Saturday, June 6, 2015

नागलीला का रहस्य


उसे लगता है प्रेम कितने रूपों में उनके सम्मुख आता है, कई बार उन्हें स्वयं भी ज्ञात नहीं होता कि किसी के प्रति इतना प्रेम अंतर में छिपा है, पर वह अपना मार्ग स्वयं ही ढूँढ़ लेता है. जिस क्षण कोई ऐसा विशुद्ध प्रेम पाता है, वह क्षण भी दैवीय होता है और वह क्षण  एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया की परिणति होता है. ईश्वर के प्रति प्रेम भी ऐसे धीरे-धीरे मन में एकत्र होता जाता है. ईश्वर से जो प्रेम उसे मिलता है वह उसे सहेजती जाती है अनजाने ही, फिर वही प्रेम कभी आँखों से बह निकलता है तो कभी कोई गीत बनकर. प्रेम कचोटता भी है सहलाता भी है यह उदात्त बनाता है. सद्गुरु इसी प्रेम को भक्ति का नाम देते हैं, प्रेम के लिए प्रेम ! एक अनवरत धारा जो प्रिय के प्रति मन में बहती है, चाहे वह उसे जने अथवा न जाने, इसकी परवाह किये बिना, पर प्रेम अपना मार्ग खोज ही लेता है !

उसका नाम अंतर को पवित्र करता है, उसे जप में कभी आलस्य नहीं होता, अच्छा लगता है और नाम सुमिरन के अतिरिक्त बात करना भी बोझ मालूम पड़ता है. सद्गुरु का सत्संग मिलता रहे तो वह चौबीस घंटे वहीं बैठी रहे, सचमुच अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले निराले होते हैं, जगत से उल्टा होता है उनका व्यवहार. वह सांसारिक बातों में दक्ष न भी हो पर अपने चिर सखा कान्हा के सम्मुख वह सत्य में स्थित होती है, ईश्वर के सम्मुख वह अपने पूर्ण होश हवास के साथ प्रस्तुत होती है और तभी तत्क्षण उसकी उपस्थिति का भास भी होता है, वह इतना प्रिय है, प्रियतर और प्रियतम है कि उसके सिवा सभी कुछ फीका लगता है. लेकिन यह जगत भी तो उसी का प्रतिबिंब है. आज सद्गुरु ने कहा कि लोग उन्हें अन्तर्यामी कहते हैं पर उन्हें अपनी चप्पल का भी पता नहीं है, ईश्वर ही उनक द्वारा अनेकों कार्य कराते हैं.

आज पुनः उपवास का दिन आया है, साधना का विशेष दिन, यूँ तो उसके लिए हर घड़ी, हर क्षण साधना का ही क्षण है. अनुभव् हुआ कि अपने कर्त्तव्यों में, भौतिक कार्यों में थोड़ी असावधानी बरती तो तुरंत मन स्वयं को फटकारने लगा, वह कौन है जो भीतर से सचेत करता है, सुबह जगाता है, जो एक प्यास जगाये रखता है, भीतर जो सुह्रद बैठा है, जो अकारण दयालु है, कोई उसके प्रेम का पात्र है या नहीं वह इसकी भी परवाह नहीं करता.

आज प्रतिपदा है, नवरात्रि का शुभारम्भ, कल पितरों को जल अर्पण करने का दिन था. भारतीय संस्कृति में मृतकों के प्रति सम्मान दिखने के लिए भी कितना आयोजन है, पर आज वे अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं. आज सद्गुरु ने कितने सुंदर शब्दों में कृष्ण की नागलीला का वास्तविक अर्थ बताया, कालियानाग के फन विभिन्न वासनाओं के प्रतीक हैं जो सताते हैं, उनपर पैर रखकर कृष्ण जब नृत्य करते हैं अर्थात आत्मा जब वासनाओं पर विजय पा लेती है तो कालियानाग से मुक्त हो जाती है. आदिगुरू शंकराचार्य कृत ‘विवेक चूड़ामणि’ दीदी ने भेजी है, अद्भुत ग्रन्थ है. अनुपम है और महान है ! गुरू और शिष्य के बीच हुए अद्भुत संवाद के द्वारा वेदांत की शिक्षा प्रदान करने का अनूठा प्रयोग ! षट् सम्पत्ति से युक्त सदाचारी शिष्य ही ब्रह्म ज्ञान पाने का अधिकारी है. जीवन में शम, दम, नियम, सदाचार, अहिंसा आदि गुण हों तभी कोई प्रभु का ज्ञान पाने के योग्य है. अंतर में भक्ति और श्रद्धा भी अनिवार्य है.


