Showing posts with label मित्र. Show all posts
Showing posts with label मित्र. Show all posts

Monday, May 20, 2013

गोल्फ फ़ील्ड में भ्रमण



कल दोपहर उसने टमाटर प्यूरी बनाई, उनके घर में उगे टमाटर अब साल के उन दिनों में भी उनका साथ देंगे जब वे बाजार में नहीं मिलते. परसों शाम उन्होंने ‘अलादीन’ फिल्म देखी. बहुत अच्छी लगी. कल शाम उसकी बंगाली सखी ने खाने पर बुलाया था, उसे अच्छा लगा, उसकी बातें अच्छी लगती हैं, और वह जानती है कि वह भी उसका साथ पसंद करती है. उसने शाम को क्लब में होने वाले “संगीत कार्यक्रम” में जाने के लिए कहा है, उसने सोचा यदि जून और नन्हा मान जाएँ तो वह जा सकती है.

अज भी ठंड ज्यादा है, उसने सारे काम निपटा लिए और हीटर के सामने आ गयी, जून का कहना है कि उसके घर आने से पूर्व खाना बिलकुल तैयार होना चाहिए. छह खतों के जवाब लिखे. जून एक स्वास्थ्य पत्रिका भी लाये हैं, जो वह तभी लाते हैं जब घर में कोई अस्वस्थ होता है.
आज मन में एक विचार आया है क क्यों न धूप में कुछ देर टहल आया जाये, इस समय सडकें भी खाली होती हैं. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, उनके पिता आए हुए थे, उसने सोचा तेजपुर से लौटकर वे भी उन्हें अपने घर बुलायेंगे, इतना लिखकर वह गोल्फ फील्ड तक टहलकर आयी है, कुछ दूर फील्ड के अंदर भी गयी, सूखी घास पर, सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लग रहा था. कल रात वर्षा के साथ तूफान भी आया, उनके बगीचे में कई नाजुक पौधे जमीन पर गिर गये हैं, उसने सहारा देकर उन्हें खड़ा तो कर दिया पर बाद में माली ही उन्हें ठीक से सम्भालेगा. आज धूप में कई दिनों बाद तेजी है, वह चटाई पर बैठी है पिछले बरामदे में.

  कल शाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनकी ‘असमिया क्लास’ हुई. उसके कुछ देर बाद उसकी असमिया सखी आ गयी, उसके साथ वह बहुत अपनापन महसूस करती है. नन्हा कल शाम फिर कह रहा था, बोर्डिंग स्कूल नहीं जायेगा, पर बाद में उनके समझाने पर मान गया, यदि उसका दाखिला हो जाता है तो उसके भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. वह कहाँ रहकर पढ़ेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा.

अभी अभी उसकी हमराशि पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, लिखने का क्रम टूट गया तो अब कुछ मुश्किल हो रही है विचारों को पकड़ पाने में, मन कितना तेज भागता है. इस एक पल में जब वह एक वाक्य लिखती है, मन में एक पूरा विचार अंकित होकर जा चुका होता है. ऐसी कोई मशीन कभी न कभी बनेगी जो मन के एक एक भाव को पकड़ सके. ऋषि-मुनियों ने इसी भागते हुए मन को लगाम लगाने का प्रयास तपस्या के बल पर किया था. उसका सारा प्रयास उस वक्त व्यर्थ चला जाता है जब वह मन ही मन गीता पाठ करती है. उस दिन उसकी सखी ने ठीक ही कहा था, बोल कर पाठ करने से मन जल्दी एकाग्र होता है.  




Thursday, April 4, 2013

बड़ी और मुंगौड़ी




कल शाम वे एक विवाह की रिसेप्शन पार्टी में गए, जून के एक सहकर्मी का विवाह, जो बड़ी बाधाओं के बाद हुआ था, आने में देर हो गयी पर सुबह वे समय से उठे, वहाँ कई और लोगों से भी मिलना हुआ. उससे पहले नन्हे का एक मित्र आया था अपने माता-पिता के साथ, नन्हा बहुत खुश था.

