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Tuesday, September 27, 2016

कांगड़ी की आग


यहाँ इस कमरे में झींगुर की आवाज आ रही है. उसके भीतर कुछ पंक्तियाँ गूँज रही हैं.
तुमने ही सींचा है दुःख को
निज प्राणों से सींचा है
साहस करके छोड़ उसे दो
जिसको खुद ही भींचा है
तुमने ही जो राह बनायी
तुम्हीं उसे मिटा सकते हो
काँटों से जो भरी हुई है
तुम्हीं उसे तज सकते हो
खोज रहे हो जिसे जगत में
वह न कभी पा सकते हो
कठिन सही भीतर जाना पर
तुम ही तो जा सकते हो
उलझे हुए हैं सारे रस्ते
जो भी बाहर जाते हैं
एक ही रस्ता भीतर को है
जिस पर संत सभी आते हैं
विधियाँ सारी बाहर-बाहर
छिपा खजाना भीतर है
जब तक स्वयं को खो न डालो
खुद को न पा सकते तुम
स्वयं को खोकर स्वयं को पाते
यह सब प्रश्नों का उत्तर है !

जीवन को यदि एक सुमधुर संगीत में बदलना हो, एक सुंदर चित्र में बदलना हो या एक कविता में ढालना हो तो जीवन में एक लय की बहुत आवश्यकता है. एक नियम, एक मर्यादा का यदि पालन नहीं किया तो जीवन एक अभिशाप बन जाता है. सभी कुछ समय पर हो तथा सभी कृत्यों को सम्मान मिले. यहाँ कुछ भी हेय नहीं है. प्रातः काल उठना भी जरूरी है और रात्रि को समय पर सोना भी. दिन में आधा घंटा विश्राम भी जरूरी है और नियमित व्यायाम भी. जीवन का एक ही पक्ष यदि दृढ़ हो शेष नहीं तो जीवन बेडौल हो जायेगा. कल दोपहर से देर रात्रि तक वह अस्वस्थ थी, कारण थी मर्यादाहीनता. पिछले दिनों दिनचर्या सुचारुरूप से नहीं चल पाई, कभी देर तक पुस्तक लेकर बैठी ही रह गयी, कभी बिना भूख लगे ही क्योंकि समय हो गया था, भोजन कर लिया, कभी अधिक खा लिया, कभी कोई मिलने वाला आ गया तो चाय ज्यादा हो गयी. आज सब कुछ नियमित चल रहा है. पिछले दिनों नियमित साधना भी नहीं की, मन कुछ ज्यादा ही वाचाल हो गया है, उसे साधना होगा, नियमित ध्यान बहुत जरूरी है. जून कल मुंबई से लौट आयेंगे. मौसम अच्छा हो गया है. दिसम्बर की धूप भाने लगी है, पिछले बरामदे में बैठे हुए उसके पैरों पर धूप पड़ रही है, जो सुहा रही है, तेज नहीं लग रही. अस्वस्थता उन्हें स्वास्थ्य की कद्र कराती है, स्वस्थ होने पर वे लापरवाह हो जाते हैं. आज सुबह बड़ी भाभी व भतीजी से बात की, उसका जन्मदिन था. सर्दियों में पिछवाड़े नैनी क्वार्टर्स से कितनी आवाजें सुनाई पड़ती हैं, सब घर के ठंडे कमरे छोडकर बाहर धूप में आ जाते हैं. यूरोप में ठंड बढती जा रही है, काश्मीर में लोग कांगड़ी खरीद रहे हैं, गर्म अंगारों को फिरन के भीतर रखते हैं, मौसम की मार से बचने के लिए आग को अपनी देह के साथ सटा कर रखते हैं. जीवन कितना विचित्र है, महाश्चर्य है.

