने सोचा है कि वह घर पर ही बच्चों को गणित पढ़ाएगी. कल से नन्हे को भी स्कूल भेजना है.




Wednesday, October 10, 2012

पड़ोस का सैलून



अगस्त का पहला दिन..मन अजीब दुविधा में पड़ा है, बनारस से उस फोन के अलावा और कोई सूचना भी तो नहीं मिली है. उसका एडमिशन यदि नहीं हो पाया तो..बनारस जाना तो था पर इतनी जल्दी जाना पडेगा यह नहीं सोचा था. गर्म पानी के सिस्टम की पाइप की वेल्डिंग करने के लिए कर्मचारी आए हैं, कितना शोर करती है वेल्डिंग मशीन. नन्हा होता तो शौक से देखता, स्कूल गया है उसे लेने भी जाना होगा स्कूल से, जून को फील्ड से आने में देर हो जायेगी. मौसम आज स्वच्छ है यानि खूब गर्मी पड़ेगी. लगातार वर्षा से रेलें भी तो नहीं चल रही हैं. कल बहुत दिनों बाद मंझले भाई का पत्र आया है. इसी महीने रक्षा बंधन भी है. जून को समय मिले तो बाजार जाकर राखी लायें. उसे दो रेसिपीज और मिली हैं, वह अच्छा खेल था, जब कुछ महिलाओं ने मिलकर आपस में रेसिपीज साझा करने का तरीका निकाला था.

कल बेहद गर्मी थी, दोपहर भर बेचैनी थी. आज सुबह के सवा नौ बजे धूप थोड़ी कम है बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है मगर कब तक ? नन्हे को कल सुबह ठंडे पानी से नहला दिया, उसे हल्का सी ठंड लग गयी है, जानबूझ कर हम मुसीबतों को निमंत्रण देते हैं नब्बे प्रतिशत मामलों में. उसे स्कूल लेने आज भी जाना है. जून व्यस्त हैं, कल रात आठ बजे आये. आज उन्होंने किन्हीं परिचित को चाय पर बुलाया है, दोपहर को ही नाश्ता बनाना है और बैठक ठीक-ठाक करनी है.

अभी-अभी जून डिब्रूगढ़ गए हैं अपने एक सहकर्मी के साथ. उनके कान का संक्रमण जो ठीक हो गया सा लगता था अब फिर से हो गया है. बांया कान कभी बंद हो जाता है कभी खुल जाता है. सभी रिपोर्ट लेकर गए हैं. दोपहर बाद तीन-चार बजे तक आयंगे. नन्हे की तबियत आज सुबह भी पूरी तरह ठीक नहीं थी, पता नहीं कैसा होगा, हिम्मती लड़का है मैनेज कर  ही लेगा. आज ट्रांजिस्टर पर कितने मधुर-मधुर गीत आ रहे हैं, प्रेम की चाशनी में पगे हुए, कल रात वे भी ऐसे ही भावों में भर रहे थे. शाम को नाश्ते का आयोजन ठीक रहा, हमारा रात्रि भोजन भी वही नाश्ता ही हो गया. नन्हे को लेने आज भी उसे ही जाना होगा, किसी से लिफ्ट मिल गयी तो ठीक नहीं तो रिक्शा ले लेंगे. बनारस से खत की प्रतीक्षा है पर ट्रेन न चलने की वजह से डाक भी तो समय पर नहीं आ रही है. पूरे देश में बाढ़ ने तबाही मचाई है. हर वर्ष यही होता है, करोड़ों रुपयों का नुकसान, कब हमारा देश सक्षम होगा, इन आपदाओं से निपटने में.

सोनू की खांसी बढ़ गयी है और हल्का बुखार भी है. कल शाम को वह बहुत खुश था, खूब बातें कर रहा था. पर रात वह बेचैन था, साँस तेज चल रही थी. वह उसे गुमसुम देखकर व्यग्र हो गयी, उसका उदास चेहरा देखकर वह भी उदास हो गयी, सुबह वे उसे अस्पताल ले गए थे. छह-सात बोतलें दी हैं डा. ने. बेनाड्रिल दी उसने, पीते ही सो गया, अभी तक उठा नहीं है कि कुछ खाने को दे. उन्हीं की लापरवाही का नतीजा भुगत रहा है यह नन्हा बच्चा. जून कल पांच बजे लौटे, उनका कान ठीक हो गया है, वैक्स जम गया था और कुछ नहीं.

