Monday, January 28, 2019

ग्रेनाईट की स्लैब



पौने ग्यारह बजे हैं सुबह के, घर में सफेदी आदि का काम शुरू हो गया है. मौसम अच्छा है, खिली हुई धूप बगीचे को और भी सुंदर बना रही है. लेकिन कमरे में भीतर तक महसूस होने वाली ठंड भी है. आज डहेलिया में पहला लाल पुष्प खिला है. किचन में ग्रेनाईट की स्लैब लगाने का काम हो रहा है. कितना शोर करती है यह मशीन और काटते हुए जो धूल उड़ती है उससे दीवारों व फर्श के साथ-साथ मजदूरों के वस्त्र तथा चेहरों पर धूल की कितनी मोटी परत चिपक गयी है. आज वे किचन का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. कल सुबह धनबाद की यात्रा पर निकलना है. कल रात एक पुराना मित्र परिवार अपने मेहमानों के साथ भोजन पर आया था, उन्हें दो कविताएँ भी सुनायीं. जून ने बहुत ठहाके भी लगाये, वह कल बेहद खुश थे. कालेज के जमाने की बातें हुईं. सखी की मेहमान के लिए उसने एक कविता लिखी, अभी टाइप करनी है, छोटी बहन की फरमाइश वाली कविता भी लिखनी है. कल उसके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ है, वह चाहती है उसके जीवन के मुख्य पड़ावों का जिक्र करती हुई एक कविता हो. शाम को क्लब जाना है, मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है.

तीन बजे हैं दोपहर के, अभी कुछ देर पहले ही सलीम ने कहा, जो मुस्लिम है और मजदूरों का मुखिया है, पंडाल भी वही लगाएगा और खाना भी वही बनाएगा. उस का अर्थ था कि घर में जो विवाह होने जा रहा है उसके लिए. सुबह कम्पनी से आये चेनमैन ने पूछा था, शादी कब है, उसने कहा, अभी देर है. उन्हें कैसे बताये कि अभी तो विवाह केवल कोर्ट में होगा बाद में ही रीतिरिवाज वाली शादी होगी और वह भी बंगलूरू में. यहाँ पर एक पार्टी ही होगी. छोटे भाई के यहाँ भी लड़के वाले आ रहे हैं, बड़ी भतीजी के रिश्ते की बात तय हो चुकी है, विवाह की तारीख आदि तय होगी. जून आज दिगबोई गये थे, दोपहर भोजन पर नहीं आये. उसने इस मौसम में पहली बार गाँठ गोभी वाले चावल बनाये थे, उनके लिए रखे थे पर मजदूरों ने जब कहा, वे ठेकेदार से पैसे न मिलने के कारण भोजन करने ही नहीं गये तो उन्हें दे दिए. उसे आश्चर्य हुआ ठेकेदार आखिर ऐसे किस काम में उलझ गया कि उसे मजदूरों के भोजन का भी ध्यान नहीं रहा. आज जून के एक सहकर्मी के पिताजी द्वारा भेजी पत्रिका ज्ञानोदय पढ़ती रही, अब उस तरह का साहित्य उसे ज्यादा आकर्षित नहीं करता. अध्यात्म से जुड़े विषय ही मन को भाते हैं. आज मृणाल ज्योति जाना था पर कुछ अव्यवस्था के चलते गाड़ी नहीं मिली. पिछले दिनों कम्पनी में कुछ अकुशल मजदूरों की भर्ती की गयी, जिन्हें काम नहीं मिला वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तथा तोड़-फोड़ पर उतर आये हैं. कल क्लब के वार्षिक सम्मेलन भी हो गया. जून उसे अपने साथ धनबाद ले जा रहे हैं, जहाँ उन्हें एक सेमिनार में भाग लेना है, और यही नहीं, वह चाहते हैं कि वह कार्यक्रम में भी उनके साथ सम्मिलित हो. वह अलग ही मिट्टी के बने हैं, दृढ़ और कर्मशील ! वे दोनों एकदूसरे के मित्र बन गये हैं अब. कल रात को कई बार भीतर के शोर और सन्नाटे को अनुभव किया, बिजली के बटन को जैसे कोई ऑन-ऑफ करे, वैसे ही भीतर संसार व भगवान दिखते हैं.      