इसी महीने मंझले भाई व भाभी के विवाह की पचीसवीं सालगिरह है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. दोनों का विवाह भी अनोखी परिस्थितियों में हुआ. बड़ी भाभी की छोटी बहन से विवाह का शुरू में विरोध हुआ था, घर में किसी को भी पसंद नहीं आया था यह कार्य. लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया और अब तो सभी को लगता है दोनों एक-दूजे के लिए बने थे. दोनों की एक बेटी है जो होशियार है, धीर-गंभीर है. अपना घर है, धन-दौलत है, कोई कमी नहीं है. भाई ने इंजीनियरिंग की, भाभी ने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से पढ़ाई की, कुछ वर्ष नौकरी भी की विवाह से पूर्व. देखते-देखते समय बीत गया और आज पच्चीस वर्ष हो गये हैं.


Tuesday, May 19, 2015

गुलाबी धूप



उसे लगता है, अन्तर्मुखी होकर जिसे भीतर पाया है, ऑंखें खोलकर उसे गंवा देती है. मौन रहकर जो शक्ति एकत्र होती है, बड़बोलेपन के एक झटके में वह बह जाती है. अपनी भाषा अपने मन पर नियन्त्रण कभी-कभी नहीं रहता, कभी क्रोध का भाव कुछ क्षणों के लिए हावी हो जाता है और कभी वाणी सुमधुर नहीं रहती, अपना होश नहीं रहता न, पर फौरन मन चपत लगाता है और वह सचेत हो जाती है पर तब तक हानि तो हो चुकी होती है. साधना के पथ पर चलना हो तो छोटी-मोटी इच्छाओं को तिलांजलि देनी ही पड़ती है बल्कि वे सहज रूप से स्वयं ही छूटती जाएँ तभी ठीक है. अभी-अभी जून का फोन आया. कल रात को साढ़े सात बजे वे गन्तव्य पर पहुंचे फिर पौने नौ बजे तक गेस्ट हाउस. रूम न. तथा फोन न. दिया है, वह कल से सुबह उन्हें फोन कर सकती है. आज सुबह की शुरुआत ठीक वैसे ही हुई जैसे जून के होने पर होती थी. मौसम आज भी मधुमय है, सर्दियों की गुलाबी धूप खिली है, नन्हा भी समय से उठकर स्कूल जा सका. उसकी ओर पहले से अधिक ध्यान देना है.

आज सुबह नींद अपने आप खुल गयी. नन्हा ट्यूशन गया तो बाहर अँधेरा था, ठंड भी बहुत थी. उसने सुबह के सभी आवश्यक कार्य किये, टिफिन बनाया पर बस स्टैंड तक जाकर वह लौट आया, आज ‘असम बंद’ है. किसने किया है, कितने समय का है कुछ पता नहीं है. जून से बात हुई, वहाँ भी धूप निकली है. कुछ देर पूर्व ससुराल से फोन आया, पिताजी ने कहा माँ कह रही थीं कि जून उन्हें भी फोन करें. आज सुबह जून ने भी उससे कहा, वह घर पर फोन करे. उसने किया तो वह अभी सो रही थीं. शायद वहाँ ठंड बहुत है. गुरूमाँ ने कहा जब तक कोई ध्यान में उतरकर अपने अकेलेपन से प्रेम करना नहीं सीखेगा, उसे बार-बार जन्मना पड़ेगा. मृत्यु के बाद और जन्म से पहले हरेक अकेला होता है अपने मन के साथ और उससे बचने के लिए ही जन्म लेता है. उसे तो उसका अकेलापन बेहद प्रिय है अर्थात वह मृत्यु के बाद भी प्रसन्न रहेगी. बाबाजी ने कहा, जीवन में सुख,शांति व समृद्धि सदा बनी रहे, ऐसी कामना को प्रश्रय देना भी मूर्खता है बल्कि होना यह चाहिए कि सदा वह मनसा, वाचा, कर्मणा सद्मार्ग पर स्थित रहे, सजग रहे. अपना हित अथवा अहित मात्र उसके हाथ में है. अपने सुख-दुःख, शांति-अशांति के लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है, बल्कि अपने सद्कर्मों से जो फल की आशा से न किये गये हों, वह पुराने कर्मों को काट भी सकती है. नया बीज तो बोना ही नहीं है, यही साधना है !

