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Saturday, April 11, 2020

श्वेत गुलाब


पौने ग्यारह बजे हैं. आज का दिन कुछ भारी है शायद या फिर अभी वह अनाड़ी है. आज सुबह कार लेकर गयी, कालोनी में ही एक चक्कर लगाया, वापस आयी तब तक भी ड्राइवर नहीं आया था , सो अकेले ही बाजार चली गयी, ट्रैक्टर को ओवरटेक करते हुए गाड़ी का बायां भाग लग गया. कार को गैराज में ले जाना पड़ेगा. कल रात को नींद खुलती रही, फिटबिट सब खबर रखता है. बहुत दिनों बाद सब्जी में प्याज डाला, कैसी अजीब सी लग रही थी उसकी गंध. सात्विक भोजन खाकर  तन-मन दोनों ही हल्के रहते हैं. एक सीनियर महिला ब्लॉगर ने उसकी तीन पोस्ट्स को ब्लॉग बुलेटिन में जगह दी, इसका अर्थ है उन्होंने अवश्य ही उन्हें ध्यान से पढ़ा भी होगा. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं, जून अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. दोपहर को वे गाड़ी बनने के लिए दे आये, दो हफ्तों बाद मिलेगी. अब भविष्य में बहुत सतर्क होकर गाडी को हाथ लगाना होगा, फ़िलहाल कालोनी में चलाना ही ठीक रहेगा. उसके बाद तिनसुकिया गए, छाता बन गया, सब्जियां-फल आदि खरीदे. जून को भी गाड़ी के दुर्घटनाग्रस्त होने का ज्यादा बुरा नहीं लगा, उन्होंने पहली बार इंश्योरेंस क्लेम किया है. कल स्कूल में मीटिंग ठीक रही, अब कुछ महीने बाद स्टेज बनने का कार्य आरम्भ हो जायेगा. समय का सदुपयोग करना हो तो पुस्तक पढ़ने से अच्छा कौन सा काम हो सकता है, कल वी एस नायपॉल की अच्छी सी पुस्तक लायी थी, पढ़ना आरम्भ किया है. नन्हे व सोनू के चश्मे गाड़ी से सामान निकालते समय मिले, उन्हें याद ही नहीं था कि वहां रखे थे.  

‘इंसान जिसके बारे में सोचता है, वैसा ही बन जाता है’. वे वही बन जाते हैं, जैसा वे बनना चाहते हैं, जैसा वे सोचते हैं. मन की गहराई में जो आकांक्षा बलवती होती है, वह एक न एक दिन मूर्तरूप अवश्य लेती है. वह बचपन से ही अध्यापिका बनना चाहती थी, पढ़ना और पढ़ाना, ये दो ही उसके प्रिय कार्य रहे हैं. परमात्मा ने उसे इस योग्य बनाया है कि वह अन्य लोगों को ज्ञान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकती है. आज यदि वह अपने भीतर जाये तो वहां कोई आकांक्षा नहीं मिलेगी, एक मौन और सन्नाटा ! पर वह मौन रसपूर्ण है, एक सहज शांति उसमें से पल-पल रिसती रहती है. खिड़की से बाहर हरियाली नजर आ रही है, पौधे, वृक्ष कैसे शांत खड़े हैं. हवा का एक कण भी नहीं है, आकाश भी थिर है, वर्षा के बाद का खुला, स्वच्छ आकाश ! दूर से पंछियों की आवाजें आ रही हैं और घास काटने की मशीन की भी. अचानक हवा बहने लगी है और अब श्वेत गुलाब की टहनी हिलकर स्थिर हो गयी है. वह जिस आकाश में स्थित है वह तो सदा ही स्थिर है. मन का आकाश भी सदा अडोल है. उसमें विचारों का स्पंदन होता है, जो साक्षी है वही मन बन जाता है और वही स्वयं में ठहर जाता है. नैनी किचन में काम कर रही है, उसने कहा, शरीर में दर्द है, उसे क्रोसिन की दो टेबलेट दी हैं. आजकल उसके पास सिलाई का काम आ रहा है, शायद झुक कर, देर तक सिलाई करने से ही ऐसा हुआ हो. दो दिन बाद गणेश पूजा है. उसी दिन वे बच्चों को नए वस्त्र देंगे. 

Thursday, May 17, 2018

गुलाब की टहनियाँ



सुबह एक अजीब सा स्वप्न देखा, वह एक नदी के तट पर है, उस पार से एक छोटी सी नौका में बैठकर एक नन्हा सा बच्चा उसके पास आता है. उसके हाथों में पीले-सफेद फूलों की एक सूखी माला है, जो वह उसे देता है. वह बदले में उसे कुछ देने के लिए, उसे वहीं छोड़कर भीतर आती है, फूल के बिना गुलाब की टहनियाँ हैं, कांटों से बचाने के लिए वह केवल पत्तियाँ तोड़ती है कि बाहर से किसी महिला के रोने की आवाज आती है, मेरा बच्चा पानी में डूब रहा है, उसे बचाओ, फिर आवाज आती है, डूब गया. वह घर के भीतर से ही समझ रही है कि महिला उसके घर की तरफ हिकारत भरी नजर से देख रही है, तभी नींद खुल जाती है. यह दुःस्वप्न अवश्य ही आत्मा ने जगाने के लिए गढ़ा होगा. आत्मा कितनी विचित्र है, कितनी मनमोहिनी ! सुबह वह स्कूल गयी थी, बच्चों व अध्यापिकाओं के साथ ध्यान किया. दोपहर को काफी दिन बाद ब्लॉग पर लिखा. इस समय रात्रि के दस बजने को हैं. पूरे गर्जन-तर्जन के साथ बाहर वर्षा हो रही है. शाम को देर तक मालिन ने बगीचे में पानी डाला था, और अब बादल भेज रहे हैं. मालिन का बेटा जो कल अस्पताल में भर्ती था आज खेल रहा था. जून कल देहली गये हैं, परसों लौटेंगे. देहली का मकान अगले महीने बिक जायेगा. सप्ताहांत में उन्हें बंगलूरू जाना है.