Tuesday, January 22, 2019

एलोवेरा का जूस



नया वर्ष आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये हैं, आज यह पीले रंग की डायरी उसे मिली है. इतने वर्षों में नीली, भूरी, काली, मैरून रंग की डायरियां ही मिलती रहीं, पहली बार पीले रंग के कवर वाली डायरी. रात्रि के सवा नौ बजने को हैं, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं. आज से उन्हें ह्यूस्टन से आये मेहमानों के साथ कुछ समय बिताना होगा, शायद कुछ दिन तक रोज ही आने में देर हो. कल शाम भी वे क्लब गये थे, तीन जनों का विदाई समारोह था. उनमें से एक की पत्नी लेडीज क्लब की सदस्या भी हैं, वह उनके लिए कविता लिखेगी. सुबह सुहानी थी, जून को बाहर तक छोड़ कर आई तो अपने आप ही हाथ कविता वाली डायरी की और बढ़ गये, कुछ पंक्तियाँ फूटने लगीं, जैसे भूमि से समय आने पर अंकुर फूटने लगते हैं. उसे आश्चर्य होता है, शब्द भीतर कहाँ सोये रहते हैं, कभी तो एक उड़ता हुआ ख्याल भी नहीं आता कि कुछ लिखे और कभी भावों का दरिया बेसाख्ता बहने लगता है. शायद वे ही समझदारी का बाँध लगा देते हैं और हिसाबी बुद्धि को भला कविता से क्या काम. दिगबोई क्लब पत्रिका के लिए लेख माँगा है, पहले का लिखा ही कोई कल भेजेगी. उसने दो सखियों को नन्हे के विवाह की खबर दी, हो सकता है बंगाली सखी इस खबर को सुनकर ही आये. जून ने रजिस्टर्ड विवाह के लिए फार्म आदि भरकर जमा कर दिए हैं. इस महीने के अंत में वह और सोनू कानूनी रूप से एक पावन बंधन में बंध जायेंगे. आज उसके जन्म के समय लिखी डायरी का एक पन्ना पढ़ा, कितना सरल था तब जीवन. सेब का दाम चौदह रूपये प्रति किलो था और मंहगे लग रहे थे.  

शाम के साढ़े पांच बजे हैं. चार बजे जून आये थे जब किचन के प्लेटफार्म पर लगाने के लिए ठेले वाला काले रंग का ग्रेनाइट लाया था. कल से घर में रंगाई-पुताई का काम शुरू हो रहा है, जो बीहू तक चलेगा. उसने आंवला-एलोवेरा-लौकी का जूस बनाया था और खीरा-टमाटर का सूप, साथ में मौसमी फल, यानि सेहत के लिए सभी मुफीद वस्तुएं ! सुबह धनिये वाले आलू बनाये थे, छोटे-छोटे सफेद आलू इसी मौसम में मिलते हैं. उससे पूर्व स्वामी रामदेव व आचार्य बालकृष्ण को सुना. सन्यास के बाईस वर्ष पूर्ण होने पर वे अपने संस्मरण सुना रहे थे. बेहद रोचक ढंग से उन्होंने अपनी युवावस्था के, गुरूकुल के प्रवास के प्रसंग सुनाये.

कल रात तीन अद्भुत स्वप्न देखे. एक में भूमि की गहराई से एक सुंदर शिवलिंग प्रकट होता हुआ दिखा, दूसरे में एक विशाल पक्षी आसमान से उतरता हुआ दिखा, वह विशाल पंखों वाला था. तीसरे में घर में ही एक कमरे में विशाल कमल ! स्वप्नों की दुनिया उसे सदा ही विस्मयों से भरती रही है. वर्षों पहले एक कविता लिखी थी कि ईश्वर कितना भी अदृश्य रहे पर स्वप्नों में वह छुपा हुआ नहीं रह पाता, उसका वैभव प्रकट हो ही जाता है. किसी अदृश्य लोक से ही आते हैं स्वप्न...दोपहर को ब्लॉग पर लिखा. पुराने दिनों की डायरी पढ़ी, नन्हे के बचपन की बातें ! नन्हे के जीवन में एक नया मोड़ आ रहा है, शायद इसलिए वह उसका बचपन याद कर रही है, मन की थाह कौन लगा सकता है, उसके अवचेतन में क्या चल रहा है, जो अचानक भीतर वात्सल्य भाव उमड़ रहा है.