Friday, June 5, 2015

अंगूर की बारी


आज उन्होंने प्रातः कालीन साधना बाहर लॉन में की पहली बार, सुबह सवा तीन बजे ही लाइट चली गयी, अंदर उमस थी. बाहर आते-जाते लोगों की आवाजें कानों में पड़ रही थीं, फिर भी अच्छा लगा. कल शाम वह उड़िया सखी से मिलने गयी, जो वापस उड़ीसा जा रही थी, पर आज सुबह वापस आ गयी क्योंकि ट्रेन ही वापस आ गयी. कहीं बम ब्लास्ट हुआ था. इन्सान अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए कितनों को हानि पहुंचाता है, ऐसे व्यक्ति स्वयं भी कभी सुखी नहीं रहते.

कल पढ़ा था, सत्य वही है जो सदा है, नित्य है, अर्थात उनका सच्चा स्वरूप ही सत्य है. जगत पल-पल बदल रहा है, इसे जैसा है वैसा ही स्वीकारना होगा क्योंकि यह तो है ही असत्य, तो असत्य में अगर सुधार करें भी तो असत्य ही रहेगा. सुधार की गुंजाइश तो सत्य में ही करनी चाहिए अर्थात यदि वास्तविक रूप अभी स्पष्ट नहीं दीख रहा हो तो उस पर से मैल झाड़नी है, पाना उसी को है जिसे पाकर खोना न पड़े, यदि खोना ही पड़े तो एक मिले या दस कोई अंतर नहीं पड़ता. ज्ञान की अनुभूति कितनी सुखद होती है, ज्ञान ही प्रेम बन जाता है और प्रेम ही भक्ति. उसे सद्गुरु के कार्य को आगे बढ़ाना है, अगले दो वर्षों में उनका संदेश पहुंचाना है, जब उनके कार्य को पच्चीस वर्ष हो जायेंगे और वे उन्हें मात्र पिछले दो वर्षों से जानते हैं, तेईस वर्षों तक वह अपना कार्य कर रहे थे पर वे अनभिज्ञ थे. शमा जल रही थी और वे अँधेरे में थे. जब तक ईश्वर की कृपा न हो व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकता.

आज गणेश पूजा का अवकाश है, गणेश चतुर्थी, उनके बारे में कई कथाएं बचपन से सुनी हैं. आज पढ़ी भी, वे विघ्नविनाशक हैं, लेकिन उसके इष्टदेव तो कान्हा ही हैं, जो प्रेम, ज्ञान और ध्यान के अध्येता हैं. जो अपनी ओर आकर्षित करते हैं. जो समता में रहने का, अमनी होने का मार्ग बताते हैं. मन व आत्मा के मध्य तो कल्पनाओं का एक बड़ा झुण्ड है पर उसके व आत्मा के मध्य तो कुछ भी नहीं, वह निकटस्थ है. उसे कृष्ण की परा प्रकृति का अंश होना है, जो शाश्वत है, चिन्मय है.