  महीने का अंतिम दिन है, नन्हे का हाफ डे है, जून आज लंच पर नहीं आने वाले थे सो सुबह उसने अपनी सुध ली, मालिश करके देर तक स्नान किया, कैसा हल्का-हल्का लगता है, इसीलिए स्पा इतने प्रचलित हैं विदेशों में. आज लेडीज क्लब में सलाद सजाने की प्रतियोगिता है. वह नन्हे को लेकर पैदल ही जायेगी, वह कुछ देर वहाँ खेलेगा या पढ़ेगा.

  मार्च महीने का पहला दिन, शुरुआत अच्छी है इंशाअल्लाह अंजाम भी अच्छा होगा. मौसम का रूप बदला नहीं है, बादल गरज कर अभी शांत हैं. कुछ मिनट पहले ही कुछ मुसलमान औरतें ‘फितरा’ मांगने आयीं थीं, चम्पा ने उन्हें यह कहकर कि यहाँ मुस्लिम परिवार नहीं रहता, जाने के लिए कह दिया. कल रात को स्वप्न में फिर पाकिस्तान की सैर की, इससे उसका जुड़ाव किसी पिछले जन्म की याद का परिणाम है, एक कशिश है जो उसे खींचे लिए जाती है, उर्दू सीखनी फिर शुरू करनी होगी, लेकिन असमिया जो पहले सीखनी शुरू की है उसके बाद ही. कल एक पंजाबी सखी से ‘गुरुमुखी’ की वर्णमाला लिखकर लायी है, “गुलदस्ता” पंजाबी पत्रिका अब पढ़ सकती है. कल उसने एक बच्चे का स्वेटर बनाना भी शुरू किया है दस दिन में बन जाना चाहिए. जून कल शाम मोरान से आए तो थके हुए थे पर नन्हे को टीटी के लिए छोड़ने गए, ही इज ए ग्रेट फादर एंड लविंग हसबैंड टू..उसने सोचा आज दोपहर वे ढेर सारी बातें करेंगे, उनके आने से पहले ही वह खाना बना कर रखेगी. आज का नीचे लिखा सूत्र भी कुछ कम नहीं-
Most of the shadows of this life are caused by our standing in our own sunshine.

हम वही बन जाते हैं जैसा सोचते हैं, अँधेरे से हटना है तो मन में सूरज को रास्ता देना ही होगा न..

   दो बजने वाले होंगे, घड़ी लॉन में तो लगाई नहीं जा सकती न, सफेद और पीली तितलियाँ जहाँ उड़कर, पौधों व पेड़ों के पत्ते हिलकर, चिडियाँ बोलकर और धूप सहलाकर उसका मन बहलाव कर रहे हैं. कल शाम को जून जब नन्हे को लेने गए थे इसी जगह लेटकर नीले आकाश को तकते हुए उसने वादा किया था, कल फिर आयेगी. सुबह व्यस्तता भरी थी, जून के कहने पर बड़ियां बनायीं, फिर बेक्ड सब्जी, लोभिया भी, समय तो लगना ही था. नन्हे को चाकलेट देना आज फिर भूल गयी लेकिन उसे आलू परांठा जरूर पसंद आया होगा. आज सुबह असमिया अक्षरों से पहचान बढ़ाने का वक्त ही नहीं मिल पाया, अभी पढ़ेगी. जून के डिपार्टमेंट में उनका कम्पयूटर अभी तक ठीक नहीं हो पाया है. आज बैंक के काम की वजह से वे जल्दी चले गए, उसे उनके बैंक सम्बन्धी कार्यों की समझ नहीं है, सिर्फ पे स्लिप देखने भर से मतलब है, ऐसा होना तो नहीं चाहिए, यह मालूम होना ही चाहिए कि कितना टैक्स वह देते हैं, कितना बचाते हैं. एक दिन सब कुछ पूछेगी, नोट भी कर लेगी क्योंकि उसे याद तो रहेगा नहीं.