पौने छह बजे हैं शाम के, कुछ देर में योग कक्षा आरम्भ होगी और एक घंटा कैसे बीत जायेगा पता ही नहीं चलेगा. सुबह एक स्वप्न देख रही थी कि मध्य में ही नींद खुल गयी, कोई कह रहा था, यह तो स्वप्न है, कितना आनंद आया. ऐसे ही एक दिन नींद में भी पता चल जायेगा कि यह तो नींद है और तब स्वप्न आने ही समाप्त हो जायेंगे. दिवास्वप्न तो अब बहुत कम हो गये हैं, हर पल भीतर जागरण की एक धारा बहती रहे, यह प्रयास रहता है. आज क्लब की एक डाक्टर सदस्या से मिलने उनके घर गयी, अगले महीने वह सदा के लिए यहाँ से जा रही हैं. उन्होंने बताया, डिब्रूगढ़ में जन्मी थीं. वे लोग चार भाई तथा तीन बहने हैं, सभी पढ़े-लिखे तथा उच्च पदों पर हैं. पिता चाय बागान में फैक्ट्री प्रमुख थे. उन्होंने आसाम मेडिकल कालेज से डाक्टरी की पढ़ाई की, फिर एपीएससी की परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी में आ गयीं. वर्तमान में वह तिनसुकिया में स्वास्थ्य विभाग में डिस्ट्रिक्ट प्रमुख हैं. स्कूल के समय से ही उन्हें पेन फ्रेंड बनाने का शौक था, पतिदेव पहले पेन फ्रेंड बने, फिर फ्रेंड और अंत में हसबेंड. अब वे समाजसेवा से जुड़ना चाहती हैं. चाय बागान के मजदूरों काम लिए कुछ काम करना चाहती हैं. उसने इन सभी बातों का जिक्र करते हुए उनके लिए एक कविता लिखी, ताकि क्लब की अन्य सदस्याओं को भी उनके कर्मशील जीवन के बारे में जानकारी हो. समाज को ऐसी महिलाओं की बहुत आवश्यकता है.

Wednesday, April 26, 2017

तीन गुलाब


आज दोनों बहनों से बात हुई, छोटी बहन दुबई जा रही थी, उसके पतिदेव को ओमान जाना था. इसी महीने उसके विवाह की वर्षगांठ है. बाईस वर्ष हो गये उनके विवाह को, कार्ड भेजा है. बड़ी के यहाँ खूब वर्षा हो रही है. उन्होंने कहा, उसके जीवन की कहानी पढ़कर उनकी उसके बारे में जो धारणा थी वह टूट रही है. वे अपनी कल्पना से ही किसी के बार में धारणाएं बना लेते हैं, सत्य का उससे कोई संबंध नहीं होता, उसने सोचा उन्हें एक पत्र लिखेगी. जून आज लंच पर नहीं आये, सुबह सात बजे गये थे शाम सात बजे ही आएंगे. सुबह कहा, वह जीत गये, कल उन्होंने ऑफिशियल पार्टी में जूस पीया. अब सत्संग का असर हो रहा है, गुरू का रंग चढ़ रहा है. सुबह साधना भी करते हैं. आसक्ति ही दुःख का कारण है. आसक्ति से प्रमाद होता है, प्रमाद से मद, मद से अहंकार और अहंकार दुःख का भोजन है. आसक्ति मिटने के लिए भीतर का आनन्द मिलना ही एकमात्र शर्त है. आसक्ति के कारण ही कामना उपजती है, कामना यदि पूरी हुई तो लोभ पैदा होगा और न हुई तो क्रोध. परमात्मा से मिलने में रुकावट कामना ही तो है. प्रेम के जिस धागे में यह जगत पिरोया हुआ है, उसे ही परमात्मा को प्रकट करने में सहायक बनाना है. आज क्लब की एक सदस्या से मिलने गयी, उनके लिए विदाई कविता लिखनी है.

अभी–अभी पड़ोस में रहने वाले ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर से मिलने गयी, आने वाले मंगलवार को गुरुपूजा करवानी है. कुछ लोगों को निमन्त्रण भी देना है. आज ठंड फिर बढ़ गयी है, उत्तर भारत में भी कड़ाके की ठंड पड़ रही है. उसे लगता है वे कुछ नहीं होकर अर्थात खाली होकर ही पूर्णता का अनुभव कर सकते हैं. जीवन की यात्रा में उस परम का अनुभव ही एकमात्र सार्थक अनुभव है, पर उसके लिए मन को छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठाना होगा. अप्रमत्त, अप्रमादी बने बिना साधना में प्रगति नहीं हो सकती. कर्मठ, कर्मशील ही भीतर का राज्य पा सकते हैं. जून आज दिल्ली गये हैं, शाम का वक्त है, उसके पास दो घंटे हैं, कुछ पढ़-लिख कर ध्यान करने वाली है.