नन्हा आज ठीक है, सुबह स्कूल नहीं गया. कल से भेजेगी. तीन दिन पढ़ाई-लिखाई बंद रही अब उसका गृहकार्य करने में मन ही नहीं लग रहा था. इस समय पापा के साथ अपने मित्र के यहाँ गया है, वही उनके घर के पीछे रहने वाले पड़ोसी. उसे यहाँ आये एक महीना होने को है वे लोग उनके यहाँ नहीं आये, न ही वह गयी. सुबह वह सोनू को यहीं पास में एक पार्लर में ले गयी थी बाल कटवाने के लिए, एक सरदारनी ने खोला है, जो बाल तो अच्छे काटती हैं पर समय बहुत लगाती हैं.

रफी के गीत



यहाँ आने के बाद से नियमित लिखने का क्रम बन ही नहीं पा रहा है, जब तक एक निश्चित समय तय नहीं कर लेती ऐसा ही होगा, सुबह नन्हे के जाते ही पहला काम क्योंकि उसके पहले तो मुश्किल है, और शनिवार को जून के जाते ही. इतवार को जैसा समय मिले, ज्यादातर सुबह उनके उठने से पहले. आज कितने दिनों के बाद रात से ही वर्षा हो रही है, मौसम ठंडा है रोज तो पसीना पोंछते-पोंछते ही रहना पड़ता था. अभी पौने दस हुए हैं, दोपहर का भोजन बन गया है. उसके सामने तीन-चार कार्य हैं - क्रोशिये का काम, जून का मफलर अधूरा है, टालस्टाय की crime and punishment या कोई अन्य पुस्तक पढ़ना, स्वयं कुछ लिखना अथवा घर की सफाई और पूरा एक घंटा है, वह सोचने लगी कि क्या करे. जून के कान का दर्द ठीक ही नहीं हो रहा, दो-तीन दिन पूर्व वह बहुत नाराज हो गया था, गलती सरासर उसकी थी सो उसके गुस्से पर प्यार आया था उसे, अपने से भी ज्यादा  ख्याल रखता है वह उसका, हर वक्त हर क्षण, उसे भी उसके बिना चैन नहीं मिलता, जितना वक्त वह घर पर रहता है मन होता है वे साथ साथ रहें...पर और भी गम है जमाने में मुहब्बत के सिवा, उसकी पढ़ाई आजकल बिलकुल ठप्प है. नन्हे का स्कूल ठीक चल रहा है, उसने तय किया कि वह क्रोशिये पर नया नमूना उतारेगी.

कल सोनू को स्कूल नहीं भेज पायी काफी देर तक मन परेशान रहा, उसकी भोली बातें भी मन को हँसा नहीं सकीं, पता नहीं ऐसा क्यों होता है कभी-कभी. आज इस समय शाम के पांच बजे हैं, वर्षा पिछले तीन दिनों से लगातार हो रही है, नन्हा सोया है, जून दफ्तर गए हैं, सीएमडी का दौरा है, शायद छह बजे आयें, फिर फील्ड जाना है, आजकल काम ज्यादा बढ़ गया है. दोपहर को भी डेढ़ घंटा देर से आये. कुछ दिन पहले काम कम होने कई शिकायत कर रहे थे.

आज छोटी बहन का जन्मदिन है, वह खुश तो होगी, उसे हमारा पत्र व कार्ड भी मिल गया होगा. मुहम्मद रफी की नौवीं पुण्यतिथि भी आज है, उसे याद है जिस वर्ष वे अपने पैतृक स्थान पर लौटकर आए थे, कुछ दिन वे दादाजी के साथ रहे थे, तभी मुहम्मद रफी का देहांत हुआ था. जून ने बनारस फोन करने की कोशिश की पर कोई फायदा नहीं हुआ. आज उसने अपने एक मित्र को तिनसुकिया से टिकट बुक करने को कहा है, देखें क्या होता है, टिकट मिल गयी तो पाँच को उसे जाना होगा, वैसे अभी तक तो यही निश्चित नहीं है कि ट्रेन चल रही है यह नहीं. उसे यहाँ आना ही नहीं चाहिए थे यह कहने का मन नहीं होता. यह एक महीना या बीस-पच्चीस दिन ही, मधुरता से बीते हैं जैसे छुट्टियाँ मिली हों, वहाँ जाकर तो फिर वही कॉलेज, झमेले. कॉलेज जाना हुआ तो नन्हे की देखभाल की समस्या होगी, उसे भी स्कूल भेजना होगा, यह बहुत जरूरी है, उसका वक्त भी अच्छा कटेगा और पढ़ना लिखना भी सीखेगा, वह व्यस्त रहेगी तो घर पर उसे पढ़ा भी कहाँ सकेगी, टिकट मिल जाएँ तभी अच्छा है, तभी उसने घड़ी की और देखा नन्हे को लेने जाना है, महरी का कुछ अता-पता नहीं, बहुत देर से आती है. जून फील्ड गए हैं, शायद देर से आयें.