Monday, January 21, 2019

महाप्राज्ञ की सीख


वे घर लौट आये हैं, दो दिन सफाई व घर को व्यवस्थित करने में लग गये. आज भी ठंड ज्यादा है. मौसम बदली भरा है, सुबह कुछ देर के लिए धूप निकली थी पर इस समय शाम के चार बजे हैं, आकाश सलेटी-श्वेत बादलों से भर गया है. कल क्रिसमस था, घर पर ही बच्चों के साथ मनाया. कल मृणाल ज्योति जाना है. लिखने का कार्य अभी आरम्भ नहीं हो पाया है.

यह वर्ष समाप्त होने में तीन दिन ही शेष हैं. अभी-अभी बंगाली सखी से बात की. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर या पहली जनवरी को नये वर्ष के लिए आमंत्रित किया. वह बहुत उत्साहित तो नहीं दिखी. भविष्य ही बतायेगा, क्या होता है. आज यहाँ कोहरा, शीत लहर और ठंड सभी अधिकता में हैं. बहुत दिनों बाद आचार्य महाप्राज्ञ को सुना, प्रेक्षा ध्यान व कायोत्सर्ग के बारे में भी सुना. किसी एक समय उसने कई दिनों तक यह ध्यान किया था. मंजिल तक पहुँची नहीं, पड़ाव को ही मंजिल मानकर जो वह बैठ गयी है उसका असर स्पष्ट दिखने लगा है, सचेत हो जाना होगा. संत ने कहा, ‘वाणी का प्रयोग भी सम्यक हो, मित भाषिता, मिष्ट भाषिता, सत्य भाषिता यदि वाणी में न हों तो दोष ही कहा जायेगा. बात को लंबा खींचना भी दोष है तथा वाणी में सार का न होना भी दोष है. मित भाषी व सार युक्त बोलने वाला सुखी रहता है’. उसने सोचा, ध्यान को पुनः नियमित करना होगा तथा शास्त्रों का पठन–पाठन भी, मन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता, यदि साधक ऊपर नहीं जायेगा तो मन नीचे जाने के लिए तैयार ही बैठा है. कल सभी को नये वर्ष के कार्ड्स भेजे हैं, अभी भी कुछ कार्ड्स शेष हैं जो भेजे जा सकते हैं.

कुछ देर पूर्व बाहर धूप में विश्राम किया, लॉन में धूप बिखरी हुई है जो वे बंगलूरू के फ़्लैट में खोजते थे. आज शाम को एक मित्र परिवार चाय पर आएगा, दो बड़े, दो बच्चे. अभी शाम की तैयारी करनी है. जून के दफ्तर में वीडियो कान्फ्रेंस थी, लंच के लिए देर से आये दस-पन्द्रह मिनट के लिए, उसने डेढ़ घंटा प्रतीक्षा की पर भोजन अकेले ही करना पड़ा. जून ने कल गेहूँ की घास का चूर्ण मंगवाया और चिया सीड्स यानि तुलसी के बीज भी, वह अपने स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रख रहे हैं. उनका एक चित्र जो ऑफिस में एक फोटोग्राफ़र ने खींचा है, उनकी स्वास्थ्य के प्रति निष्ठा को दर्शाता है. सुबह एक योग साधिका का फोन आया, उसकी सास का कल रात देहांत हो गया. चार महीने की लंबी बीमारी के बाद पिछले शुक्रवार को उन्होंने भोजन त्याग दिया था. कल ही परिवार ने उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए प्रार्थना करवाई थी. वह दो-तीन बार उन्हें देखने अस्पताल गयी थी. उनका चेहरा शांत लगता था, पर कभी-कभी वह अनर्गल वार्तालाप करने लगती थीं. शायद उन्हें भी डेमेंशिया का रोग था.    