कल शाम मन ठहर ही नहीं रहा था, देर तक पढ़ती रही फिर टीवी देखा. वे जो भी चाहते हैं उसका विपरीत साथ चला ही आता है, बिन बुलाये मेहमान की तरह. वे प्रेम तो चाहते हैं पर घृणा को जो साथ ही चली आती है, दबा लेते हैं, वही विकार बनकर प्रकट होती है. इसलिए बुद्ध कहते हैं, इच्छा ही दुःख का कारण है. सम्मान की आशा रखने वाले को अपमान के लिए तैयार रहना ही चाहिए. जीवन दो पर टिका है. महाजीवन दो के पार है. पिताजी ने स्वीपर को सफाई के सिलसिले में कोई बात कहनी चाही तो उसने उन्हें टोक दिया, बाद में लगा ऐसा नहीं करना चाहिए थे. उन्हें बात करने के लिए कोई तो चाहिए. उसका काम तो दिनभर मौन रहकर भी चल जाता है. शब्दों को लिखकर ही जो काम हो जाता है, फिर बोलने से सब गलत हो जाता है. कल गणतन्त्र दिवस है, एक छोटी सी कविता लिखी. सकारात्मक भावनाओं की ज्यादा जरूरत है आज वैसे ही वातावरण इतना बोझिल है..गुलाब के तीन बड़े से फूल खिले हैं, अपनी शान में झूम रहे हैं, वैसे हवा तो नहीं चल रही है, पर अदृश्य गति है उनकी जो दिख रही है. पिताजी ने पूरे बगीचे में पानी डाला है, साफ-सुथरा बगीचा अच्छा लग रहा है. काल चक्र निरंतर बढ़ रहा है, उन्हें उसके साथ चलना है. धर्म की धुरी को पकड़ अर्थात अपने भीतर उस एक शांत सत्ता को पकड़ कर उन्हें इस परिवर्तनशील संसार में विहार करना है. जीवन हर जगह है, परमात्मा कण-कण में है, उसका अनुभव करते हुए निर्भार होकर निष्काम कर्म करना है.  

आज पंचायत के चुनावों के कारण अवकाश है. पिताजी का स्वास्थ्य अब उतना ठीक नहीं है. बड़ी ननद की बेटी की शादी मई में होनी तय हुई है पर वे जा नहीं पाएंगे, ऐसा कह रहे हैं. कल शाम माँ के बारे में बहुत सारी बातें उन्होंने बतायीं, जिन्हें वे रिकार्ड करेंगे.

Wednesday, March 2, 2016

बगीचे में गुलाब या घास-पात


दो दिन की गर्मी के बाद आज पुनः वर्षा हो रही है. मौसम पूरे भारत में मेहरबान है. असम के कई गावों में बढ़ आ गयी है. उसका मन उन दुखी लोगों के पास भी जाता है जो बाढ़ से प्रभावित हैं. कल शाम वह पब्लिक लाइब्रेरी की मीटिंग में गयी. अगस्त की तीन तारीख को वे एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन कर रहे हैं. वे बच्चों में पुनः पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, कहानी की किताबें, कविता की किताबें, उपन्यास और भी किताबें..
आज उसने सुना. मीठे बच्चे, जब कोई गुस्सा करे तो उसमें भी दुआएं हैं, वह तो परवश है, पर आप तो शीतल जल डालने वाले बनो. गुलाब का फूल खाद से खुशबू लेता है. दूसरों से उन्हें क्या लेना है यह उन पर निर्भर है. कभी भी यह न सोचें की यह ठीक हो जाये तो वे भी ठीक हो जायें. वे सागर की लहरों को मन मुताबिक नहीं चला सकते तो संसार सागर को भी उसी नजर से देखना चाहिए. व्यक्ति बड़ा या परिस्थिति ?, स्वयं को बदले बिना विश्व परिवर्तन सम्भव नहीं है. ये सभी महावाक्य अनमोल ज्ञान हैं. बुद्धि शीघ्र नकारात्मक भाव में चली जाती है पर जैसे-जैसे उनके संस्कारों में परिवर्तन आने लगेगा वे सदा ही सकारात्मक भाव से बने रहेंगे. ज्ञान को जब वे प्रयोग में लाते हैं तभी वह उनका अपना ज्ञान होता है.
आज बहुत दिनों बाद दोपहर का यह वक्त वह इस ठंडे कमरे में बिता रही है. बाहर तेज धूप है. आज उनके दायीं ओर के पड़ोसी चले गये. कम्पनी से कई लोग जा रहे हैं. नये-नये आ रहे हैं, क्लब में कितने नये चेहरे दीखते हैं जिन्हें वे पहचानते नहीं, एक दिन उन्हें भी यहाँ से जाना होगा और एक दिन इस दुनिया से भी. रामदेव जी कहते हैं उनके लिए एक दिन एक जीवन जैसा है, जो काम एक आदमी एक जीवन में करना चाहता है वह एक दिन में करना चाहते हैं. उसका जीवन यूँ ही व्यर्थ जा रहा है, ऐसा उसे आज लग रहा है. बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं, कुछ पढ़ा भी नहीं, समय ऐसे ही बीतता रहा, व्यस्तताएं तो बहुत रहीं पर सार्थक कुछ नहीं. अब कुछ समय मिला है तो सोच-विचार कर अगले लक्ष्य का निर्धारण करना है. यह नया वर्ष भी आधा बीतने को है. नन्हे को अगले महीने जॉब के लिए इंटरव्यू में बैठना है. वह आज से पंजाब में अकेले है, अगले ग्यारह-बारह दिनों तक अकेले ही रहेगा. एकांत उन्हें अपने भीतर जाने को प्रेरित करता है. नया माली छुट्टी पर गया है, शाम को उसकी जगह दूसरा आयेगा. वे बगीचे में एक छोटा सा तालाब बनवा रहे हैं, कमल के फूल उगाने लिए. जीनिया के फूलों पर आजकल बहुत तितलियाँ मंडराती हैं, असमिया सखी की बेटी ने कहा है, उसे पेड़ों पर एक कविता दिखानी है, आज वही लिखेगी. किताबों पर कविता नहीं मिल पायी. सफदर हाशमी की वह कविता बहुत प्रभावशाली थी, एक दिन मिलेगी अवश्य. सद्गुरू को टीवी पर नहीं देख पाती पर वह सदा स्मृति में हैं.
बहुत दिनों बाद ओशो को सुनने का अवसर मिला. नाव मिली, केवट नहीं, कैसे उतरे पार ?, सद्गुरु के निकट गये बिना प्रेम किये बिना पर नहीं उतर सकते. जमीन तैयार होते ही बगीचा तैयार नहीं हो पता, गुलाब को तो लगाना पड़ेगा पर घास-पात अपने आप ही उग जायेगा. मन यदि संसार से दूर हो गया तो काम हो गया ऐसा नहीं है, उस मन में परमात्मा बसा या नहीं, असली बात तो यह है.
आज उसने फलाहार लिया है, पिछले दिनों गरिष्ठ भोजन खाया, आवश्यकता से अधिक भी. डायरी रूपी मित्र भी नियमित साथ नहीं था. पिछले दो-ढाई महीने जैसे एक स्वप्न में बीते से मालूम होते हैं. आज कई दिनों बाद नन्ही छात्रा पढ़ने आई है. दोपहर को लिखने का कार्य भी शुरू करना है. साधना में भी कमी आ गयी थी, ध्यान के समय को पूर्ववत् लाना है. कल रात नन्हे से उसके ब्लॉग के बारे में बात की. आज की पीढ़ी बौद्धिक रूप से बहुत आगे है. आज का युग ही मस्तिष्क का युग है, भावनाएं जैसे मृत हो जा रही हैं. पुरानी पीढ़ी भौंचक है, वह समझ नहीं पा रही है कि प्रेम व्यक्त करने में यह पीढ़ी इतनी कंजूस क्यों है. प्रेम, श्रद्धा, आदर, दया आदि शब्द जैसे उनके शब्दकोश में नहीं हैं.