आज उसने बाइबिल की कुछ कहानियाँ पढ़ीं, यीशू के उपदेश दिल को छू लेते हैं. प्रेम से छलकता उसका हृदय उनके हृदयों को छू जाता है. वह गड़रिया है और वे उसकी भेड़ें, वे उसकी अंगूर की बारी हैं, वह उन्हें रोपता है फिर ध्यान रखता है. वे उसके आश्रित हों तो वह उन्हें धरती का नमक भी बना सकता है. वह चुन-चुन कर उनके दोषों को दिखाता है फिर उन्हें दूर करने को कहता है. वह प्रेम को सर्वोपरि मानता है, वे सभी मूलतः प्रेम की उपज हैं, यह जगत प्रेम के आश्रित है. यीशू भी उसे कान्हा की तरह प्रिय है वैसे ही जैसे कबीर, नानक, तुलसी और अन्य संत, माँ शारदा, रामकृष्ण परमहंस तथा विवेकानन्द उसे प्रिय हैं. सद्गुरु, बाबाजी तथा गुरू माँ भी उसे प्रिय हैं. प्रीति ही जगत में स्थिरता प्रदान करती है. प्रीति यदि सच्ची हो तो हृदय को पवित्र बनाती है. आज इस क्षण उसे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कहीं न कहीं उसके कर्त्तव्य निर्वाह में त्रुटि हो रही है पर उसके मन की प्रसन्नता तथा शांति तो अखंड है, यह अब भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती, यह आत्मिक है और आत्मभाव में रहने वाला, देहात्मबुद्धि से ऊपर हुआ मन अब यूँ ही विषाद ग्रस्त कैसे हो सकता है. भीतर जो कतरा था अब दरिया बन गया है !

Wednesday, June 3, 2015

पैर की मोच



इन्सान जो चाहता है, वह एक न एक दिन उसे मिलकर ही रहता है. चाहे परिस्थितियां वैसी न हों, जिसमें उसने वह कामना की थी. सेवा का अवसर मिले ऐसा उसने चाहा था पर इस तरह नहीं. खैर इसी का नाम जीवन है, यहाँ उतार-चढ़ाव उसी तरह आते हैं जैसे सागर में ज्वर-भाटा, यह प्रकृति का नियम है. समय सदा एक सा नहीं रहता. आज सुबह वे पौने पांच बजे उठे. कल रात को सोने में थोड़ी देर हो गयी थी. क्रिया आदि की, व्यायाम नहीं कर पायी, जो सांध्य-भ्रमण से हो जायेगा यदि जून समय पर आ गये. वह बिलकुल नहीं घबराए हैं सासु माँ के पैर की मोच देखकर. जो उनकी अनुपस्थिति में अपनी एक परिचिता के साथ उनकी किसी परिचिता के घर जाने पर उन्हें लग गयी है. ईश्वर उन सभी को ऐसी दृढ़ता दे. उनके मनों को इतनी शुद्धता भी कि किसी के प्रति कोई नकारात्मक विचार भी न पनपे. सभी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार करते, कहते हैं.

कल से उसे गुरूजी बहुत याद आ रहे हैं, उनकी कृपा दृष्टि उस पर अवश्य हुई है ! आज क्रिया के बाद भी अद्भुत अनुभव हुआ, पहले वंशी की आवाज सुनाई दी फिर कहीं से विचार आया कि ससुराल में पिताजी बच्चों को डिब्बा खोल कर दिखा रहे हैं और रंग-बिरंगे हिलते-डुलते से कुछ आकार डिब्बे में दिखे, उस क्षण कुछ और सोचा होता तो वह भी दिखा होता. बाद में गुरूजी की भी एक झलक दिखी. ईश्वर की कृपा ही धूल के एक कण को हिमालय की विशालता प्रदान करती है. सीमित को असीमित कर देती है. उनका ज्ञान अद्भुत है और सबसे अद्भुत है उनका प्रेम...उसका मन एक ऐसी शांति से भर गया है, असीम स्नेह से, अनंत प्रेम से और अनोखे आनंद से कि इस क्षण यदि मृत्यु उसके सम्मुख आये तो बाहें फैलाकर उसका भी स्वागत करे. उसके 
हाथ इतने बड़े हो गये हैं कि सारा ब्रह्मांड उनमें समा सकता है !