Saturday, January 19, 2019

ऊबर का ड्राइवर



जीवन अपने आप में कुछ भी नहीं है, बस, एक सूक्ष्म अहसास, एक होना भर, एक नामालूम सा ख्याल या एक कल्पना, इतना हल्का कि पल भर में गगन तक उड़ जाए, इतना महीन कि परमाणु के भीतर से गुजर जाये. तमिलनाडू में आये वरदा चक्रवात के कारण आज यहाँ मौसम बादलों भरा है. कुछ देर पहले सोसाइटी की बेसमेंट पार्किंग में धोबी को इस्त्री के लिए चादरें, गिलाफ व अन्य कपड़े देकर आयी, हर इतवार को नन्हा चादर बदल देता है. दोपहर से पानी नहीं आ रह है, शायद टैंक की सफाई होनी हो. जून उस जगह बैठे हैं जहाँ धूप आती है, पर आज मात्र प्रकाश है. मृणाल ज्योति से फोन आया है, वापस जाकर कुछ नये दायित्व लेने हैं.

आज मौसम ठंडा है, कल शाम से लगातार वर्षा हो रही है, चेन्नई में आये तूफान से वहाँ क्या हाल हुआ होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. जून को कल दो समाचार मिले, एक प्रमोशन के लिए इंटरव्यू की तिथि और दूसरा इनकम टैक्स जमा करने के लिए नोटिस. आज उनका ऑन लाइन खरीदा हुआ डिनर सेट आ गया है. अभी चम्मच और चाय के मग आने शेष हैं. बाथरूम के लिए कैबिनेट भी आकर पड़ा है, लगाया जाना शेष है. इस घर को जितना सुविधाजनक बना सकें वे बना रहे हैं. यहाँ रहना उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है. कल भी एक विज्ञान फिल्म देखी. आज भी नन्हा एक फिल्म के बारे में बताकर गया है. कल रात्रि अथवा सुबह के स्वप्न ही में दो कहानियों की रूपरेखा मन में आकार ले रही थी. एक में दो व्यक्तियों के पुनर्जन्म की कहानी थी था दूसरी में क्या था अब जरा भी याद नहीं है. वे हर जन्म में वही गलतियाँ दोहराते चले जाते हैं, पर हर बार भूल जाते हैं. यदि याद रहे तो जीवन कितना सहज हो जाये..पर वे तो एक ही जन्म में कितनी भूलों को दोहराते रहते हैं.

दोपहर बाद के पांच बजे हैं, अभी शाम के पांच बजे हैं, कहना ठीक नहीं है क्योंकि अभी भी धूप में तेजी है, सूरज चमक रहा है. यहाँ बालकनी में गर्मी का अहसास हो रहा है. परसों उन्हें वापस घर जाना है. जून का पैर अब काफी ठीक है. नन्हे का एक पुराना मित्र यूएसए से दो दिनों के लिए यहाँ आया है. वे बहुत दिनों  बाद घर जा रहे हैं. नन्हे के घर पर सभी सुख-सुविधाएँ थन, उनका समय काफी आराम से बीता. अब आने वाले वर्ष के स्वागत की तैयारी करनी है और फिर मेहमानों के स्वागत की.

सुबह के सात बजने वाले हैं. वे हवाई जहाज में बैठ चुके हैं. जो यात्रा दोपहर बाद उन्हें घर तक ले जाएगी, वह रात्रि ढाई बजे से ही आरम्भ हो गयी थी, जब जून का अलार्म बजा. नन्हा व उसका मित्र तब तक जग ही रहे थे. ऊबर का ड्राइवर बहुत बातूनी था, उसका नाम बाशा था, तेलुगु था पर उसे हिंदी फ़िल्मी गीत बहुत पसंद थे. रास्ते भर मना करने के बावजूद बजाता रहा. कहने लगा, वह कतर में भी गाड़ी चला चुका है. तेज गति से वाहन चलाने का अभ्यास है पर भारत की सड़कें उतनी गति के लिए ठीक नहीं हैं.

