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Thursday, March 29, 2018

रोइंग में पार्टी



मायोदिया में मंजिल पर पहुंच कर बर्फ दिखी जो सड़क के दोनों किनारों पर जमी थी, पहाड़ों की ढलान पर भी बर्फ थी और वातावरण में ठंड बढ़ गयी थी. उन्होंने स्वेटर, दस्ताने, टोपी सभी कुछ पहन लिए और फोटोग्राफी करते हुए बर्फ का आनन्द लिया. वापसी की यात्रा अपेक्षाकृत सरल थी. दोपहर डेढ़ बजे वे वापस लौट आये. दोपहर का भोजन कर वे पास के बाजार गये. छोटा सा ही बाजार है, जहाँ आवश्यकता का सब सामान मिलता है. बाहर नव वर्ष की पार्टी की तैयारी हो चुकी है. सुबह ही टेंट लगाने वाले आ गये थे, एक तरफ शामियाने में बुफे का इंतजाम है. दूसरी तरफ गोल श्वेत टेंट के नीचे कुर्सियां लगी थीं. दोपहर से ही भोजन बनाने का कार्य भी आरम्भ हो गया है.

संध्या के बाद श्री पुलू ने उन्हें बुलाया, उनका परिवार भी आ चुका था. दो कमरों के मध्य के हॉल में आग जलाने का प्रबंध है. एक टीन की शीट पर मिट्टी का लेप था उस पर एक लोहे का चूल्हा था जिसमें लकड़ियाँ जलाकर आग सुलगाई जाती है. चारों तरफ चटाइयाँ तथा कार्पेट बिछे थे. उन्होंने ग्रीन टी के साथ गाजर का हलवा पेश किया, बाहर भी कुछ मेहमान आ चुके थे. सुबह से आकाश पर छाये बादल अब छंट गये थे और तारे चमक रहे थे. जैसे प्रकृति भी मेहरबान हो गयी थी, क्योंकि वर्षा होने का अर्थ था सभी को भीतर जाना पड़ता. श्रीमती पुलू डिस्ट्रिक ऑफिस में एकाउंटेंट हैं. वह तेजू में रहती हैं. दोनों बच्चों को पिता ही सम्भालते हैं. श्री पुलू ने कहा, वे हाउस-हसबैंड हैं. उनके कैम्प में देश-विदेश से कई शोध विद्यार्थी आते हैं. अरुणाचल के जंगलों में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का अध्ययन करते हैं तथा यहाँ के जंगली प्राणियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र करते हैं. वे स्वयं उनके साथ जंगलों में मीलों पैदल चलकर कैमरे तथा अन्य उपकरण आदि लगाने में मदद करते हैं. पक्षी प्रेमी भी वहाँ आकर ठहरते हैं. प्रदेश के इतिहास के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि अरुणाचल वासी शताब्दियों पूर्व चीन से म्यांमार  होते हुए यहाँ आये थे. वे कबीले बनाकर रहते थे. उन्होंने यह भी बताया कि खुदाई करने पर इस इलाके से जो स्तम्भ प्राप्त हुए हैं उन पर लिखी भाषा को पढ़ा नहीं जा सका है यहाँ विवाह संबंध मध्यस्थों के द्वारा तय होते हैं. लड़के वाले लड़की का हाथ मांगने जाते हैं तथा दहेज भी उन्हें ही देना पड़ता है. देखा जाता है कि पिछली दस पुश्तों में दोनों परिवारों में कोई रक्त संबंध तो नहीं था. रोइंग में कोई कालेज नहीं है, पढ़ने के लिए तेजू जाना पड़ता है, पर वहाँ भी केवल कला विषय पढाये जाते हैं. रोचक चर्चा चल रही थी कि भोजन का समय हो गया. पहले उन्होंने वह केक काटा, जो एगलेस केक मांगने पर हलवाई ने उन्हें थमा दिया था पर वह केक के स्थान पर मिठाई निकली, खोये की मिठाई जिसे केक की तरह सजाया गया था.. हमने नये वर्ष का स्वागत करते हुए वह बर्फी केक खाया. भोजन में केले के फूल व आलू की स्वादिष्ट सब्जी थी, लाई का सूखा साग बना था. रोटी सफेद व कोमल थी. बाहर की पार्टी का शोर बढ़ता जा रहा था. अग्नि के पास बैठकर सबने रात्रि भोजन किया, जो मेजबान द्वारा अति प्रेम से परोसा गया था.