Wednesday, January 28, 2015

गुलाब वाटिका




Happy valentine day  जून ने आज सुबह कहा और कहते हुए वह हँस भी रहे थे और वह सोच रही थी कि वह उससे नाराज हैं. मन स्वयं ही अपने मत का शिकार हो जाता है. खुद के बनाये जाल में फंस जाता है. अपनी ही कामना का फंदा उसके गले में पड़ता है, तीनों गुणों के वशीभूत होकर वह संकल्प-विकल्प के चक्रव्यूह में फंस जाता है. सुबह पिता से बात की, छोटे भाई से भी बहुत दिनों के बाद बात हुई. उनकी पीड़ा अभी घटी नहीं है, समय के साथ-साथ सब ठीक हो जायेगा. नन्हे की परीक्षाओं में मात्र दो हफ्तों का समय रह गया है, उसकी पढ़ाई ठीक चल रही है. शाम को जून और वह रोज टहलने जाते हैं, गुलाब वाटिका में नित नये गुलाब खिलने लगे हैं. आज लेडीज क्लब की एक सदस्या से बात की, शनिवार को वह और एक एक सखी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जायेंगे, जो विशेष बच्चों का एक स्कूल है. पिछले कई दिनों से सुबह डायरी खोलने का समय नहीं मिल पाता है. भागवद पढ़ रही है, सारा ध्यान कृष्ण की ओर लगा रहता है. नारद जी ने भक्ति पर कितने सुंदर श्लोक कहे हैं जो सभी की समझ में आ सकें ऐसी सरल भाषा में श्री प्रभुपाद जी द्वारा अनुदित हैं. भगवद की इतनी सुंदर टीका और नहीं मिलेगी. यथारूप भगवद गीता भी उसे डाक द्वारा मंगवानी है. जीवन के अनबूझ रहस्य जैसे सुलझते जा रहे हैं, इसमें अद्भुत ज्ञान छिपा है. कृष्ण उनके अंतर में परमात्मा रूप से विद्यमान हैं, यह ज्ञान आश्वस्त करता है. उन्हें मृत्यु से भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं क्योंकि गुणात्मक रूप से जीवात्मा और परमात्मा एक ही हैं, परमात्मा की शक्ति अपार है !

आवश्यकताएं कम हों तो जीवन सरल हो जाता है. आज बाबाजी खुदीराम बोस की बात बता रहे हैं. फांसी की सजा मिलने पर भी उन्होंने अपना पूर्व सहज हास्य स्वभाव नहीं छोड़ा. मान-अपमान, सुख-दुःख, हानि-लाभ के समय मन में समता बनी रहे तभी वे अपने सहज स्वभाव में रह सकते हैं. संसारी रसों का भोग करते-करते तन-मन क्षीण हो जाता है फिर भी वासना बनी रहती है, किन्तु ईश्वरीय रस का पान करने से शक्ति का अनुभव होता है और वासनाओं का नाश होता है. सुबह ‘जागरण’ में एक वेद मन्त्र का भाव सुना, देवताओं का आशीर्वाद उन्हें मिलता है जो सजग हैं, जागृत हैं, सचेत हैं, पल-पल सचेत रहते हैं. संसार की आसक्ति न रहे और ईश्वर के प्रति प्रीति बढ़ती जाये यही उनके जीवन का लक्ष्य होना चाहिए. जीवन भर मानव शरीर की देखभाल करता है पर अस्वस्थता से बचना मुश्किल है, जो वह वास्तव में है चेतन, मुक्त आत्मा..उसे कोई रोग नहीं व्याप्ता.
नुक्ते की हेर फेर से खुदा से जुदा हुआ
नुक्ते को ऊपर रख दें तो जुदा से खुदा हुआ

गुरू कितना अनमोल ज्ञान प्रदान करते हैं, जीवन में सद्गुरू नाव की पतवार की तरह है अन्यथा नाव को डूबने से कोई नहीं बचा सकता. ईश्वर उन्हें सही मार्ग पर लाने के लिए, उनके अहंकार को दूर करने के लिए सुख-दुःख के झूले में झुलाता है. वह जानता है उनके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित ! वे अपनी सामान्य बुद्धि से ईश्वर को समझ नहीं पाते पर वह परमात्मा रूप में उनके भीतर है और पल-पल उनकी खबर रखता है ! दुनियादारी में आकंठ डूबा हुआ व्यक्ति यह विचार भी नहींकरता कि एक दिन यह दुनिया उसकी आँखों के सम्मुख नहीं रहेगी, मृत्यु का घना अंधकार जब चारों ओर छा जायेगा, शरीर शक्तिहीन हो जायेगा तब कृष्ण के सिवा और कोई साथ नहीं देगा !