Sunday, January 13, 2019

जॉप नाउ और बिग बास्केट



आज सुबह नींद जल्दी खुली. प्रातः भ्रमण, प्राणायाम, व्यायाम सभी कुछ समय से हुआ. ठंडी हवा बह रही थी., जब वे टहलने गये. हल्के बादल भी हैं आकाश पर. गुलदाउदी के पीले पुष्प भी मिले फूल वाली मालिन से, हल्की सी फुहार चेहरे पर पड़ रही थी. नाश्ते में रागी का चीला बनवाया, जून ने जॉपनाउ से मंगवाया था रागी. नन्हा कल रात फिर देर से आया, सुबह उठते ही चला गया. इस समय हल्की धूप निकल आई है. रसोइया दोपहर का भोजन बनाकर चला गया है. महरी सफाई कर रही है. आज ब्लॉग पर दो पोस्ट्स सीधे ही लिखकर डालीं. कल पहली बार एक ब्लॉग पर मोबाइल पर लिखा था. कल विश्व विकलांग दिवस है. असम में होती तो व्यस्तता कुछ अलग होती. कल भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखी है. कल दीदी का फोन आया था, उन्हें नन्हे की मित्र के बारे में नहीं बताया है, एक दिन तो बताना ही होगा.

आज नन्हे का अवकाश है. सुबह का नाश्ता उसी ने बनाया और शाम की चाय भी. इस समय बाजार गया है. मौसम आज अच्छा है, धूप निकली है. कल रात को उसका एक मित्र अपनी पत्नी के साथ आया था, उन्हें पानी-पूरी खिलाई. जून को कल सुबह की प्रतीक्षा है, जब उनका प्लास्टर खोला जा सकता है. पिताजी व छोटे भाई से बात हुई, उसके विवाह की वर्षगांठ है, उसके लिए लिखी कविता उसे पसंद आई. तीन पोस्ट्स भी लिखीं, लिखने के लिए यहाँ समय मिल जाता है, क्योंकि घर का कोई विशेष काम नहीं करना होता. नन्हे का लाया एक खेल खेला, ‘कटान’, उसमें दस अंक मिले, पर एक जगह नियम के खिलाफ जाकर. कुछ देर अक्षय कुमार की फिल्म देखी ‘एयर लिफ्ट’. फिल्म काफी अच्छी है.

आज जून के पैर का प्लास्टर खुल गया है, पर अभी दो हफ्ते उन्हें और यहाँ रहना है. नन्हा अस्पताल ले गया था, फिर घुटने पर लगाने के लिए एक बेल्ट देने आया, जिसका नाम ‘रॉम नी बेल्ट है. वे लोग दुबई भी नहीं जा रहे हैं. छोटी बहन को बताया तो वह कुछ परेशान हुई, पर उन्हें व्यक्ति, वस्तु तथा परिस्थिति पर अपने मन की ख़ुशी को निर्भर नहीं करना है. आज ब्लॉग पर एक त्वरित रचना पोस्ट की.

शाम के पांच बजे हैं, अभी भी धूप निकली है यहाँ. असम में अँधेरा हो गया होगा. जून बेड पर व्यायाम कर रहे हैं. कल रात्रि साढ़े ग्यारह बजे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता का देहांत हो गया. कल शाम से ही उनकी सम्भावित मृत्यु की खबर टीवी पर आ रही थी. वह पिछले दो महीने से अस्पताल में थीं. जयललिता ने राजनीति में कदम रखने से पूर्व फिल्मों में भी काम किया था. हिन्दी की एक फिल्म में भी धर्मेन्द के साथ उन्होंने एक भूमिका निभाई थी, जो वह इस समय मोबाईल पर देख रही है. इस समय बचपन में सुना एक गाना, क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे, नकली चेहरा सामने आये, असली सूरत छिपी रहे...बज रहा है. यहाँ नेट की स्पीड बहुत ज्यादा है.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. सुबह से शाम कैसे हो जाती है और समय कहाँ चला जाता है, पता ही नहीं चलता. आज भी दोपहर के दो बज चुके हैं. कहीं पढ़ा था कि उम्र के साथ-साथ काम करने की गति कम हो जाती है, इसलिए उम्रदराज लोगों को समय सदा जल्दी भागता हुआ लगता है. जून विश्राम कर रहे हैं, सुबह नाश्ते में उन्होंने स्वयं बनारसी तरीके से चिवड़ा-मटर बनवाया, चाय नन्हे ने बनाई, उसने केवल फल काटे. नन्हा शनिवार होने के बावजूद दफ्तर चला गया है, शाम तक आएगा. एक फिल्म लगाकर गया था, B4G, एक बड़े दैत्य की कहानी थी, जो आदमियों को सपने देता है. अद्भुत कल्पना और फोटोग्राफी है फिल्म में. मौसम आज अच्छा है, न ठंड न गर्मी, धूप खिली हुई है. सुबह मीनाक्षी मन्दिर के बाहर से सुंदर फूल मिले, पीले और लाल फूलों की एक माला भी ! आज उन्हें बाजार जाकर फल लाने हैं इससे पहले कि नन्हा बिग बास्केट में आर्डर कर दे.