Wednesday, February 6, 2013

जगजीत सिंह की गजल



नन्हा आज स्कूल नहीं गया, कितना उदास था, चुपचाप आँखों से आंसू गिर रहे थे, इतने छोटे बच्चे को इस तरह चुपचाप रोते नहीं देखा उसने कभी, उसको टेस्ट की चिंता थी, जो शायद आज होता भी नहीं, सुबह से दो-तीन बार टायलेट गया तो उसे चिंता हो गयी, स्कूल नहीं भेजा, सेंट्रल स्कूल में टायलेट गंदे हैं, पानी भी नहीं रहता, यह सब नन्हे ने ही तो बताया था, अभी तक तो ठीक है वह, खेल रहा है, स्कूल उसके लिए बहुत आवश्यक है, उसका दिल स्कूल में रहता है. फिर भी बच्चा आखिर बच्चा है, जितनी जल्दी उदास होता है उतनी ही जल्दी भूल भी जाता है. कल छोटे भाई का पत्र मिला, अब वह खुश है ऐसा उसके पत्र से लगा तो है. कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, पिछले कई दिनों से घर में काम चल रहा है, घर दिन भर पूरा खुला रहता है, रात को नन्हे को सुलाने के लिए जल्दी-जल्दी काम निपटा कर वे सोने आ जाते हैं, कभी कभी ज्यादा थकन भी विश्राम में बाधा बनती है.

सितम्बर का एक दिन बीत गया है कल और पिछले तीन-चार दिनों से डायरी नहीं खोली, जून का दफ्तर बंद था, और नन्हे का स्कूल भी, वे डिब्रूगढ़ गए थे. जगजीत सिंह की गजल आ रही है-
“खत लिखते कभी और कभी खत को जलाकर तनहाई को रंगीन बना क्यों नहीं लेते
तुम जग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद चुरा क्यों नहीं लेते”

जो कुछ वह सोचा करती है अक्सर कोई काम करते समय या रात को जब नींद नहीं आ रही होती है वह सब लिखते समय याद क्यों नहीं आता है. एक उड़ता-उड़ता सा विचार मन में रहता है कि उसे एक स्कूल खोलना है गरीब बच्चों के लिए, उन्हें पढाना है, लेकिन यह विचार मात्र ही है, कैसे होगा यह इसके बारे में सोचा ही नहीं, जून को कहने से उनकी प्रतिक्रिया अनुकूल तो नहीं होगी, कहेंगे, समय कहाँ है ? जगह कहाँ है? और न जाने कितने सवाल जिनका उत्तर वह नहीं दे पायेगी.

क्यों नहीं दर्द फूट पड़ता
अगर कोई दर्द सचमुच है कहीं
नम कर दे आँखों को अंदर ही अंदर
क्यों नहीं कोई खुशी छलक उठती
अगर कोई खुशी सचमुच है
रोशन कर दे जो भीतर बाहर
क्यों नहीं कोई गीत उग आता
अगर कोई गीत सचमुच है
रसमय कर दे जो अंतर
क्यों नहीं कोई स्वप्न सजता
अगर कोई स्वप्न सचमुच है
एक कर दे जो बिछुड़े हुओं को

शब्दों की कमी क्यों खटकती है
थी पहले विचारों की, क्यों है ऐसा कि
जब यह है तो वह नहीं...वह है तो..

