Thursday, August 4, 2016

हरी घास पर


आज धूप कल की सी तेज नहीं है, कल कई हफ्तों बाद वर्षा रुकी थी. परसों उनकी मीटिंग थी, उसने दो कविताएँ पढ़ीं. एक जन्मदिन की कविता भी लिखी. हिंदी कविता में कई दिनों से कुछ नहीं भेजा. कल साहित्य अमृत में रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक अच्छी कहानी पढ़ी. पिता अपनी बेटी के दिल को समझता है, ऐसे ही उसने एक दिन पिताजी से कहा था कि वह कुछ करें.. माँ से नहीं कहा जब उसके नाम का खत उसे नहीं मिल रहा था. माँ-पिताजी भोजन लगने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. उसके बाद उन्हें विश्राम करना है, दोपहर बाद उठना है फिर शाम की तैयारी और इस तरह एक दिन और बीत जायेगा..एक दिन ऐसे ही जीवन पूर्ण हो जायेगा..

कल स्टोर की सफाई की, आज नैनी किचन की सफाई कर रही है. डिब्रूगढ़ रेडियो स्टेशन से छम छम छमा छम ..गीत बज रहा है. आज सुबह पंछियों की आवाज सुनकर नींद खुली. आचार्य प्रद्युम्न जी को सुना, राग-द्वेष से मुक्त होकर ही कोई परमात्मा का अनुभव कर सकता है. भीतर जब शांति हो, स्थिरता हो, आनन्द हो तब वह धीरे से आता है.

मई का आरम्भ हुए तीसरा दिन है, आज मौसम गर्म है. एसी खराब हो गया था अभी मकैनिक आया है जो न जाने कितने घरों में एसी बनता है. आज सुबह वे साढ़े चार बजे उठकर सीधा टहलने गये. सुबह की स्वच्छ हवा में टहलना एक सुखद अनुभव था. नेहरु मैदान की हरी घास पर लोग नंगे पैरों चलकर ठंडक अपने भीतर भर रहे थे. जून कल दोपहर यात्रा से लौटे तो काफी ठीक लग रहे थे. शाम को उन्होंने डायरी में अपनी अस्वस्थता के बारे में लिखना भी शुरू किया है, अब वह जल्दी ही पूर्ण ठीक हो जायेंगे. भजन के साथ गुनगुनाने भी लगे हैं आजकल. उन लोगों ने सोचा है हर शाम कुछ अलग तरह से बिताएंगे. क्लब जाना भी आरम्भ करेंगे तथा कुछ समय लाइब्रेरी में बिताएंगे. सद्गुरु की कृपा से यह परिवर्तन आरम्भ हुआ है, एकरसता आ जाने से जीवन कैसा सूना-सूना हो जाता है. उन्हें इस सुंदर जीवन को जो ईश्वर के अमूल्य देन है, रसपूर्ण बनाना ही होगा. वह भारत के एक बड़े अस्पताल के डाक्टर से मिलकर आये हैं और उन्हें कोई बीमारी नहीं है, मात्र तनाव है, तनाव का कारण माँ की बीमारी हो सकता है और उनका तनावग्रस्त होने का स्वभाव..जो अब बदल रहा है, स्वयं को बदले बिना मानव महाजीवन को पा ही नहीं सकता. उसे भी अपने समय का सही उपयोग करना है, अपनी ऊर्जा का, शक्ति का सही उपयोग करना है ताकि मन प्रफ्फुलित रहे, सरस रहे और जीवन एक उत्सव बन जाये ! गुरूजी का असम यात्रा का सीडी जो एक परिचित ने दिया था, कल कम्प्यूटर पर चलाकर देखा, कितनी सुनहरी यादें छिपी हैं उसमें..सद्गुरु को आज भी सुना..कितना उत्साह है उनकी वाणी में कितना ओज और कितना तेज.