Saturday, December 8, 2018

मणिकर्णिका घाट



आज अचानक उसे चार वर्ष पहले बनारस में बिताये दिनों की याद हो आई है, कोई न कोई कारण अवश्य होगा इसके पीछे, हो सकता है इसलिए कि एक और यात्रा पर अगले माह उन्हें जाना था, वह शायद सम्भव नहीं हो पायेगी. वे कोलकाता तक फ्लाइट से गये थे और उसके आगे कालका मेल से. सुबह उठे तो बिहार आ गया था, खेतों में सुनहरी फसल खड़ी थी, कहीं कट रही थी, कहीं कटने के इंतजार में. मीलों तक फैले खेत कहीं खाली पड़े थे. खेतों में नर-नारी दोनों काम कर रहे थे. मुगलसराय स्टेशन पर उतरे तो एक टैक्सी वाला सामने आ गया, उसके पास अम्बेसडर थी, कहने लगा एक-दो वर्षों में ये कारें दिखनी बंद हो जाएँगी, अब पार्ट्स नहीं मिलते. अगले दिन वे गंगा घाट गये. होटल बिलकुल घाट पर था, मीर घाट पर जो अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था. कमरे में सामान रखकर दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता के मन्दिर गये, आस-पास बहुत गंदगी थी, पर लोगों की कतार लगी हुई थी. गंदगी से जैसे उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. मणिकर्णिका घाट का दृश्य विचित्र था. दस-बारह शव जल रहे थे, जैसे ही एक शव जलता, चिता पर पानी डालकर उसे ठंडा कर दिया जाता व फूल चुनकर वे लोग गंगा में बहा देते थे. सीढ़ियों पर लोग बैठे थे जिनके प्रियजन जल रहे थे, पर कोई रोना-धोना नहीं था. माहौल उत्सव सा ही लग रहा था, मृत्यु का उत्सव ! लकड़ियों के ढेर लगे थे और तेज हवा में चिताएं धू-धू कर जल रही थीं. पुआल में एक अंगारा रखकर चिता जलाने के लिए लाया जाता था. देखते-देखते ही नई-नई लाशें चिता पर रखी जा रही थीं. यह कर्म चौबीस घंटे चलता रहता है. कहते हैं काशी में मरने वालों को मोक्ष मिल जाता है. गंगा की धारा हजारों वर्षों से यहाँ बह रही है, मृतकों को अपने आश्रय में लेती आ रही है, लोग इसे पावनी गंगा मानते हैं. कुछ देर बाद उन्होंने भी एक दूसरे घाट से गंगा पार जाकर इसकी धारा में स्नान किया. अपने अंदर के कल्मष को दूर करने में यह अवश्य ही सहायक होगा इस भावना के साथ. पानी पहले तो ठंडा लगा फिर देह अभ्यस्त हो गयी. गंगा के पावन जल का स्पर्श अत्यंत सुखद था, पैरों के नीचे लोगों द्वारा छोड़े गये वस्त्र छूने में आ रहे थे. सफाई की बहुत आवश्यकता है यहाँ, पर लोगों की भीड़ अनवरत आती रहती है की सफाई के लिए अलग से समय निकलना कठिन होता होगा. वापसी में उन्होंने आरती का भी आनंद लिया. आरती भव्य थी, अद्भुत क्षण थे वे, परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हो रहा था. उसके बाद विश्वनाथ मंदिर भी गये थे वे, जहाँ पुलिस का सख्त इंतजाम था. देवी अन्नपूर्णा के दर्शन किये शनिदेव के और बड़े हनुमान के भी. विशालाक्षी मन्दिर तथा अन्य भी कई मन्दिर मार्ग में देखे. होटल लौटे तो चाँद आकाश में चमक रहा था और शीतल हवा बह रही थी. अगले दिन सुबह घाट पर ही होने वाले योगाभ्यास में भाग लिया. उसके बाद घर लौटते समय वारही देवी के दर्शन किये. एक गली में था मन्दिर. मूर्ति दर्शन भी विचित्र था. ऊपर से एक चौकोर छिद्र में से झांककर देखने होता था, नीचे जिस कक्ष में मूर्ति थी वहाँ जाना सम्भव नहीं था. बनारस की हर गली में कोई न कोई छोटा बड़ा मन्दिर है, अद्भुत नगरी है यह. कुछ देर एक चबूतरे पर बैठकर गंगा की लहरों से आती ठंडक तथा सूर्य की नव रश्मियों का स्पर्श करते हुए ध्यान भी किया. शाम को नगर में स्थित आयुर्वैदिक केंद्र में पहली बार शिरोधारा का अनुभव लिया. पडोस के घर में विवाह था, उसमें भी सम्मिलित हुए थे. बनारस से वे वापस कोलकता आये थे और बंगाली सखी की बिटिया के विवाह में सम्मिलित हुए थे.