उसने कल एक कहानी पढ़ी, दो मित्रों की कहानी..जिनमें शत्रुता हो जाती है, शत्रु बनने के लिए पहले मित्र बनना ही पड़ता है, गलतफहमियों की दीवार अपनों के बीच ही तो खड़ी हो सकती है, अनजानों के मध्य तो नहीं...जितनी जल्दी यह गिर जाये उतना ही अच्छा ये बात दोनों ही चाहते हैं, क्योंकि शत्रुता ओढ़ी हुई है, चुभती है, भीतर मित्रता का सरवर बह ही रहा है, उसकी याद अभी ताजा है. पहले की दोस्ती याद आती है, एक को चोट लगती थी तो दर्द दूसरे को होता था, अब एक दूसरे की तरफ से उदासीन हो गए हैं, लेकिन यह उदासीनता कब तक टिकेगी...जब प्रेम नहीं टिका जो दैवीय गुण है तो शत्रुता कब तक टिकेगी..कहानी का अंत सुखद था. गलतफहमियां गिर जाती हैं और फिर दोनों एक हो जाते हैं एक बार फिर झगड़ने के लिए शक्ति जुटाने के लिए...शायद यही जीवन है.




Wednesday, January 9, 2013

हर कोई चाहता है...क्या?



आज फिर कई दिनों के बाद उसने डायरी खोली है, सोचती रोज थी, पर कुछ लिखे ऐसा मन नहीं होता था. आज खत लिखने बैठी तो इसे भी ले आई और अब यह उसके सामने है. सबसे पहले ध्यान आया कि कुछ देर पूर्व पंजाबी दीदी को फोन किया था मिली नहीं, शायद अस्पताल गयी हों, कल अगर फ्लाईट आई हो तो उसकी एक मित्र भी आ गयी होगी. पर वह  यह सब क्यों लिख रही है, वह तो अपने आप से बातें करने आई थी. क्या खुद का सामना करना इतना मुश्किल है, शायद आजकल हो गया है उसके लिए. कितना कुछ हुआ इन दिनों में, छोटी बहन का विवाह हो गया, वे घर गए, दिल्ली गए, कोलकाता गए वापस आये. उसका गला भी खराब हुआ, कल पिकनिक में गए और भी न जाने कितनी बातें. पर यह सब तो वह  लिखना नहीं चाहती थी, फिर वह क्या है जो लिखना चाहती है, जो उसके मन के अंदर कहीं दबा, छुपा सा रहता है, पर फूट कर नहीं आता...वह कोशिश ही नहीं करती, पर कुछ है जरूर..जो उसे औरों से पृथक करता है, जो सिर्फ उसका है, ऐसा कुछ जो आजतक बाहर आने के लिए ही वहाँ बसा है. धीरे-धीरे वह अपने आप ही बाहर आएगा, जब वह कागज-कलम लिए उसका स्वागत करने को तत्पर रहेगी, जो बाहर आकर भी उसके मन को खाली नहीं करेगा बल्कि भर डालेगा उसे, सम्पूर्णता देगा उसे, कविता में कितनी बड़ी ताकत है यह...कवि को रीता  नहीं करती, जब एक भाव कवि उड़ेंलता है तो कहीं अंतर में एक घट भर जाता है, और ऐसे ही कई भाव सुगबुगा रहे हैं उसके अंतर्मन में, कहीं तो कोई है जो इन्हें समझेगा...पर जब तक ये बाहर नहीं आते खुद ही कहाँ समझती है..और वह कोई कौन होगा शायद कोई भावी पाठक...कितने दिनों वंचित रखा है उसने उन्हें..कितने दिनों प्रतीक्षारत रखा है स्वयं को..पर कभी तो टूटेगा यह मौन?