शाम हो चुकी है, वे अभी टहल कर आये हैं. दिन भर कोई गंभीर अध्ययन नहीं किया, बल्कि आजकल पढ़ने का समय कम ही निकाल पाती है. पर मन में चिंतन चलता है. पढ़े हुए को मथकर उसे पचाने के लिए अलग से कोई समय नहीं निकलना पड़ता, कार्य करते हुए ही मनन चलता रहता है. कोई नकारात्मक विचार मन में टिकता नहीं, फौरन कृष्ण का नाम अंतर में प्रतिध्वनित होने लगता है. कभी कोई मन्त्र या भजन की पंक्ति चलती रहती है, फ्लैश बैक म्यूजिक की तरह. कृष्ण बिलकुल सच्चा वादा करते हैं कि उनके भक्तों के कुशल क्षेम का भार वह अपने सिर पर ले लेते हैं. इसलिए जीवन जितना सहज और हल्का आज लगता है वैसा पहले नहीं था, कुछ वर्षों पहले. अब ऐसा लगता है जैसे हर वक्त ही वह ध्यान में है. एक अनोखी ख़ुशी पोर-पोर से फूटती रहती है, फूल से जैसे सुवास फूटती है. कहीं कोई चाह शेष ही नहीं रह गयी है, जीवन जब उस जीवन दाता ने दिया है तो उसे ही यह अधिकार है कि उसे चलाये. वह जो उसके दिल में रहता है, जो उसे उससे ज्यादा जानता है., जो उसके विचारों को सतह पर आने से पूर्व ही पढ़ सकता है, जो जीवन का स्रोत है. 

Tuesday, June 2, 2015

कान्हा की बांसुरी


आज सुबह गुरू माँ को कुछ देर सुना था, कह रही थीं कि अधिकतर महिलाओं को अपने पति की बचत आदि की कोई जानकारी ही नहीं रहती और अचानक जरूरत पड़ने पर बहुत परेशानी होती है. अभी कुछ देर पहले एक अनजान कॉल ने उसे कुछ देर के लिए व्यर्थ ही परेशान कर दिया, जो जून के बारे में पूछ रहा था, पर पता चल गया कि अभी भी डरने की शक्ति है ! जून को उसने फोन भी कर दिया, वह भी परेशान हुए होंगे शायद नहीं, उन्हें उसे अधिक अनुभव है. फोन उनके नये ड्राइवर का था, अभी दुबारा भी आया था, खैर ..जून ने आज ही अपना बीपी भी चेक कराया, थोड़ा अधिक है, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. किसी की सही कीमत का पता तभी चलता है जब उससे दूर जाने का भय हो. वह अपने मन की इस कमजोरी को नहीं जानती थी, आज का अनुभव कुछ नया सिखा गया है. वे संसार में रहते हैं तो प्रेमवश सभी से बंधे रहते ही हैं, पर इसी बंधन से मुक्ति ही तो मोक्ष है, आसक्ति से मुक्ति छोटे मन के लिए सम्भव नहीं पर जब कोई इस छोटे मन से पार चला जाये तो कोई भय नहीं, उस वक्त वह छोटे मन के साथ थी. आज पिताजी, बड़े भाई व छोटी ननद से बात की. पिताजी अब ठीक हैं पहले से. इसी महीने कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष सत्संग है उसे निमन्त्रण पत्र टाइप करने को दिया गया है, सेवा का छोटा सा कार्य...

आज पूर्णिमा है. रक्षाबन्धन का दिन. ‘जागरण’ में इसके महत्व पर सुना. सद्गुरु और कान्हा उसके लिए एक हो गये हैं. दोनों ही से वह साहित्य के माध्यम से मिलती है, फिर ध्यान के माध्यम से, दोनों मनातीत हैं. कल पढ़ा कि शरीर में होने वाली संवेदनाएं किसी न किसी भावना की द्योतक हैं, यदि संवेदना को देखें और देखते-देखते वह खत्म हो जाये तो वह भावना भी नहीं रहती. ध्यान में तभी उनकी सभी नकारात्मक भावनाएं समाप्त होने लगती हैं और वे साफ-स्वच्छ होकर बाहर निकल आते हैं. ध्यान एक तरह से स्नान ही हुआ न... भीतरी स्नान, फिर जब नकारात्मकता नहीं रहती तब ज्ञान प्रकट होगा, प्रज्ञा जगेगी. अभी रास्ता लम्बा है, पर रास्ता भी कितना मोहक है, अद्भुत है. सद्गुरु का ज्ञान इसे और भी मोहक और आनंद प्रद बना देता है. यह तो जन्मों की साधना है.