   

  

Wednesday, January 29, 2014

हावड़ा ब्रिज - कोलकाता की शान


आज उनका टीवी खराब हो गया, टीवी के बिना दिन जैसा भी गुजरे रोज से काफी अलग होगा. टीवी उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है. जून के अनुसार शाम तक ठीक हो जायेगा. कल शाम मीटिंग थी, क्लब में कुछ खा लिया, आठ बजे जब जून और नन्हा भोजन कर रहे थे, उसे जरा भी भूख नहीं थी, दस बजे उसे भूख लगी, उस समय कुछ खाना ठीक नहीं है यह सोचकर नहीं खाया, पर खाली पेट नींद काफी देर तक नहीं आ रही थी.

अब धूप में पहले की सी तेजी नहीं है. सुबह नाश्ता करने के बाद उसने नन्हे के लिए पेपर की छोटी-छोटी कारें बनायीं जो हावड़ा ब्रिज पर खड़ी की जाएँगी. उसका प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया है, जिसे पिछले कई दिनों से वह और उसके मित्र मिलकर बना रहे थे. आज दो अक्तूबर है, बापू की १२८वी जयंती ! दोपहर को दूरदर्शन पर ‘गाँधी से महात्मा’, श्याम बेनेगल की फिल्म ‘Making of Mahatma’ का हिंदी रूपांतरण देखा. गाँधी दिल के और करीब हो गये. आज क्लब में कार्यक्रम है पर इतने बड़े महापुरुष के जीवन पर फिल्म देखने के बाद कुछ और देखना शेष नहीं रह जाता. बापू के पुत्रों को विशेषकर हरिदास को उनसे शिकायत रही, वैसे कुछ न कुछ शिकायत हर बेटे को अपने पिता से रहती ही है.

कुछ देर पहले छोटी बहन से फोन पर बात की, उसने अभी तक नवजात शिशु का नाम नहीं सोचा है, ३.४ केजी की गोरी सी बच्ची का नाम जो बड़ी बहन से कुछ मिलता-जुलता भी होना चाहिए. जून आज तिनसुकिया गये हैं, वापसी की टिकट के लिए, नहीं मिलने पर जाने की टिकट भी कैंसिल कर देंगे, सुनने पर यह वाक्य उसे कठोर लगा किन्तु यथार्थ यही है. आजकल बिना रिजर्वेशन के सफर करना उनके लिए असम्भव है, अपनी सुविधा की कीमत पर परिवार के साथ त्योहार में शामिल नहीं हुआ जा सकता. यह आधुनिक समाज की देन ही है जिसने एक ओर प्रगति की है दूसरी ओर कठिनाइयां भी बढ़ा दी हैं. घर से इतनी दूर रहने का खामियाजा ही समझ लें. पर यहाँ रहना उसे सदा से ही भाता रहा है और भाता रहेगा जब तक भी यहाँ रहना पड़े.

उसकी एक सखी बीएड करना चाह रही है, और उससे नोट्स मांग रही है. उसे आश्चर्य हुआ ऐसा कहते हुए वह बहुत निरीह लग रही थी, पहले कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी. यही तो जिन्दगी है, जो कभी सिखाती है कभी झकझोरती है. हर दिन एक नया संदेश लेकर आता है. अगर कोई ध्यान से देखे और समझे तो !

कल सुबह जून को तिनसुकिया में कम्प्यूटर लिंक न होने के कारण वापस लौटना पड़ा पर उनके मित्र के छोटे भाई( जो एक ट्रेवल एजेंट बन गया है) ने टिकट ले ली है, उन्हें ख़ुशी तो हुई पर छोटी ननद उसी समय ससुराल जा रही है, उससे शायद मिलना न हो. शाम को वे टहलने गये मौसम में एक ठंडक सी आ गयी है और हरसिंगार के फूलों की महक भी. उनके हरसिंगार में अभी कलियाँ ही आई हैं. जून ने उस दिन गुलाबों की कटिंग भी कर दी है, अगले हफ्ते वे गोबर भी डलवा देंगे. कल शाम बल्कि रात को ही पड़ोसिन ने कागज की कारें बनाने के लिए कहा, पर उसके पास समय नहीं था, मना करने में अच्छा नहीं लग रहा था, पर किया, it means she is learning to be assertive, अपने वश से बाहर के काम को भी पहले वह ले लेती थी फिर चाहे कितना परेशान होना पड़े. जून अभी आने वाले हैं, उन्हें आज अस्पताल भी जाना है, उसके कान में हवा की कुछ खुसुर-पुसुर सी लग रही थी, आज सुबह से ठीक है, फिर भी कहा है न कि छोटे रोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए.  




Wednesday, July 31, 2013

अभी मत जाओ भैया..


आज पूरे चार दिनों के बाद नन्हे का स्कूल खुला था और जून का दफ्तर भी, सो सुबह व्यस्त थी. कल दोपहर का भोज अच्छा रहा, उसकी सखी का घर कुछ बिखरा-बिखरा सा है और इसी तरह उसका मिजाज भी, शायद स्वास्थ्य के कारण, पर सदा ही वह अपने इर्द-गिर्द बुने एक दायरे में ही रहती है. इसके विपरीत एक दूसरी सखी अन्यों की बात सुनती है. तीन दिनों के बाद जून को फिर से जाना है, सो इस साथ को अधिक से अधिक खुशगवार बनाना है. मौसम ने अपना रुख वही रखा है, दिल्ली तथा उत्तर भारत में शीत लहर, कश्मीर में हिमपात और असम में बादल हैं. उनके बगीचे में कैलेंडुला खिल गये हैं, बहुत सुंदर लगते हैं और दो गुलाब भी, उस पौधे में जो मार्केट से लाकर उन्होंने पिछले साल लगाया था.