आज मौसम फिर ठिठुर रहा है, धूप एक पल के लिए आती है फिर चली जाती है. कल नूना ने लिखना शुरू किया तो समय का आभास ही नहीं रहा, जून के आने पर ही पता चला, दिन कैसा अच्छा बीता..शाम को टीटी खेलने गए, हॉल खाली था, वे आराम से खेल सके. कल यात्रा से यहाँ आने के बाद का पहल पत्र बड़े भाई-भाभी का मिला. नन्हा आज सुबह उठना ही नहीं चाह रहा था, कल दोपहर सोया नहीं था शायद इसीलिए, उसे दस-ग्यारह घंटे तो सोना ही चाहिए. पंजाबी दीदी फिर नहीं मिलीं फोन पर, उसने सोचा कुछ देर में फिर करेगी, उन्हें यहाँ से चले ही जाना है इसीलिए शायद वह पहले सा जुडना नहीं चाहतीं, नहीं तो इतने दिन फोन न करें, ऐसा नहीं हुआ. होता है ऐसा, इंसान जब जहां से जाना चाहता है नाते तोड़ना चाहता है पर जब इस दुनिया से जाना होगा...कितनी भयावह लगती है मृत्यु, शायद उतनी है नहीं पर कभी-कभी जब वह सोचती है एक दिन यह सब कुछ छोडकर शून्य हो जाना होगा तो डर लगता है, जीवन से इतना मोह है तभी समझ में आता है. अचानक उसे अपनी असमिया मित्र का ध्यान हो आया, आज उसका मन इधर-उधर ही जा रहा है, वह एकाग्रता जो लेखन में चाहिए, आ ही नहीं रही है, कोई एक विषय हो या एक बिंदु हो जिस पर मन साधना है तो आसान होगा. पर वह आधार, वह बिंदु कहाँ से लाये ? लाना भी अपने अंदर से होगा..ढूँढना होगा मन में गहरे उतर कर, यह खोज भी तो एक विषय हो सकता है. हर इंसान को हर पल किसी न किसी कई तलाश रहती ही है, किसी को सुख की किसी को शांति की तो किसी को दोस्त की और किसी को दुश्मन की... तलाश करते-करते ही जीवन चूक जाता है, किसी को भगवान की तलाश है...भगवान जो कभी नहीं मिलते, कभी उसका मन भगवान को मानने से इंकार क्यों करता है...तब जब दिमाग मन पर हावी हो जाता है. यह मानना न मानना भी तो एक तरह की तलाश है.

Tuesday, November 6, 2012

खिलौनेवाला कमरा



कल शाम को उनकी ही लेन के एक बंगाली महोदय एक विद्यार्थी को लाए, बारहवीं का है, गणित पढ़ना चाहता है. आज से वह यहाँ घर पर पढ़ाने का कार्य आरम्भ कर रही है, अच्छा लग रहा है सोचकर कि वह भी कुछ ऐसा करने जा रही है जो किसी की सहायता के लिए है. उसने सोचा वह पूरे मन से पढ़ाएगी, आज मैट्रिक्स पढ़ाना है. नन्हा अपने मित्र के साथ गेस्ट रूम में खेल रहा है, वह कमरा उसके खिलौनों से भर गया है, चाहे जैसे खेले, रखे, सजाये उसे उस कमरे में पूरी छूट है. कल ननद का पत्र आया है, वे लोग नन्हे को बहुत याद करते हैं, यह तो ठीक है, लेकिन शाम को पांच बजे दोपहर का भोजन तो कुछ ठीक नहीं लगता न. आज लगतार चौथा दिन है गर्मी का, बादलों का नाम भी नहीं है. अभी सवा दस हुए हैं, उसने सोचा आधा घंटा वह पढ़ेगी फिर फुल्के बनाएगी.

कल व परसों उसने गणित पढाया, अनुभव ठीक ही रहा. आज शनिवार है, डिब्रूगढ़ से समाचार समीक्षा का कार्यक्रम आ रहा है. आज भी दिन गर्म है, परसों रात को भयानक गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई थी उसका कुछ असर बाकी है सो धूप तेज नहीं है. नन्हा लिख रहा है, एक से बीस तक लिखने में उसे आधा घंटा लगता है, कभी-कभी जानबूझ कर देर लगाता है. उसका मित्र खेलने आ गया है, अब वह जल्दी से लिख लेगा. आज पत्र भी लिखने हैं, दीदी का पत्र भी आया था, पता नहीं वह अभी यहीं हैं या आबूधाबी चली गयी हैं. आज वह अपनी अध्यापिका को भी पत्र लिखेगी. जून ने कहा था, घर में रंग-रोगन करवाने के लिए अर्जी देंगे.

