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Thursday, June 18, 2015

श्याम सुंदर का आगमन


आज कृष्ण जन्माष्टमी है, उन्होंने फलाहार लेने का व्रत किया है. मौसम भीगा-भीगा है जैसे उस दिन जब हजारों वर्ष पूर्व कृष्ण ने मथुरा की जेल में जन्म लिया था. कृष्ण उनकी आत्मा हैं, जगत में रहते हुए यदि उनका स्मरण बना रहे तो ही कोई अपने स्वरूप में स्थित रह सकता है. कृष्ण का अवतरण जब-जब भीतर होता है, तब-तब कोई अपने में स्थित होता है, अन्यथा स्वरूप से हट जाता है. कितने नाम हैं कृष्ण के, श्यामसुन्दर का अर्थ उसने सुना, श्याम हो गयी आत्मा को जो सुंदर बना दे वही है श्यामसुंदर ! गोपियों ने कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण किया था पर राधा ने स्वयं को मिटा ही दिया. स्वयं को मिटाकर वह कृष्ण रूप ही हो गयी. जब वह कृष्ण से अलग रही ही नहीं तो कैसा विरह, कैसी पीड़ा. विसर्जन करना बहुत कठिन है, अहम् का विसर्जन, शक्ति, समय, सेवा का विसर्जन, प्रिय के साथ एकाकार हो जाना. भक्त भगवान को स्वयं से अलग मानकर उसकी पूजा करता है, वह अपनी निजता को बचाए रखता है पर ज्ञानी भक्त स्वयं को मिटा देता है, वह स्वयं को उनसे अलग कैसे मान सकता है. किन्तु सेवा की यह भावना किसी बिरले को ही प्राप्त होती है. जन्मों के संस्कार अहंकार से मुक्त होने नहीं देते. कर्म का बंधन काटना उनका कर्त्तव्य है, मुक्तामा ही भक्ति कर सकता है. उसने प्रार्थना की, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ भी न करे जो किसी को दुःख दे, ईश्वर उसे सुबुद्धि दे. एक न एक दिन लक्ष्य मिलेगा, अहम् का विसर्जन होगा और वह परम प्रिय परमात्मा के प्रेम की भागी बनेगी. ज्ञान के साथ जीना यदि आ जाये तो संसार में दुःख का नाम भी नहीं दीखता, वही संसार जो पहले अशांति का कारण बन जाता था उसकी जगह एक सुंदर संसार ने ले ली है !
अभी कुछ देर पहले उसे कान्हा की झलक मिली, कितना सुंदर रूप था उसका, ऐसा रूप क्या उसका मन बना सकता है, विश्वास नहीं होता, वह परब्रह्म परमात्मा ही कृष्ण बनकर उसकी बंद आँखों के सामने प्रकट होने आया था. उनके मध्य माया का पर्दा थोड़ा झीना हुआ है, पर्दे के पार से वह कितना मोहक है तो जब सम्मुख आएगा तो हालत क्या होगी. प्रकृति पहले उन्हें तैयार करती है फिर अपने रहस्य खोलती है. उसका मन अभी तक पूर्ण शुद्ध नहीं हुआ है, तभी एक झलक दिखाकर कृष्ण लुप्त हो जाते हैं. शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा तीनों एक ही बात है. ईश्वर की निकटता का अहसास ही जब इतना मधुर है तो स्वयं ईश्वर कैसा होगा. संतजन इसलिए उसकी महिमा का बखान करते नहीं थकते. सद्गुरु की कृपा भी अनंत है जो अनंत का दर्शन करा देती है. सारा ज्ञान भीतर ही है, कहीं-कहीं वह प्रकट होता है, वे संतजन होते हैं जिनके भीतर का ज्ञान प्रकट होने लगता है.

तन की पीड़ा की झलक अब भी विचलित करती है मन, बुद्धि को, अभी देहात्म बुद्धि का क्षरण नहीं हुआ. क्षण दो क्षण को ही सही पर झुंझला जाता है मन अब भी, अर्थात मन का निग्रह अभी नही हुआ, पर भीतर जाते ही कैसा आनंद मिलता है और तब सब कुछ विस्मृत हो जाता है. सद्गुरु के ज्ञान का आश्रय लेकर स्वयं को समझाने में सफल भी हो जाती है वह. वाणी में कोमलता नहीं तो भक्ति अभी अधूरी है, कभी-कभी न चाहते हुए भी बोलना पड़ता है, तब भी भीतर का प्रेम जाना तो नहीं चाहिए, प्रेम तो सभी से बड़ा है न, प्रेम तो ईश्वर है न, ईश्वर किसी से बात करेगा तो प्रेमपूर्वक ही करेगा, चाहे वह पुण्यात्मा हो या पापी, और फिर वह तो उनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं, तो उसे अपनी वाणी पर प्रतिक्षण नजर रखनी होगी. कठोर बात न निकले, कहने का ढंग भी अप्रिय न हो, साधक यदि सचेत नहीं रहेगा तो पीछे चला जायेगा.        