रात्रि भोजन हो चुका है. नन्हा अभी तक नहीं आया है, शायद मार्ग में हो, लगभग बारह घंटे की उसकी ड्यूटी है. अपने काम के अलावा आजकल उसका कोई दूसरा शौक नहीं रह गया है. शाम को वे टहलने गये. दुकान से इडली के लिए सूजी खरीदी. आज अपेक्षाकृत ठंड ज्यादा है. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले उठे. फूलवाली ने तब तक अपनी दुकान नहीं लगाई थी, जब वह प्रातः भ्रमण के लिए गयी, न ही सूर्य देवता ने दर्शन दिए जब छत पर गयी. हर दिन अन्य दिनों से कितना भिन्न होता है. उनकी भावनाएं भी भिन्न हों तो क्या बड़ी बात है. मन बदलता है, आत्मा सदा एक सी रहती है, द्रष्टा है, साक्षी है. जून ने कहा वह बहुत धीरे-धीरे खाती है. उसने इस बात को गम्भीरता से ले लिया, पल भर के लिए ही सही अपनी मूल स्थिति से डिग गयी, पर आत्मा को मंजूर नहीं है. वह एक बार अपने सिंहासन पर बैठ गयी है तो उसे अपनी गद्दी से उतरना मंजूर कैसे होगा.


Friday, December 7, 2018

द जंगल बुक



शाम के सात बजे हैं, पहली बार ऐसा हुआ है जब जून और वह घर में अकेले हैं. नन्हा दफ्तर गया है, और उसकी मित्र अपने किसी रिश्तेदार से मिलने. भांजा अपने हॉस्टल चला गया है. उसकी मित्र ने कहा है जब वे वापस घर जायेंगे, उसकी माँ उनसे मिलने आयेंगी. अगले वर्ष के आरम्भ में ही नन्हा और वह विवाह बंधन में बंध जायेंगे. सुबह भी पांच बजे उठे. नन्हे ने सभी के लिए दक्षिण भारतीय नाश्ता बाहर से मंगवा लिया था, इडली, डोसा, पोंगल तथा हलवा. आज PPT पर थोड़ा काम किया. जून का कहना है वह पूर्व निर्धारित तिथि को वापस नहीं जा रहे हैं, पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाने के बाद ही वह वापस जायेंगे. अगले माह पहले सप्ताह में प्लास्टर खुलेगा, उसके बाद जून की इच्छा के अनुसार सम्भवतः वे दुबई भी जा पायें. छोटी भांजी का मेल आया, वह भी दुबई जा रही है, सो बहुत खुश थी कि वहाँ उनसे भी मिलेगी. आज उसके पास समय है पर भीतर कुछ कहने को नहीं है. न ही कुछ जानने को है, जिसे जानकर सब कुछ जान लिया जाता है, उसे जानने के बाद भीतर कैसा मौन छा जाता है. इस संसार में यूँ तो जानने को बहुत कुछ है पर जो संसार एक स्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं, उसे जानकर भी क्या लाभ हो सकता है. कुछ देर योग साधना करना ही सबसे उत्तम है !