साढ़े दस हो चुके हैं. आज फिर कुछ दिनों बाद डायरी खोली है, पर दायीं हथेली में बुरी तरह जलन हो रही है, आज एक हरी मिर्च काटी थोड़ा महीन, बस उसी का असर है, बाएं हाथ पर भी थोडा असर है मगर दायीं हथेली तो.. फिर ऐसे में क्या लिखा जायेगा. जून आकर कुछ तो उपाय करेंगे, पर अभी उनके आने में बहुत देर है. कल उन्हें गोहाटी जाना है उनकी पहली, नई, मारुति कार लाने,

आज शुक्रवार है, जून संभवतः कल आएंगे, कल रात या परसों सुबह. कल रात वह देर तक नहीं सो सकी फिर नींद भी आयी तो सपनों भरी. उसकी असमिया सखी ने खाने पर बुलाया है आज शाम को, कल तिनसुकिया जाने को भी कहा है. नन्हे के लिए सैंडिल लेना है, दलिया, चाय, फल, साड़ी पिन और एक कॉटन साड़ी. जून को कैसा लगेगा- शायद बहुत अच्छा या कुछ कम अच्छा. वैसे उसे साड़ी की जरूरत तो नहीं है फ़िलहाल- हाँ कॉटन सूट की है.

आज उन्हें जाना था था पर मौसम ऐसा बिगड़ा है कि... सुबह से मूसलाधार वर्षा हो रही है, घटाटोप बादल छाये हैं, ऐसे में उन्हें जून की याद ज्यादा आने लगी, नन्हा बार-बार पापा के बारे में पूछने लगा. घर में बंद रहो तो कितना खाली-खाली लगता है, वैसे चाहे दिन भर घर में रहें, पर जब मजबूरी हो तो खलता है. उसने सोचा, एक तरह से ठीक ही हुआ, जून के बिना तिनसुकिया में वे करते भी क्या..?

नन्हा आज एक वर्ष बाद फिर से स्कूल गया है. पता नहीं वह क्या कर रहा होगा, आज जब उसे छोड़कर आयी तो वह थोड़ा उदास था, जून उसे लेकर आएंगे. उनके आने से पहले वह  भोजन पूरी तरह तैयार रखेगी, उसे लगा कि अब उन्हें भोजन डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाना चाहिए. नन्हे को सीखना भी तो है अपने आप खाना. उसने बड़े जतन से टेबिल सजाई.




Saturday, October 13, 2012

गुलाम अली का जादू



परसों जून का जन्मदिन था, कल उसके नाम नूना के पिताजी का शुभकामना कार्ड मिला, परसों उसकी छोटी बहन का मिला था. बनारस से कोई समाचार नहीं मिला है न ही कोई कार्ड या पत्र. उसे समझ नहीं आता कि वह क्यों उससे छोटी-छोटी बातों पर विरोध करने लगती है, यह अच्छी प्रवृत्ति नहीं है, विशेषकर जून के लिए, उसे दुःख होता होगा. सोनू आज स्कूल गया है, मौसम सुहाना है, सावन का महीना है आखिर, ट्रांजिस्टर की बैटरी नई लानी है और चिवड़ा, पर अब अगले महीने ही खरीदेंगे. जून ने उसे सौंपी है घर का कार्य चलाने की जिम्मेदारी. आखिर आज गेस्ट रूम की ट्यूब लाइट ठीक हो गयी, वह स्नानघर में थी कि दरवाजे की घंटी बजी, नैनी ने तीन बार घंटी सुनने पर दरवाजा खोला.  