 



Tuesday, October 9, 2012

किताबों का सेट



उन्हें घर आए तीसरा दिन है, जब से वे आए हैं बादल बने हुए हैं. कल दिन में उमस थी पर आज मौसम ठंडा है. यात्रा सुखद रही. अभी तक घर पूर्णरूप से व्यवस्थित नहीं हो पाया है. आज नन्हे का स्कूल में पहला दिन था, अच्छा रहा. उसने जरा भी परेशान नहीं किया अर्थात वह एक बार भी परेशान नहीं हुआ. बल्कि पूरी तरह आनंद उठाया उसने. कल बकरीद की छुट्टी है. दोनों घर पर पत्र लिखेगी तो सब बातें लिखेगी, उसने सोचा. आज उन्हें एक जगह रात्रि भोज में जाना है. अब तैयार होना है.
आज भी वर्षा हो रही है, कल रात भर होती रही. सुबह के पौने छह हुए हैं, यही वक्त सही है डायरी लिखने का, जून को उठाकर आयी है, दस-पन्द्रह मिनट बाद ही वह उठेंगे. नन्हे का स्कूल बंद है. बहुत दिनों बाद उसने आज व्यायाम किया, कितना हल्का लग रहा है, उसने तय किया है जब तक यहाँ है नियमित करेगी. वहाँ नहीं कर पाती थी, छोटी सी जगह और इतने सरे लोग. यहाँ कितना खुला-खुला है, जहां जब चाहे बैठो, जब चाहे लेट सको. वहाँ हर बात का समय देखना होता था. कल वे क्लब में फिल्म देखने गए, कहानी तो वही पुरानी थी, पर पर कुछ दृश्य सचमुच अछे थे, हँसाने वाले, पर कहीं-कहीं समझ नहीं आ रहा था हँसें या रोयें. सोनू पूरे वक्त बैठा रहा, आखिर में उठ गया लेकिन फिर आके बैठ गया.

कल उनके कुछ पैसे खो गए, आज सुबह जब दफ्तर जाते समय जून ने पर्स देखा तो नदारद, लगता है कल कमीज की जेब में रह गए, और कपड़े धोते समय..महरी से पूछा तो उसने साफ मना कर दिया. परसों वे तिनसुकिया गए थे, अनुभव अच्छा नहीं रहा, कार से उतरते ही वर्षा होने लगी जिसने घूमने का सारा मजा किरकिरा कर दिया. जून के कभी-कभी अजीब व्यवहार के कारण वे नन्हे की बरसाती भी नहीं खरीद सके. समझ नहीं आता कि वह किस दुकान में कैसा व्यवहार करेंगे. फिर इतनी सारी मिठाई, आधा किलो काजू वाली नमकीन और काजू खरीद लिए, इतने रुपयों का सिर्फ खाने का सामान, उसे सबल देखना चाहते हैं वह, अभियान शुरू किया है इन दिनों. पिछले दिनों उसका वजन कुछ तो कम हुआ ही है, जो विवाह के बाद नन्हे के होने के बाद बढ़ा था. उसे कम से कम पचास का तो होना चाहिए पर उससे ज्यादा नहीं. जब से वे यहाँ आए हैं उसका वजन एक केजी तो बढ़ गया होगा. नन्हे का स्कूल में चौथा दिन था, खूब बातें बनाता है, स्कूल के बारे में उसकी राय अच्छी है, दोस्त बनाना चाहता है पर शायद उसके साथ बैठने वाला बच्चा हिंदी भाषी नहीं है. जून आज उसके लिए मंगाई किताबों का सेट लेकर आएंगे पोस्ट ऑफिस से.