आज शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये, एक शंख तथा ‘की रिंग’ लेकर, पहले किसी भी उपहार को देखकर उसकी सखी ने इतनी ख़ुशी जाहिर की हो, याद नहीं पड़ता, आज का उसका उत्साह देखते ही बनता था, उसे भी अंदर तक छू गया और आज की शाम अच्छी बीती, उसने मन लगाकर चाय बनाई और अपने आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में बताया, आजकल वह स्वामी योगानन्द जी की किताब पढ़ रही है, पहली बार जब यह पुस्तक नूना ने पढ़ी थी अद्भुत असर हुआ था, उन दिनों जून अस्वस्थ थे, छोटी बहन की परेशानी भरी चिट्ठी आई थी और उसका मन शांत था, एक अपूर्व शक्ति का अनुभव होता था, ईश्वर पर विश्वास प्रगाढ़ हो गया था और प्रतिक्षण उसे उसकी निकटता का अनुभव होता था. आज भी यह पुस्तक पढ़ना उसे अच्छा लगता है. परमहंस योगानन्द जी जैसे साधकों के कारण ही भारत का स्थान विश्व में अनुपम है. यह एक ऐसा ज्ञान है जिसे हर व्यक्ति को चाहे वह वैज्ञानिक हो या सिपाही व्यापारी हो या विद्वान् सभी को आवश्यकता है. अपने आप को जानने का प्रयास और फिर अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास सभी को आगे ही ले जायेगा. प्रारब्ध में आये सभी कर्मों को निस्वार्थ भाव से किन्तु पूरे मनोयोग से करते जाना ही ज्ञानी का लक्षण है. सुख-दुःख, हानि-लाभ में सम भाव रखते हुए जीवन के मार्ग पर चले जाना उस ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन है.

...और आज जून जाने वाले हैं, शाम चार बजे नाईट सुपर से, फिर कुछ दिन उसे ऐसे मिलेंगे जब अपने आप का साथ देना होगा, खुद से बातें करनी होंगी, थोड़ा अपने को बेहतर जानने का मौका मिलेगा और दूर रहकर जून को भी ठीक से देख पायेगी, मन की आँखों से, उनकी याद आएगी, ठीक है पर उदासी नहीं होगी, इसका उसे यकीन है. वह उन दिनों को भी उनकी खूबसूरती के साथ जियेगी. शाम को नन्हे के साथ घूमने जाना फिर उसकी बातें और उसके साथ पढ़ना-खेलना, बीच- बीच में यह कहते जाना, पापा यह कर रहे होंगे ! आज उसने सभी पत्रों के जवाब दे दिए. बुआ जी के यहाँ पोता हुआ है. उन्हें बधाई का पत्र भेजना है. कल शाम वे एक मित्र परिवार में गये, उनका छोटा सा बेटा नन्हे को छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं था, बड़ी मुश्किल से वे वापस लौटे.



Wednesday, May 15, 2013

चांगलांग - अरुणाचल प्रदेश का सुंदर शहर



नये वर्ष का शुभारम्भ हुए तीसरा दिन है, पिछले दो दिन वे सभी मित्रो से मिलकर नये वर्ष की मुबारकबाद देने में व्यस्त रहे, कल दो गुलाब के पौधे अपने बगीचे में लगाये, मैरून और हल्का नारंगी रंग का गुलाब, अब छह रंगों के गुलाब उनके बगीचे की शोभा बढ़ा रहे हैं. डहेलिया में हल्के पीले रंग का पहला फूल खिला है लाल बस खिलने को है. सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं इन दिनों, पानी इतना ठंडा कि हाथ लगाने से डर लगता है. नन्हे का स्कूल क्रिसमस के अवकाश के बाद आज खुला है. घर कितना शांत लग रहा है इस समय. ईश्वर की दया का, कहना चाहिए स्नेह का एक और उदाहरण अज ही सम्मुख आया, वह हर वक्त सबकी सहायता करता है बस एक पुकार ही काफी है. कल उसकी उड़िया सखी चली जाएगी फिर न जाने कब मिलना हो, अपने उस दिन के व्यवहार से उसके पतिदेव ने उनलोगों के जाने का दुःख हल्का कर दिया है, इसके लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए. जून ने कल फोन पर दोनों घरों में सभी से बात की, उनके घर फोन लग जाने पर कितना आसन होगा सभी के समाचार लेना.

सुबह दस बजे की सुनहली धूप में बालों को सुखाने के लिए कुछ वक्त चुरा लेना कितना भला लग रहा है, अभी किचन में आधे घंटे का काम शेष है. कल शाम जून को वह टोपी, जो उसने अपने दिल का सारा प्यार पिरोकर बुनी है, बहुत पसंद आई. अब उनके लिए वुलेन बूटीज शुरू की हैं. कल शाम उन्होंने ‘पपीहा’ फिल्म का शेष भाग देखा, अच्छी लगी सई परांजपे और उनकी बेटी विनी की यह फिल्म. कल माँ का नन्हे के लिए बनाया स्वेटर व हैट मिल, दोनों बहुत सुंदर हैं, जादू है उनके हाथों में. छोटी बहन का कार्ड और छोटा सा खत भी. मंझले भाई का पत्र भी आया है, नये वर्ष के कार्ड्स भी हर दिन आते ही जा रहे हैं.

  कल शाम वे क्लब गये, वहाँ की साज-सज्जा काफी बदल गयी है, पहले से ज्यादा सुंदर लग रहा है. इस बार क्लब मीट में वे नहीं जा पाएंगे. उसी दिन नन्हे को लेकर डिब्रूगढ़ जाना है एडमिशन टेस्ट दिलाने. सुबह-सुबह नाश्ते के लिए सब्जी काटने से खास तौर पर आलू काटने से उसके दायें हाथ का अगूँठा कितना मैला सा लग रहा है, अचानक उसका ध्यान जब हाथ पर गया तो उसने सोचा अबसे दस्ताने पहन कर सब्जी काटेगी. जून ने बताया, ‘चांगलांग’ जाने के लिए इनर लाइन परमिट तथा गेस्ट हाउस में बुकिंग के लिए कह दिया है, बीहू की छुट्टियों में वे वहाँ जायेंगे.    