आज सत्संग उनके यहाँ है, जून का जन्मदिन है. सुबह से सभी के फोन आ रहे हैं. दो बजने को हैं. शाम बहुत व्यस्त बीतने वाली है. आज भी झकझोरने वाला प्रवचन सुना, संत निर्भीक होता है, वह सिर्फ देता है और जिसे कुछ चाहिए नहीं वह डांट भी सकता है. उनके सम्मुख जाते ही झूठ उजागर हो जाता है. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत होती हैं पर उन्हें जीवन में उतारने से वे पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस कान्हा की बांसुरी की तरह है जो स्वयं पीड़ा सहकर मधुर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है तभी कृष्ण के अधरों से लगती है, वैसे ही संत, संत होने से पूर्व विरह की आग में जलते हैं फिर प्रभु से दीदार होता है. और प्रभु के मुख बन जाते हैं वह, उसकी तरफ से बोलते हैं, उसका कार्य करते हैं. जब किसी के जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, वह भी उस प्रभु का साधन बन जाता है.



उत्तर काण्ड


कल की तरह आज भी मौसम गर्म है, वर्षा जो उन्हें शीतलता प्रदान करती थी पुनः आएगी और तब यह गर्मी नहीं रहेगी. द्वन्द्वों से भरा है यह जग, रात और दिन की तरह ये जीवन में आते रहते हैं लेकिन जो समर्पण का राज जानता है वह हर स्थिति में बिना शिकायत के रहना सीख जाता है. आज पहली बार उसने रामचरित मानस के ‘उत्तर कांड’ में संत कवि तुलसी दास की अद्भुत लेखनी का प्रभाव देखा. वे भक्ति और ज्ञान, सगुण और निर्गुण के प्रति सारे संशयों को खोलकर रख देते हैं. कवि के प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है. जीवन जीना एक कला है और जीवन में अनुशासन को कायम रखना भी. प्रकृति के सारे कार्य अपने निर्धारित समय पर होते हैं, एक पल के लिए भी वह नहीं चूकती, लेकिन मानव प्रमाद के कारण चूक जाता है. कल वे एक परिचित के यहाँ बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गये थे. रात को देर से लौटे, सुबह उठने में देर हुई. कल सुबह ही उस सखी की सासु माँ से बात की, जिसके ससुर गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं. वह बहुत उदास थीं, उनके सब्र का बांध जैसे टूट गया है. उसे उनसे सहानुभूति है. आज सुबह-सुबह जून के मित्र ने उन्हें फोन करके आने को कहा तो उन्हें आशंका हुई, जो बाद में सही निकली. परसों रात्रि नींद में ही उनके पिता ने अंतिम श्वास ली. वे कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे. आंटी अभी तक यह सदमा सह नहीं पा रही हैं. वक्त ही सबसे बड़ा मरहम है, जैसे – जैसे समय बीतेगा उनका दुःख कम होगा. वह दोपहर बाद तक वहीं थी. शाम को भी वे गये. घर में सभी उदास थे पर मित्र को देखकर ऐसा नहीं लगता, वह भावनाएं व्यक्त नहीं करते.

प्रारब्ध कहें या हारमोंस की शरारत, आज ईश्वर के लिए अश्रुपात करने की जगह यूँ ही आंसू बहने को आतुर हैं. मन भर आया पहले और फिर मन मुरझा गया, पर उसे लगता है कि कोई कर्म कट गया जैसे, बाकी सब तो बहाने होते हैं निमित्त मात्र. कर्ता तो उनके भीतर है, भीतर कुछ घटता है तभी बाहर उसको सहयोग दिलाने के लिए घटनाएँ होती चली जाती हैं. उनके जीवन में जो कुछ भी घटित होता है उसके एकमात्र कारण वे स्वयं होते हैं. सुबह जून ने उत्साह पूर्वक कहा कि अमेरिका में उनके ममेरे भाई भी रहते हैं वहाँ उनसे भी मिलेंगे. उन्हें पूरा विश्वास हो चला है कि वर्ष के अंत में वह टूर पर अमेरिका जा रहे हैं. अभी तक कम्पनी से अप्रूवल नहीं मिला है.