कल जून ने कहा कि चार बजे जब वह आयें उसके पहले उसे व टिफिन भी तैयार रहना चाहिए. अभी तक महरी नहीं आयी है, पानी भी नहीं आ रहा है, स्नान भी लगता है, देर से ही होगा. आज सुबह छोटी बहन को पत्र लिखा, कार्ड भी भेजा. उसका जन्म दिन आ रहा है, आज शायद उसका परीक्षा परिणाम निकल गया होगा पर उन्हें तो दस दिन बाद ही पता चलेगा. कल से मौसम गर्म है. नन्हा स्कुल गया है, घर शांत रहता है आजकल ग्यारह बजे तक, कितना बोलता है आजकल वह, कितने नए शब्द सीख रहा है. कल शाम उनका एक परिचित परिवार मिलने आया था. सब कुछ सामान्य है, अपनी गति से अबाध रूप से चल रहा है, पर स्वप्नों का कोई अर्थ होता है, या कल रात देखे नाटक का परिणाम है, हाँ, यही सत्य है.  
 



Monday, October 8, 2012

आसमानी मैक्सी



रात्रि के आठ बजे हैं, जून चले गए थे साढ़े छह बजे ही. कोलकाता में कल उनका कोई इंटरव्यू है, दो दिन बाद वापस आएंगे. सुबह वे देर से उठे, सोये ही थे रात दो बजे. सारी शिकायतें सारे शिकवे दूर हो गए और वे दोनों फिर निकटता का अनुभव करने लगे. यही सच्चाई है कि वे दोनों एक हैं, व एक-दूजे के लिए है, एक दूसरे के लिए जीते हैं. जब उसे छोडकर ऊपर आई तो रुलाई आ गयी थी. दो दिन से उसका साथ मिल रहा था, तन-मन पुलक से भरा था और अब रह गयी हैं यादें, वह पहले से सबल हो गया है, आत्मविश्वास से भरा हुआ.. इधर वह पहले से दुबली हो गयी है. जून कहते हैं कि असम जाकर वह भी पुष्ट हो जायेगी. वह अपने घर की कल्पना में भर गयी, पहले तो घर की सफाई करनी होगी, तीन-चार दिन तो लग ही जायेंगे सब ठीक-ठाक करने में.

जून अभी ट्रेन में होंगे शायद सुबह की चाय पी रहे होंगे. आज सुबह से पानी नहीं आया सो स्नान भी नहीं हो सकता, जब तक पानी नहीं आता. छह बजे हैं, दिन भर की बातें अभी से लेकर बैठ गयी है, जाने कैसे बीतेगा दिन आज का. नन्हा सोया है, पिछले तीन दिन वह जल्दी जग जाता था, आज शायद अपने पुराने वक्त पर उठेगा. जून उसके लिए एक हवाई जहाज लाए हैं बैटरी से चलने वाला, उसे बहुत पसंद है. उसने उसे ‘एयर क्राफ्ट’ पुस्तक दी है, कितने उत्साह से वह जहाजों की तस्वीरें देख रहा है, फिर उसी उत्साह से उसे दिखाता है. पहले से ही उसकी रूचि इस दिशा में थी अब जहाज मिल जाने से और भी बढ़ गयी है, इस बार की हवाई यात्रा में शायद वह पहले की तरह सोयेगा भी नहीं.

हो सकता है आज ही वह आ जाएँ. आज मन अपेक्षाकृतशांत है, समझ नहीं आता, जून के बिना इतना अकेलापन महसूस किया उसने, जैसे अधूरापन, खालीपन मन के पर्याय बन गए हों. उसका अतिशय प्रेम देखकर ...कभी कभी मन कैसा भीगा –भीगा सा रहता है, ऐसे में वह ही उसे कुछ कह देती है, अपनी प्रकृति से विवश होकर ही, वह उसके लिए क्या है और उसके लिए कितना प्रेम है मन में शायद वह खुद भी नहीं जानती उस क्षण. कल दोपहर बाद वह रोते हुए नन्हे को सुलाने लगी तो उसे रोते और खांसते-खांसते उसके कपड़ों पर ही उबकाई आ गयी, माँ वहीं लेटी थीं, मगर सहायता करना तो दूर उठकर देखा तक नहीं. उस वक्त भी जून याद आए. आज उनका एक पुराना खत डाक से मिला, उदासी भरा खत. वह जो कढ़ाई का काम कर रही थी आज पूरा हो गया. अभी कुछ देर पहले एक धागे की तरह का, गुलाबी रंग का जीव उसकी बाँह पर गिरा, ननद ने कहा, सांप का बच्चा था, दो दिन पूर्व रसोईघर में भी वैसा ही एक जीव निकला था, लगता है घर में कहीं सांप हैं जरूर.