कुछ देर बाद वे नये वर्ष की पार्टी में शामिल होने गये. सभी आनन्दमग्न थे, पुराने हिंदी फ़िल्मी गीत बज रह थे, पता चला कि मिथि साहब मुहम्मद रफी के फैन हैं तथा स्वयं भी गाते हैं. महिलाएं डाइनिंग रूम में थीं, नूना वहाँ पहुंची तो आकर्षक परिधानों में सजी स्त्रियाँ समूह में बैठी थीं, श्रीमती मिथि से पहले मिल चुकी थी सो उन्होंने सबसे परिचय कराया, लगभग सभी के पति सरकारी नौकरियों में थे. एक सुंदर गौरवर्णी महिला कहने लगीं उनके समाज में अधेड़ उम्र की महिलाएं उत्सवों में चावल की बनी मदिरा का पान करती हैं. वे इसके फायदे भी गिनाने लगीं. जब उसने कहा बिना पिए ही ये सब प्राप्त हो सकता है तो उन्होंने स्वीकार किया और वहीँ बैठी दो महिलाओं को दिखाकर कहा, ये दोनों बिलकुल नहीं पीतीं. आधा घंटा वहाँ बिताकर वे कमरे में आ गये.     

आज नये वर्ष का पहला  दिन है, सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुली. रात को पार्टी सम्भवतः साढ़े दस-ग्यारह बजे तक चली होगी. ठंड काफी थी और और छोटे बच्चे वाले परिवार बहुत थे, सो लोग जल्दी चले गये होंगे. सुबह नहा-धोकर आठ बजे नाश्ता करके वे रोइंग से विदा लेकर रवाना हुए और मार्ग में चार नदियों को पार कर तिनसुकिया में खरीदारी करते हुए वापस एक बजे घर पहुंच गये. मौसम अच्छा है. धूप खिली है. नये वर्ष की पहली शाम का स्वागत करने के लिए वे तैयार हैं.

Friday, January 19, 2018

हिमालय के निकट


आज वे नुब्रा वैली आये हैं. जो लेह से एक सौ तीस किमी दूर है. रात्रि में यहीं रहेंगे तथा कल शाम तक वापस लौटेंगे. बहते हुए पानी का कल-कल शोर, रंग-बिरंगी चिड़ियों का मधुर कलरव तथा धारा के दोनों तरफ उगे घने वृक्षों की कतार एक अनुपम दृश्य का संयोजन कर रहे हैं. परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि का आनंद लेने के लिए वे घर से इतनी दूर यात्रा करके आये हैं, कूर्ग की याद दिला रहा है यहाँ का वातावरण ! सुबह दही व अजवायन के परांठों का नाश्ता करके नौ बजे यात्रा पर निकले. इस बार  ड्राइवर थे टी दोरजी जो हाल ही में सेना से रिटायर्ड हुए हैं, शांत स्वभाव के इस बौद्ध के मन में दलाई लामा के प्रति विशेष आदर है. मार्ग में जहाँ वे आये थे, उन स्थानों को दिखाया, किस तरह लोगों ने उनका स्वागत किया इसका विवरण बताया. दलाई लामा ने लद्दाख वासियों को शाकाहारी रहने का उपदेश दिया है. इतनी ठंड होने के बावजूद यहाँ अस्सी प्रतिशत लोग शाकाहारी हैं. ज्यादातर लोगों के चेहरे एक सरल मुस्कान से खिले रहते हैं. यह रिजॉर्ट ‘रॉयल कैम्प’ भी पूर्णतया शाकाहारी व्यंजन परोसता है, प्याज लहसुन के बिना भी, क्योंकि कई जैन लोग भी यहाँ आते हैं.  लेह से चलते समय जो पहला शांति स्तूप आया उसका एक चक्कर लगाकर ड्राइवर आगे बढ़ा. शहर से बाहर निकलते ही दोनों ओर विशाल पर्वत मालाएं आरम्भ हो गयीं. सलेटी, ग्रे, भूरे कहीं काले पर्वत और उनके पार बर्फ से ढकी चोटियाँ ! किस दृश्य को कैद करें यह सोचते ही अगला दृश्य आ जाता जो उससे भी बेहतर होता. कहीं-कहीं हरियाली भी थी, कहीं कोई छोटी जलधारा, बीच–बीच में कोई गाँव जिसमें जौ तथा सरसों की खेती भी की हुई थी. 