कल शाम वे एक मित्र परिवार के यहाँ गए, होना चाहिए था क वे प्रसन्न होकर लौटते पर जून उदास हो गए. वहाँ भी बनारस की बातें हुईं. जून को माँ-पिता की बहुत फ़िक्र रहती है, वह चाहते हैं कि उसे व सोनू को वहीं रहना चाहिए, चाहे दाखिला हो या नहीं. आज भी महरी नहीं आयी, काम करने के लिए अपने लड़के को भेज दिया है, उसने सोचा, उसकी तबियत सचमुच खराब है या सिर्फ बहाना बना रही है इसका पता कैसे चले. वर्षा लगतार हो रही है, सुबह सोनू के स्कूल जाते वक्त भी और उसकी छुट्टी के वक्त भी, उसे न भेजूं ऐसा जून ने कहा पर घर में रहकर उसकी शरारतें बढ़ जाती हैं, स्कूल बच्चों के लिए बहुत जरूरी है, कल दोपहर फिर वह सो नहीं रहा था, बहुत मनाने पर सोया.

गुलाम अली को बहुत दिनों बाद सुन रही है. “मेरे होठों को तब्बसुम दे गया..धोखा तुझे....”तीन-चार बार दोहराते हैं इस एक पंक्ति को. “तूने मुझको ख्वाब जाना देख ले सेहरा हूँ मैं...”किचन से बर्तनों की खड़खड़ाहट आ रही है लगता है नैनी आ गयी है. नन्हे ने आज पहली बार कि स्कूल नहीं जाएगा, नींद आ रही है, सुबह-सुबह खूब गहरी नींद आती है न, बेड छोड़ने का मन नहीं करता होगा. कल उसको e सिखाया a से छुट्टी हुई, कल बड़ी ननद की भेजी राखी मिली पर पत्र नहीं था उसमें. जून कल शाम घर आए तो दो मित्र साथ थे, काफी खुश लग रहे थे, सुबह तक भी उनका मूड ठीक था, वह ही बिना वजह नाराज हुई.

आज 'भारत बंद' का आह्वान विपक्षी पार्टियों ने किया है. उन्होंने फिर से टिकट करायीं थीं और थोड़ी बहुत परेशानी झेल कर परसों वे बनारस पहुंच गए, उसी दिन कॉलेज गयी, फ़ीस जमा की, दाखिला हो गया. कल पहली बार बीएड की कक्षा में गयी. जून कल ही वापस चले गए. कुछ विषयों में पढ़ाई आरम्भ हो चुकी है. उसने तय किया है, एक हफ्ते में पिछला सब नोट कर लेगी. पढ़ाई विशेष कठिन नहीं लग रही है.

कल जून को पहला पत्र लिखा इस बार का. इस समय पौने आठ हुए हैं, नन्हा परेशान हो रहा है, क्योंकि उसे पढ़ने के लिए कह रही है, बहाना बना रहा है कि नींद आ रही है. उसे लगता है घर पर वह पढ़ नहीं पायेगा, उसे भी किसी स्कूल में भेजना होगा. आज एक सप्ताह हो गया कालेज जाते, नहीं पांच दिन, बीच में एक दिन छुट्टी थी. अब परसों फिर अवकाश है, तीज के कारण. नन्हे ने आज सुबह कितनी बार कहा, “आज कालेज मत जाइये”, जाते समय हाथ भी नहीं हिलाया. शाम को वापस आने पर भी बोला, “आप कभी मत जाइयेगा”. कल जून को दूसरा पत्र लिखा था, सुबह जल्दी उठी थी कि जून को खत पोस्ट करना है पर हो नहीं पाया. शाम को अंग्रेजी अखबार भी आया था, पर पिता ने मना कर दिया, उन्हें पता नहीं था कि उसने ही देने के लिए कहा था.