जुलाई माह का प्रथम दिवस, यानि आषाढ़ मासे प्रथम दिवस...पर वर्षा का तो नाम नहीं..कल रात कितनी उमस थी. देर रात तक नींद नहीं आयी, शायद वह आ जाएँ मन में कहीं दूर आशा थी. वैसे वह जानती थी कि जून शाम की ट्रेन से आएंगे रात को नहीं. सुबह वक्त नहीं मिला सो अब डायरी निकाली है, एक बहाना है यह उसे याद करने का, हर क्षण तो वैसे ही उसका ध्यान  रहता है.
कल वह आ गए थे, इस समय उसे बिना बताए कहीं गए हैं, आस-पास ही गए होंगे, क्योंकि कुरता-पजामा पहना है.
दो दिन नहीं लिख सकी, कारण वही, व्यस्तता कम और लापरवाही ज्यादा. आज सभी अभी तक सो रहे हैं, वह यहाँ बैठी है, कल जून के एक मित्र द्वारा दी गयी पार्टी में वे लोग एक होटल में गए, अच्छा आयोजन था, सामिष भोजन के कारण भी कोई समस्या नहीं हुई, वे अलग ही बैठे थे. जून किसी भी तरह माँ-पिता को खुश देखना चाहते हैं, अपनी बातों से उनको बहलाना चाहते हैं, मगर वह यह भूल जाते हैं कि माँ-बाप बच्चे को बहला सकते हैं, पर बच्चे माँ-बाप को नहीं.

परसों शाम उन्हें जाना है, उसने सोचा है आज से ही कपड़े समेटने शुरू कर देगी और भी छोटा-मोटा सामान. कल रात बिजली चली गयी और उन्हें छत पर सोना पड़ा, दिन भर भी गर्मी बहुत थी बिजली का खेल जारी था. वे लोग कुछ देर के लिए बाहर निकल गए पर जब लौटे तब भी बिजली नहीं आयी थी. अभी कुछ देर पूर्व ही वह उठकर आयी है. कल जून ने उसे एक उपहार लेकर दिया सुंदर बटनों वाली आसमानी रंग की एक सुंदर मैक्सी.


Friday, October 5, 2012

मनभावन मृगतृष्णा



उसने पेन में हरे रंग की रीफिल लगायी तो पेन कुछ और ही लिखने लगा..

तुम मेरे हमदम मेरे लिए क्या हो
क्या तुम नहीं जानते
नहीं जानते कि धागे में फूलों की तरह
पिरोये हैं हम एक-दूसरे में
भावनाएं और विचार हमारे, एक में समोए हुए हैं
और वह एक है ज्योति ‘प्रेम’ की
जो दोनों के मध्य जाने कब से बह रहा है
प्यार की शाश्वतता व अटूटता पर विश्वास क्यों नहीं करते लोग
जब ईश्वर पर करते हैं
पर मैं और तुम जानते हैं कि
ईश्वर वहीं है जहाँ प्रेम है  
एक-दूजे को बुलाते समय हम उसे भी बुलाते हैं
हमारे बीच फासले वक्त के हों या विवशता के
नहीं रोक पाएंगे उस अविरल धारा को क्योंकि
तुम्हारे हृदय में भी यही मेरा दिल धड़कता है न....