जून बाहर गये हैं, अगले हफ्ते लौटेंगे. आज नन्हा सुबह नाश्ता नहीं कर पाया, बस में खायेगा, कल उसे और भी जल्दी उठाना होगा. दोपहर को स्टोर की सफाई करनी है. अभी उसने कृष्ण का सुमिरन किया तो उसने ऐसी मौन भरी मुस्कान का उपहार भेजा. उसका नाम भी एक बार प्रेम से पुकारो तो मन ठहर जाता है, जीवन तब बहुत सरल लगता है, सहज रूप से वे जी पाते हैं वरना तो मुखौटों से पीछा नहीं छूटता, पर प्रभु के सामने कोई मुखौटा नहीं चलता. उसकी एक सखी ने कहा, वह दुबली लग रही है, कहीं कोई रोग तो नहीं, उसे अच्छा नहीं लगा, फिर स्मरण हो आया उसे तो अच्छा या बुरा लगने की मनोदशा से ऊपर रहना है. सद्गुरु का स्मरण हो आया, उनकी आत्मा के साथ उसकी निकटता है जैसे कृष्ण के साथ. कान्हा तो स्वयं उसकी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना चाहे तो दर्पण में स्वय की आँखें देख लेती है वह और सद्गुरु एक ही हैं और वे तीनो फिर एक हो जाते हैं. इस एकता की अनुभूति में अनोखा आनंद है, शांति है, यहाँ कोई भेद नहीं रहता, यह सहना है उस अथाह प्रेम को जो भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है...


Monday, June 1, 2015

मैंगो शेक की पार्टी


कल शाम ही वे तावांग की यात्रा से वापस लौट आये, वापसी की यात्रा भी निर्विघ्न सम्पन्न हुई. दोपहर का भोजन एक ढाबे में किया. सुबह बोमडीला से चले तो सर्दी बहुत थी, स्वेटर, शाल सभी कुछ पहना हुआ था पर पहाड़ खत्म होते न होते ही मौसम का मिजाज बदल गया. अज सुबह जल्दी उठे, नन्हे को पढ़ने जाना था. ढेर सारे कपड़े धोये, अभी सभी को सहेज कर रखना है, पहले प्रेस भी करने हैं. यात्रा ने मन प्राण को नवीन उत्साह से भर दिया है. आज भांजी की मंगनी की रस्म भी होने वाली है. कल ही वे फोन करेंगे ताकि सब समाचार मिल सकें. अभी उन्हें तावांग यात्रा में खींचे गये फोटोग्राफ्स का भी इंतजार है. आज सुबह जागरण नहीं सुन पायी, यात्रा के दौरान एक दिन सुना था, “जीवन भी एक यात्रा ही है और उसमें इस शरीर में मिला जीवन तो एक पड़ाव भर है, अगले जन्म में अगला पड़ाव. जैसे शंकर जी के मंदिर में चढ़ने के लिए सीढियां होती हैं, वैसे ही असली मंजिल पर जाने के लिए यह जीवन-मृत्यु सीढ़ी की तरह है. यहाँ कुछ भी चिर स्थायी नहीं है, न ही साथ जाने वाला है सिवाय उस शांति के जो मानव का जन्म सिद्ध अधिकार है. मानव यहाँ दुःख उठाने नहीं आये हैं. इस पथ पर गोविन्द पग-पग पर साथ हैं.”

कल दिन भर बादल बरसते रहे, आज भी रह-रह कर वर्षा हो रही है. कल शाम को उसने तावांग यात्रा पर लेख टाइप करना शुरू किया है. तीन-चार दिन में पूरा करना है. कल रात को नन्हे ने उनके कमरे का फोन का कनेक्शन निकाल दिया, ताकि उन्हें पता न चले, पर देर रात उसे फोन पर बात करते सुना. इस उम्र में बच्चे कुछ कार्य छुपा कर करते ही हैं, चाहे उन्हें घर में कितना भी खुला रहने को कहा जाये. ज्यादा सुविधाएँ भी उन्हें बिगाड़ देती हैं, अपने मूल उद्देश्य से भटककर वे अन्य कार्यों में अपना समय लगाने लगते हैं. आज कई दिनों बाद धूप निकली है, पर मौसम में ठंडक अभी भी मौजूद है. कभी-कभी जीवन  परीक्षा लेता है, ऐसे में ईश्वर पर अटूट विश्वास ही स्थिर रख सकता है. धागे जो उलझ गये हैं अपने आप ही सुलझ जायेंगे, अभी जहाँ अंधकार नजर आता है कल वहीं प्रकाश होगा. वह परम चेतना सभी के भीतर है, सभी को निर्देश दे रही है, सभी सुरक्षित हाथों में हैं, किसी को भी भयभीत होने की जरूरत नहीं है.