Wednesday, September 12, 2012

गंगा घाट पर सुबह की सैर



आज उन्हें यहाँ पूरा एक हफ्ता हो गया, बाजार गयी थी, किताब तो मिली नहीं..कला संकाय के लिए थी वह किताब वैसे फार्म में तो ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं था. अगले हफ्ते विज्ञान संकाय की पुस्तक भी आ जायेगी ऐसा दुकानदार ने कहा तो है. कल रात उसने पत्र लिखा, कल संभवतः उसका पत्र भी आयेगा, थोड़ा-थोड़ा गुस्सा तो वह जरूर होगा न..पर लगता है इस गुस्से में भी एक अजीब तरह की मिठास है, प्यार है. मौसम भी आज अच्छा रहा और यहाँ सभी का व्यवहार सभी के प्रति बहुत अच्छा है. स्नेह भरा, ऐसे वातावरण में रहकर ही वह बड़ा हुआ है. तभी उसका दिल भरा हुआ है प्यार से. आज दोपहर को उसके एक मित्र अपनी पत्नी के साथ आए थे, कुछ देर रुके फिर चले गए.

कल दोपहर और कल रात भी अपने घर की बहुत याद आयी. नन्हे को सुलाना था कि मेहमान आ गए. वह इतनी जिद करता है पर उसे यहाँ डांटा नहीं जा सकता, सब उसकी पैरवी करने लगते हैं. सोचा है आज से कम से कम वह तो समय से भोजन कर लेगी. और सोनू को भी साढ़े नौ बजे तक सुला देगी. ग्यारह बजे रात तक जागना उसके लिए ठीक नहीं है. इस समय सुबह के छह बजे हैं, कुछ देर पूर्व माँ को उठया गंगा जी जाने के लिए, पर शायद वह उठना नहीं चाह रही हैं. लगता है कल रात वर्षा हुई, अभी भी हवा में ठंडक है.

कल उनका असम जाने के बाद पहला खत आया. गोहाटी से भेजा है. उनकी ट्रेन १२ घंटे देर से पहुंची, सो शनिवार को दफ्तर नहीं जा सके. दूसरे खत से मालूम होगा कि सीएल की जगह पीएल तो नहीं लेनी पड़ी. अब जबकि वह दूर है तो इतना याद आता है, इतना ख्याल रहता है उसका और जब वह नजदीक था उसे...चलो अब मिलने पर सारी शिकायतें दूर हो जाएँगी. घाट तक माँ के साथ घूमने जाना है पर वह हैं कि आ ही नहीं रही हैं. लगता है वह मन से जाना नहीं चाहती हैं टालना चाहती है, हम सभी के कहने पर. बेमन से हाँ कह देती हैं. वह चाहती है कि जल्दी जाकर जल्दी लौट आये जिससे नन्हा सोया रहे जब तक वे आयें. कल का दिन सामान्य था, हाँ, चिट्ठी आयी यह बात तो थी.

डायरी लिखती है पर कल ध्यान ही नहीं था तिथि कौन सी है, कल ड्राईक्लीनर से साड़ियां मिलनीं  थीं, आज सुबह तो माँ बीस मिनट में ही तैयार हो गयीं, मगर पन्द्रह मिनट में ही वे लोग लौट आये, अखबार लेने का मन हुआ पर पर्स नहीं ले गयी थी. कल रात स्वप्न में जून को देखा, उसे भी आते होंगे ऐसे स्वप्न, अगर वह उसे एक बार लिख दे कि अप्रैल में आ जाये तो वह आ जायेगा पर वह ऐसा नहीं करेगी. वे जून में ही मिलेंगे. और उसके बाद अक्तूबर में. यहाँ सब ठीक चल रहा है. माँ कभी कभी पुरानी बातें दोहराने बैठ जाती हैं, और जानबूझ कर उदास होती हैं, जैसे दुखी होना उनके लिए जरूरी हो. पिता ठीक रहते हैं समझ गए हैं और ननद भी. अभी विशेष गर्मी शुरू नहीं हुई है, सुबह-शाम मौसम बेहद अच्छा रहता है.