जैसे-जैसे ऊंचाई बढती गयी चट्टानों और पहाड़ों पर जो बर्फ दूर से दिखाई देती थी पास से नजर आने लगी. एक जगह भेड़ों व बकरियों का एक बड़ा रेवड़ सडक पार करता हुआ दिखा. अब सडक पर बर्फ का कीचड़ नजर आने लगा. लगभग तीस किमी की लम्बाई तक सड़क खराब थी, रास्ते में कई जगह मजदूर काम कर रहे थे. ड्राइवर ने बताया उनमें से कई बिहारी थे. अब वे ‘खर्दुन्गला दर्रे’ के नजदीक पहुंचते जा रहे थे. चारों तरफ श्वेत हिम से आच्छादित पर्वत मालाएं ! जिन्हें पहले हवाई जहाज से देखकर ही आनंदित होते थे, उनके निकट से गुजरना और उन्हें छूना एक अविस्मरणय अनुभव था. १८३२५ फीट की ऊंचाई पर स्थित यह विश्व की सर्वाधिक ऊंची मोटरेबल रोड है. सभी गाड़ियाँ वहाँ रुक गयीं और प्रफ्फुलित यात्रीगण उतर कर हिमाच्छादित पर्वतों के साथ तस्वीरें उतारने लगे. वह भी निकट के एक पर्वत पर चढ़ गयी और लगभग पांच मिनट ही वहाँ रुकी पर जब नीचे उतर कर आई तो जैसे दिल बैठने लगा, कार तक पहुंचते-पहुंचते तो होश उड़ने लगे. ड्राइवर कार पार्क करके चला गया था जून  ने उसे बुलाया और जितनी जल्दी हो सका उस ऊंचाई से वे नीचे उतरने लगे, सारे लक्षण जितनी तीव्रता से आये थे वैसे ही मिटने लगे और जल्द ही स्थिति सामान्य हो गयी. कई जगह पढ़ा था कि दस-पन्द्रह मिनट से ज्यादा चोटी पर ठहरना खतरनाक हो सकता है.


 वापसी में एक जगह रुककर पुनः हिम की तस्वीरें लीं. नुब्रा वैली पहुंचने से पूर्व एक गाँव खरदुम में चाय पी, छोटे से रेस्त्रां में लोगों का तांता लगा हुआ था, भोजन भी मिल रहा था और चाय, मैगी, कोल्ड ड्रिंक्स भी. ड्राइवर वहाँ का परिचित था उसने वहीं भोजन करने को कहा पर उन्हें गंतव्य पर पहुंचने की शीघ्रता थी, सो उसने खाना खाया और वे आगे बढ़े. कलसार नामक स्थान पर पहुंचे तो ट्रैफिक रुका हुआ था, पता चला सड़क पर कोलतार बिछाने का काम चल रहा है. दूसरी तरफ भी गाड़ियों का काफिला इकट्ठा हो गया था. आधा घंटा वे आराम से बैठे रहे फिर जैसे-जैसे समय बीतने लगा भूख सताने लगी. एक घंटा हो गया तो यही उचित समझा, उतर कर कोई ढाबा खोजें, आगे गये तो कितने ही यात्री वहाँ स्थित होटलों, ढाबों में बैठे थे. एक पंजाबी ढाबे में पंजाबी लडकी ने हमें चावल पर चने-उड़द की दाल जिसमें राजमा भी दिख रहे थे, परोसे तथा साथ में सूखी मिश्रित सब्जी. तब तक ट्रैफिक भी खुल गया था और यात्रा पुनः आरम्भ हो गयी. दिस्कित गाँव में पहुंचे तो दूर से ही एक सुंदर बुद्ध प्रतिमा के दर्शन होने लगे थे जो एक पहाड़ी पर बने मन्दिर के ऊपर बनी थी. चमकदार रंगों से सजी प्रतिमा को देखते ही एक अद्भुत शांति का अनुभव हो रहा था. ऊपर पहुंचे ही थे कि वर्षा होने लगी सो जल्दी ही नीचे उतरकर मन्दिर के भीतर गये जहाँ भगवान बुद्ध, मंजुश्री, तथा तारा देवी कि मूर्तियाँ थीं. दलाई लामा का एक चित्र भी था, पता चला एक बार दलाई लामा वहाँ आकर ठहरे थे. 