रात्रि के आठ बजे हैं. आज सुबह नींद देर से खुली. प्रातः भ्रमण की जगह सांध्य भ्रमण किया. छत पर टहलने गयी तो सूर्यास्त होने ही वाला था. बादलों का रक्तिम रंग आकाश को अनोखे रंगों से दहकाता जा रहा था. वापस आकर बालकनी से देखा आकाश गुलाबी हो गया था. कैमरे से कुछ तस्वीरें लीं जो जून ने फेसबुक पर प्रकाशित कर दी हैं. आज रात्रि भोजन में काले चने की सब्जी बनाई है, जो नन्हे को बहुत रुचिकर है. दाल व मेथी की जो बड़ी वह साथ लाये थे उसे डालकर कुम्हड़े की सब्जी भी. साथ ही छोटी कटी सब्जियों का सादा सूप. आज से रसोइया छुट्टी पर जा रहा है, कल से दूसरा आएगा. दोपहर को छोटी बहन ने एक चित्र पूरा करके व्हाट्सएप पर भेजा, जो शायद वह कई दिनों से बना रही थी. टेक्नोलोजी ने दूरियाँ मिटा दी हैं. सुबह से एक बढ़ई घर में काम करता रहा, जो कल भी आएगा. नन्हे ने कलात्मक वस्तुओं से घर को सुन्दरता से सजाया है, खुला स्थान भी काफी है. आज सुबह नन्हे के साथ नेत्रालय भी गयी, डाक्टर ने परीक्षण किया पर PVD के कारण दायीं आँख के सामने जो काला घेरा दिखाई देता है, उसका कोई इलाज नहीं है, समय के साथ वह अपने आप ही कम हो जायेगा.

आज फिर बढ़ई आ गया है. शाम तक काम चलेगा. जून कुछ देर के लिए विश्राम करने शयन कक्ष में गये हैं. सुबह काफी देर तक वह दफ्तर का काम करते रहे. उन्हें घर बैठे खरीदारी करने का साधन ‘जॉप नाउ’ मिल गया है, अमेजन तो है ही. सुबह तिल भूने, अभी मूंगफली भूननी है गुड़ भी मंगाया है, वे गजक बनाने वाले हैं. कल रात देर तक ‘द जंगल बुक’ देखी, जिसका थोड़ा सा शेष भाग आज सुबह देखा. बहुत अच्छी फिल्म है. छोटा मोगली एक सखी की बिटिया की याद दिला रहा था, उसके हाव-भाव में कुछ समानता तो अवश्य है. उसके पास पढ़ने के लिए इस समय कोई प्रिय पुस्तक नहीं है. यहाँ रखी एक पुस्तक The deep work पढ़ना शुरू करेगी और करना भी. समय को व्यर्थ ही गंवाया जाये अथवा उसका सार्थक उपयोग किया जाये यह तो उन पर ही निर्भर करता है. दोपहर के बारह बजने को हैं. आजकल उसे ऐसा लगने लगा है उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है, न ही कुछ जानने को शेष रह गया है. भीतर कैसा सन्नाटा है, पर ऊर्जा जो मौन के रूप में प्रकट होती है वही तो मुखरित होगी और वह ऊर्जा तो अनंत है, चाहे जितना उपयोग करें उसका. परसों बड़े भाई का जन्मदिन है, उनके लिए एक कविता लिखेगी.