जगजीत सिंह की गजल नैनी का बेटा सुन रहा है, आवाज यहाँ तक आ रही है. उनकी आवाज में एक कशिश है जो अपनी ओर खींचती है. वह पीछे बरामदे में धूप में चटाई बिछाकर बैठी है, नन्हा स्कूल गया है. कल रात्रि उसे मैथ्स बताते-बताते सोने में देर हुई, सो सुबह भी सब काम देर से हुए. कल शाम जून का किसी के हाथ भेजा सामान मिला, अखरोट, रेवड़ी, बड़ी आदि.. शाम को सत्संग में गयी, माँ का भजन गाते-गाते सचमुच माँ की स्मृति हो आई और आँखें भर आयीं. भजन गाने में एक अनूठा ही आनंद है, पूरे मन से गाने का आनंद, सही-गलत की परवाह किये बिना ! आज सुबह से कई सखियों से फोन पर बात हुई, परसों शाम एक सखी आई, थी उसके पहले दिन एक और, सो दिन ठीक-ठाक बीत रहे हैं. वैसे भी जब अंतर्मन में कृष्ण का वास हो तो अकेलेपन की बात ही नहीं रहती, बल्कि कभी-कभी मन स्वयं ही परेशान हो जाता है दुनियादारी में ज्यादा व्यस्त रहने पर, उसे अपने प्रेम और भाव में डूबने का जब पर्याप्त समय नहीं मिलता. कृष्ण को स्मरण करने के लिए वैसे अलग से समय निकलने की भी जरूरत नहीं है. सुबह क्रिया में, फिर काम करते वक्त, भजन सुनने में, सत्संग सुनने में, व्यायाम करने व भोजन बनाने में वह हर वक्त उसके साथ ही रहता है, सिवाय तब जब पढ़ती या पढ़ाती है. उसके दौरान भी उसकी स्मृति रहती ही है, बल्कि उसके होने से ही वह है, बल्कि वही तो है...ये सारे प्राणी उसी का तो विस्तार हैं..सबमें उसी की तलाश है.



Tuesday, September 24, 2013

इक़बाल की शायरी


आज मदहोश हुआ जाये रे...मेरा मन..मेरा मन...शरारत करने को ललचाये रे..मेरा मन ..और सचमुच मन बेकाबू हो गया है. इस उम्र में यूँ बहकना कोई शराफत तो नहीं, पर आँखें हैं कि उम्र का लिहाज नहीं करतीं, फिर दिल तो है दिल लेकिन वह सरसराहट जो बरसों पहले महसूस की थी, सोचती थी वह सब पीछे छूट गया पर दुनिया में इतने अफसाने यूँ ही तो नहीं लिखे गये, हर उम्र में एक बचपन छुपा होता है और उसी तरह एक यौवन भी. उसका सुबह का काम हो चुका है, आज बहुत दिनों बाद धनिये की चटनी बनाई है, यहाँ के बड़े-बड़े नीबुओं में रस बहुत होता है, उसी को डाला है खटाई के लिए, उसका अचार भी बन सकता है पर मुश्किल यह है कि खायेगा कौन ? कल दोपहर एक सखी के यहाँ गयी, उसकी छत पर पर एक अपने-आप उग आया एक जंगली बगीचा देखा, अच्छा लग रहा था. जून की गाड़ी खिड़की से दिखाई दी सो उसने लिखना बंद किया.

कल जो तामसिकता मन पर छाई थी आज उतर गयी है और एक बार फिर हे ईश्वर ! वह उसकी कृपा के घेरे में आ गयी है. रास्ता भटक गयी भेड़ फिर चरवाहे के पीछे-पीछे चलने लगी है. भटकाव में काँटों ने उसे लहुलुहान कर दिया था और आँखों में जहरीले पत्तों का रस चला गया था, वह जो कुछ देख रही थी वह भ्रामक था पर अब चरवाहे ने उसको पहले सा स्वस्थ कर दिया है. आज भी हल्की-हल्की फुहार के बीच बसंती बयार बह रही है. पीटीवी पर इक़बाल की नज्म सुनी- ‘सूरज’

चाँद तारों के ऊपर जाते-जाते सूरज
श्याम सियाह अमा को उफक से लाली के फूल दे गया...