कल पेन ने साथ तो दिया पर वक्त ने न दिया पता नहीं, अब याद नहीं आता, क्या करने लगी थी लिखना बीच में ही छोड़कर, जरूर ही कोई अति आवश्यक कार्य रहा होगा. जून के आने में सिर्फ तीन दिन, आज का छोड़ के दो दिन शेष हैं. अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वह वहाँ जा पायेगी अर्थात स्टेशन, उन्हें लेने अथवा नहीं. नन्हा अब ठीक है और उसका जुकाम भी कई दिन हुए ठीक हो गया है. कल रात सोनू की जिद के कारण छत पर सोयी थी, पर ठंड बहुत थी आधी रात को ही नीचे आ गयी. नन्हा कुछ ओढ़ना तो चाहता ही नहीं है. जून के आने के बाद भी ऐसा ही मौसम रहे, शीतल सा सुकून दायक, तो कितना अच्छा हो. इतने दिनों बाद उसे देखकर कैसा लगेगा, समझ नहीं आता. कितना सुंदर होगा वह क्षण ! वह कुछ ही दिन तो रहेंगे फिर अकेले अकेले.., कब जायेंगे हम वापस यह भविष्य ही बताएगा. तभी उसे ध्यान आया कि टीवी समाचार का वक्त होने में कुछ वक्त है तब तक कपड़े धो सकती है, वह रोज सुबह उसी वक्त समाचार सुनती है, समय क्या उसकी या किसी की सुविधा से आगे बढता है, उसे तो बढ़ते ही जाना है अब उस दुर्घटना को हुए आठ महीने होने को हैं.

आखिर तय हो गया कल सुबह वह जून के मित्र के साथ उन्हें लेने स्टेशन जा रही है, उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि मौसम बिल्कुल ठीक रहे जिससे उनकी फ्लाईट में कोई बाधा न हो, और समय से कलकत्ता स्टेशन भी पहुंच जाएँ. आज अभी से कितनी उमस है, बादल हैं पर हवा का नाम नहीं. कल रात उसने एक मलयालम कला फिल्म देखी, उस वक्त भी जून को याद किया, उसे अजीब सी पुलक महसूस हो रही है उन दिनों के बारे में सोचकर जब वे साथ होंगे.

छह बजे हैं, कल सुबह जून आ गये थे, उनके स्टेशन पहुंचने से पहले ही वह बाहर निकल कर जा चुके थे. कल दिन भर सामान्य रहा अर्थात वैसा ही जैसा कि इतने दिनों के बाद किसी प्रिय के आने पर होता है, बातें, बातें और बातें. टिकट भी मिल गयी उन सबकी वापसी की. समझ नहीं आ रहा कि इसमें खुश होये या उदास. कल शाम से ही स्वयं को समझ पाने में असमर्थ है. क्या यह जो वह अनुभव कर रही है और लोग भी करते होंगे, क्या सब कुछ रेत का घर होता है, ताश का महल, हवा के हल्के से झोंके से ढह जाने वाला. उदासीन हैं तन और मन दोनों. कहीं कोई आकुलता नहीं, क्या सब कुछ मृगतृष्णा थी, एक छलावा ही तो कहेंगे इसे, मन इतना विद्रोही क्यों हो जाता है, काँटों की चुभन, कांटे जो दूसरों को चुभोये, खुद को भी महसूस करनी पडती है. शायद यही कारण है, किन्तु क्या वह सच्चाई नहीं थी जैसे यह सच्चाई है. जिससे कहा वह पात्र उचित नहीं था. जन्म भर के लिए स्वयं का दुश्मन बन जाना क्या उचित कहलायेगा. अथवा इन और उन सब बातों को सारहीन समझ कर तटस्थ होकर धारा के साथ बहते जाना ही उचित है. अभी एक बंदर उसके बिलकुल पास से गुजर गया उसे बाद में पता चला, भय का संचार हुआ, अभी जीवन का मोह शेष है, यही सत्य है. कभी जो स्वर्ण लगता है मगर वास्तव में स्वर्ण नहीं होता वक्त के साथ काला पड़ जाता है. उसका नकली मंगलसूत्र जैसे, अब कभी नहीं पहनेगी उसे. नन्हा सोया है अभी, पेपर देखने गयी थी, नहीं आया.
उसने आगे टेढ़े-मेढे शब्दों में लिखा-मेरे मीत, अभी नौ बजे हैं तुम्हारी ट्रेन चलने वाली होगी न..या अभी-अभी चली गयी होगी. तुम दो दिन के लिए अपनी शक्ल दिखाकर, नेह में भिगोकर चले गए हो..कहाँ चले गए हो..चित्रहार आ रहा है पर मन कहीं और है शायद तुम्हारे पास...