Friday, February 15, 2013

साइकिल की सवारी



कल सुबह से लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, दोपहर को उपवास किया, फिर शाम को टिफिन में उबले आलू खा लिए कि कुछ तो खा लेना चाहिए और खेलने चली गयी, खाली पेट में आलू वात बढ़ाते हैं, यह पता ही नहीं था, गैस सिर पर चढ़ गयी और दर्द से फटने लगा अच्छा भला सिर. घर आकर वमन किया फिर एक घंटा आराम और तब जाकर सब ठीक हुआ. पूरे वक्त जून के साथ नन्हा उसका बहुत ख्याल रख रहा था. उसको हिंदी में पूरे नम्बर मिले हैं, अगले हफ्ते उसे हिंदी में समाचार बोलने हैं स्कूल की असेम्बली में. उन्हें साथ वाले घर में हो रही शादी में जाना था, जल्दी ही लौट आए वे. वहाँ का प्रबंध बहुत अच्छा था, न ज्यादा शोर न भीड़भाड़, दुल्हन बहुत छोटी लग रही थी बहुत सुंदर. कल उसका फैब्रिक पेंटिंग का काम पूर्ण हो गया, आज दोपहर को पहले पत्रिका पढ़ेगी, फिर न्यूजट्रैक का कैसेट देखेगी फिर थर्मोकोल पर काम शुरू करेगी वह. कल शाम जून ने बहुत दिनों के बाद कहा कि वह हरी साड़ी में अच्छी लग रही थी, उन्हें शिकायत थी कि वह सिर्फ कहीं जाने के लिए ही क्यों तैयार होती है, इसका अर्थ हुआ कि वह उसकी पोशाक आदि पर नजर रखते हैं.

“आदमी अगर जिन्दा रहे तो उसे सौ साल बाद भी खुशी मिल सकती है”, अभी-अभी बाल्मीकि रामायण में हनुमान के मिलने पर सीता के मुख से यह वाक्य पढा. यह बिलकुल ठीक है, हम थोड़ी सी परेशानी होने पर जीवन को व्यर्थ मानने लगते हैं लेकिन कहीं न कहीं खुशी होती है, जो हमें मिलने वाली है. जैसे आज वे खुश हैं, कल उसने गाजर का हलवा बनाया, लाल गाजरें यहाँ नहीं मिलती, नारंगी रंग का हलवा कुछ अलग सा लगता है. उन्होंने किचन में पेंट करवाया था, नई नैनी ने सूखने की प्रतीक्षा लिए बिना पानी डाल दिया, सारा पेंट उतर गया पर..अब इसे कुछ कहने से क्या लाभ. नन्हे के स्कूल जाना है, जून ने फोन पर कहा था, उसको क्लास कैप्टन ने कल मारा था, शाम को वह थोड़ा उदास था, पर सुबह बिलकुल ठीक था. फरवरी का आरम्भ हो गया है, आदर्श महीना है, न सर्दी न गर्मी..यानि वसंत का महीना. कल उसकी पड़ोसिन ने गुलाब की एक कटिंग दी, पीला, लाल व नारंगी रंग का मिलाजुला रंग है उसका, माली ने शाम को लगा दी थी, इस मौसम में तो शायद ही खिले लेकिन अगले मौसम में जरूर फूल आयेगा. कल की तरह आज भी उसने साड़ी पहनी है, अच्छा लगता है हल्का-हल्का, खुला-खुला सा. जून को पसंद भी है, और उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं इसका तो ख्याल उसे रखना है न...और इससे उसे खुशी मिलती है, और खुशी इंसान की पहली जरूरत है.

आज नैनी जल्दी आ गयी है, खाना भी बन गया है, इसका अर्थ गाड़ी पटरी पर आ रही है, पिछले दिनों ग्यारह बज जाते थे और काम बिखरा रह जाता था. कल वे स्कूल गए थे, नन्हे की क्लास टीचर और साइंस टीचर से मिले. आज सुबह नन्हा बहुत अच्छे मूड में था, खिला- खिला और ताजा सा. टेप रिकार्डर पर ‘मिली’ फिल्म का गाना आ रहा है, छोटे भाई का उपहार उनकी शादी की सालगिरह पर. कल भी परसों की तरह उसने साइकिल चलाई, बहुत अच्छा लगता है हवा को काटते हुए गति से आगे बढ़ना. लगभग दस सालों के बाद वह साइकिल चला रही है. कितना अजीब लगता है सोचकर कि बचपन कितना पीछे छूट गया है. याद करो तो लगता है कल की ही तो बात है. नन्हा कल पिछले या उससे पिछले साल की गर्मियों को याद कर रहा था कि कैसे एक आम के लिए वह गुस्सा कर रही थी, फिर जून और भी नाराज हो गए थे, उसकी याददाश्त बहुत तेज है. उसे कहानी सुनाने की प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार मिला, उदास था कि प्रथम क्यों नहीं मिला.





Wednesday, January 2, 2013

सोवियत संघ - स्वप्न सरीखा


कल जून का जन्मदिन है, वह कार्ड तो पहले ही ले आयी थी, केक कल बनाएगी और उपहार ? उसके पिताजी ने अपने हाथों से बनाकर जन्मदिन का कार्ड भेजा है दामाद के लिए, एक गुलाब का फूल...बिलकुल वास्तविक लगता है. कल बेहद गर्मी थी वे खेलने गए पर टीटी हॉल में खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था, पसीना टपक रहा था, सो वे जल्दी लौट आए. गर्मी के कारण नन्हे का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, उसे कोई भी अप्रिय गंध उबकाई ला देती है. उसके भी घुटने पर घमौरी से दाना निकल आया है. यहाँ जुलाई-अगस्त में गर्मी पडती है, जब सारे देश में सावन की फुहार बरसती है.
आज वे सभी बहुत प्रसन्न हैं, एक तो जन्मदिन, और दूसरे सुबह उठते ही रिमझिम वर्षा...कल स्वतंत्रता दिवस है. जून ने उनकी आगामी यात्रा के लिए कोलकाता मैसेज भेज दिया है, उनकी हवाई यात्रा के बाद वहाँ ट्रांजिट फ़्लैट में रुकना है, घर जाने का उत्साह तो है पर सफर में होने वाली दिक्कतों को देखते हुए डर भी लगता है. एसी में जाएँ या द्वितीय श्रेणी में, यह भी सोचने की बात है. आजकल वह मन्मथनाथ गुप्त की एक किताब पढ़ रही है, ‘आधी रात के अतिथि’, अच्छी है,