आज सुबह जून ने उसे जन्मदिन का कार्ड दिया, जिस पर उनके मन की भावनाएं अंकित थीं, वह उसे कुछ जताना चाहते थे. उन्होंने एक सुंदर उपहार भी दिया और एक चाकलेट भी. सुबह सबसे पहले ससुराल से फोन आया, फिर एक-एक करके पिताजी, भाई-बहनों, सखियों, ननदों, बुआ-फूफा जी सभी के फोन आये. शाम को कुछ मित्र परिवार आयेंगे. वह पाव-भाजी तथा आम-दूध रस यानि मैंगो शेक बनाएगी. नन्हा कल रात को कम्प्यूटर पर कोई कार्ड बना रहा था, कमरे की लाइट बंद करके, जैसे कि उन्हें आभास हो वह सो रहा है, बच्चे इस उम्र में रहस्यमय हो जाते हैं. खैर अपनी तरह से जीने का सभी को हक है. बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो उनकी अपनी सोच होती है. जून सुबह थोड़ा परेशान थे, यह भी स्वाभाविक है, पर उसे तो किसी भी बात पर अब परेशानी होती ही नहीं, आनंद का स्रोत यदि भीतर मिल गया हो तो ये छोटी-छोटी बातें असर नहीं करतीं. वे किसी और महान उद्देश्य को पाने के लिए यहाँ भेजे गये हैं, वह रहस्य उन सबके भीतर है, उसके ही निकट उन्हें जाना है. जीवन के हर क्षण का उपयोग उस परम सत्य की खोज में हो सके तो ही जीवन सफल है. रोजमर्रा का कार्य भी उसी ओर इंगित करे, विचार, आचरण भी वही दर्शाए. अनुभव सच्चा हो, सजग होकर रहें, जीवन को एक विराट परिदृश्य में देखें. वे सभी श्वास के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े हैं, उनकी चेतना परम चेतना का ही अंश है ! वे अपरिमित शक्ति के स्वामी हैं ! 

Friday, May 29, 2015

शिशु के नयन


कल शाम को बहुत दिनों के बाद पिताजी से बात की, अच्छा लगा, उन्हें भी अवश्य लगा होगा. कल  योग शिक्षक भी साप्ताहिक भजन में आये थे, उन्हें सर्दी लगी हुई थी पर भावपूर्ण माँ के भजन उन्होंने गाए. उसे माँ शारदा तथा संत श्री रामकृष्ण का स्मरण सत्संग में हो रहा था, सो रात को स्वप्न में उनके दर्शन किये, उनके चुप रहते हुए भी भीतर से जैसे कोई बोल रहा था, जैसे माँ बोल रही थी, अद्भुत था वह स्वप्न ! आज सुबह क्रिया में भी नवीन अनुभव हुआ, क्रिया के बाद ‘सोहम’ शब्द स्पष्ट सुनाई दे रहा था, नाद के बारे में पिछले दिनों पढ़ा भी है. उसे ऐसा लग रहा है अब पिछले कुछ दिनों से आध्यात्मिक यात्रा सुचारू रूपसे चल रही है. वह कान्हा तो अच्छा लगता ही था, रामचरितमानस पढ़ते-पढ़ते तुलसी के राम भी अब अच्छे लगते हैं. कितना प्रेम है राम के अंतर में और कितना प्रेम है तुलसी के हृदय में राम के लिए. भारतीय संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने के लिए अथवा विचारों के लिए ही नहीं है उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं, धार्मिक होने को एक संकीर्ण अर्थ में जब लोग लेते हैं तभी विवाद होता है, धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार..इसी जीवन में अपने इन्हीं नेत्रोंसे..उसको जानना और उससे बल पाना, परहित के लिए, यही सद्गुरु बताते हैं !