Wednesday, August 3, 2016

अनजानी सी गंध


आज क्लब की एक पुरानी पत्रिका के कुछ लेख पढ़े. बहुत आनंद मिला. मन में कुछ भाव जगे. पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली, न जाने कहाँ गुम थी. आज पुनः सत्संग है घर पर, देखें आज कौन-कौन आता है. जून देहली गये हैं, इतवार को लौटेंगे यानि तीन दिन बाद. उसने उन्हें याद करके लिखा-

क्यों शंकित है, क्यों पीड़ित है, हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है
साथी हैं हम जनम-जनम के, सुख के दुःख के हर इक पल के
किसे ढूँढ़ते नयन तुम्हारे, कैसे दर्द छिपाए दिल में
कदम-कदम संग चलना हमको, हर मोड़ पे मिलना हमको
चलो भुला दें बीती बातें, चलो मिटा दें दुःख, फरियादें
हाथ लिए हाथों में अपने, पूर्ण करेंगे सारे सपने
साथ निभाने का था वादा, तुमने न माँगा कुछ ज्यादा
जो चाहो वह सदा तुम्हारा, साँझा है यह जीवन प्यारा
तुमसे ही अपना जीवन है, तुमसे ही यह तन मन धन है
तुम ही हो सर्वस्व हमारे, तुमसे न कोई भी प्यारे
तुमने ही जीना सिखलाया, तुमसे कितना सम्बल पाया
हर उलझन को तुम सुलझाते, अपना कर्त्तव्य निभाते
तुमसे ही यह घर चलता है, तुमसे ही जीवन सजता है
परिवार को तुमने चाहा, सुंदर सा इक नीड़ बनाया
तुमने कितने उपहारों से, सोने चाँदी के हारों से
भर दी है मेरी अलमारी, जीवन सुंदर त्योहारों से..
साथी तुम संग जीवन प्यारा, तुम न हो सूना जग सारा
कैसे तुमको भूल गये हम, खुद से ही हो दूर गये हम
तुम आओगे तकती आँखें, भर दोगे सपनों से पांखें !


उसने कुछ देर नेट पर समय बिताया. गुरूजी को सुना. सुबह ध्यान में कुछ देर तो निर्विचार हो पायी थी पर अभी तक ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सब कुछ खो जाये, स्वयं का पता तो रहता ही है, लेकिन भीतर गहरी शांति है. कल शाम एक सखी के यहाँ गयी, वह कितना परेशान रहती है, उसका स्वभाव ही ऐसा हो गया है. रात को एसी चलाया था तो कैसी महक भर गयी थी कमरे में, अजीब सी गंध से ढाई बजे आँख खुल गयी थी, फिर काफी देर बाद नींद आयी. उसी समय जून भी गेस्ट हाउस में उठे थे. दीदी से बात करनी है पर फोन कहीं भी नहीं मिल रहा है, लिखा है ‘लिमिटेड सर्विस’ जाने क्या मतलब है इसका. 

भीगा भीगा मौसम


आज सुबह क्रिया के दौरान तथा बाद में ध्यान में भी सद्गुरु की कृपा का अनुभव हुआ, भीतर उस चैतन्य शक्ति का अनुभव हुआ और उनकी उपस्थिति इतने स्पष्ट तौर से महसूस की कुछ पलों के लिए ! कितना अद्भुत है यह आत्मा का ज्ञान ! आज का दिन उसके लिए (भाषा के कारण कहना पड़ता है वरना एक ‘लहर’ के लिए, ‘आत्मा’ के लिए) बहुत खास हो गया है. शब्द छोटे पड़ते हैं उन भावों को व्यक्त करने के लिए, वह अकारण दयालु है, सुहृद है..हितैषी है, करुणा का सागर है..आज ये सारे शब्द अनुभव में आये हैं. एक-एक कर वह उसकी कमजोरियों से मुक्त करा रहे हैं. उसका ध्यान कक्ष जैसे उनका आश्रम ही बन गया है. वहाँ योग शिक्षिका ने कोर्स कराया, उस दिन सद्गुरु वहाँ अवश्य उपस्थित रहे होंगे. कितने सरल ढंग से कितनी गूढ़ बातें वह उन्हें सिखा देते हैं, कहते हैं वे यूज़फुल बनें, मस्ती और ज्ञान में डूबे हुए, छोटे बच्चे की तरह निर्दोष ! वे कितने बेहोश जीते चले जाते हैं, कंकरों, पत्थरों को सम्भालते हैं और हीरे गंवा देते हैं ! परमात्मा की कृपा अनंत है, वह महान हैं और इतने भोले भी कि सभी को अपने जैसा ही मानते हैं, वह उन्हें उनकी सारी कमियों के साथ अपना लेते हैं.