कुछ ऐसे ही थी पहली लाइन, इक़बाल की शायरी की एक किताब उसके पास भी है, उसने सोचा आज पढ़ेगी. और better sight without glasses पढ़ने का विचार भी कई दिनों से है. स्वामी रामतीर्थ की पुस्तक भी अभी पढ़नी शेष है. पिछले दिनों उसने अख़बार और पत्रिकाओं के अलावा कुछ नहीं पढ़ा, शायद इसी का असर हो कल की अहमकाना हरकतों पर..खैर, अब आज का तस्सवुर करना चाहिए.

किन राहों पर चलना होगा कितनी दूर ठिकाना है
तेरी आवाजों के पीछे और कहाँ तक जाना है

यह शेर किसी हद तक उसके दिल की हालत बयाँ करता है. अक्टूबर का महीना शुरू हो गया है यानि हरसिंगार की भीनी-भीनी खुशबू का महीना, दीवाली की तैयारी और घर की सफाई का महीना. २९ अक्तूबर को माँ-पापा भी आ रहे हैं उनके आने से दीवाली की खुशी दुगनी हो जाएगी. नन्हा आज भी cubs की ड्रेस पहन कर गया है, उसके स्कूल में इंस्पेक्शन है. कल कह रहा था की हिंदी के टीचर कह रहे हैं, दो दिन स्कूल में ड्रामा चलेगा. हर जगह आडम्बर है, ऊपर से कुछ अंदर से कुछ, सच से लोगों को घबराहट होती है, डर भी लगता है.

आज से ठंड का अहसास बढ़ गया है, सुबह स्नान करते समय भी गर्म पानी की आवश्यकता महसूस हुई और इस समय पंखा चलाने पर ठंडक महसूस हुई. गुलाबी ठंड वाली सर्दियां उसे अच्छी लगती हैं आज एक तेलुगु सखी जा रही है, पिछले दस-बारह वर्षों का उनका परिचय था, एक बार मिलकर आने का मन है. जून को एक-दो बार कहना पड़ेगा लेकिन फिर वह मान ही जायेंगे. आज वह नन्हे के खिलौनों का शोकेस भी साफ करेगी. कल उसके हिंदी अध्यापक ने एक लेख लिखने को कहा था, स्कूल जाने तक लिख रहा था.

परसों वे तिनसुकिया गये और डाइनिंग टेबल का ऑर्डर दे ही दिया, कल यानि मंगलवार को यहाँ आ भी जाएगी, थोड़ी मंहगी है पर जून को सस्ती चीजें पसंद भी कहाँ आती हैं. उनके घर के बाहर किचन गार्डन में डालने के लिये जो मिट्टी का ढेर पड़ा है उस पर चढ़कर बच्चे खेल रहे हैं, दिल कहता है खेलने दो पर दिमाग का तकाजा है कि मिटटी बिखर जाएगी और व्यर्थ जाएगी. सो मना करन ही ठीक है. उसकी बांयी आँख से कुछ दिन से पानी आ रहा है, शायद tear duct block हो गयी है. मेडिकल गाइड में पढ़ा अपने आप भी खुल सकती है. कल छोटे भाई और दीदी के पत्र मिले, विस्तृत पत्र.. बड़े मन से लिखे गये हों जैसे. उसका मन कृतज्ञता से भर गया.





Sunday, August 11, 2013

प्रेम का इन्द्रधनुष



Love is the light of life and its first colour is patience. Today in the morning Dada J P. Vasvani told this beautiful discourse. These morning thoughts have become essential for her. Yesterday she could not listen and felt some void whole day. Today while Nanha was dressing for school she tried to explain him the importance of patience but he was not ready to listen about such things, perhaps he is young yet or that was not the proper time or proper way to tell him such serious things. Today’s children or children of any age do not like “updesh” they want practical examples. Yesterday she was frightened, when jun took about 2 hours to reach home, she was praying for his safety, was it love or her cowardliness ? Then they went to a friend’s house, she made nice tea and served papad. Yesterday they got another letter from father, he knew about that check which they sent for them but they have not accepted it.