Friday, May 15, 2015

लोकल बस का सफर


आज फलाहार का दिन है, मन में शांति का अनुभव हो रहा है और तन भी हल्का है. सद्गुरु को कल भी सुना था, मन आनंद से छलक उठा और सारा दिन जैसे एक सुखद स्वप्न की तरह बीता. आज भी सुबह उनकी बातें सुनीं, सीधी सच्ची बातें जैसे वे लोग करते हैं आपस में और उनके शिष्य दिल खोलकर हँस रहे थे. मन को जैसे भीतर तक साफ करके लौटती हैं उनकी बातें. वे सहज हैं जैसे काश वे भी सदा वैसे ही सहज रह पायें. वे भूल जाते हैं और  और व्यर्थ के चिंतन में मानसिक ऊर्जा को व्यय कर बैठते हैं. सद्गुरु ऐसे में झकझोर कर जगाते हैं. उनमें अग्नि की भांति पवित्रता, धरती की भांति सहिष्णुता, गगन की तरह विशालता, वायु की भांति सूक्ष्मता, और जल की भांति शीतलता हो तो वे ईश्वर की निकटता का अनुभव कर सकते हैं. उसके प्रेम का अनुभव तो वे हर पल करते हैं. हर श्वास जो ग्रहण करते हैं उसी का प्रसाद है और श्वास जो वे छोड़ते हैं उसके प्रति उनकी कृतज्ञता है. प्रकाश जो उनकी आँख में है उसी की देन है. पंच तत्वों से देह बनी है, चेतना भी उसी का अंश है.

आज उसने सुना, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक वे अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीने की कला है. वे स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से वे सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. उन्हें कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को उनसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा अभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !

आज नन्हा दिगबोई गया था, लोकल बस से और वापस भी उसी से आया. साथ में आया उसका एक मित्र, वही जिसकी बहन की शादी का सीडी उसने कल देखा था. दोनों मित्र अच्छी तरह से रह रहे हैं, कल सुबह वापस जायेंगे, एक दिन नन्हे को भी वहाँ रहना होगा. सुबह दीदी को फोन किया, चाचीजी का नम्बर चाहिए था, चाचीजी व बुआजी दोनों से बात हुई. चाचाजी के पैर का घाव ठीक नहीं हो रहा है. ईश्वर की दुनिया में न्याय है. अपराधी यदि दुनिया के कानून से बच भी जाये तो भी उसके कानून से नहीं बच सकता. उन्हें हर क्षण सजग रहना होगा. कायिक, मानसिक, वाचिक किसी भी तरह का अपराध उनसे न हो, न किसी अन्य के प्रति न स्वयं के प्रति. सभी में उसी का वास है. जो पीड़ा में हैं उनके प्रति हृदयों में करुणा का भाव जगे, दूसरों को वे उसी प्रकार माफ़ करें जैसे ईश्वर उन्हें करता है. वह उनके हजार अपराध माफ़ करता है फिर भी वे चेतते नहीं हैं. ज्ञान ही मुक्ति का उपाय है, ज्ञान ही भक्ति का प्रेरक है.    


Tuesday, May 21, 2013

शिवरात्रि का व्रत



सोमवार की सुबह वे तेजपुर के लिए रवाना हुए. नन्हे के इन्टरव्यू के बाद परसों, मंगल की शाम को वापस आये. कल सुबह घर व कपड़ों की सफाई में गुजर गयी. जून को पूरा विश्वास है, दाखिला हो जायेगा. उन्हें स्कूल की इमारत काफी शानदार लगी, अभी फर्नीचर वगैरह नहीं थे कक्षाओं में. पहली अप्रैल से स्कूल शुरू हो रहा है. इतने कम समय में कैसे होगा और अभी टीचर्स का इन्टरव्यू भी होना शेष है. लेकिन ये सब स्कल वालों की समस्याएं हैं. उनके सामने  है, नन्हे की कक्षा तीन की वार्षिक परीक्षा. जिन बातों का कोई हल नहीं उन्हें वक्त पर छोड़ देना ही बेहतर है. नन्हे ने कल पहली बार स्वयं बोर्डिंग स्कूल जाने को कहा, वे जानते हैं, वह  वह खुश रहेगा और कक्षा में अच्छे विद्यार्थियों में से भी. तीन महीने शुरू में रहने के बाद दो महीने की छुट्टियाँ होंगी. जिन्दगी में परिवर्तन होगा, पिछले नौ-दस सालों से चली आ रही जिन्दगी में.
आज फिर कुछ दिनों के अन्तराल के बाद डायरी खोली है. कुछ दिन अस्वस्थता और फिर अव्यवस्था, यानि ओढ़ी हुई व्यस्तता. आज माह का अंतिम दिन है. सुबह से वर्षा के कारण  मौसम काफी ठंडा हो गया है. कल शाम नन्हे को जून ने किस बात पर डांटा तो वह बहुत रोया, उसके डांटने पर वह इतना परेशान कभी नहीं होता. कल शिवरात्रि का व्रत था, जून ने भी उसका साथ दिया और उन्होंने सिर्फ फलाहार किया, शाम को मन्दिर गये पर विधि के अनुसार पूजा करना उसे आता ही नहीं है, सिर्फ दर्शन करके आ गये. पिछले कई महीनों से उसने कोई कविता नहीं लिखी, अपने आप से सम्बोधित होते हुए अपने करीब जाते हुए कतराने लगी है, कविता तभी उपजती है जब अपने अंतर में झांक कर पूरे दिल से कुछ महसूस करें, ऊपर –ऊपर से शान्त दिखने वाल मन रूपी सागर के अंदर जो खलबली मची है उसे देखना होगा, एक दर्द से दो चार होना पड़ेगा, पिछले दिनों जून धर्मयुग की कई प्रतियाँ एक साथ लये, क कविताएँ उनमें अच्छी थीं. छोटी बहन ने उसके खत का जवाब नहीं दिया, अपनी जिन्दगी की बागडोर जब तक वह स्वयं अपने हाथ में नहीं लगी, खुश नहीं रह पायेगी, जितनी जल्दी यह बात समझ ले अच्छा है. ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर लिखी कविता के लिए उन्हें पुरस्कार मिला है, हिंदी दिवस पर एक नारे के लिए भी एक पुरस्कार घोषित हुआ था. एक  स्वेटर पूरा हो गया है, अब दूसरा शुरू किया है.