दोपहर के दो बजे हैं, मौसम सुहावना बना है, अभी –अभी आइसलैंड के राष्ट्रपति का भाषण सुना कि जो ज्वालामुखी अभी फटा है उससे बड़ा फटने को है. पिछले कई दिनों से यूरोप में हवाई उड़ानें बंद हैं. कुछ देर पहले एक सखी से बात हुई, उसकी बिटिया कुछ ही दिनों में घर लौट आएगी. जून ऑफिस में हैं, माँ-पिताजी सो रहे हैं. तीन दिन बाद माली आया है, गुलाब के पौधों की कुड़ाई कर रहा है. उससे कुछ बात करने का सहज ही मन नहीं हो रहा. मौसम अभी भी भीगा-भीगा सा है. जून का स्वास्थ्य अभी भी ठीक नहीं है, आज दोपहर उन्होंने कहा कि प्रेम की कमी भी कारण हो सकती है...जो स्वयं प्रेम हो वह दूसरों से प्रेम मांगे, अजीब लगता है पर जिसने अभी यह नहीं जाना कि वह प्रेम है वह तो ऐसा ही कहेगा.. उसे भी अपना अतीत नहीं भूलना चाहिए, जून की ज्यादा देखभाल करनी होगी, उसके खोये विश्वास को पुनः जगाना होगा. वह जिसमें जीते ऐसे खेल उसके साथ खेलने होंगे, उपदेश से कुछ भी नहीं होने वाला है. जब उसे स्वयं के लिए अब कुछ भी करना नहीं है, कुछ भी पाना नहीं है तो उसकी हर श्वास अब जून के लिए ही होनी चाहिए..उसके प्रेम में पड़ना होगा  जैसे पहले उन दिनों में थी..उसके भीतर भी तो वही परमात्मा है..परमात्मा भी केवल प्रेम चाहता है और जून भी केवल प्रेम ही चाहते हैं, ढेर सारा प्रेम..और वह सिवाय प्रेम के कुछ रह ही नहीं गयी है..अनंत प्रेम से ही वह बनी है..जीवन कितना सुंदर है यहाँ कुछ भी खोने को नहीं है केवल पाना ही पाना है अनंत प्रेम, आनन्द और शांति..फिर वही देते जाना है..अस्तित्त्व को..लोगों को..प्रकृति को..और जून को..उसके होना तभी सार्थक होगा जब जून भी पूर्णस्वस्थ हों..पूर्णतृप्त हों..पूर्णमुक्त हों..और..पूर्ण प्रसन्न हों..अब उसे उन्हीं के लिए जीना है. स्वार्थ समाप्त हुआ क्योंकि वहाँ कोई है ही नहीं. वहाँ  जो है वह देने वाला है..लेकिन एक्टिंग भी करनी पड़ेगी लेने वाले की..अभिनय भी करना होगा जैसे भक्त और भगवान करते हैं..एक होकर भी दो का अभिनय करते हैं ! जून अवश्य ही ठीक हो जायेंगे..उसने स्वयं से वादा किया. 


Tuesday, August 2, 2016

आइसलैंड का ज्वाला मुखी




 पंछियों को देखती है तो उसे लगता है कितने आनंद में हैं वे, बस उड़ना और गाना दो ही तो काम हैं उन्हें, न कुछ खोने का डर न कुछ पाने की ललक..और तितलियाँ, वे भी तो बस फूलों पर मंडराती हैं और छोटे-छोटे कीट, जो घास में छिपे रहते हैं, उनका तो बस होना ही काफी है. इधर मानव को देखें तो उसके भीतर कितना संघर्ष चल रहा है, रोते हैं लोग और कुढ़ते भी हैं..आदेश चलाते हैं, बिना यह समझे कि क्या कर रहे हैं.

पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली. बीहू का अवकाश था. आज जून का ऑफिस खुला है. योग शिक्षिका को जवाब दिया, उसका SMS एक सखी को पढ़कर सुनाया तो उसके भी रोयें खड़े हो गये ! उसके दिल में भी प्रभु प्रेम की ज्योति जली है ! कल सुना कि आइसलैंड में ग्लेशियर के नीचे से ज्वालामुखी फटने से आकाश में धुँए के काले बादल छा गये हैं. हजारों उड़ानें रद्द हो गयी हैं. आकाश में कांच के टुकड़े हैं जो जहाजों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. प्रलय की तैयारी ही लगती है यह. प्रकृति की विनाशलीला का एक अध्याय ! नीचे जल ऊपर आग का प्रकोप, मानव को उसके कृत्यों का दोष तो भुगतना ही पड़ेगा. सुबह बाथरूम में एक कीट को पानी में से बचने की कोशिश पर उसने उसे हिम्मत बंधायी पर वह दम तोड़ गया. नन्ही सी जान, उसके लिए तो वह जल प्रलय का रूप धर कर ही आया था. सोमवार को मृणाल ज्योति खुला है, जाना है. लेडीज क्लब की दो सदस्याओं के साथ, योग सिखाने के साथ –साथ कुछ बातचीत भी करनी है. वापस आकर सेक्रेटरी को बताना भी है, एक छोटा सा काम भी कितना महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कोई उस काम को कभी-कभी करता हो. उसका यह काम भी अस्तित्त्व को समर्पित है. कर्म न बांधें साधक को इसका ध्यान हर क्षण रखना चाहिए ! उसका फोन पुराना हो गया है, बार-बार चार्ज करना होता है, बैटरी पुरानी हो गयी है, लेकिन जब तक यह काम दे रही है, काम चलाना होगा, बस सारे फोन नम्बर कहीं लिख कर रख लेने चाहिए.

कल इतवार था, दोपहर को ‘अंकुर संस्कार केंद्र’ के बच्चों की कक्षा थी. उन्होंने बहुत शोर मचाया, वह नियन्त्रण नहीं रख पायी, कोशिश ही नहीं की, लेकिन बाद में मन उदास था. उदासी की परवाह नहीं थी पर इसकी कि अभी तक मन बचा है. जो अभी तक भी मन बचा है तो इतने दिनों की साधना क्या यूँ ही गयी, सद्गुरु से पूछे तो कहेंगे कि पहले उदासी देर तक टिकती थी अब थोड़ी देर को ही और यह उदासी तो एक सबक सिखाने आई है कि कैसे बच्चों को और अच्छा सिखाया जाये ! कल बच्चों के लिए फाइलें लेकर गयी थी ताकि वे उसमें अपनी बनाई ड्राइंग रख सकें. कल की धूप-छाँव के बाद आज पुनः बादल छाये हैं, सावन से पूर्व ही यहाँ सावन आ जाता है. नौ बजे गाड़ी उन्हें मृणाल ज्योति ले जाने आएगी. पेट में कुछ गड़बड़ है उसी का परिणाम है गले की खराश, आजकल जून को अपनी सेहत की फ़िक्र हो रही है सो वे कुछ ज्यादा खाने लगे हैं, देखें कब तक ऐसा चलता है.

Sunday, July 31, 2016

दर्द का अनुभव


सन् अठानवे में TTC Phase1(शिक्षक कोर्स) भी कर लिया और उसके बाद से पूर्णकालिक शिक्षिका हैं और सदा यात्रा करती रहती हैं, सरल स्वभाव है, रंग गोरा है, मीठा बोलती हैं, धीरे-धीरे बोलती हैं, उसे उन्होंने मन्त्र दीक्षा दी है. स्नेहमयी हैं, मस्त हैं और प्रसाद पूरी रुचि से ग्रहण करती हैं. गुरूजी के प्रति पूर्ण समर्पित हैं, कहती हैं कि वे सब कुछ जानते हैं. सहज समाधि कहाँ हुआ, किसके घर हुआ, उसे तो सुनकर ही सिहरन होने लगी. सद्गुरू के साथ उन्हें भी कृपा के कई व्यक्तिगत अनुभव हुए हैं. वह जादूगर हैं..ईश्वर से अभिन्न हैं, ऐसे महापुरुष, महात्मा कभी-कभी ही होते हैं, बिरले ही होते हैं. वह एक सखी के यहाँ बैठी थी, उनकी प्रतीक्षा कर रही थी कि सहज ध्यान होने लगा. सद्गुरू का भावपूर्वक स्मरण करते ही वह भीतर अनुभूत होने लगते हैं, वह एक ही सत्ता है, वह कैसी अनोखी सत्ता है..जितना रहस्य खुलता जाता है, उतना ही बढ़ता जाता है.  