The second colour in the spectrum of love is ‘kindness’. Kindness towards all living beings. The opposite of love is not hate but apathy or indifference towards others, animals and birds. Today dada vasvani told about 2nd ray of love and she is feeling such a void in her heart, so many times she did not show any type of kindness towards animals, for a fleeting moment a thought came in mind but could not help them practically. There is a feeling of indifference towards poor and beggars too. She could not help them by money but at least she can listen them but knows in her heart of heart that it will not be possible too… then the solution is whenever and where ever the situation arises she should try her best and rest is will of God. When He is with us, why to worry? Yesterday she stitched a frock for her niece and one will stitch today. Today is sunny weather.  और हमेशा की तरह भाषा की जंजीर ने रास्ता रोक दिया था, विचारों का प्रवाह रुक गया था और ऐसा होने पर मस्तिष्क जैसे एक दबाव महसूस करने लगता है. कल The Dangerous Fortune के कुछ और पेज पढ़े, आज समय नहीं मिल पायेगा. उसकी दायीं आँख में चुभन हो रही है इससे भी लिखने में ध्यान केन्द्रित नहीं हो पा रहा है. दूध वाला भी घंटी बजा रहा है.

Today morning she got up early and could listen from the beginning. Dada told some practical suggestions to attain the peace of mind. He stressed on taking the things easy and to meditate for some time daily, at same time. She sat in silence after reading Gita and felt some unusual calmness and concentration which was not possible without some help and help was from God. She did not feel the weight of her limbs and not a single thought other than meditation came to her mind. It was a great experience. Later  the whole day she was immersed in some different kind of peace of mind and body. आज मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, अभी कुछ देर पूर्व वे टहल कर आये, गर्मी लग रही थी. इस सर्दियों की पहली शाम जब स्वेटर से उलझन हो रही थी. होली भी आने वाली है और मार्च का आरम्भ हो चुका है. यानि वसंत का मौसम और शीत का प्रस्थान.











Wednesday, May 15, 2013

चांगलांग - अरुणाचल प्रदेश का सुंदर शहर



नये वर्ष का शुभारम्भ हुए तीसरा दिन है, पिछले दो दिन वे सभी मित्रो से मिलकर नये वर्ष की मुबारकबाद देने में व्यस्त रहे, कल दो गुलाब के पौधे अपने बगीचे में लगाये, मैरून और हल्का नारंगी रंग का गुलाब, अब छह रंगों के गुलाब उनके बगीचे की शोभा बढ़ा रहे हैं. डहेलिया में हल्के पीले रंग का पहला फूल खिला है लाल बस खिलने को है. सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं इन दिनों, पानी इतना ठंडा कि हाथ लगाने से डर लगता है. नन्हे का स्कूल क्रिसमस के अवकाश के बाद आज खुला है. घर कितना शांत लग रहा है इस समय. ईश्वर की दया का, कहना चाहिए स्नेह का एक और उदाहरण अज ही सम्मुख आया, वह हर वक्त सबकी सहायता करता है बस एक पुकार ही काफी है. कल उसकी उड़िया सखी चली जाएगी फिर न जाने कब मिलना हो, अपने उस दिन के व्यवहार से उसके पतिदेव ने उनलोगों के जाने का दुःख हल्का कर दिया है, इसके लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए. जून ने कल फोन पर दोनों घरों में सभी से बात की, उनके घर फोन लग जाने पर कितना आसन होगा सभी के समाचार लेना.

सुबह दस बजे की सुनहली धूप में बालों को सुखाने के लिए कुछ वक्त चुरा लेना कितना भला लग रहा है, अभी किचन में आधे घंटे का काम शेष है. कल शाम जून को वह टोपी, जो उसने अपने दिल का सारा प्यार पिरोकर बुनी है, बहुत पसंद आई. अब उनके लिए वुलेन बूटीज शुरू की हैं. कल शाम उन्होंने ‘पपीहा’ फिल्म का शेष भाग देखा, अच्छी लगी सई परांजपे और उनकी बेटी विनी की यह फिल्म. कल माँ का नन्हे के लिए बनाया स्वेटर व हैट मिल, दोनों बहुत सुंदर हैं, जादू है उनके हाथों में. छोटी बहन का कार्ड और छोटा सा खत भी. मंझले भाई का पत्र भी आया है, नये वर्ष के कार्ड्स भी हर दिन आते ही जा रहे हैं.