कल वे अस्पताल गये, एक सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, उसको एक नाम नूना ने भी दिया है. उसकी आँखें बहुत स्वच्छ हैं, उनमें से जैसे आत्मा झलकती है. सद्गुरु ने कहा था छह महीने तक बच्चा पूर्णतया निर्दोष होता है, वह ब्रह्म स्वरूप ही होता है. इसी भावना से जब कोई बच्चे का पालन करे तो उसे आनंद का अनुभव होता है. उस आनंद को शब्दों में व्यक्त करना असम्भव है. कल रात को उसने माँ को स्वप्न में देखा, वह किसी स्टेशन पर बैठी है तब अचानक माँ आ जाती हैं. वह भी जानती हैं कि वह शरीर नहीं हैं, नूना भी जानती है कि वह सूक्ष्म शरीर में हैं, पर वह पहले की तरह ही लग रही हैं, पूर्णतया स्वस्थ भी, फिर वह बातें भी करती हैं. वे घर आते हैं, दीदी भी हैं, मेहमान भी हैं, वे सभी को खाने की वस्तुएं देते हैं, माँ को भी, फिर चम्मच गिरने की आवाज आती है तो वह दीदी को कहती है, उन्हें पीने के लिए पानी से भरा गिलास भी देती है. माँ सभी को देख रही हैं, सब उन्हें देख रहे हैं, पर वह ठोस नहीं हैं. उसी स्वप्न में एक कौआ आकर सोये हुए लोगों पर चोंच से आक्रमण करता है, माँ उसे निस्पृह भाव से देख रही हैं. ईश्वर कहते हैं वे स्वयं को गंवाए नहीं, बिखेरें नहीं, आत्मा मन की कल्पनाओं के नीचे सुप्त है, पर है वही जिसकी सबको तलाश है. मौसम अब गर्म होने लगा है. रात को नींद पहले सी नहीं आई. एसी में सोना उसे नहीं सुहाता, हर वर्ष शुरुआत में ऐसा होता है फिर धीरे-धीरे अभ्यास हो जाता है. पर तितिक्षा को तो धारण करना ही होगा. आज जून ने वेज सैंडविच बनाया, बहुत स्वादिष्ट था, नन्हे को भी पसंद आएगा. दीदी ने उस दिन बताया भांजी की बात लगभग तय हो गयी है, उसके लिए दो किताबें भी ली हैं उन्होंने !

पिछले दिनों बहुत कुछ घटा बाहर भी और भीतर भी, बाहर की प्रतिध्वनि भीतर तक सुनाई दी और भीतर की बाहर तक. अब वस्तुएं कुछ स्पष्ट आकार लेती प्रतीत हो रही हैं. जब कोई देहबुद्धि से मुक्त होना चाहता है तो ऐसी बातों का प्रभाव मन पर क्यों लेता है जो उसके विपरीत होती हैं. अहंकार ही इसका कारण है. आलोचना होने पर अहंकार को चोट लगती है और फौरन प्रतिक्रिया होती है, जाहिर है मन के स्तर पर ही होगी, आत्मा के स्तर पर हो ही नहीं सकती. आलोचना को स्वीकार करने का यह अर्थ भी है कि बात सही है और वह इससे मुक्त होना चाहता है. इतनी चेतना रहे तो अंत ठीक होगा, वह एक-एक करके अपनी त्रुटियों को दूर करता चलेगा. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि साधना में कोई व्यवधान न पड़ने पाए, चाहे कुछ भी हो वह स्वयं को कितनी भी आलोचना का शिकार होते पाये या प्रतिक्रिया करते, क्योंकि साधना के पथ पर हर कार्य ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही होता है, वह साधक को बेहतर बनाना चाहता है, उसे स्वयं भी यही करना है और ईश्वर इसमें मदद करता है.