आज बैसाखी है, पंजाब का त्यौहार ! फसलों और मेलों का उत्सव ! कुछ लोगों को उसने SMS संदेश भेजा है. कल से बीहू की छुट्टियाँ हैं. जून का दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ है. पूरा एक महीना होने को है. आज वह न तो टहलने गये न ही सुबह प्राणायाम, व्यायाम आदि कर पाए.

बीहू का पहला अवकाश. मौसम आज खुला है. धूप के दर्शन हो रहे हैं. कल रात जून को दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी. उनकी छाती में दायीं ओर पसलियों में दर्द होता है, दिल की धड़कन भी महसूस होती है. कल डिब्रूगढ़ दूसरी बार गये इसी सिलसिले में. इस वक्त भी लेटे हैं. मानव का बस, बस थोड़ी दूर तक ही चलता है, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के सामने उसका कोई बस नहीं चलता. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजने को हैं. वह सहज ध्यान करने बैठी तो दुनिया भर के विचार आने लगे, पहले कुछ शारीरिक व्यायाम करके ध्यान करने बैठो तो सहज ही होता है !
योग शिक्षिका का SMS आया है –

छोटे से जीवन में छोटी सी
मुलाकात थी प्यार भरी
आज आपका शब्दों का गुलदस्ता पाया मैंने और समर्पित किया उनको जो मुझे बनाये आप जैसे उनके प्यारों के लिए !  

उसे जवाब लिखना है –

माना छोटी सी थी मुलाकात
दिल ने दिल से कर ली बात,
आपका जीवन जन-जन अर्पित
सृष्टा को है पूर्ण समर्पित !

शांति सरलता की जो मूरत
सदा प्रेम झलकाती सूरत,
नृत्य भरा कदमों में जिनके
याद रहेगी उनकी मन में !

मस्त चाल अनोखी मुद्रा
सजल नयन विश्वास भरा,
सारी पूजाएँ, अर्चना
हों एक के लिए सदा !





Saturday, July 30, 2016

चाट का स्टाल


आज उनके घर में इस ध्यान कक्ष में ‘सहज समाधि’ कोर्स का पहला भाग सम्पन्न हुआ ! सद्गुरु की कृपा उनके शहर पर हुई है उनके घर पर भी हुई है, उन सब पर हुई है. सदा से ही थी पर वे उसे  अनुभव कर सकें ऐसी पात्रता भी तो चाहिए ! आज सुबह उसने गुरू पूजा की तैयारी की, ठीक समय पर टीचर आ गयीं, कुल उन्नीस साधक हो गये, तीन ने पहले ही कोर्स कर लिया था, उसे और पिताजी को मिलाकर सोलह ने दीक्षा ली. पहले सहज समाधि का अर्थ बताया फिर मस्तिष्क की कार्य प्रणाली, फिर तनाव का कारण..और फिर एक-एक करके मन्त्र दिए. सात बार मौन होकर जाप करने को कहा, बीच-बीच में सात सामान्य श्वास लेनी हैं. उसे छोटा सा मन्त्र मिला है, सुंदर है, हो सकता है सभी को यही देते हों, क्योंकि किसी को बताना तो है नहीं, है न गुरूजी का ट्रेड सीक्रेट ! बहुत अच्छी तरह सारा कार्य हो गया, अब कल सुबह नौ बजे से एक घंटा ध्यान होगा तथा परसों भी. उसने कल कितनी जगह फोन किये लेकिन दो महिलाओं को छोड़कर कोई नहीं आया, जो लोग एडवांस कोर्स कर रहे हैं, उनमें से ही अन्य सभी लोग आये. जून अभी तक फील्ड से नहीं आये हैं, सम्भवतः अब आ रहे हों. आज कितना हल्का-हल्का लग रहा है, वैसे तो रोज ही लगता है पर आज सद्गुरु का एक काम उनके घर पर हुआ, वे निमित्त हुए, आर्ट ऑफ़ लिविंग परिवार का हिस्सा तो वे थे ही आज उस पर मोहर लग गयी. आज का दिन खास है. आज पिताजी ने अपने जीवन में पहली बार मन्त्र दीक्षा ली. उन्होंने बाद में अभ्यास भी किया, उनका जीवन सफल माना जा सकता है, उम्र के अस्सीवें वर्ष में हैं पर जोश जवानों से बढ़कर है, जीवन दर्शन बहुत ऊंचा है, प्रेम भी है पर थोड़ा  क्रोध है और अभी तक परमात्मा का पूर्ण अनुभव नहीं किया है, झलकें अवश्य पायी होंगी. उसे इस क्षण लग रहा है जैसे कुछ करने को नहीं है, कृत-कृत्य हो गया है मन..प्राप्त-प्राप्तव्य हो गयी है आत्मा..   
पिछले साल इन्हीं दिनों दीदी अपने बड़े पुत्र के विवाह की तैयारी कर रही थीं और वे भी यहाँ योजना बना रहे थे कि जाना है भांजे की शादी में...
महीनों से करती तैयारी..     
भरे उमंग, उत्साह अति मन में  
सारे घर को चमका डाला
कितना कुछ नया मंगवा डाला
दुकानों में जातीं लम्बी फेहरिस्तें
मेहमानों के आने के देखे रस्ते
साड़ियाँ, सूट और रेशमी परिधान
सपनों में आने लगे अब तो थान
कार्ड छपवाने से हाल बुक करने तक
चाट, मिठाई के स्टाल लगाने तक
सजाने हैं फूलों से आंगन और हाल     
बेटे की शादी है नहीं कोई खेल !