आगे की यात्रा का दृश्य अत्यंत मनोरम था, एक ओर ऊंचे पर्वत दूसरी और श्योक नदी का साफ जल तथा हरियाली भी नजर आने लगी थी. जौ की खेती की हुई थी और कहीं-कहीं घाटियों में काली गायें नजर आ रही थीं. हुन्दर गाँव में उन्हें रुकना था जो रेतीले मैदानों तथा दो कूबड़ वाले ऊंटों के लिए जाना जाता है. दोरजी उन्हें ‘रॉयल कैम्प’ में ले गया, जहाँ का वातावरण इतना भाया कि अन्य गेस्ट हाउस या कैम्प देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई. गर्मजोशी से उनका स्वागत हुआ, अरुण नामका केयरटेकर जो दार्जलिंग का रहने वाला था, उसने कैम्प दिखाया, अच्छा लगा. बाहर से श्वेत तथा भीतर से पीले रंग का, फ्लैप वाली चार खिड़कियाँ, एक द्वार जो चेन से बंद होता था, तथा सटा हुआ स्नानघर. सोलर पैनल लगे थे उन्हीं से बिजली भी बनती है तथा सुबह के समय गर्म पानी भी आता है. 

Wednesday, June 17, 2015

बोस्टन की बर्फबारी



आज बहुत दिनों के बाद डायरी का चिर-परिचित पृष्ठ उसके सम्मुख है. मौसम ठंडा है बदली भरा. जून दो दिन की छुट्टी के बाद आज दफ्तर गये हैं. उन्हें घर आये तीन-चार दिन हो गये हैं, अभी तक पूर्व दिनचर्या आरम्भ नहीं हो पायी है. पिछले महीने के मध्य में वे यात्रा पर निकले थे, एक महीने बाद वापस आये तो उसका गला ठीक नहीं था, जो अभी तक भी पूरा ठीक नहीं है. यहाँ इतने दिनों के बाद आकर सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है. सम्भवतः सब कुछ वही है उनका मन ही बदल गया है. पहले सा नहीं रहा. ह्यूस्टन से वे तीन दिनों के लिए बोस्टन गये थे, जहाँ जून के मित्र और उसकी पत्नी ने स्वागत किया. मौसम बहुत ठंडा था, जितने समय वे वहाँ रहे, बर्फ गिरती रही, पहली बार बर्फ से इतने निकट से आमना-सामना हुआ था, वे मंत्रमुग्ध से खिड़की से देखते रहते, बाहर भी गये तो ढेर सारे वस्त्र पहन कर तथा उन लोगों के दिए जूते पहन कर. बोस्टन से वे लन्दन गये जहाँ तीन दिनों में मुख्य-मुख्य स्थान देखे. वहाँ भी ठंड बहुत ज्यादा थी पर बर्फ नहीं गिर रही थी. लन्दन से दिल्ली पहुंचे तो सब कुछ कितना अलग लग रहा था, वहाँ से एक दिन के लिए पिताजी से मिलने घर गये और फिर वापस असम. नन्हे की परीक्षाओं में बहुत कम समय रह गया है. अगले महीने उसके इम्तहान है. अभी-अभी उसे देखा तो पढ़ते-पढ़ते आँखें बंद थीं. जब उसने कहा, सो जाये, तो जग गया, और सीधे होकर बैठ गया.
आज बहुत दिनों बाद गुरु माँ को सुना, कह रही थीं कि बिजली की तार पर जैसे प्लास्टिक की परत होती है और फिर कपड़े की, छूने पर कुछ भी महसूस नहीं होता इसी प्रकार मन पर कितनी परतें चढ़ी हैं तभी तो ईश्वर का नाम लेते रहने पर भी कुछ नहीं होता. वे उस प्रभु को दूर-दूर से ही याद करते हैं, पास आने से डरते हैं क्यों कि ऐसा करने पर अभिमान को तज देना होगा.

एक लम्बे अन्तराल के बाद आज डायरी खोली है. आज सुबह वह हिंदी पुस्तकालय गयी थी. पिछले महीने उसको सर्दी लगी थी और अब एक-एक करके घर में सभी को जुकाम हो रहा है. मौसम हर दिन नये रूप में आता है, कभी तेज-गर्मी तो कभी बरसात के बाद की ठंड. आज सुबह से ही शीतल हवा चल रही है. वह हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डा. राधाकृष्णन की पुस्तकें लायी है. अध्यात्म के अतिरिक्त और कोई विषय नहीं सुहाता, इसी जन्म में मुक्त होना चाहती है. जीवन दुखों का घर है, मन को कितने-कितने विकार तपाते हैं. तन को रोगादि, तथा जरा व मृत्यु तो हैं ही. वह दुखों से भागकर ही मुक्ति चाहती है, ऐसा भी नहीं है, वह उस अवस्था का अनुभव करना चाहती है जो शब्दातीत है, जहाँ सद्गुरु पहुंचे हैं. उसकी साधना में कभी-कभी विघ्न पड़ते हैं पर जैसे सहज भाव से चलते हुए नदी अपनी मंजिल पा लेती है वैसे ही उसकी साधना भी फलवती होगी. सद्गुरु का ज्ञान उसका सबसे बड़ा सहारा है, ईश्वर का प्रेम भी उसमें मिल जाता है और मन का विश्वास तथा हृदय की श्रद्धा और आस्था भी उसमें सम्मिलित है, उसे पथ दिखाने के लिए इतने साधन तो हैं फिर उसके परिजन जो सदा उसका सहयोग करते हैं, वह अपने ज्ञान की परीक्षा परिवार में ही कर सकती है. हृदय कितना निर्मल हुआ इसकी परख व्यवहार से ही होती है.