  कल शाम वे क्लब गये, वहाँ की साज-सज्जा काफी बदल गयी है, पहले से ज्यादा सुंदर लग रहा है. इस बार क्लब मीट में वे नहीं जा पाएंगे. उसी दिन नन्हे को लेकर डिब्रूगढ़ जाना है एडमिशन टेस्ट दिलाने. सुबह-सुबह नाश्ते के लिए सब्जी काटने से खास तौर पर आलू काटने से उसके दायें हाथ का अगूँठा कितना मैला सा लग रहा है, अचानक उसका ध्यान जब हाथ पर गया तो उसने सोचा अबसे दस्ताने पहन कर सब्जी काटेगी. जून ने बताया, ‘चांगलांग’ जाने के लिए इनर लाइन परमिट तथा गेस्ट हाउस में बुकिंग के लिए कह दिया है, बीहू की छुट्टियों में वे वहाँ जायेंगे.    

Wednesday, May 8, 2013

सैंड प्रोड्यूसिंग वैल




   पिछले हफ्ते पहले जून को सर्दी-जुकाम हुआ फिर उनका ठीक होते न होते उसे हो गया. आज भी हल्की खराश गले में बाकी है.  बदलते हुए मौसम की पहली सौगात...खैर अब सब ठीक है, अंशतः और अंततः भी. कल बिल्ली की मालकिन आ रही है, देखते-देखते तीन हफ्ते बीत गए वक्त अपनी रफ़्तार से गुजरता जाता है, वे ही हैं कि वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं. मौसम भी बदलते रहते हैं. ठंडक सुबह-शाम बढ़ने लगी है.

  फ्रिज की आवाज और घड़ी की टिकटिक को छोड़कर कितनी नीरवता छायी है. पिछले दो-तीन दिनों की तरह धूप आज भी नहीं निकली है. जून शायद आज देर से आयें, उनकी व्यस्तता sand producing well  पर चल रहे कार्य के कारण ज्यादा ही बढ़ गयी है. रात को इतना थके होते हैं कि खाना खाते ही सो जाते हैं, दोपहर का आराम तो गुजरे दिनों की बात हो गयी है, लेकिन  इस तरह उन्हें काम में व्यस्त देखकर उसे अच्छा लगता है, एक संतुष्टि का भाव उनके चेहरे पर भी छाया रहता है, थकान के बावजूद.

  आज धूप खिली है, सर्दियों की शुरुआत की एक अच्छी सी भोर..जून आज घर पर हैं. नन्हे के स्कूल में कल ‘बाल दिवस’ पर फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता थी, उसे बहुत आनंद आया. शाम को वे उड़िया परिवार से मिलने गए उनके बेटे के जन्मदिन पर. कल नन्हा तीन साल पुरानी उसकी डायरी निकल लाया और एक पेज खोलकर पढ़ने लगा, नहीं पढ़ पाया तो उसे पकड़ा दी, उसने देखा छब्बीस जनवरी का विवरण लिखा था, जून को भी तब समझ में आया कि डायरी लिखना कितना सुखदायक हो सकता है. यूँ तो उन्हें उस दिन की कोई बात याद नहीं थी, हजारों दूसरे दिनों की तरह वह भी बीत गया लेकिन वे छोटी-छोटी बातें जो उसने उस दिन कागज पर उतार ली थीं, हमेशा रहेंगी उन पन्नों पर.