थोड़ी देर पहले टीचर से मिलकर आयी, उनके घर पर बचपन से ही आध्यात्मिक माहौल था. पिताजी रामकृष्ण मिशन से जुड़े थे, कई संत उनके घर आकर रुकते थे, भविष्यवाणी की थी कि वह भी अध्यात्म के पथ पर चलेंगी, पर वह ऐसा मानती थीं कि दोनों मार्ग साथ-साथ चलेंगे. सामान्य जीवन भी अपने कर्म से चलेगा और अध्यात्म का भी एक उचित स्थान रहेगा, पढ़ाई आदि उसी तरह की, लेकिन सन सतानवे में बेसिक कोर्स करने आश्रम गयीं तो वहाँ योग की टेकनीक सीखने गयी थीं पर गुरूजी से मिलने के बाद जो अनुभव हुआ, वह अविस्मरणीय था. उसने जीवन की दिशा ही बदल दी.



Friday, July 29, 2016

सहज समाधि


शाम के सात बजे हैं, आजकल बादल जब देखो तब बरसने लगते हैं. इस समय भी सुबह से शायद दसवीं बार मूसलाधार वर्षा हो रही है. जून क्लब गये हैं, वहाँ stress managment पर कोई योग का कार्यक्रम है. उसकी बाईं आँख के निचले कोने पर हल्का सा दर्द हो रहा है, शायद कोई छोटा सा दाना निकला है. माँ बहुत कहने पर अब लेट गयी हैं, पहले दिन भर उन्हें लेटना पसंद था, अब घंटों बैठी रहती हैं. उनका व्यक्त्तित्व बिलकुल बदल गया है, लेकिन कई बातें पहले की तरह हैं पर हैं वे सारी की सारी नकारात्मक. अभी कुछ देर पूर्व सुना मुरारी बापू कह रहे थे, अहंकार, स्वार्थ और कपट गुरु कृपा से दूर रखते हैं. नूना कभी-कभी तेज स्वर में बोलने लगती है, यह अहंकार का ही रूप है. स्वार्थ थोड़ा भी नहीं है, ऐसा तो नहीं कह सकते, निज की मुक्ति की कामना तो है ही, कपट भी अक्सर झलक जाता है, अब चाहे भले के लिए ही बातों को वे जैसी हैं वैसी प्रकट न करके उन्हें मधुर करके सहज करके प्रस्तुत करती है, लेकिन उस छिपाव में किसी का अहित करने का भाव नहीं है और सबसे बड़ी बात कृपा का अनुभव हर क्षण होता है.