Friday, April 19, 2013

बेल का शर्बत



आज बिजली ने फिर बहुत परेशान किया, पूरी दोपहर.. फिर शाम को भी गायब रही, नौ बजे के बाद आई. गर्मी भी बेहद थी, पसीना बहा देने वाली गर्मी. दोपहर को पाकिस्तानी लेखक ‘इब्ने इंशा’ की आखिरी किताब के कुछ पन्ने पढ़े. तंज बड़ा चुभता हुआ है इस किताब में. उसने जून को तीन कवितायें भेजने का वायदा किया है, कभी ऐसा होगा कि एक ही पल में पंक्तियाँ फूटतीं जाएँगी....मन उभर कर पन्ने पर अंकित हो जायेगा. शाम को वे भाई-भाभी के यहाँ गए, भाई के स्वभाव में गम्भीरता अभी तक नहीं आई है, बिलकुल बच्चों का सा स्वभाव है उसका. उन्होंने बर्फ वाला बेल का शर्बत पिलाया, जो उसे पसंद नहीं आ रहा था,पर वे दोनों इतनी तारीफ कर रहे थे कि उसने भी हाँ में हाँ मिला दी. आने के बाद से ही उसका गला शिकायत करने लगा था. साढ़े दस हो गए हैं, नन्हा सो गया है, दोपहर को सो नहीं पाया ठीक से, उसके दांत में छोटा सा काला पदार्थ फंस गया  था, उसका पूरा ध्यान नहीं रख पाती, वह कभी-कभी. छोटी-छोटी बात पर टोक देती है, कल से इस बात का ध्यान रखेगी. पापा के प्यार से दूर वह उसके पास ही तो रह रहा है, दोनों का प्रेम देना चाहिए न. उसके लिए उससे बढ़कर कुछ है ?

  आज जून का फोन आया, पर दो-तीन बार कट जाने के बाद, बात पूरी न हो सकने के कारण मन कुछ उखड़ा-उखड़ा सा रहा सुबह. फोन पर वह कुछ उदास भी लगे, शायद उसके खत में मकान की परेशानियों की बात पढ़कर, लेकिन अपने और उनके प्रति ईमानदार तो रहना ही चाहिए. उसने सोचा, वे दोनों कितने भी चिंतित हो लें, बातों को दिल से लगा लें. होना तो वही है जो होना है, जहां तक हो सके अपने आपको इन सारी दुनियावी बातों से ऊपर ही रखना चाहिए. उसने सोचा, वैसे भी जून का दिल बहुत बड़ा है, वह सदा की तरह उसकी भूल को भुला देंगे. दोपहर को भाभी, भतीजी आ गए सो घर में हलचल रही. उसने तुलसी-अदरक की चाय पीकर गले को ठीक किया.

 कल से घर के बाहर की पुताई शुरू हो जायेगी. कल शाम को वे अपने घर की छत पर गए, छत पर पड़ी मार्बल चिप्स को बोरी में भरकर रखा, पिता भी वहीं थे. नन्हा भी, शायद उसी धूल से उसकी आँखें फिर हल्की लाल हो गयी हैं. माँ-पिता उनके मकान के लिए कितना श्रम कर रहे हैं. वे सदा उनका भला चाहते हैं, किसी का बुरा न चाहने वाले सीधे-सादे स्वभाव के... सब्जी वाले ने थोड़ी सब्जी ज्यादा दे दी तो परेशान हो जाते हैं कि कल जाकर उसे पैसे  दे देंगे. सुबह पॉलिश लाए तो सोच रहे थे कि गलती से कहीं दुकानदार ने कम पैसे तो नहीं ले लिए. उस दिन अखबार वाले को चालीस पैसे देकर ही माने. मनोरमा में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कवितायें पढीं.