  

Thursday, October 4, 2012

उफ़ ! यह कॉमन कोल्ड



यहाँ आए उसे चार दिन हो गए हैं. कल व परसों भी घर में चहल-पहल होने के कारण कुछ लिख नहीं सकी. चाचीजी और उनके बच्चे कल चले गए. परसों वह भी उनके घर जायेगी, उसी घर में जहां उसका बचपन बीता था. माँ उसे लेकर बाजार गयीं, सास, ननद, नन्हे व उसके लिए कपड़े खरीद कर दिए. नन्हा यहाँ भी उतना ही खुश है पर खाना ठीक से नहीं खाता है. आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेंगे, उसने सोचा. जून के दो पत्र मिले यहाँ आकर, वह उसे अपने पास क्यों नहीं बुला लेता उसके मन में ख्याल आया. कल वह अपना वजन करवाने गयी थी, केवल बयालीस केजी...कितना कम है.

ननद का पत्र आया है, उसका प्रवेशपत्र आ गया है, चौदह को परीक्षा है, उसे कम से कम दो-तीन दिन पहले जाना चाहिए. कल वे दीदी के घर गए थे, परसों जीजा जी आए थे, कल सुबह अपने साथ ले गए. वहाँ अच्छा लगा, दीदी, जीजाजी, व बच्चे सभी उन्हें अपने बीच पाकर बहुत खुश थे. उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा था. उन्हें एक पत्र लिखेंगे उसने मन ही मन सोचा.

कई दिन बाद डायरी लिखने बैठी है. इस बीच कितनी ही बातें हुईं, ऐसी भी जो यादगार बन गयीं पर आलस्य वश ही कहना चाहिए, लिखा नहीं. एक बार क्रम टूट जाये तो जल्दी जुड़ता नहीं है. उसे दो दिन से जुकाम ने परेशान किया है, कमजोरी भी महसूस होती है, और..कभी कभी बेचैनी भी. खुशी है तो बस इस बात की कि जून दस दिन बाद आ रहे हैं. आज भी उनका पत्र आया है, दोपहर उसने सभी को पत्र लिखे. कल परीक्षा हो गयी. उसने पढ़ाई जरूर की पर सोच-समझ कर नहीं की. खैर, जो होना था हुआ, अब उसे बदला नहीं जा सकता, यदि उसका दाखिला नहीं हुआ तो यह भले ही शर्म की बात हो, वह वापस जा सकेगी, यह क्या कम होगा, जून के साथ-साथ रहने का, जीने का  मन होता है, खुले आकाश में, अपने निज के घर में, अपने मन से जीने का...यहाँ सब कुछ ठीक है पर फिर भी अपना घर तो अपना ही है. उसका मन फिर पीछे लौट गया...समाचार भी ध्यान से सुने होते पिछले तीन-चार दिनों से तो..यह आत्मग्लानि मानव की सबसे बड़ी शत्रु है, क्या स्वयं को छोटा किये बिना मनुष्य कुछ सीख नहीं सकता...शायद नहीं.

फिर दो दिन का अंतराल. वह स्वस्थ हुई तो सोनू को सर्दी हो गयी, अभी भी खांसी है, इस समय सोया है इसी कारण, दिन में सोना उसे जरा भी पसंद नहीं, बहुत मना कर सुलाना पड़ता है. आज  उसे स्नान में काफी वक्त लग गया पर वास्तविक स्नान इसे ही कहते हैं, मालिश से भी कैसे तन में जान आ जाती है. यहाँ आयी है तब से वह ननद के लिए टॉप पर कढ़ाई कर रही है, लगभग एक तिहाई हो गया है, जून के आने से पहले ही पूरा हो जाये तभी अच्छा है, उसका पत्र आया है पर तिथि नहीं लिखी है. भूल ही गया है शायद.. आजकल वह अक्सर खुद को इस बारे में सोचते हुए पाती है कि जब वह यहाँ होगा तो इस वक्त वे क्या कर रहे होंगे.

कल रात जब पिता काम से वापस आये तो उनके हाथ में चोट लगी हुई थी. उसे इस बात का पता बाद में लगा जब वह सोनू की लगातार होती हुई खांसी के कारण उसे दवा पिलाने व नीचे सुलाने ला रही थी. उस वक्त भी सिर्फ उनके हाथ पर बंधा कपड़ा दिखा था. अभी सुबह कुछ देर पहले माँ ने बताया कि चोट काफी गहरी थी और वह रात भर ठीक से सो नहीं सके. सोनू दवा लेने के बाद आराम से सोया रहा, शुरू में कुछ देर तो बेचैन था पर बाद में ठीक से ही सोया रहा. बल्कि उसकी नींद ही बार-बार खुलती रही.