पिताजी लौट आए हैं. आज सुबह आकर उन्होंने स्टोर के खाली डिब्बों को भर दिया है. वे लाये हैं- आंवले का मुरब्बा, पेठे की केसरिया मिठाई, मावे का लड्डू, मूँगफली, चने, मिस्सा आटा, किशमिश, काजू, बादाम, हरे चने, ककड़ी, खजूर, बिस्किट, राजधानी ट्रेन में मिला सामान और भी एक वस्तु- अंजीर ! वह आठ दिनों के लिए बेटी के घर गये और उनका कितना काम करके आये हैं. सामने और पीछे के स्थान की सफाई, दोनों कूलर साफ करके इस्तेमाल के योग्य करवाए. ट्यूब लाइट साफ करवाई, घड़ा लाकर दिया और भी न जाने क्या-क्या. घर में एक जिम्मेदार बुजुर्ग के रहने से घर ठीकठाक चलता है, जहाँ पति-पत्नी दोनों काम पर जाने वाले हों वहाँ घर के कुछ काम छूट ही जाते हैं. कम्प्यूटर पर बैठकर कुछ लिखा नहीं आज. नेट पर नन्हे का साईट देखा, फेसबुक पर बड़े भांजे ने उसके जवाब दिया है उसके प्रश्न का. सारी सुबह पिताजी के लाये सामानों को व्यवस्थित करने में निकल गयी. दोपहर माली से बगीचे में काम करवाने में. अभी कुछ ही देर में जून आने वाले होंगे शाम का कार्यक्रम आरम्भ हो जायेगा, इसी तरह एक और दिन बीत जायेगा, इस जीवन का एक और दिन कम हो जायेगा. हजारों लोग इस समय यही बात सोच रहे होंगे, हजारों हँस रहे होंगे और न जाने कितने आत्मबोध को पा रहे होंगे..एक तरह से देखे तो सभी कुछ व्यर्थ है और दूसरी तरह से देखे तो सभी कुछ सार्थक है. यहाँ होना ही काफी नहीं है क्या ? हर कोई स्वयं को कुछ साबित करना चाहता है, हर कोई अपना विज्ञापन की रहा है, लेकिन अंततः तो वह तड़प आत्मा ही की है या कहें परमात्मा की..चेतना की..जो न जाने कितने-कितने रूपों में प्रकट होना चाह रही है, न जाने कितने चेहरे लगाकर एक ही सत्ता.
.सद्गुरु कहते हैं, साधक उनका काम करें और वे तो उनका काम कर ही रहे हैं. आज उसे एक सुनहरा मौका मिला है सद्गुरु का काम करने का. सुबह ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की एडवांस कोर्स टीचर से मिलने गयी, जो इटानगर से आयी हैं. दो दिन पहले ही गुरूजी ने उन्हें कहा कि यहाँ एडवांस कोर्स कराना है. उनकी कृपा यहाँ के लोगों पर कुछ विशेष ही बरस रही है. उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं या सही होगा कि सद्गुरु चाहते हैं कि उनके ‘सत्संग कक्ष’ में सहज समाधि कोर्स रखा जाये. उसने तत्क्षण ‘हाँ’ कह दी और अब कुछ लोग चाहियें जो कोर्स करें, उसने कई लोगों को फोन किये लगता है कुछ तो अवश्य ही राजी हो जायेंगे ! सद्गुरु की कृपा से अवश्य ही ‘सहज समाधि’ उनके घर में सम्पन्न होगा. कुछ वर्ष पूर्व वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी पर आज वह सम्भव है तो इसके पीछे परमात्मा की शक्ति ही काम कर रही है. उसकी कृपा कहें, प्रेम कहें या आनंद कहें, वह सब एक के ही नाम हैं. उनका सद्गुरु दुनिया में कहीं भी हो वह हर क्षण उनके साथ रहता है, रहा करता है, वह अनोखा है, अन्तर्यामी है और उस अनन्त गुणों को धारण करने वाले की नजर उन पर है, उसका हाथ उनके सिर पर है, उसकी दृष्टि उन पर पड़ी है, वह जीता-जगता परमेश्वर उन्हें अपनी झलक दिखाने खुद चलकर आया, प्यासा कुएं के पास जाता है पर यहाँ तो खुद कुआँ ही सामने खड़ा है, गंगा उनके द्वार आई है, सद्गुरु रूपी हीरा उन्हें सहज ही मिल गया है.