   आज भी मौसम अच्छा है, मधुर, गुलाबी ठंडक लिए, लगता है हर वक्त वे एसी में बैठे हैं, एक ठंडा सा अहसास गालों को छूता हुआ सा रहता है. कल दोपहर जून और उसने बगीचे में काफी देर तक काम किया, माली से भी करवाया, तीन नए पौधे भी लगाये, दो गुलाब और एक मुसन्दा. मूली भी फिर से लगाई. गुलदाउदी में कलियाँ आने लगी हैं, बिलकुल वैसी ही जैसी उसने स्वप्न में देखी थीं. कल शाम जून ने कुकिंग बुक में पढकर सांभर बनाया, बहुत जायके दार बना, और अब से वे लोग बाजार से सांभर पाउडर नहीं लायेंगे. नन्हे का आज दूसरी यूनिट टेस्ट है, उसे हॉस्टल भेजना उस पर अन्याय करना ही होगा, जिस तरह वह  आँखों में पानी भर लाता है, हॉस्टल जाने की बात पर.

    आज सुबह व्यस्तता में गुजरी, सो दोपहर के पौने एक बजे वह लिखने बैठी है. Baked cabbage, beans, peas with white sauce बनाने में समय कुछ ज्यादा ही लगता है, फिर पीछे आंगन में कल ब्लीचिंग पाउडर डलवाया था,  सुबह नन्हा तो वक्त से तैयार हो गया था फिर भी रोज की तरह एकाध बार तो उस पर झुंझलाई ही. आज उसका हिंदी का टेस्ट है और कल ‘गुरुपर्व’ का अवकाश. कल शाम एक परिवार मिलने आया था, उनके बच्चे ने ला-ओपेला की एक कटोरी तोड़ दी, माँ को बहुत बुरा लगा, यूँ शायद वह उसकी जगह होती तो उसे भी बुरा लगता, पर कल थोड़ा भी नहीं लगा, यूँ भी भौतिक वस्तुओं के प्रति इतना लगाव होना ठीक नहीं न. आज शाम दो परिवार आने वाले हैं, इसी तरह मिलने-जुलने रहने का नाम ही तो जिंदगी है. 

Thursday, July 26, 2012

सर्दियों का सूरज




आज बुधवार है, पिछले बृहस्पतिवार उसे सर्दी लगी, जो जुकाम और कमजोरी में बदल कर सोमवार को भागी और इतवार की रात नन्हें को भी उससे सर्दी लग गयी. दिन भर स्वस्थ रहता है पर रात को उसका जुकाम बढ़ जाता है. ठंड भी तो कितनी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिनों से लगातार होती वर्षा के कारण. पर सोम, मंगल को भी डायरी न उठाने का कारण है जून की अनुपस्थिति, दो दिन के लिये वे खरसांग गए थे, कल शाम ही वापस आये हैं, कल दीवाली है इसलिए. वैसे भी वहाँ अभी कार्य नहीं था, एक बार फिर जाना होगा तीन-चार दिन के लिए. सुबह के समाचारों में अभी-अभी हुए आतंकवादियों के हमले के बारे में बताया जा रहा है. पता नहीं कब छूटेगा भारत इनके चंगुल से.
आज इंदिरा गाँधी का जन्मदिन है, अगर वह होतीं तो...कितने हफ्तों बाद डायरी उठाई है. सब कुछ व्यवस्थित लग रहा है. बस वह जून का पहले की तरह ध्यान नहीं रख पाती, नन्हें के साथ व्यस्त रहती है, उनके पास शाम का कुछ खाली समय रहता है, जिसमें कुछ कर सकते हैं उसने सोचा, वह उनसे किसी नए कार्य को शुरू करने की बात कहेगी. नन्हा आज देर से उठा अभी उसका स्नान नही हुआ है, वही रात का कुरता पहने है, अच्छा लगता है उसमें वह, शाम को उसकी वह बंगाली मित्र आपने माँ-पापा के साथ आ रही है. अब नन्हे ने ऊं ऊं शुरू कर दिया है.

नवम्बर का आखिरी दिन. सर्दियाँ अपने पूरे शबाब पर हैं. सुबह का सूरज बहुत सुखदायी है और गुलाब ज्यादा लाल हो गए हैं. अब जून को ठंड लग गयी है. धूप तेज हो गयी है वह बाहर से उठकर बरामदे में आ गयी. कल बड़े भाई का जन्मदिन है, उसने मन ही मन उन्हें शुभकामना दी.