नन्हे ने छोटा सा झंडा बनाया है, उसे लेकर सुबह उत्साहित था, वह प्रधानमंत्री का भाषण सुनने में, अच्छा लगा पर पहले की उनकी स्पीच से कुछ कम...दोपहर बाद उन्होंने कैरम खेला. शाम को दो परिवार आए थे आजादी की सालगिरह की चाय पार्टी के लिए, कुल मिलाकर पन्द्रह अगस्त अच्छा गुजरा.

पिछले तीन दिन वह लिख नहीं पायी, वे घर पर ही रहे, कल खेलने गए, काफी रश था. उसके गले में हल्की खराश लगी तो एक अदरक का टुकड़ा मुँह में रख लिया, उसे इस तरह अदरक खाते देखकर जून को बहुत आश्चर्य होता है, उसे सब्जी में भी अदरक पसंद नहीं है. आज सुबह उठी तो धूप तेज थी पर अब बदली छा गयी है, कितनी जल्दी यहाँ का मौसम रंग बदलता है. आजकल वह सिवाय किताबें पढ़ने के खाली समय में और कुछ नहीं करती है जैसे हाथ का कोई काम..यहाँ तक कि खत लिखने का भी मूड नहीं था. फोन पर बात अब कुछ आसान हो गयी है.
सोवियत संघ में सत्ता परिवर्तन का प्रयास असफल हो गया है. गोर्बाचोव पुनः मास्को लौट आए हैं, और इसी के साथ ही जनशक्ति की महत्ता एक बार फिर स्थापित हो गयी है. आज की जनता जागरूक है उसे बहलाया नहीं जा सकता पहले की बात और थी.. गर्मी पिछले तीन दिनों से जारी है, चेहरे से पसीना सूखता ही नहीं. बेहद गर्मी...एसी होने के कारण ही वे इतने आराम से हैं नहीं तो उन दिनों की तरह बदहवास हो गए होते जिन दिनों एसी नहीं था. मगर एसी कितने लोगों के पास है, दूधवाला कह रहा था कि गांव में पंखा भी नहीं है.

कल शाम ...जून ने उसे सरप्राइज देने के लिए जो बात छुपाई थी उसे सुखद नहीं दुखद सरप्राइज अवश्य दे गयी, पहले उसने कहा था कि एसी के लिए पीएफ से लोन लेना पड़ा है, पर कल कहा नहीं, उतने पैसे पासबुक में ही थे. उसे खुद पर झुंझलाहट हुई, पैसे के मामले में उसे बहुत कम जानकारी है, घर के खर्च से लेकर कोई सामान खरीदना हो तो सारे निर्णय वही करता आया है, सो उसने कभी जानने की भी जरूरत महसूस नहीं की. एक तो यहाँ बाजार जाने का कोई साधन नहीं है, दूसरे सब सामान जब घर बैठे मिल जाता है तो ..
नन्हे की तबियत आज ठीक नहीं थी पर उसके मना करने पर भी वह स्कूल जाने की जिद कर रहा था कि उसका टेस्ट है, अभी इतना छोटा है और टेस्ट की कितनी चिंता है, सचमुच यह नई पीढ़ी उनसे बहुत आगे होगी, पता नहीं स्कूल में कैसे पढाई कर रहा होगा, जून की बायीं कलाई में दर्द है जैसे कुछ माह पहले उसे हुआ था, शायद टीटी खेलने के कारण.. उसने सोचा फोन करके पूछे...
छोटे-छोटे मसलों को वे कितना बड़ा बना लेते हैं...रात भर कैसे सपने आते रहे, क्या हो जाता है ऐसा कि स्नेह की उज्ज्वल धारा कहीं लुप्त हो जाती है. कल बाजार से आते वक्त जून बहुत तेज कार चला रहे थे, नन्हा और वह डर ही गए थे. नन्हा कितना परेशान था घर आकर...उसके कोमल दिमाग पर कितना बुरा असर पहुंचता होगा.








Tuesday, June 21, 2011

गुलाब का पौधा


नूना स्नानघर में थी कि दरवाजे पर खटखटाहट हुई, कल भी ऐसा हुआ था. बहुत कोफ़्त होती है ऐसे में. अभी सवा सात ही हुए थे, दूधवाला आज जल्दी आ गया था. आज सुबह वह साथ-साथ ही उठ गये  थे. बाहर लॉन में गए, सुबह का समय उसे सदा से सर्वप्रिय लगता है, उस वक्त वह सबसे अच्छी मनःस्थिति में होती है. याद आती हैं वे सुबहें जब प्रातः भ्रमण के समय गुलाब की झाड़ियों के साथ साथ चलती थी दूर तक अकेले पर हमेशा उसके बारे में सोचते हुए..... फूफाजी का पत्र आया है दादाजी की तबियत ठीक नहीं है, बुआजी घर गयी हैं. अब दूसरा पत्र आने तक उन्हें उनके स्वास्थ्य के बारे में पता भी नहीं चलेगा. आज रात्रिभोज पर जाना है, उसकी पसंद की पीली साड़ी पहनने वाली है नूना, कल रात को सपने में खूब होली खेली, बचपन की सहेली संतोष को देखा. उसकी मकान मालकिन व उनकी बेटियों को भी. उन गमलों का पता नहीं क्या हाल होगा, छोटी बहन ने एक बार भी तो नहीं लिखा, वह गुलाब का पौधा अब बड़ा हो गया होगा.